संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : पाखंड को विज्ञान साबित करने की अंतहीन ज़िद...
सुनील कुमार ने लिखा है
18-Oct-2025 4:41 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : पाखंड को विज्ञान साबित करने की अंतहीन ज़िद...

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के एक प्रोफेसर, विनय पांडेय ने एक रिसर्च-नतीजे का दावा किया है कि 37 फीसदी शादियां इसलिए टूट रही हैं क्योंकि वर-वधू की कुंडलियां नहीं मिलाई जा रही हैं। उनका कहना है कि ग्रहदोष होने के बावजूद शादियां की जा रही हैं, और कुंडली की वजह से ही ऐसे पति-पत्नी शादी के बाद प्रेम-प्रसंगों में पड़कर नए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं, या एक-दूसरे का कत्ल करवा रहे हैं। प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि उन्होंने अपने रिसर्च स्कॉलरों के साथ मिलकर छह महीने में इस शोध को पूरा किया है। उनका कहना है कि आजकल लड़के-लड़की की कुंडली में गुण मिलाए नहीं जाते, और आधुनिक बनने के चक्कर में लोग सनातन रस्में नहीं निभाते हैं। उनका कहना है कि मंत्रों के उच्चारण की जरूरत भी आजकल नहीं समझी जाती, और नतीजा यह है कि पति-पत्नी एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं।

इस देश को सबसे पहले तो अमरीका से कभी-कभार हिंदुस्तान आने वाली सुनीता विलियम्स का सम्मान करना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह तो अंतरिक्ष में जाकर उन ग्रहों को अधिक करीब से देखती हैं जो कि पंडित विनय पांडेय, आशुतोष त्रिपाठी, और अमित कुमार मिश्रा की इस रिसर्च की भावना को चोट पहुंचाती है। जब भारत के कुछ विश्वविद्यालयों में अब ज्योतिष के तहत ग्रहों को पढ़ाया जा रहा है, तो नासा जैसी फ्रॉड अंतरिक्ष एजेंसी को ऐसे भारतीय विश्वविद्यालयों का अमरीकी अध्ययन केंद्र खोलना चाहिए ताकि एलन मस्क सरीखों पर अधिक पैसा बर्बाद न हो, और नासा ज्योतिष विज्ञान से ही सबकुछ सीख ले। भारत का इसरो मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रहा है, उसमें एक-दो ज्योतिषी भी भेजने चाहिए जो मंगल से पूछ सकें कि वह शादी के वक़्त लड़के-लड़कियों की कुंडली में कुंडली मारकर क्यों बैठ जाता है, और रिश्ते नहीं होने देता? यह सिलसिला देश के लिए इतना खतरनाक हो चुका है कि बड़े-बड़े अखबार, टीवी चैनल, और करोड़ों हिट्स पाने वाली वेबसाइटें भी तथाकथित ज्योतिष पर आधारित कॉलम या कार्यक्रम दिखाने में लगे रहते हैं। यह पूरा सिलसिला देश में दहशत पैदा करके दुहने का है। ऐसे सारे ज्योतिषी चुनावों के समय बिल से निकलकर आते हैं, तरह-तरह की घोषणाएं करते हैं, और चुनावी नतीजे आने पर उनमें से अधिकतर पांच बरस के लिए फिर बिल में चले जाते हैं। भारत में कई चीजों को विज्ञान कहने का शौक है, इसमें ज्योतिष भी एक है। इसे न सिर्फ पेशेवर लोग विज्ञान कहते हैं, बल्कि सरकारों के धार्मिक और राजनीतिक रुझान के चलते कई विश्वविद्यालयों में इसके कोर्स शुरू कर दिए गए हैं। नतीजा यह है कि इस पूरी तरह अवैज्ञानिक विषय को एक वैज्ञानिक मान्यता दिलवा दी गई है। अब इसका अगला कदम यही हो सकता है कि चुनाव आयोग अपने अधिकृत ज्योतिषी रखे, और बिना मतदान के उनसे नतीजे निकलवा ले। चूंकि ये ज्योतिषी वैज्ञानिक का दर्जा भी प्राप्त होंगे, इसलिए उन पर ईवीएम जैसा शक भी विपक्षी पार्टियां नहीं कर सकेंगी। 

इस मुद्दे से थोड़ा सा ऊपर उठकर अगर देखें, तो यह दिखता है कि जितनी अवैज्ञानिक बातें रहती हैं, वे अपने आपको विज्ञान का दर्जा दिलाने के लिए लगी रहती हैं। कुछ लोग तरह-तरह की धार्मिक बातों को विज्ञान का दर्जा दिलवाना चाहते हैं। अभी-अभी एक साध्वी का बयान आया कि गाय का पचास ग्राम घी जलाने से चालीस टन ऑक्सीजन पैदा होती है। अब विज्ञान की समझ रखने वाले लोग ऐसे दावों के झांसे में नहीं आएंगे, लेकिन धर्म पर अंधभक्ति रखने वाले लोग यह मान लेंगे कि साध्वी कह रही हैं तो सच ही होगा। ऐसा होने पर धर्म के लोग कोरोना के दौरान ऑक्सीजन के लिए गिरते-पड़ते अस्पतालों में क्यों पहुंचे थे? लोगों को वह तस्वीर भी याद होगी कि रामदेव नाम का एक भगवा लंगोटीधारी तबीयत खराब होने पर भागे-भागे जाकर एम्स में भर्ती हुआ था, और तुरंत ऑक्सीजन लेने लगा था। कायदे से तो उसे गाय के घी का दीया जलाकर उसके धुएं को सूंघना चाहिए था, या किसी गौशाला में बैठकर गाय की छोड़ी हुई सांस सूंघना चाहिए था जिसके बारे में दावा किया जाता है कि गाय ऑक्सीजन ही लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। यह बड़े ही मजे की बात है कि धर्म बार-बार विज्ञान के बेजा इस्तेमाल की कोशिश में लगे रहता है, जबकि विज्ञान है कि वह धर्म की दुकान के सामने से निकल जाता है, उस तरफ झांकता भी नहीं है। इसी से पता चलता है कि दोनों में से अधिक अहमियत किसकी है। अंधभक्तों की बहुतायत धर्म के साथ हो सकती है, लेकिन उनमें से किसी को भी अगर कहकर देखें कि विज्ञान की दी हुई चीजों का इस्तेमाल न करें, बिजली, फोन, पेट्रोल, और पंप से आया हुआ पानी इस्तेमाल न करें, तो उनकी आस्था का वजन समझ में आ जाएगा, वह गैस के गुब्बारे से भी हल्की साबित होगी।

इस देश में ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने के बाद अब तंत्र-साधना विज्ञान, झाड़-फूंक विज्ञान, पीलिया उतारने और सांप का जहर उतारने का विज्ञान, इन सबके भी डिग्री या डिप्लोमा कोर्स शुरू करने चाहिए। दुनिया के विकसित देश, जिनमें पड़ोस का चीन भी शामिल है, विज्ञान और टेक्नोलॉजी से आगे बढ़ रहे हैं, और हिंदुस्तान में जो लोग विज्ञान और टेक्नोलॉजी की हर सहूलियत का मजा ले रहे हैं, वे दूसरों पर अंधविश्वास थोप रहे हैं। अब ये ज्योतिषी क्या बताएंगे कि बड़े-बड़े राजा-रानी की शादियों के पहले तो उन्हें राजज्योतिषियों की सेवा हासिल रही होगी, उसके बाद इनकी शादियां क्यों टूटती हैं? पाखंड अगर सीधे-सीधे पाखंड फैलाने का काम करे, तो उसमें कोई दिक्कत नहीं है, फुटपाथ पर लोग तांत्रिक अंगूठी बेचते हैं, और जब तक दुनिया में बेवकूफ जिंदा है तब तक ऐसी अंगूठियां बिकती रहती हैं, दिक्कत सिर्फ वहीं पर है जब इसे विज्ञान का दर्जा दिया जाता है, विश्वविद्यालय में इसका कोर्स शुरू किया जाता है। कितनी आसान सी बात है कि विज्ञान को कभी किसी पाखंड की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन पाखंड को विज्ञान के मुखौटे की तलाश हमेशा ही रहती है, है ना दिलचस्प बात?

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