संपादकीय
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय सिंह ने अपनी सालाना आदत के मुताबिक मधुमक्खी के छत्ते में जोरों से एक पत्थर मारा। उन्होंने एक पुरानी फोटो पोस्ट की जिसमें भाजपा के एक सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी गुजरात के किसी कार्यक्रम में कुर्सी पर बैठे हैं, और उनके ठीक सामने से नीचे बैठने वालों का सिलसिला शुरू हो रहा है जिसमें पहले ही नंबर पर, आडवाणीजी के पैरों के पास नरेंद्र मोदी बैठे हुए हैं। बाकी नेता भी पीछे दिख रहे हैं। दिग्विजय ने इस फोटो को पोस्ट करते हुए लिखा- यह चित्र बहुत ही प्रभावशाली है, किस प्रकार आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक व जनसंघ का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री, और देश का प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है। जय सियाराम।
अब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय का यह फोटो पोस्ट करना जिन लोगों को बहुत मासूम हरकत लग रही होगी, उन्हें दिग्विजय की काबिलीयत का अंदाज नहीं है। इस पोस्ट से लेकर कार्यसमिति की बैठक निपट जाने तक यह सुगबुगाहट चलती रही कि क्या दिग्विजय कांग्रेस संगठन में बदलाव की तरफ इशारा कर रहे हैं? कांग्रेस पार्टी ने औपचारिक रूप से दिग्विजय के एक और बयान को सिरे से खारिज कर दिया, और कहा कि कांग्रेस और भाजपा में फर्क है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी गिना दिया कि कांग्रेस कभी धर्म की राजनीति नहीं करती। इसके बाद कांग्रेस के एक स्थायी असहमत, असंतुष्ट, और बागी माने जाने वाले सांसद शशि थरूर भी एक कार्यक्रम में दिग्विजय के साथ बैठे मिले। लोगों ने दो और दो चार जोड़कर यह अटकलें भी लगाईं कि क्या अब कांग्रेस के एक पुराने चुनाव चिन्ह की तरह यह बागी बैला-जोड़ी बन रही है? कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने दिग्विजय के बयान पर आरएसएस को नाथूराम गोडसे से जोड़ा और कहा कि जो संगठन गोडसे के नाम से जाना जाता है, वह गांधी की ओर से बनाए गए संगठन को क्या सिखा सकता है? कांग्रेस के एक और नेता मणिकम टैगोर ने दिग्विजय की पोस्ट को सेल्फ-गोल बताया, और कहा कि आरएसएस से सीखने की कोई जरूरत नहीं है, जो कि नफरत पर बना है, नफरत फैलाता है। उन्होंने कहा कि आप अलकायदा से क्या सीख सकते हैं? लेकिन कांग्रेस के एक और नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिग्विजय पूरी तरह पार्टी लीडरशिप के साथ हैं, और हम सभी आरएसएस की विचारधारा को खारिज करते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने पार्टी के औपचारिक रुख को बताते हुए कहा कि कांग्रेस को गोडसे के संगठन आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।
दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर समय-समय पर अपने कई बयानों को पार्टी की तरफ से खारिज पाते रहे हैं। फिर भी वे मानो अपनी एक अलग सोच सामने रखने के लिए सालाना लीज नवीनीकरण करवाते रहते हैं। कांग्रेस का भी हक है कि अपने नेताओं को समय-समय पर झिड़की देते रहे, और उसने किसी नेता के बयान के गुण-दोष को देखे बिना भी उसे खारिज करने पर महारत हासिल कर रखी है, कई दूसरी पार्टियों की तरह। अब ऐसे में दिग्विजय की कही बात के तर्क को सुनने और समझने वाले कांग्रेस पार्टी में अगर कोई होंगे भी, तो भी उनके सामने चुप रहने की मजबूरी है। दूसरी कई बड़ी पार्टियों की तरह कांग्रेस में भी लीडरशिप के खिलाफ कुछ कहने का रिवाज रह नहीं गया है।
अभी चार दिन ही हुए हैं, कांग्रेस के भीतर से यह आवाज उठी थी कि प्रियंका गांधी को पार्टी की लीडरशिप देनी चाहिए। फिर मानो यह बात कांग्रेस के प्रथम-परिवार के भीतर दरार की अफवाहें पैदा करने के लिए काफी न हों, प्रियंका के विवादास्पद पति, रॉबर्ट वाड्रा ने सार्वजनिक रूप से कहा कि चारों तरफ से यही मांग है, और आज उनके खुद के भी राजनीति में आने की जरूरत है...
कुल मिलाकर प्रियंका के किसी चापलूस ने, और प्रियंका के पति ने मिलकर ऐसी किसी दरार की अफवाहों को पुख्ता कर दिया। अब राहुल गांधी अपनी अब तक की बड़ी अस्पष्ट लीडरशिप क्षमता के चलते हुए सवालों के घेरे में रहते आए हैं, लोकसभा में प्रियंका के एक दो धांसू भाषणों को देखते हुए उन्हें पार्टी का लीडर बनाने की अफवाहें जोर पकड़ रही हैं। मतलब यह कि पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पार्टी की सबसे वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, पार्टी के चार दिन पहले तक भविष्य समझे जा रहे राहुल गांधी, और अब पार्टी की एक नई संभावना बताई जा रही प्रियंका गांधी के बीच लीडरशिप की धुंध और गहरा गई है।
दिग्विजय ने तो चाहे इशारे में, चाहे अपनी किसी अतृप्त हसरत के चलते, नीचे से उठकर लीडरशिप के टॉप तक पहुंचने की जो बात सार्वजनिक रूप से उठाई है, वह बात हमला तो गांधी परिवार पर ही करती है, फिर चाहे दिग्विजय की नीयत किसी और पर हमला करने की क्यों न हो। फिर हम तर्क की बात अगर करें, तो दिग्विजय की बात इसलिए बहुत खोखली है कि आज पार्टी के अध्यक्ष पद पर मल्लिकार्जुन खड़गे हैं जो कि जमीन से उठकर इस जगह तक पहुंचे हुए एक दलित नेता हैं। कांग्रेस के पास आज इससे बड़ा तो कोई पद देने के लिए है नहीं। ऐसे में नरेंद्र मोदी के नीचे बैठे हुए फोटो से दिग्विजय भला क्या साबित कर सकते हैं? सोनिया, राहुल, और प्रियंका के परिवार ने अगर मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का अध्यक्ष बनाना बेहतर समझा है, तो इसके बाद किसी को यह शिकायत तो होनी नहीं चाहिए कि नीचे से ऊपर पहुंचने का मौका इस पार्टी में किसी को नहीं मिलता। जब तक राहुल अध्यक्ष थे, तब तक भी अगर दिग्विजय ने यह बात कही होती, तब भी कोई बात होती। आज तो यह बात पूरी तरह बेबुनियाद, गैरजरूरी, और नाजायज भी लगती है।
बीच-बीच में कांग्रेस में जब कभी अध्यक्ष बनाने की बात उठती थी, कभी अशोक गहलोत के नाम पर चर्चा होती थी, तो कभी किसी और नाम पर, तब भी हर बार आधा दर्जन नामों में दिग्विजय के नाम की भी चर्चा होती थी। और तकरीबन हर बार दिग्विजय के किसी सेल्फ गोल की वजह से, किसी बेमौके के बयान की वजह से उनका नाम चर्चा से हट जाता था। दिग्विजय को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस में आज आरएसएस और भाजपा से सीधी टक्कर की लड़ाई लेने वाले ऐसे और बहुत नेता नहीं हैं, जैसे दिग्विजय हैं। दूसरी बात यह कि अर्जुन सिंह जैसे संक्रमणकाल के वक्त भी दिग्विजय ने कभी कांग्रेस नहीं छोड़ी। फिर मध्यप्रदेश खोने के बाद दिग्विजय दस बरस के स्वघोषित संन्यास पर भी चले गए थे। इन सबके चलते हुए उनके अपने ही बयान समय-समय पर उन्हें सीढ़ी से नीचे गिरा देते हैं, वरना दूसरे कई पार्टी अध्यक्षों के मुकाबले दिग्विजय अधिक असरदार और बेहतर अध्यक्ष साबित हुए रहते।
एक बड़ी पार्टी में रहते हुए या तो किसी को बगावत ही करनी हो, तब तो बागी तेवरों के बयान सुहाते हैं। लेकिन अपने ही बयानों का पार्टी की तरफ से हर साल-छह महीने में औपचारिक खंडन करवाकर कोई भी नेता महज यही साबित कर सकते हैं कि पार्टी की रीति-नीति, और उसकी वर्तमान सोच का उन्हें ठीक से अंदाज नहीं है। ऐसा साबित करना पार्टी के भीतर, और पार्टी के बाहर किसी भी नेता के वजन को कम ही करता है। दिग्विजय सिंह पता नहीं क्यों इस आदत से ऊबर नहीं पाते हैं। एक बड़े संगठन में सही कुछ नहीं होता, जो पार्टी को माकूल बैठता है, वही सही होता है। फिर दिग्विजय की इस फोटो वाली पोस्ट पर एक दूसरी हैरानी भी होती है कि जिस संगठन, आरएसएस से वे रात-दिन जूझते हैं, जिस भाजपा से वे अपनी बाकी जिंदगी भी विरोधी ही बने रहेंगे, उन संगठनों की तारीफ किसी भी संदर्भ में करना, किसी भी असहमत पार्टी के लिए असहनीय बात ही होने वाली थी। अगर संगठन की कोई मिसाल देनी ही थी, तो दिग्विजय को कोई ऐसा संगठन छांटना था जो कि कांग्रेस को बर्दाश्त भी हो सकता। आरएसएस और भाजपा को लेकर तो कांग्रेस ने पलभर में गांधी और गोडसे से रिश्ता जोड़कर दिग्विजय को पूरी तरह खारिज कर दिया। अब जाने और कितना वक्त उन्हें इस सबसे ताजा नुकसान से उबरने में लगेगा। जब तक इस तस्वीर से उपजे जख्म भरेंगे, हमारा अंदाज है कि दिग्विजय फिर कोई और सेल्फ-गोल करने की प्रैक्टिस कर चुके रहेंगे।


