संपादकीय
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कई बार किसी एक देश का मीडिया सच से ऊपर अपने देश के रणनीतिक हितों को रखते हुए झूठी खबरें भी फैलाने में लग जाता है, और यह पत्रकारिता के प्रति ईमानदारी के बजाय राष्ट्रवाद या राष्ट्रप्रेम को महत्व देना मान लिया जाता है। ऐसे में आज जब झूठी खबरें, या वीडियो गढक़र फैलाना आम हो चला है, और एआई का इस्तेमाल ऐसी चुनिंदा खबरों को चारों तरफ फैलाने में किया जा रहा है, तो सच और झूठ का फर्क कर पाना थोड़ा मुश्किल रहता है। सोशल मीडिया पर आई खबरें यह पता नहीं लगने देतीं कि उनमें खबर क्या है, और झूठ क्या है। फिर सोशल मीडिया एक अलग सिद्धांत पर काम करता है कि जब तक कोई झूठ का भांडफोड़ करे, तब तक उसे इतनी जगह, इतने दूर तक फैला दो कि भांडाफोड़ वहां तक पहुंच ही न सके। हम खबरों के धंधे में होने की वजह से सोशल मीडिया पर जाने-माने लोगों के फैलाए हुए ऐसे झूठ लगातार देखते हैं, जो कि सोच-समझकर फैलाए जाते हैं। उनका यह मकसद होता है कि बाद में चाहे भांडाफोड़ हो जाए, लेकिन तब तक वे जंगल की आग की तरह दूर-दूर तक फैल चुके रहें।
ऐसे में अभी बांग्लादेश की एक खबर आई है, जिसे हम किसी भरोसेमंद समाचार स्रोत पर नहीं ढूंढ पा रहे हैं। इसलिए इस खबर पर शक के साथ ही इस पर चर्चा कर रहे हैं। इसके मुताबिक आज की बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के वरिष्ठ सलाहकार आसिफ महमूद शोजिब भुयान ने अभी सोशल मीडिया पर कहा है कि बांग्लादेश में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी आर्मी (आईआरए) की स्थापना चल रही है। इसके लिए कुछ पाकिस्तान समर्थक अधिकारियों के साथ-साथ पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलीजेंस (आईएसआई), और तुर्की की एक एजेंसी (एमआईटी) के प्रतिनिधि बांग्लादेश के चुनिंदा सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। इस खबर में भारतीय अफसरों के नाम बिना लिखा गया है कि भारत इसे बांग्लादेश को इस्लामी राज्य में बदलने के एक कदम की तरह देख रहा है। खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज की खबरों में दिलचस्प यही रहता है कि किसी स्रोत का जिक्र नहीं रहता। फिर भी हम यह मानकर चल रहे हैं कि यह खबर सच हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश आज जितनी उथल-पुथल से गुजर रहा है, और हाल के महीनों में पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते जितने सुधरे हैं, और गाढ़े हुए हैं, उनमें यह बिल्कुल मुमकिन है। दूसरी तरफ तुर्की आज के वक्त में मुस्लिम देशों का एक बड़ा हिमायती होकर खड़ा है, और भारत-पाकिस्तान के किसी भी संघर्ष और तनाव में वह पाकिस्तान के साथ खुलकर है। ऐसे में अगर तुर्की एक नया बांग्लादेश बनाने में ढाका के साथ है, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं होगी।
अब भारत के लिए ऐसी नौबत में फिक्र की बात यह है कि बांग्लादेश पिछले उथल-पुथल के बाद से जिस तरह अस्थिर चल रहा है, और वहां पर भारतविरोधी माहौल जितना आक्रामक है, वह भारत के लिए अच्छा नहीं है। एक तरफ श्रीलंका अलग किस्म की अस्थिरता से गुजर रहा है, और पाकिस्तान का भी कई मायनों में ऐसा ही हाल है, बल्कि वह तो अपने कुछ हिस्सों में गृहयुद्ध सा झेल रहा है। भारत का एक और पड़ोसी म्यांमार फौजी और अलग किस्म के आतंकी गृहयुद्ध को झेल रहा है, और उसका दबाव भारत पर है। फिर एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि भारत के ये सारे ही पड़ोसी देश चीन के प्रभाव में हैं, और भारत के मुकाबले चीन की दखल वहां पर बहुत अधिक है। सबसे ताजा अस्थिर देश नेपाल वहां पर भारतविरोधी भावनाओं को देख रहा है, और वहां की नई नौजवान पीढ़ी भारत के सख्त खिलाफ दिख रही है जो कि हाल के इस सत्ता पलट की जिम्मेदार रही है। इस तरह भारत के अड़ोस-पड़ोस का एक भी देश ऐसा नहीं रह जाता जिसका कोई भी वजन हो, और जो भारत के साथ हो। भूटान किसी रणनीतिक महत्व का नहीं है, और वह चीन और भारत के बीच एक संतुलन बनाकर चलता है।
इस भौगोलिक स्थिति को देखें तो लगता है कि भारत एक चीनी माला के मोतियों से घिरा हुआ है, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, और पाकिस्तान। भारत के इर्द-गिर्द ऐसा घेरा हो सकता है कुछ लोगों को फिक्र का सामान न लगता हो, लेकिन चीन या पाकिस्तान के साथ किसी तनाव की नौबत रहने पर ये सारे ही देश भारत के लिए एक फौजी खतरा बन सकते हैं। ऐसे में जब बांग्लादेश से फौज के इस्लामीकरण की खबर आ रही है, और अगर उसमें कोई सच्चाई है तो यह एक और फिक्र की बात रहेगी। श्रीलंका वहां पर बसे हुए तमिलों को लेकर भारत के साथ कई बार तनातनी झेल चुका है, भारत के एक प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी श्रीलंका के तमिल मुद्दे को लेकर हुई थी। श्रीलंका के तमिलों का मुद्दा भारत सरकार, और तमिलनाडु के लिए अलग-अलग नजरिए से संवेदनशील है, और इसमें भारत की राष्ट्रीय, और क्षेत्रीय सोच अलग-अलग हो जाती है। कुछ ऐसा ही बांग्लादेश के मामले में है जहां पर बंगला मुस्लिमों को लेकर, भारत की राष्ट्रीय सोच, और पश्चिम बंगाल की सोच में कुछ फर्क आता है। इस तरह यह अंतरराष्ट्रीय तनाव भारत के लिए पड़ोसी देश के साथ तनाव होने के साथ-साथ देश के भीतर केन्द्र और राज्य के बीच तनाव भी खड़ा करता है।
भारत सरकार देश की इस बड़ी घेरेबंदी पर सीधे-सीधे कभी कोई बात नहीं करेगी, क्योंकि वह देश की जनता में निराशा पैदा करने वाली होगी, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी देश अपनी ऐसी घेरेबंदी, या शिकस्त मंजूर भी नहीं करता। लेकिन दुनिया के जो लोग हिन्द महासागर के इस हिस्से में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें याद रखना पड़ेगा कि कैसे एक-एक पड़ोस में बढ़ता हुआ तनाव, जनसंतोष, सत्तापलट, और भारतविरोधी भावनाएं एक खतरा खड़ा कर रही हैं। भारत के लोग आमतौर पर अधिक सोचकर कोई फिक्र नहीं करते हैं, वे देश के भीतर फैलाए गए सतही मुद्दों में उलझे रहते हैं, लेकिन जो लोग गंभीर और असल मुद्दों को सोचने में भरोसा रखते हैं, उन्हें भारत के गले में बड़ी यह चीनी विस्फोटक माला गौर से देखनी चाहिए। लोकतंत्र तब तक अधिक सुरक्षित रहता है, जब तक उसके इर्द-गिर्द के देशों में भी लोकतंत्र मजबूत हैं, भारत को अपने पड़ोसियों को मजबूत लोकतंत्र बनाने में दिलचस्पी रखनी चाहिए।


