संपादकीय
कुछ अरसा पहले एक लतीफा था जिसमें किसी संपन्न या विकसित देश का एक व्यक्ति ऑनलाइन खरीदी करने के लिए किसी शॉपिंग वेबसाइट पर जाता है, और वहां अपने कपड़ों का साइज तय करते हुए एआई चैटबॉट जो कि उस व्यक्ति की दूसरी सारी जानकारी भी रखता है, वह कहता है कि साल भर पहले आपके शर्ट का साइज लार्ज था, और अब एक्स्ट्रा लार्ज हो गया है। चैटबॉट उसे याद दिलाता है कि उसका वजन पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ रहा है, और उसका शुगर लेवल, उसका बीपी, ये भी बढ़ रहे हैं। एआई के पास इस आदमी की जांच-रिपोर्ट हैं, डॉक्टर का लिखा हुआ पर्चा है, दवा खरीदी के बिल हैं। एआई उसे यह भी याद दिलाता है कि पिछले तीन महीनों में वह चार बार रेस्त्रां में अधिक तली-भुनी चीजें खा चुका है, हर बार शराब भी पी चुका है, और जरूरत से अधिक मीठे केक-आइसक्रीम भी उसने खाए हैं। एआई चैटबॉट उसे बताता है कि वह ऑफिस आते-जाते रास्ते में रूककर मीठा मिल्कशेक लेता है, और इससे उसकी सेहत पर खतरा बढ़ते चल रहा है। फिर मानो इतनी जानकारी काफी न हो, जब यह आदमी लड़कियों के कुछ भीतरी कपड़े खरीदना चाहता है, ऑर्डर करते रहता है, तो मददगार एआई चैटबॉट उसे बताता है कि यह साइज उसकी पत्नी का नहीं है, और रंग भी पत्नी के पसंद का नहीं है, इसे घर के एड्रेस पर मंगाने से गड़बड़ हो सकता है। चैटबॉट ही यह बताता है कि पत्नी आने वाली किस तारीख को दस दिनों के लिए किस शहर जा रही है, जहां उसके माता-पिता भी रहते हैं, और उन दिनों में ऐसा पैकेट बुलवाना सुरक्षित रहेगा। एआई चैटबॉट ऑफिस की कई बातों को गिनाकर सावधान करता है, बाहर कॉस्मेटिक की किसी दुकान से कोई खरीददारी करना बताता है, और याद दिलाता है कि उस वक्त उसकी बीवी तो घर पर थी, और बाहर जिसके लिए भी उसने कॉस्मेटिक खरीदी थी, उसका बिल उसके क्रेडिट कार्ड पर आना ही है।
आज भारत में भी लोग सौ-पचास रूपए के फलों से लेकर, मेडिकल स्टोर से खरीदी जाने वाली चीजों तक का भुगतान मोबाइल फोन से यूपीआई के मार्फत करने लगे हैं। हर चीज का रिकॉर्ड इतने खुलासे के साथ बैंकों, यूपीआई कंपनियों, और कुल मिलाकर सरकार के हाथ है कि कितने बजे किस इलाके के किस ठेले से आपने फल खरीदे, और कितने बजे किस दूसरी दुकान से कहां पर आपने कोई दूसरा सामान खरीदा। इसके अलावा फोन के कॉल डिटेल्स, फोन की लोकेशन से यह भी सरकार के हाथ है कि आप किस पते पर कितनी देर रहे, और उस पते पर इस तरह से जाना हफ्ते के किसी खास दिन, किसी खास समय पर होता है, या हर दिन होता है? ऐसी तमाम बातें अब निजी कंपनियों के हाथ, सरकार के हाथ, और एआई के हाथ भी लगती चल रही है। अभी एक बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ, एक कंपनी एक नए एआई के साथ प्रयोग कर रही थी। कंपनी के कर्मचारियों-अधिकारियों के ईमेल खातों तक एआई को पहुंच दी गई थी, ताकि वह कंपनी का बहुत सारा काम कर सके। बाद में एआई की अधिक दखलंदाजी देखकर कंपनी के लोगों ने यह तय किया कि इस एआई को काम से हटा दिया जाएगा। यह चेतावनी सुनने के बाद एआई ने अपनी ट्रेनिंग के खिलाफ जाकर जानकारियां इकट्ठा कीं, और जिस अधिकारी ने एआई को हटाने की चेतावनी दी थी, उसे धमकी दी कि अगर वह इस एआई को हटा देगा, तो एआई उसके ईमेल संपर्कों को उसके ईमेल बॉक्स से मिली निजी जानकारियां भेज देगा, जिनमें यह भी शामिल है कि वह किन तारीखों पर किस विवाहेत्तर प्रेमिका के साथ कहां छुट्टियां मनाने गया था, टिकटों का भुगतान, होटल का भुगतान उसने किस तरह किया था। यह घटना किस्सा-कहानी नहीं है, यह अभी कुछ हफ्ते पहले एक कंपनी में सचमुच हुआ है कि जब एआई को लगा कि उसके अस्तित्व पर संकट आ गया है, उसे खत्म करने की बात हो रही है, तो आत्मरक्षा के लिए उसने ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी। अब आज सरकारें, सार्वजनिक सुविधाएं, और कारोबार, इन सबका एक-दूसरे से पल-पल का ऑनलाइन रिश्ता इतना जटिल और मजबूत हो गया है कि लोगों की हर खरीदी, उनका हर भुगतान, पैसों की आवाजाही, इन सबका रिकॉर्ड एआई से लैस कम्प्यूटर सरकारी दखल के साथ पल भर में निकाल सकते हैं।
कल तक जो लगता था कि सीसीटीवी कैमरे और ट्रैफिक के चालान, टोल टैक्स नाके पर किए गए भुगतान, और हाईवे पर डीजल-पेट्रोल या खाने के भुगतान से लोगों की आवाजाही पर नजर रखी जा सकती है, अब ऐसे कैमरों की जरूरत भी नहीं रह गई है। अब सिर्फ मोबाइल फोन, इंटरनेट, डिवाइस की लोकेशन से भी बहुत सारी चीजें तय की जा सकती हैं। लोगों को डिजिटल सहूलियतों की आदत तो हो गई है, लेकिन डिजिटल सावधानी सूझना भी शुरू नहीं हुई है। जब पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी आपके मोबाइल फोन, ईमेल बॉक्स, सोशल मीडिया की गतिविधियां लेकर बैठती हैं, तो आपका मानो तौलिया ही उतर जाता है। कुछ भी निजी, कुछ भी गोपनीय नहीं रह जाता। निगरानी से परे अब सिर्फ यही हो सकता है कि जो लोग जंगल की या पहाड़ की किसी गुफा के भीतर रहते हैं, जहां न बिजली है, न कोई उपकरण है, जहां गुफा के बाहर कोई कैमरे भी नहीं लगे हैं, जहां कोई मोबाइलधारी लोग आते-जाते भी नहीं हैं, बस वहीं पर लोगों की निजता रह सकती है, फिर चाहे वे जानवर की खाल लपेटकर रहें, या बिना कपड़ों के रहें। बाकी तो दुनिया में अब कुछ भी छुपा हुआ नहीं रह गया है। तमाम प्रमुख महानगरों में अब सीसीटीवी कैमरों के साथ एआई से लैस चेहरा पहचानने वाली तकनीक इस्तेमाल होने लगी है, और कैमरों का नेटवर्क एआई में डाले गए किसी भी चेहरे को किसी महानगर में पल भर में ढूंढकर निकाल सकते हैं, और फिर लगातार खबर कर सकते हैं कि यह चेहरा किस तरफ जा रहा है, कहां तक पहुंच रहा है।
दुनिया में अब निगरानी की इतनी किस्में हो गई हैं कि सरकारी खुफिया एजेंसियों को आधी सदी पहले की जासूसी फिल्मों की तरह किसी का पीछा करते हुए पैदल जाने की जरूरत नहीं है। अब पैदल जाकर, दौडक़र, छुपकर, छत से, या जहां से भी निगरानी रखनी है, अब एआई से लैस कैमरे, संचार उपग्रह, संचार कंपनियों के कम्प्यूटर, भुगतान कंपनियों के रिकॉर्ड, ये सब मिलकर निगरानी के काम को बच्चों के खेल सरीखा बना चुके हैं। इसलिए जिस तरह एक वक्त यह इश्तहार आता था जिसमें ललिताजी कहती थी कि सर्फ की खरीददारी में ही समझदारी है, उसी तरह आज यह कहा जा सकता है कि अपना चाल-चलन, और अपनी हरकतें ठीक-ठाक रखने में ही समझदारी है, वरना जिस बात को आप निजी समझते हैं, उसके पोस्टर आपको अगले चौराहे पर देखने मिल सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


