संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चाहे जितना बड़ा गुंडा हो, असरदार तो ट्रम्प ही है...
सुनील कुमार ने लिखा है
13-Oct-2025 5:30 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : चाहे जितना बड़ा गुंडा हो, असरदार तो ट्रम्प ही है...

आज 13 अक्टूबर की सुबह जब हम यह लिख रहे हैं, उसी पल इजराइल के एयरपोर्ट पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का विमान उतरा है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीन के हमास के कब्जे से इजराइली बंधकों का एक जत्था रिहा होकर रेडक्रॉस के मार्फत इजराइल की जमीन पर पहुंच गया है। दो बरस एक हफ्ते बाद की यह रिहाई करीब दो दर्जन जिंदा, और दो दर्जन गुजर चुके बंधकों की रिहाई वाली रहेगी, और इसके एवज में इजराइल सैकड़ों फिलीस्तनी कैदियों को रिहा करने जा रहा है जिसमें कुछ दर्जन ऐसे स्वास्थ्य कर्मचारी भी हैं जो कि इजराइली हमले में घायल हुए फिलीस्तीनियों के इलाज में लगे हुए थे। यह मौका दुनिया के इस हिस्से के लिए बड़ी अहमियत इसलिए रखता है कि पूरे मध्य-पूर्व में, खाड़ी के देशों में, अकेला इजराइल परमाणु हथियार संपन्न देश है, और मुस्लिम देशों में से कुछ के साथ उसके फौजी तनातनी के रिश्तों का बड़ा लंबा इतिहास रहा है। इजराइल और गाजा के बीच के हथियारबंद टकराव में इजराइली फौजी हमलों में अब तक 67 हजार से अधिक फिलीस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें से अधिकतर तो निहत्थे नागरिक थे, महिला-बच्चे थे।

दुनिया के इतिहास के इस पल को देखें, तो यह लगता है कि ट्रम्प ने जिस अंदाज में इजराइल और गाजा के हथियारबंद संगठन हमास के बीच यह समझौता कराया है, वह ट्रम्प ही करवा सकता था, और शायद इसी अंदाज में करवा सकता था। इसके पहले उसने परदे के पीछे से शायद निहत्थे फिलीस्तीनियों पर फौजी हमले बढ़ाने की छूट भी दी होगी, और माहौल में जब तनाव बहुत अधिक बढ़ गया, तब उसे सुलझाने का शायद नाटक भी किया होगा। उसने नोबल शांति पुरस्कार कमेटी की बैठक के ठीक पहले इस समझौते की घोषणा की, और यह उम्मीद भी की कि इस बरस का यह पुरस्कार उसे मिले, यह एक अलग बात है कि यह उसे न मिलकर उसकी एक कट्टर समर्थक महिला को वेनेजुएला में अपने आंदोलनों की वजह से मिला है।

हम एक बार फिर आज के गाजा के मुद्दे पर लौटें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया की बहुत सी दूसरी ताकतें फिलीस्तीन को बचाने में बेअसर साबित हुईं। जिन देशों ने अभी कुछ हफ्ते पहले फिलीस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी, उनमें से भी ब्रिटेन और जर्मनी तो ऐसे थे जो कि इजराइल को हथियार बेच ही रहे थे, उन्होंने हथियार बेचना बंद नहीं किया था, इजराइल के खिलाफ कोई फैसला नहीं लिया था। ऐसे में अमरीका, जो कि पूरी तरह से इजराइल का सरपरस्त बना हुआ है, उसे एक के बाद एक अमरीकी राष्ट्रपति फिलीस्तीन पर बरसाने के लिए हथियार और बम देते आ रहे थे, उस अमरीका ने इजराइल और हमास दोनों की बांहें मरोडऩे का दिखावा करते हुए वह करवाया है, जो कि इजराइल चाहता था, और इसे एक समझौते की तरह पेश किया गया। लेकिन इससे भी हमें कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि पश्चिम के बड़े-बड़े देशों ने इस समझौते से सहमति जताई है, और मध्य-पूर्व के अधिकतर मुस्लिम देशों ने हामी भरी है। भारत जैसा दूर बैठा देश भी इस समझौते की तारीफ कर रहा है, और इसके खिलाफ कोई आवाज उठी नहीं है। मतलब यह कि बाहुबली ट्रम्प ने लोगों की बांह मरोडक़र अपनी मर्जी का यह समाधान लागू करवा दिया है। हम हर दिन फिलीस्तीन में होती दर्जनों मौतों को किसी भी तरह रोकने के हिमायती थे, और फिलहाल वहां के दसियों लाख लोगों को सांस लेने, पेट में दो कौर डालने, और शायद मरहम लगाने का एक मौका मिला है। इसके साथ-साथ ट्रम्प के प्लान में गाजा के पुनर्निर्माण की जो बात है, उस सच को अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि मजहब के गद्दार मुस्लिम देशों ने दुनिया के इस सबसे गरीब और जुल्म के शिकार, जख्मी और बेघर हो चुके देश के लिए कुछ भी नहीं किया, जबकि यह भी उन्हीं के मुस्लिम ब्रदरहुड वाला देश है। यह बताता है कि मजहब के दावे करने वाले लोग किस हद तक बेरहम और बेइंसाफ हो सकते हैं। आज यही मुस्लिम देश ट्रम्प के हाथों बांह मरोड़ी जाने पर फिलीस्तीन का साथ देने के लिए खड़े हुए हैं, लेकिन 67 हजार लोगों के मारे जाने पर इन लोगों ने कफन-दफन के मौके पर कहे जाने वाले दो शब्द भी नहीं कहे थे।

आज की इस बात को लिखने का मकसद महज यह है कि दुनिया को आज किसी नैतिकता की बात करने का कोई हक नहीं रह गया है। गांधी, नेहरू, और अटल बिहारी के हिन्दुस्तान ने फिलीस्तीन के लिए मरहम की एक ट्यूब नहीं भेजी, किसी मुस्लिम देश ने दो मीटर का कफन भी नहीं भेजा, ऐसे में चाहे अपनी ही बढ़ाई गई मौतों को रोकने की ताकत अगर ट्रम्प ने दिखाई है, तो आज की तारीख में तो वही फिलीस्तीनियों की जान बचाने वाला नेता है। दुनिया में अब कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन कारगर नहीं रह गए हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह बेअसर हो चुका है, और ट्रम्प से तो शायद राष्ट्रसंघ के मुखिया को मिलने का वक्त भी नहीं मिलता होगा। आज दुनिया का हाल जिसकी लाठी, उसकी भैंस जैसा हो गया है, और आज अगर फिलीस्तीन में मौतें थमी हैं, लोगों की तरफ आटा बढ़ रहा है, दवा बढ़ रही है, तो यह सब कुछ ट्रम्प की वजह से हो रहा है। हम फिलीस्तीन के साथ किसी लंबे-चौड़े इंसाफ की उम्मीद नहीं कर रहे हैं, लेकिन हर दिन होने वाली दर्जनों मौतों को अगर आज रोका गया है, तो आज की दुनिया में फिलीस्तीन जैसा कमजोर और गरीब देश इससे अधिक कोई इंसाफ पा नहीं सकता। यह बात ट्रम्प जैसे दुनिया के सबसे बड़े मवाली का शक्ति प्रदर्शन है, लेकिन साथ-साथ दुनिया की बाकी तमाम ताकतों को यह सोचना चाहिए कि आज धरती के इस गोले में उनकी क्या जगह और औकात रह गई है? जिन लोगों को फिलीस्तीन के भविष्य की बात सूझ रही है, और आज का यह समझौता खटक रहा है, उन्हें यह समझना चाहिए कि इसी रफ्तार से अगर हर दिन इजराइली हमले में फिलीस्तीनी मरते रहते, तो इजराइल को भला कौन रोक सकता था। इस विश्व को आज किसी भी तरह की सभ्यता का कोई दावा नहीं करना चाहिए, यह दुनिया अब पत्थर युग की तरह सबसे ताकतवर की गुलाम है, और यहां पर लोकतंत्र जैसी तमाम बातें पूरी तरह फिजूल हैं। ट्रम्प अगर कल नार्वे पर हमला करके नोबल शांति पुरस्कार के मैडल को बंदूक की नोंक पर छीनकर भी ले आएगा, तो भी किसी को कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आज की विश्व व्यवस्था में उसी ताकत को सबने मान लिया है। फिलहाल हम चाहते हैं कि फिलीस्तीन का पेट भरे, उसके जख्मों पर मरहम लगे, और दुनिया के देशों की बांह मरोडक़र ट्रम्प गाजा का पुनर्निर्माण करवा सके।  

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