बलौदा बाजार
विद्यार्थियों के लिए आर्द्रभूमि संरक्षण व तकनीकी परीक्षण पर कार्यशाला आयोजित
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बलौदाबाजार, 5 जून। आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बलौदाबाजार में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में विद्यार्थियों को वेटलैंड्स की पहचान, उनके पर्यावरणीय महत्व, संरक्षण की नीतियों और फील्ड स्तर पर उपयोग होने वाले आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी गई।
कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा जानकारी दी गई कि वेटलैंड्स वे क्षेत्र होते हैं जहां वर्षभर या किसी निश्चित अवधि तक पानी मौजूद रहता है, जिनमें तालाब, झीलें, दलदली क्षेत्र और जलाशय शामिल हैं।
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. आर.के. सिंह ने कहा कि वेटलैंड्स केवल जल स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये हजारों प्रजातियों के जीवन का आधार हैं. यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में जल संकट और जैव विविधता के नुकसान जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक एवं एग्रीकल्चर इकोनॉमिस्ट दिनेश कुमार मारोठिया ने अपने व्याख्यान में बताया कि कृषि उत्पादन, जल सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक आर्द्रभूमियों पर निर्भर करती है। कई क्षेत्रों में वेटलैंड्स किसानों के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत हैं, जबकि अनेक पक्षी और वन्यजीव इन्हें अपना स्थायी आवास बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और अतिक्रमण के कारण देशभर में वेटलैंड्स का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनभागीदारी दोनों जरूरी हैं। कार्यशाला में वन विभाग के अधिकारियों ने जिले में संचालित वेटलैंड संरक्षण कार्यों की तकनीकी जानकारी साझा की।
डीएफओ ने बताया कि वनमंडल स्तर पर विभिन्न आर्द्रभूमियों की पहचान, दस्तावेजीकरण और उनके संरक्षण के लिए ग्राउंड ट्रूथिंग और फील्ड सर्वे जैसी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जा रहा है।
प्रशिक्षु एसीएफ गुलशन कुमार साहू ने वेटलैंड्स से जुड़े कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देश में आर्द्रभूमियों को अतिक्रमण, प्रदूषण और अवैध दोहन से बचाने के लिए विभिन्न नियम और नीतियां बनाई गई हैं, जिनमें युवाओं की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है।
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में विद्यार्थियों को व्यावहारिक और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया। सहायक अध्यापक अजय मिश्रा ने विद्यार्थियों को बताया कि किसी भी वेटलैंड की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए हेल्थ कार्ड तैयार किया जाता है। इसमें जल की गुणवत्ता, जैव विविधता, रासायनिक गुण, वनस्पति की स्थिति, जीव-जंतुओं की उपस्थिति और पर्यावरणीय संकेतक जैसे मानकों का अध्ययन किया जाता है।
वन विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों और रसायनों की मदद से छात्र-छात्राएं जल के भौतिक और रासायनिक गुणों का परीक्षण करेंगे तथा स्थानीय वनस्पतियों व जीवों का सर्वेक्षण करेंगे।
तकनीकी सत्र के दौरान विद्यार्थियों को डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (डीजीपीएस) की कार्यप्रणाली समझाई गई। जानकारों ने बताया कि यह तकनीक सामान्य जीपीएस की तुलना में अधिक सटीक भौगोलिक आंकड़े उपलब्ध कराती है, जिससे वेटलैंड्स के सटीक स्थान, क्षेत्रफल और सीमाओं का निर्धारण किया जाता है।


