भोपाल, 17 जनवरी | मध्य प्रदेश के अनेक हिस्सों में कौओं के साथ अन्य पक्षियों की मौत हो रही है, अब तो राज्य के 51 जिलों में से 28 जिलों के पक्षियों में बर्ड फ्लू की पुष्टि हो चुकी है। वहीं कई स्थानों पर कुक्कट सामग्री को नष्ट करने का क्रम जारी है। झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गों को भी नष्ट किया गया है। राज्य के बड़े हिस्से में कौओं और अन्य जंगली पक्षियों की मौत का सिलसिला जारी है। छतरपुर जिले के हरपालपुर में भी मृत पाए गए कौओं में एच5एन8 वायरस की पुष्टि होने के साथ प्रदेश में बर्ड फ्लू से प्रभावित जिलों की संख्या 28 हो गयी है। प्रदेश में अभी तक इंदौर, आगर-मालवा, मंदसौर, नीमच, खंडवा, खरगोन, देवास, गुना, उज्जैन, शिवपुरी, राजगढ़, शाजापुर, विदिशा, दतिया, अशोकनगर, बड़वानी, होशंगाबाद, भोपाल, झाबुआ, हरदा, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, डिंडोरी, मंडला, सागर, धार और सतना में पक्षियों में एच5एन8 वायरस की पुष्टि हो चुकी है।
राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा रोग अनुसंधान प्रयोगशाला भोपाल द्वारा राज्य के बड़े हिस्से में बर्ड फ्लू की पुष्टि के बाद सरकार और प्रषासन की चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत शासन द्वारा जारी एडवाइजरी के अनुसार सभी प्रभावित जिलों में एवियन इनफ्लूएंजा से बचाव, रोकथाम और नियंत्रण के उपाय करने के निर्देश दिये गये हैं।
राज्य के पशु चिकित्सा अधिकारियों से पोल्ट्री एवं पोल्ट्री उत्पाद बाजार, फार्म, जलाशयों एवं प्रवासी पक्षियों पर विशेष निगरानी रखने के साथ मुर्गियों का नियमित सर्विलांस करने के निर्देश दिये गये हैं। सभी जिलों में कंट्रोल रूम की स्थापना के साथ रैपिड रिस्पांस टीमों का गठन कर दिया गया है। नियंत्रण एवं शमन कार्य में संलग्न अमले द्वारा पीपीई किट पहनकर एंटी वायरल ड्रग के बाद कार्यवाही की जा रही है। पोल्ट्री एवं पोल्ट्री उत्पाद बाजार में बायो सिक्युरिटी मापदंडों का पालन किया जा रहा है।
झाबुआ जिले के ग्राम रूंडीपाड़ा में कड़कनाथ मुर्गी में एच5एन1 वायरस मिला है। प्रभावित स्थल से एक किलोमीटर की परिधि को संक्रमित क्षेत्र मानते हुए सभी प्रकार के कुक्कुट की कलिंग (नष्ट) की जा रही है। वहीं एक से नौ किलोमीटर की परिधि को सर्विलांस जोन मानते हुए सेम्पल कलेक्शन किया जा रहा है। संक्रमित क्षेत्र में अगले तीन माह तक कुक्कुट और कुक्कुट उत्पाद की रिस्टाकिंग और कुक्कुट परिवहन पर प्रतिबंध रहेगा। झाबुआ जिले के कुक्कुट बाजार और पोल्ट्री फार्मों को संक्रमण रहित किया जायेगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि झाबुआ के थांदला क्षेत्र के रूंपीपाड़ा स्थित विनेाद के फार्म हाउस में मृत कड़कनाथ के शव के नमूने जांच के लिए भेजे गए थे, उसकी रिपोर्ट आ गई है। यह वह फार्म है जिससे दो हजार चूजे का आर्डर क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी ने दिया था। बर्ड फ्लू के कारण ही केरल सहित अन्य दक्षिण भारत के राज्यों से कुक्कुट सामग्री के परिवहन को प्रतिबंधित किया गया है। वहीं इंदौर, नीमच व आगर मालवा के चिन्हित स्थानों पर कुक्कुट कारोबार को एक सप्ताह के लिए बंद किया गया।
नई दिल्ली, 17 जनवरी | भारतीय क्रिकेट टीम के आलराउंडर हार्दिक पांडया ने अपने पिता के निधन के एक दिन बाद ही सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट किया है। हार्दिक और उनके भाई क्रुणाल पांडया के पिता हिमांशु पांड्या का दिल का दौरा पड़ने से शनिवार सुबह निधन हो गया था। वह 71 साल के थे।
हार्दिक के बड़े भाई क्रुणाल सैयद मुश्ताक अली टॉफी में बड़ौदा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। वह बायो बबल से निकल कर टीम को छोड़कर घर रवाना हो गए थे। क्रुणाल अपने परिवार के पास चले गए।
हार्दिक ने इंस्टाग्राम पर एक भावुक पोस्ट करते हुए लिखा, " मेरे पिता, मेरे हीरो। आपको खो देने की बात को मानना जिंदगी की सबसे कठिन चीजों में से एक है। लेकिन आपने हमारे लिए इतनी बड़ी यादें छोड़ दी हैं कि हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि आप मुस्कुरा रहे हैं।"
उन्होंने आगे लिखा, "आपके बेटे जहां खड़े हैं, वे आपकी मेहनत और आत्मविश्वास की वजह से हैं। आप हमेशा खुश थे। अब इस घर में आपके न होने से इंटरटेनमेंट कम होगा। हम आपसे बहुत प्यार करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। आपका नाम हमेशा टॉप पर रहेगा। मुझे एक बात पता है, आप हमें ऊपर से उसी तरह से देख रहे हैं, जिस तरह से आपने यहां किया था।"
हार्दिक ने कहा, "आपको हम पर गर्व था, लेकिन डैडी हम सभी को इस बात पर गर्व है कि आपने हमेशा अपना जीवन जिया! जैसे कि मैंने कल कहा था और एक बार फिर कहूंगा कि मैं आपको अपनी जिंदगी के हर दिन मिस करूंगा। लव यू डैडी।"
पांडया बंधुओं के पिता के निधन पर भारतीय कप्तान विराट कोहली, इरफान पठान और आकाश चोपड़ा ने शोक व्यक्त किया है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी | कांग्रेस ने रविवार को कोविड के टीकों की खरीद पर सवाल उठाया। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार ने बढ़ी हुई कीमत पर कोविड वैक्सीन खरीदी है, बावजूद इसके निर्माताओं ने यह दावा किया था कि वे बिना लाभ के टीकों की आपूर्ति करेंगे। कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा, "मोदी सरकार को भारत बायोटेक के लिए 95 रुपये प्रति डोज से अधिक का भुगतान क्यों करना चाहिए, जोकि सरकार द्वारा संचालित आईसीएमआर के वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता और अनुभव के साथ विकसित किया गया है। साथ ही केवल 755 व्यक्तियों पर परीक्षण किया गया है और चरण-3 परीक्षणों के बाद अभी इसे हरी झंडी दिखाया जाना बाकी है?"
कांग्रेस नेता ने कहा कि इस तरह के टीके की कीमत एस्ट्राजेनेका-सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के कोविशील्ड से सस्ती होनी चाहिए।
उन्होंने पूछा, "खुले बाजार में टीका की कीमत 1,000 रुपये प्रति खुराक क्यों है?"
सुरजेवाला ने कहा, "'कोविशील्ड' एक एस्ट्राजेनेका वैक्सीन है, जो सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा निर्मित है। सीरम इंस्टीट्यूट सरकार को यह वैक्सीन 200 रुपये प्रति डोज में दे रहा है। एस्ट्रेजेनेका बिना किसी लाभ के वैक्सीन की आपूर्ति करने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन की आपूर्ति 295 रुपये प्रति खुराक पर की जा रही है। जाहिर है, कोवैक्सीन को आईसीएमआर के साथ मिलकर भारत बायोटेक द्वारा विकसित किया गया है।"
एसआईआई के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा था कि उनकी कंपनी कोविशील्ड को खुले बाजार में 1,000 रुपये प्रति डोज पर बेचेगी, जो कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक 2 खुराक के लिए 2,000 रुपये है।
सुरजेवाला ने कहा, "क्या हमें भारत की आबादी के टीकाकरण के बिना ही निर्यात की अनुमति देनी चाहिए? कोरोना वैक्सीन फॉर ऑल 'मोदी सरकार की घोषित नीति होनी चाहिए।"
मुंबई, 17 जनवरी | अभिनेता अक्षय कुमार और अभिनेत्री से लेखिका बनीं ट्विंकल खन्ना के वैवाहिक जीवन को रविवार को 20 साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर अभिनेता ने अपनी पत्नी से कहा है कि वह अभी भी उनका दिल धड़काती हैं। अक्षय ने इंस्टाग्राम पर ट्विंकल के साथ एक तस्वीर पोस्ट की है। इसमें अक्षय सफेद शर्ट पहने हुए हैं, जबकि ट्विंकल 'केसरी' स्टार को पीछे से गले लगाई हुई हैं।
अभिनेता ने इस फोटो को कैप्शन दिया, "मेरी अब तक की सबसे पक्की पार्टनरशिप..बीस साल का साथ और तुम अब भी मेरा दिल धड़काती हो। जब भी मेरे आसपास होती हो तो मुस्कुराने का कारण दूर नहीं होता है। हैप्पी एनिवर्सरी टीना।"
अक्षय के इस पोस्ट पर ट्विंकल ने कमेंट में एक लाल दिल वाला इमोजी पोस्ट किया। उन्होंने भी इंस्टाग्राम पर यही तस्वीर शेयर की।
उन्होंने लिखा, "इस पार्टनरशिप में ब्यूटी और ब्राउन (मसल पॉवर या मांसपेशी) आप ही हैं और मैं तो यह भी नहीं कह सकती कि मैं ब्रेन हूं, क्योंकि आप मुझसे ज्यादा स्मार्ट हैं। हमें एक-दूसरे को कंप्लीट करने की जरूरत नहीं है, लेकिन हमें हमेशा एक-दूसरे के आसपास होने की जरूरत है। हैप्पी एनिवर्सरी मिस्टर के.।"
अक्षय और ट्विंकल जनवरी 2001 में शादी के बंधन में बंधे थे। उनके 2 बच्चे- बेटा आरव और बेटी नितारा है।
ब्रिस्बेन, 17 जनवरी | शार्दुल ठाकुर और वॉशिंगटन सुंदर ने यहां के गाबा इंटरनेशनल स्टेडियम में आस्ट्रेलिया के साथ जारी चौथे और अंतिम टेस्ट मैच के तीसरे दिन रविवार को सातवें विकेट के लिए 123 रनों की साझेदारी करके आस्ट्रेलिया को बड़ी बढ़त लेने से रोक दिया। ठाकुर (67) और सुंदर (62) के बीच सातवें विकेट के लिए हुई शतकीय और बहुमूल्य साझेदारी के दम पर भारतीय क्रिकेट टीम ने यहां अपनी पहली पारी में 336 रन का स्कोर बनाया।
ठाकुर ने मैच के बाद कहा, "वे मेरे साथ बातचीत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मैं उनको जवाब नहीं दे रहा था। एक या दो बार मैंने उन्हें एक शब्द में जवाब दिया। यहां तक कि उन्होंने मेरे उपर छींटाकाशी करने की भी कोशिश की, लेकिन मैंने उसे नजर अंदाज कर दिया और अपना खेल जारी रखा।"
ठाकुर ने 115 गेंदों पर नौ चौके और दो छक्के लगाए। सुंदर ने 144 गेंदों पर सात चौके और एक छक्का लगाया।
ठाकुर ने कहा, "हम स्कोर बोर्ड की तरफ नहीं देख रहे थे। हमारी योजना विकेट पर कुछ समय बिताने की थी। हम जानते थे कि उनके गेंदबाज थक रहे थे और यह पहले पहले घंटे की बात थी। इसलिए हमारी योजना थी कि अगर हम उनके गेंदबाजों को और थकाते हैं तो हम मैच में बने रहेंगे। इसलिए हमारे लिए यह जरूरी था कि हम उन्हें थकाएं और कमजोर गेंदों का फायदा उठाएं।"
आस्ट्रेलिया ने इसके जवाब में तीसरे दिन का खेल समाप्त होने तक अपनी दूसरी पारी में बिना किसी नुकसान के 21 रन बना लिए हैं और उसे अब तक 54 रनों की बढ़त हासिल हो चुकी है।
भारत ने आस्ट्रेलिया को उसकी पहली पारी में 369 रनों पर समेट दिया था और इस लिहाज से आस्ट्रेलिया को पहली पारी में केवल 33 रनों की ही बढ़त मिल पाई।
उन्होंने कहा, "जब हम क्रीज पर नए थे तो हम डिफेंड करने की कोशिश कर रहे थे। जैसे जैसे हमारी साझेदारी बड़ी होती हो गई तो हमने शॉट खेलना शुरू कर दिया। हमें पता था कि गाबा में उछाल है और अगर गेंदबाज अपनी लाइन और लैंथ से भटकता है तो हम खराब गेंद पर शॉट खेल सकते हैं।"
बगलकोट (कर्नाटक), 17 जनवरी | केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि केंद्र द्वारा हाल ही में लागू किए गए तीन कृषि कानूनों से किसानों की आय कई गुना बढ़ जाएगी, क्योंकि वे देश में कहीं भी अपनी उपज को किसी को भी उच्चतम मूल्य में बेच पाएंगे। बेंगलुरु से लगभग 475 किलोमीटर दूर कर्नाटक के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र बगलकोट में शाह ने कहा, "कृषि कानून किसानों को उनकी आय को कई गुना बढ़ाने में मदद करेगा, क्योंकि वे अपनी फसल उन्हें बेच सकते हैं,जो उन्हें इसकी सबसे अधिक कीमत देंगे।
दक्षिणी राज्य के अपने दौरे के दूसरे दिन, शहर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज मैदान में एक विशाल सार्वजनिक रैली (जनसेवक समावेश) को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के कल्याण में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध है, जैसा कि सरकार 2014 में छह साल पहले सत्ता में आने के बाद से कर रही है।
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री किसान निधि (पीएम-किसान) योजना के तहत, लाखों किसानों को प्रति वर्ष सीधे उनके बैंक खातों में 6,000 रुपये मिल रहे हैं। भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार द्वारा पहले दिए गए 6 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले किसानों को 13 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया है।"
किसानों का एक वर्ग 26 नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है और इसे निरस्त करने की मांग कर रहा है, शाह ने इस पर कहा कि देश भर में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) को डिजिटल रूप से जोड़ा जाएगा ताकि किसान अपनी उपज सीधे उन लोगों को बेच सकें, जो उन्हें उच्चतम मूल्य प्रदान करते हैं।
यह देखते हुए कि मोदी सरकार पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन में इथेनॉल के बढ़ते उपयोग को बढ़ावा दे रही है, गृह मंत्री ने कहा कि गन्ना उत्पादकों को भी उच्च इथेनॉल उत्पादन से लाभ होगा।
शाह ने राज्य के मंत्री मुरुगेश निरानी के स्वामित्व वाली कंपनियों के निरानी समूह की नई चीनी फैक्ट्री का भी अनावरण किया, जिन्हें 13 जनवरी को बेंगलुरु में कैबिनेट में शामिल किया गया था।
वेलिंगटन, 17 जनवरी | न्यूजीलैंड के ऑलराउंडर जेम्स नीशम बाएं हाथ की ऊंगली का ऑपरेशन किया गया है। क्रिकेट वेलिंगटन ने इसकी जानकारी दी है। क्रिकेट वेलिंगटन ने कहा है कि एक सप्ताह के अंदर विशेषज्ञ चिकित्सक एक बार फिर से नीशम के उंगली की जांच करेंगे। इसके बाद ऐसी उम्मीद है कि वह न्यूजीलैंड में जारी सुपर स्मैश टी-20 टूर्नामेंट में वापसी कर सकते हैं।
क्रिकेट वेलिंगटन ने ट्वीट करते हुए कहा, "जेम्स नीशम की बाएं हाथ की उंगली अनामिका के जोड़ अलग हो गये थे। उनका शनिवार की रात को आपरेशन किया गया। एक सप्ताह के अंदर विशेषज्ञ चिकित्सक एक बार फिर से नीशम के उंगली की जांच करेंगे। इसके बाद ऐसी उम्मीद है कि वह न्यूजीलैंड में जारी सुपर स्मैश टी-20 टूर्नामेंट में वापसी कर सकते हैं।"
नीशम ने न्यूजीलैंड के लिए अब तक 12 टेस्ट, 63 वनडे और 24 टी-20 मैच खेले हैं।
नई दिल्ली, 17 जनवरी | कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने घोषणा की है कि मौजूदा जीएसटी प्रणाली के खिलाफ वो राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करेगा। उसका कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान जब भारत का खुदरा व्यापार दोबारा स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है, तो ऐसी स्थिति में जीएसटी कर प्रणाली में कई मनमाने संशोधनों के कारण इसका स्वरूप विकृत हो गया है और अब यह देश भर के व्यापारियों के जी का जंजाल बन गया है।
इस तरह के संशोधनों का कड़ा विरोध करते हुए कैट ने कहा है कि आगामी 8 से 10 फरवरी तक नागपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में आंदोलन के भविष्य का रूप तय किया जाएगा। देश भर के लगभग 200 प्रमुख व्यापारी नेता सम्मेलन में भाग लेंगे।
कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया एवं राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि देश का व्यापारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनके विभिन्न दूरदर्शी कार्यक्रम के लिए बहुत सम्मान करता है, लेकिन यह बेहद खेदजनक है कि केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों का क्रियान्वयन व्यापारियों के लिए एक बड़ा दर्द बन गया है जिसमें विशेष रूप से देश में जीएसटी की वर्तमान जटिल स्थिति उसके मूल सिद्धांतों का अत्यधिक उल्लंघन है।
कैट ने जीएसटी के विभिन्न प्रावधानों के खिलाफ एक आक्रामक राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है और इसलिए, 8 से 10 फरवरी तक राष्ट्रीय व्यापारी नेता इस आंदोलन की रूप रेखा घोषित करेंगे।
भरतिया और खंडेलवाल ने बताया कि जीएसटी के अलावा कैट के तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में ई-कॉमर्स व्यापार और प्रस्तावित ई-कॉमर्स नीति, महिला उद्यमियों को सशक्त बनाने, मुद्रा योजना का मूल्यांकन, व्यापारियों के लिए वित्त की आसान उपलब्धता, 28 प्रकार के लाइसेंसों के स्थान पर एक लाइसेन्स, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में व्यापारियों की भूमिका, खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत अधिकारियों को दी गई मनमानी शक्तियां, लोकल पर वोकल एवं आत्मनिर्भर भारत का जमीनी स्तर पर सफल क्रियान्वयन, खुदरा व्यापार के लिए राष्ट्रीय व्यापार नीति, राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर पर ट्रेड बोर्ड का गठन, डिजिटल भुगतानों की स्वीकृति, खुदरा व्यापार के मौजूदा प्रारूप का डिजिटलीकरण, आपूर्ति श्रृंखला में एफएमसीजी कंपनियों द्वारा की जा रही विकृतियां जैसे विषयों पर भी गंभीर चर्चा की जाएगी और भविष्य के लिए रूपरेखा तय होगी ।
भरतिया और खंडेलवाल ने कहा कि खुदरा व्यापार लगातार उपेक्षित रहा है, हालांकि यह 80 लाख करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रहा है और देश में 8 करोड़ व्यापारी 40 करोड़ लोगों को रोजगार दे रहे हैं। कैट ने देश में खुदरा व्यापार परि²श्य को बदलने के लिए इन मुद्दों पर आक्रामक रूप से निर्णय लेने का फैसला किया है।
चंडीगढ़, 17 जनवरी | पंजाब के कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने रविवार को केंद्र सरकार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों और इन्हें समर्थन करने वालों के खिलाफ नोटिस देने के मामले में आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस नेता ने कहा, "जो किसान पूरे देश को अपने खून, पसीने से सींचता है, उसे ऐसे धमकी से झुकाया नहीं जा सकता। यह नई दिल्ली में सत्तारूढ़ सरकार के लिए बहुत महंगा साबित होगा।"
रंधावा ने कहा कि एनआईए द्वारा नोटिस दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के आंदोलन को कमजोर करने के लिए भाजपा सरकार द्वारा एक कुटिल चाल का हिस्सा है।
उन्होंने यह भी कहा कि एनडीए सरकार के पिछले साढ़े छह साल के कार्यकाल में यह पहली बार नहीं है कि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उनकी एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है।
वर्तमान दौर को भारत के लोकतंत्र के लिए सबसे अंधकारमय करार देते हुए, उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थानों और स्वतंत्र सरकारी एजेंसियों का संकीर्ण राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि भाजपा अपने विरोधियों को डराने के लिए हथकंडे अपनाती है और अब यह नया शैतानी कदम उनके लिए एक आपदा साबित होगा।
रंधावा ने कहा, "कांग्रेस पार्टी और राज्य सरकार हमेशा किसानों के साथ खड़ी रहेगी और इस तरह की निरंकुश रणनीति का विरोध करेगी। केंद्र के पास इन काले कानूनों को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।"
विशाखापट्टनम, 17 जनवरी | भाजपा की आंध्र प्रदेश इकाई ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गौतम सवांग के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और उन्हें हटाने की मांग की है। डीजीपी ने भाजपा नेताओं पर मंदिरों पर हमला करने का आरोप लगाया था। पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख सोमू वीरराजू ने कहा कि मुख्यमंत्री वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी को आधारहीन आरोप लगाने के लिए तुरंत डीजीपी के पद से गौतम सवांग को हटा देना चाहिए।
रविवार को यहां एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, भाजपा नेता ने कहा कि मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी को पुलिस प्रमुख द्वारा की गई टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मंदिरों पर हमलों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
सोमू वीरराजू ने कहा कि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी सरकार को यह बताना चाहिए कि इसका उद्देश्य क्या है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत कर रही है।
उन्होंने डीजीपी के बयान में गलती पाई और कहा कि अंतरवेदी में प्राचीन रथ को जलाने, रामतीर्थ मंदिर में अभद्रता और कई अन्य मंदिरों पर हमले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, लेकिन पुलिस प्रमुख ने भाजपा नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज करने की घोषणा की।
भाजपा नेता ने राज्य में धर्मांतरण पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि सरकार हिंदुत्व को कमजोर करने के इरादे से काम कर रही है।
उन्होंने आश्चर्य जताया कि क्या सरकार धर्मातरण करने के लिए पादरियों को वेतन दे रही है। उन्होंने पूछा, "जब चचरें के पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, तो सरकार को चचरें का निर्माण क्यों करना चाहिए।"
भाजपा नेता ने चचरें के स्वामित्व वाली संपत्ति पर एक श्वेतपत्र की मांग की और कहा कि पार्टी चर्च की संपत्ति पर अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंपेगी।
गौतम सवांग ने शुक्रवार को मंदिर हमले मामलों और सोशल मीडिया पर झूठे प्रचार में राजनीतिक लिंक का विवरण जारी किया था। उन्होंने दावा किया कि टीडीपी और भाजपा से जुड़े 21 लोगों की पहचान की गई और 15 को अब तक गिरफ्तार किया गया है। नौ मामलों में शामिल 21 लोगों में से 17 टीडीपी के हैं और चार भाजपा के हैं। उन्होंने कहा कि अब तक टीडीपी के 13 और भाजपा के नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
एंथ्रोपोसीन युग यानी आज के दौर में इंसानी गतिविधियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग को जन्म दिया है और जीवों के क़ुदरती आवास को नुक़सान पहुँचाया है. इंसान ने समंदर, मिट्टी और वायुमंडल की रासायनिक बनावट को तब्दील कर दिया है जिसकी वजह से बहुत से जीव धरती से विलुप्त हो गये हैं.
इन हालात में ऐसे आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका और उनकी अहमियत बहुत बढ़ गई है जिनका ताल्लुक़ इंसाफ़ हासिल करने से है.
महिलावादी कार्यकर्ता लंबे समय से कहते आये हैं कि दुनिया भर में सामाजिक और पर्यावरण व जलवायु संबंधी इंसाफ़ की लड़ाई महिलाएं ही लड़ेंगी. 'दिल्ली चलो आंदोलन' में महिलाओं की मौजूदगी इस बात का प्रतीक है. लेकिन, ये लड़ाई बेहद मुश्किल और दर्द भरी रहने वाली है.
इसकी वजह ये है कि हमारे समाज में मर्दवादी सोच की जड़ें बेहद गहरी हैं. पितृसत्तात्मक सोच ये मानती ही नहीं कि महिलाओं की अपनी भी कोई हस्ती है. किसान आंदोलन में मौजूद महिलाओं को लेकर आ रहे बयान और टिप्पणियाँ इसी बात का सबूत हैं.
मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों को लागू करने पर रोक लगा दी. मगर कृषि क़ानूनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि "उन्हें यह जानकर अच्छा लगा कि बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होंगे.
इससे पहले 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो ये आदेश जारी नहीं करेगा कि "नागरिकों को विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहिए." हालाँकि चीफ़ जस्टिस बोबडे ने तब भी सवाल किया था कि 'इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं और बुज़ुर्गों को क्यों शामिल किया गया है?'
जस्टिस बोबडे ने वरिष्ठ वकील एच एस फुल्का से कहा कि 'वो आंदोलन में शामिल महिलाओं और बुज़ुर्गों को प्रदर्शन स्थल से घर वापस जाने के लिए राज़ी करें.'
महिलाओं के हक़ की बात
भारत के चीफ़ जस्टिस के ये विचार देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उन ख़यालों से बहुत मिलते हैं, जिन्हें उन्होंने पिछले साल शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शनों के हवाले से, सुप्रीम कोर्ट में बयान किया था.
तब तुषार मेहता ने कहा था कि 'प्रदर्शनकारियों ने अपने आंदोलन में महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा कवच बनाया हुआ है.'
तब सर्वोच्च अदालत ने वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े की अगुवाई में प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए एक कमेटी बनाई थी.
उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "विरोध करना नागरिकों का बुनियादी हक़ है और लोग विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं."
लेकिन, इन बातों से जो बड़ा सवाल पैदा होता है, वो चिंतित करने वाला है.
सवाल ये कि आख़िर देश के नागरिकों में किन-किन की गिनती होती है? और अगर विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं को भी 'रखा' जा रहा है, तो क्या जज साहेबान ये सोचते हैं कि महिलाओं की कोई हस्ती नहीं? किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं सवाल उठाती हैं कि क्या उन्हें अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का हक़ नहीं है?
चीफ़ जस्टिस बोबड़े की इन टिप्पणियों को लेकर प्रदर्शनकारियों में नाराज़गी ज़रूर है, मगर महिला आंदोलनकारियों को जस्टिस बोबड़े की बातों से कोई हैरानी नहीं हुई.
इसकी वजह ये है कि ज़्यादातर संस्थानों में मर्दों का दबदबा है. सुप्रीम कोर्ट का भी यही हाल है. ऐसे में महिलाओं का एकजुट होना और अपनी आवाज़ उठाना, उन्हें अखरता है.
शाहीन बाग़ के धरने से चर्चा में आईं 82 बरस की बिल्कीस दादी कहती हैं कि महिलाएं हर काम में हिस्सा लेती हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए.
वे कहती हैं कि "जब सवाल देश और उसके मूल्यों को बचाने का आएगा, तो यक़ीन जानिए इसकी अगुवाई महिलाएं ही करेंगी. हम उनके साथ हैं. इसका ताल्लुक़ ना उम्र से है, और इस बात से कि कोई औरत है या मर्द. हम सब बराबर हैं."
महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रही सोच
हरियाणा की महिला किसान नेता सुदेश गोयल कहती हैं कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं बिल्कुल अपनी मर्ज़ी से यहाँ आई हैं.
वे कहती हैं कि "हर गुज़रते दिन के साथ विरोध प्रदर्शन में महिलाओं की तादाद बढ़ रही है, ख़ासतौर से हरियाणा से बड़ी तादाद में महिलाएं आ रही हैं. हम तब तक घर नहीं लौटेंगे जब तक ये कृषि क़ानून ख़त्म नहीं किये जाते. हम यहाँ इसलिए हैं क्योंकि एक महिला के तौर पर हमें अपने अधिकारों का अच्छी तरह से एहसास है."
किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं कहती हैं कि चीफ़ जस्टिस के बयान से महिलाओं को लेकर उनकी सोच का बचकानापन झलकता है. ये महिलाओं के प्रति उनकी ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की पूर्वाग्रह भरी सोच है. तभी तो चीफ़ जस्टिस बोबड़े ये कहते हैं कि विरोध प्रदर्शन में महिलाओं को शामिल नहीं होना चाहिए.
विरोध-प्रदर्शन में शरीक महिलाएं, चीफ़ जस्टिस के बयान को समाज की मर्दवादी सोच की नुमाइश के तौर पर देखती हैं.
उनका कहना है कि हमारा समाज हर बात को पुरुषों की नज़र से ही देखता है.
शाहीन बाग़ की हिना अहमद कहती हैं कि "उन्हें शायद ये एहसास ही नहीं है कि पूरी दुनिया में होने वाले आंदोलनों में महिलाएं शामिल होती रही हैं. ये महिला आंदोलनकारी ही हैं जो विरोध प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बनाये रखती हैं."
शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की वजह
हार्वर्ड की प्रोफ़ेसर एरिका चेनोवेथ के मुताबिक़, विरोध के आंदोलनों की सफलता का सीधा संबंध, उनमें महिलाओं की भागीदारी से पाया गया है. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट भी ये कहती है कि जब किसी आंदोलन में महिलाएं शामिल होती हैं, तो उसके शांतिपूर्ण बने रहने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों में महिलाएं कई तरह की भूमिकाएं निभाती हैं. वो आंदोलन की आयोजक होती हैं. प्रदर्शनों में शामिल लोगों का ख़याल रखती हैं और उनकी हिफ़ाज़त करती हैं. लेकिन, जब बात राजनीतिक प्रक्रिया, सत्ता के परिवर्तन और वार्ता की आती है, तो महिलाओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है. बातचीत की टेबल पर बहुत कम महिलाएं दिखती हैं.
हरियाणा की रहने वाली देविका सिवाच, किसान आंदोलन के पहले ही दिन से टीकरी बॉर्डर पर डटी हुई हैं. अब वो गुरुग्राम में महिलाओं को को एकजुट कर रही हैं. देविका इस सच से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं कि महिलाओं की भागीदारी के कारण ही आंदोलन शांतिपूर्ण बने रहते हैं.
देविका कहती हैं कि, "हरियाणा और पंजाब में हमारे आंदोलन की अगुवाई महिलाएं ही कर रही हैं. हम कोई कमज़ोर औरतें नहीं हैं. हमने हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की है. वो ये कैसे सोच लेते हैं कि हम औरतें कमज़ोर हैं? अगर हम मर्दों को जन्म दे सकते हैं, तो हम अपनी लड़ाई भी लड़ सकते हैं. मातृशक्ति बेहद महत्वपूर्ण है. आंदोलनों में अमन हम से ही है."
बराबर की हिस्सेदार
हज़ारों महिला किसान देश की राजधानी की सीमाओं पर आकर डटी हुई हैं.
वो दिल्ली चलो आंदोलन की समर्थक ही नहीं हैं, उसमें बराबर की भागीदार भी हैं. कई महिलाओं ने तो नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ के आंदोलन का हवाला देकर कहा कि उन्हें तो विरोध जताने का हौसला शाहीन बाग़ की औरतों से मिला.
शाहीन बाग़ में औरतों ने दिल्ली की भयंकर ठंड में भी सौ से ज़्यादा दिनों तक अपना धरना चलाया था. इसके बाद सरकार ने ये कहते हुए उनका धरना ज़बरदस्ती ख़त्म करा दिया था कि महामारी के दौरान वो इतनी महिलाओं को एक साथ, एक जगह नहीं बैठने दे सकते.
शाहीन बाग़ के आंदोलन में शामिल रही हिना अहमद ने इस धरने को कामयाब बनाने के लिए काफ़ी मेहनत की थी. उन्होंने बड़ी संख्या में महिलाओं को इससे जोड़ा था. हिना कहती हैं कि इसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं है कि मर्द, औरतों को कमज़ोर समझते हैं.
47 बरस की हिना कहती हैं कि, "मगर, उन्हें अब ये सोचना छोड़ देना चाहिए कि औरतें कमज़ोर होती हैं. जब हम धरनों में बैठते हैं, तो बच्चों को उम्मीद की किरण दिखती है. शाहीन बाग़ में माएं क्यों धरने पर बैठी थीं? क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी. उन्होंने हम पर तमाम तरह के इल्ज़ाम लगाए. उन्होंने हमारी औक़ात बिरयानी तक समेट दी थी. अब वो किसानों को क्या कहेंगे? महिलाओं ने हमेशा ही विरोध प्रदर्शन किए हैं. वो अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ती आई हैं."
बुनियादी अधिकार
भारत का संविधान कहता है कि विरोध का अधिकार, महिलाओं का भी बुनियादी हक़ है. दिल्ली की रहने वाली मानव अधिकार मामलों की वकील श्रुति पांडेय कहती हैं कि महिलाओं को हमेशा संविधान को अपने दिल में बसाए रखना चाहिए.
नेशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च के मुताबिक़, वर्ष 2018 में देश के कृषि क्षेत्र के कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 42 फ़ीसद थी.
ये आंकड़े ही ये ज़ाहिर करने के लिए काफ़ी हैं कि खेती में महिलाओं की भागीदारी किस तरह लगातार बढ़ रही है. फिर भी आज महिलाएं, खेती के लायक़ केवल दो फ़ीसद ज़मीन की ही मालिक हैं.
किसान आंदोलनों में भागीदारी, इन महिलाओं को इस बात का भी मौक़ा मुहैया कराती है कि वो कृषि क्षेत्र में अपने अदृश्य योगदान से पर्दा उठाकर, देश को ये एहसास कराएं कि खेती-बाड़ी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण है. विरोध-प्रदर्शन के ज़रिए महिलाएं, किसान क़ानूनों पर अपनी राय का भी इज़हार कर रही हैं, जो उनके हिसाब से महिला विरोधी हैं.
फिर से छिड़ी पुरानी बहस
इस आंदोलन के ज़रिए वो पुरानी बहस फिर से ज़िंदा हो गई है कि क्या पूंजीवाद, महिलाओं के ख़िलाफ़ है?
हो सकता है कि ये बात सच हो कि पूंजीवाद ने महिलाओं को काम करने और तरक़्क़ी के तमाम मौक़े दिए. लेकिन, पूंजीवाद ने मर्दवादी ख़यालात से महिलाओं में पैदा हुई असुरक्षाओं का भी बेज़ा इस्तेमाल किया. महिलाओं ने राजनीतिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी के अधिकार के लिए सदियों तक संघर्ष किया है.
बीसवीं सदी में अमरीका का महिलाओं को मताधिकार का आंदोलन हो, या 2020 में भारत के शाहीन बाग़ में धरना, महिलाओं ने हमेशा ही विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई की है. और, पिछले एक दशक के दौरान महिलाओं ने बराबरी का हक़ हासिल करने के लिए ऐसे बहुत से आंदोलन चलाए हैं.
श्रुति पांडेय कहती हैं कि, इन आंदोलनों में महिलाओं की शिरकत महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं है.
वो कहती हैं कि, "सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को लेकर जिस तह की टिप्पणियां की हैं, वो संवेदनहीन हैं, बल्कि सच तो ये है कि ये विचार रूढ़िवादी हैं. हालांकि ऐसी बातों से महिलाओं को कम और एक लोकतांत्रिक संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट को ही अधिक नुक़सान होगा.''
''ऐसी टिप्पणियों से देश की सबसे बड़ी अदालत अप्रासंगिक या बेहद पुरातनपंथी सोच वाली मालूम होती है. किसी भी सूरत में बट्टा सुप्रीम कोर्ट की इज़्ज़त पर ही लगा है. अगर सुप्रीम कोर्ट की अपनी सोच ऐसी होगी, तो फिर वो किस मुंह से समाज में महिला विरोधी विचारों को रोकने का अधिकार जताएंगे? जब उनकी अपनी विश्वसनीयता कठघरे में होगी, तो वो सामाजिक नियम कायदों को मज़बूत बनाने का काम कैसे कर सकेंगे?"
श्रुति पांडेय का मानना है कि विरोध की एक हक़ीक़त ये है कि वो भविष्य की ज़ुबान बोलता है. आज महिलाओं का इम्तिहान लिया जा रहा है. अब समाज के मूल्यों को नए सिरे से परिभाषित करना ही होगा.
श्रुति कहती हैं कि, "हमें सुप्रीम कोर्ट की बातें बुरी लगनी चाहिए. हमें ये मानना पड़ेगा कि केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हम आज ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां पुराने और नए विचारों का टकराव बढ़ रहा है. आज धर्म हो, जाति हो, परिवार हो, या बाज़ार, सभी जगह मर्दवादी सोच हावी है. हालात को ऐसे ही बनाए रखने में पुरुषों का ही फ़ायदा है."
"लेकिन, महिलाएं इस मंज़र को बदलना चाहती हैं. ये लड़ाई, बेलगाम मर्दवादी सोच को क़ाबू करने की है. इस टकराव से पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव की जगह, आने वाले समय में बराबरी वाले समाज की ज़मीन तैयार हो रही है.''
''देख-भाल करने का विचार भी वैसा ही है. लोगों को लगता है कि पुरुषों की देख-भाल की ज़िम्मेदारी महिलाओं की है. ये औरतों को ख़ास लैंगिक भूमिका में देखने वाली सोच का ही नतीजा है."
यही कारण है कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं को उसी भूमिका में देखा जा रहा है कि वो आंदोलनकारियों का ख़याल रख रही हैं.
भारत में हाल के दिनों में हुए कई आंदोलनों में देखा गया है कि महिलाओं ने आंदोलन के लिए खाने और रहने के इंतज़ाम किए. इसके ज़रिए, वो अहिंसक तरीक़े से अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं.
मर्दों का हित
महिलाओं का ये तिरस्कार, और उन्हें खलनायिका बनाकर पेश करना कोई नई बात नहीं है.
लेकिन, महिला आंदोलनकारियों की ऐसी आलोचना ज़रूर नई है, और इसकी समीक्षा करना ज़रूरी है. महिलाओं को विलेन बनाने वाली ऐसी टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि, महिलाओं को मौजूदा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है.
श्रुति पांडेय कहती हैं कि, "देश की सरकार मर्दवादी है. न्यायपालिका पर मर्दों का दबदबा है, बाज़ार पुरुषवादी है. बल्कि कुल मिलाकर कहें तो इंसानी सभ्यता पर ही मर्दवाद हावी रहा है. इसके ख़िलाफ़ बग़ावत तो महिलाएं ही करेंगी. ये सारी बातें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. महिलाओं का विरोध वही लोग करते हैं, जिनके हित मर्दों के दबदबे वाली मौजूदा व्यवस्था से जुड़े हैं."
जहां तक संविधान की बात है, तो वो महिला और पुरुष में भेद नहीं करता है. महिलाओं को भी बराबरी के क़ानूनी हक़ हासिल हैं. संविधान में कोई बदलाव नहीं हुआ है, और संविधान के मुताबिक़ औरतें कोई दोयम दर्ज़े की नागरिक नहीं हैं.
किसान आंदोलन का समर्थन करने वाली अभिनेत्री गुल पनाग कहती हैं कि महिलाओं के विरोध करने के अधिकार को कम करके आंकना, नाइंसाफी है. इससे ऐसा लगता है कि महिलाओं को उनकी इच्छा के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों में लाया गया, और अब 'बंधक बनाकर' रखा जा रहा है.
गुल पनाग कहती हैं कि, "हर किसान परिवार में महिलाएं, मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं और खेती-किसानी में बराबर की साझीदार हैं. बल्कि, सच तो ये है कि किसी और पेशे की तुलना में खेती में तो औरतें, मर्दों के साथ बराबर की शरीक हैं."
महिलाओं को दबाकर रखने का सिलसिला बहुत पुराना है. ये सोच हमारी ज़बान, सामाजिक रिश्तों के ताने-बाने, घिसे-पिटे नज़रियों, धर्म और संस्कृति के ज़रिए ज़ाहिर होती है. पूंजीवाद ने समाज पर पुरुषों के दबदबे को कई तरीक़ों से बढ़ावा दिया है.
उपभोक्तावादी संस्कृति ही ख़ूबसूरती के पैमाने तय करती है, और वो ये भी बताती है कि महिलाएं क्या और कैसा बनने के ख़्वाब देखें. पूंजीवाद, असुरक्षा के बोध पर ही फलता-फूलता है. मर्दवाद, इसी बिनाह पर अपना शिकंजा और कसता जाता है.
पूंजीवादी साज़िश
दिल्ली चलो आंदोलन में शामिल महिलाएं नए कृषि क़ानूनों को पूंजीवाद की एक साज़िश के तौर पर देखती हैं.
पूंजीवाद ही जलवायु परिवर्तन के संकट का भी एक कारण है. मर्दवादी समाज, आज भी महिलाओं को कमज़ोर बताता है. वो बुज़ुर्गों और बच्चों के साथ महिलाओं के बारे में भी यही कहता है कि वो ठंड और कोरोना वायरस की शिकार ज़्यादा जल्दी हो जाएंगी. महिलाएं ऐसी बातों को सिरे से ख़ारिज करती हैं.
भारत के मुख्य न्यायाधीश की ये टिप्पणियां एक रूढ़िवादी सोच उजागर करती हैं. वो महिला विरोधियों को एक और हथियार उपलब्ध कराती हैं, जिससे वो औरतों को निशाना बना सकें.
मगर, इन टिप्पणियों से ये भी ज़ाहिर होता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को ये जानकारी ही नहीं है कि भारत में महिलाओं ने 'चिपको आंदोलन' सरीखे बहुत से विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है.
टीकरी बॉर्डर पर एक ट्रैक्टर की ट्रॉली में बैठी जिन नौ महिलाओं से मैं दिसंबर महीने में मिली थी, उनका कहना था कि वो इस आंदोलन में इसलिए शामिल हैं, क्योंकि ऐसा करना उनका हक़ है. वो अपनी मर्ज़ी से यहां आई हैं.
इनमें सबसे बुज़ुर्ग महिला की उम्र 72 बरस थी, तो सबसे कम उम्र की आंदोलनकारी बीस बरस की एक लड़की थी. उनके साथ एक छोटा बच्चा भी था. वो पंजाब के बठिंडा ज़िले के चक राम सिंह वाला से आए थे.
उस ट्रॉली में सत्तर साल से ज़्यादा उम्र की चार महिलाएं थीं. उनमें से एक थीं जसबीर कौर. उन्होंने मुझसे कहा कि, "हमने अपनी मर्ज़ी से यहां आकर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने का फ़ैसला किया. हम भी तो किसान हैं. वो हमको कुछ समझते ही नहीं हैं."
जसबीर कौर, भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्रहण) से ताल्लुक़ रखती हैं. उन्होंने कहा था कि जब तक सरकार ये क़ानून वापस नहीं लेती, वो घर नहीं लौटेंगी.
ठंड और ऊल-जलूल बयानों के बाद भी, जसबीर कौर अभी धरने पर डटी हुई हैं. वो कहती हैं कि, "हमें इस विरोध प्रदर्शन से अलग नहीं रखा जा सकता. हम भी बराबर के नागरिक हैं."
इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का असल मक़सद यही है. बराबरी का अधिकार हासिल करना. ये लड़ाई तो सदियों से चली आ रही है. मताधिकार के लिए संघर्ष, इसी जंग का हिस्सा था.
बिल्कीस बानो कहती हैं कि, "हम सबके लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. महिलाएं यही तो करती आई हैं. वो सभी को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए संघर्ष करती हैं."(bbc.com/hindi)
रामपुर सहसवान घराने से ताल्लुक रखने वाले शास्त्रीय संगीतकार उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान का 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है.
उनकी बहू नम्रता गुप्ता ख़ान ने बीबीसी को बताया कि उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा की मौत रविवार दोपहर 12.47 बजे हुई.
उन्होंने बताया कि उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान को 2019 में ब्रेन स्ट्रोक हुआ था, तब से वो डॉक्टरों की देखरेख में थे. उन्होंने मुंबई के कार्टर रोड स्थित उनके घर में ही आइसीयू सेटअप कर लिया था. तब से ही उनके आधे शरीर में लकवा हो गया था और वो बात करने में असमर्थ थे.
नम्रता ने इंस्टाग्राम पर भी इसकी जानकारी दी. उन्होंने लिखा, 'कुछ ही मिनट पहले मेरे ससुर, हमारे परिवार के स्तंभ और देश की लीजेंड पद्म विभूषण उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहेब ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है.'
शास्त्रीय संगीत के महारथी उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान को 1991 में पद्म श्री, 2006 में पद्म भूषण और 2018 में पद्म विभूषण अवॉर्ड से नवाजा गया था. 2003 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था.
जानी मानी गायिका लता मंगेशकर ने ट्वीट किया, "मुझे अभी अभी ये दुखद ख़बर मिली है कि महान शास्त्रीय गायक उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहेब इस दुनिया में नहीं रहे. ये सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ. वो गायक तो अच्छे थे ही पर इंसान भी बहुत अच्छे थे."
उन्होंने लिखा, "मेरी भांजी ने भी ख़ान साहेब से संगीत सीखा है. मैंने भी उनसे थोड़ा संगीत सीखा था. उनके जाने से संगीत की बहुत हानि हुई है. मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अपर्ण करती हूं."
दिग्गज सरोद उस्ताद अमजद अली ख़ान ने भी उनकी मौत पर अपनी संवेदना व्यक्त की. उन्होंने ट्वीट किया, "उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान के निधन के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ. वह देश के एक सम्मानित और बहुमुखी गायक थे. उनकी संगीतमय विरासत हमेशा के लिए रहेगी. उनके परिवार के प्रति मैं अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता हूं. उनकी आत्मा को शांति मिले."
एआर रहमान ने लिखा, "सभी के सबसे मधुर टीचर... गफ़ूर-उर-रहीम आपको दूसरी दुनिया में एक ख़ास स्थान दे #UstadGhulamMustafa" (bbc.com)
उद्धव ठाकरे सरकार में सामाजिक विकास मंत्री धनंजय मुंडे पर बलात्कार के आरोपों से राज्य की राजनीति में काफी हलचल है. धनंजय मुंडे गठबंधन सरकार में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के कोटे से मंत्री हैं.
महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील और बीजेपी नेता किरीट सोमय्या ने धनंजय मुंडे से इस्तीफ़ा मांगा है.
वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने मुंडे पर लगे आरोपों को गंभीर बताया है.
हालांकि राज्य कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की महिला नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. ये महिला नेता औरतों पर अत्याचार, महिला अधिकार और राज्य में महिलाओं के कल्याण के लिए नीतिगत मुद्दों पर बोलती रही हैं लेकिन इस मामले पर सब चुप हैं.
राज्य में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की महिला नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर सड़कों पर उतरने वाली कहां ग़ायब हो गई हैं?
महिला मुद्दों पर भी राजनीति का चश्मा?
क्या महिला उत्पीड़न के मुद्दे को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है? क्या ये लोग इसलिए चुप हैं क्योंकि इस बार उनकी अपने गुट के नेता पर आरोप लगे हैं?
भूमाता ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने आरोप लगाया है कि धनंजय मुंडे मामले पर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की महिला नेताओं की चुप्पी उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है.
उन्होंने कहा, "धनंजय मुंडे पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया है. पिछले चार दिनों से महाविकास अघाड़ी की किसी महिला नेता ने इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं कहा है. यह काफी दुखद है और इन महिला नेताओं के दोहरे रवैये को जाहिर करता है."
तृप्ति देसाई सवाल उठाती हैं कि एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले, राज्य की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री यशोमति ठाकुर, शिवसेना नेता नीलम गोऱ्हे और दूसरी तमाम महिला नेताएं कहां गुम हो गई हैं?
उन्होंने कहा, "हमारे नेता महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों पर अपनी सुविधा के हिसाब से बात करते हैं. अगर विपक्ष के नेता पर ऐसे आरोप हों तभी वे विरोध प्रदर्शन करेंगे."
हालांकि इस मामले में धनंजय मुंडे पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिला के ख़िलाफ़ भी शिकायत दर्ज कराई गई है. बीजेपी के नेता कृष्णा हेगड़े और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मनीष धुरी ने महिला के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है.
तृप्ति देसाई ने कहा, "महिला के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज होना भी चिंतित करने वाला पहलू है. हम उनसे पूछताछ की मांग करते हैं. लेकिन हमारा ये कहना है कि ऐसे मामलों में महिला नेताओं को बोलना चाहिए, भले आरोप उनके अपने ही दल के नेता पर क्यों ना लगे हों."
हालांकि राज्य में विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी की महिला मोर्चा ने इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की है.
क्यों चुप हैं महिला नेता?
महाराष्ट्र में बीजेपी की राज्य उपाध्यक्ष चित्रा वाघ ने कहा, "पुलिस पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए. इस मामले में दोषियों का बचाव नहीं होना चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों ना हो. जांच पूरी होने तक धनंजय मुंडे को मंत्रालय से हटाया जाना चाहिए."
"ऐसे मामलों में पीड़िता और परिवार पर दबाव डाला जा सकता है. सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है. आरोपों को नष्ट किया जा सकता है. नैतिक आधार पर धनंजय मुंडे को मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."
धनंजय मुंडे के इस्तीफ़े की मांग के साथ बीजेपी राज्य महिला मोर्चा 18 जनवरी से राज्य व्यापी धरना प्रदर्शन शुरू करने जा रहा है.
वैसे महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस तीनों दलों में कई महिला नेता मौजूद हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में सुप्रिया सुले के अलावा विद्या चव्हान, रुपाली चाकनकर भी वरिष्ठ नेताओं में गिनी जाती हैं.
वहीं, कांग्रेस की यशोमति ठाकुर राज्य की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री हैं जबिक स्कूली शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा भी वर्षा गायकवाड़ के पास है.
शिवसेना की नीलम गोन्हेविधान परिषद की डिप्टी स्पीकर हैं. वहीं एमएलसी मनीषा कायंदे और प्रियंका चतुर्वेदी भी चर्चित चेहरा हैं. लेकिन इन लोगों ने इस मामले में अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
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'कोई धनंजय मुंडे का बचाव नहीं कर रहा है'
एनसीपी की वरिष्ठ नेता विद्या चव्हाण ने बीबीसी मराठी से कहा, "अब बात करने का कोई मतलब नहीं है. यह सब भयानक है. वे शादीशुदा हैं. विवाहेत्तर संबंध से उनके दो बच्चे हैं. अब एक अन्य महिला ने आरोप लगाए हैं. यह मामला काफी उलझा हुआ है. ये पूरा मामला क्या निकलता है, इसे देखना होगा. लेकिन कोई धनंजय मुंडे का बचाव नहीं कर रहा है. वैसे यह समझना होगा कि मुंबई में हनीट्रैप के मामले बहुत ज़्यादा देखने को मिलते हैं."
एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा, "आरोपों के बाद मामले में कई ट्विस्ट आ चुके हैं. संवेदनशील मामला है. इस मामले में परिवार को भी समझना चाहिए. हमें पुलिस पर पूरा भरोसा है. पूछताछ के बाद हम इस पर बात करेंगे."
वहीं दूसरी ओर शिवसेना की महिला नेताओं ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बात की और मामले को काफी पेचीदा बताया.
शिवसेना की नीलम गोन्हे ने बीबीसी मराठी से कहा, "मामले के सामने आने के बाद मैंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे को इसकी जानकारी दी थी. उन्होंने कहा कि मामले की जांच चल रही है और सरकार उचित कार्रवाई करेगी." नीलम गोऱ्हे ने बताया कि ऐसे मामलों में पीड़िता को मदद की जरूरत होती है, हम उनकी शिकायत दर्ज कराने में या कानूनी मदद मुहैया कराते हैं लेकिन ये मामला अलग क्योंकि इसमें राजनीति भी शामिल है.
शिवसेना की एमएलसी मनीषा कायंदे ने बीबीसी मराठी से कहा, "ये मामला अचानक सामने आया और बहुत पेचीदा है. धनंजय मुंडे 2019 में अदालत में जा चुके हैं. शिकायत करने वाली महिला पर जिस तरह के आरोप लगे हैं उससे भी मामला उलझा है."
NEELAMGORHE
महिला आयोग की प्रमुख का पद खाली
बीबीसी मराठी ने महाराष्ट्र कांग्रेस की महिला नेताओं से इस मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की लेकिन कोई बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हुईं.
वैसे उद्धव ठाकरे को सरकार में आए एक साल से ज़्यादा समय हो चुका है. लेकिन अभी तक राज्य महिला आयोग के चेयरपर्सन की नियुक्ति नहीं हुई है और ना ही कोई समिति का गठन हुआ है.
एनसीपी की नेता विद्या चव्हान ने बीबीसी मराठी से बताया, "हमने महिला आयोग के पदों को भरने के लिए एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार जी से बात की थी. हमने इस मामले में एक सूची भी दी है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई फ़ैसला नहीं हुआ है."
महिलाओं की कई शिकायतों का निपटारा महिला आयोग के ज़रिए किया जाता है. पीड़ितों की आवाज सुनने के लिए भी महिला आयोग एक उपयुक्त मंच है. लेकिन उद्धव ठाकरे सरकार में महिला आयोग की चेयरपर्सन का पद महीनों से खाली पड़ा हुआ है.
शिवसेना की एमएलसी मनीषा कायंदे ने बताया, "मैंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और गृहमंत्री अनिल देशमुख को इस बारे में लिखा है. मैंने चेयरपर्सन की नियुक्ति के अलावा जल्द ही समिति के गठन का अनुरोध भी किया है." (bbc.com)
23 साल की वीके विस्मया ख़ुद को 'एक्सिडेंटल एथलीट' बताती हैं. केरल के कन्नूर ज़िले में जन्मी वीके विस्मया का लक्ष्य एक इंजीनियर बनने का था और वो इसकी पढ़ाई में लगी हुई थी.
एक वक्त वो ख़ुद को स्पोर्ट्स में मध्यम दर्जे का मानती थी. उन्हें तब पता नहीं था कि वो एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली हैं.
उनकी बहन एक उभरती हुई एथलीट थीं. उन्होंने विस्मया को एथलेटिक्स में और अधिक दिलचस्पी लेने के लिए प्रोत्साहित किया.
धीरे-धीरे वो अपने स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर और बाद में कॉलेज के कोच की मदद से एथलीट में निखरती गईं. चंगनाचेरी में स्थित उनका यह असेंशन कॉलेज शीर्ष स्तर के एथलीटों के लिए जाना जाता है.
एथलीट के तौर पर विस्मया के करियर की शुरुआत साल 2014 में अपने राज्य केरल के लिए दो स्वर्ण पदकों की जीत के साथ हुई. अब वो 2021 के ओलंपिक में भाग लेने जा रही हैं.
मगर इंजीनियर बनने का सपना लिए विस्मया के लिए एक एथलीट के तौर पर करियर का चुनाव एक आसान फैसला नहीं था.
विस्मया के पिता एक इलेक्ट्रीशियन हैं और उनकी माँ गृहणी हैं.
उनका परिवार आर्थिक तौर पर उतना मज़बूत नहीं है इसलिए उनके लिए एथलीट के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लेने का फैसला छोड़ना एक आसान फैसला नहीं था.
वो कहती हैं कि उनके माता-पिता के लिए अपनी दो बेटियों को एथलीट के क्षेत्र में करियर बनाने का समर्थन करना एक मुश्किल फैसला था लेकिन फिर भी उन लोगों ने अपने सामर्थ्य के हिसाब से पूरी मदद की.
शुरू में वीके विस्मया के पास सिंथेटिक ट्रैक और आधुनिक जिम की सुविधा नहीं थी. इसके बजाय उन्हें कीचड़ भड़े ट्रैक पर ट्रेनिंग लेनी होती थी. मॉनसून के दिनों में इस पर ट्रेनिंग करना बहुत मुश्किल हो जाता था.
विस्मया का मानना है कि पर्याप्त संसाधनों, सुविधाओं और ट्रेनिंग की एक एथलीट के करियर के शुरुआती दौर में अहम भूमिका होती है लेकिन देश में इसका अभाव है.
इन सबके वजह से एथलीट्स के चोटिल होने की संभावना रहती है. विस्मया ने खुद इसे झेला है.
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक बाधा धावक के तौर पर की थी लेकिन चोट लगने की वजह से उन्हें अपना ट्रैक बदलना पड़ा. उन्होंने इसके बदले मध्यम-दूरी के धावक के तौर पर ट्रेनिंग लेनी शुरू की.
स्वर्ण पदक जीता और बनने लगी पहचान
2017 में विस्मया के करियर में उस वक्त एक सुनहरा मोड़ आया जब उन्होंने ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशीप के 200 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतते हुए 25 साल का रिकॉर्ड तोड़ा था.
उसी चैंपियनशीप में उन्होंने 400 मीटर के दौड़ में एक सिल्वर मेडल भी जीता था. तब से लोगों के बीच उनकी पहचान बनने लगी थी.
इसने विस्मया को नेशनल कैंप में पहुँचने में मदद की. वहाँ उन्हें प्रशिक्षण की सभी आधुनिक सुविधाएँ प्राप्त हुईं और कोच की भी सुविधा मिली.
इसके बाद विस्मया 4X400 मीटर रिले दौड़ की राष्ट्रीय टीम एक अहम सदस्य बन गईं. 2018 में जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में टीम ने स्वर्ण पदक जीता.
वो इस जीत को अपने करियर का सबसे बेहतरीन जीत बताती हैं. 2019 में विस्मया ने चेक गणराज्य के बर्नो में हुई एथलेटिक मीटिंग में 400 मीटर दौड़ की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता.
साल 2019 में इसके बाद उन्होंने दोहा में वर्ल्ड एथलेटिक्स चैम्पियनशीप के मिक्स रिले में हिस्सा लिया. टीम फ़ाइनल में पहुँची और टोक्यो में होने वाले ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया.
विस्मया इस बात में यकीन करती हैं कि अगर आप सकारात्मक बने रहे और असफलताओं से हतोत्साहित नहीं हुए तो आपकी सबसे बड़ी तकलीफ़ ही आपकी सबसे बड़ी मजबूती बन जाती है.
(यह लेख बीबीसी को ईमेल के ज़रिए वीके विस्मय के भेजे जवाबों पर आधारित है.) (bbc.com)
अहमदाबाद. उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि अदालतों को ‘शासन प्रणाली की संस्थाओं’ के तौर पर सार्वजनिक जांच पड़ताल तथा आलोचनाओं को स्वीकार करना चाहिए. अहमदाबाद में आयोजित व्याख्यान को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संबोधित करते हुए शनिवार को साल्वे ने कहा कि न्यायाधीशों, न्यायिक मर्यादाओं और कार्यप्रणाली के तरीकों की आलोचना से अदालत नाराज नहीं होतीं और जिस लहजे में इस तरह की आलोचनाएं की जाती हैं वह हल्के फुल्के अंदाज में होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ‘आज हमने यह स्वीकार कर लिया है कि न्यायाधीश, या कहें अदालतें और खासकर संवैधानिक अदालतें शासन प्रणाली की संस्थाएं बन गई हैं और इस नाते उन्हें सार्वजनिक जांच पड़ताल तथा सार्वजनिक आलोचनाओं को स्वीकार करना चाहिए. साल्वे ने कहा, ‘हमने यह हमेशा माना है कि अदालतों के फैसलों की आलोचना की जा सकती है, ऐसी भाषा में की गई आलोचना भी जो विनम्र न हो. फैसलों की निंदा हो सकती है. क्या हम निर्णय निर्धारण की प्रक्रिया की निंदा कर सकते हैं? क्यों नहीं?’.
वरिष्ठ अधिवक्ता 16वें पीडी देसाई स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे जिसका विषय था ‘न्यायपालिका की आलोचना, मानहानि का न्यायाधिकार और सोशल मीडिया के दौर में इसका उपयोग’. व्याख्यान में उन्होंने कहा, ‘‘सूर्य की तेज रोशनी के उजाले तले शासन होना चाहिए. मेरा मानना है कि ऐसा वक्त आएगा जब उच्चतम न्यायालय सरकारी गोपनीयता कानून के बड़ी संख्या में प्रावधानों पर गंभीरता से विचार करेगा और देखेगा कि वे लोकतंत्र के अनुरूप हैं या नहीं.’
उन्होंने कहा 'एक क्षेत्र हैं, जहां मुझे लगता है कि न्यायाधीशों को सुरक्षा दी जानी चाहिए. और वह क्षेत्र है किसी संस्था की पर एक स्वतंत्र संस्था के रूप में चरित्र के साथ सिलसिलेवार हमले करना.' उन्होंने कहा कि अदालतों को उन लोगों के ट्वीट्स पर ध्यान नहीं देना चाहिए, जिनके पास बैठकर अपने मोबाइल फोन पर फैसले देने के अलावा बेहतर करने के लिए कुछ नहीं है. खासतौर से उन चीजों पर जिन्हें वे नहीं समझते हैं.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 17 जनवरी। राजधानी रायपुर के गुढिय़ारी क्षेत्र में आज सुबह हुए एक सडक़ हादसे में घायल भाजपा नेता सुनील दुबे (35) की मौत हो गई है।
जानकारी के मुताबिक गुढिय़ारी विकास नगर निवासी श्री दुबे आज सुबह अपने किसी काम से निकले थे, तभी अशोक नगर में तेज रफ्तार एक स्कॉर्पियों ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में श्री दुबे गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्होंने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 17 जनवरी। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह रविवार को एक बार फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में वन मैन शो चल रहा है। इस पर मुख्यमंत्री श्री बघेल ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा शासन में अधिकारी सरकार चलाते थे।
पूर्व मुख्यमंत्री ने मीडिया से चर्चा में भूपेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए, और कहा कि प्रदेश में वन मैन शो चल रहा है। विधायक, मंत्रियों की बात नहीं सुनी जा रही है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार विधायक और मंत्री ही चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा शासनकाल में अधिकारी ही सरकार चलाते थे। महत्वपूर्ण मामले की फाइल गायब हो गई थी, जो कि अधिकारी के लॉकर में मिली।
पूर्व मंत्री और रायपुर ग्रामीण के विधायक सत्यनारायण शर्मा के जन्मदिन के मौके पर रविवार को बधाई देने समर्थकों का तांता लगा रहा। इस मौके पर दिव्यांगों को सहायक उपकरण प्रदान किए गए। उनके विधानसभा क्षेत्र में कई जगहों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। जिसमें समर्थकों ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी।
पटना, 17 जनवरी। बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मांग की है कि रिपब्लिक टीवी चैनल के संपादक अर्नब गोस्वामी के वॉट्सएप चैटिंग की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराई जानी चाहिए।
ये कैसी देशभक्ति है जहाँ हमारे वीर जवानों की शहादत को टीआरपी और चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे दुर्भाग्यपूर्ण-निंदनीय हरकत कुछ नहीं हो सकती।
हमारे देश को माफीनामा और शहादत की सौदेबाजी वाली देशभक्ति की जरूरत नहीं है।
सरकार में बैठे लोग अनंत काल तक नहीं रहेंगे और लालची गोदी मीडिया वाले भी हमेशा के लिए नहीं रहेंगे लेकिन इनके द्वारा भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और उनकी विश्वसनीयता को जो नुकसान हो रहा है वह अपरिवर्तनीय और अकल्पनीय है। देश को यह क़तई स्वीकार्य नहीं है।
रिपब्लिक चैनल के संपादक की 500 पेज की सनसनीखेज चैट की लीक ने दिनभर राजनेताओं को गाली देने वाले छद्म प्रवचनकारी पत्रकारों को बेनकाब किया है। गोदी मीडिया और उसके पत्रकारों को मोदी सरकार टखनों तक जकड़े हुए हैं। सरकार बताएँ देश की सुरक्षा और अखंडता संबंधित अति गोपनीय सूचनाएँ गोदी मीडिया तक कैसे पहुँच रही है? इन लोगों को कैसे पता की कब और कहाँ आतंकवादी हमला होगा? कब स्ट्राइक होगी इत्यादि?
एक अन्य तथ्य यह भी है कि मोदी सरकार को इस तरह के सुविधाभोगी बिकाऊ दलाल चैनलों के माध्यम से सभी तरह के भद्दे सच को मिटाने के लिए धर्म और राष्ट्रवाद की आवश्यकता है।
इस पूरे प्रकरण की संसदीय कमिटी द्वारा जाँच होनी चाहिये।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने किसान नेता बलदेव सिंह सिरसा और पंजाबी एक्टर दीप सिद्धू समेत 40 लोगों को समन जारी कर रविवार को पूछताछ के लिए बुलाया है. अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने केंद्र सरकार की एजेंसी की इस कार्रवाई पर नाराजगी जताई है और आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार नौवें दौर की वार्ता विफल होने के बाद अपने एजेंसियों के माध्यम से किसान नेताओं और किसान आंदोलन को समर्थन देने वालों को प्रताड़ित करना चाह रही है.
बादल ने शनिवार को ट्वीट किया, "किसान नेताओं और किसान आंदोलन के समर्थकों को एनआईए और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) द्वारा पूछताछ करने के लिए बुलाकर उन्हें धमकाने के केंद्र के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हैं. वे देशद्रोही नहीं हैं. 9वीं वार्ता विफल होने के बाद, यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि भारत सरकार केवल किसानों को थकाने की कोशिश कर रही है."
बता दें कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) से संबंधित एक मामले में न्यायिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के तहत गवाह के रूप में पूछताछ के लिए लगभग 40 लोगों को बुलाया है. एक्टर दीप सिद्धू किसान आंदोलन का समर्थन और तीनों नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे. उन्हें भी आतंक निरोध एजेंसी के नई दिल्ली स्थित दफ्तर में पूछताछ के लिए बुलाया गया है. इनके अलावा जिन लोगों को समन भेजा गया है, उनमें गैर-लाभकारी खालसा एड के अधिकारी भी शामिल हैं.
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खालसा एड, जो विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को आवश्यक सहायता प्रदान कर रहा है, ने शनिवार को एक बयान जारी कर कहा है कि वह एजेंसी के साथ सहयोग करेगा. सिख फॉर जस्टिस अमेरिका में एक प्रतिबंधित संगठन है.
बयान में कहा गया है, "हम एनआईए द्वारा किसानों के विरोध में शामिल व्यक्तियों को जारी किए गए सम्मन के बारे में गहराई से जानने के लिए चिंतित हैं, बस ड्राइवरों से लेकर यूनियन नेताओं तक सभी को एनआईए के सामने पेश होने के लिए तलब किया गया है, जिसकी जांच 'राष्ट्र-विरोधी' के रूप में और आतंकवाद का समर्थन करने के रूप में की जा रही है. हमारी खालसा एड इंडिया टीम को भी तलब किया गया है और पूछताछ/ जांच की जा रही है ... हमारी टीम एनआईए द्वारा पूछे गए किसी भी प्रश्न का सहयोग करेगी और जवाब देगी."
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 17 जनवरी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रविवार को यहां अपने निवास कार्यालय में राज्य की जनजातियों की जीवनशैली, उनके परिचय, उत्पत्ति अवधारणा, आवास और बसाहट, सामाजिक संगठन और संस्कृति पर प्रकाशित फोटो हैण्डबुक का विमोचन किया। आदिमजाति कल्याण मंत्री डॉ.प्रेमसाय सिंह टेकाम भी इस अवसर पर उपस्थित थे।
छत्तीसगढ़ आदिमजाति अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान द्वारा इस फोटो हैण्डबुक का प्रकाशन किया गया है, जिसमें राज्य की जनजातियों के छायांकित अभिलेखीकरण श्रृंखला अन्तर्गत 29 जनजातीय समुदायों यथा खडिय़ा, दण्डामी माडिय़ा, दोरला, हलबा, मुरिया, धुरवा, परजा, भतरा, गोंड (कबीरधाम), सवरा, धनवार, कंवर, उरांव, मझवार, नगेसिया, मुण्डा कोल, राजगोंड, अगरिया, पारधी, बिंझवार, भैना, बियार, कोंध, गोंड (बस्तर), खैरवार, सौंता भारिया एवं कण्डरा के बारे मेंं जानकारी दी गई है।
फोटो हैंड बुक में जनजातियों के परिचय उत्पत्ति अवधारणा, उनके आवास एवं बसाहट, सामाजिक संगठन, आर्थिक जीवन, जन्म संस्कार, विवाह संस्कार, मृत्यु संस्कार, धार्मिक जीवन, उनमें प्रचलित न्याय व्यवस्था, लोक परम्पराएं उनके वस्त्र आभूषण, गोदना, घरेलु उपकरण, कृषि उपकरण, शिकार, मत्स्याखेट उपकरण, वनोपज आधारित जीवनशैली के साथ-साथ उनके समग्र विकास हेतु किये जा रहे शासकीय प्रयासों को विभिन्न आकर्षक छायाचित्रों के जरिए दर्शाया गया है।
इस फोटो हैण्डबुक में प्रकाशित तथ्य राज्य के संबंधित जनजातीय समुदायों, जनजातीय संस्कृति में रूचि रखने वाले अध्येताओं के लिए एवं आदिवासी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उपयोगी होगी।
इस अवसर पर प्रभारी मुख्य सचिव सुब्रत साहू, मुख्यमंत्री के सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आदिमजाति कल्याण विभाग के सचिव डी. डी. सिंह, वित्त विभाग की सचिव अलरमेलमंगई डी, संचालक आदिम जाति विभाग शम्मी आबिदी उपस्थित थीं।
अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार, नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी के नेतृत्व में इस्लामाबाद में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि 'पीटीआई के 23 बैंक खातों में इसराइल और भारत से भी पैसे आये.'
अख़बार जंग के अनुसार, मुस्लिम लीग (नवाज़) के महासचिव एहसान इक़बाल ने कहा कि अगर विदेशी फ़ंडिंग केस का फ़ैसला वक़्त पर आ जाता तो इमरान ख़ान सियासत के लिए अयोग्य क़रार दिए जाते और उनकी पार्टी का रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया जाता.
इमरान ख़ान ने विपक्ष और नवाज़ शरीफ़ के हमलों का जवाब दिया है.
अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार, इमरान ख़ान ने कहा, "मुझे ख़ुशी है कि पीडीएम वाले चुनाव में धांधली के आरोप के बाद अब चुनाव आयोग में विदेशी फ़ंडिंग पर आ गये हैं. मैं चुनाव आयोग से अपील करता हूँ कि वो हमारा, पीपीपी, मुस्लिम लीग (नवाज़) और मौलाना फ़ज़लुर्रहमान का हिसाब-किताब सामने रख दें, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा."
इमरान ने कहा, "मैं गारंटी देता हूँ कि इन दोनों पार्टियों ने बाहर के मुल्कों से पैसा लिया है. शेख़ रशीद (मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री) सब बता सकते हैं, जब वे मुस्लिम लीग में थे और नवाज़ शरीफ़ के साथ बाहर गए तो किन-किन मुल्कों ने इनको पैसा दिया."
इमरान ने कहा, "मुझे भी दो मुल्कों ने फ़ंडिंग की पेशकश की थी जो उन दोनों बड़ी पार्टियों को फ़ंडिंग कर रहे हैं. उनमें इसराइल शामिल नहीं लेकिन नाम इसलिए नहीं बता सकता कि इन मुल्कों के साथ संबंध ख़राब हो जाएंगे."
इमरान ने कहा कि 'उनकी पार्टी पाकिस्तान के इतिहास में पहली पार्टी है जिसने आधिकारिक रूप से सबको बताकर सियासी फ़ंड रेज़िंग की.'
इमरान ख़ान की पार्टी ने चुनाव आयोग से अपील की है कि वो मुस्लिम लीग (नवाज़) और पीपीपी के ख़िलाफ़ विदेशी फ़ंडिंग के केस की रोज़ाना सुनवाई करे.
पीटीआई का कहना है कि इन दोनों के ख़िलाफ़ केस चार सालों से लटका हुआ है इसलिए इसे फ़ौरन निपटाया जाए.
पाकिस्तान में असल लड़ाई लोकतंत्र बचाने की है: इमरान ख़ान
इमरान ख़ान ने विपक्षी पार्टियों पर एक और हमला करते हुए कहा कि 'पाकिस्तान में इस वक़्त असल लड़ाई लोकतंत्र बचाने की है.'
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार, एक निजी टीवी चैनल को दिये इंटरव्यू में इमरान ख़ान ने कहा, "पाकिस्तान में इस वक़्त सामंती प्रथा है, मतलब ये कि नाम तो लोकतंत्र का लेते हैं लेकिन परिवार शासक बन जाते हैं और 25 साल का नौजवान अपनी माँ की वसीयत पर आ जाता है."
इमरान ख़ान ने कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि ये दोनों (शरीफ़ और भुट्टो) ख़ानदान पहले क्या थे और सत्ता में आने के बाद कहाँ पहुँचे.
उन्होंने ख़ुद का बचाव करते हुए कहा, "मैं पाकिस्तान का अकेला राजनेता हूँ जो जीएचक्यू (सेना मुख्यालय) की नर्सरी में नहीं पला, अय्यूब (फ़ील्ड मार्शल अय्यूब ख़ान) की कैबिनेट में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो अकेले सिविलियन मंत्री थे और नवाज़ शरीफ़ को पाल कर राजनेता बनाया गया." (bbc.com)
अख़बार दुनिया के अनुसार, अफ़ग़ान तालिबान प्रमुख मुल्ला हैबतुल्लाह ने एक बयान जारी कर अफ़ग़ान तालिबान नेताओं से अपील की है कि वो ज़्यादा शादियाँ ना करें क्योंकि इससे दुश्मन को उन लोगों के ख़िलाफ़ प्रोपगैंडा करने का मौक़ा मिल जाता है.
बयान में कहा गया है कि अगर कोई दूसरी शादी करना चाहता है तो उसे अफ़ग़ान तालिबान प्रमुख से लिखित इजाज़त लेनी होगी.
बयान में कहा गया है कि ज़्यादा शादियों के कारण तालिबान नेताओं की तरफ़ से इस काम (शादियों) के लिए फ़ंडिंग की माँग बढ़ने लगी थी.
बयान में एक से ज़्यादा शादी पर फ़िलहाल पाबंदी नहीं लगाई गई है लेकिन इतना ज़रूर कहा गया है कि अगर तालिबान नेतृत्व और तालिबान के कमांडर ज़्यादा शादियाँ ना करें तो वो इस तरह की परेशानियों से बच जाएंगे और दुश्मन को उनके ख़िलाफ़ प्रोपगैंडा का भी मौक़ा नहीं मिलेगा.
ज़्यादातर तालिबान नेताओं ने एक से ज़्यादा शादियाँ कर रखी हैं. अफ़ग़ान तालिबान के संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर और उनके बाद प्रमुख मुल्ला अख़्तर मंसूर की तीन-तीन पत्नियां थीं.
तालिबान के मौजूदा प्रमुख की दो पत्नियाँ हैं. दोहा में तालिबान के सबसे वरिष्ठ नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर की तीन बीवियां हैं. (bbc.com)
उधर लंदन में रह रहे नवाज़ शरीफ़ को वहाँ के क़ानून की वजह से राहत मिली है.
अख़बार जंग के अनुसार, ब्रितानी सरकार ने कहा है कि लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग की तरफ़ से नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ ग़ैर-ज़मानती गिरफ़्तारी वारंट जारी करने के आधार पर सरकार उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सकती है.
ब्रितानी सरकार का कहना है कि यह मामला नवाज़ शरीफ़ और पाकिस्तान सरकार के बीच है और ब्रिटेन की पुलिस ब्रिटेन से बाहर किसी अदालत के आदेश पर अपने मुल्क में रह रहे किसी आदमी को गिरफ़्तार नहीं कर सकती.
ब्रिटेन ने कहा कि पाकिस्तान और ब्रिटेन के बीच प्रत्यर्पण संधि भी नहीं है. ब्रिटेन की सरकार ने हालांकि आगे कहा कि संधि नहीं होने के बावजूद किसी को प्रत्यर्पित किया जा सकता है लेकिन इसका एक प्रॉपर चैनल होता है.
सरकार और विपक्षी महागठबंधन पीडीएम के बीच जारी गतिरोध के दौरान सरकार ने सुलह सफ़ाई की भी कोशिश की है. (bbc.com)