संपादकीय
आज हिन्दुस्तान के काफी बड़े हिस्से में शिवरात्रि, या महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। उत्तर भारत में सडक़ों के किनारे भंडारे लगे हैं, और आते-जाते राहगीरों को हर आधे-एक किलोमीटर पर अलग-अलग जगह प्रसाद के रूप में पेट भर खाना मिलता रहेगा। जिस शंकर के लिए यह महाशिवरात्रि मनाई जाती है, उनके वर्णन को देखें, तो यह लगता है कि उन्हें पूजने वाले, उनके नाम पर आज पर्व और समारोह मनाने वाले लोग उन्हें किस हद तक मानते भी हैं। भगवान शंकर को लेकर जितने किस्म के ब्यौरे बिना किसी विवाद के उन्हीं की अनगिनत कहानियों में, अनगिनत लोकगीतों में दर्ज हैं, उन्हें देखना चाहिए।
शिव अपने गले में नागों को लिपटाए रहते हैं। जो सांप समाज में डर का प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें देखते ही लोग लाठी ढूंढने लगते हैं कि उन्हें कैसे जल्द से जल्द मारा जाए, जिन्हें लेकर हजार किस्म के कहावत-मुहावरे बने हुए हैं कि फलां धोखेबाज आस्तीन का सांप साबित हुआ, वैसे मासूम सांपों को शंकर गले में पहने रहते हैं। उनकी तस्वीर याद करें तो किस तरह उन्होंने गंगा को सिर पर धारण किया हुआ है। सिर पर अगर रखा है, तो जाहिर है कि प्रकृति की इस सबसे बड़ी देन का उन्होंने सम्मान किया है, और इसका अलिखित संदेश यही है कि गंगा को साफ रखना है, ताकि उसे सिर पर सजाया जा सके। उन्होंने न सिर्फ नंदी को अपना वाहन बनाया, बल्कि शंकरजी की बारात का वर्णन पढ़ें, तो उसमें कुछ सांप बारात के आगे-पीछे चल रहे थे, कुछ शिव के गले में लिपटे हुए थे, शिव नंदी पर सवार थे, कई किस्म के जंगली जानवर बाराती बने चल रहे थे, शुभ-अशुभ माने जाने वाले कई पक्षी और कीड़े-मकोड़े भी शिव की बारात में नाचते हुए चल रहे थे, फिर प्राणियों से परे देखें तो भूत-पिशाच भी बारात में बराबरी से चल रहे थे। कोई एक लोकगीत या कहानी यह भी बताते हैं कि किस तरह जब बारात पार्वती के घर पहुंची, तो वहां के अधिकतर लोग यह सब देखकर हक्का-बक्का रह गए कि उनकी बेटी किस तरह के दूल्हे के साथ ब्याही जाने वाली है। शंकरजी की बारात में चंडाल, और श्मशानवासी भी थे, देवता और असुर सभी बराबरी से चल रहे थे, शंकर ने अपने शरीर पर चिता की राख मल रखी थी, चिता की राख ही उड़ाई जा रही थी, भूतों के नाचने की आवाज आ रही थी, ऐसी थी शंकर की बारात।
शंकर के चरित्र को देखें, तो उनमें न मौत का कोई डर था, न जहर का। पौराणिक कहानी बताती है कि किस तरह समुद्र मंथन में जहर निकला, तो शंकर ने उसे पी लिया, और गले में थमे हुए इस जहर की वजह से उनका चेहरा नीला बनाया जाता है, और उन्हें शायद नीलकंठ भी कहा जाता है। शिव को अपने आसपास नशा करने वाले लोगों से कोई परहेज नहीं था, और पुराणों के मुताबिक शिव को भांग, धतुरा, और शराब चढ़ाने की परंपरा है। शिव का चरित्र इस तरह का कोई छद्म पवित्रतावादी नहीं था कि वहां नशे की कोई जगह न हो। आज भी किसी पेड़ के नीचे धार्मिक या सामाजिक चबूतरे पर गांजा पीते हुए लोगों को बम-बम भोले, या शंकर के दूसरे कई किस्म के संबोधनों को लेते देखा जाता है। उत्तर भारत, और हिन्दी भारत के कई प्रदेशों में एक लोकगीत खूब गाया जाता है जिसे पंडित छन्नूलाल मिश्र ने पूरी दुनिया में अपने शास्त्रीय गायन से भी पहुंचाया। इस गाने के बोल देखें, तो वे बताते हैं कि किस तरह श्मशान में दिगंबर शिव होली खेल रहे हैं, किस तरह भूत-पिशाच को साथ लेकर वे चिता की राख से खेल रहे हैं। शंकर का अर्धनारीश्वर का रूप देखें, तो वे शायद अकेले ऐसे भगवान हैं जो यह साबित करते हैं कि स्त्री और पुरूष किस हद तक बराबर हैं। बदन को ही आधे-आधे हिस्से में जिस तरह दिखाया गया है, वह शायद ही किसी दूसरे देवी-देवता की छवि में हो। जिसका एक प्रचलित नाम ही अर्धनारीश्वर हो, उससे बड़ा बराबरी का और संदेश क्या हो सकता है?
अब इन तमाम बातों को देखें, और आज उनके नामलेवा में से कुछ को देखें, तो कुछ विरोधाभास दिखते हैं। उन्हें मानने वाले लोगों को इन विरोधाभासों पर सोचना चाहिए। एक तरफ शिव न सिर्फ इंसान, बल्कि प्रकृति, पशु-पक्षी, भूतप्रेत, अछूत माने जाने वाले लोग, अपवित्र मानी जाने वाली जगहें, चिताओं की राख, नशा करने वाले लोग, सभी को समाहित करके चलने वाले रहे। उनके आसपास देवताओं और राक्षसों या भूतप्रेत-पिशाचों में कोई फर्क नहीं रहा, सभी बराबरी के बाराती रहे। जिस सांप को देखते ही मारने की सोच लोगों में रहती है, उसे वे गले में सजाए रहते हैं। जिस जहर को उन्होंने पीकर अपने गले में रोक रखा, आज उनके नाम लेने वाले बहुत से लोग बिना जहर पिए भी रात-दिन मुंह से जहरीली बातें निकालते रहते हैं। बाहर के जहर को खुद के बदन में रख लिया जाए ताकि बाकी लोगों को वह जहर न झेलना पड़े, उसे अनदेखा करके उनके कई नामलेवा आज जहर उफनते घूमते हैं। शिव जिस तरह एक पूरी तरह लोकतांत्रिक, अराजकता की हद तक लोकतांत्रिक जीवनशैली को जीते रहे, आज उसके ठीक खिलाफ लोग अपने किसी धर्म, या अपनी किसी जीवन-संस्कृति को दूसरों पर थोपने की हिंसा में लगे रहते हैं। और यह पूरा सिलसिला शिव के सबको समाहित करके चलने के दर्शन के ठीक खिलाफ है। शिव की कथाओं में उनका किसी से भी परहेज नहीं दिखाया गया, लेकिन आज उनके नामलेवा कुछ लोग पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को दूर करते हैं, फिर अपने ही धर्म की दूसरी जातियों के लोगों को दूर करते हैं, फिर खानपान के आधार पर लोगों का बहिष्कार करते हैं, पोशाक के आधार पर लोगों को गैर करार देते हैं। शिव की जो बुनियादी खूबियां हैं, उनसे बिल्कुल उलटे जाकर लोग खामियों से भरी जिंदगी जीते हैं, और अपने को शिवभक्त भी कहते हैं। आज अगर लोग अर्धनारीश्वर शिव-पार्वती को पूजनीय समझते हैं, तो असल जिंदगी में पार्वती को कोई जगह नहीं देते, महिलाओं के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। शिवभक्तों में से कितने हैं जो पशु-पक्षियों का भी बराबरी से सम्मान करते हों, गंगा को सिर पर चढ़ाने जितना साफ रखते हों, और बारात जैसे अपने खुशी के मौके पर जो हर तबके के मेहमान लेकर चलते हों?
आज शिवरात्रि है, पूजा के साथ-साथ इस सोच-विचार के लिए भी यह एक बड़ा सही मौका है। शिव के लोकतांत्रिक, समाजवादी, बहुलतावादी, समावेशी रूपों को माने बिना, इस सोच का सम्मान किए बिना पूजा और भंडारे का भला क्या महत्व है? और अगर ऐसी सोच पर लोग अमल करें, तो फिर हर दिन पूजा जैसा समारोह रहेगा, हर दिन हर किसी जरूरतमंद के लिए भंडारा रहेगा। धार्मिक प्रतीकों को बहुत कट्टरतावादी, और संकुचित नजरिए से देखने के बजाय उन्हें उनकी व्यापकता में देखकर अधिक सीखा जा सकता है। शिव से बड़ा समानतावादी और बहुलतावादी और भला कौन है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


