विचार/लेख
-डॉ. चन्दर सोनाने
देश में पिछले तीन माह से भी अधिक समय से गायों में लंपी वायरस की महामारी फैली हुई है। इससे करीब 70 हजार से ज्यादा गायों की मौत हो गई है। लाखों गायें मौत से जूझ रही है। हाल ही में एक ओर डरावनी खबर आई है। वह यह कि राजस्थान के सरहदी जिले बाड़मेर के कातरला गाँव में करीब 35 हिरणों में इस लंपी वायरस के लक्षण पाए गए हैं। इनमें से 25 हिरणों की मौत से चारों और खलबली मच गई है। ये सभी हिरण अमृता देवी वन्य जीव संरक्षण संस्थान से सम्बद्ध थे। गायों के बाद हिरणों में इस महामारी के फैलने की खबर ने सबको चिंता में डाल दिया है। आश्चर्य और दु:खद बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने तीन माह में एक बार भी इस महामारी के संबंध में चिंता व्यक्त नहीं की है। उनकी इस संबंध में चुप्पी और चीतों के नामकरण के बारे में चिंता हैरत में डाल रही है !
दु:खद यह भी है कि अभी तक इस लंपी वायरस का टीका बना नहीं है। इसलिए वैकल्पिक टीके गोट पॉक्स से काम चलाया जा रहा है। यह टीका बकरी और भेड़ों को दिया जाता है। गायों को इसकी तीन गुना ज्यादा डोज देनी पड़ती है। वह भी पर्याप्त मात्रा में नहीं है। कई राज्यों में इस वैकल्पिक टीके गोट पॉक्स की कमी की खबर आ रही है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश की हालत देखे तो पता चलता है कि मध्यप्रदेश के आधे जिलों में यह महामारी फैली हुई है। इस प्रदेश के 53 जिलों में से 26 जिलों में यह महामारी फैली हुई है। सवा सौ के लगभग गायों की मौत हो गई है और हजारों गाय इससे पीडि़त है।
इस प्रदेश में करीब 35 लाख से अधिक गौवंशी पशु है, किन्तु सितम्बर माह के अंत तक केन्द्र से केवल 14 लाख वैकल्पिक टीके ही प्रदेश को मिले है। इसे प्रदेश के चार केन्द्रों इन्दौर, भोपाल, ग्वालियर और उज्जैन को भेजे गए है। इन केन्द्रों से संभाग के अन्य जिलों में और जिलों से पशु चिकित्सा विभाग के अस्पतालों में भेजे जा रहे है। उन अस्पतालों में टीकाकरण शुरू कर दिया गया है। महामारी से मृत पशु को गाँव या शहर से बाहर स्थानीय प्रशासन की मदद से गड्ढा खोद कर चूना और नमक के साथ दफनाने के लिए समझाइश भी दी जा रही है। किन्तु इसके बावजूद प्रदेश के कई जिलों से वैकल्पिक टीके की कमी की खबर भी आ रही है। यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में ही जितने टीकों की जरूरत है, उससे आधे ही अभी तक पहुँचे है। यह देश की हालत मध्यप्रदेश के उदाहरण से अच्छी तरह से समझी जा सकती है।
देश में यह महामारी 16 से अधिक राज्यों में फैल चुकी है। इन 16 राज्यों में सबसे अधिक प्रभावित 8 राज्यों में गुजरात,राजस्थान, पंजाब,हरियाणा,उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड,मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर है। इन राज्यों में से सबसे खराब हालत राजस्थान की है। इस राज्य में रोजाना करीब 600-700 पशु महामारी से मर रहे हैं। इस राज्य के सबसे अधिक प्रभावित जिलों में से एक जिला है बाड़मेर । इस जिले में सबसे ज्यादा भयावह स्थिति है। यहाँ मृत पशुओं को दफनाने के लिए जगह कम पड़ गई है। सैकड़ों मृत पशु खुले में पड़े हैं। उन्हें कुत्ते और अन्य पशु-पक्षी नोंच रहे हैं। इससे यह बीमारी और अधिक फैलने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
यह महामारी जुलाई माह से फैलना आरम्भ हुई है। इस महामारी के प्रकोप से किसान और पशुपालक दु:खी और अचंभित है। किन्तु, अभी तक इस महामारी के प्रकोप के नियंत्रण में केन्द्र सरकार तेजी से और व्यापक स्तर पर प्रयास कर रही है, यह कहीं देखने में नहीं आ रहा है ! प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले जुलाई माह के बाद तीन माह के दौरान अपने मन की बात कही है। पिछले माह सितम्बर के अंतिम रविवार को भी प्रधानमंत्री ने अपनी मन की बात कही। किन्तु इस बार भी उन्होंने गायों में और हिरणों में फैल रही इस महामारी का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने जिक्र किया मध्यप्रदेश के कूनो अभ्यारण्य में उनके जन्मदिन पर उनके द्वारा छोड़े गए चीतों के नामकरण के बारे में । प्रधानमंत्री ने लोगों से चीतों के नामकरण के लिए सुझाव देने का भी आव्हान किया। किन्तु पिछले तीन महीनों के बाद सितम्बर माह में भी मन की बात में उन्होंने देश के 16 राज्यों में गौ माता और हिरणों में फैल रही इस महामारी का जिक्र तक नहीं किया। प्रधानमंत्री की इस चुप्पी और मौन के बारे में क्या कहा जाए ?
विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के गौरक्षक भी गौमाता में फैल रही इस भयंकर बीमारी में सेवा करते हुए कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं ! ये वही गौरक्षक हैं, जो गौ परिवहन में लगे लोगों पर जरा सी बात पर मार-काट पर उतारू हो उठते है और लोगों की हत्या तक कर देते हैं। यदि ये सच्चे गौरक्षक हैं तो उन्हें गायों में फैल रही इस महामारी के नियंत्रण में आगे आकर पीडि़त गायों की सेवा करनी चाहिए!
देश में जिस तरह कोरोना महामारी के नियंत्रण के लिए देशव्यापी महाअभियान आरंभ किया गया था और देश में नए हजारों टीकाकरण केन्द्र स्थापित कर नागरिकों का टीकाकरण किया गया था। ठीक उसी प्रकार गौमाता और हिरणों को बचाने के लिए भी कोरोना नियंत्रण के महाअभियान की तरह ही गायों में और हिरणों में फैल रही इस लंपी वायरस के नियंत्रण के लिए टीकाकरण का महाअभियान आरंभ करने की आज सख्त आवश्यकता है, तभी इस पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। अन्यथा यह महामारी देश के उन राज्यों में भी फैल सकती है, जहाँ अभी तक इसका प्रकोप नहीं पहुँचा है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मल्लिकार्जुन खडग़े अब कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे, यह तो तय ही है। यदि अशोक गहलोत बन जाते तो कुछ कहा नहीं जा सकता था कि कांग्रेस का क्या होता? गहलोत को राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों के प्रचंड समर्थन ने महानायक का रूप दे दिया था लेकिन गहलोत भी गजब के चतुर नेता हैं, जिन्होंने दिल्ली आकर सोनिया गांधी का गुस्सा ठंडा कर दिया। उन्हें अध्यक्ष की खाई में कूदने से तो मुक्ति मिली ही, उनका मुख्यमंत्री पद अभी तक तो बरकरार ही लग रहा है।
अध्यक्ष बनने के बाद खडग़े की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वे गहलोत पर हाथ डालें। गहलोत और कांग्रेस के कई असंतुष्ट नेता भी उम्मीदवारी का फार्म भरने वाले खडग़े के साथ-साथ पहुंच गए। याने समस्त संतुष्ट और असंतुष्ट नेताओं ने अपनी स्वामिभक्ति प्रदर्शित करने में कोई संकोच नहीं किया। यह ठीक है कि शशि थरुर और त्रिपाठी ने भी अध्यक्ष के चुनाव का फार्म भरा है लेकिन सबको पता है कि इनकी हालत वही होगी जो, 2000 में जितेंद्रप्रसाद की हुई थी।
उन्होंने सोनिया गांधी के विरुद्ध कांग्रेस-अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। उन जैसा शशि थरुर का भी हाल होने वाला है। हालांकि उन्होंने पहले दिग्विजयसिंह, अशोक गहलोत और अब खडग़े के बारे में बहुत ही गरिमामय ढंग से बात की है। 22 साल बाद होने वाले इस चुनाव से क्या कांग्रेस के हालात कुछ बदलेंगे? क्या यह डूबता हुआ सूरज फिर ऊपर उठ पाएगा? यह जाम हुआ चक्का क्या फिर चल पाएगा? कुछ भी कहना कठिन है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी पर माँ-बेटा राज तो अब भी पहले की तरह जोर से चलता रहेगा।
हालांकि खडग़े अनुभवी और सुसंयत नेता हैं और उन्हें कर्नाटक की विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में रहने के अनेक अवसर मिले हैं लेकिन कर्नाटक के बाहर उन्हें कौन जानता है? आम जनता की बात तो अलग है, कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी उन्हें ठीक से नहीं जानते। यह ठीक है कि जगजीवन राम के बाद वे ही पहले दलित हैं, जो कांग्रेस अध्यक्ष बनेंगे।
लेकिन नरेंद्र मोदी ने पहले रामनाथ कोविंद और अब द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर पहले ही नहले पर दहला मार रखा है। कांग्रेस का भाग्योदय अगर होता है तो वह नौकर-चाकरों के भरोसे नहीं हो सकता। उसके मालिकों को गर्व होना चाहिए कि उन्हें ऐसी बगावत नहीं देखनी पड़ रही है, जैसी इंदिरा गांधी ने देखी थी। मालिकों के इस दावे पर कौन भरोसा कर रहा है कि वे अध्यक्ष के इस चुनाव में निष्पक्ष हैं?
माँ-बेटे को खुशी होनी चाहिए कि जिन वरिष्ठ नेताओं ने बगावत की बांग लगाई थी, वे भी उनके आगे अब दुम हिला रहे हैं। इस अध्यक्षीय चुनाव से कांग्रेस के पुनरोदय की जो आशा बनी थी, वह धूमिल हो चुकी है। जब तक कांग्रेस के पास नरेंद्र मोदी का वैकल्पिक नेता और नीति नहीं होगी, वह इसी तरह लडख़ड़ाती रहेगी और भारतीय लोकतंत्र और कांग्रेस का यह दुर्भाग्य होगा कि वह लडख़ड़ाते-लडख़ड़ाते कहीं धराशायी ही न हो जाए। (नया इंडिया की अनुमति से)
कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर के बीच होगा. सवाल उठ रहे हैं कि अध्यक्ष अगर गांधी परिवार का प्रतिनिधि ही रहेगा तो फिर आखिर बदलाव क्या हुआ.
पढ़ें डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष के पद के लिए चुनाव के लिए दो नामों की घोषणा हो गई है. राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, लोक सभा सदस्य शशि थरूर और झारखंड सरकार में पूर्व मंत्री के एन त्रिपाठी ने अपना अपना नामांकन पत्र भर दिया है. करीब दो दशक बाद पहली बार गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति पार्टी का अध्यक्ष बनेगा.
मतदान 17 अक्टूबर को होगा और मतों की गिनती 19 अक्टूबर को होगी. गांधी परिवार के किसी सदस्य ने आधिकारिक रूप से खड़गे को समर्थन देने की घोषणा नहीं की है.
लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत के रेस से बाहर होने के बाद जिस तरह राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खड़गे को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया उसके बाद खड़गे की जीत तयमानी जा रही है.
अगर ऐसा होता है तो दशकों बाद कांग्रेस को एक दलित अध्यक्ष मिलेगा. मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि खड़गे के नामांकन पत्र के प्रस्तावकों में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी, दिग्विजय सिंह, अजय माकन, भूपिंदर हुड्डा, पृथ्वीराज चव्हाण, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे पार्टी के कई बड़े नेता शामिल हैं. इसे भी उनकी जीत का एक संकेत माना जा रहा है.
80 साल के खड़गे पार्टी के पर्चे बांटने वाले कार्यकर्ता, छात्र नेता, विधायक, सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. उन्हें लंबे समय से गांधी परिवार बड़ी जिम्मेदारियों के लिए चुनता आया है. वो 2014 से 2019 तक लोक सभा में कांग्रेस के नेता थे और 2021 से राज्य सभा में विपक्ष के नेता हैं.
अगर वो कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं तो यह देखना होगा कि वो कांग्रेस के "एक व्यक्ति, एक पद" सिद्धांत के तहत विपक्ष के नेता बने रहते हैं या नहीं. पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से संकेत यही मिल रहे थे कि भले ही गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव ना लड़ रहा हो, गांधी परिवार किसी ना किसी उम्मीदवार के पीछे खड़ा जरूर होगा.
राजस्थान की कथित बगावत से पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसी श्रेणी के उम्मीदवार थे, लेकिन 29 सितंबर को उन्होंने राजस्थान के घटनाक्रम पर अफसोस जताते हुए उसकी नैतिक जिम्मेदारी ली. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से माफी मांगी और अध्यक्ष पद की दौड़ से खुद को बाहर कर लिया.
बल्कि अब उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर भी संदेह है. उन्होंने खुद संकेत दिया कि उन्होंने सोनिया गांधी के सामने अपने इस्तीफे की पेशकश भी की. संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के मुताबिक राजस्थान के मुख्यमंत्री के विषय पर सोनिया गांधी दो दिनों में फैसला देंगी. (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने भारत की महिलाओं के अधिकारों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। उसने अपने ताजातरीन फैसले में सभी महिलाओं को गर्भपात का अधिकार दे दिया है, वे चाहे विवाहित हों या अविवाहित हों। भारत में चले आ रहे पारंपरिक कानून में केवल विवाहित महिलाओं को ही गर्भपात का अधिकार था। वे गर्भ-धारण के 20 से 24 हफ्ते में अपना गर्भपात करवा सकती थीं लेकिन ऐसी महिलाएं, जो अविवाहित हों और जिनके साथ बलात्कार हुआ हो या जो जान-बूझकर या अनजाने ही गर्भवती हो गई हों, उन्हें गर्भपात का अधिकार अब तक नहीं था।
उसका नतीजा क्या होता रहा? ऐसी औरतें या तो आत्महत्या कर लेती हैं, या छिपा-छिपाकर घर में ही किसी तरह गर्भपात की कोशिश करती हैं या नीम-हकीमों और डॉक्टरों को पैसे खिलाकर गुपचुप गर्भमुक्त होने की कोशिश करती हैं। इन्हीं हरकतों के कारण भारत में 8 प्रतिशत गर्भवती औरतें रोज मर जाती हैं। लगभग 70 प्रतिशत गर्भपात इसी तरह के होते हैं। जो औरतें बच जाती हैं, वे इस तरह के गर्भपातों के कारण शर्म और बिमारियों की शिकार हो जाती हैं।
भारत में गर्भपात संबंधी जो कानून 1971 और संशोधित कानून 2021 में बना, उसमें अविवाहित महिलाअेां का गर्भपात गैर-कानूनी या आपराधिक माना गया था। अब सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसी ही महिला के मामले पर विचार करते हुए सभी महिलाओं को गर्भपात की छूट दे दी है। जाहिर है कि संसद अब इस आदेश को लागू करने के लिए कानून बनाएगी। इसके साथ-साथ अदालत ने यह भी माना है कि यदि कोई विवाहित स्त्री अपने पति के बलात्कार के कारण गर्भवती हुई है तो उससे भी गर्भपात की छूट देनी चाहिए।
यह जरुरी नहीं है कि जो भी अविवाहित महिला गर्भवती होती हैं, वह व्यभिचार के कारण ही होती है। इसके अलावा गर्भपात के लिए अन्य कई अनिवार्य कारण भी बन जाते हैं। उन सब पर विचार करते हुए अदालत का उक्त फैसला काफी सही लगता है लेकिन डर यही है कि इसके कारण देश में व्यभिचार और बलात्कार की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जैसा कि यूरोप और अमेरिका में होता है।
दुनिया के 67 देशों में गर्भपात की अनुमति सभी महिलाओं को है। कुछ देशों में गर्भपात करवाने के पहले उसका कारण बताना जरुरी होता है। केथोलिक ईसाई और मुस्लिम राष्ट्रों में प्राय: गर्भपात के प्रति उनका रवैया कठोर होता है लेकिन सउदी अरब और ईरान जैसे देशों में इसकी सीमित अनुमति है। दुनिया के 24 देशों में अभी भी गर्भपात को अपराध ही माना जाता है।
भारत में गर्भपात की अनुमति को व्यापक करके सर्वोच्च न्यायालय ने स्त्री-स्वातंत्र्य को आगे बढ़ाया है लेकिन तलाक के पेचीदा कानून में भी तुरंत सुधार की जरूरत है। तलाक की लंबी मुकदमेबाजी और खर्च से भी लोगों का छुटकारा होना चाहिए। इस संबंध में संसद कुछ पहल करे तो वह बेहतर होगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
डॉ . अरविन्द नेरल
1 अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर विशेष
बहुत दिन पहले एक कहानी सुनी थी एक वृद्ध के उस संदूक की , जिस पर लटकता मोटा ताला उसके बेटों और बहुओं को यह एहसास कराता रहता था कि बूढ़े के पास अब भी कोई मोटी रकम है और उसे चतुराई के साथ थोड़ी सी चाटुकारी और सेवा टहल करके हथिया लिया जा सकता है। लेकिन वृद्ध ने जब आखरी सांस तो उस मोटे ताले और खाली संदूक की पोल खुली। फिर तो उसकी आत्मा को जमकर कोसा गया।
जी भर जली कटी सुनाई गई , जो इतने लंबे समय तक हर किसी को धोखे में रखकर मुफ्त में इतनी सेवा टहल करवाता रहा । लेकिन किसी को इस घटना के मूल कारण बूढ़ापे के उस दर्द का एहसास नहीं हुआ बुढ़ापे की बेचारगी का वह दर्द , जिसका बोझ वह लाचार बूढ़ा स्वयं बरसों तक ढोता रहा । महज दो निवालों की भूख के चलते बुढ़ापे की यह दास्तान कोई हवाई कयास नहीं कोरी कल्पना अथवा गप नहीं , बल्कि 7 • यथार्थ को झेलते जीवन की दास्तान है , उस निराश्रित से असहाय वृद्ध के जीवन की , जिसके हाथ में टेक लेने के लिए सिर्फ लाठी ही तो है।
जीवन के चौथेपन की मजबूरियों और मोहताजी की गूंज आज हर घर या हर आलीशान कोठी के बंद झरोखों के भी बाहर तक सुनाई देती है । सफेद पत्थरों से बने बेटों के आलीशान भवन में एक ऐसी अंधेरी कोठरी भी होती है , जहां घर के फालतू सामान के साथ साथ पिता को भी रख दिया जाता है। भारी पर्दों वाले घरों की कैसी बेपर्दगी है यह जो इन घरों की नींव रखने वालों कोउफ तक नहीं करने देती ।
जिन चरणों की धूल कभी हर माथे की शोभा होती थी , उसी से आज घर की चौखट के मैली होने की सोच हमारे सामाजिक सांस्कृतिक गिरावट की पराकाष्ठा है। आज की अपसंस्कृति से विकृत जीवन शैली वास्तव में हर बात को उससे होने वाले लाभ और हानि के पैमाने पर परखती है । वृद्ध भी इसी परख का शिकार होकर रह गये हैं। दादा दादी, नाना नानी के साथ नाती पोतों का हाथ पकडक़र चलना , उनके साथ - - स्कूल जाना , खाना पीना , सोना अब किस्से कहानी के अंग बनकर रह गए हैं । उनके दोस्त ( नाती पोते ) भी कंप्यूटर फ्रेंडली हो चले हैं । उपेक्षित बुढ़ापा सुबह उठते ही ईश्वर से मौत की दुआ मांगता है इसलिए उनके दर्द को समझने के लिए शब्दों की नहीं , संवेदना की जरूरत है।
आजादी के वक्त सन् 47 में जहां जीने की औसत उम्र 35 वर्ष के आसपास हुआ करती थी , वहीं आज औसतन 6 4 वर्ष की उम्र तक मनुष्य जी रहा है । भारत में बुजुर्गों की संख्या कुल जनसंख्या का 9.6 प्रतिशत है। यह छोटी संख्या भी भारत की अत्यधिक जनसंख्या के संदर्भ में 138 मिलियन जैसा बड़ा आंकड़ा है।
एक अनुमानानुसार सन् 2025 तक यह संख्या 175 मिलियन ( लगभग 13 प्रतिशत ) होगी । जनसंख्या संबंधित कुछ और आंकड़े हैं जो बुजुर्गों की ओर अधिक ध्यान दिए जाने का आग्रह करते हैं । मसलन इसमें 90 प्रतिशत लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है । 80 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं 55 प्रतिशत बुजुर्ग महिलाएं विधवा है और 73 प्रतिशत अशिक्षित है ।
लगभग आधे बुजुर्गों को कोई न कोई लंबी बीमारी है और तकरीबन 4 मिलियन वृद्धजनों को मानसिक रोग है । सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली आर्थिक सहायता महज 10 प्रतिशत नौकरीपेशा लोगों को ही नसीब है। असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को यह लाभ नहीं मिलता। 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर पर समाज के इस महत्वपूर्ण वर्ग के प्रति हमें अपने उत्तरदायित्वों पर चिंतन मनन करने की जरूरत है ।
वृद्धजनों की ब?ती संख्या और उसके फलस्वरूप उनकी सामाजिक , आर्थिक , शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की और लोगों में चेतना और समझ पैदा करने की जरूरत है । अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने पर 60 . वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी अपनी तरह की अलग रचनात्मक जिंदगी गुजर बसर कर सकते हैं और समाज को सक्रिय योगदान दे सकते हैं । एक ऐसे माहौल के निर्माण की आवश्यकता है कि जहाँ वे रिटायर होने के बाद भी टायर्ड थका हुआ ) महसूस न करें बल्कि अपने आपको रिडिप्लायड ( पुर्नस्थापित करते हुए जिंदगी के अंतिम पड़ाव को भी सार्थकता प्रदान कर सकें ।
एक निवेदन बुजुर्गों से कि उन्हें भी अपनी सोच बदलनी होगी । उन्हें अपनी बची क्षमता प्रतिभा का लाभ समाज व राष्ट्रहित में सुनियोजित प्रक्रिया से देना होगा । इसके लिए उनका संगठित होना आवश्यक है । वृद्धजन समाज व राष्ट्र निर्माण में अपने अनुभव और कौशल से योगदान दें , तो उनकी छवि बदलेगी अपने वर्चस्व और आदर सम्मान की लड़ाई उन्हें स्वयं ढ्ढ स्न लडऩी होगी । ढलती आयु में भी अपनी उपयोगिता सिद्ध करते हुए उन्हें परिवार व समाज में स्थान बनाना होगा । समाज के विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के साथ सामंजस्य बनाए रखना भी वृद्धों के लिए आवश्यक है । समाज के इस बहुमूल्य और अनुभवी संसाधन का समाज की बेहतरी के लिए अधिकतम इस्तेमाल करना जरूरी है । पुराने लोग नया हौसला भी देंगे , बुजुर्गों से . मिलते रहिए दुआएं देंगे क . (चेयरमेन आश्रय लायन्स वृद्धाश्रम)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यूक्रेन के चार क्षेत्रों में रूस ने जनमत संग्रह करवा लिया और अब अगले सप्ताह उन चारों क्षेत्रों को वह रूस में मिला लेगा। उन्हें वह रूस का हिस्सा बना लेगा। ये चार क्षेत्र हैं- दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसान और झपोरीझाझिया! इन चारों क्षेत्रों से लाखों यूक्रेनी भागकर अन्य यूरोपीय देशों में चले गए हैं। ये चारों क्षेत्र मिलकर यूक्रेन की 15 प्रतिशत भूमि में हैं। इन क्षेत्रों में ज्यादातर रूसी मूल के लोग रहते हैं।
यूक्रेन कई दशकों तक सोवियत रूस का एक प्रांत बनकर रहा है। इसके पहले भी दोनों देशों में सदियों से घनिष्टता रही है। यूक्रेनी लोग रूस में बसते रहे और रूसी लोग यूक्रेन में लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद याने यूक्रेन के अलग होने के बाद रूसी और यूक्रेनी लोगों के मतभेद बढ़ते गए। उक्त चारों इलाकों के रूसी मूल के लोग रूस में मिलने के छोटे-मोटे आंदोलन भी चलाते रहे हैं लेकिन रूस ने उस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया।
अब क्योंकि नाटो देशों ने यूक्रेन पर भी डोरे डालने शुरु कर दिए थे, इसीलिए रूसी नेता व्लादीमीर पूतिन ने यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। उन्होंने इन चारों क्षेत्रों में पांच दिनों तक जनमत संग्रह की नौटंकी रचकर इन्हें रूस में मिलाने की घोषणा कर दी है। इस जनमत संग्रह में 87 से 99 प्रतिशत लोगों ने रूस में विलय के पक्ष में वोट दिए हैं। यूक्रेनी नेताओं ने कहा है कि यह जनमत संग्रह शुद्ध पाखंड है।
रूसी फौजियों ने घर-घर जाकर पेटियों में लोगों से जबर्दस्ती वोट डलवाए हैं। यह पता नहीं कि वोटों की गिनती भी ठीक से हुई है या नहीं? या गिनती के पहले ही परिणामों की घोषणा हो गई है? यूक्रेन की इस आपत्ति को रूसी नेताओं ने निराधार कहकर निरस्त कर दिया है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस तरह का जनमत-संग्रह उचित और व्यावहारिक है?
रूस ने सीधे कब्जा नहीं किया और उसकी जगह जनमत-संग्रह करवाया यह बेहतर बात है लेकिन यदि इसे सही मान लिया जाए तो आज की दुनिया के कई देशों के टुकड़े हो जाएंगे। पड़ौसी देशों के विधर्मी और विजातीय लोग लाखों-करोड़ों की संख्या में आकर किसी भी देश में बस जाएं तो क्या वे अपना अलग देश बनाने या अपने मूल देश में मिलने के अधिकारी हो सकते हैं?
यदि ऐसा होने लगे तो पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार जैसे कई देशों के टुकड़े होने लगेंगे, क्योंकि इन देशों के कई जिलों और प्रांतों में पड़ौसी देशों के लोगों की बहुतायत है। दक्षिण एशिया ही नहीं, दुनिया के लगभग सभी देशों में यह उपक्रम संकट उपस्थित कर सकता है। वह जन-संग्राम और अंतरराष्ट्रीय युद्धों का कारण भी बन सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
परिवार समेत शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी कहीं भुला तो नहीं दिये जाएंगे ?
-अभिषेक उपाध्याय
40 साल से हर दिन बारी-बारी से नियमित सुंदरकांड पढ़ने, भगवान की भक्ति में लीन रहने वाली रायगढ़ की त्रिपाठी दंपति के लिए अब सब कुछ बदल गया। भगवान की जगह चिराग और अगरबत्ती उनके बेटे-बहू-नाती के फोटो के आगे जल रहे हैं। करीब 6 महीने लगे 73 वर्षीय माँ आशा त्रिपाठी को बेटे की शहादत को स्वीकार करने में, वह घर से बाहर नहीं निकल रहीं। अफसोस भरी हर आंखों का सामान कठिन होता है।

77 साल के सुभाष त्रिपाठी हर शाम को अपने पोते से मिलने जाते हैं। पोता उन्हें मिलता है ठीक चिल्ड्रेन पार्क के बगल में, चिल्ड्रेन पार्क में कई सारे बच्चे खेल रहे होते हैं इन्हीं में से एक आवाज 8 वर्षीय अबीर की होती है, शायद नहीं। वह बगल के श्मशान घाट में अपने दादा का इंतजार कर रहा होता है। उसकी आवाज सिर्फ दादा को ही सुनाई देती है। बड़े इत्मीनान से दादा वहां कुछ देर अकेले उसकी कब्र के ऊपर अपने हाथ फिराते और उससे अपनी बात कहते। ललाट के पसीने और आंसू में कोई फर्क नहीं कर सके इसलिए वह धीमे-धीमे 3 किलोमीटर दूर उसके पास जाते और फिर लौट आते अगले दिन की तैयारी के लिये। दादा को एक बात का सुकून है कि जब वो आखिरी बार अबीर से मिले थे वह उन्हें जल्दी आने को कह रहा था। जब वह इस कब्र में गया तो उसे किसी को दिखाया नहीं गया।
अबीर त्रिपाठी, सबसे कम उम्र का शहीद 7 वर्षीय बच्चा। उसकी एकमात्र ख्वाहिश थी कि वह अपने पापा की तरह आर्मी ऑफिसर बनेगा। कम उम्र में वह वॉर रूम प्लानिंग का खेल अपने पिता शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी के साथ खेलता। बाप-बेटे को साथ देख दादा सुभाष त्रिपाठी से ज्यादा कौन खुश होता। वक्त का तकाजा देखिये कि तीनों के शव को कांधा इन्होंने ही दिया। वह कहते हैं कि हम चाहते थे कि अबीर आर्मी ऑफिसर बने पर जीवन के आठवें दशक में प्रवेश करने के कारण जब वह ऑफिसर बनता तो शायद हम जिंदा रहते। वह दादा का दुलारा था तो उसने मेरे जीते जी शहीद होने का दर्जा पा लिया।
अबीर त्रिपाठी ने अपनी माता अनुजा और पिता कर्नल विप्लव त्रिपाठी के साथ बीते साल 13 नवंबर को मणिपुर के चूड़ाचांदपुर में शहादत पाई। भारतीय सैन्य इतिहास में शायद यह पहली मर्तबा होगा कि एक सैन्य अधिकारी की परिवार समेत उग्रवादियों ने घात लगाकर हत्या कर दी।
शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी, कमाडेंट, 46 वीं बटालियन, असम राइफल्स को गैलेंट्री अवार्ड (वीरता सम्मान) दिलाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर ग्राउंड स्तर पर प्रयास शुरू हो चुके हैं। परिजन, आमजन राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधियों-अधिकारियों से पत्राचार कर रहे हैं। लोग सोशल मीडिया में खूब लिख रहे हैं। स्थानीय लोग छोटे-छोटे समूह बनाकर सेना से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं।
इनकी शहादत को 10 माह बीत चुके हैं सेना खामोश है। राज्य सरकार मौन धरे हुए है। सिंघट पोस्ट पर जवानों को खुद उत्साहवर्धित कर और पत्नी अनुजा त्रिपाठी आर्मी वेलफेयर वर्किंग कमेटी की मुखिया मेडिकल इंस्पेक्शन रूम का उद्याटन कर जवानों को संबल देकर 12 नवंबर की शाम को बेस लौटना चाह रहे थे। उनको अगले दिन के लिए रोका जाता है। अगला दिन यानी 13 नवंबर पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादियों का नो मूवमेंट डे होता है। यह बात भारतीय सेना भली भांति जानती है। लेकिन उस दिन क्यों कर्नल विप्लव त्रिपाठी को जाने का आदेश दिया जाता है। जबकि खुफिया तंत्रों ने उग्रवादियों द्वारा किसी बड़े हमले के लिए आगाह किया था। हालांकि यह सब सेना स्तर पर जांच का विषय है और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) इस मामले को देख रही है। सेना के सूत्र बताते हैं कि सेना स्तर पर कोर्ट ऑफ इंक्वायरी हुई और नतीजा क्या हुआ अज्ञात है।

अब असल मसला आता है शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी को भारतीय सैन्य वीरता सम्मान देने का तो वह इसके किस वर्ग में नहीं समाते, यह भी बड़ा सवाल है। कायदे से उनकी यूनिट असम राइफल उनके नाम को वीरता सम्मान के लिए भेजती पर अभी तक उन्होंने नहीं भेजा, शायद इसके पीछे सैन्य प्रशासन से जुड़े तकनीकी कारण हो सकते हैं। क्यूआरटी के शहीद हुए 4 जवान को भी अभी तक पहचान नहीं मिली।
यह वही कर्नल विप्लव त्रिपाठी हैं जिन्होंने इससे पहले की अपनी पोस्टिंग मिजोरम में 46 असल राइफल्स के कमांडेंट रहते हुए म्यांमार बॉर्डर पर ड्रग्स माफियाओं और तस्करों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई की थी। मणिपुर बार्डर में भी इनका यही तेवर कायम रहा। तो कहीं सिस्टम की भेंट तो नहीं चढ़ गए कर्नल विप्लव त्रिपाठी। क्योंकि जब इनके नाम को वीरता सम्मान पदक के लिए भेजा जाएगा तो परिस्थितियों का भी जिक्र होगा जिसका संस्था कभी वर्णन नहीं करना चाहती। लेकिन एक सैन्य अधिकारी अपने परिवार समेत शहीद हुआ है। उसने अपने अपने राइफल की पूरी कारबाइन खाली कर दी और सर्विस रिवाल्वर की सारी गोली दुश्मनों पर चलाई फिर भी वह नहीं बच सका और न ही अपने जवानों और परिवार को बचा सका। एक सोची समझी रणनीति का शिकार उसके साथ 4 जवान और 2 परिजन हुए जिसमें उसका 7 साल का बेटा और पत्नी भी शामिल थीं। शहादत की इससे बड़ी कोई और परिभाषा है तो कोई बताए।
शहीद की मां आशा त्रिपाठी रिटायर्ड शासकीय कर्मचारी हैं, 6 महीने तक बदहवास रहने वाली माता को संबल मिला तो उन 4 शहीदों को परिजनों से मिलकर जिनकी उन्होंने यथासंभव मदद की। अब देश के सैन्य अकादमियों में जाकर बेटे-बहू-नाती की स्मृति में कुछ करने की योजना बनाई है। क्योंकि पैसा उनके लिए मायने नहीं रखा मायने हैं तो बेटा-बहू और नाती की स्मृति को बनाए रखना।
छोटा भाई कर्नल अनय त्रिपाठी सेना के कायदे कानून के ऊपर कुछ नहीं सोचता बड़े भाई विप्लव की यही सीख उसने गांठ बांधी है। दोनों भाइयों की मिसाल पूरा रायगढ़ देता है जिनके लिए वे बुलु और बुबलु रहे कोई अधिकारी नहीं। रायगढ़ कभी जान ही नहीं पाया कि विप्लव कितने बड़े अधिकारी थे क्योंकि वह अपने शहर में बुलु रहते हर किसी से एकदम शालीनता से मिलते। पर जब वह गए तो शहर के घरों के चूल्हे बमुश्किल जलें हो। पूरा रायगढ़ उनके आखिरी दर्शन को आया था। बड़े भाई के परिवार की अनुपस्थिति ने छोटे भाई के परिवार को एकाएक वयस्क बना दिया। यहां तक कि 7 वर्षीय ताशी अपना बचपन भूल चुकी है।
समाजसेवक गोपाल अग्रवाल कहते हैं “ बीते कई दिनों से मुख्यमंत्री रायगढ़ जिले में घूम रहे हैं पर उनके पास 1 मिनट का समय शहीद के परिवार से मिलने का नहीं है। शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी की परिवार समेत शहादत पर क्या किसी को कोई शक है। 10 महीने बाद भी उनकी शहादत को किसी तरह की पहचान हीं मिली, आखिर क्यों? जो रायगढ़ की जनता चाहती उससे सरकार को क्या एतराज हो सकता है। जनभावना के साथ यह कैसा खिलवाड़। सिर्फ एक मैदान के आधे –अधूरे नामकरण से जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते वैसे भी यह नगर निगम का फैसला है।“
स्थानीय युवा लक्ष्मीकांत दुबे कहते हैं : "रायगढ़ पिछड़ा क्षेत्र है यहां आर्मी कल्चर है नहीं। पंडालों में शहीद की फोटो, कवि सम्मेलन और क्रिकेट टूर्नामेंट से लोग यदा-कदा याद कर रहे हैं। पर जनप्रतिनिधियों ने तो एक निर्जन मैदान को शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी का नाम देकर अपनी पीठ थपथपा ली है और सूबे के मुखिया भी खुश हैं। जिन्होंने सिर्फ एक ट्वीट कर अपनी संवेदना जताई। हां, लखीमपुर में सड़क हादसे में मरे लोगों को 50-50 लाख मुआवजा बांट देते हैं। पर जब उनके राज्य के शहीद की बात आती है तो चुप हो जाते हैं। मैंने शहीद विप्लव के घर पास कोतवाली परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित करने के लिए पत्र व्यवहार भी किया था लेकिन उसका जवाब अब तक नहीं आया। "
शहादत के समय कई नेता-अधिकारी आए। उन्हीं में से एक ने बताया कि मुख्यमंत्री शहीद परिवार को रायपुर में श्रद्धांजलि देना चाहते थे। घटना के तीसरे दिन 15 नवंबर को लेकर वायुसेना का विमान सीधे रायगढ़ आ गया। इससे शायद उन्हें आघात लगा हो और उन्होंने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया होगा। वरना मुख्यमंत्री का इनके पास आना तो बनता था। हादसा 13 नवंबर को हुआ, शव क्षत-विक्षत थे, 14 को सेना की मेडिकल टीम ने इन्हें जोड़कर दिया पर मणिपुर के मुख्यमंत्री के इंतजार में 14 की जगह 15 नवंबर को विमान रायगढ़ पहुंचा। इधर देर होने के कारण परिजन व्याकुल थे और समय पर अंतिम संस्कार करना जरूरी था। अगर विमान रायपुर होते आता तो अंतिम संस्कार में एक दिन और लग सकता था। सनद रहें बारूद का घाव का शरीर को तेजी से खराब करता है।
तीन महीने पहले स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव रायगढ़ आए तो शहीद को नमन करने गए। परिजनों से बात करने के बाद उन्होंने कहा कि सैन्य संस्थानों में दिये जाने वाले पुरस्कार के नाम को शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी के नाम करने के लिए वह प्रयास करेंगे। पर उनके प्रयास अभी तक नहीं दिख रहे। पर इस मसले पर मुख्यमंत्री का रवैया समझ के परे है।
करते हैं कुछ : सीएम भूपेश बघेल
सितंबर की शुरुआत में करीब 7 दिन मुख्यमंत्री लगातार रायगढ़ दौरे पर थे, कर्नल विप्लव की शहादत के बाद पहली आये थे। कई सभा की, पर कहीं उनका ज़िक्र नहीं किया। उनसे भेंट मुलाकात में पत्रकारों ने पूछ ही लिया तो जवाब गोलमोल देने लगे, बचते रहे। अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में शहीद को गैलेंट्री अवार्ड देने के लिए राज्य सरकार की ओर से क्या किया जा रहा है पर उन्होंने कहा स्टेडियम का नाम रख दिया है। आगे देखते हैं।
रक्षामंत्री और गृहमंत्री से बात करूंगी: सांसद गोमती साय
रायगढ़ की सांसद गोमती साय ने कहा :” शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी पर पूरे देश को गर्व है देश सेवा में उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उन्हें सैन्य वीरता सम्मान दिलाने के लिए मैंने प्रधानमंत्री से पत्र व्यवहार किया है। दिल्ली के अगले दौरे में रक्षामंत्री और गृहमंत्री से मुलाकात कर शहीद को वीरता सम्मान के संदर्भ में जरूर बात करूंगी।“
खैर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य पंडित किशोरी मोहन त्रिपाठी के पौत्र ने अपने खानदान की लेगेसी बनाए रखी। दादा के साथ वह मुग़ल गार्डन में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मिला था, 5 साल के विप्लव में वहीं से फौज में जाने की प्रेरणा मिली।
यहां यह भी बताना होगा कि चाहे युद्ध काल हो या शांति का समय देश की सुरक्षा के लिए सैनिकों और सैन्य अधिकारियों को सम्मानित करने की सुदृढ़ परंपरा भारत सरकार की रही है। यही नहीं यह भारत सरकार का नैतिक दायित्व भी है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले कई वर्षों से मैं लिख रहा हूँ कि हमारी सरकारें जो दावे करती रही हैं कि देश की गरीबी घटती जा रही है, वे मुझे सही नहीं लगते। यह ठीक है कि देश में अमीरी भी बढ़ रही है और अमीरों की संख्या भी बढ़ रही है लेकिन यदि हम गरीबी की सही पहचान कर सकें तो हमें मालूम पड़ेगा कि देश में हमारे आम लोग गरीब से गरीबतर होते जा रहे हैं। मंहगाई बढ़ती जा रही है, आमदनी घट रही है और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी दूभर हो रही है।
एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था, ‘फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी’ के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत के 80 प्रतिशत लोग 163 रु. रोज से भी कम खर्च कर पाते हैं। जऱा हम सोचें कि क्या डेढ़ सौ रु. रोज में कोई आदमी अपने भोजन, कपड़े, निवास, चिकित्सा और मनोरंजन की व्यवस्था कर सकता है? बच्चों की शिक्षा, यात्रा, ब्याह-शादी आदि के खर्चों को आप न भी जोड़ें तो भी आपको मानना पड़ेगा कि भारत के लगभग 100 करोड़ लोग गरीबी की जिंदगी गुजार रहे हैं।
हमारे लोगों के दैनंदिन जीवन की तुलना जरा हम यूरोप और अमेरिका के लोगों से करके देखें। शहरों और गांवों के उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों को छोड़ दें और देश के अन्य ग्रामीण, पिछड़े, मेहनतकश लोगों को जरा नजदीक से देखें तो हमें पता चलेगा कि वे मनुष्यों की तरह जी ही नहीं पाते हैं। भारत में शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच इतनी गहरी खाई है कि मेहनतकश लोग पशुओं सरीखा जीवन जीने के लिए मजबूत होते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि उत्तम भोजन, उत्तम वस्त्र और स्वच्छ निवास कैसा होता है?
गरीबी की रेखा को सरकारें ऊँचा-नीचा करती रहती हैं लेकिन करोड़ों लोग कुपोषण के शिकार होते हैं। इसका पता कौन रखता है? देश के लाखों लोगों के पास अपने इलाज के लिए पर्याप्त पैसे ही नहीं होते। वे इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं।
पैसेवालों के लिए ठाठदार निजी अस्पताल हैं, उनके बच्चों के लिए निजी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय हैं, सरकारी कर्मचारियों और नेताओं के लिए तरह-तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन जिन 100 करोड़ लोगों को गरीबी की रेखा के ऊपर बताया जा रहा है, उनकी हालत तो आज भी दयनीय है। देश के 116 करोड़ लोग खुद पर रोज़ 163 रु. से भी कम खर्च कर पाते हैं लेकिन 20 लाख ऐसे भी हैं, जिनका खर्च 4 हजार रु. रोज़ से भी ज्यादा है याने एक साधारण आदमी एक माह में जितना खर्च करता है, उतना खर्च अमीर लोग रोजाना कर डालते हैं।
अमीरी-गरीबी की इस खाई को पाटने के बारे में क्या हमारे नेता कभी कुछ सोचते हैं? हमारे देश के करोड़ों लोग सूखी रोटियों पर गुजारा करते हैं, फटे-टूटे कपड़े-जूते पहनते हैं और झुग्गी-झोंपडिय़ों में अपने दिन काटते हैं। भारत में दान-धर्म का चलन बहुत है लेकिन इससे क्या अमीरी-गरीबी खाई पट पाएगी? (नया इंडिया की अनुमति से)
-अपूर्व गर्ग
अपराध पहाड़ों पर कभी न चढ़ सका था। पहाड़ों से आती अपराध की खबरें एक डंक सी चुभती हैं, खासकर तब जब अपराध की शिकार बेटियां हो रही हों।
जाहिर है जब पूरे देश में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं तो अब पहाड़ कैसे बचते?
एनसीआरबी की रिपोर्ट से भी जाहिर है 2021 में ही महिलाओं पर हुए अपराधों में 15.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि 2012 में निर्भया कांड के बाद बीजेपी महिलाओं की सुरक्षा के वायदे के साथ केंद्र की सत्ता में आई।
खतरनाक बात है शांत और अपराधमुक्त रहने वाले पहाड़ों से अमानवीय, बर्बर और दहला देने वाली खबरों का आना।
अंकिता पर हुई हैवानियत से उत्तराखंड की उखड़ी-उखड़ी अपराध ग्रस्त तस्वीर सामने है।
जरा गौर फरमाइए हिमाचल की तस्वीर और भी भयावह मिलेगी। अब हिमाचल के पहाड़ों से अपराध रिस-रिस कर हिमाचल को कैसे दागदार बना रहे कभी गौर करिये।
2017 में हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित कोटखाई में गुडिय़ा गैंगरेप-मर्डर के बाद सत्ता में आयी और महिला सुरक्षा च्ज् के तहत 8 घोषणाएं जोर-शोर से की गईं।
उत्तराखंड में जिस तरह महिलाओं पर हुए अपराधों में 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी और बलात्कार में 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई ठीक वैसे ही पड़ोसी हिमाचल प्रदेश में बलात्कार के मामले 2016 में जो 244 थे, वो 2018 में बढक़र 345, 2019 में 360 ,2020 में 333, 2021 में लगातार बढ़ते 359 हुए।
दोनों प्रदेशों में बीजेपी की सरकार जिसने घोषणा पत्र में महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े वायदे किए।
उत्तराखंड में चुनाव हो चुके और अब हिमाचल की बारी है। गुडिय़ा काण्ड के बाद हिमाचल की जनता को 2017 के घोषणा पत्र जिसे स्वर्णिम हिमाचल दृष्टि पत्र कहा गया और अपराध मुक्त हिमाचल की बात की गई हुआ बिल्कुल उल्टा।
2004 में जहां महिलाओं पर हुए अपराधों के 910 मामले दर्ज किए गए थे वहीं 2021 में यह संख्या बढक़र 1700 तक जा पहुंची है।
ये है वो ‘वर्णिम’ सुरक्षा जो हिमाचल की महिलाओं को जयराम सरकार ने दी।
इनसे पूछिए उत्तराखंड हो या हिमाचल आखिर शांत अपराधमुक्त पहाड़ों का इन्होंने ये क्या हाल कर दिया?
इनके खुद के नेता के बेटे ने उत्तराखंड का सिर दुनिया में झुका दिया।
हिमाचल में महिलाओं पर अपराध बहुत बढ़े हैं। स्वर्णिम घोषणा पत्र के बाद अब कौन सा हीरक आश्वासन देंगे?
उत्तराखंड में ये चुनाव जरूर जीत चुके पर हिमाचल अभी बाकी है।
पहाड़ों की बेटी अंकिता के साथ जो बर्बरता हुई उससे जितना क्रोधित उत्तराखंड है उतना ही हिमाचल भी।
कभी पहाड़ों पर बेटियां तितली की तरह निर्भीक होकर उड़ा करतीं।
पर अब पहाड़ों में अपराध बढ़ रहे, पहाड़ इंसाफ मांग रहे। पहाड़ों में बैठी ये सरकारें न सुरक्षा दे पा रहीं न कर पा रहीं इंसाफ।
दो महीने बाद हिमाचल में चुनाव हैं। हिमाचल से एक बड़ा परिवर्तन शुरू होना चाहिए। एक ऐसा परिवर्तन जो पहाड़ों की ही नहीं मैदानों की बेटियों को भी महसूस हो।
हिमालय से ऐसी शीतल बयार का सबको इंतजार है।
-अरुण माहेश्वरी
यह कांग्रेस का जगत है । सचमुच, भारत की राजनीति के परम ऐश्वर्य का जगत । राजनेताओें के अच्छे-बुरे, सारे लक्षणों की लीला-भूमि का राजनीतिक जगत । आलाकमान की आत्म रति और क्षत्रपों की स्वतंत्र मति-गति । सब साथ-साथ । राजनीति के दुखांत और प्रहसन, अर्थात् उदात्तता और क्षुद्रता, सबके साथ-साथ प्रदर्शन का एक खुला रंगमंच । राजा, वज़ीर, घोड़ों, हाथियों, ऊँटों और प्यादों की अपनी-अपनी चालों और गतियों के शह और मात के अनोखे खेल वाला राजनीति की अनंत संभावनाओं का शतरंज ।
दक्षिण के एक छोर पर भारत के जन-मन को आलोड़ित करती ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और उत्तर के पश्चिमी किनारे पर राजनीति में महलों की काली साज़िशों वाला ‘राजस्थान’ । राजनीति के ‘जन’ और ‘तंत्र’ के दोनों ही रूप साथ-साथ । जिस गहलोत को कल तक पूरी कांग्रेस की बागडोर थमाया जाना तय था, वही अचानक एक अनुशासनहीन बाग़ी कहलाने लगे । और जो पायलट चंद रोज पहले ही घोषित बाग़ी की शत्रु की भूमिका में दिखाई दिया था, उसे ही कांग्रेस में अपनी धुरी की धुन में खोया हुआ आलाकमान अपनी आंख का तारा बन कर बिना नींव के महल का राजा बनाने पर आमादा है । परिणाम सामने हैं । एक ओर जहां भारत जोड़ो यात्रा जारी है और दूसरी ओर कांग्रेस के अध्यक्ष की तलाश भी जारी है । लेकिन इस समग्र जनतांत्रिक और राजनीतिक चर्वणा के बीच जो तय हो चुका है वह यह कि आलाकमान और क्षत्रप, कांग्रेस में दोनों अपनी-अपनी जगह बदस्तूर कायम है और रहेंगे । पार्टी का आलाकमान होने का अर्थ है उसका परम तत्त्व, उसका परमेश्वर और उसके क्षत्रप देश-काल की सीमाओं में उस परमेश्वर की स्वतंत्रता के नाना रूप । कांग्रेस हमेशा से कमोबेस इसी प्रकार केंद्रीयता और संघवाद, स्थानीयतावाद के बीच के संतुलन को साधती रही है । गांधी जी भी कभी अपने को कांग्रेस का अधिनायक कह चुके हैं ।
अभी के कांग्रेस के नए अध्यक्ष के चुनाव और राजस्थान संकट के संदर्भ में निश्चय के साथ सिर्फ यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस को जल्द ही अपना एक नया अध्यक्ष मिलेगा, और अगर यात्रा इसी प्रकार पांच महीनों के लंबे और कठिन रास्ते को तय करती हुई अपने गंतव्य तक पहुंचती है तो उसी के बीच से कांग्रेस ही नहीं, देश के लिए भी निश्चित तौर आगे के नए रास्ते खुलते दिखाई देंगे ।
और, जहां तक राजस्थान का सवाल है, देखने की बात होगी कि कांग्रेस के पुनरोदय के वर्तमान साफ संकेतों, उसके अंदर यात्रा के जरिए नए कार्यकर्ता-नेताओं के निर्माण की संघर्षशील धारा के बीच भी पार्टी के अंदर का संघवाद (क्षत्रपवाद) और अभी के विधायकों आदि का व्यक्तिवाद, उनके तथाकथित जातिवादी और स्थानीय समूहों के समीकरण आगे किस रूप और किस हद तक अपने को बनाए रख पायेंगे । यह सबक सिर्फ कांग्रेस नहीं, सभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक राजनीतिक पार्टियों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा ।
कांग्रेस में आज ‘यात्रा’ और ‘क्षत्रपवाद‘ को लेकर जो चर्वणा चल रही है, वह हमें गांधीजी की उस बात की याद दिलाता है जो 12 मार्च 1930 के दिन साबरमती आश्रम से दांडी मार्च के लिए कूच करने के पूर्व कांग्रेस वर्किंग कमेटी के अपने साथियों से उन्होंने कही थी कि — “जब तक मैं शुरू न करूं, प्रतीक्षा कीजिए । मेरे प्रस्थान के साथ ही इसके पीछे का विचार सामने आ जायेगा ।” (D.G.Tendulkar, Mahatma, Life of Mohandas Karamchand Gandhi, Vol.3, page, 20)
तब से अब की यात्रा में एक बुनियादी फर्क यह है कि वस्तुतः कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अभी यात्रा में, अर्थात् संघर्ष की जमीन पर है और उसके क्षत्रप जन-प्रतिनिधि अपनी सत्ताओं की चिंता में । लेकिन समानता यह है कि यात्रा के अंत तक आते-आते हर हाल में इन दोनों के बीच की दीवार यात्रा के राजनीतिक परिणामों से ही ढहेगी, जैसा सन् ’20 में खिलाफत के सवाल से शुरू हुए गांधी जी के असहयोग आंदोलन से लेकर डांडी मार्च के परिणाम के बीच से हुआ था । निस्संदेह, कांग्रेस भारत की राजनीति के जनतांत्रिक सवालों पर संघर्ष की एक सबसे पुरानी प्रमुख पार्टी की अपनी प्रतिष्ठा को फिर से हासिल करेगी ।
यात्रा अभी केरला से निकल कर कर्नाटक में प्रवेश करेगी, और फिर बीस दिनों बाद तेलंगाना, आंध्र होते हुए महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में जायेगी । और कहना न होगा, यह यात्रा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ेगी, यात्रा का संदेश उतना ही अधिक, अपने अनेक आयामों के साथ प्रकट होता चला जायेगा, जैसा गांधीजी ने कहा था कि ‘मुझे प्रस्थान करने दीजिए, इस यात्रा के पीछे के विचार सामने आते जायेंगे’ ।
आजादी की लड़ाई के इतिहास से अवगत लोग जानते हैं कि सविनय अवज्ञा की दांडी यात्रा का बीज वास्तव में सन् ’20 के ‘असहयोग आंदोलन’ के समय पड़ गए थे । 1 अगस्त 1920 को गांधी जी ने वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड को एक पत्र लिख कर अपने उन सब ख़िताबों को लौटा देने की घोषणा की थी जो उन्हें अंग्रेजों ने मानवता की सेवा में दक्षिण अफ्रीका में उनके कामों के लिए उन्हें दिए थे । अपने उस कदम को उन्होंने ‘ख़िलाफ़त’ के प्रति ब्रिटिश साम्राज्य की सरकार के ‘विवेकहीन, अनैतिक और अन्यायी रवैये और इस अनैतिकता के पक्ष में उसके एक के बाद एक ग़लत कामों के विरोध में अपने असहयोग का प्रारंभ कहा था’ । उन दिनों कांग्रेस के अंदर मालवीय जी जैसे पुराने लोगों ने गांधीजी के फैसले का विरोध किया था । उनके जवाब में गांधीजी ने लिखा कि “एक उच्चतर कर्त्तव्य का मुझसे तकाजा है कि असहयोग समिति (जिसका गठन मेसोपोटामिया पर ब्रिटेन के कब्जे की योजना की खिलाफत के प्रश्न को केंद्र में रख कर गठित किया गया था — अ.मा.) ने जो कार्यक्रम निश्चित कर दिया है, उससे मैं पीछे न हटूँ । जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब आपके लिए कोई ऐसा काम करना भी जरूरी हो जाता है जिसमें आपके अच्छे से अच्छे मित्र भी आपका साथ न दे सकें । जब कभी कर्त्तव्य को लेकर आपके मन में द्वंद्व पैदा हो जाये उस समय आपको अपने अन्तर की शान्त और क्षीण आवाज पर ही निर्णय छोड़ देना चाहिए ।”
इसके अलावा इस लेख में उन्होंने दिलचस्प ढंग से व्यक्ति और संगठन के बीच के संबंध को व्याख्यायित करते हुए कांग्रेस और उसके सदस्यों के बीच संबंधों के बारे में लिखा था — “कांग्रेस तो आखिरकार राष्ट्र के विचारों को वाणी देने वाली संस्था है । और जब किसी के पास ऐसी कोई सुविचारित नीति या कार्यक्रम हो जिसे वह चाहे कि सब लोग स्वीकार करें या अपनाएं, लेकिन साथ ही वह उसके पक्ष में जनमत भी तैयार करना चाहता हो, तो स्वभावतः वह कांग्रेस से उस पर विचार करने और उसके सम्बन्ध में अपना मत स्थिर करने को कहेगा । लेकिन जब किसी को किसी नीति विशेष या कार्य विशेष में अडिग विश्वास हो तब उस पर कांग्रेस के मत की प्रतीक्षा करना भूल होगा, ऐसे व्यक्ति को तो उस नीति या कार्यक्रम के अनुसार काम करके उसकी कार्य-साधकता सिद्ध कर देनी चाहिए ताकि सम्पूर्ण राष्ट्र उससे स्वीकार ले ।”
गांधीजी अपने स्वतंत्र मत के विषय को आगे और व्याख्यायित करते हुए कहते हैं कि “किसी भी संस्था में सदा तीन श्रेणियों के लोग आते हैं : एक तो वे जिनके विचार अमुक नीति के पक्ष में हैं, दूसरे वे जिनकी राय उस नीति पर सुनिश्चित किन्तु विपक्ष में होती है और तीसरे वे जिनके इस सम्बन्ध में कोई निश्चित विचार ही नहीं है । कांग्रेस इसी तीसरी और बड़ी श्रेणी के लोगों के एवज में निर्णय लेती है । असहयोग के सम्बन्ध में मैं एक निश्चित विचार रखता हूँ ।”(सम्पूर्ण गांधी वांग्मय, खण्ड 18, ‘कांग्रेस और असहयोग’, पृष्ठ-122-123)
यह है कांग्रेस संगठनात्मक सिद्धांत का एक मूलभूत सच । आजादी के पहले और बाद में भी कांग्रेस के इतिहास में व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह और कांग्रेस नेतृत्व के बीच सीधी टकराहटों के अनेक उदाहरण मिलते हैं । इसमें आलाकमान भी होता है और क्षत्रप और व्यक्तिगत विचार रखने वाला सदस्य भी । बहुमत की अधीनता को मान कर चलने का ऐसा कोई अटल सिद्धांत नहीं है, जिसमें आलाकमान को चुनौती देने वाले का कोई स्थान नहीं होता है । संगठन में आलाकमान की हैसियत एक नैतिक शक्ति की तरह की ज्यादा होती है ।
यही कारण है कि कांग्रेस में बहुत कुछ ऐसा चलता है जो उस दल की आंतरिक संहति को संदेहास्पद बनाता है, पर शायद इसकी यही तरलता उसके सदस्यों के बीच और आमजन से कांग्रेस के संगठन के बीच अन्तर्क्रिया को ज्यादा आसान और व्यापक भी बनाता है । ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का पूरा स्वरूप, जिसे दांडी मार्च की तरह ही स्थानीय लोगों के तमाम हिस्सों के साथ संवाद की एक प्रक्रिया के रूप में स्थिर किया गया है और जिसके साथ ही साथ देश के और भी कई हिस्सों में ऐसी ही यात्राओं के आयोजन की घोषणा की गई है, उन सबसे देश भर में शुरू होने वाले राजनीतिक जन-संवाद के सामने राजस्थान की तरह की घटना और कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी शायद बहुत ज्यादा मायने नहीं रखेगा ।
आज के समय में सांप्रदायिक फासीवाद की कठिन चुनौती के मुकाबले में सक्षम एक नई कांग्रेस का उदय जरूरी है और वह ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तरह के जन-संवाद के प्रभावशाली कार्यक्रमों के बीच से ही संभव हो सकता है ।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लाख मना करें कि उन्होंने अपने कांग्रेस विधायकों को नहीं भड़काया है लेकिन उनकी इस बात पर कौन भरोसा करेगा? उनके 92 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे सौंपकर वह काम कर दिखाया है, जो मेरी याददाश्त में कांग्रेस तो क्या, किसी भी पार्टी के राज्य में ऐसा कभी नहीं हुआ। पहले कई बार दल-बदल हुए हैं, सरकारें गिरी हैं लेकिन किसी पार्टी की इज्जत इस तरह से पहले कभी नहीं गिरी।
सोनिया-राहुल कंपनी सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि उनके अपने कर्मचारी उन्हें शीर्षासन करा देंगे। यदि अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पहले ही यह करिश्मा दिखा सकते हैं तो अध्यक्ष के तौर पर तो वे माँ-बेटे की मिल्कियत को भी उलटवा सकते हैं। राजस्थान में हुए घटना-क्रम की यही व्याख्या दिल्ली से भेजे गए दूत अब लौटकर पार्टी मालिकों को देंगे। गहलोत अपने हाथ झाड़ना चाहेंगे लेकिन लगता यह है कि अब उनका अध्यक्ष पद ही झड़ जाएगा।
यदि सोनिया अब भी गहलोत को अध्यक्ष बनाने पर आमादा होंगी तो वह बहुत बड़ा खतरा मोल लेंगी। यदि गहलोत अब राजस्थान के मुख्यमंत्री ही बने रहे तो भी वे गले की फांस बन जाएंगे। उनका कद माँ-बेटे से भी ऊँचा हो गया है। गहलोत के लिए यह मारवाड़ी कहावत लागू हो रही है- गोड़गड़ी रे, गोड़गड़ी। सासू छोटी, बहू बड़ी।। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के जो पिछले तीन-चार चुनाव हुए थे, उनमें भी रोचक नौटंकियां हुई थीं लेकिन इस चुनाव ने सिद्ध किया है कि देश की पार्टियों में अब आंतरिक लोकतंत्र की शुरुआत हो रही है।
राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों ने जो सत्साहस किया है, वह सभी पार्टियों के शीर्ष नेताओं को संदेश दे रहा है कि आप अपने वाली चलाना बंद कीजिए। ऊपर से मनचाहे चहेतों को थोपना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि माँ-बेटा नेतृत्व गहलोत के साथ दुर्व्यवहार करेगा तो राजस्थान से भी कांग्रेस का सफाया वैसा ही हो जाएगा, जैसा कि पंजाब से हुआ है। राजस्थान में चली यह नौटंकी सबसे ज्यादा खुश किसे कर रही होगी? शशि थरुर को! और सबसे ज्यादा दुखी, किसको? राहुल गांधी को!
क्योंकि राहुल ने ही केरल से मंत्र मारा था कि ‘एक आदमी, एक पद’। अब आदमी और पद, दोनों ही हवा में लटक गए हैं। गहलोत चाहे तो अपनी नई पार्टी खड़ी करके राजस्थान के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। वे अन्य कई कांग्रेसी नेताओं की तरह अपने 92 विधायकों को लेकर भाजपा में भी शामिल हो सकते हैं। इस घटना ने गहलोत को महानायक की छवि प्रदान कर दी है। गहलोत ने राहुल गांधी को केरल में करेले का रस पिला दिया है। अब राहुल को तुरंत दिल्ली आकर भारत जोड़ो की बजाय कांग्रेस जोड़ो अभियान चालू करना पड़ेगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
100 साल पहले इटली में फासीवाद का उदय हुआ था। इटली के बेनिटो मुसोलिनी के बाद जर्मनी में एडोल्फ हिटलर ने नाजीवाद को पनपाया। इन उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के कारण द्वितीय महायुद्ध हुआ। पिछले 77 साल में यूरोप के किसी भी देश में ये उग्रवादी तब पनप नहीं सके लेकिन अब इटली, जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों में दक्षिणपंथी राजनीति तूल पकड़ती जा रही है।
इन पार्टियों के नेता मुसोलिनी और हिटलर की तरह हिंसक और आक्रामक तो नहीं हैं लेकिन इनका उग्रवाद इनके देशों के लिए चिंता का विषय तो बन ही रहा है। ये लोग तख्ता-पलट के जरिए सत्तारुढ़ नहीं हो रहे हैं। लोकप्रिय वोटों से चुने जाकर ये लोग सत्ता के निकट पहुंचते जा रहे हैं। इटली में ‘बदर्स ऑफ इटली’ की नेता श्रीमती जिर्योजिया मेलोनी के प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावना है।
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी और मत्तेओ साल्विनी की पार्टियों के साथ मिलकर कल चुनाव लड़ा था। मेलानी (45) अभी युवा हैं, बर्लुस्कोनी (85) के मुकाबले और जब वे छात्रा थीं तो ‘इटालियन सोश्यल मूवमेंट’ में काफी सक्रिय रही हैं। यह संगठन मुसोलिनी के समर्थकों ने खड़ा किया था। बाद में मेलोनी सांसद और मंत्री भी बनीं। वे आजकल दावा करती हैं कि वे फांसीवादी बिल्कुल नहीं हैं लेकिन किसी जमाने में वे मुसोलिनी की काफी तारीफ किया करती थीं।
मारिया द्राघी की पिछले सरकार में कई पार्टियां गठबंधन में शामिल हुई थीं लेकिन मेलोनी की अकेली बड़ी पार्टी थी, जो विपक्ष में बैठी रही थी। इसीलिए अब ‘ब्रदर्स ऑफ इटली’ पार्टी को इटली की जनता काफी महत्व दे रही है। उम्मीद यही की जा रही है कि कल संपन्न हुए आम चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें इसी पार्टी को मिलेंगी। मेलोनी यदि प्रधानमंत्री बन गईं तो वे सिर्फ गरीबों का ही नहीं, सबका टैक्स घटाएंगी, इटली की जनसंख्या को प्रोत्साहित करेंगी, प्रवासियों को आने से रोकेंगी और इटली के मामलों में यूरोपीय संघ की दखलंदाजी को नियंत्रित करेंगी।
वे इस्लामी तत्वों के साथ सख्ती बरतने पर भी आमादा हैं। वे गर्भपात-विरोधी हैं। वे स्त्री-अधिकार और अन्य कई सामाजिक प्रश्नों पर कट्टर पोंगापंथी रवैया अपनाए हुए हैं। यूक्रेन के मामले में वे रूस का भी डटकर विरोधी कर रही हैं। पता नहीं, उनकी गठबंधन सरकार कितने दिन चलेगी, क्योंकि उनके सहयोगी नेताओं का रूख इन समस्याओं पर जऱा नरम है। वे यूक्रेन से ज्यादा रूस के प्रति सहानुभूतिपूर्ण हैं। मेलोनी ने इधर मुसोलिनी की आलोचना भी शुरु कर दी है। ऐसी आशंका कम ही है कि इटली समेत यूरोप के अन्य देशों में अब फासीवाद या नाजीवाद का उदय दुबारा हो सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
- ज़ारिया गॉर्वेट
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 15 नवंबर, 2022 को दुनिया में इंसानों की आबादी आठ अरब हो जाएगी.
जनसंख्या वृद्धि ने लोगों के बीच बड़ा विभाजन पैदा कर दिया है. कुछ लोग इससे चिंतित हैं तो कई लोग इसे सफलता की अभूतपूर्व कहानी बता रहे हैं. वास्तव में दुनिया में तेज़ी से एक ऐसी विचारधारा पनप रही है जो मानती है कि हमें और लोगों की ज़रूरत है.
साल 2018 में अमेज़ॉन के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस ने एक ऐसे भविष्य का अनुमान लगाया, जब हमारे सौर मंडल में एक अरब इंसान फैल जाएंगे. उन्होंने एलान किया कि वे इस लक्ष्य को पाने की योजना बना रहे हैं.
इस बीच, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टर और प्रकृति के इतिहासकार सर डेविड एटनबरो सहित कई लोगों ने इंसानों की इतनी बड़ी आबादी को 'पृथ्वी पर प्लेग' का नाम दिया है.
इस नज़रिए के अनुसार, आज हम पर्यावरण से जुड़ी जिस समस्या से जूझ रहे हैं, चाहे वह जलवायु परिवर्तन हो, या जैव विविधता का नुकसान, जल संकट हो या भूमि संघर्ष, उन सबका संबंध पिछली कुछ सदियों के दौरान तेज़ी से बढ़ी हमारी आबादी से है.
1994 में दुनिया की आबादी जब केवल 5.5 अरब थी. तब कैलिफ़ोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने गणना की थी कि इंसानी आबादी का आदर्श आकार 1.5 से 2 अरब होना चाहिए.
तो क्या वाक़ई दुनिया की आबादी बहुत ज़्यादा है? और इंसानों के वैश्विक प्रभाव का भविष्य क्या है?
एक बहुत पुरानी चिंता
प्लेटो के मशहूर ग्रंथ 'द रिपब्लिक' में 375 ईस्वी पूर्व के लगभग दो काल्पनिक राज्यों के बारे में चर्चा की गई है. एक जहां 'स्वस्थ' है, वहीं दूसरा 'विलासी' है पर 'अस्वस्थ'.
दूसरे राज्य की आबादी अपनी ज़रूरत से अधिक विलासी जीवन जीना पसंद करती है और इसमें बहुत धन ख़र्च करती है.
नैतिक रूप से जर्जर यह राज्य आखिरकार पड़ोसी भूमि पर कब्जा करने की कोशिश करता है और उसकी यह कोशिश अंततः युद्ध में बदल जाती है.
यह राज्य बिना अतिरिक्त संसाधनों के अपनी विशाल और लालची आबादी का बोझ नहीं संभाल सकता.
इस कहानी का सहारा लेकर प्लेटो ने एक सवाल उठाया था, जो आज भी प्रासंगिक है. समस्या क्या है, इंसानी आबादी या उसकी ओर से किए जाने वाला संसाधनों का उपभोग?
1798 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध शोध, 'जनसंख्या के सिद्धांत पर एक निबंध' में थॉमस माल्थस ने इंसानों की दो मूल प्रवृतियों 'भोजन और सेक्स' का ज़िक्र किया.
अपने इस निष्कर्ष को उन्होंने जब तार्किक अंज़ाम तक पहुंचाया तो समझाया कि इस वजह से आपूर्ति से ज़्यादा मांग के हालात पैदा हो जाते हैं.
माल्थस ने लिखा, ''जनसंख्या को जब बेलगाम छोड़ दिया जाता है, तो यह ज्यामितीय अनुपात में बढ़ती है. वहीं जीवनयापन के साधन केवल अंकगणितीय अनुपात में ही बढ़ते हैं.''
सरल शब्दों में कहें, तो आबादी जितनी तेज़ी से बढ़ती है, उसकी तुलना में संसाधनों का उत्पादन और उसकी आपूर्ति बहुत धीमी गति से बढ़ती है.
माल्थस की इन बातों का तुरंत प्रभाव हुआ. इससे कइयों में भय और कइयों में ग़ुस्सा बढ़ा, जो दशकों तक समाज में दिखता रहा.
एक समूह ने सोचा कि आबादी को क़ाबू से बाहर जाने के लिए कुछ करना चाहिए. वहीं दूसरे समूह का मानना था कि आबादी को नियंत्रित करने का प्रयास बेतुका या अनैतिक है. इस समूह की राय थी कि आबादी नियंत्रित करने के बजाय उन्हें खाद्य आपूर्ति बढ़ाने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए.
माल्थस का निबंध जब प्रकाशित हुआ था, उस समय पृथ्वी पर केवल 80 करोड़ लोग थे.
हालांकि दुनिया की बेशुमार जनसंख्या के बारे में आधुनिक चिंताएं 1968 में जाकर सामने आ पाई, जब स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पॉल एर्लिच और उनकी पत्नी ऐनी एर्लिच ने 'द पॉपुलेशन बम' नामक किताब लिखी.
यह किताब भारत की राजधानी नई दिल्ली के बारे में थी.
उन्होंने अपने अनुभवों को बयान किया था. एक रात जब वे दोनों टैक्सी से होटल लौट रहे थे, तब उनकी टैक्सी किसी गरीब इलाके से गुजरी. उस दौरान सड़कों पर इंसानों की हद से ज़्यादा भीड़ देखकर वे विचलित हो गए.
उन्होंने अपने अनुभव को जिस तरह से बयान किया था, उसकी बड़ी आलोचना हुई. यह आलोचना इसलिए भी हुई कि उस समय ब्रिटेन की राजधानी लंदन की आबादी नई दिल्ली से दोगुनी से भी ज़्यादा थी.
इस दंपति ने अपनी इस किताब में अकाल की चिंता पर विस्तार से लिखा था. इन दोनों का मानना था कि विकासशील देशों में जल्द ही अकाल आने वाला है. उन्होंने यह आशंका अमेरिका के बारे में भी जताई, जहां लोग पर्यावरण पर पड़ रहे असर को महसूस करने लगे थे.
अधिक जनसंख्या से सामने आ रही आज की अधिकांश चिंताओं को सामने लाने के लिए उनकी इस किताब को बहुत श्रेय दिया जाता है.
परस्पर विरोधी नज़रिया
दुनिया की आबादी कब अधिकतम सीमा को छुएगी, इसे लेकर अलग-अलग अनुमान हैं. लेकिन अनुमान है 2070 से 2080 के बीच पृथ्वी पर इंसानों की अधिकतम आबादी 9.4 से 10.4 अरब के बीच पहुंच सकती है.
संयुक्त राष्ट्र को उम्मीद है कि यदि हमारी आबादी 10.4 अरब के स्तर तक पहंचती है, तो उस स्तर पर लगभग दो दशकों तक स्थिर रहेगी. लेकिन उसके बाद आबादी घटना शुरू हो जाएगी.
इस अनुमान ने हमारे भविष्य को लेकर परस्पर विरोधी विचार पैदा किए हैं.
एक ओर वे लोग हैं, जो कुछ इलाकों में कम होती प्रजनन दर को संकट के रूप में देखते हैं.
जनसांख्यिकी के एक विद्वान ब्रिटेन की गिरती जन्मदर से इतने चिंतित हैं कि उन्होंने संतानहीन लोगों पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया है.
ब्रिटेन में 2019 में प्रति महिला औसतन 1.65 बच्चे पैदा हुए. यह 2075 में जनसंख्या को घटने से रोकने के लिए ज़रूरी जन्म दर से कम है. हालांकि दूसरे देशों से आने वाले प्रवासियों के कारण जनसंख्या में वृद्धि होती रहेगी.
वहीं दूसरी तरफ वो लोग हैं, जिनका विचार है कि दुनिया की जनसंख्या वृद्धि को धीमा करना और रोकना बहुत ज़रूरी है. इनका यह भी मानना है कि लोगों पर बिना दबाव डाले स्वैच्छिक साधनों से ही जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाई जा सकती है.
ऐसे लोगों का मानना है कि इससे न केवल पृथ्वी का भला होगा, बल्कि दुनिया के सबसे गरीब लोगों के जीवन में भी सुधार हो सकता है.
वहीं कुछ लोगों का मानना है कि आबादी की वृद्धि दर कम करने या न करने की बहस बेकार है. इनका मानना है कि इंसानों के द्वारा उत्पादों की ख़पत पर लगाम लगाई जानी चाहिए.
इनका तर्क है कि कोई इंसान संसाधनों की जो ख़पत करता है, उसका हम पर अधिक असर पड़ता है. इसलिए अपनी निजी ज़रूरतें कम करके सबसे गरीब देशों में विकास प्रभावित किए बिना भी बढ़ती आबादी का असर कम किया जा सकता है.
दुनिया के पिछड़े हिस्सों की जनसंख्या वृद्धि कम करने में पश्चिमी देशों की रुचि के चलते आरोप लगाया जाता है कि वे नस्लवाद का भाव रखते है. ऐसा इसलिए भी कि यूरोप और उत्तरी अमेरिका कुल मिलाकर बहुत घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं.
पर्यावरण पर असर
बहरहाल इस बहस से परे पृथ्वी पर इंसानी प्रभाव के आंकड़े चौंकाने वाले हैं.
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि एजेंसी (एफएओ) के अनुसार, पृथ्वी की सतह के 38 फ़ीसदी हिस्से का इस्तेमाल मनुष्य या उनके पशुओं के लिए भोजन और अन्य उत्पाद (जैसे ईंधन) पैदा करने में होता है. यह रकबा करीब पांच करोड़ वर्ग किलोमीटर है.
हमारे पूर्वज पृथ्वी पर एक समय कई विशाल जीवों के बीच रहा करते थे, लेकिन आज इंसान पृथ्वी की सबसे प्रभावी रीढ़ वाली प्रजाति है.
वज़न के हिसाब से आंके तो रीढ़ वाले जीवों में इंसानों का वज़न प्रतिशत सबसे अधिक 32 है. वहीं जंगली जानवरों का आंकड़ा केवल एक प्रतिशत है. बाक़ी हिस्से में मवेशी हैं.
विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के अनुसार, 1970 से 2020 के बीच दुनिया में जंगली जीवों की आबादी में दो तिहाई की कमी आई है. लेकिन इसी अवधि में दुनिया की आबादी दोगुने से अधिक हो गई है.
वास्तव में, इंसान का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ा है, वैसे-वैसे पर्यावरण में कई बदलाव हुए हैं. इसे लेकर दुनिया के कई बड़े पर्यावरणविदों और प्रकृतिवादियों ने अपनी चिंता जाहिर की है.
2013 में, एटनबरो ने 'रेडियो टाइम्स' नाम की एक पत्रिका में लिखा, ''पर्यावरण की हमारी सभी समस्याओं का हल आबादी कम होने पर आसान रहता है और आबादी अधिक होने पर इसे हल करना असंभव हो जाता है.''
मानवता की भलाई की चिंता करते हुए कई लोगों ने कम बच्चे या एक भी बच्चा पैदा न करने का फ़ैसला किया है.
समय के साथ बच्चे न पैदा करने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है. इन महिलाओं ने एलान किया है कि जब तक 'क्लाइमेट इमरजेंसी' और जीवों के विलुप्त होने की समस्या दूर नहीं हो जाती, तब तक वे 'बर्थ स्ट्राइक' यानी 'बच्चे पैदा न करने की हड़ताल' करेंगी.
आज बड़े पैमाने पर माना जा रहा है कि लोग दुनिया के सीमित संसाधनों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं. इसके लिए अब 'अर्थ ओवरशूट डे' मनाकर बताया जा रहा है.
हर साल इस दिन यह अनुमान लगाया जाता है कि मानवता ने सभी जैविक संसाधनों का उस स्तर तक दोहन कर लिया है, जिसकी पृथ्वी सतत रूप से भरपाई कर सकती है.
2010 में इसे आठ अगस्त को मनाया गया, जबकि 2022 में इसकी तारीख़ 28 जुलाई थी.
'8 बिलियन एंड काउंटिंगः हाउ द सेक्स एंड माइग्रेशन शेप ऑवर वर्ल्ड' नाम की किताब के लेखिका जेनिफर स्क्यूबा लिखती हैं, ''क्या यह समस्या बहुत अधिक इंसानों की है या हमारे द्वारा उपयोग किए जाने वाले संसाधनों की है, या दोनों है. मैं सोच भी नहीं सकती कि पर्यावरण के लिए और अधिक मनुष्य कैसे बेहतर साबित हो सकते हैं.''
हालांकि, स्क्यूबा बताती हैं कि जल्दी ही सामने आने वाले 'जनसंख्या बम', जिससे पृथ्वी का विनाश हो जाएगा, वाला विचार अब पुराना हो गया है.
उनके अनुसार, यह विचार जब दिया गया था, तब दुनिया के 127 देशों में महिलाओं की औसत प्रजनन दर पांच या अधिक थी.
उस दौर में, बढ़ती जनसंख्या के रुझान वाक़ई में बहुत ख़तरनाक मालूम पड़ते थे. उनका मानना है कि इसके चलते बढ़ती जनसंख्या ने कई पीढ़ियों के मन में एक दहशत बैठा दी, जो आज भी जीवित है.
वे कहती हैं, ''लेकिन आज औसतन पांच से अधिक बच्चे पैदा करने वाले देशों की संख्या केवल आठ है. ऐसे में मुझे लगता है कि ये महसूस करना अहम है कि अब वे रुझान बदल गए हैं.''
सुखद भविष्य की कल्पना
जनसांख्यिकी पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को प्रभावित ही नहीं करती, बल्कि यह बहुत बड़ी छिपी हुई शक्ति भी होती है, जो लोगों के जीवन की गुणवत्ता को संवारती भी है.
पेंसिल्वेनिया की ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी में ग्लोबल हेल्थ के प्रोफेसर एलेक्स एजेह के अनुसार, किसी देश में लोगों की संख्या सबसे अहम चीज़ नहीं है.
इसके बजाय, जनसंख्या वृद्धि या गिरावट की दर से उसके भविष्य का पता चलता है.
उनके अनुसार, अफ्रीका को ही ले लें, जहां विभिन्न देशों में जनसंख्या की वृद्धि दर अलग अलग है.
''कई देशों ख़ासकर दक्षिणी अफ्रीका में, प्रजनन दर कम हो गई है और वहां गर्भनिरोधक का उपयोग बढ़ गया है, जो एक अच्छी ख़बर है.''
वहीं, मध्य अफ्रीका के कई देशों में अभी भी उच्च प्रजनन दर और लंबी उम्र की संभावना की वजह से जनसंख्या वृद्धि की दर ज़्यादा है.
वे कहते हैं, ''कई जगहों पर यह दर 2.5 से अधिक है, जो बहुत ज़्यादा है. कई देशों में तो हर 20 सालों में जनसंख्या दोगुनी हो जाएगी.''
उनके अनुसार, ''मुझे लगता है कि आकार और संख्या को लेकर हो रही बातचीत भटक गई है.''
''जरा एक ऐसे शहर के बारे में सोचें जिसकी आबादी हर 10 साल में दोगुनी हो जा रही है. वहां की सेवाओं की कवरेज़ दुरुस्त रखने के लिए हर 10 साल में जो संसाधन चाहिए, क्या वो किसी सरकार के पास वाक़ई हैं?
''अर्थशास्त्री सोचते हैं कि बड़ी आबादी कई अलग-अलग नतीज़ों के लिए अच्छी है लेकिन बड़ा सवाल है कि आबादी कितने सालों में बढ़ रही है?''
-असगर वजाहत
लम्बे समय तक फारसी और अरबी भाषाओं के माध्यम से भारत की रचनात्मकता और ज्ञान को संसार तक पहुंचाने का काम किया गया था। पंचतंत्र का किसी विदेशी भाषा में पहला अनुवाद पुरानी फारसी (पहलवी,550 ई. पू. ) में किया गया था और उसके बाद एक अन्य विद्वान अब्दुल्ला इब्न अल-मुकाफ्फा द्वारा इसका अरबी में अनुवाद किया गया था। इन अनुवादों के माध्यम से ही पंचतंत्र का अनुवाद संसार की अनेक भाषाओं में सम्भव हुआ था। उस समय फारसी विश्व भाषा थी । मध्यकाल में भी संस्कृत के सैकड़ों ग्रंथों का अनुवाद फ़ारसी में किया किया गया था।
महाभारत के बाद फ़ारसी में वाल्मीकि-रामायण का फारसी अनुवाद एक बड़ी परियोजना थी। अकबर के आदेश और संरक्षण में रामायण के फारसी अनुवाद ने मुगल दरबार की कला में एक नई शैली का विकास किया था। रामायण के फ़ारसी अनुवाद के शानदार चित्र अपने प्रकृतिवाद, बारीक और महीन काम के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। इस विशिष्ट शैली को इंडो-फ़ारसी सौंदर्य का गतिशील संगम कहा जाता है।
यह सचित्र पांडुलिपि भारतीय संस्कृति और धार्मिक भावनाओं का अद्भुत चित्रण है। यह कलाकारों की उत्कृष्ट कारीगरी का भी एक नायाब उदाहरण है। इसमें कलाकारों के असाधारण रचनात्मक कौशल और उनकी तकनीकी दक्षता को भी देखा जा सकता हैं। पाठ और चित्र के बीच एक सुसंगत सेतु बनाकर कथा को और अधिक प्रभवशाली बनाया गया है।
इतिहासकार बताते हैं कि 6 नवंबर, 1589 को बदायूंनी द्वारा इसका तीन सौ पैंसठ पन्नों का अनुवाद प्रस्तुत करने के बाद केवल सात महीने में एक सौ छिहत्तर लघुचित्रों को बनाने का काम पूरा किया गया था।
रामायण के फारसी अनुवाद की शाही प्रति अब जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय संग्रहालय में है।
पांडुलिपि की शाही प्रति बनाने के अलावा अनेक प्रतियां बनाने की परंपरा भी मुगल काल में थी। इतिहासकारों ने यह भी उल्लेख किया गया है कि 1593 में सम्राट अकबर की मां हमीदा बानो बेगम के लिए भी रामायण की एक प्रति बनाई गई थी। इसके अलावा, अकबर के एक नवरत्न, कवि और सेना के प्रमुख कमांडर अब्दुर रहीम खानखाना ने सम्राट की अनुमति से रामायण की एक प्रति अपने लिए तैयार कराई थी।
-शिल्पा शर्मा
समय आ गया है कि महिलाओं शरीर के बारे में हम अपनी कंडिशनिंग बदलें। शरीर को केवल शरीर ही समझें, केवल उतनी ही तवज्जो दें।
आज पूरे विश्व में महिलाओं की स्थिति में जो भी सुधार आया है, जैसे- उन्हें शिक्षा का अधिकार, वोट देने का अधिकार मिलना, उनका नौकरी कर पाना, समान काम के लिए समान वेतन (जो अभी भी कई जगह नहीं मिलता!) वगैरह इसके पीछे लंबे समय (सौ वर्ष से भी अधिक) तक महिलाओं और उन्हें समझने वाले पुरुषों ने संघर्ष किया है। बावजूद इसके यह सच है कि महिलाओं को अब तक वो सहज समानता नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए। और आज के समय में जब हर व्यक्ति के हाथ में एक मोबाइल फोन है, जिससे वह किसी भी घटना का वीडियो बना सकता है, महिलाओं के लिए अलग ही तरह की मुश्कि़ल आ खड़ी हुई है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि महिलाओं के शरीर को लेकर हम अपनी कंडिशनिंग बदलें।
कहा जाता है कि जब हम अपनी सोच बदलते हैं तो हमारे आसपास की चीजें भी बदलना शुरू हो जाती हैं। बीते सप्ताह चंडीगढ़ के नजदीक एक निजी विश्वविद्यालय में कुछ लड़कियों का बाथरूम वीडियो वायरल होने पर हंगामा मचा। कथित तौर पर यह वीडियो कैंपस की ही एक छात्रा ने बनाया और शिमला में एक लडक़े को भेज दिया, जिसने इसे वायरल कर दिया। इसके बाद कई छात्राओं के आत्महत्या करने के प्रयास करने की खबर भी चली, जिसका पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन ने खंडन किया।
वहीं एक खबर यह भी सामने आई है कि उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में गैंगरेप की शिकार एक 15 वर्षीय लडक़ी बचने के लिए निर्वस्त्र ही सडक़ पर निकल भागी और घर पहुंची। तब भी लोगों ने उसका भी वीडियो बनाया और वायरल कर दिया। काश, कि वीडियो बनाने वालों ने वीडियो बनाने की जगह, उसे कपड़े दे दिए होते। लेकिन हमारे डिजिटल होते समाज में इंसानियत का जज्बा बहुत कम होता जा रहा है। और यह चिंता का विषय है।
आज के समय में कई बार यह सुनने में आता है कि प्रेमी ही अपनी प्रेमिकाओं के साथ सेक्शुअल संबंध बनाते समय धोखे से उसका वीडियो बना लेते हैं और उसे वायरल करने का डर दिखा कर उन पर जबरन संबंध कायम करने का दबाव बनाते हैं। यहां यह कहना भी जरूरी है कि कई महिलाएं भी इस तरह के वीडियो बनाकर, वायरल करने का डर दिखा कर पुरुषों को ब्लैकमेल करती हैं। पर हम बात को महिलाओं पर ही केंद्रित रखना चाहते हैं, क्योंकि आज भी समाज इस तरह के वीडियो वायरल होने की स्थिति में महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा करता है। सदियों की इस कंडिशनिंग का युवतियों और महिलाओं के मानस पर इतना दबाव होता है कि वे जीने और संघर्ष करने की राह छोडक़र आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती हैं।
इस तरह के वीडियो महिलाओं के प्रेम में स्वेच्छा से संबंध बनाने के भी बना लिए जाते हैं और उनका बलात्कार करते समय भी बना लिए जाते हैं। उन्हें वायरल करने की धमकी भी दी जाती है और वायरल कर भी दिया जाता है। पर ऐसे वीडियोज में संबंध तो दो लोग बना रहे होते हैं और अमूमन दोनों ही बिना कपड़ों के नजऱ आते हैं, पर शर्म का पूरा बोझ किसी महिला और उसके शरीर पर ही लाद दिया जाता है, क्यों?
सदियों की कंडिशनिंग है। आसानी से नहीं जाएगी। पर कहीं से तो इसके प्रयास शुरू करने होंगे। और अब वक़्त आ गया है कि ये प्रयास संजीदगी से शुरू किया जाए। महिलाओं शरीर के बारे में हमें अपनी कंडिशनिंग बदलनी ही होगी, क्योंकि आज हर व्यक्ति (याद रखिए मैंने केवल पुरुष नहीं कहा, क्योंकि चंडीगढ़ वाले मामले में आरोप एक युवती पर है) के हाथ में मोबाइल है। वो अपनी कुंठित मानसिकता के चलते या किसी तरह के दबाव में आकर किसी का भी वीडियो बनाकर वायरल कर सकता है। हम उन्हें नहीं रोक सकते, लेकिन अपनी मानसिकता को तो बदल ही सकते हैं।
जहां तक बात बलात्कार के समय वीडियो बनाए जाने की है तो हम सभी को यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार किसी भी लडक़ी के साथ हुई एक दुर्घटना है, जिसके लिए लडक़ी दोषी ही नहीं है। ऐसे में उस लडक़ी के परिजनों को चाहिए कि उसे कहें कि इसे एक दुर्घटना समझ कर भूल जाओ। हां, इंसाफ की लड़ाई में जरूर उसका साथ दीजिए, लेकिन इस घटना से उसके मन पर कोई अपराधबोध कभी न पलने दीजिए। ज़रूरत हो तो उन्हें साइकोलॉजिकल/साइकियाट्रिक ट्रीटमेंट दिलवाइए।
किसी महिला का बलात्कार होने पर अमूमन लिखा जाने वाला यह वाक्य कि महिला की इज़्ज़त लूट ली गई, महिलाओं के शरीर को ले कर हमारी कंडिशनिंग से ही प्रेरित है। पर साथ ही यह वाक्य यह भी तो बता देता है कि पहली बात तो पुरुष की तो कोई इज्जत ही नहीं होती और दूसरी बात कि वह तो सिर्फ इज्जत का लुटेरा है। लेकिन इन दोनों बातों पर और ख़ासतौर पर लुटेरा होने को ले कर हमने कभी किसी पुरुष को शर्मिंदा होते तो नहीं देखा। आपने देखा है क्या? जबकि शर्मिंदगी की बात तो ये होनी चाहिए।
अमूमन लड़कियां जब किसी से संबंध बनाती हैं (हनीट्रैप और वेश्यावृत्ति अपवाद हो सकते हैं) तो वे मानसिक तौर पर जुडऩे के बाद ही ऐसा करती हैं (फिर चाहे वे अविवाहित ही क्यों न हों!)। ऐसे में यदि उनका साथी धोखे से उनका वीडियो बना ले और ब्लैकमेल करता रहे तो वे इस डर से किसी को बता ही नहीं पातीं कि यदि वीडियो वायरल हो गया तो उनका नग्न शरीर सबके सामने आ जाएगा। पर शरीर तो सिर्फ शरीर है, उसका हमारी इज्जत से केवल उतना ही लेना-देना है, जितना कि हम अपने दिमाग में बिठा लें। चूंकि पितृसत्तात्मक सोच की वजह से हमेशा महिलाओं के शरीर को टैबू बना दिया गया है इसलिए उनका बलात्कार हो या फिर इस तरह के वीडियो वायरल हों तो उसे पूरे परिवार की इज्जत से जोड़ दिया गया है और इस तरह यह दबाव सिफऱ् पीडि़त महिलाओं और उनके परिजनों (जिनमें आप भी शामिल हो सकते हैं!) के मत्थे मढ़ दिया गया है।
अब मुख्य बात पर आते हैं। इस डिजिटल युग में, जब हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और हम नहीं जानते कि किसके भीतर किस तरह का इंसान, किस तरह का साइकोपैथ है, जो किस समय का वीडियो बना लेगा। तो समय आ गया है कि हम सब (खासतौर पर पुरुष) सबसे पहले तो अपने मन के भीतर यह बात बिठा लें कि शरीर सिर्फ शरीर है। उसका इज्जत से कुछ लेना देना नहीं है। जैसे पुरुषों का शरीर है, वैसे ही महिलाओं का शरीर है। बनावट अलग है बस। इस दुनिया में शरीर को ढंक कर इज्जतदार बनने का ढोंग केवल मनुष्य ही करता है। आज भी हमारे चारों ओर जानवर (फिर चाहे वे नर हों या मादा) बिना कपड़े के ही घूमते हैं और हम उन्हें देख कर सहज ही रहते हैं। यह बात विशेषतौर पर घर के पुरुषों को अपने मन में जरूर बैठा लेनी चाहिए, ताकि वे अपने घर की महिलाओं को यह बात समझा सकें।
दूसरा कदम ये है कि अपनी बच्चियों, बहनों, महिलाओं के मन में यह बात बिठा दें कि यदि कभी कोई भी व्यक्ति आपके शरीर का किसी भी तरह का वीडियो बनाकर वायरल करने की धमकी दे (फिर चाहे उन्होंने संबंध स्वेच्छा से बनाए हों या उनके साथ बलात्कार हुआ हो) तो डरो मत। उसके दबाव में मत आओ। पुलिस में शिकायत करो। मामला साइबर सेल तक ले कर जाओ। उससे कहो कि यह सिफऱ् शरीर है और जैसा मेरा है, बिल्कुल वैसा ही तुम्हारी मां, बहन और बेटी का भी है। केवल उन्नीस-बीस का ही फक़ऱ् है- रंग, क़द-काठी और चेहरा। कहीं किसी सिरफिऱे ने मेरी तस्वीर की जगह मॉफऱ् कर के इसी वीडियो में तुम्हारी मां, बहन या बेटी की तस्वीर लगा दी तो क्या होगा?
जिस दिन से हमने महिलाओं के शरीर को केवल शरीर मानना सीख लिया, उस दिन से कोई भी व्यक्ति (महिला/पुरुष) किसी भी दूसरे व्यक्ति को ऐसे वीडियो वायरल करने की धमकी दे ही नहीं सकेगा, क्योंकि तब ऐसी धमकियां काम करना ही बंद कर देंगी।
जब आत्मविश्वास के साथ हर परिवार, हर परिवार का पुरुष फिर चाहे वो पिता हो, भाई हो, बेटा हो, पति हो या दोस्त, अपने घर की महिलाओं को यह बात सिखा देगा कि शरीर सिर्फ शरीर है, उसे उतनी ही तरजीह दो, तो मुझे भरोसा है कि सदियों की इस कंडिशनिंग से पार पाने में हमें बहुत ज़्यादा वक्त नहीं लगेगा। वजह? डिजिटल युग है दोस्तों ‘यदि इस पोस्ट में सार है, समझाईश है, जो सही है और आपके घर में मां, बहन और बेटी है या फिर पिता, भाई, बेटा या पति है’ तो इसे वायरल होते देर नहीं लगेगी।
-अचिता तिवारी
‘हर घर तिरंगा’ भारत की आजादी के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में लोगों को अपने घर पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए ‘आजादी के अमृत’ महोत्सव के तत्वावधान में चलाया गया एक अभियान था लेकिन इस अभियान ने कई सकारात्मक संदेश दिये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संभवत: यही मकसद भी था। राष्ट्रीय झंडे के साथ हमारा संबंध सदैव व्यक्तिगत की बजाए औपचारिक और संस्थागत रूप में अधिक रहा है। स्कूलों में झंडा रोहण के बाद राष्ट्रगान और लड्डू खाने तक ही स्वाधीनता दिवस सम्पन्न हो जाता था। कार्यालयों में भी रस्म अदायगी हो जाती थी। कमोवेश ऐसे ही हालात अब तक थे। लेकिन आजादी के 75वें वर्ष के दौरान एक राष्ट्र के रूप में झंडे को सामूहिक रूप से घर पर लाना न केवल तिरंगे के साथ हमारे व्यक्तिगत संबंध का प्रतीक रहा बल्कि यह राष्ट्र निर्माण में हमारी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता दिखा। यह पहल लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जागृत करने और भारत के राष्ट्रीय झंडे के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए की गई थी। तिरंगे को लेकर इस तरह का उत्साह हमने तो पहली बार ही देखा। देश को जब 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली थी। उस समय का उत्साह तो अवर्णनीय तो रहा ही होगा। मुझे उस उल्लास और उत्सव को देखने का सौभाग्य नहीं मिला क्योंकि मेरा जन्म इसके बाद हुआ था। लेकिन सन 2022 में स्वाधीनता की हीरक जयंती मनाते हुए 13 अगस्त से ही गली गली तिरंगा यात्रा जिस तरह से निकल रही थीं और तिरंगे के साथ लोग अपनी सेल्फी मोबाइल पर भेज रहे थे उससे पूरा देश तिरंगामय हो गया था। स्वतंत्रता दिवस इस बार आजादी से पूर्व का गणेश उत्सव हो गया था। लोगों को एकजुट करने का माध्यम बन गया है। रास्ट्रीय ध्वज और उससे जुड़ी कई बातों की जानकारी भी लोगों को मिली हैं।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है तथा राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सार्वभौमिक स्नेह, सम्मान तथा निष्ठा है। यह भारत के लोगों की भावनाओं और मानस में एक अद्वितीय और विशेष स्थान रखता है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का फहराना, उपयोग, प्रदर्शन राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 और भारतीय ध्वज संहिता, 2002 द्वारा शासित होता है। भारतीय ध्वज संहिता, 2002 की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं।
भारतीय ध्वज संहिता, 2002 को 30 दिसंबर 2021 के आदेश के अंतर्गत संशोधित किया गया था और पॉलिएस्टर या मशीन निर्मित ध्वज से बने राष्ट्रीय ध्वज को अनुमति दी गई है। अब हाथ से काते, हाथ से बुने अथवा मशीन से बने हुए राष्ट्रीय ध्वज कपास, पॉलिस्टर, ऊन, रेशम, खादी के होंगे।
कोई भी सार्वजनिक अथवा निजी संस्था अथवा शैक्षिक संस्थान का सदस्य सभी दिनों, अवसरों, औपचारिक अथवा अन्य अवसरों पर राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और सम्मान के अनुरूप उसे फहरा सकता है। भारतीय ध्वज संहिता, 2002 को दिनांक 19 जुलाई 2022 के आदेश द्वारा संशोधित किया गया था। भारतीय ध्वज संहिता को इस प्रकार प्रतिस्थापित किया गया था जहाँ ध्वज खुले में प्रदर्शित किया जाता है या जनता के किसी सदस्य के घर पर प्रदर्शित किया जाता है, उसे दिन-रात फहराया जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज आकार में आयताकार होगा। ध्वज किसी भी आकार का हो सकता है लेकिन ध्वज की लंबाई और ऊँचाई (चौड़ाई) का अनुपात 3 अनुपात 2 होगा।
जब भी राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शित किया जाए, तो उसे पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए और उसे प्रत्यक्ष रूप से यथोचित स्थान पर रखा जाना चाहिए। क्षतिग्रस्त या मैला-कुचौला ध्वज प्रदर्शित नहीं किया जाता।
ध्वज को किसी भी अन्य ध्वज या ध्वजों के साथ एक ही स्तंभ पर नहीं फहराया जाना चाहिए। ध्वज संहिता के अनुसार गणमान्य व्यक्तियों जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों आदि को छोडक़र किसी भी वाहन पर ध्वज नहीं फहराया जाना चाहिए। कोई अन्य ध्वज राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर या साथ-साथ नहीं रखा जाना चाहिए।
घर-घर तिरंगा अभियान के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि तिरंगा देश के वस्त्र उद्योग, खादी और आत्म-निर्भरता का प्रतीक रहा है। सूरत ने इस क्षेत्र में एक आत्म-निर्भर भारत के लिए बुनियाद तैयार की है। गुजरात ने बापू (महात्मा गांधी) के रूप में देश के स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व किया। देश को लौह पुरुष सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्व दिये। जिन्होंने आजादी के बाद ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की आधारशिला रखी। पीएम मोदी ने कहा, बारदोली सत्याग्रह और दांडी यात्रा ने जो संदेश दिया उससे पूरा देश संगठित हो गया था। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तिरंगे में देश का भविष्य देखा था। उन्होंने इसे कभी किसी भी तरह झुकने नहीं दिया। आज जब हम आजादी के 75 साल बाद नये भारत की यात्रा शुरू कर रहे हैं तो तिरंगा एकबार फिर भारत की एकता और चेतना को प्रतिबिंबित कर रहा है। गुजरात का हर कोना उत्साह से भरा है और सूरत ने इसके वैभव को और बढ़ाया है।
सूरत की तिरंगा यात्रा के बारे में जिक्र करते हुए मोदी ने कहा था कि इस यात्रा में लघु भारत दिखाई दे रहा है। समाज के हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हैं। परिधान विक्रेता हैं, दुकानदार हैं, कोई शिल्पकार है, कोई सिलाई कढ़ाई का काम करता है, कोई परिवहन या आभूषण के काम में लगा है। पूरे वस्त्र उद्योग और सूरत की जनता ने इस आयोजन को भव्य बना दिया है। मोदी ने कहा कि देश भर में चल रहीं तिरंगा यात्रा ‘हर घर तिरंगा अभियान’ की शक्ति और समर्पण का प्रतीक है। 13 से 15 अगस्त तक भारत के हर घर में तिरंगा फहराया गया। समाज के हर वर्ग, हर जाति और वर्ण के लोग स्वत: स्फूर्त एक ही पहचान के साथ आ रहे थे। यह भारत के निष्ठावान नागरिक की पहचान थी। इस अभियान में महिलाएं और पुरुष, युवा, बुजुर्ग और अन्य सभी अपनी भूमिकाएं निभा रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर घर तिरंगा आह्वान के बाद देश भर में तिरंगे झंडे की जोरदार मांग उठ रही। पूरे देश में आजादी के 75वें वर्ष को मनाने के लिए लोगों में जबर्दस्त उत्साह देखा देश की सबसे बड़ी टेक्सटाइल मंडी सूरत में ही अकेले कपड़ा व्यापारियों को 5 करोड़ से अधिक तिरंगे के ऑर्डर मिले थे। हर घर तिरंगे ने उत्साह के साथ एक साथ चलने का संदेश दिया।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज के दिन तीन बड़ी खबरें हैं। ये तीनों अलग-अलग दिखाई पड़ रही हैं लेकिन तीनों आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। पहली खबर यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष कौन बनेगा? दूसरी खबर यह कि देश के लगभग सभी प्रमुख विरोधी दल मिलकर भाजपा-विरोधी मोर्चा खड़ा कर रहे हैं। तीसरी खबर यह कि यदि अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनना पड़ गया तो राजस्थान का मुख्यमंत्री कौन बनेगा? यदि अशोक गहलोत का बस चलेगा तो सचिन पायलट को वे अपना स्थान क्यों लेने देंगे?
जिस व्यक्ति ने उनकी कुर्सी हिलाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिए थे और जिसे मुख्यमंत्री ने निकम्मा तक कह दिया था, उसका मुख्यमंत्री बन जाना गहलोत की इकन्नी हो जाना है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का कोई अर्थ नहीं है। जिसे प्रियंका और राहुल जो चाहें, सो बना दें तो फिर आप चाहे प्रधानमंत्री बन जाएं या कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं, आप रबर के ठप्पे से ज्यादा कुछ नहीं होंगे।
यों भी गहलोत चाहते थे कि वे मुख्यमंत्री और पार्टी-अध्यक्ष, दोनों बने रहें लेकिन राहुल ने एक व्यक्ति, एक पद का बयान खुले-आम देकर गहलोत की मन्शा पर पानी फेर दिया। वैसे गहलोत की यह इच्छा गलत नहीं थी, क्योंकि जब एक व्यक्ति प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनों बने रह सकता है तो वह मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बना रह सकता है?
इसमें शक नहीं कि आज कांग्रेस की जो दुर्दशा है, उसके मूल में बापकमाई का असली मसला है। देश में अपने बाप या माँ के दम पर जो भी नेता बने हैं, उनका अहंकार रावण को भी मात करता है। कांग्रेस का भी असली रोग यही है। गहलोत इस रोग से मुक्त हैं। वे खुद-मुख्तार हैं। जमीनी नेता हैं। विनम्र और मिलनसार हैं। वे नए और पुराने सभी कांग्रेसियों को जोडऩे में सफल हो सकते हैं लेकिन असली सवाल यह है कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनी इस कांग्रेस में उनकी हैसियत क्या होगी?
यदि उनकी हैसियत सिर्फ एक मुनीम की होगी, मालिक की नहीं तो वे रबर का ठप्पा बनकर रह जाएंगे। कांग्रेस की हालत आज जो है, उससे भी बदतर होती चली जाएगी। जहां तक चौधरी देवीलाल के जन्म दिन पर देश के विपक्षी दलों के एक होने का प्रश्न है, उसके मार्ग में कई रोड़े हैं। पहला तो यह कि विपक्ष का एकछत्र नेता कौन बनेगा? क्या कांग्रेस किसी अन्य को अपना नेता मान लेगी?
दूसरा, विपक्ष के पास मुद्दा क्या है? सिर्फ मोदी हटाओ। मोदी ने क्या आपात्काल जैसी कोई भयंकर भूल कर दी है या पिछली कांग्रेस सरकार की तरह वह भ्रष्टाचार में डूब गई है? तीसरा, हमारे विपक्ष के पास नेता तो है ही नहीं, उसके पास कोई वैकल्पिक नीति भी नहीं है। कोई नक्शा या सपना भी नहीं है। अगले चुनाव के पहले यदि मोदी से कोई भयंकर भूल हो जाए तो और बात है, वरना 2014 में भी मोदी के लिए कोई गंभीर चुनौती आज तो दिखाई नहीं पड़ रही। (नया इंडिया की अनुमति से)
-डॉ राजू पाण्डेय
समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन के अवसर पर रूस के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 16 सितंबर 2022 के अपने उद्घाटन भाषण में कहा- "मैं जानता हूँ कि आज का युग युद्ध का है नहीं और हमने फ़ोन पर भी कई बार आपसे इस विषय पर बात की है कि डेमोक्रेसी और डिप्लोमेसी और डायलाग ये सारी बातें ऐसी हैं कि जो दुनिया को स्पर्श करती हैं।"
पश्चिमी मीडिया को प्रधानमंत्री जी का यह कहना कि -आज का युग युद्ध का है नहीं- बड़ा पसंद आया और इस कथन को उन्होंने इस रूप में परिभाषित किया कि भारत ने अंततः अमेरिका और नाटो से जुड़े यूरोपीय नेताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया है और अब वह यूक्रेन के मामले में रूस से दूरी बना रहा है।
यदि प्रधानमंत्री जी के पूरे वक्तव्य पर नजर डाली जाए(जिसमें रूस और भारत की सुदीर्घ एवं प्रगाढ़ मैत्री और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ स्वयं के घनिष्ठ संबंध का ज़िक्र है) तो उनके उपर्युक्त कथन की इस प्रकार की व्याख्या अतिरंजित लग सकती है। किंतु यह भी सच है कि उक्त कथन पूरे वक्तव्य की मूल भावना से संगत न लगते हुए भी इसका हिस्सा है और इसे एक विशाल देश के प्रधानमंत्री द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी जिम्मेदारी से की गई टिप्पणी माना जा सकता है।
विशेषज्ञों ने अनेक प्रकार से प्रधानमंत्री जी के उक्त कथन को व्याख्यायित किया है। सर्वप्रथम एक अर्थ तो यह निकाला गया कि रूस-यूक्रेन के मध्य जो कुछ भी हो रहा है वह प्रधानमंत्री जी की दृष्टि में टकराव(कॉनफ्लिक्ट) नहीं है अपितु युद्ध(वॉर) है। प्रधानमंत्री जी के कथन को आधार बनाकर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि क्या वे अमेरिका के आधिपत्य वाले पश्चिम समर्थित एक ध्रुवीय विश्व को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं? यदि ऐसा है तो उपनिवेशवाद के शिकंजे से बड़े संघर्षों के बाद आज़ाद हुए देश के प्रधानमंत्री का यह मानना क्या चौंकाने वाला और दुःखद नहीं है? क्या रूस की अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करने के अमेरिकी सपने को साकार करने में हमारी भी कोई भूमिका होगी?
प्रधानमंत्री जी अपने वक्तव्य में भारत-रूस की मैत्री का उल्लेख करते हुए भावुक नजर आए और यह मैत्री है ही विलक्षण। सोवियत संघ के जमाने से ही हमारे पारस्परिक संबंधों का आधार आपसी हितों की सिद्धि के लिए मोलभाव और सौदेबाजी से अधिक एक दूसरे पर विश्वास और सम्मान रहा है। 1971 का वह दौर कौन भूल सकता है जब सोवियत संघ हमारी रक्षा के लिए चट्टान की भांति खड़ा रहा था। सोवियत संघ विघटित हुआ, रूस का तेवर और कलेवर बदला किंतु विदेश नीति लगभग यथावत रही, रिश्तों की गर्माहट में कुछ खास अंतर नहीं आया।
भारत उन कुछ देशों में है जो रूस यूक्रेन विवाद से आर्थिक रूप से अप्रभावित रहा है बल्कि लाभान्वित ही हुआ है। हमने तटस्थता का रुख अपनाया और अपने आर्थिक सामरिक हितों को वरीयता दी। इस बात के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा भी हुई थी कि अमेरिका के दबाव में न आते हुए उसने रूस के साथ जुड़े हितों और पुराने संबंधों को ध्यान में रखते हुए रूस-यूक्रेन विवाद पर अपना दृष्टिकोण तय किया। और भारत ऐसा अकेला देश नहीं है, ईरान,तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों ने रूस-यूक्रेन टकराव के दौर में रूस से अपने रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं।
यह सवाल भी पूछा जाना भी लाजिमी है कि भारत की अपनी प्राथमिकताओं और वैश्विक परिदृश्य की जटिलताओं से एकदम असंगत प्रधानमंत्री जी की यह दार्शनिक अभिव्यक्ति क्या विश्व नेता बनने की उनकी महत्वाकांक्षा का परिणाम है जो एक पुराने मित्र को गलत मौके पर दी गई नेक सलाह के रूप में सामने आई है।
यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि लगभग सभी देश शांति, सहयोग और उदारता के आकर्षक प्रवचनों का उपयोग संकीर्ण स्वार्थों और राष्ट्रीय हितों की सिद्धि के लिए तैयार की गई विदेश नीति की स्याह और डरावनी कारगुजारियों को छिपाने के लिए करते रहे हैं। अन्य देशों पर पश्चिमी जगत का दबाव है कि वे रूस से व्यापारिक संबंध तोड़ लें। किंतु अटलांटिक काउंसिल मैगज़ीन में प्रकाशित एक आलेख के अनुसार लगभग 1000 बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वादा किया था कि वे रूस यूक्रेन टकराव के कारण रूस छोड़ देंगी लेकिन हकीकत यह है कि केवल 106 पश्चिमी कंपनियों ने रूस छोड़ा और 1149 अभी रूस में बनी हुई हैं, इनमें लगभग 75 प्रतिशत कंपनियां ऐसी हैं जिनका शुमार दुनिया की नामचीन कंपनियों में होता है।
अनेक विश्लेषक हमें यह ध्यान दिलाते हैं कि रूस के सुदूर पूर्व में जारी सखालिन-2 तेल और प्राकृतिक गैस प्रोजेक्ट बदस्तूर जारी है। ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार मित्सुई और मित्सुबिशी जापान सरकार के सहयोग से इस परियोजना पर कार्य कर रही हैं। इस परियोजना से जापान की कुल विद्युत आवश्यकता के 9 प्रतिशत की पूर्ति होती है, इसलिए इनके रूस छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। पश्चिमी देश रूस से उर्वरक खरीद रहे हैं और इसके जल मार्ग से परिवहन पर कोई प्रतिबंध नहीं है किंतु रूस से गैर पश्चिमी देशों को भेजे जाने वाले उर्वरक और खाद्यान्न पर प्रतिबंध जारी है।
अनेक विषय विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वैश्विक खाद्य संकट की अफवाह अमेरिका द्वारा केवल इसलिए उड़ाई गई थी कि यूक्रेन के खाद्यान्न भंडारों में जमा गेहूँ की बिक्री अमेरिकी कंपनियों के माध्यम से यूरोपीय देशों में कराने के मार्ग में रूस बाधा न बन सके। अमेरिकी कंपनियों ने यूक्रेन की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा खरीद लिया है और उसके अनाज व्यापार इनका आधिपत्य है।
जब आदरणीय प्रधानमंत्री जी रूसी राष्ट्रपति से यह कहते हैं कि -आज फिर एक बार हम मिल रहे हैं और आज भी दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चिंता है और खासकर के डेवलपिंग कंट्रीज को फूड सिक्युरिटी की, फ्यूल सिक्युरिटी की, फ़र्टिलाइज़र की ऐसी जो समस्याएँ हैं, हमें जरुर कुछ ना कुछ रास्ते निकालने होंगे और आपने भी उसमें पहल करनी होगी- तब कहीं न कहीं वे अमेरिका और पश्चिमी देशों के नैरेटिव पर अपनी सहमति की मुहर लगा रहे होते हैं और इन देशों के दोगलेपन को नजरअंदाज कर रहे होते हैं।
अगस्त के अंतिम सप्ताह में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन पर प्रक्रियात्मक मतदान के दौरान रूस के विरुद्ध मतदान किया। सुरक्षा परिषद द्वारा यूक्रेन के राष्ट्रपति को बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया। संयुक्त राष्ट्र में रूसी राजदूत द्वारा बैठक में जेलेंस्की की भागीदारी के विषय में में एक प्रक्रियात्मक मतदान कराने का अनुरोध किया गया। जेलेंसकी की भागीदारी के पक्ष में भारत समेत 13 सदस्यों ने मत दिया,रूस ने इस आमंत्रण के विरुद्ध मत दिया जबकि चीन ने मतदान में भाग नहीं लिया। प्रधानमन्त्री जी के भाषण के बाद अनेक जानकार यह अनुमान लगा रहे हैं कि यदि संयुक्त राष्ट्र में भविष्य में रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने विषयक कोई प्रस्ताव आता है तो उसे भारत का समर्थन मिल सकता है।
प्रधानमंत्री जी का यह कहना कि आज का युग युद्ध का नहीं है, एकदम सच है किंतु जिस अवसर पर जिस प्रकार से उन्होंने यह बात कही है उससे यह संकेत जाता है कि युद्ध के लिए केवल रूस जिम्मेदार है। जबकि रूस को घेरने के लिए नाटो लगभग पच्चीस वर्षों से अपनी रणनीतियां बनाता रहा है और अपने प्रसार में लगा हुआ है। अंत में जब वह रूस के एकदम निकट जा पहुंचा तब रूस के पास शायद कोई और विकल्प नहीं था। पश्चिमी शक्तियों ने गोर्बाचेव से यह वादा किया था कि नाटो पूर्व की ओर अपना विस्तार नहीं करेगा किंतु मूल रूप से 12 सदस्य देशों वाले नाटो से आज 30 देश जुड़ चुके हैं और सच्चाई यह है कि रूस को छोड़कर वारसा संधि के सभी साथी देश नाटो के सदस्य हैं। नाटो पर अमेरिका के सामरिक हितों की सिद्धि और उसके अंतरराष्ट्रीय दबदबे में बढ़ोतरी के लिए कार्य करने के आरोप लगते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी यह मानता है कि इन आरोपों में काफी हद तक सच्चाई है।
प्रधानमंत्री जी के उद्घाटन भाषण की एक व्याख्या यह भी है कि रूस और चीन जैसे देशों की मौजूदगी में संभवतः शंघाई सहयोग संगठन के देश एक ऐसे समूह की छवि प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे थे जो अमेरिकी आधिपत्य को चुनौती देने में सक्षम है। प्रधानमंत्री नहीं चाहते थे कि वे ऐसी किसी तस्वीर का हिस्सा बनें। शायद चीन के साथ हमारे संबंधों की कटुता एवं तनाव और रूस के आक्रामक तेवरों से हमारी असहमति इसके मुख्य कारण थे।
अमेरिका और पश्चिमी जगत शीत युद्ध के इतने वर्षों बाद भी भारत को उसी तरह संदेह से देखते हैं जैसे उस काल में देखा करते थे। तब उन्हें न तो हमारी गुट निरपेक्षता रास आई थी न रूस से हमारी गाढ़ी दोस्ती। प्रधानमंत्री जी को अमेरिका और पश्चिम के संशय और दुविधा का निवारण करने में सफलता मिले न मिले, इनका विश्वास हासिल करने की उनकी कोशिशें पुराने विश्वसनीय मित्रों को हमसे छीन सकती हैं और गुट निरपेक्ष आंदोलन के अगुआ के रूप में अब तक के हमारे हासिल पर पानी फेर सकती हैं।
एक ध्रुवीय विश्व युद्ध और हिंसा से मुक्त होगा यह मानना अपरिपक्वता होगी। एक ध्रुवीय विश्व अविकसित और विकासशील देशों के शोषण, दमन और इन पर नव उपनिवेशवाद के कसते शिकंजे का पर्याय बन गया है। बहुध्रुवीय विश्व सैन्य टकराव की आशंका तो पैदा करता है किंतु शक्ति के अनेक केंद्रों की उपस्थिति इन पिछड़े और गरीब देशों के लिए नए विकल्प और अपनी हितसिद्धि के नए अवसर भी उत्पन्न करेगी।
युद्ध और हिंसा आज ही क्यों, किसी भी काल में स्वीकार्य नहीं हो सकते। लेकिन यह भी सच है कि कोई भी समय इनसे मुक्त न रह पाया और शायद न आगे रह पाएगा। संवाद और चर्चा ही अंतरराष्ट्रीय तनाव मिटाने और देशों के मध्य आपसी विश्वास कायम करने का एकमात्र उपाय है। लेकिन यह भी सच है कि संवादहीनता की स्थिति बारंबार बन जाती है। इसी समरकंद सम्मेलन के दौरान भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुखों के बीच द्विपक्षीय संवाद की आशा बहुत से प्रेक्षकों ने लगाई थी, किंतु स्वयं प्रधानमंत्री जी इनके प्रति अनिच्छुक नजर आए। चीन से सीमा विवाद और कश्मीर के मसले पर मोदी जी को वही भाषा बोलनी पड़ती है जो पुतिन यूक्रेन के विषय में बोल रहे हैं।
समरकंद घोषणा पत्र में भारत के अनेक सुझावों को स्थान मिला। जलवायु परिवर्तन पर सदस्य देशों की पहल, स्टार्टअप और नवाचार के लिए एक वर्किंग ग्रुप का निर्माण, पारंपरिक औषधियों के लिए विशेषज्ञ कार्य समूह बनाने पर सहमति- कुछ ऐसे विषय थे जो भारत की पहल पर घोषणापत्र में शामिल किए गए। यह भी तय किया गया कि एससीओ आतंकवादी, अलगाववादी और चरमपंथी संगठनों की एक साझा सूची बनाएगा जिससे सभी सदस्य देशों में इनकी गतिविधियां प्रतिबंधित की जा सकें। हमने इस बात में भी कामयाबी हासिल की कि चीन अपनी विवादास्पद वन रोड वन बेल्ट योजना को एससीओ के एजेंडे में शामिल न करा सके।
भारत की इस उपलब्धि का श्रेय केवल वर्तमान सरकार को ही नहीं है। स्वतंत्रता बाद से चली आ रही शांतिपूर्ण सह अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग पर आधारित विदेश नीति के कारण निर्मित भारत की सकारात्मक छवि के प्रति विश्व समुदाय के सम्मान के कारण ऐसी उपलब्धियां हमें सहज मिलती हैं। शायद हमने सैद्धांतिक और आदर्शवादी होने की कीमत चुकाई हो, लेकिन हमने जो हासिल किया है वह भी इनके बलबूते पर ही किया है। यदि प्रधानमंत्री जी विश्व नेता बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं तो उन्हें भारत की इस तटस्थ, शांतिप्रिय और उदार छवि को मजबूत करना होगा और ऐसा हमारी अब तक चली आ रही विदेश नीति की निरंतरता और सुदृढ़ता द्वारा ही संभव है, इसे खारिज करने से काम नहीं बनने वाला।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) नामक मुस्लिम संगठन पर सरकार की कड़ी नजर पहले से थी, लेकिन इस बार देश भर में उस पर मारे गए छापों ने उसकी पोल खोलकर रख दी। भारत में हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों या किसी भी मजहब के नाम पर कोई संगठन बनाने की मनाही नहीं है लेकिन यदि वह संगठन हिंसा, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और देशद्रोह फैलाने का काम करे तो उस पर प्रतिबंध लगाना तो जरुरी है ही, उसे दंडित भी किया जाना चाहिए।
कांग्रेस सरकार ने 2006 में इसी तरह के संगठन सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस संगठन का उद्देश्य था, भारत को आजाद करके उसे इस्लामी राष्ट्र बनाना। इस संगठन के बिखरने पर पीएफआई का जन्म हो गया। केरल के कुछ मुसलमान उग्रवादियों ने इसकी शुरुआत की और फिर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के तीन उग्रवादी संगठनों ने मिलकर इसे सारे देश में फैला दिया। इसने ‘सोश्यल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया’ नामक एक राजनीतिक दल भी खड़ा कर लिया।
यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि इन सारे संगठनों के नामों में ‘मुस्लिम’ शब्द किसी में भी नहीं है। यानी पूरी चालाकी से काम लिया गया है। इस संगठन पर डाले गए छापों से पता चला है कि इस्लाम के नाम पर विदेशों से करोड़ों रुपए इसने प्राप्त किए हैं। इसने पिछले डेढ़ दशक में जितने भी आंदोलन इस्लाम के नाम पर चले हैं, उनकी आग में तेल डालने का काम किया है। श्रीलंका के गिरजे में मारे गए 250 लोगों की हत्या में भी इसका हाथ बताया गया है। श्रीलंका के तमिल और मलयाली मुसलमानों को भी इसने अपनी गिरफ्त में ले रखा है।
केरल के एक अध्यापक टी.जे. जोजफ़ का एक हाथ भी इसी के कार्यकर्ताओं ने यह कहकर काट दिया था कि उसने पैगंबर साहब का अपमान किया था। कई राज्यों में पीएफआई के कार्यकर्ताओं को हत्या के जुर्म में भी गिरफ्तार किया गया है। इस बार इसके कार्यालयों पर छापे पड़े तो कल केरल बंद का आह्वान किया गया, जिसके दौरान काफी तोड़-फोड़ भी हुई।
इस संगठन पर पहले भी प्रतिबंध लग चुके हैं लेकिन ठोस प्रमाणों के अभाव में उसे छूट मिलती रही है। यदि इस बार भी सरकार ने सिर्फ आरोपों का प्रचार किया और उनके ठोस प्रमाणों को सार्वजनिक नहीं किया तो सरकार की मन्शा पर शक बढ़ेगा और उसकी प्रतिष्ठा पर भी आंच आएगी।
यदि इस संगठन पर लगे आरोप सही हैं तो यह मानना पड़ेगा कि यह भारत के मुसलमानों का काफी नुकसान कर रहा है। मुस्लिम लीग के रास्ते पर चलकर भारत के मुसलमान 1947 में बंट गए, कमजोर हो गए, पिछड़ गए। उन्हें अरबों का नकलची बनाकर नहीं, उन्हें पक्का भारतीय बनाकर ही उनका उद्धार किया जा सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-आर.के. जैन
इस दर्दनाक खबर से दिल दहल सा गया है कि देश की राजधानी दिल्ली में सडक़ के किनारे बने डिवाइडर पर सो रहे चार व्यक्तियों को एक तेज गति से जा रहे ट्रक ने कुचल दिया और चारों की मौत हो गई है ।
यह हादसा बीती रात को लगभग डेढ़ बजे हुआ है। जाहिर है कि सडक़ के किनारे सो रहे व्यक्ति गरीब मज़दूर होंगे जिनका न कोई आशियाना होता है और न ही कोई ठिकाना। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद ये गरीब मजदूर और कहीं और जगह न मिलने के कारण सडक़ के किनारे डिवाइडर पर ही सो गये होंगे ।
वैसे तो हर शहर का यह आम नजारा है। हजारों गरीब मज़दूरों ने सडक़ों को ही अपना ठिकाना बना रखा है और सडक़ के किनारे बने फुटपाथों व डिवाइडर पर ही अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते है। अपने घर परिवार से दूर बड़ी बडी बिल्डिंगों को बनाने वाले, कारखानों में मेहनत करने वाले, रिक्शा व ठेला गाड़ी खींचने वाले आदि ऐसे हज़ारों लाखों लोग हैं जिनकी पूरी जिंदगी सडक़ों पर ही व्यतीत हो जाती हैं ।
अक्सर हम अख़बारों में पढ़ते भी रहते है कि सडक़ किनारे सो रहे व्यक्तियों पर गाड़ी चढ़ गई और इतने लोग मर गये। कुछ साल पहले फि़ल्म अभिनेता सलमान खान की गाड़ी से भी कई लोग कुचलकर मर गये थे और उस पर केस भी चला था पर चूँकि मरने वाले गरीब मजदूर होते है और मारने वाले महँगी गाडिय़ों में सवार अमीर व्यक्ति तो सजा होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।
दिल्ली देश की राजधानी है और अगर राजधानी में भी गरीब मजदूर सडक़ों पर जिंदगी बिताने के लिए मजबूर है तो यह हमारे लिए चिंता व शर्म की बात है । देश के कोने कोने से गरीब व्यक्ति रोजगार व काम की तलाश में दिल्ली आता है और दिन भर कड़ी मेहनत करता है ताकि अपने घर परिवार वालों को गुजारे लायक कुछ पैसा भेज सके। अगर ये गरीब मजदूर न हो तो दिल्ली की लगभग सारी व्यवसायिक व निर्माण गतिविधियाँ ठप्प पड़ जायेगी पर इनकी बेसिक ज़रूरतों का ध्यान न कोई सरकार रखती हैं और न ही व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले । कोरोना काल में लाखों मज़दूरों का पैदल पलायन कौन भूल सकता है ।
अब सवाल यह है कि ऐसे निराश्रित लोगों की सुध कौन लेगा? क्या उस सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है जो व्यवसायिक व निर्माण के क्षेत्रों से टैक्सों द्वारा अपना खजाना भरती है । क्या दिल्ली सरकार ऐसे लोगों के लिए समुचित रैन बसेरों का इंतजाम नहीं कर सकती ताकि कोई गरीब सडक़ों पर न सो सके और ऐसे हादसों में जान न गँवाएँ। ध्यान रहे कि दिल्ली सरकार की आर्थिक स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में कई गुना सुदृढ़ रहती हैं क्योंकि दिल्ली शहर व्यावसायिक गतिविधियों का शुरू से ही प्रमुख केंद्र रहा है ।
काश दिल्ली सरकार लोकलुभावन व प्रचार की राजनीति से उपर उठकर गरीबों के कल्याण के लिए धरातल पर कुछ ठोस काम कर सकती तो ऐसे गरीब मजदूरों की अकाल व दर्दनाक मृत्यु न होती।
-श्रवण गर्ग
दुनिया के प्रजातांत्रिक मुल्कों का ध्यान इस समय भारत की कथित आर्थिक तरक्की पर नहीं बल्कि इस बात पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मई 2014 में सत्ता में आने के बाद पहली बार इतने निर्णायक तरीके से राजनीतिक चुनौती मिल रही है और सत्तारूढ़ दल में 2024 के परिणामों को लेकर एक तरह की बेचैनी है। बाहरी दुनिया देखना चाह रही है कि प्रधानमंत्री सामने खड़ी चुनौती से कैसे निपटते हैं, उनका अगला कदम क्या हो सकता है? और यह भी कि उनके द्वारा उठाए जाने वाले कदम कितने राजनीतिक और प्रजातांत्रिक होंगे ? इंदिरा गांधी के जमाने के ‘आपातकालीन’ उपाय तो आजादी के ‘अमृतकाल’ में नहीं दोहराए जाएँगे ? देश की जनता अपने प्रधानमंत्री से राष्ट्र के नाम अचानक से दिए जाने वाले संदेशों के ज़रिए ही ज़्यादा परिचित है।
वे तमाम लोग जो इस समय सत्ता के शीर्ष पर हैं , इस हकीकत को महसूस नहीं कर पा रहे हैं कि पिछले आठ-साढ़े आठ सालों के दौरान एक-एक करके काफी लोगों को नाराज कर दिया गया है। नाराज लोगों की बढ़ती हुई भीड़ में सिर्फ एनडीए के घटक, विपक्षी पार्टियाँ और ‘गांधी परिवार’ के सदस्य ही नहीं हैं बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा के कई नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हैं जिन्हें उनके वर्षों के संघर्ष के पुरस्कार स्वरूप हाशियों पर पटक दिया गया है।
विश्व इतिहास में उल्लेख है कि कई बार नायक अपनी सत्ता के वर्तमान को ही अपना और देश का भविष्य मान बैठने के अहंकार का शिकार हो जाते हैं। वे चुनावों में जनता द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने की स्थिति में भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संवैधानिक व्यवस्थाओं का सम्मान करते हुए शांतिपूर्ण तरीक़ों से सत्ता का हस्तांतरण करने से इनकार कर देते हैं। अमेरिका में दो साल पहले ऐसा ही हुआ था। राष्ट्रपति पद के चुनाव में प्राप्त हुई पराजय को विपक्षियों के द्वारा अपने खिलाफ किया गया आपराधिक षडय़ंत्र घोषित करते हुए डॉनल्ड ट्रम्प ने न सिर्फ बाइडन को सत्ता सौंपने से मना कर दिया था, चुनाव-परिणामों की पुष्टि के दौरान उनके समर्थकों को हिंसक तरीके से उकसा कर वाशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकी संसद पर हमला भी करवा दिया गया था। इसी नवम्बर अमेरिका में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों को लेकर ट्रम्प की पार्टी के उम्मीदवारों ने अभी से घोषणा कर दी है कि पराजय की स्थिति में वे चुनाव परिणामों को स्वीकार करने से इंकार कर सकते हैं।
हमारे यहाँ नागरिकों का ध्यान इस समय प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर नामीबिया से लाए गए चीतों पर केंद्रित कर दिया गया है। चीतों के आगमन को एक ऐतिहासिक घटना और देश में अच्छे दिनों की शुरुआत के तौर पर पेश किया जा रहा है। कुछ दिनों के बाद ऐसा ही कोई नया चमत्कार देखने को मिल सकता है। कुछ ही दिन पहले हमें गर्व के साथ जानकारी दी गई थी कि हमारे एक उद्योगपति दुनिया में दूसरे नम्बर के सबसे धनी व्यक्ति बन गए हैं। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी से पूछा जा सकता है कि जो चमत्कार सिर्फ पिछले आठ सालों में हो गया वह कांग्रेस के पचपन सालों के शासनकाल में क्यों संभव नहीं हो पाया?
देश को यह भी बताया गया है कि एक आर्थिक शक्ति के रूप में भारत ने ब्रिटेन को भी पीछे छोड़ दिया है और अब देश दुनिया में पांचवें नंबर पर पहुँच गया है। आर्थिक विकास की दर के मामले में भी हमने बड़े-बड़े देशों को पीछे छोड़ दिया है।
हमारे शासक यह नहीं बताना चाहते है कि ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ (विश्व भुखमरी सूचकांक) में 116 देशों के बीच भारत 101वें स्थान पर क्यों है ? क्या कल्पना की जा सकती है कि भारत का शुमार उन 31 मुल्कों में किया गया है जहां भुखमरी की स्थिति गंभीर बताई जाती है! सरकार अगर अस्सी करोड़ लोगों को दिया जाने वाला मुफ्त का अनाज बंद कर दे तो हालात क्या बनेंगे? देश में प्रजातंत्र की मौजूदा स्थिति के बारे में ‘इकॉनॉमिस्ट इंटेलिजेन्स यूनिट’ ने भारत को दुनिया के मुल्कों के बीच 46वें स्थान पर तथा ‘ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स’ में अमेरिकन थिंक टैंक केटो ने 119वें क्रम पर रखा है। प्रेस की आजादी के मामले में हम 180 देशों के बीच 150वें स्थान पर हैं।
इस हकीकत की ओर हमने अभी झांकना भी प्रारंभ नहीं किया है कि अब आगे आने वाले बीस महीने भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए कितने निर्णायक साबित होने वाले है! देश इस समय अनिश्चय की राजनीति के दौर से गुजऱ रहा है। ऐसा पहले नहीं हुआ। आपातकाल के खऱाब दिनों में भी लोकतांत्रिक राजनीतिक स्थिरता को लेकर आज जैसी अनिश्चितता की स्थिति नहीं थी।
आश्चर्य नहीं कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को देश के नागरिक, विशेष कर वह युवा पीढ़ी जिसका जन्म इस शताब्दी के उदय के साथ हुआ है, हवा के एक ताजा झोंके की तरह से देख रहे हैं। यात्रा को प्रारंभ हुए अभी दो सप्ताह ही हुए हैं और वह लोगों की आकांक्षाओं में प्रकट होने लगी है। उसे अभी पाँच महीने या उससे भी ज्यादा का वक्त उन सडक़ों से गुजरना है जिन पर भूखे-प्यासे पैदल चलकर लाखों देशवासियों ने कोरोना के दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में घर-वापसी की थी। इस बीच मौसम और पेड़-पौधों के रंग बदल जाएँगे। वे सैकड़ों यात्री जो तमाम कष्टों को सहते हुए यात्रा में शामिल हैं उनकी यह नवरात्रि, दशहरा दीपावली जनता के बीच मनने वाली है।
पिछले एक दशक के दौरान योजनाबद्ध तरीके से इतना कुछ बदल कर नागरिकों के जीवन में स्थापित कर दिया गया है कि इस एक यात्रा से ज़्यादा बदलने वाला नहीं है। यात्रा और उसकी उपलब्धियों को विफल करने और नकारने के लिए तमाम तरह की ताकतें जुट गईं हैं, संगठित हो गईं हैं। इनमें किसी समय सत्ता को बदल देने का आह्वान करने वाली वे पार्टियाँ भी शामिल हैं जो कांग्रेस के पैदल चलने से अपने पैरों में थकान महसूस कर रहीं हैं।
यात्रा की सफलतापूर्वक समाप्ति के लिए इसलिए प्रार्थनाएँ कीं जानी चाहिए कि देश के जीवन में इस तरह के क्षण बार-बार उपस्थित नहीं होते हैं। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की सुखद पूर्णाहुति विभाजन की विभीषिका को दोहराने की कोशिशों को ध्वस्त कर कई नई यात्राओं को जन्म देने वाली है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और अखिल भारतीय इमाम संघ के प्रमुख इमाम उमर इलियासी दोनों ही हार्दिक बधाई के पात्र हैं। इन दोनों सज्जनों ने जो पहल की है, वह एतिहासिक है। इलियासी ने दावत दी और भागवत ने उसे स्वीकार किया। मोहन भागवत मस्जिद में गए और मदरसे में भी गए। मोहनजी ने मदरसे के बच्चों से खुलकर बात की।
इसके एक दिन पहले मोहन भागवत ने पांच नामी-गिरामी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से भी संवाद किया। मोहनजी ने राष्ट्रीय एकात्म पैदा करने की यह जो पहल की है, इसकी शुरुआत पूर्व संघ-प्रमुख कुप्प सी सुदर्शन ने की थी। सुदर्शनजी कन्नड़भाषी थे। उनका लालन-पालन और शिक्षण मध्यप्रदेश में हुआ था। वे इंदौर में संघ की शाखा चलाया करते थे। वे मेरे अभिन्न मित्र थे। वे लगभग 60-65 साल पहले इंदौर में मेरे घर पर आने वाले मेरे मुसलमान और ईसाई मित्रों से खुलकर बहस किया करते थे।
मेरे पिताजी के पुस्तकालय में इस्लाम पर जितने भी ग्रंथ थे, वे सब उन्होंने पढ़ रखे थे। उनकी यह पक्की धारणा थी कि भारत के हिंदू और मुसलमान सभी भारतमाता की संतान हैं। यह जरुरी है कि वे मिलकर रहें और उनके बीच सतत संवाद और संपर्क बना रहना चाहिए। जब सुदर्शनजी सर संघचालक बने तो उन्होंने 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बनवाया, जिसका सफल संचालन इंद्रेशकुमार कर रहे हैं। सुदर्शनजी ने मेरे अनुरोध पर स्वयं लखनऊ जाकर कई मौलानाओं और समाजवादी नेताओं से सस्नेह संवाद कायम किया।
उसी धारा को अब मोहन भागवत ने काफी आगे बढ़ा दिया है। मोहनजी ने अपने संवाद में साफ-साफ कहा कि जिहाद के नाम पर हिंसा और बैर-भाव फैलाना तथा हिंदुओं को काफिर कहना कहाँ तक ठीक है? इसी प्रकार उन्होंने अपने कथन को दोहराया कि हिंदू और मुसलमानों का डीएनए तो एक ही है। वे सब भारतमाता की संतान हैं। मोहनजी ने मदरसे के बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उनकी शिक्षा में आधुनिक विषय पढ़ाने के सुझाव भी दिए।
मोहन भागवत के आगमन और संवाद से सम्मोहित हुए इमाम इलियासी ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ तक कह दिया। फूलकर कुप्पा होने की बजाय विनम्रता के धनी मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रपिता तो एक ही हैं। हम सब राष्ट्र की संतान हैं। इलियासी अक्सर मुझसे कहा करते हैं कि मुसलमान तो मैं पक्का हूँ लेकिन मैं राजपूत भी हूँ, यह मत भूलिए। हिंदुओं और मुसलमानों में जो लोग कट्टरपंथी हैं, उन्हें भागवत और इलियासी, दोनों से काफी नाराजी हो रही होगी, लेकिन वे जरा सोचें कि नरेंद्र मोदी राज में कट्टरवादियों ने कटुता और संकीर्णता का जैसा माहौल बना रखा है, उसमें क्या यह भेंट आशा की किरण की तरह नहीं चमक रही है?
पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उनके नेताओं से जब भी मेरी बात होती है, वे संघ पर प्रहार करने से कभी नहीं चूकते लेकिन क्या अब वे यह महसूस नहीं करेंगे कि यह जो नई विचारधारा भारत में चल पड़ी है, यह भारत के हिंदुओं और मुसलमानों को ही एक-मेक नहीं कर देगी बल्कि यह प्राचीन भारत याने आर्यावर्त्त याने दक्षिण एशिया के पड़ौसी देशों को भी एक सूत्र में बांधने का काम करेगी। यही असली ‘भारत जोड़ो’ है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-हृदयेश जोशी
नामीबिया से अफ्रीकी चीतों को भारत आये हफ्ता भर होने को है और इसे लेकर अब भी बहस गर्म है क्या भारत में इन्हें अनुकूल इकोसिस्टम मिलेगा? यहां जिस वातावरण में ये चीते छोड़े गये हैं क्या उसमें वह ढल पायेंगे? मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में छोड़े गये चीते अभी पूरी तरह आजाद नहीं हैं। करीब 750 वर्ग किलोमीटर में फैले इस नेशनल पार्क के एक बाड़े में उन्हें चरंटाइन करके रखा गया है। लिहाजा ये अभी स्वच्छन्द शिकार नहीं कर सकते और इन्हें वनकर्मी भैंस इत्यादि का मीट मुहैया करा रहे हैं।
विरोध और आलोचना के
बीच सरकार आश्वस्त
सोमवार को जाने माने वन्य जीव विशेषज्ञ वाल्मिकी थापर ने एक बार फिर कहा कि भारत चीते के लिये अनुकूल बसेरा नहीं है। यह सवाल इसलिये भी उठ रहा है क्योंकि जो चीते कूनो पहुंचे हैं वह उस प्रजाति के नहीं जो 1940 के दशक में लुप्त हो गई थी। हालांकि इस कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञ आश्वस्त हैं कि चीता प्रोग्राम सफल रहेगा। भारत सरकार ने अगस्त में ही इस कार्यक्रम के उद्देश्यों और रूपरेखा को जारी किया था जिसमें ‘खुले जंगल और सवाना प्रणालियों को बहाल करने के लिए संसाधनों को इक_ा करने’ से लेकर उपयुक्त ‘ईकोसिस्टम से जैव विविधता’ को बढ़ाने की कोशिश बताई है।
सरकार ने यह भी कहा है कि चीता संरक्षण क्षेत्रों में ईकोसिस्टम की बहाली गतिविधियों के माध्यम से कार्बन को अलग करने की भारत की क्षमता को बढ़ाने के लिए और इस तरह वैश्विक जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लक्ष्य हासिल होंगे। साथ ही ‘स्थानीय समुदाय की आजीविका को बढ़ाने के लिए पर्यावरण-विकास और पर्यावरण-पर्यटन के लिए भविष्य के अवसरों का उपयोग’ किया जायेगा।
वैसे अफ्रीकी चीतों को भारत लाने से पहले देश में देसी प्रजातियों को एक से दूसरी जगह सफलता पूर्वक बसाया गया है जैसे दुधवा नेशनल पार्क में एक सींग वाला राइनो या फिर मध्य प्रदेश के सतपुड़ा में टाइगर रिजर्व में बारहसिंगे। इसके अलावा राजस्थान के सरिस्का और एमपी के पन्ना में टाइगर बसाये गये हैं लेकिन यह पुनस्र्थापन देश के भीतर देसी प्रजातियों का था जबकि नामीबिया से आये प्राणी अफ्रीकी हैं।
क्या चीतों के लिये विकसित
किया गया कूनो?
चीतों को भारत लाये जाने पर टीवी से लेकर सोशल मीडिया पर छाये उत्साह के बीच यह जानना जरूरी है कि क्या पिछले कुछ दशकों में कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिये तैयार किया गया। सच यह है कि मध्यप्रदेश के श्योपुर जि़ले में बसा कूनो नेशनल पार्क-जो कि विन्ध रेन्ज का हिस्सा है- वह पिछले कुछ दशकों में गीर के जंगलों से एशियाई शेरों को लाने के लिये तैयार किया गया। पश्चिम एशियाई देशों से लेकर भारत के पूर्व तक जंगलों में पाये जाने वाले एशियाई शेर अभी देश में केवल जूनागढ़ स्थित गीर के जंगलों में ही हैं।
इसलिये विशेषज्ञों ने कहा कि इन्हें गीर के अलावा किसी अन्य जगह में भी रखा जाये। जाने माने वन्य जीव विज्ञानी और शोधार्थी डॉ. फैयाज अहमद ख़ुदसर बताते हैं कि नब्बे के दशक के शुरुआती सालों में जिन जगहों को गीर के शेरों के दूसरे संभावित घर के रूप में चिन्हित किया गया उनमें कूनो भी एक जगह थी। खुदसर ने वाइल्ड लाइफ- इंडिया ञ्च 50 नाम से प्रकाशित पुस्तक में कूनो नेशनल पार्क के विकसित होने की पूरी कहानी लिखी है। वह लिखते हैं कि जंगल के बीचोंबीच बहने वाले कूनो नदी (जो कि चंबल की सहायक जलधारा है) के कारण इसे यह नाम मिला। एशियाई शेरों के लिये बिल्कूल माकूल यह जगह 1981 तक एक वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी थी और इसे बाद में 2018 में नेशनल पार्क बना दिया गया।
खुदसर याद दिलाते हैं कि वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने भी एक फील्ड सर्वे के बाद 1994 में कूनो को एशियाई शेरों के दूसरे घर के रूप में संभावित जगह बताया। उसके बाद से लगातार शेरों को गीर से बाहर लाने का प्रोजेक्ट चलता रहा लेकिन मुख्य रूप से गुजरात सरकार के अनमनेपन के कारण यह कभी पूरा नहीं हो पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कूनो में शेर लाने
को कहा था, चीतों को नहीं
चीतों को भारत लाने के लिये गंभीर कोशिश पूर्व वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के वक्त 2009 में ही शुरू हो गई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश इसके आड़े आ गया। असल में 2006 में दिल्ली स्थित एक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर कहा कि एशियाई शेरों के अस्तित्व पर संकट के कारण उन्हें केवल गीर में ही रखना ठीक नहीं है और उन्हें उसके बाहर भी रखा जाना चाहिये। इस केस में लंबी सुनवाई हुई और अप्रैल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने शेरों को गीर नेशनल पार्क से कूनो में लाने की सहमति दे दी।
इसके साथ ही कोर्ट ने तब नामीबिया से अफ्रीकी चीतों को भारत लाये जाने को इजाज़त नहीं दी थी और कहा था कि मूल प्रजातियों को बचाना प्राथमिकता होनी चाहिये। स्पष्ट है कि कोर्ट में लंबी बहस के बाद गीर में शेरों पर छाये विलुप्ति के खतरे को समझा गया और उन्हें दूसरा घर दिये जाने को कहा गया। कूनो को एशियाई शेरों के लिये तैयार करना आसान नहीं था और इसके लिये यहां से 24 गांवों को खाली कराया गया। सहरिया आदिवासियों ने अपना घर छोड़ा और रहन सहन का तरीका बदला लेकिन एशियाई शेर कूनो में कभी नहीं आये। आज मध्यप्रदेश में कई जानकार और स्थानीय इसे शेरों और आदिवासियों दोनों के साथ धोखा मान रहे हैं।
कैसे बना कूनो चीतों का घर
यह कौतूहल का विषय है कि जब भारत अभी महंगाई, बेरोजगारी और पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों समेत ढेरों समस्याओं से जूझ रहा है तो अचानक चीते को लाने की बात होने लगी। इसके लिये देश की नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) ने कोर्ट में यह हलफनामा दिया कि चीतों को यहां लाने से बाद में शेरों को बसाने में कोई समस्या नहीं होगी। इसके बाद चीतों को कूनो में पुनर्स्थापित करने की राह साफ हुई।
लेकिन खुदसर लिखते हैं कि पिछले कुछ सालों में कूनो में हालात बदले हैं और यहां चीतल या चिंकारा की जैसे जानवरों की संख्या कम हुई है जो कि चीतों के लिये उपयुक्त और स्वाभाविक आहार है। अब यहां कोमलपत्तियों वाली वनस्पतियों की जगह कड़ी लकड़ी वाले पेड़ या कुश अधिक हो गयी है जिसे खाया नहीं जा सकता। इसी क्षेत्र में तेंदुओं की संख्या काफी बढ़ी है जिनका चीतों के साथ संघर्ष हो सकता है।
कुछ जानकारों ने उस दलील को चुनौती दी है जिसमें चीता पुनस्र्थापन के बहाने सरकार इकोसिस्टम को दुरस्त करने का दावा कर रही है। इंडियन एक्सप्रेस में जैव विविधता विशेषज्ञ रवि चेल्लम ने लिखा है कि पारिस्थितिकी तो दुरस्त करने के लिये चीता लाने से बेहतर तरीके उपलब्ध हैं। चेल्लम ने पूरे चीता एक्शन प्लान के वैज्ञानिक आधार को त्रुटिपूर्ण बताया है और कहा है कि यह खेद का विषय है कि अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों और पर्यावरण संरक्षण में लगे संस्थानों ने विज्ञान की अनदेखी की और विमर्श को नहीं जगह नहीं दी।
जो भी हो अब सच यही है कि जिस जंगल और नेशनल पार्क को देसी शेर के लिये तैयार किया गया वहां अफ्रीकी चीते आ गये हैं। सरकार आजादी के अमृत महोत्सव के बीच इसे एक बड़े पर्यावरण और वन संरक्षण प्रोजेक्ट की तरह पेश कर रही है जबकि आलोचक इसे सरकार का ‘वेनिटी प्रोजेक्ट’ बता रहे हैं। लेकिन अगर सरकार के दावे के मुताबिक वाकई अफ्रीकी चीते इस इकोसिस्टम का हिस्सा बन पाये और उनका परिवार फला-फूला तो यह वन्य जीव संरक्षण के इतिहास में मील का पत्थर कहा जायेगा। (कार्बनकॉपी)
-प्राण चड्ढा
अचानकमार टाइगर रिजर्व के लमनी छपरवा में आदिवासियों के बीच तीन दशक तक शिक्षा की मशाल जगाये प्रो. पीडी खेरा के जीवन ज्योति का अवसान दो बरस पूर्व हो गया। वे नब्बे बरस के थे।
पांच दशक पहले वह दिल्ली विवि के शोधार्थियों के दल को लेकर अमरकण्टक की वादी में रहने वाले अत्यंत पिछड़ी जनजाति बैगा पर अध्ययन के लिए हर साल आते और वह उनके संग ऐसे रमे की सेवानिवृत्त होने के बाद वानप्रस्थी बन कर यहां के हो गए। वो बैगा आदिवासियों के सच्चे हमदर्द रहे, उनको वही मौके पर चिकित्सा उपलब्ध करते। हाट बाजार की अन्नदूत सेवा से जोडऩे सूत्रधार बनते। जंगल के संरक्षक बने रहे।
प्रो. खेरा लमनी से रोज बस से छपरवा के स्कूल जाते और अलग-अलग क्लास में अँग्रेजी पढ़ते। जिससे उनके छात्रों को नौकरी पाने की दौड़ में सहूलियत होती। मेरी उनसे बड़ी पुरानी पहचान रही। चांदनी रात में रेंजर भगत, प्रो. खेरा और मैं लमनी बेरियर में साथ बैठ कर चर्चा करते। उनके कांधे पर लटके खादी के झोले में चना मुर्रा भरा रहता। जिसे वह शाम बच्चों और रात भूखे को बांटते।
वो खादी पहनते और पक्के गांधी वादी रहे।लमनी में छोटी सी कुटिया कुछ कपड़े और भोजन का सामान बस यही उनकी पूंजी बाद मरने के बाद मिली। कौन मानेगा की आज के स्वार्थ और नफरत भरी दुनिया में इस आदमी भी हो सकता है जिसके जीवन का पल-छिन जंगल में अभाव में जीते वनवासियों के नाम था।
उनकी निस्वार्थ सेवा पर भी उंगली उठती, एक बार अमरकंटक के किसी साधु ने मुझसे कहा- मुझे तो यह नक्सली लगता है। मुझे बड़ा दुख हुआ, पर मैने जबाव दिया,ज्आपसे धोबी के वचनों के कारण ही सीता माता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी होगी। वह बहुत शर्मिंदा हुये, मुझसे वचन लिया कभी इस किस्से को उनके नाम से नहीं जोडऩा।
आदमी की उम्र तय है,जो जन्म लेता है उसको जाना होता है। बाप की जगह बेटा, गुरु की जगह शिष्य ले लेता है, अफसर की जगह नया अफसर आ जाता है, लेकिन आदिवासी के पिता तुल्य प्रो पीडी खेरा जैसा कोई और बनेगा,यह नामुमकिन है।
वह कहां से आये और उनके घर का पता क्या था यह सब पता नहीं।सबने मिल कर इस महामानव को अपना समझा और अंतिम संस्कार किया।
-डॉ. परिवेश मिश्रा
नवम्बर 1956 में देश के चार राज्यों का विलय कर एक नये राज्य ‘मध्यप्रदेश’ की घोषणा कर दी गयी थी। ये चारों राज्य हिन्दी भाषा की रस्सी से आपस में बांधे गये थे किन्तु इनके बीच की बाकी विविधताओं के विलय होने में कई साल लग गये थे। इस चारों राज्यों की प्रशासनिक शैलियां अलग थीं, संस्कृति और बोलियां अलग थीं। खान-पान की आदतें भी जुदा थीं।
इस अंतिम-खान-पान की-आदतों और शैलियों की विभिन्नता का लाभ उठाया श्रीमती अन्नपूर्णा पाटस्कर ने। उन्होंने इनके बीच से कम आय वाले परिवारों की महिलाओं के लिये आमदनी के अवसर ढूंढने का प्रयास किया।
वे गांधीवादी राज्यपाल श्री हरि विनायक पाटस्कर की पत्नी थीं। आमतौर पर लोग उन्हें ताई के नाम से संबोधित करते थे। ताई ने कुछ प्रमुख महिलाओं को जोडक़र भोपाल में एक क्लब की स्थापना की। इसमें सारंगढ़ की रानी ललिता देवी जी सहित कुछ मंत्रियों और अधिकारियों की पत्नियां तो थीं ही, भोपाल की बेगम (नवाब साजिदा सुल्तान जी जो सीनियर बेगम कहलाती थीं) जैसी कुछ वे महिलाएं भी थीं जो इन दोनों श्रेणियों में नहीं आती थीं।
हालांकि क्लब की शुरुआत राजभवन स्टाफ के परिवारों की महिलाओं को पापड़ और बड़ी बनाना सिखा कर हुआ। लेकिन क्लब की उपलब्धियों की चर्चा इस कहानी का फोकस नहीं है।
एक दिन सदस्यों ने आपसी सहयोग से एक भोज का आयोजन किया। रानी ललिता देवी जी के साथ जो व्यंजन पहुंचा उसने अपनी अनूठी शैली, स्वाद और प्रस्तुतीकरण से सबको विमुग्ध कर दिया। एक स्वर में मांग उठी की अगली बैठक में रानी साहिबा अपने रसोईया को साथ लाएं ताकि उसका इंटरव्यू लेकर इस सर्वथा अपरिचित डिश के बारे में समझा जा सके। अगली बैठक में रानी ललिता देवी जी पहुंचीं और बैठक हॉल में चली गईं।
पीछे पीछे राजभवन के पोर्च में दूसरी कार पहुंची। दरबान (उन दिनों सरकारी/सामाजिक व्यवस्था में दरबान, अर्दली, बावर्ची, खानसामा जैसे शब्द आम प्रचलन में थे) ने लपककर कार का दरवाजा खोला। कार से सूट, टाई, चमचमाते जूतों और सिर पर हैट के साथ पांच फुट दस इंच के एक साहबनुमा शख्स उतरे। उन्होंने अपने कोट को ठीक किया, हैट को करीने से सिर से निकाल कर बाएं हाथ की कोहनी के नीचे रखा और कदम प्रवेश द्वार की ओर बढ़ाए। किन्तु दरबान ने हाथ बढ़ा कर उन्हे रोक दिया। यहां महिलाओं का कार्यक्रम चल रहा था और साहबों का प्रवेश वर्जित था।
विलम्ब होता देख रानी साहिबा बाहर आईं और इन शख्स को अपने साथ अंदर ले गयीं। वहां उन्होंने उनका परिचय दिया-मिस्टर सिच्ेरा, हमारे खानसामा।
बीसवीं सदी की शुरुआत में जन्मे मिस्टर सिच्ेरा मूल रूप से गोआ के रहने वाले थे। गोआ उन दिनों पुर्तगाल का उपनिवेश था। सीमा पर आने जाने में रोक टोक नहीं थी और वहां के युवक रोजग़ार की तलाश में आमतौर पर बम्बई ही आते थे। उम्र में स्व. राजा जवाहिर सिंह जी के समकालीन मिस्टर सिच्ेरा के बचपन के दिनों में बम्बई जैसे हिन्दुस्तानी इलाकों में गोआ के बारे में जो सीमित समझ थी उसमें माना जाता था कि गोआ में हर दूसरा व्यक्ति या तो पाक-कला में पारंगत होता है या वायलिन बजाने में। पुर्तगालियों ने गोवा में चर्च स्थापित किये और संगीत जानने समझने वाले स्थानीय युवाओं को कॉयर मास्टर के रूप में चर्चों में ऑर्गन और पियानो जैसे पाश्चात्य वाद्य यंत्र बजाने के अवसर मिलने लगे। इसी के चलते ये लोग पाश्चात्य संगीत की लिपि-स्टाफ नोट- भी पढऩे और लिखने की कला सीख सके। पाश्चात्य वाद्ययंत्रों तथा स्टाफ नोट से परिचय इनके बड़े काम आया। प्रथम विश्वयुद्ध में लडऩे के लिए सामान्य सैनिकों की भर्ती तो देश भर में हुई, लेकिन मिलेट्री बैन्ड जितने भी बने उनमें गोआ के लोगों की भरमार थी।
बम्बई में उन दिनों पारसी तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय की बड़ी आबादी रहती थी। युद्ध समाप्ति के बाद उनकी निजी पार्टियों के साथ साथ उनके थियेटर/नाटक, नाईट-क्लब, होटल आदि के लाईव-संगीत में भी गोवा के इन कलाकारों को जीविकोपार्जन का अवसर मिला। कुछ आगे चलकर जब शंकर-जयकिशन ने पृथ्वी थियेटर में संगीत देना छोडक़र फिल्म संगीत की ओर कदम बढ़ाये तो पाश्चात्य संगीत में सिद्धहस्त गोअन, पारसी तथा यहूदी कलाकार साथ हो लिए और ऑर्केस्ट्रा दलों में वादक के रूप में खपे। जहां पांच से दस वादकों को साथ लेकर गाने रिकॉर्ड कर लिये जाते थे वहां पचास से सत्तर वादकों वाले आर्केस्ट्रा का चलन प्रारंभ हो गया।
संगीत के अलावा जिस दूसरी पारम्परिक कला में ये सिद्धहस्त थे वह थी पाक-कला। सन् 1903 के दिसम्बर में जमशेदजी टाटा ने ताज होटल की शुरुआत कर होटल और खानपान उद्योग के दरवाजे गोआ के युवकों के लिए खोल दिए।
मिस्टर सिच्ेरा ने अपनी शुरुआत ताज महल होटल से की लेकिन कुछ ही सालों में परिस्थितियों ने ऐसा रूप बदला कि जब राजा जवाहिर सिंह जी ने मिस्टर सिच्ेरा को अपनी सारी पाक-कला, प्रशिक्षण और प्रशस्तियों के साथ सारंगढ़ आकर बसने का प्रस्ताव दिया तो वे इनकार नहीं कर पाये। यह कहानी उन्ही परिस्थितियों की है जिन्होने सुदूर गोआ में जन्मे, पोर्चगीज़ (पुर्तगाली), कोंकणी, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी बोलने वाले, इंगलैंड में ट्रेनिंग पा चुके ताज होटल के शेफ-दि-च्जिीन पुर्तगाली नागरिक के सारंगढ़ में बसने की राह प्रशस्त की।
पुर्तगालियों के साथ रहने का प्रभाव गोआ वालों की पाक कला पर भी पड़ा था। ताज जैसे होटल के लिए पाश्चात्य या कॉन्टिनेन्टल भोजन बनाने के लिए या और एडवांस ट्रेनिंग देने के लिये गोआ के युवकों से बेेहतर विकल्प नहीं उपलब्ध था। हमारी रुचि की बात यह रही कि यह पहला ऐसा होटल स्थापित हुआ जहां शेफ और बटलर के रूप में कुछ पुर्तगाली युवकों को न सिर्फ भर्ती किया गया बल्कि शुरुआती बैच के युवकों को ट्रेनिंग के लिए इंगलैंड भेजा गया। मिस्टर सिच्ेरा इन्ही युवाओं में से एक थे।
1914 से पहले तक ताज होटल भारत के निजि क्षेत्र में युवाओं को रोजग़ार देने वाले सबसे बड़े संस्थानों में एक था। पांच साल चले प्रथम विश्वयुद्ध और उसके तत्काल बाद आयी स्पैनिश फ्लू की महामारी के कारण पूरे विश्व में आर्थिक मंदी आ गई थी। भारत भी इससे प्रभावित था। पांच साल से ठप्प पड़े रहे ताज होटल के सैकड़ों कर्मचारियों के साथ साथ उनके परिवारों के हजारों सदस्य भीषण आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे।
ताज महल होटल सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह और उनके घनिष्ठ मित्र बैरिस्टर रणजीत पंडित (जिनका विवाह पं. जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी जी के साथ हुआ था) के लिए बम्बई में स्थायी पता जैसा था। होटल व्यवसाय और उसमें कार्यरत कर्मचारियों के बीच अपने भविष्य को लेकर व्याप्त चिंताओं से राजा जवाहिर सिंह भलीभंति परिचित थे। मिस्टर सिच्ेरा के सामने जब उन्होने अपने साथ सारंगढ़ चलने का प्रस्ताव रखा तो सिच्ेरा साहब ने उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करने में समय नहीं लगाया।
मिस्टर सिच्ेरा के छोटे भाई उन दिनों ताज में शेफ दि पार्टे (सहायक शेफ) के पद पर कार्य कर रहे थे। वे अपने साथ भाई को भी ले आये।
मिस्टर सिच्ेरा के कंधों पर गिरिविलास पैलेस में न केवल कॉन्टिनेंटल भोजन का आधुनिक किचन स्थापित करने की जिम्मेदारी थी बल्कि सहायकों के रूप में उपलब्ध कराए गये स्थानीय रंगरूटों को प्रशिक्षित कर पाककला का एक विशिष्ट ‘घराना’ खड़ा करने की जिम्मेदारी भी उनकी ही थी। उनके स्थानीय सहायकों को कॉन्टिनेंटल भोजन सीखने से अधिक कष्टदायी लगा सिच्ेरा शब्द का उच्चारण करना। कुछ ही समय में उनका नाम ‘सकीरा साहब’ के रूप में प्रचलित हुआ और अंत तक वे इसी नाम से जाने गये।
सकीरा साहब के लिए एक अलग और नई रसोई की व्यवस्था की गई। यह दरअसल सिर्फ रसोईघर नहीं उनका छोटा सा साम्राज्य था। सकीरा साहब की अपनी बेकरी थी जिसमें वे प्रतिदिन ब्रेड, बिस्किट, केक, पेस्ट्री के साथ साथ मरैंग जैसे अनेक इटैलियन तथा फ्रेंच डेजर्ट बनाते थे। उनके अपने दो रेफ्रिजरेटर थे जो फ्रिजिडेयर कहलाते थे। अमेरिका की गार्जियन फ्रिजिडेयर कम्पनी ने सन् 1916 में फ्रिजिडेयर ब्रांड के तहत पहली बार रेफ्रिजरेटर बाजार में प्रस्तुत किया था। उन दिनों, और बाद के अनेक दशकों तक रेफ्रिजरेटर के लिए, चाहे वह किसी भी ब्रांड का हो, फ्रिजिडेयर शब्द ही इस्तेमाल किया जाता रहा था। आज का प्रचलित शब्द ‘फ्रिज’ उसी फ्रिजिडेयर का संक्षिप्त रूप है। 350 लिटर के ये विशाल फ्रिज केरोसिन से चलते थे। इसके अलावा एक बर्फखाना भी था जो डीप-फ्रीज के लिये काम आता था। उनका अपना मुर्गीखाना और मछलियों को ताजा रखने के लिए पानी की एक विशाल टंकी थी। रोज मिर्च, नारियल, धनिया, खस खस जैसे ताजे गीले मसाले आदि पीसने के लिए एक हेल्पर था। उन दिनों मेयोनेज या विभिन्न प्रकार के अन्य सॉस जैसे टार्टर सॉस, मिन्ट सॉस जैसी अनेक खाद्य सामग्रियों के बाजार में मिलने का चलन प्रारम्भ नहीं हुआ था। सकीरा साहब ने गिरिविलास के स्टाफ को ये सारी चीजें बनाना सिखाया।
अपने ज्ञान और अनुभव को बांटने में और बचे समय में छत्तीसगढ के व्यंजनों और पकवानों को समझने-सीखने में उन्होंने अपने आप को खपा दिया। सकीरा साहब के ‘साम्राज्य’ से कुछ दूरी पर महल का जनार-राऊर (जनार-ज्योनार का स्थानीय रूप, रसोई; राऊर-स्थान या घर) था जिसमें राजमाता जी और रानी साहिबा जैसी महिलाओं की देखरेख में और निर्देश पर छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनते थे। सकीरा साहब को जब अवसर मिलता वे जनार-राऊर के व्यंजनों और शैलियों से सीखते और अपने खजाने को समृद्ध करते। उसी का परिणाम था 1960 में भोपाल के राजभवन में उनकी पाक-कला की हुई वाहवाही जिसका जि़क्र शुरुआत में है। उस दिन उनका बनाया व्यंजन था ‘कोचाई पपची’। छत्तीसगढ की कोचाई अन्य इलाकों में अरबी या घुइयां कहलाती है। पपची उत्तर भारत के ‘खाजा’ जैसा होता है।
सारंगढ़ से कुछ दूरी पर रांपागुला नामक गांव में उन्हे खेत दिए गए थे जिसमें उनके बेटे पावलो की देखरेख में खेती होती थी।
सकीरा साहब अपना परिवार गोआ में छोडक़र आए थे किन्तु उनकी पत्नी और बेटेे पावलो का आना जाना लगा रहता था। सन् 1950 में राजा जवाहिर सिंह के बेटे और तब तक राजा बन चुके राजा नरेशचन्द्र सिंह जी मध्यप्रदेश के मंत्री के रूप में नागपुर में रहने लगे थे। बच्चों को हॉस्टल भेज दिया गया। अपने पिता की उम्र के सकीरा साहब को राजा साहब अपने साथ नागपुर ले गये। तब तक उनके छोटे भाई वापस गोवा जा चुके थे और स्वयं सकीरा साहब राजा साहब के विस्तृत परिवार का हिस्सा बन चुके थे। सारंगढ़ में उनकी छत्रछाया में प्रशिक्षित खानसामाओं की फौज तैयार हो चुकी थी। 1956 में नया मध्यप्रदेश बना और राजधानी भोपाल में बन गयी। राजा नरेशचन्द्र सिंह जी और उनके परिवार के साथ सकीरा साहब भी भोपाल आ गये थे। उनके जीवन का यह काल सेवानिवृत्ति से पहले के लम्बे अवकाश की तरह था। नियमित रूप से वे चर्च जाते। घर में सयाने की तरह समय गुजारते। बेटे को रेल्वे में नौकरी मिल चुकी थी। 1967 में राजा नरेशचन्द्र सिंह की बड़ी बेटी रजनीगंधा जी का विवाह हुआ। विवाह के बाद रिसेप्शन भोपाल में राजा साहब के निवास 5, श्यामला हिल्स में हुआ जो अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास है। इस रिसेप्शन में खान-पान की व्यवस्था संभालना सकीरा साहब की अंतिम औपचारिक जिम्मेदारी थी। इसके बाद उन्होंने सेवानिवृत्ति ली और गोआ वापस चले गये। उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा सकीरा साहब के रूप में छत्तीसगढ़ में बीता था। जब वे वापस मिस्टर सिक्वेरा के जीवन में लौटे तो सहज नहीं रहे। कुछ ही समय में उनकी मृत्यु हो गई। 1970 के आस पास उनके बेटे ने सारंगढ़ आकर रापांगुला की जमीने बेच दीं पर गोआ के साथ सारंगढ़ के जुड़े तार नही टूटे। उनके समय की यादें अभी भी गिरिविलास के रसोईयों के हाथों और दस्तावेजों में सुरक्षित हैं।
गिरिविलास पैलेस
सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)


