संपादकीय
एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें बंगाली या असमी में दुकानों के बोर्ड दिख रहे हैं, बाजार के बीच जोरों से एक धार्मिक डीजे बज रहा है, एक धर्म के झंडे-डंडे दिख रहे हैं, कुछ लोग तलवारें लिए भी दिख रहे हैं, और सैकड़ों बालिग-नाबालिग लड़कियां लाउडस्पीकर पर बजते मां की गाली वाले एक गाने की धुन पर बावलों की तरह नाच रही हैं, और गाने में किसी के मां के शरीर के जिस अंग का ब्यौरा है, अपने शरीर के उस अंग की तरफ इशारा करते हुए भी नाच रही हैं। गजब का धार्मिक उत्साह दिख रहा है। कई लोगों ने इस वीडियो के महज स्क्रीनशॉट पोस्ट किए हैं कि इतनी गंदी गालियों वाले गाने-वीडियो वे पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन कुछ लोगों ने वीडियो भी पोस्ट किए हैं। यह शायद चुनाव के मुहाने पर खड़े असम या बंगाल का वीडियो दिखता है, और जाहिर तौर पर इस चुनाव के मकसद से इसे सडक़ पर किसी धार्मिक जुलूस में रिकॉर्ड किया गया, या अभी फैलाया गया है। किसी दूसरे धर्म के लोगों की मां को सबसे गंदी गाली देते हुए न सिर्फ यह गाना कम्पोज किया गया, बल्कि उसे रिकॉर्ड करके बजाया भी जा रहा है, और तेज आवाज के डीजे की धुन पर लड़कियों दीवानों की तरह नाच रही हैं। धर्म का मकसद पूरा हो गया लगता है।
अभी भारत में कई तरह के दूसरे मामले भी धर्म से जुड़े हुए सामने आए हैं। महाराष्ट्र में मंदिर ट्रस्टों का मुखिया, और एक हिन्दू ज्योतिषी, धर्म का और ईश्वर का नाम लेकर कोई सौ-डेढ़ सौ हिन्दू महिलाओं के साथ अपने सेक्स के वीडियो बनाकर बैठा था। इसके खिलाफ बलात्कार की शिकायतें सामने आईं, तो गिरफ्तारी के साथ पुलिस को इसके कब्जे से ऐसे करीब डेढ़ हजार वीडियो मिलने की खबर है। राज्य के बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेताओं से इसका गठजोड़ सामने आया है। राजनीतिक लोगों को बेशर्म बना ही देती है, लेकिन एक सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के नाम पर देवी-देवताओं की प्रतिमा-फोटो लगाकर, मंदिर बनवाकर जो आदमी इस तरह दर्जनों या सैकड़ों हिन्दू महिलाओं की जिंदगी बर्बाद करते रहा, और अब उनसे सेक्स के वीडियो छोड़ गया है, तो इस पर हिन्दू संगठनों ने क्या किया? यह सवाल हमारा बहुत मौलिक सवाल नहीं है, सोशल मीडिया पर बहुत सारे जाने-माने, परिचित, और जिम्मेदार प्रमुख हिन्दू लोग ही यह सवाल खड़ा कर रहे हैं। और इस सवाल से सहमति के साथ हम इसे दोहरा रहे हैं कि कहीं-कहीं इक्का-दुक्का होने वाली अंतरजातीय शादियों, या दो धर्मों के बीच होने वाली शादियों को लेकर, सहमति को भी अनदेखा करके बवाल तो आसानी से खड़ा हो जाता है, लेकिन जब एक-एक व्यक्ति इस तरह दर्जनों महिलाओं के साथ धर्म, आध्यात्म, तंत्र-मंत्र साधना के नाम पर सेक्स करता है, वीडियो रिकॉर्डिंग करके उन्हें ब्लैकमेल करता है, और उनकी पहचान को उजागर कर देता है, तो इस पर इन पीडि़त महिलाओं का धर्म क्या करता है? उसका झंडा-डंडा लेकर चलने वाले लोग क्या करते हैं? और बात महज इस नए ज्योतिषी या तांत्रिक की नहीं है, हर कुछ दिनों में ऐसे किसी का मामला सामने आता है। अलग-अलग नामों वाले आसाराम बलात्कारी साबित होते हैं, और पीडि़ता या शिकार के धर्म के लोग चुप रह जाते हैं क्योंकि बलात्कारी से उनके धर्म का नाम जुड़ा है। कई मामलों में तो ऐसा भी हुआ है कि इसे एक धर्म के संतों को बदनाम करने की साजिश भी कह दिया गया है। इसी आसाराम पर जब भक्त परिवार की नाबालिग लडक़ी ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी, तो देश भर से उसे एक हिन्दू संत को बदनाम करने की साजिश करार दिया गया था। और यह बलात्कार सुप्रीम कोर्ट तक साबित हुआ, आसाराम को उम्रकैद हुई, और उसे सिर्फ इलाज के नाम पर जमानत की राहत बरसों बाद किसी तरह मिल पाई है। लेकिन एक हिन्दू भक्त परिवार की नाबालिग हिन्दू बेटी के साथ बलात्कार पर हिन्दू समाज ने आसाराम को धिक्कारा हो, ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उसकी संस्था के भक्तजन अपने बीवी-बच्चों के साथ देश भर में सार्वजनिक जगहों पर उसके पर्चे बांटते रहते हैं, उसके नाम का पंडाल-शामियाना लगाकर प्रचार करते हैं। भक्त-समाज को इस बात की परवाह नहीं है, कि इन सबसे बलात्कार की शिकार उस लडक़ी के दिल पर क्या गुजरती होगी। इन्हें यह भी परवाह नहीं है कि देश की सबसे बड़े अदालत तक जो आसाराम मुजरिम साबित हो चुका है, उसके लिए हिकारत दिखाते हुए ये लोग आसाराम का प्रचार करते हैं। अलग-अलग नामों से अलग-अलग धर्मों में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जो अपने धर्म के सबसे घटिया लोग रहते हैं, लेकिन उस धर्म के लोग हैं कि धर्म के नाम पर उनकी पूजा जारी रखते हैं। यह धर्म से परे भी होता है, राजनीतिक दल या दूसरे संगठनों में लोग अक्सर ही अपने सबसे घटिया लोगों को बचाने के लिए, उनके साथ खड़े दिखते हैं।
लेकिन हम बात को धर्म से बहुत दूर ले जाना नहीं चाहते। जिस ताजा वीडियो से आज की यह चर्चा शुरू की है, हम अभी उसके धर्म की बात भी नहीं कर रहे। वह एक धार्मिक आयोजन है, उसमें पहले से रिकॉर्ड किए गए तेज संगीत में मां की गंदी गालियां लगातार दुहराने वाला गाना गाया जा रहा है, और उसके धुन-ताल पर नौजवान बालिग-नाबालिग लड़कियां लगातार झूम रही हैं, उसी गाने के हिंसक और अश्लील बोल दुहरा रही हैं, और यह सब एक दूसरे धर्म के लोगों के खिलाफ गाया जा रहा है, नाचा जा रहा है। अब जब धार्मिक नफरत और सांप्रदायिकता बढ़ते-बढ़ते नई पीढ़ी की लड़कियों तक को दूसरे धर्म के लोगों की मां के एक अंग पर केन्द्रित गालियों पर झूमने का उत्साह दे रही है, तो फिर लगता है कि धर्म ने अपनी साम्प्रदायिक जिम्मेदारी पूरी कर दी है। हम इस धर्म का जिक्र नहीं कर रहे हैं, कुछ लोगों को शक हो सकता है कि यह बात उनके धर्म के बारे में है, अपने धर्म को वे हमारे मुकाबले अधिक बेहतर जानते-पहचानते हो सकते हैं, लेकिन सभी धर्म के लोग यह बात सोचें कि अगर धार्मिक आयोजन दूसरे धर्म के लोगों की मां के बदन के एक छोटे से हिस्से पर हमले की गालियों का जलसा हो गए हैं, तो यह उस धर्म के ईश्वर को कितना पसंद आ रहा होगा? लोग ऐसे हमलावर बनकर भी धार्मिक भी बने हुए हैं, आस्थावान भी बने हुए हैं, और अपने धर्म के झंडे-डंडे लेकर भी चल रहे हैं। जिस मां को ये गालियां दी जा रही हैं, उसी मां के महिला-तबके की लड़कियां दूसरे धर्म के नाम पर इस तरह झूम-झूमकर मानो युद्धोन्माद में सिर हिला रही हैं, और वीर रस के गाने गा रही हैं!
जिन लोगों का धर्म पूरी तल्खी और पूरी हिंसा के साथ यह कर रहा है, उन्हें अपने धर्म के बारे में सोचने की जरूरत है, अपने बारे में सोचने की जरूरत है, और एक ऐसे आईने में अपना चेहरा देखने की जरूरत है जिसमें अपने पीछे उन्हें अपने ईश्वर, या धार्मिक प्रतीक भी दिखते रहें। धर्म ने अब भेड़ की खाल उतार फेंकी है, अब वह नाबालिग लड़कियों की इस भीड़ की शक्ल में अपने बड़े दांतों, और तेज नाखूनों के साथ खुलकर अपना मकसद पूरा कर रहा है। लोग अपने-अपने धर्मों के बारे में सोचें कि क्या अपनी नई पीढ़ी को इस तरह हिंसक बनाकर वे अपने धर्म को खतरे में डाल रहे हैं, या नहीं? हो सकता है कि इस धर्म की यह नई पीढ़ी दुनिया के किसी सभ्य देश में जाकर रहने का मौका पाए, और वहां पर उसे अपने बाहर निकले दांत, और नाखून घिसने का मौका भी न मिले। वैसे भी आज दुनिया के कोई जिम्मेदार-सभ्य देश लोगों के सोशल मीडिया खातों को देखे बिना उन्हें पर्यटक वीजा भी नहीं देते। उन देशों को इस बात की परवाह नहीं रहती कि हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट ऐसे वीडियो को अपने दखल के लायक नहीं मानता। हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी, और अनदेखी दुनिया के सभ्य देशों को प्रभावित नहीं करती, उनके अपने पैमाने हैं। जिन्हें कुएं से बाहर निकलकर जिंदगी जीनी है, उन्हीं को इन बातों की फिक्र होनी चाहिए, और जिन्हें कुएं में ही जिंदगी खत्म कर देनी है, उन्हें किसी वीजा की जरूरत तो पडऩी भी नहीं है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


