संपादकीय
छत्तीसगढ़ में कल 17 बरस की एक 11वीं की छात्रा की मौत हो गई। घटना की पूरी जानकारी सामने आई है। वह किसी के साथ प्रेम-प्रसंग में थी, और दोनों ने मिलकर कोई मोबाइल फोन खरीदा था, लडक़े ने शायद अपने हिस्से का पैसा दे दिया था, लडक़ी नहीं दे पाई थी। दो दिन पहले वह शाम को उस लडक़े के घर गई, रात वहीं रूकी, फोन को लेकर झगड़ा हुआ, तो उस लडक़े ने फोन रख लिया। गुस्से में लडक़ी ने जाकर पेट्रोल खरीदा कि वह आत्मदाह करेगी, लडक़े ने पेट्रोल छीनकर अपनी मोटरसाइकिल में डाल लिया, और चले गया। पीछे से लडक़ी ने सडक़ पर ही आत्मदाह किया, और बुरी तरह जली हालत में एक दिन बाद अस्पताल में वह चल बसी।
हम इस एक अकेली घटना को लेकर यहां लिखना नहीं चाहते, लेकिन बालिग-नाबालिग लोगों में जिस तरह के प्रेम और देह-संबंध हो रहे हैं, जिस तरह शादीशुदा जिंदगी से परे के बेवफाई के रिश्ते हो रहे हैं, जिस तरह कुछ पत्नियां प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों को निपटा दे रही हैं, और जिस तरह कुछ पत्नियों को डरे-सहमे पति भी प्रेमी के साथ बिदा कर दे रहे हैं, इन सब पर गौर करने और सोचने-विचारने की जरूरत है। समाज में एकदम से शादी के पहले के प्रेम और देह-संबंधों, और शादी के बाद के विवाहेत्तर संबंधों का विस्फोट सा हुआ है। ऐसा लगता है कि पहले तो दुपहियों से मिली आजादी, और उसके बाद मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर सवार होकर आई बड़े आकार की आजादी ने एक पीढ़ी में ही लोगों की सोच बदल दी, उनका तौर-तरीका बदल दिया, और समाज के ढांचे को बदलकर रख दिया। टेक्नॉलॉजी की वजह से मिली हुई नई आजादी, बनते हुए नए रिश्तों ने समाज के परंपरागत ढांचे को, लोगों की वर्जनाओं को एकदम से ढहा दिया है, और लोगों को मानसिक और शारीरिक रोमांच की संभावनाएं दिखा दी हैं। परंपरागत प्रेम का रोमांस अब एक रोमांच के साथ मिलकर कई तरह की नई दुनिया गढ़ रहा है। बालिग और नाबालिग होने के फर्क खत्म हो गए हैं, और शादीशुदा जिंदगी के बाद के प्रेम के संबंध भी हर दिन पहले के मुकाबले अधिक आम होते जा रहे हैं।
आज ही मध्यप्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट का एक कुछ हटकर फैसला आया है जिसमें 19 बरस की एक युवती की शादी 40 बरस के एक आदमी से कर दी गई थी, और तालमेल न बैठने की वजह से उसने मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने पर अपने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई, हाईकोर्ट ने प्रेमी के साथ रहती हुई इस युवती को इस बात की इजाजत दी कि वह वहां रहना चाहती है तो वहां रहे। अदालत ने इतना किया कि पुलिस की दो महिला सिपाहियों को 6 महीने तक इस युवती की हिफाजत के लिए ‘शौर्या दीदी’ नियुक्त किया है। इसके साथ ही इस केस को अदालत ने खत्म कर दिया। शादीशुदा महिला अपने प्रेमी के साथ रहने लगी, पति द्वारा दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने मामला सुना, और बालिग युवती के मनमर्जी के हक के हक में फैसला सुनाया। ऐसी व्याख्या अलग-अलग कई अदालतें कई मामलों में कर चुकी हैं, अभी कुछ दिन पहले ही एक दूसरा मामला आया था जिसमें एक शादीशुदा आदमी पत्नी से परे अपनी प्रेमिका के साथ रह रहा था, और उसे भी अदालत ने जायज ठहराया था। जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस तरह के उदार फैसले देने लगते हैं, तो समाज में हसरतें रखने वाले और लोगों का भी हौसला बढ़ता है। ऐसे फैसलों के बाद ये नजीरें निचली अदालतों में भी काम आती हैं।
अब दो नाबालिग लोगों का साथ रहना भी गैरकानूनी नहीं माना जा रहा, और दो बालिग लोग तो बिना शादी के, या परिवार की मर्जी के खिलाफ किसी भी तरह साथ रह सकते हैं, शादी करके भी, और बिना शादी के भी। ऐसे में आज समाज को भी अपने ढांचे के बारे में सोचना होगा, और समाज की सबसे छोटी ईकाई के रूप में लोगों को, और परिवारों को भी। अब चूंकि व्यक्तिगत संबंधों की आजादी का एक विस्फोट हो चुका है, इसलिए सामाजिक ढांचे के बिखर चुके कुछ टुकड़ों को जोडक़र अब वह पुराना समाज दुबारा नहीं बनाया जा सकता। आज चारों तरफ होने वाले बहुत से जुर्म ऐसे हैं, जिनमें नाबालिगों के प्रेम और देह-संबंध से बात शुरू हुई रहती है। अब परिवारों को यह देखना होगा कि लडक़े-लड़कियां दोनों ही पढऩे और खेलने के लिए, किसी कोचिंग के लिए, या पिकनिक के लिए घर के बाहर आते-जाते हैं, या किसी दूसरे शहर में रहकर पढ़ते हैं। ऐसे में इनके अपने संबंधों को बनने से अधिकतर परिवार रोक नहीं सकते। अब ऐसे में परिवार अगर चाहते हैं कि उनके बच्चे समझदारी के फैसले लें, तो उन्हें दोस्ती और मोहब्बत से दूर रहने की नसीहत देना फिजूल की बात होगी। नसीहत तो वही काम आ सकेगी जो एक बेहतर पसंद, जिम्मेदारी के फैसले के साथ आजादी भी दे। आज बच्चों का आगे बढऩा, और दोस्ती-मोहब्बत से दूर रहना साथ-साथ नहीं हो सकता। जिस तरह एक वक्त बहुत रईस लोग अपने बच्चों को घर पर ही होम-स्कूलिंग में पढ़ाते थे, अब वैसा मुमकिन नहीं है। और जो परिवार अपने बच्चों को बाकी दुनिया से बचाकर रखने की कोशिश करते हैं, उनके बच्चे तरह-तरह के व्यक्तित्व विकास विकारों के शिकार होते हैं। यह न सिर्फ उन बच्चों, परिवारों, बल्कि बाकी समाज के लिए भी एक खतरा रहता है कि बच्चे समाज में बाकी लोगों से मिलने-जुलने से अलग रह जाएं। हमने ऑनलाईन संबंधों की वजह से घटने वाले असल जिंदगी के रिश्तों के खतरों पर कई बार लिखा है, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर कहा भी है। इसलिए बच्चों के सही व्यक्तित्व विकास, उनके जिंदगी के बाकी पहलुओं के विकास को साथ-साथ आगे बढ़ाने के लिए जो अकेला रास्ता हमें सूझता है, वह बच्चों को शुरू से ही समझदार और जिम्मेदार बनाने का है। इसका कोई शॉटकट नहीं है, यह उनकी बढ़ती उम्र के साथ-साथ उन्हें लगातार समझाने, भरोसे में रखने का एक लंबा सिलसिला है। इसके लिए मां-बाप को अपने बच्चों से कुछ हद तक दोस्तों की तरह बर्ताव भी करना पड़ेगा। बहुत से मां-बाप जो कि असल जिंदगी में जिंदा रहने की रोजाना की लड़ाई में लगे रहते हैं, वे न इतना वक्त निकाल सकते, और न ही उनकी इतनी समझ रहती। ऐसे में सरकार और समाज की एक भूमिका स्कूलों से ही बच्चों में एक समझदारी का व्यक्तित्व विकास लाने में बनती है। अब जिम्मेदार देश-प्रदेश, और समाज ऐसा करते भी हैं। भारत के साथ एक दिक्कत यह है कि यह एक साथ कई सदियों में जीता है, एक-एक पीढ़ी का फासला आमतौर पर 25 बरस का होना चाहिए, लेकिन बहुत से मामलों में एक पीढ़ी पहले के समाज की सोच एक सदी पुरानी भी हो जाती है। यह पूरा एक बड़ा जटिल मामला है, लेकिन जिम्मेदार सरकार को यह चाहिए कि वह समाजशास्त्रियों, और मनोवैज्ञानिकों की मदद से किशोरावस्था में पहुंचने वाले बच्चों को जिंदगी के प्रति एक जिम्मेदार नजरिया विकसित करने में मदद करें। इसके लिए इम्तिहान के पाठ्यक्रम से परे कुछ पढ़ाने का काम भी किया जा सकता है। इस तरफ ध्यान नहीं देंगे, तो नाबालिग बहुत किस्म के संगीन जुर्म में फंसते जा रहे हैं, और जुर्म के ऐसे आंकड़ों से परे, रोजाना की कई तरह की दिक्कतें वे खड़ी कर रहे हैं। आज के वक्त में बढ़ती हुई उम्र के साथ जिम्मेदारी और समझदारी को जोडऩा जरूरी है, वरना समाज को बहुत किस्म के नुकसान झेलने पड़ रहे हैं।


