संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : भविष्य की बात एआई के खतरों के साथ ही हो सकती है, उसके बिना नहीं
सुनील कुमार ने लिखा है
15-Dec-2025 6:52 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : भविष्य की बात एआई के खतरों के साथ ही हो सकती है, उसके बिना नहीं

छत्तीसगढ़ विधानसभा का एक विशेष सत्र कल पहली बार इतवार को हुआ, और इसमें वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी ने ‘अंजोर 2047’ नाम की एक रिपोर्ट पेश की कि जब देश की आजादी की सालगिरह रहेगी, तब तक छत्तीसगढ़ किस दिशा में आगे बढ़ेगा, और कहां पहुंचेगा। वित्तमंत्री अगले 20 बरस का अंदाज लगाने के लिए कुछ खूबियां रखते हैं, वे मंत्रिमंडल में अकेले भूतपूर्व नौकरशाह हैं, गांव और गरीबी से ऊपर उठे और आईएएस बने भोला छत्तिसगढिय़ा भी हैं, निजी जीवन में वे शेयर बाजार में पूंजीनिवेश करते हुए देश के कारोबार, अर्थव्यवस्था, और वित्तीय चीजों को बेहतर समझते भी हैं। महत्वपूर्ण मंत्रियों में वे सबसे नौजवान भी हैं, इसलिए वे 2047 का अंदाज लगाने के लिए तब तक सक्रिय रह सकने वाले नेताओं में से भी एक हैं।

खैर, किसी एक व्यक्ति पर चर्चा आज का मकसद नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ को लेकर अपनी सरकार की जो कल्पनाएं उन्होंने सामने रखी हैं, वैसी कई कल्पनाएं भारत की मोदी सरकार भी बीच-बीच में सामने रखती है, और अब पांच-पांच बरस के लिए किसी सोच का वक्त खत्म हो गया है, और अब सरकारें, राजनीतिक दल, और नेता 2047 तक का वक्त मांगने लगे हैं, तब तक के सपने दिखाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ ने अपने अस्तित्व के पिछले 25 बरस देखे हैं, और अगले 20-22 बरस की कल्पना अभी की सरकार ने सामने रखी है। यह एक अलग बात है कि हर पांच बरस में जनता यह तय करती है कि अगला कार्यकाल किस पार्टी को देना है, और 2047 तक तीन-चार सरकारें आ सकती हैं।

कल जब छत्तीसगढ़ का यह विजन डॉक्यूमेंट सामने आया, उसी वक्त अमरीका की एक खबर भी आई कि किस तरह वहां पर अभी 40-45 बरस के लोग अधेड़ उम्र में एक बार फिर स्कूल-कॉलेज जा रहे हैं, दिन भर के काम के बाद रात की क्लास पहुंच रहे हैं, ताकि वे अपने मौजूदा हुनर को बेहतर कर सकें, या कोई ऐसा नया हुनर सीख सकें जिस पर एआई के हमले से उसकी जरूरत खत्म होने का खतरा न हो। हम अपने इस कॉलम में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस बात को उठाते हैं कि दुनिया के तमाम कामगारों को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि अगर एआई उनके काम को इंसानों के मुकाबले बेहतर तरीके से कर सकेगा, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। एक तरफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग से जुड़ा हुआ, और कम्प्यूटर प्रणालियों से नियंत्रित रोबो है, जो मशीन मानव एक ही किस्म के दुहराए जाने वाले कामों से इंसानों को तेजी से बेदखल कर रहा है, और दूसरी तरफ एआई है जिसकी संभावनाओं की आशंका भी अभी इंसानों को ठीक से नहीं हो पाई है। अमरीका के कैलिफोर्निया में बिना ड्राइवर वाली कारों में घूमकर लौटने वाले सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि उनका तजुर्बा कैसा रहा। हर दिन अमरीका से लेकर चीन तक कई देशों में लगातार ऐसी कारें बढ़ती जा रही हैं, और ऐसी कारें हर किलोमीटर के बाद कुछ अधिक अनुभवी और माहिर भी होते चल रही हैं। अब अमरीका और दूसरे कुछ देशों के फुटपाथों पर सामान पहुंचाने वाली छोटी-छोटी सी पहियों वाली गाडिय़ां दौड़ते दिखती हैं जो कि कैमरों से लैस हैं, भीड़ और ट्रैफिक के बीच चलना जानती हैं, और कूरियर कहे जाने वाले लोगों की नौकरियां खाती जा रही हैं।

अमरीका की खबर बता रही है कि वहां अधेड़ लोगों के पढऩे और सीखने के लिए जो सस्ते कॉलेज हैं, वहां पर लोग अब शौक में नहीं, आशंका में पहुंच रहे हैं कि अगर वे अपना काम बेहतर नहीं करेंगे, तो वे बेरोजगार हो जाएंगे। हमने आज की यह बात छत्तीसगढ़ के 2047 तक के सपने से जोडक़र शुरू की है। अगले 20-25 बरस का कोई भी सपना आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की पूरी मार का अंदाज लगाए बिना नहीं देखा जा सकता। एक तरफ मशीनें हैं जो कि तेजी से इंसानों को बेदखल कर रही हैं। सदियों से धान के खेतों में फसल काटने के लिए लगने वाले मजदूरों की जरूरत अब खत्म सी हो गई है, क्योंकि पंजाब से बड़ी-बड़ी दानवाकार मशीनें आकर कुछ घंटों में ही फसल काटकर किसान को दे देती हैं, और लागत शायद इंसानी मजदूरी से कम पड़ती है। धीरे-धीरे खनिज से जुड़े हर काम में मजदूरों की जरूरत कम होती जाएगी, क्योंकि मशीनें उन कामों को संभाल लेंगी। खेत और खदान में इंसानों की जरूरत अगर घटेगी, तो वह एक बड़ा फर्क रहेगा, और उनके लिए किसी वैकल्पिक रोजगार का कोई सपना अभी दिखता नहीं है। दूसरी तरफ सरकारी कामकाज, स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई, इन सबमें एआई का इस्तेमाल वैसे भी शुरू हो गया है, और यह दो-ढाई दशक में किस तरह इंसानों के बिना होने लगेगा, ऐसा बुरा सपना अभी लोगों को समझ नहीं पड़ रहा है। क्लासरूम शिक्षक की जगह बड़ी-बड़ी स्क्रीन, और सबसे काबिल और माहिर शिक्षक के रिकॉर्ड किए हुए व्याख्यान, या उनसे ऑनलाईन सवाल-जवाब से नौकरियां बहुत बुरी तरह खत्म हो जाएंगी। आज भी छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भारत सरकार की एक योजना के तहत जिस तरह ई-फाइल का काम चलने लगा है, उसकी रफ्तार देखने लायक है। घंटे भर में एक फाइल किसी जिले से निकलकर सचिव से होते हुए मुख्य सचिव तक पहुंचकर, मंजूरी या नामंजूरी पाकर वापिस जिले तक पहुंच सकती हैं, और कुछ मामलों में पहुंच भी रही होगी। अभी तक इसमें सिर्फ कम्प्यूटरों का इस्तेमाल है, एआई इसमें दाखिल नहीं हुआ है, लेकिन उसके दाखिल होने के बाद तस्वीर और बुरी तरह बदल सकती है।

हमारा ख्याल है कि आज दुनिया का कोई भी देश हो, उसे अपने हर रोजगार को लेकर, हर कामगार को लेकर एआई की रौशनी में भविष्य का अंदाज लगाना चाहिए। किसी भी समाज की उत्पादकता बेरोजगारों की भीड़ में नहीं हो सकती। कम्प्यूटर और एआई, अपने से और अधिक बेरहम कारोबार के साथ मिलकर इंसानों के लिए बहुत बड़ी तबाही ला सकते हैं। जिस तरह आज इंसान कोई सामान दस रूपए सस्ता मिलने पर पड़ोस की दुकान छोड़ ऑनलाईन खरीदने लगते हैं, उसी तरह उद्योग-व्यापार के मैनेजमेंट मजदूरी और हुनर के किसी भी काम को मशीन और एआई से सस्ते में निपटने पर इंसानों को पल भर में धंधे से बाहर कर देंगे।

दुनिया में कई कारोबार ऐसे हैं जिनकी तकनीकी जरूरतें सीमित रहने से वे एआई नाम की सुनामी में भी बह नहीं जाएंगे, बचे रहेंगे। लेकिन लोगों की कल्पना से बहुत अधिक किस्म के ऐसे काम हैं जो कि एआई के सैलाब को झेल नहीं पाएंगे, उनके पांव उखड़ जाएंगे, और एआई उन्हें नाम भर की लागत पर बेहतर तरीके से कर दिखाएगा। हम जो बात कह रहे हैं, उसका पूरा अंदाज लगा पाना कहने के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल है। लेकिन अगर 2047 के लिए, या इतने लंबे वक्त के लिए दुनिया की कोई भी सरकार एक विजन डॉक्यूमेंट बनाती है, तो उसे एआई के असर का अंदाज लगाना ही होगा, और उसके हिसाब से अपनी आबादी के लिए काम या रोजगार सोचना होगा। आज हमें भारत जैसे देश में लंबे समय से चले आ रहे उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में ऐसे किसी खतरे की आशंका से जूझने का संकेत नहीं दिखता है। आज भी यह देश एआई के आने के पहले के कोर्स ही चला रहा है। अभी तक केन्द्र या किसी राज्य सरकार ने ऐसा दस्तावेज पेश नहीं किया है कि 2047 तक कौन-कौन से रोजगार और काम पुरातत्व बन चुके होंगे। सरकारों को दूरदर्शी, कल्पनाशील योजनाशास्त्रियों की जरूरत रहती है जो कि इतिहास के बोझ से आजाद हों, और जिनके सामने भविष्य की परवाह ही अकेला काम हो। यह अपने आपमें एक बड़ा भविष्य विज्ञान और उस पर आधारित योजना का काम होगा, अगर सरकारें ऐसी अलोकप्रिय आशंकाओं को जनता के सामने रखने की हिम्मत करेंगी। ऐसी हकीकत के खतरे को अनदेखा करना, या जनता को उसके प्रति आगाह न करना कोई जिम्मेदारी का काम नहीं होगा। इसलिए 2047 की हर बात एआई की संभावनाओं के साथ जुड़ी हुई ही होनी चाहिए।

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