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ब्रसेल्स, 31 अक्टूबर | बेल्जियम सरकार ने घोषणा की है कि देश में सोमवार से राष्ट्रीय लॉकडाउन लागू किया जाएगा। यूरोप के इस देश में कोविड-19 संक्रमण दर सबसे अधिक होने की सूचना मिलने के बाद यह फैसला लिया गया है।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, नए लॉकडाउन के तहत गैर-आवश्यक दुकानें और हेयर सैलून जैसी व्यक्तिगत सेवाएं प्रदान करने वाले व्यवसाय दिसंबर के मध्य तक बेल्जियम भर में बंद रहेंगे।
वहीं सार्वजनिक स्थानों पर सभाएं अधिकतम चार लोगों तक सीमित रहेंगी। सुपर मार्केट्स को सिर्फ आवश्यक सामान बेचने की अनुमति होगी।
परिवारों को सिर्फ एक आगंतुक आमंत्रित करने की अनुमति होगी और रात के दौरान कर्फ्यू के उपाय और रेस्तरां बंद रखना जारी रहेगा।
स्वास्थ्य मंत्री फ्रैंक वांडेनब्रुक ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि नया लॉकडाउन लोगों को आइसोलेशन में नहीं डुबोएगा।
बीबीसी ने वांडेनब्रुक के बयान का हवाला देते हुए कहा, हालांकि यह लॉकडाउन है, लेकिन यह लॉकडाउन कारखानों को संचालित करने की अनुमति देता है और स्कूलों को सावधानीपूर्वक खोलने की अनुमति देगा।
इस साल की शुरुआत में पहली कोविड-19 लहर में बेल्जियम को दुनिया में सबसे अधिक मृत्युदर का सामना करना पड़ा।
यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल के अनुसार, पिछले दो सप्ताह में देश में 1,600 नए मामले और प्रति 100,000 लोगों में 8.4 मौतें दर्ज की गई हैं।
बेल्जियम में शनिवार को कुल मामले बढ़कर 412,314 हो गए, जबकि मौतों का आंकड़ा 11,452 रहा।
(आईएएनएस)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31 अक्टूबर। प्रदेश के शिक्षा कर्मियों को छत्तीसगढ़ राज्योत्सव पर खुशियों की सौगात मिली है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की घोषणा के अनुरूप लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा 7 हजार 925 व्याख्याताओं (पंचायत एवं नगरीय निकाय) के एक नवम्बर 2020 से स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन का आदेश आज जारी कर दिया गया है।
-दयाशंकर शुक्ल सागर
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए
महात्मा गांधी अगर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न करते तो सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र पहली भारतीय सरकार के अंतरिम प्रधानमंत्री होते.
जिस समय आज़ादी मिली, पटेल 71 साल के थे जबकि नेहरू सिर्फ 56 साल के. देश उस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था.
जिन्ना पाकिस्तान की जिद पर अड़े थे. ब्रितानी हुकूमत ने कांग्रेस को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था.
कांग्रेस चाहती थी कि देश की कमान पटेल के हाथों में दी जाए क्योंकि वे जिन्ना से बेहतर मोलभाव कर सकते थे, लेकिन गांधी ने नेहरू को चुना.
राजेन्द्र प्रसाद जैसे कुछ कांग्रेस नेताओं ने ज़रूर खुलकर कहा कि 'गांधीजी ने ग्लैमरस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया' लेकिन ज्यादातर कांग्रेसी ख़ामोश रहे. बापू ने देश की बागडोर सौंपने के लिए नेहरू को ही क्यों चुना?
आज़ादी के 77 के बाद भी यह सवाल भारत की राजनीति में हमेशा चर्चा में रहा है.
इसका कारण को तलाशने के लिए हमें ब्रिटिश राज के अंतिम वर्षों की राजनीति और गांधी के साथ नेहरू और पटेल के रिश्तों की बारीकियों समझना होगा.

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विरोधी से गांधी भक्त बने थे पटेल
वल्लभ भाई पटेल से गांधी की मुलाकात नेहरू से पहले हुई थी. उनके पिता झेवर भाई ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था. तब वे तीन साल तक घर से गायब रहे थे.
1857 के विद्रोह के 12 साल बाद गांधी जी का जन्म हुआ और 18 साल बाद 31 अक्टूबर 1875 में पटेल का यानी पटेल गांधी से केवल छह साल छोटे थे जबकि नेहरू पटेल से 14-15 साल छोटे थे.
उम्र में छह साल का फर्क कोई ज्यादा नहीं होता इसलिए गांधी और पटेल के बीच दोस्ताना बर्ताव था. पटेल लंदन के उसी लॉ कॉलेज मिडिल टेंपल से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे, जहाँ से गांधी, जिन्ना, उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल और नेहरू ने बैरिस्टर की डिग्रियां ली थीं.
उन दिनों वल्लभभाई पटेल गुजरात के सबसे महँगे वकीलों में से एक हुआ करते थे. पटेल ने पहली बार गाँधी को गुजरात क्लब में 1916 में देखा था.
गांधी साउथ अफ़्रीका में झंडे गाड़ने के बाद पहली दफ़ा गुजरात आए थे. देश में जगह-जगह उनका अभिनंदन हो रहा था. उन्हें कुछ लोग 'महात्मा' भी कहने लगे थे लेकिन पटेल गांधी के इस 'महात्मापन' ने जरा भी प्रभावित नहीं थे. वो उनके विचारों से बहुत उत्साहित नहीं थे.
पटेल कहते थे, ''हमारे देश में पहले से महात्माओं की कमी नहीं है. हमें कोई काम करने वाला चाहिए. गांधी क्यों इन बेचारे लोगों से ब्रह्मचर्य की बातें करते हैं? ये ऐसा ही है जैसे भैंस के आगे भागवत गाना.'' (विजयी पटेल, बैजनाथ, पेज 05)
साल 1916 की गर्मियों में गांधी गुजरात क्लब में आए. उस समय पटेल अपने साथी वकील गणेश वासुदेव मावलंकर के साथ ब्रिज खेल रहे थे.
मावलंकर गांधी से बहुत प्रभावित थे. वो गांधी से मिलने को लपके. पटले ने हंसते हुए कहा, ''मैं अभी से बता देता हूं कि वो तुमसे क्या पूछेगा? वो पूछेगा- गेहूं से छोटे कंकड़ निकालना जानते हो कि नहीं? फिर वो बताएगा कि इससे देश को आज़ादी किन तरीकों से मिल सकती है.''
लेकिन बहुत जल्द ही पटेल की गांधी का लेकर धारणा बदल गई.
चंपारण में गांधी के जादू का उन पर जबरदस्त असर हुआ. वो गांधी से जुड़ गए. खेड़ा का आंदोलन हुआ तो पटेल गांधी के और करीब आ गए.
असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो पटेल अपनी दौड़ती हुई वकालत छोड़ कर पक्के गांधी भक्त बन गए और इसके बाद हुआ बारदोली सत्याग्रह जिसमें पटेल पहली बार सारे देश में मशहूर हो गए.
ये 1928 में एक प्रमुख किसान आंदोलन था. प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में 30 फ़ीसदी की बढ़ोतरी कर दी. पटेल इस आंदोलन के नेता बने और ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा.
इसी आंदोलन के बाद पटेल को गुजरात की महिलाओं ने 'सरदार' की उपाधि दी. 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में पटेल पहली और आखिरी बार पार्टी के अध्यक्ष चुने गए. पहली बार वह 'गुजरात के सरदार' से 'देश के सरदार' बन गए.

BETTMANN
नेहरू का चुनाव
देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होना था लेकिन उससे एक साल पहले ब्रिटेन ने भारतीय हाथों में सत्ता दे दी थी. अंतरिम सरकार बननी थी.
तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा. उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे. वो पिछले छह साल से इस पद पर थे. अब उनके जाने का वक्त हो गया था.
तब तक गांधी, नेहरू के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे. 20 अप्रैल 1946 को उन्होंने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं.'
गांधी ने बिना लागलपेट पर ये भी साफ़ कर दिया कि 'अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं. उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता.' (कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315)
इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में ख़बर फैल गई कि गांधी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं. 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना था जिसे कुछ महीने बाद ही अंतरिम सरकार में भारत का प्रधानमंत्री बनना था.
इस बैठक में महात्मा गांधी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के साथ कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे.
कमरे में बैठा हर शख़्स जानता था कि गांधी नेहरू को अध्यक्ष देखना चाहते हैं.
परपंरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था. बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था.
किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था जबकि सारी कमेटियाँ अच्छी तरह जानती थी कि गांधी नेहरू को चौथी बार अध्यक्ष बनाना चाहते हैं.
पार्टी के महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गांधी की तरफ बढ़ा दी. गांधी ने कृपलानी की तरफ देखा. कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं. उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया. उस पर सबने दस्तख़त किए. पटेल ने भी दस्तख़त किए. अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे. एक नेहरू और दूसरे पटेल.

नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें. कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी.
मतलब साफ था-चूंकि गांधी चाहते हैं नेहरू अध्यक्ष बनें इसलिए आप अपना नाम वापस लेने के कागज पर साइन कर दें लेकिन आहत पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गांधी की तरफ बढ़ा दिया.
गांधी ने नेहरू की तरफ़ देखा और कहा, ''जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नहीं सुझाया है. तुम्हारा क्या कहना है?''
नेहरू ख़ामोश रहे. वहां बैठे सारे लोग ख़ामोश थे. गांधी को शायद उम्मीद थी कि नेहरू कहेंगे, तो ठीक है आप पटेल को ही मौका दें. लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं कहा. अब अंतिम फैसला गांधी को करना था.
गांधी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया. इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए. कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं.''
कृपलानी ने अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में इस पूरी घटना का विस्तार से ज़िक्र किया है.
उन्होंने लिखा है, ''मेरा इस तरह हस्तक्षेप करना पटेल को अच्छा नहीं लगा. पार्टी का महासचिव होने के नाते में गाँधी की मर्ज़ी का काम यंत्रवत कर रहा था और उस वक्त मुझे ये बहुत बड़ी चीज नहीं लगी. आख़िर ये एक अध्यक्ष का ही तो चुनाव था.''
''मुझे लगा अभी बहुत सी लड़ाइयाँ सामने हैं. लेकिन भविष्य कौन जानता है? मालूम होता है ऐसी तुच्छ घटनाओं से ही किसी व्यक्ति या राष्ट्र की किस्मत पर निर्भर होती है.
ये भी पढ़ें: विवेचना: किस तरह पटेल ने बनाया हैदराबाद को भारत का हिस्सा

SARDAR PATEL NATIONAL MEMORIAL, AHMEDABAD.
गांधी ने ऐसा क्यों किया?
ये महात्मा गांधी ही कर सकते थे. कांग्रेस का अध्यक्ष कौन बनेगा, ये फ़ैसला एक ऐसा आदमी कर रहा था जो 12 साल पहले ही कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे चुका था लेकिन कांग्रेसियों के लिए ये बड़ी बात नहीं थी क्योंकि साल 1929, 1936, 1939 के बाद ये चौथा मौका था जब पटेल ने गाँधीजी के कहने पर अध्यक्ष पद से अपना नामांकन वापस लिया था. सब हक्का-बक्का रह गए.
तब के जाने-माने पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब 'इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू' में लिखा है, ''राजेन्द्र प्रसाद ने मुझसे कहा कि 'गांधीजी ने ग्लैमरस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया. और मुझे डर है कि अब नेहरू अंग्रेज़ों के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे.''
''राजेन्द्र बाबू की ये प्रतिक्रिया जब मैंने गाँधी जी को बताई तो वे हँसे और उन्होंने राजेन्द्र की सराहना करते हुए कहा कि नेहरू आने वाली ढेर सारी समस्याओं का सामना करने के लिए ख़ुद को तैयार कर चुके हैं.''
तो सवाल है इतने विरोधों के बावजूद गांधी ने पटेल की जगह नेहरू को क्यों चुना?

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जैसे कि गांधी ने कहा था कि उनके पास इसकी कई वजहें हैं लेकिन वे वजहें न किसी ने उनसे पूछी न उन्होंने किसी को बताईं. कांग्रेस में तो किसी में हिम्मत नहीं थी कि वह बापू से पूछे कि सरदार पटेल जैसे योग्य नेता को छोड़कर आपने नेहरू को क्यों चुना?
सब जानते थे कि पटेल के पाँव ज़मीन पर मजबूती से स्थापित हैं. वो जिन्ना जैसे लोगों से उन्हीं की ज़ुबान में मोलभाव कर सकते हैं.
उनसे जब पत्रकार दुर्गादास ने ये सवाल पूछा तो 'गांधी ने माना कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष पटेल एक बेहतर 'नेगोशिएटर' और 'ऑर्गनाइज़र' हो सकते हैं. लेकिन उन्हें लगता है कि नेहरू को सरकार का नेतृत्व करना चाहिए.''
जब दुर्गादास ने गांधी से पूछा कि आप ये गुण पटेल में क्यों नहीं पाते हैं? तो इस पर गांधी ने हंसते हुए कहा, "जवाहर हमारे कैम्प में अकेला अंग्रेज़ है.''
गांधी को लगा कि दुर्गादास उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं तो उन्होंने कहा, ''जवाहर दूसरे नम्बर पर आने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे. वो अंतराष्ट्रीय विषयों को पटेल के मुकाबले अच्छे से समझते हैं. वो इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं. ये दोनों सरकारी बेलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल हैं. इसमें अंतरराष्ट्रीय कामों के लिए नेहरू और राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे. दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे."
गांधी के इस प्रेस इंटरव्यू से दो बातें निकल कर आईं. एक ये कि नेहरू नम्बर-2 नहीं होना चाहते थे जबकि गांधी को भरोसा था कि पटेल को नम्बर-2 होने में कोई एतराज़ नहीं होगा और वाकई ऐसा ही हुआ क्योंकि पटेल मुंह फुलाने की बजाए एक हफ्ते के अंदर फिर न केवल सामान्य हो गए बल्कि हंसी-मज़ाक करने लगे.
उनकी बातों पर हँसने वालों में खुद गांधी भी शामिल थे. दूसरी बात ये कि गांधी को लगता कि अपनी अंग्रेज़ियत के कारण सत्ता हस्तांतरण को नेहरू पटेल के मुकाबले ज्यादा बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं.
महात्मा गांधी ने एक और मौके पर भी यही बात कही थी कि 'जिस समय हुकूमत अंग्रेजों के हाथ से ली जा रही हो, उस समय कोई दूसरा आदमी नेहरू की जगह नहीं ले सकता. वे हैरो के विद्यार्थी, कैम्ब्रिज के स्नातक और लंदन के बेरिस्टर होने के नाते अंग्रेज़ों को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं.' (महात्मा, तेंदुलकर खंड 8 पेज 3)
यहाँ गांधी सही थे. बाहर की दुनिया में नेहरू का नाम आजादी की लड़ाई में गांधी के बाद दूसरे नम्बर पर था. न केवल यूरोपीय लोग बल्कि अमरीकी भी नेहरू को महात्मा गांधी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते थे जबकि पटेल के बारे ऐसा बिल्कुल नहीं था.
पटेल को शायद ही कोई विदेशी गाँधी का उत्तराधिकारी मानता हो. लंदन के कहवा घरों में बुद्धिजीवियों के बीच नेहरू की चर्चा होती थी. तमाम वायसराय और क्रिप्स समेत कई अंग्रेज अफसर नेहरू के दोस्त थे. उनसे नेहरू की निजी बातचीत होती थी.

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नेहरू से उलट थे पटेल
दोनों में और भी बड़े अंतर थे जो राजनीति में बहुत मायने रखते हैं. नेहरू एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे. उन्हें अंग्रेज़ी और हिन्दी में बोलने और लिखने की कमाल की महारत हासिल थी. नेहरू उदार थे और उनका खुलापन उन्हें लोकप्रिय बनाता था.
वो भावुक और सौदर्यप्रेमी थे जो किसी को भी रिझा सकते थे. इसके उलट पटेल सख़्त और थोड़े रुखे थे. वो व्यवहार कुशल थे लेकिन उतने ही मुंहफट भी. दिल के ठंडे लेकिन हिसाब-किताब में माहिर.
नेहरू जोड़तोड़ में बिलकुल माहिर नहीं थे. वे कांग्रेस में भी अलग-थलग रहने वाले नेता थे. जेल में बंद रहकर वे अपने साथी कांग्रेसियों से गपशप करने की जगह अपनी कोठरी में अकेले बैठ कर 'डिस्कवरी आफ इंडिया' जैसी किताबें लिखते थे. उनकी अभिजात्य वर्ग की अपनी एक अलग दुनिया थी.
वहीं, पटेल राजनीतिक तंत्र का हर पुर्जा पहचानते थे. जोड़-तोड़ करने में महिर थे. यही वजह थी कि प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी में उन्हें 15 में से 2 कमेटियों का समर्थन मिला.
नेहरू कमाल के वक्ता थे जबकि पटेल को भाषणबाजी से चिढ़ थी. वे दिल से और साफ साफ बोलते थे. ऐसा नहीं था कि मुसलमानों को लेकर उनके मन में आरएसएस जैसी कोई वितृष्णा या पूर्वाग्रह था लेकिन खरा-खरा बोलने के कारण वह देश के मुसलमानों में नापसंद किए जाने लगे.
नेहरू समाजवाद के मसीहा थे तो पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा करने वाले पटेल पूंजीवादियों के संरक्षक.
नेहरू आधुनिक हिन्दुस्तान और धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखते थे तो पटेल राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते थे. हिंदू और हिंदू परम्परा को लेकर उनके मन में कोमल भावनाएं थीं जो वक्त-बेवक्त उन्हें उत्तेजित कर देती थीं.
नेहरू में एक पैनी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि थी, बावजूद इसके वे स्वाभाविक रूप से भावुक और जरूरत से ज्यादा कल्पनाशील थे.

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जब नेहरू की चूक से बिगड़ गई बात
नेहरू के अध्यक्ष चुने जाने साल की ही दो घटनाएं हैं जो नेहरू और पटेल के व्यक्तित्व को बखू़बी उजागर करती हैं.
कांग्रेस और लीग, दोनों कैबिनेट मिशन की योजना तकरीबन कबूल कर चुकी थी. अगले महीने अंतरिम सरकार बननी थी, जिसमें दोनों के प्रतिनिधि शामिल होने वाले थे यानी देश का विभाजन टलता हुआ दिख रहा था.
ये बात अलग थी कि कांग्रेस और लीग दोनों अपने हिसाब से कैबिनेट मिशन की योजना का मतलब निकाल रहे थे. ऐसे माहौल में नेहरू ने सात जुलाई 1946 को कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने साफ़ कर दिया कि कांग्रेस के हिसाब से इस योजना में क्या है.
कांग्रेस मानती थी कि चूँकि प्रांतों को किसी समूह में रहने या न रहने की आज़ादी होगी. इसलिए ज़ाहिर है कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और असम, जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं, वो पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान वाले समूह से जुड़ना चाहेंगे.
जिन्ना कांग्रेस की इस व्याख्या से कतई सहमत नहीं थे. उनके अनुसार कैबिनेट मिशन योजना के तहत पश्चिम के चार और पूर्व के दो राज्यों का दो मुस्लिम-बहुल समूह का हिस्सा बनना बाध्यकारी था. बस यहीं सोच का अंतर था.
अभी समझदारी ये थी कि जैसा जो सोच रहा है, सोचे. पहले कांग्रेस और लीग मिलकर अंतरिम सरकार बनाएं. फिर जो जैसा होगा तब वैसा देखा जाएगा. लेकिन इसके तीन दिन बाद 10 जुलाई 1946 को नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके कहा कि कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला तो कर लिया है लेकिन अगर उसे ज़रूरी लगा तो वह कैबिनेट मिशन योजना में फेरबदल भी कर सकती है.
नेहरूने एक बयान देकर कैबिनेट मिशन की सारी योजना को एक मिनट में ध्वस्त कर दिया. इससे अटूट भारत की आख़िरी उम्मीद पर पानी फिर गया.
नाराज़ जिन्ना को मौका मिल गया. उन्होंने भी एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई और साफ़ कह दिया कि कांग्रेस के इरादे नेक नहीं. अब अगर ब्रिटिश राज के रहते मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो बहुत बुरा होगा.
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त से डायरेक्ट एक्शन का एलान कर दिया. जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का नतीजा भारी हिंसा होगी, ये कोई नहीं जानता था. लेकिन सरदार पटेल समझ रहे थे कि नेहरू से बड़ी भारी गलती हो गई. उनकी बात सही थी लेकिन इसका खुला एलान करने की ज़रूरत नहीं थी.
सरदार ने अपने करीबी मित्र और अपने निजी सचिव डीपी मिश्रा को एक ख़त लिखा,"हालांकि नेहरू अब तक चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जा चुके हैं. लेकिन उनकी हरकतें मासूमियत से भरी लेकिन बचकानी होती हैं. उनकी ये प्रेस कान्फ्रेंस भावुकता से भरी और मूर्खतापूर्ण थी.''
''लेकिन उनकी इन उनकी तमाम मासूम गलतियों के बावजूद उनके अंदर आज़ादी के लिए गजब का जज़्बा और उत्साह है, जो उन्हें बेसब्र बना देता है जिसके चलते वे अपने आप को भूल जाते हैं. जरा-सा भी विरोध होने पर वे पागल हो जाते हैं क्योंकि वे उतावले हैं."
नेहरू की पहाड़ जैसी भूल का नतीजा बहुत जल्द देश के सामने आ गया. जिन्ना के 'डायरेक्ट एक्शन' से देश में हिंदू- मुस्लिम दंगे भड़क गए. अकेले कलकत्ता शहर में हजारों लोग मारे गए, लाखों लोग बेघर हो गए. नोआखली में भी भारी कत्लेआम हुआ. धीरे-धीरे देश को इन दंगों ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया.
इसके बाद गांधी कलकत्ते से लेकर नोआखली और बिहार तक, दंगे में मारे गए हिन्दुओं और मुसलमानों के ख़ून को साफ करने की 24 घंटे की ड्यूटी पर लगे रहे. ये ड्यूटी आज़ादी मिलने के दिन तक जारी रही.

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तलवार के बदले तलवार उठाने की सलाह
जगह-जगह दंगे हो रहे थे. हिन्दू-मुसलमान मारे जा रहे थे. ऐसे में 'पटेल के हिन्दुत्व' ने उछाल मारा और 23 नवंबर 1946 को मेरठ में कांग्रेस के अधिवेशन में अपना आपा खो बैठे.
अधिवेशन में उन्होंने अपने भाषण में कह दिया, "धोखे से पाकिस्तान लेने की बात मत करो. हाँ अगर तलवार से लेना है तो उसका मुकाबला तलवार से किया जा सकता है.''( 54वां मेरठ कांग्रेस अधिवेशन, केपी जैन)
पटेल का बयान सनसनीखेज था. गांधी की अहिंसा नीति के एकदम उलट. गांधी तक शिकायत तुरंत पहुंच गई.
गांधी ने पटेल को लिखा, ''तुम्हारे बारे में बहुत सी शिकायतें सुनने में आई हैं. बहुत में अतिशयोक्ति हो तो वो, अनजाने में है. लेकिन तुम्हारे भाषण लोगों को खु़श करने वाले और उकसाने वाले होते हैं. तुमने हिंसा-अहिंसा का भेद नहीं रखा है. तुम लोगों को तलवार का जवाब तलवार से देना सिखा रहे हो. जब मौका मिलता है, मुस्लिम लीग का अपमान करने से नहीं चूकते.''
''यदि यह सब सच है तो बहुत हानिकारक है. पद से चिपटे रहने की बात करते हो, और यदि करते हो तो वह भी चुभने वाली चीज है. मैंने तुम्हारे बारे में जो सुना, वह विचार करने के लिए तुम्हारे सामने रखा है. यह समय बहुत नाज़ुक है. हम जरा भी पटरी से उतरे कि नाश हुआ समझो. कार्य-समिति में जो समस्वरता होनी, चाहिए वह नहीं है. गंदगी निकालना तुम्हें आता है; उसे निकालो."
इसी पत्र में आगे गांधी ने पटेल को ये भी बता दिया कि वो बूढ़े हो गए हैं.
गांधी ने लिखा, ''मुझे और मेरा काम समझने के लिए किसी विश्वसनीय समझदार आदमी को भेजना चाहो तो भेज देना. तुम्हें दौड़कर आने की बिल्कुल जरूरत नहीं. तुम्हारा शरीर भाग-दौड़ के लायक नहीं रहा. शरीर के प्रति लापरवाह रहते हो, यह बिल्कुल ठीक नहीं है." (बापुना पत्रों 2 : सरदार वल्लभभाई ने, पृ. 341-43)
ये दो घटनाएं नेहरू और पटेल के व्यक्तित्व के बारे में बताने के लिए काफ़ी हैं. सच तो ये है कि गांधी 1942 में उस वक्त नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे जो दोनों के बीच मतभेद चरम पर थे.
तब गांधी ने कहा था, ''हमें अलग करने के लिए व्यक्तिगत भतभेद से कहीं अधिक ताकतवर शक्तियों की जरूरत होगी. कई वर्षों से मैं ये कहता आया हूं और आज भी कहता हूं कि जवाहरलाल मेरे उत्तराधिकारी होंगे. वे कहते हैं वो मेरी भाषा नहीं समझते और मैं उनकी. फिर भी मैं जानता हूं जब मैं नहीं रहूंगा तब वे मेरी ही भाषा बोलेंगे.'' (इंडियन एनुअल रजिस्टर भाग-1, 1942 पेज 282-283)
लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि गांधी पटेल से कम प्रेम करते थे.
आज न गांधी हैं, न नेहरू और न पटेल. वक्त का पहिया पूरी तरह से घूम गया है. आज नेहरू कटघरे में हैं और गुजरात में लगी लौह पुरुष पटेल की करीब 600 फीट ऊंची दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति इतिहास को पलट कर देख रही है.
कांग्रेस के महान नेता पटेल के 'हिन्दुत्व' पर उस आरएसएस ने कब्जा कर लिया है जिसे पटेल ने कभी प्रतिबंधित किया था.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'महात्मा गांधी : ब्रह्मचर्य के प्रयोग' के लेखक हैं.) (bbc.com)
राज्य स्थापना दिवस के मौके पर
-विनय शील
छत्तीसगढ़ के शहीद वीर नारायण सिंह से जुड़ी यह घटना कौन भूल सकता है कि किस तरह से सोनाखान रियासत के राजकुमार वीर नारायण सिंह ने 1856 में पड़े भीषण अकाल के दौरान हजारों किसानों को साथ लेकर कसडोल के जमाखोरों के गोदामों पर धावा बोलकर अनाज लूटा और फिर उसे भूखे मर रही जनता में बांट दिया था। मगर उनकी यह दरियादिली अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर इलियट को रास नहीं आई और उन्होंने वीर नारायण सिंह को गिरफ्तार करवा लिया और अंतत: 10 दिसंबर, 1857 को रायपुर में एक चौराहे पर फांसी दे दी।
इस घटना के 164 सालों के बाद आज भी किसान, खेती और खाद्यान्न छत्तीसगढ़ के केंद्र में है। इतना कि, पहली नवंबर को एक पृथक राज्य के रूप में दो दशक पूरे कर रहे इस राज्य की सियासत तक इनसे तय होती रही है। दो साल पहले पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान पर्यावरण संबंधी मुद्दों को समर्पित प्रतिष्ठित वेबसाइट मोंगाबे-इंडिया के मयंक अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ के हालात पर लंबी रिपोर्ट लिखी थी। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के राजनांदगांव क्षेत्र को भी कवर किया था। उनकी इस रिपोर्ट में किसान नेता सुदेश टेकाम को यह कहते हुए दर्ज किया गया था, ‘सरकार का ध्यान सिर्फ माइनिंग और बिजली में है। किसानों के मुद्दों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। पिछले चुनावों में रमन सिंह ने धान की फसल के लिए 2100 रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य और तीन सौ रुपये बोनस का वादा किया था। लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कभी भी अपना वादा पूरा नहीं किया। किसानों के भारी आंदोलन के बाद सरकार ने 2017 में धान के लिए सिर्फ 1750 रुपये एमएसपी और तीन सौ रुपये बोनस दिए थे। हम इस बार मूर्ख नहीं बनेंगे।’
इसी रिपोर्ट में टेकाम ने यह भी कहा कि उनके लिए किसानों तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के लिए कर्जमाफी भी बड़ा मुद्दा है, क्योंकि सरकार ने छोटे और मझोले किसानों की उपेक्षा की है। इस चुनाव में डॉ. रमन सिंह खुद तो राजनांदगांव से विजयी हुए, मगर वह अपनी पंद्रह साल पुरानी सरकार नहीं बचा सके थे। हैरत नहीं कि लंबे शासन के दौरान उनकी पहचान 'चाउर वाले बाबा' के रूप में स्थापित हो गई थी,क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पी डी एस ) के जरिए गरीबों को एक रुपए और दो रुपए किलो चावल देने की योजना चलाई थी।
हालांकि पीडीएस के जरिये दो रुपये किलो चावल देने की योजना कोई नया विचार नहीं था। 1980 के दशक में एनटीआर रामाराव ने अविभाजित आंध्र प्रदेश में इसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। यूपीए शासन के दौरान 2013 में अस्तित्व में आए खाद्य सुरक्षा कानून का आधार ही राशन की दुकानों के जरिये गरीबों को सस्ता अनाज देने की व्यवस्था है। कोरोना काल में पीडीएस की इस व्यवस्था ने पूरे देश में अपनी सार्थकता साबित की है।
हैरत नहीं होनी चाहिए कि दो साल पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 90 में से मिली 67 सीटों के पीछे किसानों प्रति क्विंटल धान के बदले ढाई हजार रुपये देने का वादा भी एक बड़ी वजह थी। भूपेश बघेल ने नेतृत्व वाली कांग्रेस की इस सरकार ने उस धारणा को ही बदल दिया कि भारत में चुनावी वादे सिर्फ चुनाव जीतने के लिए होते हैं। शपथ ग्रहण के शायद दो घंटे के भीतर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जिन दो फैसलों पर हस्ताक्षर किए उनमें से एक था बस्तर में लोहंडीगुड़ा के आदिवासी किसानों की जमीन वापसी का और दूसरा फैसला किसानों की कर्जमाफी का। लोहंडीगुड़ा में पूर्वर्ती रमन सरकार ने ग्रामीणों के भारी विरोध के बावजूद उनकी ज़मीनें टाटा के लिए अधिग्रहीत कर ली थीं लेकिन टाटा ने प्लांट लगाया नहीं तो आदिवासियों को उनकी ज़मीनें लौटाने के बजाए उसे सरकारी लैंड बैंक में शामिल कर लिया। ये पंद्रह साल के एक मुख्यमंत्री का नितांत अलोकप्रिय और आदिवासी विरोधी फैसला था। दूसरी ओर जब भूपेश बघेल ने इन ज़मीनों को लौटाने की फाइल पीआर दस्तखत किए तो पूरे देश को नजरें अचानक लोहंडीगुड़ा की ओर उठ गईं थीं। ऐसा सम्भवत: पहली बार किसी सरकार ने किया था। ये उस विकास की दिशा का इशारा था जिसका वादा कांग्रेस पार्टी ने किया था। केन्द्र की मोदी सरकार की तमाम अड़चनों के बावजूद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसानों को धान का समर्थन मूल्य और बोनस मिला कर 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल दिया लेकिन अगली बार इस पर केन्द्र की मोदी सरकार ने अड़ंगा डाल दिया। जाहिर है कि यह भूपेश बघेल की लोकप्रियता बढ़ाने वाला कदम था और बीजेपी के लिए यह असुविधाजनक था। लेकिन बोनस को लेकर केंद्र के अड़ंगे के बाद भूपेश सरकार ने समर्थन मूल्य तो दिया पर बाकी राशि के लिए अपने संसाधनों से एक किसानों के लिए राजीव गांधी न्याय योजना लागू कर दी। हालांकि यह सच है कि खेती से जुड़े वृहत संकट का यह स्थायी समाधान नहीं है,लेकिन दुनिया के है बड़े अर्थशास्त्री की नजरों में इस संकट के बीच समाधान का रास्ता इन्हीं गलियों से हो कर गुजरता है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सस्ते अनाज और सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कृषि का क्या महत्व है, यह कुछ सहज उपलब्ध तथ्यों से समझा जा सकता है। पिछली जनगणना के मुताबिक राज्य की 75 फीसदी आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है और धान यहां की मुख्य फसल है। छत्तीसगढ़ की 40 फीसदी से भी अधिक आबादी गरीबी की रेखा से नीचे गुजर बसर करने को मजबूर है। 32 फीसदी आबादी आदिवासियों की है और उनमें गरीबी का आंकड़ा तो और भी बुरा है। यह स्थिति तब है, जब छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध है और इसका करीब 45 फीसदी भू-भाग जंगलों से घिरा हुआ है।
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री दिवंगत अजीत जोगी अपने राज्य के बारे में अक्सर कहते थे, ‘अमीर धरती के गरीब लोग।’ यह विडंबना ही है कि सात राज्यों के करीब पच्चीस जिलों से घिरा यह राज्य आगे बढऩे की असीम संभावनाओं और संसाधनों के बावजूद आज भी पिछड़ा हुआ है।लेकिन अजीत जोगी को महाजकाम के लिए तीन साल मिले थे और भाजपा की रमन सरकार ने पंद्रह बरस राज किया पर छत्तीसगढ़ के आम लोगों की बुनियादी जरूरत संबोधित ना हो सकी। लेकिन अब यह उम्मीद तो बंधी है कि एक मुख्यमंत्री ऐसा है जिसे छत्तीसगढ़ की बुनियादी जरूरतों की पहचान है। अभी तो शायद इन दशकों में छत्तीसगढ़ की नौकरशाही भी इन जरूरतों की ठीक से पहचान ना कर सकी थी।
दो दशक का समय किसी राज्य के जीवन में लंबा वक्त नहीं होता, मगर यह तो देखा ही जाना चाहिए कि आखिर छत्तीसगढ़ विकसित प्रदेशों की श्रेणी में क्यों नहीं आ सका। इसके उलट जनवरी, 2019 को आई नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के भुखमरी और कुपोषण जैसे सूचकांकों में निचले क्रम में है। उस दिन यह जानना सुखद था जब भूपेश बघेल ने यह ऐलान किया कि बस्तर जैसे इलाकों में जिला खनिज न्यास की राशि अनुत्पादक निर्माणों के बजाए सुपोषण और स्वास्थ्य जैसी जरूरतों पर खर्च होगी। बस्तर में कुपोषण में कमी के आंकड़े भूपेश सरकार के इस फैसले की सफलता की कहानी है। ये ऐसे फैसले हैं जिन्हें गवर्नेंस के प्रयोगों के रूप में समझना चाहिए ।
छत्तीसगढ़ के लिए एक बड़ा मुद्दा माओवाद भी है। इस बीच माओवादी हिंसा में कमी जरूर आई है, लेकिन अब भी छत्तीसगढ़ इससे सर्वाधिक पीडि़त है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2018 के दौरान पूरे देश में माओवादी हिंसा में 3,769 लोग मारे गए थे, जिनमें से सर्वाधिक 1,370 मौतें छत्तीसगढ़ में दर्ज की गई थीं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यूपीए सरकार के अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल पूरा होने के मौके पर 24 मई, 2010 को प्रेस कांन्फ्रेंस में नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। उनकी इस प्रेस कान्फ्रेंस से करीब डेढ़ महीने पहले ही छह अप्रैल, 2010 को दंतेवाड़ा के सबसे बड़े नक्सल हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। बस्तर के दरभा में मई, 2013 में नक्सलियों के भीषण हमले में कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के अनेक नेता मारे गए थे।
आखिर ऐसा क्यों हुआ कि नया राज्य बनने के बाद माओवादी या नक्सली हिंसा में कमी के बजाए बढ़ोतरी होती गई? इसका जवाब तलाशने के लिए दिल्ली के नजरिये की नहीं, बस्तर के नजरिये की जरूरत है। बस्तर के सातों जिले आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं, तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ आर्थिक दूरदृष्टि का न होना भी वजह है। समावेशी विकास की जिस अवधारणा की बात इन दिनों काफी सुनी जाती है, उसका विलोम बस्तर में देखा जा सकता है। वहां खनिज और वन संपदा के असली मालिक आदिवासी ही हाशिये पर ही रहे हैं। माओवाद से निपटने के लिए उन मुद्दों को संबोधित करना ज़रूरी है जो माओवाद के लिए खाद पानी का काम करते रहे हैं। आदिवासियों की ज़मीन वापसी से लेकर वनोपज संग्रहण की राशि में बड़ी वृद्धि या जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) का बुनियादी मानवीय जरूरतों में खर्च होना एक सकारात्मक संकेत है।
बस्तर में बड़े उद्योग हैं, सार्वजनिक क्षेत्र में एनएमडीसी की देश के विकास में बड़ी भूमिका है लेकिन अब इसके निजीकरण का खतरा है। प्रदेश सरकार इसका विरोध कर रही है। औद्योगिक विकास एक अलग तरह के संघर्ष से गुजर रहा है।एक तरफ केवल मुनाफा और दोहन है, दूसरी तरफ है तरह के विकास की कोशिशों के सामने खड़े अवरोध हैं और तीसरी तरफ जनाकक्षाएं हैं।छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाकों की चुनौती इनके बीच अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक सरकार को पहुंचाना है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हाल ही में बस्तर में नए इस्पात संयंत्र स्थापित करने पर सहमति जताई है। यह मौका है, जब वह ऐसे संयंत्रों में आदिवासियों को मुनाफे का हिस्सेदार बनाकर विकास का एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकते हैं। यह हिस्सेदारी वन और कृषि संपदा को लेकर भी हो सकती है। एक उदाहरण से इसे समझते हैं। बस्तर की इमली न केवल मशहूर है, बल्कि इसका करीब सालाना पांच सौ करोड़ रुपये का कारोबार है। मगर ऐसी लघुवनोपज को जैसे बाजार की जरूरत है, वह नहीं मिला। आखिर बस्तर की इमली की ब्रांडिंग क्यों नहीं की जा सकती? यही बात छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाली चावल की विविध किस्मों को लेकर कही जा सकती हैं कि उनकी पेशेवर तरीके से ब्रांडिंग और मार्केटिंग क्यों नहीं की जा सकती। हालांकि हाल के दिनों में भूपेश सरकार ने इस दिशा में भी काम शुरू किया है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके सकारात्मक परिणाम भी नजर आएंगे। वन अधिकार पत्र और सामुदायिक वन अधिकार पत्र जैसे कदम और इसके बाद जैव विविधता के संरक्षण की जो योजना बताई जा रही है वो अगर दावे के अनुरूप ही लागू हुई तो निश्चित ही तस्वीर बदलेगी।
दरअसल स्थानीय संसाधनों और संपदा के बेहतर इस्तेमाल और स्थानीय लोगों की साझेदारी से ही छत्तीसगढ़ के विकास की कहानी बदली जा सकती है।
(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
दामाद के साथ मिलकर दूसरी पत्नी ने की थी हत्या, बंदी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31 अक्टूबर। राजधानी रायपुर के बूढ़ातालाब पास बंद बोरी में दो दिन पहले मिले युवक के शव की पहचान कर ली गई है। मृतक बोरियाखुर्द टिकरापारा का रहने वाला था, और उसकी हत्या कर शव मोटर सायकल से लाकर यहां फेंक दिया गया था। कारण-पारिवारिक विवाद बताया जा रहा है। पुलिस ने इस मामले में मृतक की दूसरी पत्नी, दामाद व पुत्र को हिरासत में ले लिया है, जांच जारी है।
पुलिस ने आज इस मामले का खुलासा किया। बताया गया कि मृतक आसिफ कादर उर्फ फिरोज की हत्या बोरियाखुर्द टिकरापारा में की गई थी। वह अपनी पत्नी से छोटी-छोटी बात को लेकर विवाद करता था। इससे तंग आकर उसकी पत्नी ने अपने दामाद के साथ मिलकर लोहे की छेनी से उसकी हत्या कर दी। शव का हाथ-पैर बांध कर फिर उसे तालाब के पास फेंक दिया। गुरूनानक चौक निवासी कुर्सी कारोबारी सैय्यद मो. शफीक को शाम किसी ने फोन पर बूढ़ा तालाब कैलाशपुरी ढाल के पास एक शव होने की जानकारी दी। उसने अपने कुछ करीबियों के साथ मौके पर पहुंचकर उसे देखा, तो यह शव आसिफ कादर का निकला।
दूसरी तरफ, शव मिलने की शिकायत पर पुरानी बस्ती पुलिस ने इसकी जांच की, तो दो दिन में ही आरोपी पकड़े गए। पकड़े गए लोगों में मृतक की पत्नी रूबीना परवीन उर्फ रानी (32), दामाद ईरफान खान (24) व पुत्र एक अपचारी बालक तीनों आरडीए कालोनी बोरियाखुर्द शामिल हैं। घटना के बाद पुलिस ने इसकी पूरी जांच की, तो हत्या का खुलासा हुआ। पारिवारिक विवाद के चलते युवक की हत्या की गई थी। उसके गले, दाहिने आंख, सिर तथा बांये पैर के घुटने के पास चोट के निशान पाए गए थे।
पुलिस का कहना है कि शव को सबसे पहले सफाई कर्मियों ने देखा था। इसके बाद आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। इन सभी लोगों से पूछताछ और सीसीटीवी फुटेज की जांच के बाद हत्या का खुलासा हुआ है। मृतक अपनी दूसरी पत्नी के घर आरडीए कॉलोनी में अंतिम बार देखा गया था। शुरूआत में उसकी पत्नी, दामाद ने हत्या के आरोप से इंकार कर दिया था। कड़ाई से पूछताछ में इन लोगों ने हत्या करना स्वीकार कर लिया। घटना के समय अपचारी बालक भी था। पुलिस हत्या का मामला दर्ज कर पूछताछ-जांच में लगी है।
बिहार, 31 अक्टूबर। 31 अक्टूबर, 2020 को चिराग पासवान जो महसूस कर रहे हैं, उसे ठीक-ठीक नापा नहीं जा सकता।
ये पहला मौका है जब उनके जन्मदिन पर उनके पिता मौजूद नहीं हैं, लिहाजा चिराग को उनकी बेइंतहा कमी खल रही है, वहीं दूसरी ओर बिहार चुनाव के पहले चरण के मिले फ़ीडबैक ने उन्हें उत्साहित कर रखा है। वे इस बात से खुश हैं कि पिता जहां भी होंगे, उन्हें देखकर खुश हो रहे होंगे।
बिहार चुनाव के पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुआ है, उन जगहों से मिल रहे फीडबैक के मुताबिक चिराग की पार्टी भले ही बहुत बड़ा करिश्मा नहीं करने जा रही हो लेकिन उनके उम्मीदवारों ने जनता दल यूनाइटेड खेमे की नींद उड़ा दी है।
इन उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर ही चिराग पासवान दावा कर रहे हैं कि नीतीश कुमार किसी भी हाल में 10 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे, हालांकि वे यह दावा भी करते हैं कि बीजेपी-एलजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगी।
पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुए हैं, उनमें से 42 सीटों पर चिराग पासवान ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से 18-20 सीटों पर उनके उम्मीदवार जितने वोट जुटाने का दावा कर रहे हैं, उससे जनता दल यूनाइडेट के उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। चिराग को उम्मीद है कि आने वाले दो चरणों में भी उनके उम्मीदवार यही करने जा रहे हैं।
एनडीए के समर्थकों और खासकर जनता दल यूनाइटेड के समर्थकों का कहना है कि चिराग पासवान के चलते कुछ जगहों पर समीकरण प्रभावित हो रहा है।
जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता प्रगति मेहता कहते हैं कि चिराग पासवान के दावों की हकीकत 10 नवंबर को सामने आ जाएगी, क्योंकि बिहार में नीतीश कुमार से बड़ा चेहरा कोई नहीं है और लोगों का भरोसा उन पर बना हुआ है।
चिराग पासवान की रणनीति
वहीं, दूसरी ओर चिराग पासवान की सारी रणनीति नीतीश कुमार की सीटों को कम से कम करने पर फोकस दिखती है। उनकी बातों से ज़ाहिर होता है कि वे इस चुनाव को रणनीतिक स्तर पर कम और भावनात्मक स्तर पर ज़्यादा लड़ रहे हैं और उनकी इस लड़ाई के चलते ही तीन महीने पहले तक सुनिश्चित दिख रही बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की जीत अब आसान नहीं लग रही है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि वो वजहें क्या रहीं जिसके चलते चिराग पासवान उस स्तर तक पहुँच गए जहां से वे नीतीश कुमार के लिए खतरे की घंटी बन गए हैं। इसकी भूमिका कोई एक-दो महीने में नहीं बनी है।
चिराग के पिता रामविलास पासवान की राजनीति का शत-प्रतिशत हिस्सा केंद्र में गुजरा था और वे बिहार पर उस तरह से फोकस नहीं कर पाए थे जिसकी महत्वाकांक्षा हर नेता को होती है।

पार्टी की कमान थमाने के साथ-साथ उन्होंने यह दायित्व भी चिराग को सौंपा था। बिहार की राजनीति को गंभीरता से लेते हुए नवंबर, 2019 में लोक जनशक्ति पार्टी ने एक सर्वे कराया।
सर्वे का सैंपल साइज महज 10 हजार था लेकिन उससे चिराग और उनकी टीम को एक आइडिया लगा कि बिहार की जनता क्या चाहती है. उस सर्वे में शामिल करीब 70 प्रतिशत लोगों ने नीतीश कुमार को लेकर नाराजगी जाहिर की थी।
इस सर्वे के आकलन के बाद चिराग ने यह भांप लिया कि बिहार की राजनीति में स्पेस है जिसको भरने की कोशिश होनी चाहिए और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष स्तर के लोगों तक यह फीडबैक पहुंचाया कि बिहार में नीतीश कुमार को लेकर भारी नाराजगी है।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में रहते हुए चिराग पासवान की टीम ने यह रणनीति बनाई कि नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रोश को काउंटर करने के लिए उनके खिलाफ सवाल पूछे जाने चाहिए।
फरवरी आते-आते उन्होंने बिहार फस्र्ट, बिहारी फस्र्ट का कॉन्सेप्ट तैयार कर लिया। जिसमें बिहार के आम लोगों की जरूरतों को देखते हुए कई पहलूओं को शामिल किया गया।
प्रशांत किशोर से मुलाकात
चिराग इस डॉक्यूमेंट को लेकर कितने गंभीर थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसकी प्रति को समाज के विभिन्न तबके के हजारों लोगों को पढ़वाया और उनकी राय को जोड़ते हुए इसे सार्वजनिक किया गया।
चिराग ने इसके बाद नीतीश कुमार के सात निश्चय और दूसरे मुद्दों पर सवाल पूछना शुरू किया. उन्हें लगा कि नीतीश कुमार की तरफ से उनके सवालों के जवाब आएँगे लेकिन यह नहीं हुआ।
इन सब मुद्दों पर बात करने के लिए चिराग पासवान ने नीतीश कुमार से फरवरी, 2020 में वक्त माँगा। तीन दिन तक वे पटना में इंतजार करते रहे लेकिन नीतीश कुमार के दफ्तर से उन्हें मिलने का वक्त नहीं मिला।
अभी बिहार चुनाव के दौरान चिराग की रणनीति के पीछे प्रशांत किशोर का दिमाग होने की बता कहने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. लेकिन, यह जानना दिलचस्प है कि फरवरी, 2020 में नीतीश कुमार से समय नहीं मिलने के बाद चिराग पासवान की टीम आगे की रणनीति के लिए प्रशांत किशोर से भी मिली थी।
चिराग पासवान की टीम के एक सदस्य के मुताबिक़, उस बैठक में प्रशांत किशोर ने हमारे आइडिया में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. अगर वे साथ आ जाते तो हमारी स्थिति और भी बेहतर होती क्योंकि उनके पास एक पूरी टीम है जो इस काम को आसानी से मैनेज कर सकती थी।
यहाँ यह भी देखना होगा कि प्रशांत किशोर ने बिहार की बात का एलान मार्च, 2020 में किया था, जिससे एक महीना पहले चिराग बिहार फस्र्ट, बिहारी फस्र्ट का विजन जारी कर चुके थे।
नीतीश और पासवान में तल्खी
इस बीच में लॉकडाउन के चलते बिहार में नीतीश कुमार के तौर-तरीकों की खासी आलोचना हुई और उनके प्रति नाराजगी बढ़ी।
एक और बात ये हुई कि तत्कालीन खाद्य आपूर्ति मंत्री के तौर पर रामविलास पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के बीच तल्खियाँ बढ़ गईं। लॉकडाउन के दौरान आम लोगों को मुफ़्त में अनाज वितरित करने के मुद्दे पर दोनों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी।
लेकिन अगस्त, 2020 तक चिराग अलग रास्ता ले लेंगे यह तय नहीं हो पाया था। इसी दौरान किसी इंटरव्यू में उनसे पूछ लिया गया कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, तो उन्होंने कहा कि बीजेपी जिसे बनाएगी, वे उनके साथ हैं।
इन बयानों से भी यह झलकने लगा था कि चिराग़ पासवान अपनी राह अलग लेने वाले हैं, वैसे भी उनकी पार्टी ने बिहार में कभी जनता दल यूनाइडेट के साथ चुनाव नहीं लड़ा था।
इसके अलावा चिराग की अपनी पार्टी का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा ने भी जन्म ले लिया और उन्हें लगा कि उनके पास खोने को कुछ भी नहीं है. आखऱि बिहार की 2015 की विधानसभा चुनाव में उनके महज़ दो विधायक ही चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे।
इस दौरान बिहार में एनडीए की रूपरेखा की एक मीटिंग में बिहार बीजेपी के एक प्रभावी नेता ने ये कहा कि चिराग पासवान की पार्टी के गठबंधन में शामिल होने से 20 सीटें ज़्यादा आएंगी लेकिन उनके बिना भी 160 से ज़्यादा सीटें आ जाएंगी. चिराग को यहां भी लगा कि गठबंधन के साथ रहने पर उनकी उतनी अहमियत नहीं रहेगी जितनी अकेले जाने से हो सकती है।
अकेले चुनाव लडऩे का फैसला

सीटों के बँटवारे की चर्चाओं के बीच तीन अक्टूबर को चिराग पासवान ने बिहार में अकेले चुनाव लडऩे का एलान कर दिया।
बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ़ से कभी उन्हें यह नहीं कहा गया कि वे चुनाव में अकेले ना लड़ें. वे लगातार बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बने रहने की बात करते रहे।
बिहार के पहले चरण के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तारीख़ 12 अक्टूबर थी, आठ अक्टूबर को राम विलास पासवान का निधन हो गया, नौ को उनका अंतिम संस्कार करने के बाद चिराग ने आखऱिी 48 घटों में उम्मीदवारों के नाम फाइनल किए. वो दुख के इन पलों में रणनीतिक तौर पर नहीं डगमगाए।
इसमें दिनारा से राजेंद्र सिंह (बीजेपी के वरिष्ठ नेता और संगठन मंत्री रहे), पालीगंज से बीजेपी की पूर्व विधायक रहीं उषा विद्यार्थी और सासाराम से रामेश्वर चौरसिया जैसे बीजेपी के बड़े नेताओं को टिकट दिया गया, जिससे यह संदेश भी लोगों तक गया है कि एलजेपी बीजेपी के साथ मिलकर जनता दल यूनाइटेड को साइडलाइन करने जा रही है.
ऐसी ही एक सीट शेखपुरा की बरबीघा भी है, जहां से महागठबंधन के उम्मीदवार कांग्रेस नेता गजानंद शाही हैं और उनकी स्थिति इस वजह से मजबूत हो गई है क्योंकि चिराग पासवान ने पिछली विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार डॉ. मधुकर को टिकट दे दिया। जिसके चलते जेडीयू उम्मीदवार सुदर्शन कुमार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
गजानंद शाही के मुताबिक इस बार महागठबंधन का वोट बैंक काफी एकजुट हो कर वोट कर रहा है, यही वजह है कि नीतीश कुमार की विदाई तय है।
इस पहलू पर राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं, बिहार का चुनाव दुनिया का इकलौता ऐसा चुनाव होगा जहां एक पार्टी चार-चार गठबंधनों का हिस्सा है. बीजेपी ने खूबसूरत बिसात बिछाई है. प्रत्यक्ष तौर पर नीतीश कुमार जी के साथ है वहीं, अप्रत्यक्ष गठबंधन चिराग पासवान की पार्टी के साथ है. इसके अलावा अदृश्य तौर पर ओवैसी जी के गठबंधन और पप्पू यादव के गठबंधन के साथ हैं।
जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता प्रगति मेहता के मुताबिक़ भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने लगातार कहा कि बिहार में बीजेपी जेडीयू के साथ लड़ रही है, ख़ुद प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में कह रहे हैं कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनेंगे. बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को लेकर कोई उलझन नहीं है और लोक जनशक्ति पार्टी की स्थिति वोट कटवा जैसी पार्टी से ज़्यादा नहीं है।
चिराग की बढ़ती लोकप्रियता

दरभंगा के बेनीपुर के एक युवा के मुताबिक़ नीतीश कुमार को चिराग़ पासवान के चलते नुक़सान हो रहा है. वहीं, हाजीपुर में रामविलास पासवान के समर्थक का कहना है कि चिराग पासवान को एनडीए के साथ रहना चाहिए था।
वहीं, सोनपुर के डाक बंगला मैदान में तेजस्वी यादव को सुनने आए एक युवा ने कहा कि चिराग को तेजस्वी के साथ आ जाना चाहिए।
लेकिन, चिराग की मौजूदा रणनीति इसलिए ज्यादा मुफीद दिख रही है क्योंकि अगर वे कम से कम 15-20 सीट ले आते हैं तो उनके बिना कोई सरकार नहीं बन पाएगी. लेकिन, चिराग इन दिनों इस बात पर ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं कि उनका कौन-सा उम्मीदवार नीतीश कुमार के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है।
इस लड़ाई में उनका एक फायदा तो यह हुआ है कि बिहार फस्र्ट की बात कह कर वे बिहार के युवाओं के बीच जगह बनाने में कामयाब हुए हैं, यही वजह है कि उनकी सभाओं में ठीक-ठाक भीड़ आ रही है।
इतना ही नहीं उन्होंने एक झटके में 143 विधानसभा सीटों पर पार्टी का ढाँचा, संगठन और उम्मीदवार खड़े कर लिये हैं। अब उनकी नजर विधानसभा सीटों से ज़्यादा वोट प्रतिशत बढ़ाने की है, इसमें वो कामयाब होते दिख रहे हैं।
दरअसल, चिराग जिस रणनीति के जरिए मैदान में उतरे हैं, उससे उनका अपना और बीजेपी का फ़ायदा तो दिख रहा है लेकिन, जेडीयू का नुक़सान तय है। यही वजह है कि जब तीन अक्टूबर को उन्होंने अलग चुनाव लडऩे की घोषणा की तो नीतीश कैंप की ओर से उन्हें एक दिन में दर्जनों बार फोन किए गए।
लेकिन, तेजस्वी यादव की सभा में उमड़ती भीड़ ने बीजेपी को आशंकित किया है कि कहीं चिराग के चलते गठबंधन का इतना नुक़सान ना हो जाए जिससे सरकार के गठन में ही मुश्किलें आ जाएं. ऐसी सूरत में भी चिराग पासवान अपनी अहमियत साबित कर देंगे कि उनके पास एक ट्रांसफर होने लायक वोटबैंक है। (bbc.com)
2017 में भारतीय मीडिया में जोर-शोर से खबरें देकर दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अहमदाबाद में साबरमती नदी से मेहसाणा के धरोई बांध तक सी-प्लेन से यात्रा की तो वे भारत में सी-प्लेन की सवारी करने वाले पहले व्यक्ति बन गए. दरअसल, भारत में सी-प्लेन से की गई यह कोई पहली यात्रा नहीं है.
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केरल में सी-प्लेन के उद्घाटन का वीडियो 2013 में ही अपलोड किया जा चुका है. अतीत में ऐसी कई यात्राएं की जा चुकी हैं, जिनमें से सबसे उल्लेखनीय ये हैं-
1. अंडमान-निकोबार में सी-प्लेन की व्यावसायिक सेवा चल रही है, जिसका उद्घाटन 2010 में किया गया था. उड़ान भरने वाला पहला सी-प्लेन सेसना-208 था.
2.केरल में सी-प्लेन सेवा 2013 में शुरू की गई, जिसका पहला विमान सेसना-206 था.
3. वास्तव में, इसी हफ्ते मुंबई में स्पाइसजेट के मुंबई में स्पाइसजेट सी-प्लेन ने उड़ान भरी.
‘ ट्रिप एडवाइजर’ कंपनी मुंबई से लोणावला के लिए सी-प्लेन सेवा देती है, जिसका उद्घाटन 2014 में किया गया था. (द प्रिंट में 13 दिसंबर 2017 को प्रकाशित जानकारी)

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31 अक्टूबर। प्रदेश कांग्रेस, लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत दिवस को आज किसान अधिकार दिवस के रूप में मना रही है। कांग्रेस ने इस दौरान आज राजधानी रायपुर के अंबेडकर चौक पर किसान-मजदूर विरोधी कानून के विरोध में सत्याग्रह किया। उनका यह आंदोलन प्रदेश के बाकी जिला मुख्यालयों में भी जारी रहा।
शहर जिला कांग्रेस से जुड़े दर्जनों नेता-कार्यकर्ता आज सुबह यहां अंबेडकर चौक पर एकजुट हुए। इसके बाद सरदार पटेल और इंदिरा गांधी को याद करते हुए यहां सत्याग्रह पर बैठ गए। सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस नेता, केन्द्र सरकार द्वारा पारित किसान विरोधी तीन कृषि कानून को वापस लेने जाने की मांग करते रहे।
प्रदेश कांग्रेस मीडिया प्रमुख शैलेष नितिन त्रिवेदी का कहना है कि कृषि करने के विरोध में प्रदेश में हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया गया है। हस्ताक्षरयुक्त प्रतियां जल्द ही प्रदेश कांग्रेस के पास जमा होगी। अखिल भारतीय कांग्रेस द्वारा 14 नवंबर को 2 करोड़ किसानों और खेतिहर मजदूरों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा जाएगा।
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर| भारत में 24 घंटों में कोरोनावायरस के 48,268 नए मामले सामने आने और 551 मौतों के साथ शनिवार को देश में इस बीमारी के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 81,37,119 हो गई। राष्ट्रीय राजधानी में भी पिछले तीन दिनों से प्रतिदिन लगभग 5,000 मामलों के साथ संक्रमण की संख्या में वृद्धि देखने को मिली है।
कुल कोविड-19 मामलों में से, 5,82,649 वर्तमान में सक्रिय हैं, 74,32,829 को ठीक होने के बाद अस्पताल से छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 1,21,641 लोग कोरोना से जान गंवा चुके हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों ने दर्शाया कि रिकवरी दर 91.34 प्रतिशत है और मृत्यु दर 1.49 प्रतिशत है।
महाराष्ट्र कुल 16,72,858 मामलों और 43,837 मौतों के साथ कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बना हुआ है। इसके बाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और दिल्ली हैं।
इस बीच, दिल्ली में शुक्रवार को कोरोना के 5,891 नए मामले दर्ज किए गए, जो अब तक का सबसे अधिक एक दिवसीय वृद्धि है, जिसमें कुल मामलों की संख्या बढ़कर 3.81 लाख के पार पहुंच गई, जबकि 47 नई मौतों के साथ राष्ट्रीय राजधानी में अब तक 6,470 लोगों की मौत हो चुकी है।
संक्रमण की तीसरी लहर से जूझ रही है राष्ट्रीय राजधानी में पिछले तीन दिनों से प्रतिदिन 5,000 से अधिक मामले आ रहे हैं।
इस बीच, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने शुक्रवार को एक ही दिन में 10,67,976 सैंपल परीक्षण किए। अब तक कुल 10,87,96,094 नमूनों की जांच हो चुकी है। (आईएएनएस)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31 अक्टूबर। राज्य स्थापना दिवस के मौके पर रविवार को मुख्यमंत्री निवास में अलंकरण समारोह होगा। समारोह से पहले राजीव गांधी न्याय योजना की तीसरी किश्त करीब 15 सौ करोड़ रूपए किसानों के खाते में ट्रांसफर की जाएगी। इस मौके पर कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए कार्यक्रम में शामिल होंगे।
कोरोना संक्रमण की वजह से इस बार राज्य स्थापना दिवस समारोह का कार्यक्रम छोटा कर दिया गया है। सार्वजनिक तौर पर कार्यक्रम न होकर मुख्यमंत्री निवास में अलंकरण समारोह आयोजित किया गया है, जिसमें मंत्री, विधायकों के अलावा चुनिंदा अतिथि रहेंगे। यह कार्यक्रम दोपहर 12 बजे से शुरू होगा। पहले राहुल गांधी की वर्चुअल मौजूदगी में राजीव गांधी न्याय योजना की तीसरी किश्त करीब 15 सौ करोड़ रूपये का भुगतान किया जाएगा।
राहुल गांधी कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। इसके बाद अलंकरण समारोह होगा, जिसमें महापुरुषों के नाम पर कला, साहित्य, खेल, पत्रकारिता, समाज सेवा में उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया जाएगा।
मौतें-2038, एक्टिव-22350, डिस्चार्ज-160918
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 31अक्टूबर। प्रदेश में कोरोना मरीज एक लाख 85 हजार पार हो गए हैं। बीती रात मिले 1 हजार 718 नए पॉजिटिव के साथ इनकी संख्या बढक़र 1 लाख 85 हजार 306 हो गई है। इसमें से 2038 मरीजों की मौत हो गई है। 22 हजार 350 एक्टिव हैं और इनका एम्स समेत अलग-अलग जगहों पर इलाज चल रहा है। 1 लाख 60 हजार 918 मरीज ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं। सैंपलों की जांच जारी है।
राजधानी रायपुर समेत प्रदेश में कोरोना संक्रमण जारी है, और नए पॉजिटिव फिलहाल दो हजार आसपास सामने आ रहे हैं। बुलेटिन के मुताबिक बीती रात 8 बजे 1 हजार 718 नए पॉजिटिव सामने आए। इसमें रायगढ़ जिले से सबसे अधिक 285 मरीज पाए गए। रायपुर जिले से 152, जांजगीर-चांपा से 152, बिलासपुर से 117 व कोरबा से 109 मरीज मिले।
दुर्ग-62, राजनांदगांव-70, बालोद-79, बेमेतरा-30, कबीरधाम-28, धमतरी-33, बलौदाबाजार-67, महासमुंद-83, गरियाबंद-25, मुंगेली-25, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-8, सरगुजा-52, कोरिया-35, सूरजपुर-15, बलरामपुर-35, जशपुर-7, बस्तर-60, कोंडागांव-51, दंतेवाड़ा-39, सुकमा-52, कांकेर-20, नारायणपुर-8, बीजापुर जिले से 15 व अन्य राज्य से 4 मरीज सामने आए हैं। ये मरीज आसपास के कोरोना अस्पतालों में भेजे जा रहे हैं। इनके संपर्क में आने वालों की जांच-पहचान जारी है।
दूसरी तरफ कल 5 मरीजों की मौत हो गई। इसमें कोरोना से 3 एवं अन्य बीमारियों के साथ कोरोना से 2 की मौत शामिल है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग को दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर, धमतरी जिले के अस्पतालों से पूर्व में हुई 44 और मौतों की जानकारी मिली है। इसमें 19 की कोरोना और 25 की अन्य गंभीर बीमारियों के साथ कोरोना से मौत हुई है। इस तरह कल 49 लोगों की मौत दर्ज की गई है। स्वास्थ्य अफसरों का कहना है कि प्रदेश में लगभग सर्दी का सीजन शुरू हो रहा है। ऐसे में कोरोना से ज्यादा से ज्यादा बचाव जरूरी है।
‘छत्तीसगढ़’ न्यूज डेस्क
आज इंदिरा गांधी के शहादत दिवस पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने उनकी एक तस्वीर के साथ ट्विटर पर लिखा है- शुक्रिया दादी, मुझे यह दिखाने के लिए कि इन शब्दों को जीने का क्या मतलब है।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
भिलाई नगर, 31 अक्टूबर। बालोद से लगे ग्राम सिवनी में मकान मालिक की छोटी सी बेटी को 50 से अधिक जगहों पर सिगरेट दागने वाला सिपाही अविनाश राय आज सुबह पावर हाउस भिलाई में गिरफ्तार कर लिया गया। दूसरी तरफ, सिपाही के इस अपराध को गंभीरता से लेते हुए डीजीपी डीएम अवस्थी ने उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
विदित हो कि दुर्ग पुलिस लाइन के पहले बालोद जिले में पदस्थ सिपाही अविनाश राय परसों शराब के नशे में सिवनी अपने किराये के घर में पहुंचा और यहां मकान मालिक की डेढ़ साल की बच्ची से जबरन पापा बुलवाना चाहा। बच्ची द्वारा ऐसा न कहने पर उसके साथ बुरी तरह से मारपीट करते हुए उसे 50 से अधिक जगहों पर सिगरेट से दाग दिया।
घटना की जानकारी जैसे ही पीडि़त बच्ची की मां को मिली वह उसे लेकर बालोद थाने पहुंची। पुलिस ने बच्ची को तुरंत अस्पताल भिजवाया और घटना की जानकारी अधिकारियों को दी। डीजीपी अवस्थी ने आरोपी सिपाही को बर्खास्त कर उसे गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर दिया है।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बालोद डीआर पोर्ते ने बताया कि आरोपी सिपाही को आज सुबह भिलाई पावर हाउस स्थित छाया लॉज से गिरफ्तार कर लिया गया। उसे पुलिस बालोद लेकर पहुंच गई है। आरोपी सिपाही के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है। दूसरी तरफ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर रोहित झा ने बताया कि सिपाही हाल ही में बालोद से दुर्ग तबादले पर आया था। फिलहाल उसकी पदस्थापना पुलिस लाईन में है, लेकिन वह 25 अक्टूबर से ड्यूटी नहीं आ रहा था और दुर्ग पुलिस उसकी तलाश में लगी थी।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बालोद, 31 अक्टूबर। पापा न कहने पर मकान मालकिन की बेटी को सिगरेट से दागने व मारपीट करने वाला सिपाही भिलाई से हिरासत में ले लिया गया है। विभाग में अब उसके निलंबन की कार्रवाई चल रही है और बर्खास्तगी का प्रकरण तैयार किया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक यह सिपाही अविनाश राय इसके पहले उसके घर किराएदार रह चुका है और घटना के दिन वह शराब पीकर उसके घर पहुंचा था। बताया गया कि उसने मकान मालकिन को कुछ पैसा दिया था, जिसकी वसूली के लिए वह उसके घर गया था। इस दौरान वह शराब के नशे में मकान मालकिन की छोटी सी बेटी को जबरदस्ती पापा कहने के लिए दबाव बनाता रहा। बच्ची ने जब उसे पापा नहीं कहा, तो वह गुस्से में आकर उसके हाथ, पैर, पीठ को सिगरेट से दागने लगा। उसने बच्ची व उसकी मां के साथ मारपीट भी की। इसके बाद वह फरार हो गया।

दूसरी तरफ, मकान मालकिन ने घटना की शिकायत बच्ची के साथ बालोद पुलिस में दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी सिपाही के खिलाफ गाली-गलौज, मारपीट, धमकी का मामला दर्ज कर उसकी तलाश शुरू की। इस दौरान वह भिलाई के एक लॉज में आज सुबह पकड़ा गया। बालोद पुलिस पूछताछ-जांच में लगी है।
राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने मामला संज्ञान में लिया
राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के सदस्य यशवंत जयंत से फोन पर जानकारी ली गई तो उन्होंने बताया कि बच्ची को सिगरेट से दागने वाली घटना की जानकारी बाल संरक्षण आयोग तक पहुंची हुई है। साथ ही हमने मामले की पूरी जानकारी के लिए पुलिस को पत्र लिख दिया है। इसमें धारा बढ़ाने की भी बात कही जा रही है। उन्होंने बताया कि यह काफी जघन्य अपराध है। पुलिसकर्मी को बर्खास्त करने के लिए भी पत्र लिखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस : 1 नवम्बर
समस्या यह है कि विकास का नया विमर्श सिर्फ ‘विकास’ के इर्दगिर्द घूमता है। इस नए विमर्श में खनिज और खदान, रियल एस्टेट और भवन निर्माण विकास के पैमाने हो गए हैं। इसकी आड़ में आदिवासियों और किसानों से जमीन छीनकर उद्योगों के हवाले कर दी गई।
कोरोना की महामारी न हुई होती तो झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ नवंबर में जोरशोर से अपनी स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मना रहे होते। जब इन राज्यों की मांग हुई तो इसके मूल में क्षेत्रीय अस्मिता और पहचान थी। विकास का नारा तो बाद में जुड़ा। झारखंड और छत्तीसगढ़ के बारे में कहा गया कि ये आदिवासी बहुल इलाके हैं। लेकिन यह सच नहीं। छत्तीसगढ़ में आदिवासी 30.62% और झारखंड में 26.21% हैं। दोनों ही राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग की बहुलता है। उत्तराखंड में सवर्ण जातियां अधिक हैं।
बहुत लोगों को लगता था कि विकास के लिए ज़रूरी है कि राज्य छोटे हों। अब इस बात का आकलन करना चाहिए कि इन तीन राज्यों का कितना विकास हुआ? छोटे राज्यों को लेकर बहसें होती रही हैं। डॉ बी आर आंबेडकर खुद छोटे राज्यों के पक्ष में थे। जब भाषायी आधार पर राज्यों के गठन के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग बना, तो वे बड़े राज्यों का विरोध कर रहे थे। लेकिन आज यह कहना मुश्किल है कि विकास का कोई एक पैमाना हो सकता है। यदि हरियाणा, पंजाब और केरल-जैसे छोटे राज्यों के उदाहरण हैं तो कर्नाटक और तमिलनाडु-जैसे बड़े राज्यों के भी उदाहरण हमारे सामने हैं।
यह कतई जरूरी नहीं कि छोटे राज्य उन सपनों को पूरा कर सकें जिनको लेकर उनका गठन हुआ। जिस समाज या समूह के विकास को आधार बनाया गया था, उसका इस राह पर चलकर भला ही होगा, यह भी सुनिश्चित नहीं है। तीनों राज्यों के मानव विकास सूचकांक चुगली करते हैं कि छोटे राज्य बनने से उनका भला नहीं हुआ। हालांकि ‘विकास’ के ऐसे ढेर सारे आंकड़े हैं जिससे विकास का भ्रम पैदा हो जाए। उदाहरण के तौर पर, जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े। छत्तीसगढ़ जब बना तो प्रति व्यक्ति आय 10,744 रुपये थी जो 2019-20 में बढ़कर 92,413 रुपये हो गई थी। ऐसे ही आंकड़े झारखंड और उत्तराखंड के लिए भी उपलब्ध हैं। लेकिन इसका कोई जवाब नहीं है कि यदि प्रति व्यक्ति आय में इतनी बढ़ोतरी हो रही थी तो फिर छत्तीसगढ़ में गरीबी क्यों बढ़ती रही? क्यों छत्तीसगढ़ 39.9% गरीबों के साथ देश का सबसे गरीब राज्य है? वहां सबसे अधिक 18% लोग झुग्गियों में क्यों रहते हैं? यही हाल झारखंड का है। हालांकि उत्तराखंड ने गरीबी के मामले में अपनी स्थिति सुधार ली है।
आदिवासियों का भी तो भला नहीं हुआ
झारखंड और छत्तीसगढ़ आदिवासियों के नाम पर बने थे। लेकिन तथ्य बताते हैं कि इन दोनों राज्यों में आदिवासी समुदाय ने ही सबसे अधिक पीड़ा झेली है। झारखंड पिछले दो दशकों में ‘खदानों के नरक’ में बदल गया है। आदिवासी लगातार विस्थापित हुए हैं और अपनी जीवन शैली के साथ उन्हें बहुत समझौता करना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पनपने की वजह आदिवासियों का शोषण थी तो अलग राज्य बनने के बाद उनका भला होना चाहिए था और नक्सली गतिविधियां सिमट जानी थीं। लेकिन हुआ इसका एकदम उलट। जब राज्य बना तो तीन विकास खंडों में नक्सली गतिविधियां थीं लेकिन 15 बरस के बीजेपी शासनकाल में राज्य के 14 जिलों में नक्सल समस्या फैल गई।
नक्सलियों से लड़ने के नाम पर सलवा जुडुम की शुरुआत हुई। लेकिन इसके असर से बस्तर में आदिवासियों का सबसे ज्यादा पलायन हुआ। आदिवासियों के 650 से अधिक गांव खाली करवा दिए गए। लगभग तीन लाख आदिवासियों को पलायन करना पड़ा। फर्जी एनकाउंटर, आदिवासियों की प्रताड़ना और गांव जलाने आदि की अनगिनत घटनाएं हुईं।
समस्या यह है कि विकास का नया विमर्श सिर्फ ‘विकास’ के इर्दगिर्द घूमता है। इस नए विमर्श में खनिज और खदान, रियल एस्टेट और भवन निर्माण विकास के पैमाने हो गए हैं। इसकी आड़ में आदिवासियों और किसानों से जमीन छीनकर उद्योगों के हवाले कर दिया गया। जिन मूल निवासियों को राज्य के निर्माण का लाभ मिलना था, वे इस विकास की दौड़ के चलते हाशिये पर चले गए। वे भूल ही गए कि नए राज्य का निर्माण उनके लिए भी हुआ था।
ठोस योजना का अभाव
छोटे राज्य बनाने का चाहे जो तर्क दे दीजिए- क्षेत्रीय विकास का असंतुलन, आंतरिक सुरक्षा और जनभावनाएं आदि, लेकिन सच यह है कि नया राज्य बनाने के साथ अगर उस राज्य के विकास का कोई ब्लू- प्रिंट नहीं बना, कोई रोड मैप नहीं बना तो राज्य का हित संभव ही नहीं है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड इसके अप्रतिम उदाहरण हैं।
यह कहना गलत होगा कि कुछ हुआ ही नहीं। कुछ तो होना ही था। केंद्र से पैसा सीधे पहुंचा, फैसले लखनऊ, भोपाल और पटना की जगह देहरादून, रायपुर और रांची में होने लगे, परियोजनाओं के लिए बेहतर संसाधन मिले, खनिजों के लिए रॉयल्टी की राशि सीधे मिलने लगी, कुछ उद्योग लगे, थोड़ा रोजगार बढ़ा। लेकिन ये तीनों ही उन राज्यों में तब्दील नहीं हो सके जिसका सपना दिखाया गया था।
तीनों ही राज्यों के शासकों ने कोई ठोस रणनीति या कोई ब्लू प्रिंट नहीं बनाया जिससे राज्य एक सुनिश्चित दिशा में आगे बढ़ सके। एक बार नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था कि 50 के दशक में केरल सरकार ने जिद पकड़ ली कि वे अपनी योजना का सबसे अधिक पैसा शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगाएंगे और उसी जिद का परिणाम है कि केरल आज सबसे संपन्न राज्यों की सूची में है।
झारखंड और उत्तराखंड तो राजनीतिक अस्थिरता से भी जूझते रहे। छत्तीसगढ़ में राजनीतिक अस्थिरता अब तक नहीं है लेकिन इससे राज्य का भाग्य बदला नहीं है।
छत्तीसगढ़ की दूरगामी सोच
वैसे, छत्तीसगढ़ में अब बदलाव के आसार दिख रहे हैं। नई सरकार ठोस और दूरगामी परिणाम देने वाली योजनाओं पर काम कर रही है। वह आदिवासियों और किसानों की सुधले रही है। नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को भी राजनीति का हिस्सा बनाकर लोगों के मन में एक नई आस जगाई है। उन्होंने बस्तर के लोहांडीगुड़ा में उद्योग के नाम पर ली हुई 1,700 आदिवासी किसानों की जमीन लौटा दी। किसानों को प्रति क्विंटल धान के लिए 2500 रुपये मिल रहे हैं।
तेंदूपत्ता मजदूरों को प्रति मानक बोरा 2500 रुपये की जगह 4000 रुपये मिल रहे हैं। सरकार ने वनोपज खरीद की नीति बदली है जिससे आदिवासियों को लाभ मिला है। नई सरकार छत्तीसगढ़ को बिजली बनाने वाले राज्य से बिजली खपत करने वाले राज्य में बदलना चाहती है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ‘नरवा गरुवा घुरुवा बारी’ नाम की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की। इसका उद्देश्य वर्षाजल का संचयन कर नदी नालों को पुनर्जीवित करना, गौधन का संवर्धन और घर-घर में पौष्टिक फल सब्जी के उत्पादन को बढ़ावा देना है। इसी के अंतर्गत छत्तीसगढ़ सरकार ने देश में पहली बार गोबर खरीदना शुरू कर दिया है और गांव-गांव में गोशालाएं बन रही हैं। अगर ठीक से अमल हुआ तो छत्तीसगढ़ अगले दशकों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दम पर चलने वाला इकलौता राज्य होगा।
लेकिन, सवाल अकेले छत्तीसगढ़ का नहीं है। यह सवाल झारखंड और उत्तराखंड का भी है। साथ ही देश के उन सभी राज्यों का है जो ठोस और दूरदर्शी योजनाओं के अभाव में पिछड़ रहे हैं। राजनीति चलती रहेगी। चुनाव आते-जाते रहेंगे। सरकारें बनती-बिगड़ती रहेंगीं। लेकिन योजनाएं ऐसी होनी चाहिए जिससे राज्य की जनता का भाग्य बदले, राज्य की अर्थव्यवस्था बदले और इस तरह बदले कि उसका सकारात्मक असर दूर तक दिखाई दे। ये बदलाव हर सूरत में क्रांतिकारी होने चाहिए। तभी बात बनेगी।(लेख अख़बार 'नवजीवन' के सौजन्य से)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार रह चुके हैं, और अभी छत्तीसगढ़ सीएम के राजनीतिक सलाहकार हैं)
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बलौदाबाजार, 31 अक्टूबर। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ टूट के कगार पर पहुंच गई है। पार्टी के संस्थापक अजीत जोगी के निधन के बाद पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। जेसीसी जे के विधायक देवव्रत सिंह ने कहा था कि उनको और बलौदा बाजार विधायक प्रमोद शर्मा का भविष्य कांग्रेस में ही है। इस पर प्रमोद शर्मा ने भी अपनी सहमति जताई है। इस बयान से छत्तीसगढ़ में चुनाव से पहले जोगी कांग्रेस में फूट देखने को मिल रही है। खैरागढ़ विधायक ने कहा था कि उनका कांग्रेस में ही है।
मरवाही उपचुनाव से पहले जयसिंह अग्रवाल के बयान के बाद जोगी कांग्रेसमें खींचतान मची हुई है। प्रमोद शर्मा ने मीडिया से चर्चा में कहा कि वे विधायक देवव्रत सिंह के साथ हैं और उनके साथ कांग्रेस में जाना चाहते हैं। वे उनके साथ रहेंगे। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के सुप्रीमो रहे अजीत जोगी उनके राजनीतिक गुरु थे उनके जाने के बाद विधायक देवराज सिंह के साथ है। कांग्रेस की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा है छत्तीसगढ़ का चौमुखी विकास काग्रेस सरकार की देन है। किसानों के हित के लिए कांग्रेस सरकार लगातार छत्तीसगढ़ में काम कर रही है।
हिंसा के बीच सम्हाला कामकाज
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 31 अक्टूबर। दुर्गा पूजा के दौरान बिहार के मुंगेर में हुए हिंसक उपद्रव के बीच चुनाव आयोग ने 2010 बैच की रचना पाटिल को नया कलेक्टर नियुक्त किया है। रचना राजनांदगांव शहर की रहने वाली है। मुंगेर में प्रतिमा विसर्जन के दौरान पुलिस और जनता के बीच विवाद और तनाव हो गया। जिसके चलते पुलिस ने फायरिंग कर दी। पुलिस की गोली से एक व्यक्ति की मौत होने से विवाद और खड़ा हो गया और बाद में पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
पुलिस के लाठी से कई लोग जख्मी भी हुए हैं। वहीं गुस्साई भीड़ ने मुंगेर के तीन थानों को आग के हवाले कर दिया। प्रशासन और पुलिस पर भीड़ को नियंत्रित नहीं करने के कारण चुनाव आयोग के निर्देश पर कलेक्टर और एसपी हटा दिए गए। अब नए कलेक्टर के रूप में रचना पाटिल ने कामकाज सम्हाला है। रचना राजनांदगांव शहर के भरकापारा की रहने वाली है। वह 2010 में सीधे आईएएस बनने वाली नांदगांव जिले की इकलौती अफसर है।
रचना उस समय भी सुर्खियों में आई जब उन्होंने अपने एक जूनियर आईपीएस 2011 बैच के कुमार गौतम से वैवाहिक बंधन में बंधी। गौतम का मूल कैडर पश्चिम बंगाल है और वह बिहार के भागलपुर के ही बाशिंदे हैं। रचना ने अपने आईएएस कैरियर में वैशाली जिले में कलेक्टर के रूप में शुरूआत की। वह प्रशासनिक महकमे में सीधे और सटीक बातों को करने के लिए जानी जाती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में भी वह पदस्थ रही है। मुंगेर में तनाव को कम करने और कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कामकाज की शुरूआत कर दी है।
मुंगेर का प्रभार सम्हालने के बाद ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा करते रचना पाटिल ने कहा कि चुनाव आयोग के निर्देश पर कलेक्टर की जिम्मेदारी मिली है। कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने के साथ लोगों से संवाद किया जा रहा है। कहीं कोई भ्रम की स्थिति निर्मित होने के कारण हिंसक घटनाएं हुई है। स्थिति पर काबू पाने पुलिस और प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि डीएम के रूप में वह सभी मोर्चे पर सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए काम कर रहे हैं।
बिहार के मुंगेर शहर में दशहरा के दिन प्रतिमा विसर्जित करने के दौरान अहिंसक भीड़ पर पुलिसकर्मियों द्वारा लाठीचार्ज व फायरिंग में एक युवक की मौत के बाद राजनीति गर्म हो गई है. बात जनरल डायर से तालिबानी शासन तक पहुंच गई.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-
बिहार में तीन नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण को देखते हुए राजनीतिक दल रोटियां सेंकने में जुट गए हैं. आरोप-प्रत्यारोप के जरिए चुनावी लाभ लेने की कोशिशों के बीच मुंगेर शहर गुरुवार को फिर सुलग उठा. विसर्जन जुलूस पर फायरिंग की घटना का यहां 28 अक्टूबर को हुए मतदान पर भी खासा असर रहा. मुंगेर के तीन विधानसभा क्षेत्रों में औसतन 46-47 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि इसके पड़ोसी जिलों में औसतन यहां से करीब दस फीसद अधिक वोटिंग हुई. चुनाव आयोग ने गुरुवार की घटना के बाद जिलाधिकारी राजेश मीणा तथा पुलिस अधीक्षक लिपि सिंह को हटा दिया है. रचना पाटिल मुंगेर की डीएम तथा मानवजीत सिंह ढिल्लो नए एसपी बनाए गए हैं.
परंपरा तोड़ने से इनकार पर हुई भिड़ंत
दरअसल, 26 अक्टूबर को विजयादशमी के दिन मुंगेर शहर में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन हो रहा था. परंपरा के अनुसार बड़ी दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जित करने के लिए डोली पर ले जाया जाता है जिसे 32 लोग उठाकर चलते हैं. बड़ी दुर्गा की मूर्ति के विसर्जित होने के बाद ही किसी अन्य प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है. जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, जबकि पुलिस शंकरपुर दुर्गा पूजा समिति की प्रतिमा को आगे निकाल कर विसर्जन करवाना चाह रही थी. आदेश नहीं मानने पर पुलिस व पूजा समिति के सदस्यों के बीच झड़प हो गई. इसी बीच पुलिस के जवानों ने शहर के दीनदयाल उपाध्याय चौक के पास विसर्जन जुलूस में शामिल लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज होते ही आक्रोशित भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया. इस बीच फायरिंग होने लगी.
गोली लगने से अमरनाथ पोद्दार नामक व्यवसायी के 18 वर्षीय पुत्र अनुराग पोद्दार की मौत हो गई. पुलिस ने निहत्थे लोगों पर जमकर लाठियां भांजीं. घटना के बाद वायरल वीडियो पुलिस की बर्बरता बयां करने को काफी है. सात अन्य लोगों को भी गोली लगने की सूचना है. इस संबंध में 30 लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इधर पुलिस का कहना था कि गोली भीड़ में से किसी ने चलाई, पुलिस ने फायरिंग नहीं की. मुंगेर की तत्कालीन एसपी लिपि सिंह के अनुसार "विसर्जन के दौरान असामाजिक तत्वों ने निशाना साधकर पुलिसकर्मियों पर पथराव किया. उपद्रवियों की ओर से चली गोली से एक व्यक्ति की मौत हुई. बीस से अधिक जवान भी घायल हुए हैं." मुंगेर चैंबर ऑफ कामर्स ने इस घटना का विरोध करते हुए दोषी पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की तथा अनिश्चितकाल तक मुंगेर बाजार बंद करने का निर्णय लिया.
कार्रवाई न होने से हिंसा पर उतरे लोग
पुलिस बार-बार अपना बचाव करने में जुटी रही. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो व लोगों के आक्रोश पर आला अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया. अंतत: दो दिन बाद गुरुवार को लोगों का आक्रोश फूट पड़ा. जैसे ही शहर में चुनाव के मौके पर तैनात किए गए अर्द्धसैनिक बलों के दस्ते रवाना हुए, एक और के मौत की अफवाह फैली. उस समय जस्टिस फॉर अनुराग के सदस्य धरना दे रहे थे. इन सदस्यों के साथ ही और कुछ युवा सड़क पर उतर आए. देखते ही देखते भीड़ में सैकड़ों लोग खासकर युवा शामिल हो गए. क्रुद्ध भीड़ ने तीन थानों को फूंक दिया. पुलिस के कई वाहनों तथा थाने के पास जब्त कर रखे गए वाहनों में आग लगा दी.
कई घंटे तक शहर रणक्षेत्र में तब्दील रहा, भीड़ घूम-घूमकर उत्पात मचाती रही. वे शहर की सड़कों पर मुंगेर पुलिस हाय-हाय और मुंगेर एसपी मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए आगजनी करते रहे. आक्रोश का आलम यह था कि नए डीएम-एसपी के आगमन की सूचना मिलने पर भीड़ साफियाबाद हवाई अड्डे पर पहुंच गई और वहां हेलीकॉप्टर को क्षतिग्रस्त कर दिया. इस दौरान अफवाहों ने आग में घी का काम किया. बेकाबू हालात देख डीआइजी मनु महाराज सड़क पर उतरे और स्थिति को नियंत्रित किया. स्थानीय लोगों का कहना था कि फायरिंग व लाठीचार्ज की घटना के बाद से ही पुलिस-प्रशासन के प्रति लोगों में काफी आक्रोश था. दोषी थानेदारों के खिलाफ कार्रवाई न होने से लोग उद्वेलित हो उठे थे. भीड़ ने उन्हीं थानों पर हमला किया जहां के थानेदारों को वे इस घटना के लिए जिम्मेदार मान रहे थे.
सीआईएसफ की रिपोर्ट में पुलिस पर आरोप
हालांकि चुनाव आयोग द्वारा हटाए जाने से पहले डीएम राजेश मीणा व एसपी लिपि सिंह ने दो थानेदारों को लाइन हाजिर करते हुए एसडीओ के नेतृत्व में एसआइटी का गठन करते हुए उन्हें जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दे दिया था. लोगों का कहना था कि यदि दोषी थानेदारों को पहले ही हटा दिया जाता तो मुंगेर शहर गुरुवार को नहीं उबलता. वैसे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) की इंटरनल रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि 26 अक्टूबर की रात फायरिंग की शुरुआत मुंगेर पुलिस ने ही की थी.
यह रिपोर्ट सीआइएसएफ के एक डीआईजी ने तैयार कर मुख्यालय को भेजी है. इसमें कहा गया है कि रात्रि 11.45 बजे विसर्जन जुलूस में स्थानीय पुलिस व लोगों के बीच विवाद हुआ. उसके बाद लोगों ने पथराव किया. हालात को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय पुलिस ने सबसे पहले हवाई फायरिंग की. इसके बाद भीड़ और उग्र हो गई. हालात बेकाबू होते देख विसर्जन जुलूस की सुरक्षा ड्यूटी में तैनात सीआइएसएफ के हेड कांस्टेबल एम गंगैया ने अपनी राइफल से करीब एक दर्जन गोलियां हवा में दागी थी.
मुद्दा बनाने में जुटे राजनीतिक दल
26 अक्टूबर को निहत्थे लोगों पर लाठीचार्ज और फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत को राजनीतिक दल विधानसभा चुनाव के अगले दो चरण को देखते हुए मुद्दा बनाने में जुट गए. मुंगेर के समीपवर्ती कोसी व सीमांचल के इलाके में तीसरे चरण में चुनाव होना है. इस घटना के तुरंत बाद विपक्ष हमलावर हो उठा. राजद व लोजपा ने एसपी लिपि सिंह को बर्खास्त करने तथा घटना की सीबीआई जांच की मांग की. लालू प्रसाद यादव के पुत्र व महागठबंधन में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने कहा, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जवाब देना चाहिए कि आखिर किसके इशारे पर जनरल डायर बने. इसकी अनुमति उन्हें किसने दी." उन्होंने उपमुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए पूछा कि ट्वीट करने के अलावा उन्होंने इस घटना पर क्या किया? कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सूरजेवाला ने कहा कि बिहार में निर्दयी कुमार व निर्मम मोदी का शासन है. आश्चर्य है, कोई ऐसा मुख्यमंत्री भी हो सकता है जो मां दुर्गे के भक्तों की हत्या का आदेश देता है. जिन भक्तों के सिर पर माता की लाल चुनरी होनी चाहिए थी उनके सिर पुलिस की लाठियों से लहूलुहान कर दिए गए. कई लोग जो मां दुर्गे की प्रतिमा के पास बैठ गए थे, उन निहत्थे लोगों पर भी बेरहमी से निर्ममतापूर्वक लाठियां बरसाईं गईं. उन्होंने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री मोदी नीतीश सरकार को बर्खास्त करने का साहस दिखाएंगे.
मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री की तुलना जनरल डायर से करते हुए कहा कि नीतीश कुमार इन दिनों जनरल डायर की भूमिका में हैं, जिसने जालियांवाला बाग जैसे नरसंहार का आदेश दिया था. मुंगेर की इस घटना के लिए सीधे मुख्यमंत्री जिम्मेदार हैं. श्रद्धालुओं को गोली मारना नीतीश कुमार के तालिबानी शासन का द्योतक है. मुंगेर एसपी को तत्काल निलंबित कर उस पर धारा-302 के तहत मुकदमा दर्ज होना चाहिए. चिराग के आरोपों पर जदयू नेता संजय झा कहते हैं, "अब प्रूव हो गया, ये तेजस्वी की बी टीम है. उसी की मदद के लिए ये सारा खेल खेल रहे हैं." वहीं जदयू के मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह विपक्षियों के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहते हैं, "राजद नेता तेजस्वी यादव जातीय उन्माद के कंधे पर सवार होकर बिहार फतह करने निकले हैं. उन्हें और कुछ दिखाई नहीं दे रहा." केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने भी कहा है कि बर्बरता का यह कृत्य दुर्भाग्यपूर्ण है. दोषी चाहे कितना बड़ा भी अधिकारी क्यों न हो, जांच के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.
पहले भी विवादों से घिरी हैं लिपि सिंह
चुनाव का मौसम तो है ही, किंतु दरअसल मुंगेर की तत्कालीन एसपी लिपि सिंह के जदयू नेता व राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह की पुत्री होने के कारण राजनीतिक दलों ने उन्हें निशाने पर लेते हुए एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश की है. कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सूरजेवाला ने तो मुंगेर में दोबारा हुई घटना के बाद साफ कहा, "मुंगेर की एसपी जदयू के एक बड़े नेता की बेटी है और वहां के डीएम नीतीश कुमार के चहेते." दरअसल लिपि सिंह पहले भी विवादों से घिरी हैं. भारतीय पुलिस सेवा की 2016 बैच की बिहार कैडर की अधिकारी लिपि सिंह पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी चुनाव कार्य से हटाई गईं थीं. बाहुबली नेता अनंत सिंह की पत्नी व 2019 के लोकसभा चुनाव में बाढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी नीलम देवी ने चुनाव आयोग से उनकी शिकायत की थी. उस समय लिपि बाढ़ की एएसपी थीं. नीलम देवी ने आरोप लगाया था कि जदयू नेता आरसीपी सिंह की पुत्री होने के कारण वे चुनाव में गड़बड़ी कर सकतीं हैं तथा वे अनंत सिंह को करीबियों को जान-बूझकर परेशान कर रहीं हैं.
हालांकि चुनाव संपन्न होने के बाद वह फिर से बाढ़ में पुराने पद पर तैनात की गईं तथा बाद में उन्हें प्रोन्नत कर मुंगेर का एसपी बनाया गया. 23 अगस्त, 2019 को वे एकबार फिर चर्चा में आईं जब आर्म्स एक्ट में दिल्ली की साकेत कोर्ट में सरेंडर करने के बाद बाहुबली अनंत सिंह को लाने वे दिल्ली गईं थीं. उस समय उन पर आरोप लगा था कि जिस गाड़ी से वे उन्हें लाने गईं थीं उस पर राज्यसभा का स्टीकर लगा था. विरोधी उनपर यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि राजनीतिक रसूख के कारण वे अपने वरीय अधिकारियों की भी नहीं सुनती थीं. हालांकि ऐसा नहीं है कि लिपि सिंह जहां रहीं वहां अपराध नियंत्रण में कमजोर रहीं. उन्होंने भारी मात्रा में आग्नेयास्त्र पकड़े तथा नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की. वे कड़क व ईमानदार अधिकारी के रूप में भी चर्चित रहीं हैं. निर्वाचन आयोग ने डीएम-एसपी को हटाकर सख्ती दिखाते हुए पूरे प्रकरण की जांच की जिम्मेदारी मगध के प्रमंडलीय आयुक्त असंगबा चुबा को सौंपी है.(dw.com)
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट-
असम में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिमों के लिए म्यूजियम मुद्दे पर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है. विधान सभा की एक समिति की सिफारिश के बावजूद असम सरकार इसका विरोध कर रही है.
कांग्रेस के एक विधायक शरमन अली अहमद ने हाल में असम सरकार को राज्य के चर-चापोरी यानी नदी के द्वीपों और तटवर्ती इलाकों में रहने वाले बंगाली मुसलमानों के लिए गुवाहाटी में प्रसिद्ध श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में म्यूजियम स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन सरकार ने विधायक की मांग को खारिज कर दिया है. उसके बाद इस मुद्दे पर बहस तेज हो रही है. दरअसल यह विवाद राज्य के ताकतवर मंत्री और बीजेपी के शीर्ष नेता हिमंत बिस्वा सरमा के उस ट्वीट के बाद तेज हुआ जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य के चर यानी तटवर्ती इलाके में रहने वालों की कोई अलग पहचान और संस्कृति नहीं है.
राज्य में तटवर्ती इलाके में रहने वाले मुस्लिमों को मियां कहा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि इस म्यूजियम की स्थापना का प्रस्ताव सबसे पहले बीजेपी सदस्यों वाली एक समिति ने ही दिया था. इससे पहले बीते साल भी बांग्ला मूल के कवियों की लिखी कविताओं को मियां कविता कहने पर विवाद हुआ था. असम में लगभग एक करोड़ की मुस्लिम आबादी में बंगाली मुस्लिमों की तादाद करीब 64 लाख है.
विवाद की शुरुआत
दरअसल, यह पूरा विवाद कांग्रेस विधायक शर्मन अली अहमद के उस पत्र से शुरू हुआ जो उन्होंने म्यूजियम निदेशक को लिखा था. इसमें कहा गया था कि तटवर्ती इलाकों की विरासत व संस्कृति को दर्शाने वाले प्रस्तावित म्यूजियम की स्थापना शीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में की जानी चाहिए. लेकिन इसके जवाब में मंत्री हिमंत ने अपने ट्वीट में कहा, "हमारी सरकार राज्य में मुस्लिमों की विरासत पेश करने वाले मियां म्यूजियम बनाने की अनुमति नहीं देगी. मेरी समझ में असम के चार अंचल में कोई अलग पहचान और संस्कृति नहीं है, क्योंकि वहां के ज्यादातर लोग बांग्लादेश के प्रवासी हैं. श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र असमिया संस्कृति का प्रतीक है और हम इसमें कोई विकृति नहीं आने देंगे. माफ कीजिएगा विधायक साहब.”
असम में नागरिकता रजिस्टर को लेकर भी विवाद रहा है
सरमा के इस बयान के बाद विवाद बढ़ गया. इसका जवाब देते हुए असम से कांग्रेस सांसद अब्दुल खालिक ने ट्वीट किया, "माफ कीजिएगा हेमंत जी, इन लोगों के पूर्वज तत्कालीन बंगाल से आए थे, जो कि अखंड भारत का अहम हिस्सा था. कृपया सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ मत कीजिए.” विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पत्रकारों से कहा, "श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र की स्थापना संत विद्वान श्रीमंत शंकरदेव के आदर्शों के अनुरूप की गई है और राज्य सरकार उसे बरकरार रखने के लिए कृतसंकल्प है.”
दूसरी ओर, हेमंत बिस्वा सरमा ने अपने रुख में कोई भी नरमी नहीं दिखाई है. विधायी समिति की म्यूजियम बनाने की सिफारिशों के बारे में एक सवाल पर उनका कहना था, "जिस भी समिति ने जो भी रिपोर्ट दी है, वह सिर्फ फाइलों में ही रहेगी. असम सरकार का रुख साफ है, कलाक्षेत्र में कोई भी मियां म्यूजियम नहीं बनेगा.”
विधायी समिति की सिफारिश
दरअसल, मियां म्यूजियम बनाने का प्रस्ताव सबसे पहले इसी साल मार्च में एक विधायी समिति ने सरकार को दिया था. लेकिन कोरोना और लॉकडाउन की वजह से तब वह मुद्दा दब गया था. अब कांग्रेस विधायक ने अपने पत्र में उस समिति की सिफारिशों का हवाला दिया है. असम गण परिषद के एक विधायक की अध्यक्षता वाली उक्त समिति में बीजेपी के भी छह विधायक शामिल थे. असम गण परिषद राज्य की साझा सरकार में बीजेपी की सहयोगी है.
उसके बाद कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के समर्थन से राज्यसभा में पहुंचे पत्रकार अजीत कुमार भुइयां ने भी अपने एक ट्वीट में कहा है, "शिक्षा मंत्रालय से संबद्ध स्थायी समिति ने ही चर-चापोरी म्यूजियम की सिफारिश की थी. समिति के अधिकांश सदस्य बीजेपी और उसके सत्तारूढ़ गठबंधन से हैं. बहुमत से एक सिफारिश पारित करने के बाद बीजेपी पूरे मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए राजनीतिकरण कर रही है. यह बेहद शर्मनाक है.”
हालांकि अहमद के पत्र में भी उक्त समिति की सिफारिशों का जिक्र है. लेकिन भुइयां ने अपने ट्वीट में साफ किया कि जिस 15 सदस्यीय समिति ने उक्त सिफारिश की थी उसमें बीजेपी के छह सदस्यों के अलावा असम गण परिषद और बोडोलैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट के दो-दो विधायक भी शामिल थे. कांग्रेस के जिस शर्मन अली ने म्यूजियम के बारे में पत्र लिखा है वह भी उसी समिति के सदस्य हैं.
क्या है चर इलाका
राज्य में पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा से लगे मुस्लिम बहुल इलाकों को चर यानी तटवर्ती इलाका कहा जाता है. यह इलाका हर साल बाढ़ की चपेट में रहता है. पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश से लगी सीमाओं की वजह से यहां की संस्कृति और भाषा पर भी उसका असर नजर आता है. करीब 3.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले इस इलाके की आबादी 25 लाख है. यहां रहने वाले मुस्लिम तबके के लोगों को हेय निगाहों से देखा जाता है और उनके लिए मियां संबोधन का इस्तेमाल किया जाता है.
इस इलाके में असमिया से ज्यादा बांग्ला संस्कृति का असर है. इस इलाके में बांग्लादेश से घुसपैठ के आरोप लगते रहे हैं और यह मुद्दा असम की राजनीति में सबसे विवादास्पद रहा है. घुसपैठ के मुद्दे पर अस्सी के दशक की शुरुआत में छह साल लंबा असम आंदोलन भी हो चुका है. उसके बाद भी एनआरसी और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दे इसी विवाद पर केंद्रित रहे हैं. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रंजीत दास कहते हैं, "विधायी समिति की ओर से ऐसी सिफारिश के बावजूद सरकार उसे स्वीकार नहीं कर सकती. उक्त 15-सदस्यीय समिति में बीजेपी के दस सदस्य जरूर हैं. लेकिन जिस बैठक में उक्त प्रस्ताव पारित हुआ था उसमें कुल पांच सदस्य ही मौजूद थे. उनमें से तीन बीजेपी के थे.”
इतिहासकार अंकुर तामुलू फूकन कहते हैं, "इस समुदाय ने म्यूजियम के जरिए अपनी पहचान और विरासत को दर्शाने की मांग उठाई है. लेकिन असमिया मूल के लोग चाहते हैं कि ब्रह्मपुत्र घाटी में रहने वाले बंगाली मुस्लिम भी असमिया के तौर पर पहचाने जाएं और उनका कोई अलग सांस्कृतिक एजेंडा नहीं हो.” वह कहते हैं कि म्यूजियम की मांग में कोई बुराई नहीं है. लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं होगा. इससे विभिन्न तबकों के बीच दूरियां बढ़ने का अंदेशा है. इस समुदाय के सबसे बड़ी साहित्यिक संस्थान चर चापोरी साहित्य परिषद के अध्यक्ष हफीज अहमद कहते हैं, "अगर हमने भी असमिया संस्कृति अपना ली तो हमारी सांस्कृतिक विरासत का क्या होगा? हमारी भी संस्कृति व परंपराएं काफी समृद्ध हैं. ऐसे में म्यूजियम की स्थापना की मांग जायज है.”(dw.com)
क्रिकेट में कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी बल्लेबाज़ की तूफ़ानी पारी भी उसकी टीम के सिर पर जीत का सेहरा नहीं बांध पाती. अबू धाबी में खेले गए आईपीएल टूर्नामेंट के 50वें मुक़ाबले में ऐसा ही हुआ.
पहले ही ओवर में मनदीप सिंह के आउट होने के बाद जब क्रिस गेल बल्लेबाज़ी करने आए, तो उन्होंने कप्तान के.एल राहुल को भरोसा दिलाया और आख़िरी ओवर तक राजस्थान रॉयल्स के गेंदबाज़ों की नाक में दम करके रखा.
20वें ओवर की चौथी गेंद पर आउट होने से पहले क्रिस गेल ने किंग्स इलेवन पंजाब का स्कोर 184 रनों पर पहुंचाया. अपने बल्ले की ताक़त दिखाते हुए क्रिस गेल ने आठ छक्के और छह चौके मारकर 99 रन बनाए.
उन्हें इस बात का बड़ा मलाल हुआ कि एक रन से शतक से चूक गए, लेकिन संतोष इस बात का भी था कि राजस्थान रॉयल्स को बड़ी चुनौती देने में कामयाब हुए.
पर उनकी इस चुनौती पर किंग्स इलेवन पंजाब के गेंदबाज़ों ने ही पानी फेर दिया जो राजस्थान रॉयल्स के बल्लेबाज़ों पर शिकंजा कसने में नाकाम हुए.
चार ओवर, 32 रन और दो विकेट- ये थी बेन स्टोक्स की गेंदबाज़ी. फिर जब बल्लेबाज़ी की बारी आई तो बेन स्टोक्स ने तीन छक्के और छह चौके की मदद से 26 गेंदों में 50 रन बना डाले.
राजस्थान रॉयल्स का जब पहला विकेट 60 रन के स्कोर पर गिरा, उसमें 50 रन बेन स्टोक्स के ही थे.
बेन स्टोक्स के इस ऑल-राउंडर प्रदर्शन से राजस्थान रॉयल्स को विजय और उन्हें 'मैन ऑफ़ द मैच' का ख़िताब मिला.
बेन स्टोक्स ने किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान के.एल राहुल और निकोलस पूरन जैसे बल्लेबाज़ों को पवैलियन भेजा, जो क्रिस गेल के साथ साझेदारी करके राजस्थान रॉयल्स को 185 रनों से भी बड़ी चुनौती दे सकते थे.
अपने बल्ले के बूते क्रिस गेल इस मुक़ाबले में 'मैन ऑफ़ द मैच' के हक़दार बन सकते थे, लेकिन बेन स्टोक्स के ऑल-राउंडर प्रदर्शन और किंग्स इलेवन पंजाब की हार के साथ उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया.
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इस कहावत को राजस्थान रॉयल्स के बल्लेबाज़ों ने चरितार्थ करके दिखाया.
क्रिस गेल की तूफ़ानी पारी किंग्स इलेवन पंजाब के काम नहीं आ सकी, क्योंकि राजस्थान रॉयल्स के बल्लेबाज़ों ने कंधे से कंधा मिलाकर रन बनाए.
सबसे पहले आउट होने वाले बेन स्टोक्स 50 रन बनाकर पवैलियन लौटे तो उनके बाद रॉबिन उथप्पा ने 30 और फिर संजू सैमसन ने 48 रनों का योगदान देकर क्रिस गेल की मेहनत पर पानी फेर दिया.
रही-सही कसर स्टीव स्मिथ ने 31 और जोस बटलर ने 22 रन बनाकर पूरी कर दी.
वहीं किंग्स इलेवन पंजाब के मनदीप सिंह अपना खाता भी नहीं खोल पाए थे, जबकि ग्लेन मैक्सवेल छह और दीपक हुडा एक रन का ही योगदान दे पाए.
कप्तान के.एल राहुल ने 46 और निकोलस पूरन ने 22 रन ज़रूर बनाए, लेकिन राजस्थान के 'रॉयल' बल्लेबाज़ पांच उंगलियों से बनने वाली मुट्ठी के समान ताक़तवर साबित हुए.
बहरहाल इस मुक़ाबले में हार के बावजूद अंक तालिका में किंग्स इलेवन पंजाब चौथे पायदान पर आ गया है. वहीं मुक़ाबला जीतकर भी राजस्थान रॉयल्स पांचवें स्थान पर है.
दोनों टीमों के 12-12 अंक हैं. समान अंक के बावजूद किंग्स इलेवन पंजाब बेहतर नेट-रनरेट की बदौलत अंक तालिका में राजस्थान रॉयल्स से एक पायदान ऊपर है.(bbc)
दुबई, 31 अक्टूबर । दिल्ली कैपिटल्स आज यहां दुबई इंटरनेशनल स्टेडियम में होने वाले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 13वें सीजन के अपने अगले मैच में मुंबई इंडियंस से भिड़ेगी।
चेन्नई सुपर किंग्स को गुरुवार को मिली जीत के साथ का प्लेऑफ में स्थान पक्का हो गया है। अब मुंबई, दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ उतरेगी और दिल्ली का लक्ष्य भी प्लेऑफ में पहुंचना होगा। दिल्ली के 12 मैचों में 14 अंक हैं। मुंबई को मात दे उसके 16 अंक हो जाएंगे और वह भी लगभग प्लेऑफ में जगह बना लेगी।
प्लेऑफ में भी जगह बनाने के बावजूद मुंबई इस मैच को हल्के में नहीं लेगी क्योंकि उसकी कोशिश शीर्ष-2 में रहते हुए लीग दौर का अंत करने को होगी। इससे फायदा यह होगा कि अगर वह प्लेऑफ में क्वालीफायर-1 में हार भी जाती है, तो उसे फिर क्वालीफायर-2 में खेलने का मौका मिलेगा, जिसे जीत वह फाइनल में जा सकती है।
आईपीएल में हर टीम की कोशिश होती है को वह शीर्ष-2 में रहते हुए लीग चरण का अंत करे और दिल्ली भी इसी फिराक में होगी। लेकिन कितना सफल रहती है, यह अंत में पता चलेगा।
मुंबई ने बीते तीन मैच बिना रोहित शर्मा के खेले हैं। उनकी जगह कीरन पोलार्ड ने शानदार कप्तानी की है और बाकी बल्लेबाजों ने रोहित की कमी महसूस नहीं होने दी है, खासकर ईशान किशन और सूर्यकुमार यादव ने। सूर्यकुमार ने रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर के खिलाफ जो पारी खेली थी उसने सूर्यकुमार को एक अलग जगह खड़ा कर दिया है।
वह लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और रोहित के जाने के बाद जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर ले ली है। ईशान को रोहित की गैर मौजूदगी में क्विंटन डी कॉक के साथ पारी की शुरूआत के लिए भेजा जा रहा है। यह युवा बल्लेबाज इसमें भी खरा उतरा है।
हार्दिक पांड्या ने भी अपना रोद्र रूप दिखाया है। पोलार्ड और पांड्या के भाई क्रूणाल भी रन बना रहे हैं। लेकिन क्या दिल्ली की मजबूत गेंदबाजी के सामने यह सभी अपनी फॉर्म को जारी रख पाएंगे, वो भी तब जब दिल्ली प्लेऑफ में जाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने के लिए तैयार है।
दिल्ली की गेंदबाजी ही नहीं बल्लेबाजी भी मजबूत है, लेकिन पिछले कुछ मैचों में उसके लिए कुछ भी अच्छा नहीं रहा है। उसे सिर्फ हार ही मिली है। इसलिए अब जीत के रास्ते पर वापसी करना उसके लिए बेहद जरूरी हो गया है।
सभी खिलाड़ी टूर्नामेंट के आखिरी दौर की जरूरत को जानते हैं। इसलिए दिल्ली एक जख्मी शेर की भांति हो गई है जो बेहद खतरनाक है।
पृथ्वी शॉ का टीम में लौटना जरूरी हो गया है। शिखर धवन के साथ उनकी जोड़ी ने दिल्ली को अच्छी शुरूआतें दी हैं। मध्य क्रम से लेकर सलामी बल्लेबाज तक अपनाए जाने वाले अजिंक्य रहाणे इस सीजन चल ही नहीं रहे हैं। बल्लेबाजी में टीम धवन, कप्तान श्रेयस अय्यर, मार्कस स्टोयनिस, ऋषभ पंत और शिमरन हेटमायेर पर निर्भर है।
गेंदबाजी में कैगिसो रबादा, तुषार देशपांडे और एनरिक नॉर्खिया पर मुंबई के तूफानी आक्रमण को रोकने की जिम्मेदारी होगी। रविचंद्रन अश्विन और अक्षर पटेल की स्पिन जोड़ी मुंबई के बल्लेबाजों को परेशान कर सकती है।
मुंबई का गेंदबाजी आक्रामण भी काफी मजबूत है। जसप्रीत बुमराह, ट्रेंट बोल्ट और पैट कमिंस पूरी तैयारी से दिल्ली के बल्लेबाजों को रोकने उतरेंगे। इन सभी के अलावा, लेग स्पिनर राहुल चहर भी दिल्ली के बल्लेबाजों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
टीमें (सम्भावित:)
दिल्ली कैपिटल्स : श्रेयस अय्यर (कप्तान), अजिंक्य रहाणे, एलेक्स कैरी, पृथ्वी शॉ, ऋषभ पंत (विकेटकीपर), शिखर धवन, शिमरन हेटमायेर, अक्षर पटेल, ललित यादव, मार्कस स्टोयनिस, कीमो पॉल, आवेश खान, हर्षल पटेल, कैगिसो रबादा, मोहित शर्मा, रविचंद्रन अश्विन, संदीप लामिछाने, एनरिक नॉर्खिया, तुषार देशपांडे।
मुंबई इंडियंस : रोहित शर्मा (कप्तान), आदित्य तारे (विकेटकीपर), अनमोलप्रीत सिंह, अनुकूल रॉय, क्रिस लिन, धवल कुलकर्णी, दिग्विजय देशमुख, हार्दिक पांड्या, ईशान किशन, जेम्स पैटिनसन, जसप्रीत बुमराह, जयंत यादव, कीरन पोलार्ड, क्रूणाल पांड्या, मिशेल मैक्लेंघन, मोहसिन खान, नाथन कुल्टर नाइल, प्रिंस बलवंत राय, क्विंटन डी कॉक (विकेटकीपर), राहुल चहर, सौरभ तिवारी, शेरफाने रदरफोर्ड, सूर्यकुमार यादव, ट्रेंट बोल्ट।(आईएएनएस/ग्लोफैंस)
ह्यूस्टन, 31 अक्टूबर | अमेरिका के टेक्सस राज्य में इस साल 3 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए शुरुआती मतदान की संख्या 2016 के चुनाव में हुए कुल मतदान के पार निकल चुकी है।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट में टेक्सास ट्रिब्यून के हवाले से बताया कि 13 अक्टूबर से 29 अक्टूबर के बीच 90,09,850 मतदाता मतदान कर चुके हैं, जो कि यहां के पंजीकृत मतदाताओं का 53 प्रतिशत है। अभी शुरुआती मतदान का एक दिन बाकी है। जबकि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए टेक्सस से 89,69,226 मतदान हुआ था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव के दिन के वोट और मेल के जरिए आने वाले मतपत्रों की कुल संख्या इस बार के चुनाव में मतदान का रिकॉर्ड तोड़ सकती है। संभावना है कि यह 1990 के दशक के बाद पहली बार यह 60 फीसदी मतदान के रिकॉर्ड को पार कर जाएगी।
वोटों में आया ये उछाल शुरुआती मतदान में मतदाताओं के बड़ी संख्या में मतदान करने के कारण है और टेक्सस के शहरी और उप-नगरीय काउंटी में मतदाताओं के पंजीकरण में बढ़ोतरी के कारण हुआ है।
30 अक्टूबर को टेक्सास में शुरुआती मतदान का आखिरी दिन है। हैरिस काउंटी स्थित टेक्सास के सबसे बड़े शहर ह्यूस्टन में सभी 122 प्रारंभिक मतदान स्थल शाम 7 बजे (स्थानीय समय) तक खुले रहेंगे। स्थानीय अधिकारियों ने कोविड-19 महामारी के कारण लोगों को सुरक्षा उपायों के साथ मतदान करने के लिए प्रोत्साहित किया।
स्थानीय मीडिया ने हैरिस काउंटी के क्लर्क क्रिस हॉलिन्स के हवाले से कहा, "हम जानते हैं कि मेल द्वारा मतदान करना मतदान का सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक तरीका है, लेकिन हैरिस काउंटी के हजारों निवासी जो इसके योग्य नहीं थे उनके लिए हमने मतदान करने के और अधिक मौके दिए। टेक्सास के लोगों ने बेहद सुरक्षित तरीके से मतदान किया।"(आईएएनएस)
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक सीमा होती है और इसका अर्थ ये कतई नहीं कि दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचाई जाए.
इमरान ख़ान ने कहा, "इस्लाम को मानने वालों में पैग़ंबर मोहम्मद को लेकर जो भावनाएं हैं उसके बारे में पश्चिमी देशों के लोगों को कोई जानकारी नहीं है."
उन्होंने इसे मुसलमान बहुल देशों के नेताओं की नाकामी बताया और कहा कि ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो दुनिया भर में इस्लाम के विरोध (इस्लामोफ़ोबिया) के मुद्दे पर चर्चा करें.
उन्होंने कहा कि ज़रूरत पड़ने पर वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाएंगे.
इमरान ख़ान शुक्रवार को इस्लामाबाद में ईद-उल-मिलाद के मौक़े पर आयोजित एक कॉन्फ्रेस में बोल रहे थे.
फ़्रांस और मुसलमान देशों के बीच जारी तनाव को लेकर उन्होंने कहा, "मैंने इस्लामिक देशों के समूह में सभी से कहा है कि पश्चिम में इस्लामोफ़ोबिया बढ़ रहा है और इस समस्या के समाधान के लिए सभी मुसलमान देशों को एक साथ आने और इसके बारे में चर्चा छेड़ने की ज़रूरत है."
"इस्लामोफ़ोबिया के कारण सबसे अधिक वो लोग प्रभावित होते हैं जो किसी देश में मुसलमान अल्पसंख्यक आबादी का हिस्सा हैं."
मैक्रों को लेकर तुर्की के बाद ईरान-पाकिस्तान ने खोला मोर्चा
इमरान ख़ान ने कहा, "पश्चिमी देश इस्लाम, पैग़ंबर और मुसलमानों के संबंध को नहीं समझ सकते. उनके पास वो किताबें नहीं हैं जो हमारे पास हैं. इसलिए वो इसे नहीं समझ सकते हैं."
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश मानते हैं कि मुसलमान अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ हैं और संकीर्ण मानसिकता वाले हैं. इसके विरोध में कैंपेन चलाए गए हैं.
उन्होंने कहा, "एक छोटा तबका है जो इस्लाम के विरोध में है और इसे बड़ी बुरी नज़र से देखना चाहता है. हमें दुनिया को ये बताना चाहिए कि ये मुसलमानों के लिए परेशान करने वाला है."
उन्होंने कहा शार्ली एब्दो जैसी घटना के पीछे कुछ ऐसे ही लोग हैं जो मुसलमानों को बुरा दिखाना चाहते हैं.
इमरान ख़ान ने कहा कि वो देश में कक्षा नौ से बारह तक के छात्रों के पाठ्यक्रम में इस्लाम के पैग़ंबरों के बारे में जानकारी शामिल करने के लिए क़ानून लाएंगे, ताकि छात्रों को भी इस्लाम के बारे में जानकारी मिले.
इसी कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान प्राशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री रज़ा फ़ारुक़ हैदर भी मौजूद थे. उन्होंने प्रदेश में सभी प्रकार के फ़्रांसीसी सामान के बहिष्कार की अपील की.
इस्लाम पर फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बयान को लेकर शुक्रवार को पाकिस्तान में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए.
शुक्रवार को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में मौजूद फ़्रांसीसी दूतावास के सामने भी विरोध प्रदर्शन हुए और फ़्रांस के सामानों के बहिष्कार की अपील की गई.
यहां लोगों की भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोल दाग़ने पड़े.
कराची में भी क़रीब 10,000 लोगों ने जुमे की नमाज़ के बार फ़्रांसीसी रष्ट्रपति के विरोध में नारे लगाए.
पाकिस्तान में फ्रांसीसी राष्ट्रपति का विरोध
गुरुवार को मध्य प्रदेश के भोपाल के इक़बाल मैदान में हज़ारों की तादाद में मुसलमानों ने फ़्रांस का विरोध किया और फ़्रांसीसी झंडा भी जलाया.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार शुरैह नियाज़ी के अनुसार इस मौक़े पर मौजूद कांग्रेस के विधायक आरिफ मसूद ने भारत सरकार से अपना राजदूत बुलाने की मांग की.
इस घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार हरकत में आई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इस मामले में 188 IPC के तहत मामला दर्ज किया जाएगा और किसी को भी बख़्शा नहीं जाएगा.
शुक्रवार को बांग्लादेश में फ़्रांस विरोधी प्रदर्शन हुए जिसमें सैंकड़ों लोग शामिल हुए.
राजधानी ढाका की बैतुल मुकर्रम मस्जिद के सामने बांग्लादेश की सैंकड़ों आम लोगों समेत कई राजनीतिक पार्टियों के लोग भी शामिल हुए. लोगों के हाथों में जो प्लेकार्ड थे उन पर इमैनुएल मैक्रों के बारे में लिखा था कि वो "शांति का दुश्मन" हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार पुलिस ने कहा है कि ढाका में हुए विरोध प्रदर्शन में 12,000 लोग शामिल हुए. हालांकि आयोजकों का दावा है कि 40,000 लोगों ने इन प्रदर्शनों में शिरकत की.
फ़लस्तीन में फ़्रांसीसी राष्ट्रपति का विरोध कर रहे फ़लस्तीनियों और इसराइली सीमा पुलिस के बीच झड़प होने की ख़बर है.
फ़लस्तीन की अल अक्सा मस्जिद के सामने हज़ारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए. वहीं गज़ा में राष्ट्रपति मैक्रों का पुतला जलाया गया.
अल अक्सा मस्जिद के सामने आए एक प्रदर्शनकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "फ़्रांस में हिंसा की जो घटनाएं हो रही हैं हम उसके लिए फ़्रांस के राष्ट्रपति को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनके बयान के कारण ये सब हो रहा है."
हमास के एक अधिकारी नासिम यासिन कहते हैं, "हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि पैग़ंबर मोहम्मद हमारे लिए उस रेखा की तरह हैं जिनकी कोई अवमानना नहीं कर सकता. जो उनका अपमान करे उसे सज़ा मिलनी चाहिए."
मस्जिद के आहते में मौजूद प्रदर्शकारियों को इसराइली सीमा पुलिस ने वहां से जाने के लिए कहा.
फ़्रांस और इस्लाम पर क्यों हो रही है चर्चा?
इसी महीने फ़्रांस में पैग़ंबर मोहम्मद के एक कार्टून को दिखाने वाले टीचर सैमुअल पेटी पर हमला कर एक व्यक्ति ने उनका गला काट दिया. इसके बाद फ़्रांस में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए.
फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पैग़ंबर मोहम्मद के विवादित कार्टून दिखाने के टीचर के फ़ैसले का बचाव किया और कहा कि वे मुसलमान कट्टरपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करेंगे.
उन्होंने कहा फ़्रांस के अनुमानित 60 लाख मुसलमानों के एक अल्पसंख्यक तबक़े से "काउंटर-सोसाइटी" पैदा होने का ख़तरा है. काउंटर सोसाइटी या काउंटर कल्चर का मतलब एक ऐसा समाज तैयार करना है जो कि उस देश के समाज की मूल संस्कृति से अलग होता है.
इमैनुएल मैक्रों के इस फ़ैसले से कई मुसलमान बहुल देश नाराज़ हैं.
सोमवार को पाकिस्तान और ईरान की संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर मैक्रों की आलोचना की. पाकिस्तान की संसद ने तो फ़्रांस से अपना राजदूत वापस बुलाने की माँग की.
जबकि ईरान की संसद का कहना है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर पैग़ंबर मोहम्मद का अपमान फ़्रांसीसी सरकार के रुख़ पर सवाल उठाता है.
कई देशों ने फ़्रांसीसी सामान के बहिष्कार की भी अपील की. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कहा, "अगर फ़्रांस में मुसलमानों का दमन होता है तो दुनिया के नेता मुसलमानों की सुरक्षा के लिए आगे आएँ. फ़्रांसीसी लेबल वाले सामान न ख़रीदें."
उन्होंने कहा कि फ़्रांस में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ऐसा ही अभियान चलाया जा रहा है, जैसा दूसरे विश्व युद्ध से पहले यहूदियों के ख़िलाफ़ चलाया गया था.(bbc)
महाराज तंत्र V /S लोकतंत्र
28 सीटों पर चुनाव का खर्च कई करोड़ में है। इस खर्च की भरपाई आपकी जेब से ही होगी। आप पर सरकार और टैक्स थोपेगी। सरकार गिराने में जो पैसा लगा होगा उसकी भरपाई सरकार अपने करीबी व्यापारियों को खुलेआम कालबाज़ारी करने की छूट करके देगी। इस नुकसान को भी समझिये।
एक नवंबर मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस। इस बार ये कुछ अलग है। मध्यप्रदेश में स्थापना दिवस के दो दिन बाद मतदान है। क्योंकि लोकतंत्र की चुनी हुई सरकार गिरा दी गई। 22 विधायकों ने एक साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा का साथ दिया। कमलनाथ का इस्तीफा और शिवराज बने मुख्यमंत्री। इस सब मे विधायकों की बिक्री का मामला उठा। गद्दार और बिकाऊ हवा में गूंज रहा है।
प्रदेश की 28 सीटों पर जनता के पास मौका है इस स्थापना दिवस पर प्रदेश में अपनी ताकत दिखाने का। लोकतंत्र को बचाने का। उसे फिर से स्थापित करने का। आखिर जो 22 विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के इशारे पर भाजपा में चले गए, उनको आपने ही चुना था। आपके वोट का ऐसा अपमान। प्रदेश की जनता ने उन्हें पांच वर्ष के लिए चुना था। फिर वे कैसे मतदाता से गद्दारी कर सकते हैं। ये महाराज तंत्र नहीं लोकतंत्र है। इस महाराज तंत्र को मिटाकर लोकतंत्र को खड़ा करना आपकी जिम्मेदारी है।
प्रदेश में ये गद्दारी का तीसरा अवसर है। पहले अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सिंधिया खानदान ने देश से गद्दारी की। दूसरा आज़ाद भारत में भी मध्यप्रदेश में पहला दलबदल और सरकार गिराने का काम भी महल के इशारे पर हुआ। राजमाता सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत कर संविद सरकार बनवाई। अब तीसरी बार फिर प्रदेश में चुनी हुई सरकार गिराई गई। इस बार चुनी हुई सरकार गिराकर लोकतंत्र की हत्या की ज्योतिरादित्य सिंधिया ने।
जनादेश का अपमान किसी भी प्रदेश के मतदाता के लिए एक अपमान है। जनादेश को ठुकराने वालों को ठोकर जरुरी है। प्रदेश में यदि आ इस तरह से लोकतंत्र के बिकने को नहीं रोका गया तो पूरे देश में हम भी बिहार, उत्तरप्रदेश और कर्नाटक के जैसे कलंकित प्रदेश कहलायेंगे। जरुरी है कि प्रदेश को ऐसी राजनीति से बचाकर इसकी स्वच्छ छवि को बरक़रार रखा जाए।
ये मामला सिर्फ 22 विधायकों की टूट का नहीं है। ये सत्ता की भूख, निजी स्वार्थ का है। आखिर कौन भरोसा करेगा इस बात पर कि उसूल और जनता के दर्द को दूर करने के लिए विधायकी और मंत्री पद छोड़ दिया। पद छोड़ने वाले फिर पद के लिए दौड़ नहीं लगाते। दौड़ तो छोड़िये इस वक्त पद की वापसी के लिए आपने लोगों के चरणों में लौटते हुए मंत्री भी देखे होंगे। क्या उसूल वाले ऐसे चरणों में लौटते हैं।
पद का त्याग नहीं ये पद की पैसो की लालसा का मामला है। त्याग ही करना था तो पद छोड़कर कांग्रेस में ही रहते। दूसरे दल में क्यों जाने की जरुरत पड़ी ? यदि आपमें इतना ही त्याग है तो इस्तीफा देकर निर्दलीय लड़ते। देखते तो जनता आपको कितना त्यागी मानती है। सबसे बड़ी बात बिना विधायक बने मंत्री बनने की के जरुरत थी। थोड़ा रुक जाते। जनता का फैसला तो सुन लेते।
प्रदेश की राजनीति का ये अब तक का सबसे गन्दा दौर है। अगर इसे आज नहीं रोका गया तो आज हम सिर्फ बिकाऊ के नारे लगा रहे हैं। भविष्य में हिंसा और धमकी के दम पर प्रदेश में विधायकों को बंधक बनाकर अपनी तरफ किया जाएगा। जनता जिसे हरा देगी उसे खरीदकर जीतने की इस परम्परा को रोकना प्रदेश के हर व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए। वोट देते वक्त एक बार प्रत्याशी की गद्दारी का चेहरा जरूर देखिये।
मध्यप्रदेश में ये जो तख्ता पलट हुआ है। इसके राजनीतिक मायने छोड़ दीजिये। एक तटस्थ मतदाता, नागरिक के तौर पर इसे देखिये। क्या कांग्रेस की सरकार गिरने से कुछ बदलाव हुआ। आधे से ज्यादा मंत्री तो अब भी वही हैं जो उस सरकार में थे। ये वही मंत्री हैं जिनपर भाजपा हमेशा भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रही। भाजपा में आते ही ये सब मर्यादा पुरुष और बेचारे कैसे हो सकते हैं।
पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक ), इंदौर
मुंबई, 31 अक्टूबर | मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की तस्वीर पाए जाने के कुछ देर बाद ही, मुंबई पुलिस ने इसे सड़क से हटा दिया। अधिकारियों ने यहां शुक्रवार को यह जानकारी दी। पोस्टर कुछ अज्ञात लोगों ने लगाए थे, जिसका वीडियो कुछ लोगों ने बना लिया। सोशल मीडिया में वायरल हुए इन वीडियोज में लोगों और वाहनों को तस्वीर के ऊपर से गुजरते देखा जा सकता है।
घटना की जानकारी मिलने के बाद पयधोनी पुलिस स्टेशन की एक टीम सड़क पर पहुंची और पोस्टर को हटा दिया। इस मामले में कोई केस दर्ज नहीं किया गया है, क्योंकि पुलिस शुक्रवार दोपहर ईद मिलाद उन नबी जुलूस की वजह से काफी व्यस्त थी।
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों हाल ही में मोहम्मद के कार्टून और आतंकवादी घटनाओं के सिलसिले में दिए अपने बयानों की वजह से विश्वभर में मुस्लिमों के निशाने पर आ गए हैं।
इस बीच, भाजपा नेता अतुल भटकेलकर ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से फ्रांस के राष्ट्रपति के पोस्टर को सड़क पर चिपकाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया है।
--आईएएनएस


