संपादकीय
अमरीका के न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की एक रिसर्च-रिपोर्ट कहती है कि जो लोग नकारात्मक लोगों के साथ अधिक रहते हैं, या अधिक नकारात्मक लोगों के साथ रहते हैं, वे जल्दी उम्रदराज होने लगते हैं। शोधकर्ताओं ने 23 सौ से अधिक लोगों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के साथ-साथ उनकी लार के नमूनों को डीएनए विश्लेषण भी किया, और इन सबसे यह समझ आया कि तकरीबन हर किसी की जिंदगी में परेशान करने वाले लोग रहते हैं, और ऐसे एक नकारात्मक व्यक्ति की मौजूदगी से उम्र बढऩे की रफ्तार करीब डेढ़ फीसदी बढ़ जाती है। मतलब यह कि पूरी जिंदगी अगर एक नकारात्मक व्यक्ति आसपास है, तो लोगों की जिंदगी 9 महीने तक घट सकती है। अब इसे हम दिल्ली के प्रदूषण से जोडक़र देखना नहीं चाहते जहां वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां की प्रदूषित हवा में जीने वाले लोगों की उम्र कई बरस घट जा रही है, शायद 9 बरस तक। अब नकारात्मकता का यह एक नए किस्म का प्रदूषण सामने आया है।
हम पहले से नकारात्मकता के नुकसानों को समझते आ रहे थे, और इस बारे में बीच-बीच में कभी लिखते भी थे। नकारात्मकता सिर्फ निजी जिंदगी में नहीं, अगर देश-प्रदेश की हवा में है, शहर या मुहल्ले में लगातार कोई तनाव बने रहता है, नफरत की कोई वजह रहती है, तो उसका भी असर लोगों के जल्द बूढ़े होने की शक्ल में सामने आता है। आज की खबर में जिस वैज्ञानिक निष्कर्ष का जिक्र है, उसके बिना भी हमारी बुनियादी समझ का निष्कर्ष यही था, और हम किसी भी जगह नकारात्मकता, नफरत, हिंसा की हवा के खिलाफ लिखते आए हैं। हमारा तो यह भी मानना है कि लगातार इनके बीच जीने वाले लोगों के तन-मन का असर उनकी अगली पीढिय़ों तक भी जाता होगा, और हो सकता है कि एआई की मेहरबानी से अगले कुछ बरसों में ऐसे शोध-निष्कर्ष सामने आ भी जाएं कि नकारात्मकता की हवा लोगों के डीएनए में किस तरह का बदलाव लाती है जो कि अगली पीढिय़ों तक जाता है।
फिलहाल हम आज की बात करें, तो कुछ समझदार लोग पहले से इसका ख्याल रखते हैं कि उनके आसपास के लोग बहुत नकारात्मक सोच के न हों। फिर कई ऐसे लोग रहते हैं जो खुद तो बहुत नकारात्मक नहीं रहते, लेकिन जिन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों की जिंदगी की तकलीफों की कहानी का बखान बड़ा सुहाता है, और वे दूसरों की दिलचस्पी या जरूरत के बिना भी उन पर अपनी देखी या सुनी गई दुखदाई कहानियों को दुहराते रहते हैं। अगर दूसरों की जिंदगी के ऐसे दुख में आपके करने का कुछ नहीं है, आप उनकी कोई मदद नहीं कर सकते, तो उसे सुन-सुनकर उसमें डूब जाने का कोई मतलब नहीं रहता। हर किसी की अपनी जिंदगी की नकारात्मकता काफी रहती है, दूसरों से बिना मतलब उसे न सुनना चाहिए, न देखना चाहिए। जहां आपके सामाजिक सरोकार आपको मदद करना सुझाते हैं, वहीं पर आप शामिल हों, वरना अपने आसपास के किस्सेबाजों से कह दें कि आप इस तरह की बातों को सुनना नहीं चाहते।
यह बात सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन की नहीं रह गई है, अब तरह-तरह की चिकित्सा शास्त्रीय रिसर्च भी यही सुझाती है कि लगातार नकारात्मक रिश्तों की वजह से, वैसी बातों, या वैसे माहौल की वजह से लोगों में अलग किस्म के हार्मोन पैदा होते हैं, बदन में सूजन बढ़ सकती है, प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, दिल की बीमारी, डायबिटीज, और मानसिक रोगों का खतरा बढ़ सकता है। रिसर्च बताती है कि तनावपूर्ण रिश्तों, और कहानियों से शरीर की कोशिकाओं में डीएनए के स्तर पर बदलाव होने लगता है जिससे जैविक उम्र तेजी से बढ़ सकती है। कुछ और शोध नतीजे बताते हैं कि लगातार नकारात्मक सामाजिक अनुभवों से अवसाद (डिप्रेशन) और स्मृति का नुकसान भी हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि लोगों का अपने जीवनसाथी के साथ होने वाला तनाव कम नुकसानदेह रहता है, बजाय दूसरे लोगों से मिले हुए तनाव के। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों की असल जिंदगी में कुछ और किस्म के तनाव जुड़ गए हैं, इनसे भी छुटकारा पाने की जरूरत है।
कुछ लोग ऐसे रहते हैं जो आपके सोशल मीडिया पेज पर आकर गंदगी बिखेरकर जाने को अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। आपका सोशल मीडिया पेज आपका अपना रहता है। वहां पर आप उन्हीं लोगों से बात करना चाहते हैं जिनकी बातों से आप सहमत हों, या जिनकी असहमति की तार्किकता के महत्व को आप मानते हों। जो लोग आपके लिए लगातार तनाव खड़ा करते हैं, लगातार हिंसक बातें लिखते हैं, किसी प्रोपेगंडा के तहत आपके पेज पर गंदगी फैलाते हैं, उन्हें बिना देर किए ब्लॉक कर देना चाहिए। उनके पास अपनी सोच को फैलाने के और बहुत से जरिए हैं, ऐसे एक-एक व्यक्ति आपका बुढ़ापा आने की रफ्तार को डेढ़ फीसदी तक बढ़ा सकते हैं। ऐसे नकारात्मक लोगों के लिए अपनी जिंदगी क्यों खोना? कुछ समझदार लोग तो वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों पर भी उन लोगों को ब्लॉक करते हैं, जो सुबह होते ही लगातार नफरत और हिंसा की बातें भेजने लगते हैं। ऐसे लोगों की वजह से दिन में पहली बार अपना फोन खोलते ही एक तनाव होने लगता है। इसका रास्ता जानने के लिए हमें किसी मनोवैज्ञानिक, या किसी रिसर्च की जरूरत नहीं है, फोन पर, वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों पर, फेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पेज पर अनफॉलो करना, ब्लॉक करना जैसे कई विकल्प रखे गए हैं, और उनका इस्तेमाल पूरी तरह से शिष्टाचार के भीतर आता है। आज लोगों को अपनी खुद की जिंदगी के तनाव इतनी तरह के रहते हैं, काम का इतना बोझ रहता है, रोज की जिंदगी इतनी चुनौतियों से भरी रहती है, कि आप अवांछित नकारात्मक, नफरती, हिंसक, और बकवासी लोगों को झेलने के लायक नहीं रहते। फिर ऐसे लोगों का कोई कर्जा तो खाया हुआ है नहीं कि मजबूरी में उन्हें झेलना ही है। लोगों को बात आगे बढऩे के पहले इस शिष्टाचार का इस्तेमाल करना चाहिए कि व्यक्तिगत दुआ-सलाम का रिश्ता बना रहे, और नफरती असहमति को दूर रखा जाए। हम तो अपनी सामान्य समझबूझ से खुद भी ऐसा करते आए हैं, और लोगों को सुझाते भी आए हैं। अब अमरीकी विश्वविद्यालय की शोध रिपोर्ट ने वैज्ञानिक आधार पर इसी बात को कहा है। लोगों को खुद भी चैन से जीना चाहिए, और दूसरों को भी चैन से रहने देना चाहिए। नफरती असहमति दूसरों पर थोपने के बजाय अपनी सोच के लोग जुटाकर उनके साथ नफरती-संगीत करना चाहिए जिसके लिए कई धर्म, आध्यात्म, या राजनीतिक सोच के गीत मौजूद हैं। हमसे भी कुछ लोग यह कहते हैं कि वे हमारी सोच से सहमत नहीं हैं, और इसलिए हम उन्हें अपने लिखे या कहे के लिंक न भेजें, और हम तुरंत ही उन्हें इस अवांछित बोझ और तनाव से मुक्त कर देते हैं, बिना बुरा माने।


