संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मुल्क कितना ही ताकतवर क्यों न हो मेरे दोस्त, अमन के अलावा चारा नहीं
सुनील कुमार ने लिखा है
31-Dec-2025 7:51 PM
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मुल्क कितना ही ताकतवर क्यों न हो मेरे दोस्त, अमन के अलावा चारा नहीं

भारत में अभी कुछ हफ्ते पहले एक शहर में कुछ नाबालिग स्कूली छात्रों को पकड़ा गया जो कि पाकिस्तान स्थित इस्लामिक आतंकियों के प्रचार के झांसे में आ गए थे। टेलिफोन और तरह-तरह के दूसरे मैसेंजरों पर इनके संदेश पकड़ाए, तो देश की खुफिया एजेंसी ने इन पर निगरानी रखना शुरू किया, और सुबूत जुटते चले गए। यह किस प्रदेश के किस शहर में हुआ है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि हिंदुस्तान के कुछ मुस्लिम बच्चे ऐसे झांसे में आ गए, और वे इंटरनेट पर डार्क वेब पर हथियारों के बारे में भी पूछताछ करने लगे। जब जांच एजेंसियों ने इन बच्चों से पूछताछ की, तो पता लगा कि इन्हें स्कूल में दूसरे बच्चे इनके धर्म की वजह से चिढ़ाते रहते थे, परेशान करते थे, पाकिस्तानी और आतंकी कहते थे, इन सबकी वजह से इनके मन में बड़ा रंज था, और सोशल मीडिया के रास्ते ऐसे रंज पर नजर रखने वाले पाकिस्तानी एजेंटों ने इन तक पहुंच की, और इनका ब्रेनवॉश किया। खतरा यह भी था कि इन बच्चों के मन में रंज इतना था कि वे हथियार पाकर हिंसा करने की सोच रहे थे। अब देश के कानून के तहत किसी नाबालिग पर जो भी कार्रवाई हो सकती है, वह कार्रवाई जांच एजेंसियां करेंगी, लेकिन इस नौबत के बारे में भी सोचना चाहिए कि स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के मन में दूसरे बच्चों को धर्म को लेकर इस तरह के हमले करना सूझता कहां से है, उनके मन में यह जहर आता कहां से है कि किसी धर्म के बच्चों को आतंकी कहकर पाकिस्तान जाने को कहा जाए।

अभी हफ्ते भर में ही हमने इस बात पर भी लिखा है कि स्कूली बच्चों को अखबार पढ़ाना यूपी में शुरू किया गया है, और कुछ दूसरे प्रदेश ऐसा करने का सोच रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि अखबारों में अगर बच्चों को भडक़ाने वाली ऐसी खबरें छपेंगी, और उन्हें स्कूलों में औपचारिक रूप से पढ़ाया जाएगा, या अखबार पढऩे को कहा जाएगा, तो उनके मन में दुनिया की जानकारी आएगी, या अपने देश के लिए जहर आएगा? इस खतरे के बारे में हम अपने इस कॉलम में, और अपने यू-ट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार लिखते-बोलते हैं कि अगर आहत आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा भी रंज में बदला लेने पर ऊतारू हो जाएगा, तो न तो ऐसे हर व्यक्ति की शिनाख्त हो सकेगी, न ही ऐसे हर व्यक्ति को समय रहते रोका जा सकेगा। पूरी दुनिया में जगह-जगह बिना किसी बड़े संगठन से जुड़े हुए अकेले हमलावर बहुत सा नुकसान कर देते हैं। अमरीका में तो हर बरस दर्जनों ऐसी गोलीबारी होती है जो एक अकेला निराश, हताश, या आक्रोशित व्यक्ति कोई ऑटोमेटिक बंदूक लेकर कर देता है, और एक-एक घटना में कई लोग मारे जाते हैं। अभी ऑस्ट्रेलिया में एक यहूदी त्यौहार के वक्त भारत से ऑस्ट्रेलिया जाकर बसे एक मुस्लिम आदमी ने अपने जवान बेटे के साथ मिलकर यहूदियों को मारने की नीयत से गोलीबारी की, और 15 लोगों को मार डाला। ऐसे लोगों को दुनिया में लोन-वुल्फ कहा जाता है, यानी एक अकेला भेडिय़ा जो कि मनमाने हमले कर देता है। (यह शब्दावली अंग्रेजी में इस्तेमाल होती है, हालांकि इसे गढऩे वाले लोगों को ऐसा एक भी भेडिय़ा नहीं मिलेगा जो इस किस्म का खून-खराबा करता होगा।) भारत में अभी जिन बच्चों को आतंकी प्रचार का शिकार पाया गया है, उन बच्चों के बारे में ऐसी गारंटी कौन ले सकते हैं कि वे ऐसे प्रचार के झांसे में नहीं आएंगे, और आगे कोई हिंसा नहीं करेंगे? आज तो पंजाब जैसे सरहदी राज्यों से हर हफ्ते खबरें आती हैं कि किस तरह पाकिस्तान से नशा, और हथियार लेकर ड्रोन आते हैं, उन्हें सुरक्षा एजेंसियां कभी पकड़ लेती हैं, गिरा लेती हैं, लेकिन हो सकता है कि ऐसे आने वाले हथियार इस देश के भीतर पाकिस्तान के कुछ एजेंट किसी तबके के बेचैन लोगों तक पहुंचाएं, और उन्हें आतंकी हमला करने के लिए उकसाएं। अभी कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में लाल किले के इलाके में जो विस्फोट हुआ था, उससे जुड़े हुए तमाम तार कश्मीर और यूपी के कई मुस्लिम डॉक्टरों और दूसरे लोगों तक पहुंचे ही थे जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं, और वे आतंकी हमलों की तैयारी में थे। अब उनके पास बड़ी मात्रा में विस्फोटक पहुंचे थे, शायद दूसरे हथियार भी जब्त हुए थे। जहां तक हथियारों की बात है, तो भारत की हर तरफ की जमीनी सरहद उससे नाखुश देशों से ही घिरी हुई है। बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, और पाकिस्तान, किसी भी तरफ से, या हर तरफ से हथियार यहां आ सकते हैं। हथियारों का अपना कोई धर्म नहीं होता, उनकी अपनी कोई विचारधारा भी नहीं होती। और यह भी जरूरी नहीं है कि इन देशों की सरकारें ही वहां से ये हथियार भेजें, इन देशों के कारोबारी भी किसी आतंकी संगठन से भुगतान पाकर ऐसे हथियार तस्करी से भारत पहुंचा सकते हैं, शायद पहुंचा भी रहे हैं। मणिपुर जब जल रहा था, उस वक्त वहां के लोगों के हाथों में ढेरों गैर-कानूनी हथियार थे, जो कि जाहिर तौर पर सरहद पार से आए हुए लगते थे।
 


हम बार-बार इस बात को उठाते हैं कि लोगों को देश के माहौल को अच्छा रखना चाहिए, इसलिए भी कि खराब माहौल में पूरे देश की हिफाजत कर पाना किसी के बस का नहीं हो सकता। पूरी दुनिया में जो अमरीका सबसे अधिक सुरक्षित देश माना जाता है, उसकी ही कारोबारी राजधानी न्यूयॉर्क में उसकी प्रतिष्ठा की प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों को ओसामा के आतंकी हवाई हमले ने पलभर में गिराकर मिट्टी में मिला दिया था, और हजारों लोगों को मार भी डाला था। अब अमरीका से अधिक मजबूत खुफियातंत्र दुनिया में कम ही देशों का होगा, अमरीका से अधिक सुरक्षा जांच और सुरक्षा इंतजाम भी कम ही देशों में होंगे। फिर भी वह अपने-आपको पूरी तरह से सुरक्षित नहीं कर पाया। ऐसे में आज दुनिया के हर देश को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके अपने भीतर के लोग इतने पीडि़त और प्रताडि़त न हों कि वे कुछ बाहरी आतंकी ताकतों के हाथों इस तरह हथियार बनकर अपने ही लोगों का नुकसान करने पर ऊतारू हो जाएं। दुनिया का इतिहास बताता है कि धर्म जैसी सोच, राजनीतिक विचारधारा, राष्ट्रवाद या रंगभेद जैसी बातों से परे दुनिया में बहुत से हमले पेशेवर कातिल और हमलावर भी करते हैं जो कि पैसों के लिए हर तरह का जुर्म करने के लिए तैयार रहते हैं, और जिनकी सेवाएं डार्क वेब पर ढूंढी जा सकती हैं। ऐसे लोग दुनिया के कई बहुत बड़े-बड़े अपराधों के पीछे जिम्मेदार रहे हैं, और इंटरनेशनल एजेंसियां इनकी तलाश भी करती रहती हैं। अब दुनिया के कई देश एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए भाड़े के ऐसे हत्यारे और हमलावर भेजकर भी आतंकी हमले करवा सकते हैं, और उस देश में तनाव फैलाने के लिए उसकी तोहमत किसी स्थानीय तबके पर लगवा सकते हैं।

आज दुनिया के बहुत से देशों के बीच कई तरह के खुले टकराव चलते हैं, और कई तरह के शीतयुद्ध भी चलते हैं। भारत के ऊपर भी कनाडा और अमरीका जैसे देशों में ऐसे आरोप लगे हैं कि भारत की सरकारी एजेंसियों से जुड़े लोगों ने इन दोनों देशों में खालिस्तानियों पर हमले करवाए। अमरीका की एक अदालत में तो ऐसा मुकदमा ही चल रहा है जिसमें भारत से जुड़ा एक आदमी भाड़े के एक हत्यारे के साथ मोल-भाव करके उसे सुपारी दे रहा है कि उसे किस पर हमला करना है। अमरीकी एजेंटों ने ऐसी पूरी कार्रवाई को रिकॉर्ड भी किया है, और यह वहां की अदालती खबरों में सामने आ भी चुकी है। अब दुनिया के कई दूसरे देश, कई आतंकी संगठन ऐसे भी हो सकते हैं जो कि भारत में इस तरह की हिंसा करवाने का किसी को ठेका दें, और उसके बाद उसकी तोहमत किसी स्थानीय व्यक्ति या संस्था पर लगाकर एक बड़ा सामाजिक तनाव खड़ा करके इस देश में बेचैनी और बदअमनी फैलाएं। आज दुनिया में सिर्फ सरकारें और आतंकी संगठन ऐसा नहीं कर रहे, कई जगहों पर तो कारोबारी भी किसी सरकार को बदनाम करने के लिए, किसी इलाके में हिंसा फैलाने के लिए इस तरह की हरकतें करते हैं। कहीं पर आतंकी और कारोबारी मिल जाते हैं, कहीं पर कारोबारी और सरकारें मिल जाते हैं, और कहीं-कहीं पर तो सरकारें भी दूसरे देशों की जमीन पर बड़े जुर्म करने के लिए आतंकियों को भी भाड़े पर ले लेती हैं। ऐसे में जौन एलिया का एक शेर याद आता है, अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है।

इसलिए अमन ही अकेली हिफाजत हो सकती है।


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