संपादकीय
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
शोषण को झेलना जनता की जिम्मेदारी मान ली गई थी, इसे उसके पिछले जन्मों के पाप से जोड़ दिया गया था, और असंतोष या विद्रोह को ऐसा पाप करार दे दिया गया था जिसका भुगतान अगले सात जनम तक करना पड़ेगा। धर्म ने, और यह बात सनातन या हिंदू धर्म की नहीं है, दुनिया के तकरीबन तमाम धर्मों में यही धारणा बढ़ाई गई कि इस जन्म में बगावत की बात सोचना भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी भुगतना पड़ेगा। धर्म लोगों को यह धैर्य सिखाता है कि आज उनकी जिंदगी में जितनी दिक्कतें हैं, उनका राजा से कोई लेना-देना नहीं है, यह सब उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों का नतीजा है।अधिकतर धर्मों की प्रार्थनाओं और उनके ग्रंथों के लिखे हुए को देखें तो वे लोगों को हर तकलीफ के लिए ईश्वर की मर्जी का तर्क देने वाले हैं, उनके भाग्य में ही ऐसा लिखा हुआ था, यह समझाने वाले हैं, और पिछले जन्मों का फल गिनाने वाले धर्म तो मानो फलों का कोल्ड स्टोरेज ही हैं। हर तकलीफ के वक्त वे एक पेटी सेब निकालकर लोगों को दे देते हैं कि ये उनके पिछले जन्मों का फल है कि वे आज तकलीफ पा रहे हैं।
भारत जैसे लोकतंत्र में धर्म का इस्तेमाल अलग-अलग पार्टियां कम या अधिक दूर तक कर सकती हैं। पंजाब में अकाली दल तो पूरी तरह से धर्म आधारित पार्टी है, और अपने फैसलों के लिए वह सिख धर्म के सबसे बड़े धार्मिक संगठन के प्रति सीधी जवाबदेह भी रहती है, और उसकी सुनाई गई सजा को भी भुगतने के लिए तैयार रहती है। भारत में हजारों बरस से राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की जो परंपरा चली आ रही थी, उसे बौद्ध धर्म ने बड़ी और कड़ी चुनौती दी थी, उसने न पुनर्जन्म माना, न भाग्य माना, और न राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना। वक्त के साथ बौद्ध धर्म की धार भोथरी होती चली गई, और जनता के जागरण में वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाया।
धर्म का जनकल्याणकारी रुख कितना हो सकता है, और कितना नहीं, यह देखना हो तो मुगल और अंग्रेज काल देखना होगा कि किस धर्म ने उस वक्त के शासकों के सामने दंडवत समर्पण किया, और किन धर्मों ने जनता के जागरण का काम किया। उस लंबे इतिहास में जाना आज मेरा मकसद नहीं है, और जिनकी दिलचस्पी अपने देश, धर्म, और राजतंत्र को जिम्मेदारी से जानने की हो, वे अलग-अलग जगहों से इस ताजा इतिहास को तलाश सकते हैं।
फिलहाल तो हालत यह है कि कांग्रेस का ताजा इतिहास भी धर्म से आजाद नहीं रहा। उसके अलग-अलग नेताओं ने अलग-अलग समय पर धर्म का इस्तेमाल किया, और खुद भी धर्म के काम आए। नेहरू के वक्त तक तो कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनी रही, लेकिन इंदिरा गांधी के राज में धर्मगुरुओं, ज्योतिषियों, गले में रूद्राक्ष, सिर पर देवरहा बाबा का पैर, ये तमाम तस्वीरें लोगों की याद में ताजा हैं। जिस तरह रूस के जार-राजाओं के पुरोहित हुआ करते थे, उसी मिसाल का इस्तेमाल इंदिरा गांधी के करीबी, तथाकथित योगगुरू धीरेंद्र ब्रह्मचारी के लिए किया जाता था। सफेद कपड़े के दाढ़ी वाले इस गुरू का बोलबाला इंदिरा की सत्ता में इतना था कि वह तरह-तरह के बड़े-बड़े सरकारी फायदे पाता था।
इंदिरा के बाद राजीव गांधी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो वाला फैसला पलटा था, जिस तरह अयोध्या में राम मंदिर के ताले खुलवाए थे, वह सबकुछ देखने लायक था, और इतिहास में बहुत अच्छी तरह दर्ज है। नरसिंह राव के कार्यकाल का हाल यह था कि दिल्ली के एम्स के कार्डियो थोरेसिक सेंटर के डायरेक्टर डॉ. वेणुगोपाल हफ्ते में तीन दिन पुट्टपर्थी जाकर वहां सत्यसाईं बाबा के अस्पताल में दिल के मरीजों का ऑपरेशन करते थे, और यह इंतजाम प्रधानमंत्री के आदेश से किया गया था। कांग्रेस के तकरीबन सारे ही मंत्री-मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपने-अपने धर्म के चरणों पर आए दिन दिखते ही थे। अकेले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसे थे जो कि वोटरों और चुनाव पर अधिक निर्भर नहीं करते थे, और उन्होंने धर्म को, अपने सिख धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा, और कभी उसकी सार्वजनिक नुमाइश नहीं की।
हाल के बरसों में तो लोगों ने देखा हुआ है कि बापू कहलाने वाले बलात्कारी आसाराम के चरणों पर किस-किस पार्टी के कौन-कौन से नेता नहीं पड़े रहते थे। मोदी और आडवाणी के साथ-साथ दिग्विजय सिंह की भी अनगिनत तस्वीरें आसाराम के चरणों पर चारों तरफ फैली हुई हैं, जिन्हें देखना हो इंटरनेट सर्च पर बस नाम ही काफी है।
अभी छत्तीसगढ़ में जो विवाद चल रहा है, उसमें बागेश्वर सरकार जैसा करिश्मा दिखाने वाला बड़बोला कथाकार भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ अनगिनत बातें बोलता दिखता है, और वह यह स्थापित करने में लगा हुआ है कि भारत संवैधानिक रूप से भी एक हिंदू राष्ट्र है। वह अपने तथाकथित प्रवचनों में जिस अंदाज में पत्रकारों को और दूसरे लोगों को धमकियां देता है, बात-बात में लोगों की ठठरी बंधवा देने (अर्थी पर बंधवा देने) की बात कहता है, वह हिंसक अहंकार सुनना भी उन लोगों को तो भारी पड़ता है जिनके मन में इंसानियत की कुछ बुनियादी खूबियां अभी भी बाकी हैं। ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाने वाले किस तरह के भू-माफिया रहते हैं, यह उनके अखबारी इश्तहारों और सडक़ों पर लगने वाले होर्डिंग्स से आसानी से समझ में आ जाता है। इसके साथ ही उनका जमीनों का अवैध कारोबार करोड़ों से अरबों का हो जाता है, और उसका एक टुकड़ा वे ऐसे आयोजनों के लिए डाल देते हैं।
भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में संविधानेत्तर ताकतों का ऐसा बोलबाला चलते ही रहता है। कई पार्टियां इन्हें विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में भी भेज देती हैं, तरह-तरह का राजकीय दर्जा दे देती हैं। भारत में 75 बरसों के तथाकथित लोकतंत्र के इस छोटे से दौर को छोड़ दें, तो राजा और धर्म का ऐसा रिश्ता तो हमेशा से रहते आया है, पिछली पौन सदी में यह कई जगह खुलकर सामने आया, कुछ जगहों पर पर्दे के पीछे से चला। खुद कांग्रेस पार्टी को समय-समय पर कोई शंकराचार्य बहुत सुहाते रहे, और राजनीतिक चेतना की बातें कहने पर कई शंकराचार्य सत्ता की आंखों की किरकिरी भी रहे। छोट-मोटे प्रवचनकर्ता और कथाकार, चमत्कारी और करिश्माई बाबाओं की बात तो छोड़ दें, राम मंदिर के भूमिपूजन पर तो शंकराचार्यों को भी नहीं बुलाया गया था, ऐसे शंकराचार्यों को भी जो कि खुलकर हिंदुत्व की वकालत करते हैं।
धर्म और राजनीति के गठजोड़ की यह कहानी बड़ी लंबी जा सकती है, लेकिन आज के लिए इतनी चर्चा काफी है। भूपेश बघेल अपनी लड़ाई खुद लडऩे में सक्षम हैं, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है, और देश के सबसे बड़े हिस्से पर आज उसका राज है, पूरे देश पर तो है ही, इसलिए वह भी अपनी मर्जी के लोगों को बढ़ाने और बचाने की पर्याप्त ताकत रखती है। मेरा कोई इरादा इन दो के बीच चल रही लड़ाई में पिसने का नहीं है। मैंने तो धर्म और राजनीति के बीच के रिश्तों के बारे में कुछ शब्दों में अपनी बात रखी है, बाकी तो ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है।
(आज का यह साप्ताहिक कॉलम ‘आजकल’ और संपादकीय दोनों मिलाजुला-संपादक)


