संपादकीय
ब्रिटिश संसद ने अभी एक फैसला लिया है जिसकी वजह से वहां सदियों से चली आ रही एक परंपरा खत्म होने जा रही है। वहां के लोकतंत्र में जो सामंती परंपराएं चली आ रही हैं, उनके खिलाफ नई सोच वाले लोग आलोचना करते आए हैं, और अब संसद में मतदान से यह तय किया है कि वहां के उच्च सदन (भारत की राज्यसभा जैसे) में राज परिवारों के लोग अपने शाही खिताबों की वजह से नहीं बैठ सकेंगे। एक विकसित, पश्चिमी, और आधुनिक लोकतंत्र किस तरह सदियों पुरानी सामंती परंपराओं का गुलाम बने रह सकता है, यह उसकी बहुत बड़ी मिसाल है। जिन शाही परिवारों के सेक्स-स्कैंडल न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया को हिलाते, और गुदगुदाते रहे हैं, वैसे ब्रिटिश शाही परिवारों के लोग हाऊस ऑफ लॉड्र्स में अपने खिताब की वजह से बैठते थे। एक दिलचस्प बात यह भी है कि वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड के वरिष्ठ पदाधिकारी भी बैठते हैं। शाही परिवारों के अलावा राजा अपने समर्थक सामंतों को भी जमीन या उपाधि दे देते थे, और यह उपाधि उनके परिवारों में किसी शाही विरासत की तरह चलती थी, और ऐसे कुनबों में पैदा होने की वजह से लोग ब्रिटिश संसद के उच्च सदन में बैठते थे! किसी पारिवारिक फर्म के मालिक की संतान जैसे दुकान की मालिक हो सकती है, कुछ उसी तरह का ब्रिटेन में वहां की उच्च सदन की सदस्यता का भी था। पहले ऐसे सैकड़ों सदस्य थे, लेकिन 1999 में इन्हें घटाकर 92 ऐसे वारिस-सदस्य रखे गए थे। चर्च ऑफ इंग्लैंड के 26 वरिष्ठ बिशप उच्च सदन के सदस्य रहते हैं, सदन की बहस में भाग लेते हैं, और कानूनों पर मतदान भी कर सकते हैं। कहने को ब्रिटेन एक धर्मनिरपेक्ष देश लगता है, लेकिन वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड को राजकीय चर्च माना जाता है।
भारत की संसदीय व्यवस्था का बुनियादी ढांचा ब्रिटेन से प्रेरित है, यहां ब्रिटिश हाऊस ऑफ कॉमंस की तरह लोकसभा बनाई गई, और हाऊस ऑफ लॉड्र्स की तरह राज्यसभा। दिलचस्प बात यह भी है कि भारत में इन दोनों सदनों की सीटों का रंग भी लंदन के संसदीय भवन के दोनों सदनों की सीटों की तरह रखा गया था। लेकिन जब भारतीय संसदीय व्यवस्था तय की गई तो संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश परंपराओं से ऊपर उठकर उससे बेहतर, और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई थी। इसे महज अधिक कहना बेइंसाफी होगी भारत में पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई। भारत में कोई वंशानुगत सांसद नहीं हैं, कोई धार्मिक प्रतिनिधि स्वत: इसके सदस्य नहीं हैं। इसके अलावा भारत में संसद से परे भी पुराने राजा-महाराजा, नवाब जैसे रहे हुए लोगों की राजकीय उपाधियों को कानून बनाकर खत्म कर दिया। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था राजपरिवार के बोझ को भी ढोती है। वहां एक ही शाही परिवार संविधान प्रमुख चले आ रहा है, और उसके भीतर विरासत की पीढिय़ां तय हो जाती हैं। जब तक पिछली रानी गुजर नहीं गई, तब तक उनका बूढ़ा हो चुका राजकुमार बेटा राजा नहीं बन पाया! दिलचस्प बात यह भी है कि ब्रिटिश शाही परिवार बहुत सारे देशों के आजाद हो जाने के बाद भी वहां का संविधान प्रमुख बना हुआ है। इसके पीछे ब्रिटेन की कोई ताकत नहीं है, लेकिन उन देशों की इससे उबरने की हसरत भी नहीं है। वो देश अपने आपमें पूरी तरह स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसे 15 देशों में ब्रिटिश सम्राट ही संवैधानिक प्रमुख हैं, उन्हीं की तस्वीर नोट, सिक्कों, और डाक टिकटों पर छपती हैं। इनमें बहुत से तो एक वक्त अंग्रेजों के गुलाम रहे हुए छोटे देश हैं, लेकिन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड जैसे कुछ बड़े देश भी ब्रिटिश राजा को अपना संवैधानिक प्रमुख मानते हैं। इसके साथ भारत के संविधान-प्रमुख, राष्ट्रपति के पद की तुलना करके देखें, तो यह पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यह किसी कुनबे की गुलाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्रपति को अपने सांसदों और विधायकों के वोटों से चुनते हैं, जो किसी भी धर्म, जाति के हो सकते हैं। भारत में अब तक बहुत से धर्मों के लोग, और महिलाएं भी राष्ट्रपति बन चुके हैं, और भारत की यह संवैधानिक व्यवस्था ब्रिटेन जैसे देश के सामने एक मिसाल है।
क्या भारतीय संसद की ऐसी कोई कल्पना की जा सकती है जिसमें पुराने राजे-महराजे बैठें, जिसमें चारों शंकराचार्य बैठें, या दूसरे धर्मों के इमाम या पादरी बैठें? क्या यह कल्पना की जा सकती है कि सेक्स-स्कैंडलों से भरा हुआ कोई परिवार सैकड़ों बरस से राष्ट्रपति भवन में काबिज रहे, और लगातार राष्ट्रपति रहे? भारत को अगर देखें तो इसने पहले ही दिन से जो संविधान बनाया, उसमें महिलाओं को बराबरी का मताधिकार दिया जो कि पश्चिम के बहुत से देशों में महिलाओं को मताधिकार देर से मिला। कहने के लिए फ्रांस में लोकतंत्र 1789 से माना जाता है, लेकिन करीब डेढ़ सौ साल बाद 1944 में पहली बार महिलाओं को वोट का हक मिला। एक सबसे आधुनिक माने जाने वाले देश स्विटजरलैंड में महिलाओं को 1971 में वोट का हक मिला, जो कि भारत के भी 20 बरस बाद की बात रही। भारत में 1950 में लागू संविधान के बाद 1951-52 के पहले आम चुनाव से ही पुरूष और महिला, अमीर और गरीब, जाति, धर्म, और शिक्षा के भेदभाव के बिना सबको बराबरी का वोट का हक मिला। आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक-दादा होने का दावा करने वाला अमरीका 1965 के मताधिकार कानून के बाद काले वोटरों के लिए रास्ता खोलने वाला बना। इसके पहले दशकों तक इसके लिए आंदोलन चला, और कई राज्यों ने काले वोटरों को रोकने के लिए वोट डालने पर टैक्स लगाया, उनके शिक्षित होने की शर्त रखी, और वोट से रोकने के लिए हिंसा और धमकी का भी इस्तेमाल किया। कई राज्यों में काले वोटरों के वोट शून्य रहते थे, फिर लंबे आंदोलन के बाद 1965 में कालों को वोट का असल हक मिल पाया।
आज जब ब्रिटेन में घटिया, सामंती व्यवस्था के खिलाफ वोट डला है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उच्च सदन में काबिज लोग घटने जा रहे हैं, तो इस मौके पर भारत की बेहतर संसदीय परंपराओं की भी याद आई। हर देश के सामने शर्म की तो कई बातें रहती ही हैं, जब मौका लगे, अपनी सकारात्मक बातों पर भी गर्व तो कर ही लेना चाहिए।


