संपादकीय
भारत को पिछले कुछ समय से दुनिया का डायबिटीज-कैपिटल भी कहा जा रहा है, और यह भी कहा जा रहा है कि यह दुनिया में कमउम्र बच्चों में डायबिटीज की सबसे बड़ी जगह बन गया है। आंकड़ों के साथ एक दिक्कत यह है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आंकड़े अलग-अलग देशों में ऐसे कुल मरीजों की संख्या बताते हैं। होना तो यह चाहिए कि उन देशों की आबादी के अनुपात में ऐसे डायबेटिक कितने हैं, वह समझ आना चाहिए। फिलहाल जिस तरह भी आंकड़े हैं उनके मुताबिक भारत में चाइल्डहुड ओबेसिटी (बचपन में मोटापा) चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। करीब डेढ़ करोड़ बच्चे और ढाई-पौने तीन करोड़ किशोर-किशोरियां बहुत अधिक वजन वाले हैं। ये आंकड़े बढ़ते ही चल रहे हैं। और इनका पहला असर इन लोगों के आगे चलकर डायबिटीज का शिकार होने की शक्ल में सामने आता है। हम बहुत अधिक मोटापे (ओबेसिटी) और डायबिटीज को जोडक़र दोनों के लिए जिम्मेदार बातों पर कुछ चर्चा जरूरी समझते हैं।
बच्चों के बीच बाजार में मिलने वाले फास्टफूड, तरह-तरह के कोल्डड्रिंक्स, आइसक्रीम, चॉकलेट, और मिठाइयों जैसी भयानक मीठी चीजें तेजी से फैल रही हैं। जो संपन्न तबका है, उसके पास इन चीजों को खरीदने के लिए हमेशा ही पैसे रहते हैं, और अब घर बैठे कुछ भी बुला लेने की सहूलियत ने लोगों को रबड़ी या कुल्फी भी घर बुलाकर खाने का आराम दे दिया है। जब बाहर निकलने की जहमत भी न उठानी पड़े, तो यह खानपान खतरनाक हद तक बढऩा ही है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और चीजें भी हो गई हैं। कोरोना-लॉकडाउन के दौर में जिस तरह बच्चों को ऑनलाइन काम करना पड़ा, उनका स्क्रीन के साथ वह रिश्ता चलते रह गया। आज हिन्दुस्तान में किसी भी आय वर्ग के बच्चे और बड़े हर दिन कई घंटे स्क्रीन पर उलझे रहते हैं। खाने में भारी घी-तेल-मक्खन, नमक और शक्कर, मैदा और दूसरी नुकसानदेह चीजें, और चलने-फिरने, खेलने-कूदने की जगह स्क्रीन की कैद! नतीजा यह हो रहा है कि शक्कर और कैलोरी, घी और दीगर चीजें भीतर जा रही हैं, और बदन इनमें से किसी को खर्च नहीं कर रहा है। खेल के मैदान घटते चले गए हैं, गली-मोहल्ले की सडक़ों पर खेलने वाले बच्चों को माँ-बाप सडक़ हादसे के डर से वहां खेलने नहीं देते, घूम-फिरकर सबके पास मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम, या कम्प्यूटर पर वक्त गुजारना रह गया है। आज किसी भी तरह की भीड़ के बीच अगर यह देखें कि औसत वजन से अधिक के कितने लोग हैं, तो भीड़ उन्हीं की दिखती है।
हम भारत में अतिमोटापे के आंकड़ों को देखें, तो दस लाख की आबादी पर 34 हजार अतिमोटे बच्चे हैं। जंकफूड के प्रचार की वजह से 70 फीसदी बच्चे हफ्ते में 3 से अधिक बार जंकफूड खाते हैं। लेकिन जब हमने यह ढूंढना शुरू किया कि क्या मोटापे का अनुपात देशों की संपन्नता के अनुपात में होता है? गरीब देशों या समाजों के बच्चे आखिर क्या खाकर मोटे होंगे, तो एआई से मिला विश्लेषण बतलाता है कि गरीबों के बीच भी परंपरा घरेलू खानपान से हटकर अब लोग बाजार के बने हुए तरह-तरह के जंकफूड की तरफ जाते हैं क्योंकि मजदूर और कामकाजी माँ-बाप के लिए बच्चों को आसानी से तुरंत कुछ खाना देना आसान हो जाता है। कई गरीब देशों में बच्चे बाजार में मिलने वाले अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड अधिक पा जाते हैं क्योंकि परिवार फल-सब्जियों को अधिक महंगा पाते हैं। जंकफूड से बदन में कैलोरी तो जमा होती रहती है, लेकिन शारीरिक विकास के लिए जरूरी पोषण आहार नहीं मिलता। इसे ‘डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रीशन’ कहा जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में गरीब परिवारों में एक ही वक्त कुपोषण भी है, और मोटापा बढ़ाने वाले ओवरन्यूट्रीशन भी हैं! यह बात कुछ विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन इस सच्चाई का विश्लेषण करने वाले कहते हैं कि भूख और मोटापा एक ही घर में रहते हैं!
हमने डायबिटीज के विशेषज्ञ कई डॉक्टरों से पूछा तो उनका कहना था कि खूब शारीरिक मजदूरी करने वाले गरीब भी इन दिनों डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं। भारत सरकार के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि शहरी गरीबों के बीच कुपोषण और अतिपोषण का यह दोहरा बोझ तेजी से बढ़ रहा है। गरीब ग्रामीण महिलाओं में भी मोटापा चौथे सर्वे से पांचवें सर्वे के बीच चार फीसदी से बढक़र चौदह फीसदी तक हो गया, और शहरी गरीब महिलाओं में तो यह 20-30 फीसदी तक पहुंच गया है। अब बच्चे अगर मोटे दिख रहे हैं, तो जरूरी नहीं है कि वे सेहतमंद हों, वे कुपोषण के शिकार भी हो सकते हैं। ये सारे आंकड़े, और यह निष्कर्ष अटपटे लग सकते हैं, लेकिन ये सब सरकारी सर्वे से मिले हुए नतीजे हैं।
गरीबों के बीच भी बहुत से लोग बेरोजगार हैं, कई लोग बिना मेहनत वाले रोजगार में हैं, और आजकल हर किसी के पास सस्ते में मिला हुआ इतना डाटा है कि लोग मोबाइल फोन पर उलझे रहते हैं, सेहत के लिए कुछ नहीं करते। हम हर कुछ दिनों में लोगों को चलने-फिरने, साइकिल चलाने, सार्वजनिक जगहों पर लगी कसरत की मशीनों पर कुछ मशक्कत करने की सलाह देते रहते हैं। कई लोगों को लगता है कि वे तो दुबले-पतले हैं, उन्हें डायबिटीज का भला क्या खतरा हो सकता है? लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों के क्लीनिक जाकर देखें, तो दुबले-पतले मधुमेह-रोगी, दिल के रोगी, सभी बड़ी संख्या में मिल जाएंगे। दूसरी तरफ बढ़ते हुए अंधाधुंध मोटापे की वजह से बीमारियां सहेलियों सहित आती हैं, वे एक या दो बीमारी तक सीमित नहीं रहतीं।
दुनिया भर में मोटापे को घटाने के लिए अभी तक के सबसे सफल समझे जा रहे एक इंजेक्शन पर से भारत में पेटेंट एक हफ्ते में खत्म हो रहा है। 22 मार्च से भारत की बहुत सारी दवा कंपनियां इस इंजेक्शन को बनाकर काफी सस्ते में भारतीय बाजार में उतारने जा रही हैं। पांच-दस हजार रूपए महीने का यह इलाज अतिसंपन्न तबके को बहुत महंगा नहीं लगेगा, लेकिन इस दवाई के साथ-साथ डॉक्टरों का यह भी कहना है कि जब तक जीवनशैली में फर्क नहीं लाया जाएगा, वजन घटाने और फिटनेस बढ़ाने के दूसरे कई तरीके समानांतर चलाए नहीं जाएंगे, तब तक अकेले इस इंजेक्शन से करिश्मे की उम्मीद करना जायज नहीं होगा। हम कई तरह की टुकड़ा-टुकड़ा बातों को आज यहां इसीलिए लिख रहे हैं कि अमीर हों, या गरीब, या इन दोनों के बीच लोग हों, इन सबको मोटापे के बारे में, और डायबिटीज जैसी बहुत सारी बीमारियों के बारे में चौकन्ना रहने की जरूरत है। खानपान तुरंत काबू में लाना चाहिए, न सिर्फ मात्रा में, बल्कि किस्म में भी। दूसरी बात यह कि बदन की चर्बी पर जोर डालना चाहिए। इन दोनों सिरों से लगातार मेहनत ही लोगों को महंगे अस्पतालों से बचा सकती है।


