दुर्ग
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
उतई, 2 नवंबर। विश्व शाकाहारी (वीगन) दिवस के अवसर पर 30 अक्टूबर को देशभर के कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर एक राष्ट्रव्यापी अभियान में वीगनिज़्म के संदेश को फैलाने के लिए काम किया।
यह कार्यक्रम वीगन इण्डिया मूवमेंट द्वारा संचालित था, जो देशभर में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का एक संगठन है। भारत के 30 स्थानों पर 500 से अधिक कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। न केवल बैंगलूरू, दिल्ली और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों ने इसमें भाग लिया, बल्कि बिलासपुर और भिलाई जैसे छोटे शहरों ने भी पशु अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद की।
इस विशाल राष्ट्रव्यापी आयोजन में भिलाई के कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया।
पशु अधिकार के मैसेज वाले पोस्टर और लैपटॉप, जिसमें विभिन्न उद्योगों में जानवरों के साथ किए जाने वाले व्यवहार के वीडियोस दिखाए गए, और हमनें पशु अधिकारों के बारे में दर्शकों से बात की। इसका उद्देश्य जनता को शिक्षित करना था कि वे जानवरों को संवेदनशील प्राणी के रूप में देखें, ना कि केवल वस्तुओं के रूप में। हम इस मिथक को दूर करना चाहते थे कि वीगनिज़्म बस एक आहार है और जनता को इसे सामाजिक न्याय आंदोलन के रूप में दिखाना चाहते थे।
यह जागरूकता का कार्यक्रम भिलाई में सिविक सेंटर में 2 घंटे तक चला। वीगनिज़्म केवल एक आहार नहीं है, बल्कि एक सामाजिक न्याय आंदोलन है, और हम इस आयोजन के माध्यम से इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना चाहते थे।
आस्था गुप्ता एक आयोजक ने कहा, कल्पना कीजिए कि आप केवल इसीलिए पैदा हो कि आपको किसी की इच्छाओं के लिए प्रताडि़त किया जाए और मार दिया जाए।यह उन अरबों स्थलचर और जलचर प्राणियों की कहानी है जिनका हम हर साल भोजन, कपड़े, मनोरंजन, प्रयोग, श्रम इत्यादि के लिए शोषण करते हैं। अगर ये पीडि़त इंसान होते, तो हम इसे अब तक की सबसे नीच बर्बरता कहते और जब तक कोई पशु-आधारित उत्पादों से परहेज नहीं करता, वह इस बर्बरता को बढ़ावा दे रहे हैं। जानवरों पर क्रूरता के लिए नाराजगी जताने वाले और फिर अत्याचारी उद्योग का आँख मूंदकर समर्थन करने वाले लोगों में इतना अधिक वियोग देखना भयावह है।
जहां भी कसाईखाना होता है, वहां क्रूरता होती है। जहां भी मांस की दुकान होती है, वहां कू्ररता होती है। जहां कहीं भी पशु उत्पादों के अज्ञानी उपभोक्ता हैं, वहां क्रूरता है, उन्होंने कहा।
दुनिया भर में करोड़ों वीगनवादी इस बात की गवाही देते हैं कि मांस, अंडे, दूध, शहद, चमड़ा, ऊन, रेशम, फर, सर्कस, चिडिय़ाघर आदि के बिना भी व्यक्ति स्वस्थ और खुशी से रह सकता है। जब हम दूसरों को नुकसान पहुंचाएं बिना खुश और स्वस्थ रह सकते हैं, तो हम ऐसा क्यों नहीं करते?


