संपादकीय
अमरीका में अभी कुछ हफ्तों के भीतर ही एक और सडक़ हादसा हुआ जिसमें भारत से वहां जाकर गैरकानूनी रूप से रह रहे सिक्ख नौजवान जशनप्रीत सिंह ने नशे और लापरवाही की हालत में एक हाईवे पर बुरा एक्सीडेंट किया, सडक़ पर ढेरों गाडिय़ां एक-दूसरे से टकराईं, और इसमें तीन लोग मारे गए। लोगों को याद होगा कुछ हफ्ते पहले भी भारत के ही एक सिक्ख नौजवान ने अमरीका में लापरवाही से बड़ी ट्रक मोड़ी थी, और इसी तरह का एक्सीडेंट हुआ था। आज की ट्रंप सरकार तो देश के बाहर से आए हुए और गैरकानूनी रूप से बसे हुए लोगों को बाहर निकाल रही है, लेकिन ऐसे लाखों लोग वहां पर बसे हुए हैं जो कि अवैध तरीके से घुसे हुए, या रूके हुए हैं, और इनमें से हर महीने हजारों लोग उनके देश भेज दिए जा रहे हैं। भारत में भी अमरीका से निकाले गए, और हथकड़ी-बेड़ी में जकडक़र लाकर यहां छोड़े गए लोगों के शुरू के कुछ विमान तो पंजाब में ही उतरे थे, क्योंकि इनमें वहीं के लोग ज्यादा थे।
जब कभी किसी देश की पहचान लेकर कहीं गए हुए, या वहां बसे हुए लोग कोई गलत काम करते हैं, तो उनके देश की बदनामी भी होती है, और अगर वे धर्म के प्रतीक चिन्ह पहने रहते हैं, तो उनके धर्म की साख पर भी आँच आती है। कोई भी धर्म अपने को मानने वाले लोगों के चाल-चलन से भी पहचाना जाता है, फिर चाहे उस धर्म की किताबें और नसीहतें कुछ और क्यों न कहती हों। भारत से गए हुए लोग ही अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में सबसे अधिक संख्या में हैं, या सबसे अधिक खबरों में रहते हैं। वे भारत के खालिस्तानी आंदोलन को भी इन देशों में चलाते हैं, भारत के माफिया गिरोह भी इन देशों तक अपना विस्तार कर चुके हैं, और वहां भी गोलीबारी करवाते रहते हैं, या कत्ल भी। अभी तो कुछ देशों में भारत सरकार के कुछ अफसर भी घिरे हुए हैं कि उन्होंने वहां की जमीन पर भारत के दुश्मन माने जाने वाले लोगों का कत्ल करवाया, या कत्ल करने की सुपारी दी। इन सबसे एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में भारत का नुकसान हुआ, जो कि जारी भी है, और इसके अलावा जो लोग इस तरह की हरकतों से जुड़े रहते हैं, उनके धर्म भी नुकसान पाते हैं।
ट्विटर, यानी एक्स के मालिक एलन मस्क ने कल ही एक समाचार की कतरन पोस्ट की है जिसमें फ्रांस में एक विदेशी आप्रवासी ने एक फ्रेंच बच्ची से बलात्कार करके उसका कत्ल कर दिया था, और जब तक मुजरिम को सजा होती, तब तक अपनी बेटी को खोने वाले पिता ने भी नशे में डूबकर जिंदगी खो दी। अब इस एक घटना ने आप्रवासियों के खिलाफ नफरत का एक नया सैलाब ला दिया है। इसी तरह ब्रिटेन में अभी बाहर से आकर बसे कुछ मुस्लिमों ने कुछ जुर्म किए, तो उससे मुस्लिमों के खिलाफ भी नाराजगी फैली, और विदेशी शरणार्थियों के खिलाफ भी। ऐसा दुनिया के कई देशों में हो रहा है, और कुछ देशों में तो वहां की सबसे दक्षिणपंथी पार्टियां ऐसे ही शरणार्थी-मुद्दों को लेकर सत्ता पर आ गईं। भारत में भी आज बांग्लादेश और म्यांमार से आए हुए शरणार्थियों का एक बड़ा मुद्दा चुनावी बहस का सामान बना हुआ है, और धर्म के साथ-साथ राष्ट्रीयता भी निशाने पर है।
लोग जब अपनी पहचान को लिए चलते हैं, तो उन्हें अपनी जड़ों के सम्मान के प्रति अधिक सावधान रहना चाहिए। जब धार्मिक कपड़े, प्रतीक चिन्ह, या झंडे लिए हुए लोग कोई हिंसा करते हैं, तो पहला नुकसान वे अपने ही धर्म की साख का करते हैं, दूसरे लोगों का नुकसान तो बाद में होता है। लोगों को सोशल मीडिया पर यह लिखने का मौका मिलता है कि अगर आपका धर्म आपको हिंसा के लिए उकसाता है, तो आपको एक नए धर्म की जरूरत है, या फिर सारे धर्मों को छोड़ देने की। इसी तरह जब लोग अपनी जमीन से दूर जाकर कहीं और बसकर या रहकर काम करते हैं, तो उनकी हरकतें उनके देश को भी नाम दिलाने या बदनाम करने का काम करती हैं। अब आज दुनिया के दर्जनभर से अधिक देशों से गृहयुद्ध या आतंक की वजह से जो बेदखली चल रही है, और लोग जान बचाकर पश्चिम के देशों में गैरकानूनी तरीके से भी घुसने की कोशिश में अपनी जान दे दे रहे हैं, उससे भी उन देशों में संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो रहा है, और संकीर्णतावादी-राष्ट्रवादी लोगों को एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी मिल रहा है। योरप के कई देशों ने इतनी संकीर्ण पार्टियों की इतनी सफलता कई दशकों में नहीं देखी थीं, जितनी कि आज शरणार्थियों और घुसपैठियों की वजह से, उनका खतरा गिनाते हुए मुमकिन हो पा रही है।
सर्वधर्म समभाव की सोच अच्छी है, लेकिन हर धर्म की सोच एक सरीखी है नहीं। खासकर लोकतंत्र को लेकर कुछ धर्म पश्चिमी लोकतंत्रों का अधिक सम्मान कर पाते हैं, और कुछ धर्म अपने को लोकतंत्रों से ऊपर साबित करने में ही लगे रह जाते हैं। पश्चिम में जहां भी उदार लोकतंत्र दुनिया के शरणार्थियों के प्रति अपनी वैश्विक जिम्मेदारी अधिक हद तक निभाने की कोशिश कर रहे हैं, वहां-वहां उन्हें कुछ देशों से आए हुए, और एक-दो धर्मों वाले ऐसे लोगों की चुनौती झेलनी पड़ रही है जो कि लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को अपने धर्म के खिलाफ मानते हैं। योरप की संस्कृतियों में बसने के बाद भी कई मुस्लिम देशों से आए हुए लोग अपनी लड़कियों और महिलाओं के लिए अपने देश के घरेलू संस्कृति जारी रखना चाहते हैं, और लोकतंत्र से उनका एक टकराव खत्म होता ही नहीं है। बुर्का से लेकर हिजाब तक, और बाल विवाह से लेकर ऑनरकिलिंग तक बहुत से मामलों में शरणार्थी समुदाय स्थानीय सरकारों से टकराते हैं, और धीरे-धीरे उनके प्रति योरप के स्थानीय लोगों के बीच हमदर्दी खत्म होती जाती है।
अपनी धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने का हक सैद्धांतिक रूप से एक ठीक बात है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता किसी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और कानूनों से टकराने पर आमादा रहती है, जब वे अपने जन्म के देश की तरह धर्म को संविधान के ऊपर मानकर चलते हैं, या धर्म ही जिनका संविधान रहता है, तो वे लोग शरण देने वाले देशों और वहां की संस्कृति-संविधान से लगातार टकराते रहते हैं। और चूंकि पूरी दुनिया का गोला अब पल-पल के संपर्क की वजह से एक गांव जैसा हो गया है, इसलिए एक देश में शरणार्थियों या घुसपैठियों को लेकर जो तनाव खड़ा होता है, उसका झोंका दूसरे देशों तक भी जाता है। इसलिए हर देश और धर्म के लोगों को बाहर जाने पर, या दूसरे लोगों के साथ रहने पर अपनी आस्था, और अपनी राष्ट्रीयता का सम्मान बनाए रखने की अतिरिक्त कोशिश करनी चाहिए।


