दुर्ग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
दुर्ग, 10 जनवरी। देश-विदेश में चर्चित कथाकार, गद्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन के निधन पर जन-संस्कृति मंच दुर्ग -भिलाई ने कथाकार कैलाश बनवासी के निवास पर आयोजित शोक सभा में उन्हें गहरी संवेदना के साथ याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।
इस शोक सभा में संचालन करते हुए कथाकार कैलाश बनवासी ने उनके 90 वर्षों के अथक सक्रिय और कर्मठ जीवन का परिचय देते हुए अपने समय की चुनौतियों से लडऩे वाला प्रतिबद्ध योद्धा बताया।जिसमें उन्होंने उनके स्वभाव में प्रारंभ से ही विद्रोही तेवर की,साठोत्तरी पीढ़ी के सबसे चर्चित कथाकार होने की बात कही। उन्होंने अपनी पत्रिकाज्पहलज् को देश के हर कोने, भाषा से जोड़ा और कभी सत्तामुखी नहीं रहे। कैलाश बनवासी ने उनके समय को सूक्ष्मता से प्रकट करने वाले विलक्षण और महत्वपूर्ण गद्य का पाठ किया। कवि घनश्याम त्रिपाठी ने उनकी कहानी च्पिताज् की चर्चा करते हुए बेहद प्रभावशाली कहानी बताया।
पहल में छपी लंबी कविता पुरातत्ववेत्ता के कवि शरद कोकास ने ज्ञानरंजन के साथ अपने बहुत लंबे समय से जुड़ाव को स्मरण करते हुए कहा कि वे सत्ता और राजनीति पर दो टूक बात करते थे। और कविता के गहन पाठक थे। युवा आलोचक अंजन कुमार ने उनकी कहानियों की संरचना,शिल्प, शैली और प्रभाव को विलक्षण बताते हुए कहा, वे अपने समय की संवेदनाओं के विघटन,क्षरण, और बदलते मूल्यों को बहुत सूक्ष्मता से दर्ज करते थे और व्याप्त अंतर्विरोधों को काव्यात्मक गद्य में प्रकट करते थे। कवियत्री और अनुवादक मिता दास ने उनसे अपनी मुलाकातों का जिक्र करते हुए उनके साहसिकता के साथ आत्मीयता को याद किया।
कथाकार विजय वर्तमान ने उनके अंतिम समय तक वैचारिक प्रतिबद्धता को दुर्लभ बताया। श्रमिक नेता बृजेन्द्र तिवारी ने उनके संपादन कार्य की व्यापकता को आने वाली पीढिय़ों को अनुकरण करने की जरुरत पर बल दिया,यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा, ज्ञानरंजन ने लेखकों को बनाने का काम किया। वह समय को बहुत पहले से देख लेने वाले वैश्विक दृष्टि से, वैचारिक प्रतिबद्धता से लैस विलक्षण कथाकार थे। उनके संपादन में निकले च्पहलज् की आठवें दशक में वही भूमिका थी जो नवजागरण काल में च्सरस्वतीज् के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी की थी। वे युवा रचनाकारों के प्रेरणा स्त्रोत थे। वह एक व्यक्ति नहीं, संस्था थे। सभा में श्रमिक नेता आर पी गजेन्द्र, दिनेश सोलंकी भी उपस्थित थे।


