विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय का सरकार से यह आग्रह बिल्कुल उचित है कि नफरती बयानों पर रोक लगाने के लिए वह तुरंत कानून बनाए। यह कानून कैसा हो और उसे कैसे लागू किया जाए, इन मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि संसद, सारे जज और न्यायविद् और देश के सारे बुद्धिजीवी मिलकर विचार करें। यह मामला इतना पेचीदा है कि इस पर आनन-फानन कोई कानून नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि देश के बड़े से बड़े नेता, नामी-गिरामी बुद्धिजीवी, कई धर्मध्वजी और टीवी पर जुबान चलानेवाले दंगलबाज- सभी अपने बेलगाम बोलों के लिए जाने जाते हैं।
कभी वे दो टूक शब्दों में दूसरे धर्मों, जातियों, पार्टियों और लोगों पर हमला बोल देते हैं और कभी इतनी घुमा-फिराकर अपनी बात कहते हैं कि उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। वैसे अखबार तो इस मामले में जरा सावधानी बरतते हैं। यदि वे स्वयं सीमा लांघें तो उन्हें पकड़ना आसान होता है लेकिन टीवी चैनल और सामाजिक मीडिया में सीमाओं के उल्लंघन की कोई सीमा नहीं है।
अकेले उत्तर प्रदेश में सिर्फ पिछले एक साल में ऐसे मामलों की 400 प्रतिशत बढ़ोतरी हो गई है। वहां और उत्तराखंड में 581 ऐसे मामले सामने आए हैं। 2008 से लेकर अब तक हमारे टीवी चैनलों पर ऐसे आपत्तिजनक बयानों पर 4000 शिकायतें दर्ज हुई हैं। अखबार में छपे हुए नफरती बयानों से कहीं ज्यादा असर टीवी चैनलों पर बोले गए बयानों का होता है। करोड़ों लोग उन्हें सुनते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया तुरंत होती है। उदयपुर में एक दर्जी की हत्या कैसे हुई और कुछ प्रदेशों में दंगे कैसे भड़के?
ये सब टीवी चैनलों की मेहरबानी के कारण हुआ। हमारे ज्यादातर टीवी चैनल अपनी दर्शक-संख्या बढ़ाने के लिए कोई भी दांव-पेंच अख्तियार कर लेते हैं। उन्हें न राष्ट्रहित की चिंता होती है और न ही वे सामाजिक सद्भाव की परवाह करते हैं। ऐसे मर्यादाहीन चैनलों को दंडित करने के लिए कड़े कानून बनाए जाने चाहिए। यदि ऐसे कानून बन गए तो ये चैनल हर वाद-विवाद को रेकार्ड करके पहले संयमित करेंगे और फिर उसे अपने दर्शकों को दिखाएंगे। इससे भी ज्यादा करूण कहानी तथाकथित सामाजिक मीडिया (सोश्यल मीडिया) की है।
इसका नाम ‘सामाजिक’ है लेकिन यह सबसे ज्यादा ‘असामाजिक’ हो जाता है। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अद्भुत मंच है लेकिन इसका जितना दुरूपयोग होता है, किसी और माध्यम का नहीं होता। इसको मर्यादित करने के लिए भी कई उपाय किए जा सकते हैं। सरकार ने अश्लीलता के विरुद्ध तो कुछ सराहनीय कदम उठाए हैं लेकिन नफरती सामग्री के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जरूरत है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रूचिर गर्ग
भूपेन हजारिका याद हैं? जिन्होंने हुंकार लगाई थी-
‘ओ गंगा तुम
ओ गंगा बहती हो क्यूं?’
पूरा सुनिए, फिर से सुनिए, फिर फिर सुनिए।
गंगा और समाज के रिश्ते को समझिए, गंगा और इस देश के बीच जिंदगी की कडिय़ों को जोडि़ए, उन चुनौतियों की शिनाख्त कीजिए जिन्हें महसूस कर भूपेन दा गंगा का आह्वान कर पूछते हैं-
‘नैतिकता नष्ट हुई,मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यूं’
गंगा जी और सभ्यता के विकास की कहानियां पढि़ए, गंगाजी के तट पर लिखी किसी कवि की कविता को ढूंढिए, गंगा जी और समाज-संस्कृति को सहेजने वाले यात्रा वृत्तांत पढि़ए, गंगा जी के तट पर घंटों पानी में पैर डालकर सुकून पाने वाले लोगों की स्मृतियों को टटोलिए, गंगा जी पर आश्रित जन के पसीने और गंगा जल के पवित्र रिश्ते की महक महसूस कीजिए।
गंगा जी को पंडों की नजर से मत देखिए...वो तो चुप हैं और चुप रहेंगे! वो तो आर्यों की प्रभुता के ही वाहक हैं। गंगा जी और मानव सभ्यता को भूपेन दा के इस आह्वान से जानिए-
‘इतिहास की पुकार, करे हुंकार
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को
सबलसंग्रामी, समग्रोगामी
बनाती नहीं हो क्यूं?’
क्रूज पर शैम्पेन उड़ाने वाले प्रभु समाज के लिए नदियां तो ऐसी ही अश्लील विजयों की प्रतीक हैं, नदियों को रौंदने वाले इस समाज की ही संस्कृति की वाहक सत्ता के लिए भी गंगा जी केवल एक बहता पानी है, लेकिन भूपेन दा के इस गीत के जरिए पूछिए गंगा जी से-
‘व्यक्ति रहे व्यक्ति केन्द्रित
सकल समाज व्यक्तित्व रहित
निष्प्राण समाज को छोड़ती ना क्यूं?’
ये शुद्धतावाद नहीं है लेकिन जब गंगा जी की सभ्यता की छाती रौंदी जा रही होगी, उस क्रूज पर जाम टकरा रहे होंगे तब भूपेन दा को याद करते हुए गंगा जी से पूछिए-
‘गंगे जननी, नव भारत में
भीष्मरूपी सुतसमरजयी जनती नहीं हो क्यूं?’
गंगा मां के बेटे वो प्रजा है जो दोनों पार बसती है।
वो ‘अनपढ़ जन अक्षरहिन
अनगीन जन खाद्यविहीन’ गंगा मां के बेटे हैं जो दोनों पार बसते हैं ।
जब लाखों रुपए खर्च कर इस क्रूज पर बैठ शैम्पेन उड़ाते, वहीं पाखाना करते ये लोग इन तटों से गुजरेंगे तब कहीं भूपेन दा पूछ रहे होंगे-
‘विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार नि:शब्द सदा
ओ गंगा तुम
ओ गंगा बहती हो क्यूं?’
भूपेन दा के सवाल इस देश के करोड़ों जन के सवाल हैं, हमारे भी हैं।
हमने गंगा जी को जीया है, गंगा जी की पुण्य संस्कृति में अपने कदम डुबो कर हम भी गंगा नहाए हैं। हम भी गंगा जी की बारीक चमकीली बालू से लिपटे लोग हैं। हमने गंगा जी के तट पर मिलने वाले पत्थरों पर इस पवित्र नदी के भावों की थोड़ी सी चित्रकारी की है...और उन्हें पेपरवेट की तरह इस्तेमाल नहीं किया बल्कि हरिद्वार निवासी हमारी अरुणा मौसी ने उन्हें सहेज रक्खा था ।
हमारे लिए भी गंगा जी मान और अपमान का सवाल हैं ।
जिनके लिए नहीं हैं वो फिर लाइन में लगेंगे और गंगा मां के नकली पुत्रों को वोट देकर आयेंगे!...और शायद हम फिर पूछेंगे- ‘ओ गंगा तुम बहती हो क्यूं?’
(लेखक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के आजकल जैसे हालात हैं, मेरी याददाश्त में भारत या हमारे पड़ोसी देशों में ऐसे हाल न मैंने कभी देखे और न ही सुने। हमारे अखबार पता नहीं क्यों, उनके बारे में न तो खबरें विस्तार से छाप रहे हैं और न ही उनमें उनके फोटो देखे जा रहे हैं लेकिन हमारे टीवी चैनलों ने कमाल कर रखा है। वे जैसे-तैसे पाकिस्तानी चैनलों के दृश्य अपने चैनलों पर आजकल दिखा रहे हैं। उन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, क्योंकि पाकिस्तानी लोग हमारी भाषा बोलते हैं और हमारे जैसे ही कपड़े पहनते हैं।
वे जो कुछ बोलते हैं, वह न तो अंग्रेजी है, न रूसी है, न यूक्रेनी। वह तो हिंदुस्तानी ही है। उनकी हर बात समझ में आती है। उनकी बातें, उनकी तकलीफें, उनकी चीख-चिल्लाहटें, उनकी भगदड़ और उनकी मारपीट दिल दहला देनेवाली होती है। गेहूं का आटा वहां 250-300 रु. किलो बिक रहा है। वह भी आसानी से नहीं मिल रहा है। बूढ़े, मर्द, औरतें और बच्चे पूरी-पूरी रात लाइनों में लगे रहते हैं और ये लाइनें कई फर्लांग लंबी होती हैं। वहां ठंड शून्य से भी काफी नीचे होती है।
आटे की कमी इतनी है कि जिसे उसकी थैली मिल जाती है, उससे भी छीनने के लिए कई लोग बेताब होते हैं। मार-पीट में कई लोग अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं। पाकिस्तान के पंजाब को गेहूं का भंडार कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि बलूचिस्तान और पख्तूनख्वाह के लोग आटे के लिए क्यों तरस रहे हैं? यहां सवाल सिर्फ आटे और बलूच या पख्तून लोगों का ही नहीं है, पूरे पाकिस्तान का है। पूरे पाकिस्तान की जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है, क्योंकि खाने-पीने की हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं।
गरीब लोगों के तो क्या, मध्यम वर्ग के भी पसीने छूट रहे हैं। बेचारे शाहबाज़ शरीफ प्रधानमंत्री क्या बने हैं, उनकी शामत आ गई है। वे सारी दुनिया में झोली फैलाए घूम रहे हैं। विदेशी मुद्रा का भंडार सिर्फ कुछ हफ्तों का ही बचा है। यदि विदेशी मदद नहीं मिली तो पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद हो जाएगा। अमेरिका, यूरोपीय राष्ट्र और सउदी अरब ने मदद जरुर की है लेकिन पाकिस्तान को कर्जे से लाद दिया है।
ऐसे में कई पाकिस्तानी मित्रों ने मुझसे पूछा कि भारत चुप क्यों बैठा है? भारत यदि अफगानिस्तान और यूक्रेन को हजारों टन अनाज और दवाइयां भेज सकता है तो पाकिस्तान तो उसका एकदम पड़ौसी है। मैंने उनसे जवाब में पूछ लिया कि क्या पाकिस्तान ने कभी पड़ौसी का धर्म निभाया है? फिर भी, मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी इस वक्त पाकिस्तान की जनता (उसकी फौज और शासकों के लिए नहीं) की मदद के लिए हाथ बढ़ा दें तो यह उनकी एतिहासिक और अपूर्व पहल मानी जाएगी। पाकिस्तान के कई लोगों को टीवी पर मैंने कहते सुना है कि ‘इस वक्त पाकिस्तान को एक मोदी चाहिए।’ (नया इंडिया की अनुमति से)
-पुष्य मित्र
शरद यादव के बारे में कल से बहुत सारे किस्से कहे गये हैं, मगर इस किस्से का जिक्र बहुत कम आया कि कैसे एक बार उन्हें राजीव गांधी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतार दिया गया था।
यह 1981 की बात है। संजय गांधी के निधन के बाद अमेठी की सीट खाली हुई थी। जनता पार्टी की दोनों सरकारों के गिर जाने के बाद इंदिरा गांधी की अच्छे खासे बहुमत से सत्ता में वापसी हो चुकी थी। मनमौजी हरकतें करने वाले अपने एक बेटे के चले जाने के बाद वे अब अपने दूसरे और बड़े बेटे पर दाव खेलना चाहती थीं, इसलिए राजीव गांधी को अमेठी उपचुनाव में उतार दिया गया था।
तब तक पूर्व हो चुके प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और जनसंघ के नेता नानाजी देशमुख चाहते थे कि शरद यादव अमेठी से राजीव गांधी को टक्कर दें। राजीव गांधी का वह पहला चुनाव था, मगर जबलपुर में 1974 में ही जनता का उम्मीदवार बनकर शानदार जीत हासिल कर चुके शरद यादव उन दिनों देश में किसी चमकदार सितारे की तरह मशहूर हो गये थे। समाजवादी पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं के वे चहेते थे।
चरण सिंह और नानाजी देशमुख को लगता था कि शरद आसानी से राजीव गांधी को पटखनी दे देंगे। मगर शरद यादव को समझ आ रहा था कि यह मुकाबला आसान नहीं होगा। उनके राजनीतिक कैरियर के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वे इनकार कर रहेे थे। तब चरण सिंह उन्हें एक ज्योतिषी के पास ले गये, उस ज्योतिषी ने कहा कि शरद यादव यह चुनाव जीत जायेंगे और इसके बाद इंदिरा गांधी की सरकार गिर जायेगी। मगर शरद यादव फिर भी नहीं माने।
एक बार चरण सिंह तो ढीले पडऩे लगे, मगर नानाजी देशमुख ने उन पर दवाब बनाना शुरू कर दिया। फिर चरण सिंह ने उन्हें यह भी कह दिया कि तुम डरपोक हो। मजबूरन शरद यादव को वह चुनाव लडऩा पड़ा। चुनाव में शरद यादव बुरी तरह हारे और उन्हें 21 हजार के करीब वोट मिले। फिर उन्होंने अगला चुनाव बदायूं से लड़ा, जहां उन्हें जीत मिली। फिर मधेपुरा आये तो यहीं के रह गये।
एक जमाने में फायरब्रांड युवा नेता के रूप में मशहूर शरद यादव फिर किंगमेगर बने। पहले लालू को सीएम बनाया, फिर नीतीश के साथ जुड़े। कहते हैं कि दोनों ने उन्हें धोखा दिया, मगर सच तो यह है कि ये खुद दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा करते थे। वे हमेशा कोशिश करते थे कि जिन्हें उन्होंने सीएम बनाया है वे उनकी मर्जी से चलें। हर बात उनके हिसाब से करें। कहते हैं, एक बार तो उन्होंने लालू यादव को हटाकर रामसुंदर दास को सीएम बनाने की भी प्लानिंग कर ली थी।
शरद दिल्ली के पत्रकारों के बहुत प्रिय रहे हैं, समाजवादी विचारों के आईडियोलॉग रहे हैं। मगर इसके बावजूद उन्हें भाजपा और संघ से कभी परहेज नहीं रहा। मगर उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चूक रही, जब उन्होंने महिला आरक्षण के मसले पर सदन में यह टिप्पणी कर दी कि यह सिर्फ परकटी औरतों की लड़ाई है। महिला आरक्षण में आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग तर्कसंगत हो सकती है, मगर उन्होंने औरतों को लेकर जो टिप्पणी की, उस पर उन्हें संभवत: बाद में खुद भी ग्लानि होती होगी।
पिछले दिनों पटना में महिला आरक्षण की प्रबल पैरोकार गीता मुखर्जी की याद में आयोजन हुआ था। गीता मुखर्जी वही महिला थीं जिन्होंने विधायिका में महिला आरक्षण के लिए केंद्रीय मंत्री तक का पद ठुकरा दिया था। पिछली सदी के आखिरी दशक में जब इस आरक्षण को लेकर सबसे अधिक सक्रियता थी, तब वे पार्टी के दायरे से बाहर निकलकर हर सांसद से इस आरक्षण को समर्थन देने कहती थीं। मगर आरक्षण लागू नहीं हुआ, आज तो वह ठंडे बस्ते में चला गया है। तब शरद यादव जैसे नेता चाहते तो सहमति के साथ महिला आरक्षण लागू हो सकता था। मगर उन्होंने महिलाओं के आरक्षण के सवाल को परकटी औरतों का मुद्दा कहकर उसकी खिल्ली उड़ायी।
खैर, हर नेता से चूक होती है। हमारे दौर का एक अनूठा नेता कल अपना भरा-पूरा जीवन जीकर चला गया। उसके जीवन में कई रंग थे। उन रंगों से गुजरते हुए आज की पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयान पर हमारे विपक्षी नेता बुरी तरह से बिफर पड़े हैं। कांग्रेसी नेता उन्हें भाजपा सरकार का भौंपू बता रहे हैं और उन्हें उपराष्ट्रपति पद की प्राप्ति ममता-विरोध के फलस्वरूप बता रहे हैं और कुछ विपक्षी नेता उन्हें आपातकाल की जननी इंदिरा गांधी का वारिस बता रहे हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत को 1975 में तहस-नहस कर दिया था, वैसा ही आरोप धनखड़ पर लगाया जा रहा है।
इस तरह के आरोप लगानेवाले यह बताएं कि इंदिरा गांधी की तरह धनखड़ को क्या किसी अदालत ने कटघरे में खड़ा कर दिया है? वे अपना कोई मुकदमा तो सर्वोच्च न्यायालय में नहीं लड़ रहे हैं। वे स्वयं प्रतिभाशाली वकील रहे हैं। वे प्रखर वक्ता भी हैं। उन्होंने यदि संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन में संसद की सर्वोच्चता पर अपने दो-टूक विचार व्यक्त कर दिए तो यह उनका हक है। यदि वे गलत हैं तो आप अपनी बात सिद्ध करने के लिए जोरदार तर्क क्यों नहीं देते? आप तर्क देने की बजाय शब्दों की तलवार क्यों चला रहे हैं?
संविधान की पवित्रता और मान्यता पर धनखड़ ने प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है। उन्होंने जो मूल प्रश्न उठाया है, वह यह है कि सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है या संसद सर्वोच्च है? देश के सारे न्यायालयों में तो सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है। इसमें किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन वह संसद से भी ऊँचा कैसे हो गया? संसद चाहे तो एक ही झटके में सारे जजों को महाभियोग चलाकर पदमुक्त कर सकती है। संविधान ने ही उसे यह अधिकार दिया हुआ है। जहां तक संविधान के ‘मूल ढांचे’ का प्रश्न है, किस धारा में उसे अमिट, अटल, और अपरिवर्तनीय लिखा है?
श्री वसंत साठे और मैंने तो लगभग 30 साल पहले देश में अध्यक्षीय शासन लाने का अभियान भी चलाया था। मैं तो आजकल चुनाव पद्धति का भी विकल्प ढूंढ रहा हूं। आप मूल ढांचे पर आंसू बहा रहे हैं, संसद चाहे तो पूरे संविधान को ही रद्द करके नया संविधान बना सकती है। क्या हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय ने बनाकर संसद को थमाया है? सर्वोच्च न्यायालय तो अपने न्यायालयों के और अपने ही कई फैसले रद्द करता रहता है। उसके अपने फैसलों में सारे जजों की सर्वानुमति नहीं होती है।
‘मूल ढांचे’ के फैसले में भी सात जज एक तरफ और छह जज दूसरी तरफ थे। भारतीय संविधान का मूल ढांचा क्या है, इसे सिर्फ अदालत को तय करने का अधिकार किसने दिया है? यदि संसद चाहे तो वह एकदम नया संविधान ला सकती है, जैसा कि हमारे कई पड़ौसी राष्ट्रों में हुआ है। हिटलर के मरने के बाद जर्मनी ने डर के मारे जो प्रावधान अपने संविधान के लिए किया था, उसकी अंधी नकल हमारे नेता और न्यायाधीश क्यों करें? हमारे देश में हिटलरी चल ही नहीं सकती और हमारा संविधान इतना लचीला है कि पिछले सात दशकों में उसमें लगभग सवा सौ संशोधन हो चुके हैं। इसीलिए इतने उत्थान-पतन के बावजूद वह अभी तक टिका हुआ है लेकिन संविधान संविधान है, कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-राजेन्द्र चतुर्वेदी
जब 1999 में विष्णु प्रयाग में अलकनंदा नदी पर बांध बनने का काम शुरू हुआ था, तब ज्योतिर्मठ और द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने जनता से अनुरोध किया था कि इस बांध के खिलाफ प्रबल आंदोलन छेड़ा जाए। अगर ये बांध बन गया तो जोशीमठ को निगल जाएगा।
तब शंकराचार्य के अनुयायियों ने एक आंदोलन की शुरुआत की भी थी, उस आंदोलन को कमजोर करने के लिए एक सांस्कृतिक संगठन आगे आया, उसके स्वयंसेवक घर घर गए। जनता को समझाया कि विकास के लिए बांध जरूरी है।
जनता को यह भी समझाया गया कि शंकराचार्य इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वे वामपंथी शंकराचार्य हैं, कांग्रेसी शंकराचार्य हैं, इसलिए नहीं चाहते कि एक राष्ट्रवादी सरकार विकास का कोई काम करे।
और जनता की समझ में बात आ गई। आंदोलन खत्म हो गया। विकास इतनी तेजी से शुरू हुआ कि नदियों की धाराओं को मोडऩे के लिए सुरंगें तक बना दी गईं। जिस सुरंग ने काम नहीं किया, उसे वैसा का वैसा छोड़ दिया गया, अधबना।
अब विकास के इस दौर में मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह देश को इस बात की भनक तक न लगने दे कि जोशीमठ कस्बे के ठीक नीचे से एक सुरंग निकाली गई है और जब अलकनंदा का पानी उससे नहीं निकाला जा सका, तो उस सुरंग को वैसा ही छोड़ दिया गया, जो भू-धसान का एक बड़ा कारण बन गई है।
चेतन भगत जैसे विद्वान लेखकों, विचारकों, कॉलमिस्ट का फर्ज है कि वे विष्णु प्रयाग में बंधे विनाशकारी बांध की तरफ देश का ध्यान न जाने दें और जोशीमठ के विनाश का ठीकरा केवल और केवल पर्यटन पर फोड़ दें।
इससे आम के आम और गुठलियों के दाम।
एक तरफ तो जनता का ध्यान बांध की तरफ नहीं जाएगा, और वह बांध को हटाने की मांग नहीं करेगी, दूसरी तरफ यह लिखकर सरकार की चापलूसी भी की जा सकेगी कि देश में प्रतिव्यक्ति आय बढ़ गई है, जिससे पहाड़ों पर ज्यादा पर्यटक पहुंचने लगे हैं।
लेखक को और क्या चाहिए। ऊपर से कृपा आती रहे और जीवन धन्य।
दो खुल्ले रुपैया वाले आईटीसैलियों और फोकट में भड़ैती करने वाले फ्रिंज एलिमेंट्स का फर्ज यह है कि जोशीमठ के संकट के लिए जहां भी कोई व्यक्ति अटल श्रद्धेय की भूमिका पर सवाल उठाए, वे फौरन वहां कूद पड़ें और पूछें कि 10 साल तक मनमोहन सिंह क्या करते रहे। जरूरत पड़े तो श्रद्धेय पर सवाल उठाने वालों को 10-20 गालियां तो छूटते ही दे मारें।
और जोशीमठ की जनता की नियति है कि वह अपनी जड़ों से कटे, विस्थापित हो। आंदोलन करने से अब कुछ नहीं होगा। आंदोलन तो उस दिन करना चाहिए था, जिस दिन शंकराचार्य (अब ब्रह्मलीन) स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने आवाज दी थी।
अब कुछ नहीं हो सकता। ‘जब जागो, तभी सबेरा’ वाला मामला नहीं है यह। देर से जागे, इसलिए चीजें हाथ से निकल गई हैं।
अब सरकार विष्णु प्रयाग का बांध हटाने और पहाड़ों की छाती में किए गए छेद मूँदने के लिए भी अगर तैयार हो जाए तो भी जोशीमठ को सामान्य होने में 20 साल से ज्यादा का समय लगेगा।
-अभय शुक्ला
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ विकलांग हैं। यह संख्या देश की आबादी की 2.21 फीसदी है। यह एक बड़ी संख्या है लेकिन समाज और सरकार-दोनों ने ही उनकी खास जरूरतों का ध्यान रखने और मुख्यधारा के जीवन में उन्हें सहजता के साथ शामिल करने की दिशा में कम ही काम किया है।
जिन क्षेत्रों से उन्हें पूरी तरह बाहर रखा गया है, उनमें से एक है स्वास्थ्य बीमा। यह जानना हैरान करने वाला हो सकता है कि बीमा कंपनियां किसी भी विकलांग व्यक्ति को स्वास्थ्य बीमा देने से साफ मना कर देती
हैं, चाहे वह कितना भी स्वस्थ क्यों न हो। और तो और, यह जानने के बाद कि बीमा कवर मांगने वाला व्यक्ति विकलांग है, बीमा कंपनियां इस पर विचार करने को भी तैयार नहीं होतीं। जबकि ऐसे कानून और अंतरराष्ट्रीय समझौते हैं जो साफ कहते हैं कि वे इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते। वे किसी सक्षम और अक्षम व्यक्ति के बीच भेदभाव नहीं कर सकते।
बीमा कंपनियां इस तरह की लापरवाही करके बचती रहीं क्योंकि विकलांगों के हितों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य आयुक्त और आईआरडीएआई (भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण)
अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे। उपेक्षा के साये में जी रहे इन 2.68 करोड़ लोगों के लिए हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक रूप से अहम होने जा रहा है। लेकिन पहले इस मामले की थोड़ी पृष्ठभूमि।
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले में याचिकाकर्ता सौरभ हैं जो एक निवेश विश्लेषक और सलाहकार हैं। 2011 में 26 साल की छोटी उम्र में एक दुर्घटना में उन्हें रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी और वह हमेशा के लिए व्हील चेयर के मोहताज हो गए। हालांकि इस अक्षमता के अलावा वह किसी और बीमारी से कभी पीडि़त नहीं रहे, कभी किसी बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती नहीं हुए और वह एक सफल वित्तीय विश्लेषक के रूप में घर से काम करते हैं।
सौरभ को ठीक होने में तीन साल लग गए और उसके बाद वह और उनके पिता ने कम-से-कम आधा दर्जन बीमा कंपनियों (सरकारी और निजी दोनों) के चक्कर काटे लेकिन कोई भी उन्हें कवर देने को तैयार नहीं हुआ। सौरभ को बीमा कवर नहीं देना है, यह फैसला करने के पहले उन्होंने टेस्ट कराके यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि उन्हें किसी तरह की कोई बीमारी है भी या नहीं। सौरभ ने विकलांगों के हित के लिए नियुक्त मुख्य आयुक्त से शिकायत की और आयुक्त ने उनकी शिकायत को आईआरडीएआई को भेजकर अपने दायित्व को पूरा मान लिया।
इसके बाद आईआरडीएआई ने सौरभ की शिकायत को बीमा कंपनियों को भेज दिया और इस पर बीमा कंपनियों ने जवाब दिया कि उन्होंने सरकार की नीतियों के अनुरूप ही इनकार किया था। आईआरडीए ने कंपनियों के इस ‘स्पष्टीकरण’ को सौरभ को इस टिप्पणी के साथ भेज दिया कि बीमाकर्ताओं को पॉलिसी जारी करते समय वाणिज्यिक पहलू पर विचार करना होता है। इस तरह उसने कंपनियों के अवैध और अनैतिक कार्यों पर मुहर लगा दी।
इसके बाद सौरभ ने कंपनियों के इनकार और सरकारी एजेंसियों के असहयोगी रवैये के खिलाफ 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस मामले की पैरवी सिद्धार्थ नाथ ने की थी जिस पर अदालत ने विकलांगों समेत कुछ अन्य वंचित श्रेणियों के लिए पॉलिसी तैयार करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति प्रतिभा सिंह ने अपने फैसले में कहा कि स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा का अधिकार जीवन के अधिकार का ही अभिन्न अंग है। विकलांग व्यक्ति पीडब्ल्यूडी (विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम) और विकलांगों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के तहत स्वास्थ्य बीमा कवरेज के हकदार हैं और स्वास्थ्य बीमा के मामले में विकलांग व्यक्तियों के साथ उनकी आय और सामाजिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। भारत ने भी इस अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किया है।
अदालत ने न केवल उन दो बीमा कंपनियों को जो मुकदमे में पक्षकार थीं, (मैक्स बूपा और ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी), बल्कि दो सरकारी नियामकों, विशेष रूप से आईआरडीए को भी कड़ी फटकार लगाई। जज ने यह तक कहा कि ‘इस तरह आईआरडीए ने समस्या की ओर से आंखें मूंद लीं और बीमा कंपनियों का बचाव किया।’
अदालत ने दोनों प्रतिवादी कंपनियों को सौरभ के आवेदन पर पुनर्विचार करने और अगली सुनवाई की तारीख तक एक प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने आईआरडीएआई को सभी बीमा प्रदाताओं की एक बैठक बुलाने और पीडब्ल्यूडी और अन्य वंचित श्रेणियों के लिए एक उपयुक्त बीमा उत्पाद तैयार करने और उन्हें जल्द से जल्द पेश करने का निर्देश दिया है। सुनवाई की अगली तारीख 17 मार्च, 2022 है और तब तक इस पर स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश भारत की 2 फीसदी आबादी के लिए ऐतिहासिक है। अदालत का यह फैसला सौरभ द्वारा मांगी गई राहत से परे है। इस मामले में नियामक की गलती पकड़ी गई है। यह फैसला स्वास्थ्य कवर का लाभ उठाने के लिए लाखों लोगों के लिए दरवाजे खोल देगा, यह सभी बीमा कंपनियों को सभी पीडब्ल्यूडी को स्वास्थ्य कवर देने के लिए मजबूर करेगा।
एजेंसियों को भी यह ध्यान में रखना होगा कि कमजोर लोगों के प्रति उनका लापरवाह और असंवेदनशील रवैया अदालतें बर्दाश्त नहीं करेंगी। इस मामले में एक विडंबना है जो मार्मिक और सकारात्मक दोनों है- हालांकि सौरभ खुद चल नहीं सकते लेकिन उन्होंने अपने जैसे लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।
वैसे, क्या मैंने जिक्र किया कि सौरभ मेरा छोटा बेटा है?
(अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं।) (navjivanindia.com/)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारतीय न्यायपालिका को दो-टूक शब्दों में चुनौती दे दी है। वे संसद और विधानसभाओं के अध्यक्षों के 83 वें सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। वे स्वयं राज्यसभा के अध्यक्ष हैं। आजकल केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच जजों की नियुक्ति को लेकर लंबा विवाद चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का चयन-मंडल बार-बार अपने चुने हुए जजों की सूची सरकार के पास भेजता है लेकिन सरकार उस पर ‘हाँ’ या ‘ना’ कुछ भी नहीं कहती है।
सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि सरकार का यह रवैया अनुचित है, क्योंकि 1993 में जो चयन-मंडल (कालेजियम पद्धति) तय हुई थी, उसके अनुसार यदि चयन-मंडल किसी नाम को दुबारा भेज दे तो सरकार के लिए उसे शपथ दिलाना अनिवार्य होता है। इस चयन-मंडल में पांचों चयनकर्त्ता सर्वोच्च न्यायालय के जज ही होते हैं। और कोई नहीं होता। इस पद्धति में कई कमियाँ देखी गईं। उसे बदलने के लिए संसद ने 2014 में 99 वां संविधान संशोधन पारित किया था लेकिन उसे सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि उसमें जजों के नियुक्ति-मंडल में कुछ गैर-जजों को रखने का भी प्रावधान था।
यह मामला तो अभी तक अटका ही हुआ है लेकिन धनखड़ ने इससे भी बड़ा सवाल उठा दिया है। उन्होंने 1973 के केशवानंद भारती मामले में दिए हुए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध बता दिया है, क्योंकि उस फैसले में संसद के मुकाबले न्यायपालिका को निरंकुश बना दिया गया था। उसे संसद से भी ज्यादा अधिकार दे दिए गए थे। वह किसी भी संसदीय कानून को उलट सकती है।
संसद को कह दिया गया था कि वह संविधान के मूल ढांचे को अपने किसी भी कानून से बदल नहीं सकती है। याने संसद नीचे और अदालत ऊपर। याने जनता नीचे और जज ऊपर। संसद बड़ी है या अदालत? धनखड़ ने पूछा है कि जब संसद अदालती फैसले नहीं कर सकती तो फिर अदालतें कानून बनाने में टांग क्यों अड़ाती हैं? संसद की संप्रभुता को चुनौती देना तो लोकतंत्र का अपमान है। अदालत को यह अधिकार किसने दे दिया है कि वह संविधान के मूल ढांचे को तय करे?
मैं पूछता हूं कि क्या हमारा संविधान अदालत में बैठकर इन जजों ने बनाया है? केशवानंद भारती मामले में भी यदि 7 जजों ने उक्त फैसले का समर्थन किया था तो 6 जजों ने उसका विरोध किया था। व्यावहारिकता तो इस बात में है कि किसी भी संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों में संतुलन और नियंत्रण बहुत जरूरी है। जहां तक संसद का सवाल है, सीधे जनता द्वारा चुने होने के कारण उसे सबसे अधिक शक्तिशाली होना चाहिए। न्यायाधीशों की नियुक्ति में यदि सरकार और संसद की कोई न कोई भूमिका रहेगी तो वह अधिक विश्वसनीय होगी। बेहतर तो यही होगा कि इस मसले पर भारत के मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री के बीच सीधी और दो-टूक मंत्रणा हो। अन्यथा, यह विवाद अगर खिंचता गया तो भारतीय लोकतंत्र का यह बड़ा सिरदर्द भी साबित हो सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागव ने ‘पांचजन्य’ साप्ताहिक को दी गई एक भेंट वार्ता में ऐसी कई बातें कही हैं, जिन पर देश के लोगों और खास तौर से संघ के स्वयंसेवकों को विशेष ध्यान जाना चाहिए। उन्होंने पहली बात यह कही है कि भारत के मुसलमानों को किसी से डरने की जरुरत नहीं है। उन्हें वैसे ही निर्भय रहना चाहिए, जैसे अन्य भारतीय रहते हैं।
आजकल देश और विदेशों के कई बुद्धिजीवी यह महसूस करते हैं कि जब से मोदी सरकार कायम हुई है, भारत के मुसलमान बहुत डर गए हैं। कुछ हद तक यह बात सही है लेकिन इसका मूल कारण यह सरकार उतना नहीं है, जितना कि कुछ सिरफिरे ‘हिंदुत्ववादी लोग’ हैं, जो कि नफरत फैलाते हैं और अपने व्यवहार से लोगों में डर पैदा करते हैं। भाजपा सरकार को इन उग्रवादी और तथाकथित ‘हिंदुत्ववादियों’ के खिलाफ सख्त कदम उठाने में कोताही क्यों करनी चाहिए?
सच्चाई तो यह है कि वे हिंदुत्व की मूल भावना को समझते ही नहीं हैं। उनमें यूरोप और अरब देशों की मजहबी अतिवादिता दिखाई पड़ती है। मजहब के नाम पर उन मुल्कों में अब भी भयंकर अत्याचार जारी हैं। यह विदेशी मजहबी अंधापन आप भारत में भी देख सकते हैं। कोई यहोवा या अल्लाह को माने, इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इसके लिए अरबों और गोरों की नकल करना क्या जरुरी है? कोई व्यक्ति किसी धर्म या विचारधारा को माने लेकिन उसके पहले वह अपने आप को सच्चा और पक्का भारतीय बनाए, क्या यह जरुरी नहीं है?
अब आप देखें कि सउदी अरब के वर्तमान शासक शाहजादे सलमान ने तथाकथित अरबी और इस्लामी परंपराओं में कितने बड़े बदलाव कर दिए हैं। मोहन भागवत हमारे मुसलमानों से भी यह बराबर कहते रहे हैं कि उनका और हिंदुओं का डीएनए एक ही है। क्या किसी हिंदू या मुसलमान नेता ने आज तक ऐसी बात कही है? उनकी इस बात से कई पोंगापंथी मुसलमान और हिंदू चिढ़ भी सकते हैं लेकिन भारत ही नहीं, संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों को जोड़ने में यह कथन निर्णायक भूमिका निभाएगा।
मोहन भागवत मस्जिदों में गए और इमामों से उन्होंने संवाद किया, क्या यह कम बड़ी बात है? यह ठीक है कि भारत के मुसलमानों ने कई मजबूरियों में इस्लाम को कुबूल कर लिया लेकिन वे विदेशी आंक्रांताओं के वारिस नहीं हैं। उन आक्रांताओं की संतानें भी अब पूर्णरूपेण भारतीय हो गई हैं। यह ठीक है कि लगभग हजार साल तक विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को दबाने की कोशिश की है और उसके विरुद्ध भारतीय लोग लगातार लड़ते रहे हैं लेकिन वह वैमनस्य और वह अहंकार किसी भी रूप जिंदा नहीं रहना चाहिए।
मोहनजी ने इस बात पर भी जोर दिया है कि भारतीयों पर इस समय कोई विदेशी आक्रमण तो नहीं हो रहा है लेकिन भारत विदेशियों का नकलची बन रहा है। वह उनकी भोगवादी प्रवृत्तियों को अपना रहा है। मोहन भागवत के इस कथन पर हमारे देश के तथाकथित नेता गण, खासकर भाजपा के लोग ध्यान दें, यह जरुरी है। सच्ची भारतीयता तो ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ याने त्याग के साथ उपभोग में ही निवास करती है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-रजनीश कुमार
नेपाल, 11 जनवरी । नेपाल की संसद में मंगलवार को जो कुछ हुआ, उसे वहाँ के संसदीय लोकतंत्र में लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
25 दिसबंर को पुष्प कमल दाहाल प्रचंड तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे और मंगलवार को उन्हें बहुमत साबित करना था.
275 सदस्यों वाली नेपाल की प्रतिनिधि सभा में प्रचंड को बहुमत साबित करने के लिए 138 सदस्यों के समर्थन की ज़रूरत थी, लेकिन उन्हें 268 सांसदों ने समर्थन में वोट किया.
प्रतिनिधि सभा में कुल 270 सांसद मौजूद थे और इनमें से 268 ने प्रचंड के समर्थन में वोट किया. केवल दो सांसदों ने प्रचंड के ख़िलाफ़ वोट किया.
यह हुआ कैसे?
प्रचंड ने 2022 के नवंबर महीने में हुआ आम चुनाव नेपाली कांग्रेस के साथ लड़ा था. नेपाली कांग्रेस चुनाव में 89 सीटें जीत सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी सेंटर) के महज़ 32 सांसद हैं. प्रचंड को केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का समर्थन मिला है. ओली की पार्टी के पास 78 सीटें हैं.
ऐसा माना जा रहा था कि नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ही प्रधानमंत्री रहेंगे, लेकिन प्रचंड ने ऐन मौक़े पर पाला बदल लिया.
प्रचंड चाहते थे कि नेपाली कांग्रेस उन्हें प्रधानमंत्री बनाए, लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई थी.
ओली और प्रचंड के हाथ मिलाने के बाद नेपाली कांग्रेस विपक्ष में हो गई थी. ऐसा माना जा रहा था कि नेपाली कांग्रेस 10 जनवरी को पुरज़ोर कोशिश करेगी कि प्रचंड संसद में बहुत हासिल न कर पाएं.
लेकिन हुआ ठीक उल्टा. नेपाली कांग्रेस के 89 सदस्यों ने भी प्रचंड के समर्थन में वोट कर दिया.
नेपाली कांग्रेस के इस रुख़ से नेपाल का लोकतंत्र फ़िलहाल पूरी तरह से विपक्ष विहीन हो गया है. लेकिन यह केवल विपक्ष विहीन होने का मामला नहीं है.
नेपाली कांग्रेस के प्रचंड को समर्थन करने से केपी शर्मा ओली भी असहज हो गए हैं. संसद में यह नज़ारा देख मंगलवार को ओली ने नेपाली कांग्रेस पर तंज़ किया और कहा कि देउबा ने जिस उम्मीद से समर्थन किया, उसमें निराशा ही हाथ लगेगी.
ओली ने प्रचंड पर भी शक़ किया कहीं खेल कुछ और तो नहीं हो रहा है.
नेपाली कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया?
नेपाली कांग्रेस के संयुक्त महासचिव महेंद्र यादव ने प्रचंड के समर्थन पर मीडिया से कहा कि पार्टी ने सर्वसम्मति से मंगलवार को फ़ैसला किया था कि विश्वासमत के समर्थन में वोट करेंगे, लेकिन सरकार में शामिल नहीं होंगे.
हालांकि प्रचंड को समर्थन करने पर नेपाली कांग्रेस बुरी तरह से बँटी हुई बताई जा रही है. सोमवार को प्रचंड नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा से मिलने उनके आवास पर गए थे और उन्होंने मंगलवार के विश्वासमत में समर्थन में वोट करने का आग्रह किया था.
नेपाली कांग्रेस को जब प्रचंड के समर्थन में ही वोट करना था तब गठबंधन क्यों टूटने दिया? इसके पीछे की रणनीति क्या है?
नेपाल के प्रतिष्ठित अख़बार कांतिपुर के संपादक उमेश चौहान को लगता है कि नेपाली कांग्रेस पहली ग़लती ठीक करने के चक्कर में दूसरी ग़लती कर बैठी है.
उमेश चौहान कहते हैं, ''नेपाली कांग्रेस शुरू में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए अड़ी रही. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रचंड ने ओली से हाथ मिला लिया. इसके बाद नेपाली कांग्रेस को लगा कि बड़ी पार्टी होने के बावजूद वह ख़ाली हाथ रह गई.
उसे अपनी ग़लती का एहसास हुआ कि प्रचंड को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए था. लेकिन तब तक बहुत देर हो गई थी. मुझे लगता है कि नेपाली कांग्रेस को अब विपक्ष की भूमिका में रहना चाहिए था लेकिन उसने लालच में प्रचंड को समर्थन कर दूसरी ग़लती कर दी है.''
उमेश चौहान कहते हैं, ''अभी राष्ट्रपति का चुनाव होना है. प्रतिनिधि सभा के स्पीकर का चुना जाना बाक़ी है. उपराष्ट्रपति भी चुने जाएंगे. नेपाली कांग्रेस के मन में यह लालच है कि कम से कम राष्ट्रपति और स्पीकर का पद मिल जाए. लेकिन यह आसान नहीं होगा.
नेपाल की सिविल सोसाइटी और आम लोगों में यही इम्प्रेशन गया है कि यहाँ की सारी पार्टियां सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती हैं. मुझे लगता है कि पूरे घटनाक्रम में प्रचंड भी संदिग्ध बनकर उभरे हैं. ओली के साथ एक ठोस रोडमैप बन चुका था. सत्ता में हिस्सेदारी का भी ब्लूप्रिंट तैयार था. ऐसे में उन्हें देउबा के पास समर्थन के लिए नहीं जाना चाहिए था.''
उमेश चौहान कहते हैं, ''अगर प्रचंड को लग रहा है कि उनके पास ओली और देउबा दोनों का समर्थन है तो वह मुग़ालते में हैं. मेरा मानना है कि उनके पास 268 सांसदों का समर्थन है भी और नहीं भी है. यहाँ कोई तीसरा खेल भी हो सकता है.
ओली और प्रचंड दोनों नेपाली कांग्रेस को सरकार में बनाने गठबंधन के लिए सबसे मुफ़ीद सहयोगी मानते हैं. प्रचंड की गुगली के जवाब में ओली और देउबा में सरकार बनाने के लिए बात चल सकती है. दोनों संपर्क में भी हैं. संभव है कि दोनों एक साथ प्रचंड से समर्थन वापस ले लें और प्रचंड को कुर्सी छोड़नी पड़े. मैं मानता हूँ कि प्रचंड 268 सांसदों के समर्थन पाकर भी बहुत दिनों तक सत्ता में नहीं रह पाएंगे.''
संसद में बहुमत हासिल करने के बाद प्रचंड ने मंगलवार को कहा, ''हमारी सरकार की प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय, सुशासन और संपन्नता के प्रति है. एक प्रधानमंत्री के रूप में मैं सहमति, सहयोग, आपसी विश्वास और प्रतिशोध रहित मंशा से काम करूंगा. राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में राष्ट्रीय सहमति का कोई विकल्प नहीं है.''
ख़ास बातें:-
प्रचंड ने चुनाव नेपाली कांग्रेस के साथ लड़ा था, लेकिन सरकार केपी शर्मा ओली के साथ बनाई
275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में प्रचंड के महज़ 32 सांसद हैं और प्रधानमंत्री बन गए
नेपाली कांग्रेस ने अचानक से विश्वासमत के दौरान प्रचंड का समर्थन कर दिया
नेपाली कांग्रेस 89 सासंदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है और ओली की पार्टी 78 सांसदों के साथ दूसरे नंबर पर है
नेपाली कांग्रेस के समर्थन के बाद संसद विपक्ष विहीन हो गई है
नेपाल के नागरिक आंदोलनों में सक्रिय रहने वाले और वरिष्ठ पत्रकार युग पाठक से पूछा कि नेपाली संसद का विपक्षी विहीन होना वहाँ के लोकतंत्र के लिए कैसा होगा?
युग पाठक कहते हैं, ''नेपाल संसदीय लोकतंत्र की तमाम बुराइयों से बहुत जल्दी ग्रस्त हो गया है. लोकतंत्र में विपक्ष का होना अनिवार्य होता है लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी पाने के लिए सारी पार्टियां एक हो गई हैं. यह तो ऐसा ही है कि भारत में कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी पार्टियों तीनों एक साथ आ जाएं.''
युग पाठक कहते हैं, ''नेपाली कांग्रेस के समर्थन देने से प्रचंड की मंशा घेरे में है और ओली भी सशंकित हैं. ओली का डर बढ़ गया है कि प्रचंड अब उस तरह से तवज्जो नहीं देंगे क्योंकि नेपाली कांग्रेस का भी समर्थन है.
प्रचंड भले अभी शह-मात के खेल में ऊपर दिख रहे हैं लेकिन उन्हें अपनी हक़ीक़त पता होगी कि महज़ 32 सांसदों के दम पर पीएम बने हुए हैं. जब ओली और शेरबहादुर देउबा 32 सांसद वाली पार्टी को पीएम की कुर्सी दे सकते हैं तो दोनों के पास क्रमशः 78 और 89 सांसद हैं और ये ख़ुद को भी पीएम बना सकते हैं.''
युग पाठक कहते हैं, ''प्रचंड जब ओली के साथ गए तो नेपाली कांग्रेस को अपनी ग़लतियों का एहसास हो गया था. लेकिन जब उसने विपक्ष में रहने का फ़ैसला किया था तो रहना चाहिए था.
नेपाली कांग्रेस ने विपक्ष में रहने के बजाय प्रचंड को समर्थन कर सिविल सोसाइटी में अपनी इज़्ज़त खोई है. नेपाल की सिविल सोसाइटी में यह बात भी कही जा रही थी कि भारत नेपाली कांग्रेस को सत्ता में भागीदार देखना चाहता था. ऐसे में शेर बहादुर देउबा के प्रचंड के साथ जाने को इस रूप में भी देखा जा रहा है.''
युग पाठक से पूछा कि अब नेपाल में प्रचंड विश्वासमत जीत चुके हैं. उनके पास ओली और देउबा का भी समर्थन है. ऐसे में भारत के प्रति प्रचंड का रुख़ कैसा रहेगा?
युग पाठक कहते हैं, ''भारत का राष्ट्रवाद स्वतंत्रता की लड़ाई से निकला और आकार लिया. अंग्रेज़ चले गए तो राष्ट्रवाद पाकिस्तान विरोध के ईर्द-गिर्द घूमने लगा. भारत अपने दो पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान से युद्ध कर चुका है. ऐसे में भारत के लोकप्रिय राष्ट्रवाद के लिए पर्याप्त मसाला है.
नेपाल में इस मसाले का अभाव है. नेपाल कोई उपनिवेश रहा नहीं. राजशाही को बेदखल किया जा चुका है. चुनावी राजनीति में वोट लेने के लिए राष्ट्रवाद शॉर्टकर्ट होता है. भारत नेपाल का पड़ोसी है. ऐसे में भारत से जुड़े कुछ विवादों को राष्ट्रवाद की चाशनी में पेश किया जाता है. संभव है कि आने वाले वक़्त में ऐसी चीज़ें बढ़ेंगी.''
भारत से विवाद शुरू?
काठमांडू पोस्ट की ख़बर के मुताबिक़ प्रचंड के नेतृत्व वाली सत्ताधारी गठबंधन सरकार ने भारत से लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को 'वापस' लेने का वादा किया है.
इस ख़बर के मुताबिक़ सत्ताधारी गठबंधन का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम सोमवार को सार्वजनिक हुआ और इसी में यह वादा किया गया है.
काठमांडू पोस्ट की ख़बर के अनुसार, प्रचंड सरकार नेपाल की संप्रभुता, एकता और स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध है. हालांकि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में चीन से लगी सरहद पर चुप्पी है.
मई 2020 में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड में धारचुला से चीन की सीमा लिपुलेख तक एक सड़क का उद्घाटन किया था. नेपाल का दावा है कि सड़क उसके क्षेत्र से होकर गई है. अभी यह इलाक़ा भारत के नियंत्रण में है.
2019 के नवंबर महीने में भारत ने जम्मू-कश्मीर के विभाजन के बाद अपने राजनीतिक मानचित्र को अपडेट किया था, जिसमें लिपुलेख और कालापानी भी शामिल थे. नेपाल ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी और जवाब में अपना भी नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया.
अपने नए नक़्शे में नेपाल ने लिपुलेख और कालापानी को नेपाल में दिखाया था. नेपाल के तत्कालीन रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने राइजिंग नेपाल को दिए इंटरव्यू में यहाँ तक कह दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी तो नेपाल की सेना लड़ने के लिए तैयार है.
कालापानी में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस की भी तैनाती है. पूरे विवाद पर भारत के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने कहा था कि नेपाल सरहद पर चीन की शह में काल्पनिक दावा कर रहा है.
नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है और वो भारत से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. 2015 में भारत की तरफ़ से अघोषित नाकाबंदी की गई थी और इस वजह से नेपाल में ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत हो गई थी. कहा जाता है कि तब से दोनों देशों के बीच संबंधों में वो भरोसा नहीं लौट पाया है. (bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दस जनवरी विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मैं अपने विचार व्यक्त करूं, इससे बेहतर यह होगा कि हमारे भारतीय और विदेशी महापुरूषों और विद्वानों द्वारा हिंदी के बारे में जो कुछ कहा गया है, उसे संक्षेप में आपके लिए प्रस्तुत कर दूं।
हिन्दी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। मेरी आँखें उस दिन को देखने के लिए तरस रही हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक ही भाषा को समझने और बोलने लगेंगे। (महर्षि दयानन्द सरस्वती)
यदि मैं तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा दिया जाना बंद कर देता। सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएं अपनाने को मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बरखास्त कर देता। मैं पाठ्य पुस्तकों के तैयार किए जाने का इन्तज़ार न करता। अंग्रेजी को हम गालियाँ देते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया, लेकिन उनकी अंग्रेजी भाषा के तो हम अभी तक गुलाम बने बैठे हैं । (महात्मा गांधी)
हिन्दी में, मैं इसलिए लिखता और प्रवचन देता हूँ क्योंकि इस भाषा में विचारों को स्पष्टतः से सामने लाने की अद्भुत क्षमता है। मैं तो चाहता हूं कि देवनागरी लिपि में ही देश की सब भाषाएँ लिखी जायें। इससे दूसरी भाषाएं सीखना आसान हो जाएगा। …केवल अंग्रेजी सीखने में जितना श्रम करना पड़ता है, उतने श्रम में हिन्दुस्तान की सभी भाषाएं सीखी जा सकती हैं। …..मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूं परंतु मेरे देश में हिन्दी की इज्जत न हो, ये मैं नहीं सह सकता। (संत विनोबा भावे)
जब एक बार शराब पीने की आदत पड़ जाती है तो किसी न किसी रूप में कानून का सहारा लेना पड़ता है। आज अंग्रेजी शराब से भी ज्यादा नुकसान कर रही है और अंग्रेजीबन्दी शराबबन्दी से भी ज़्यादा ज़रूरी है। (डॉ. राममनोहर लोहिया)
जब तक भारतीय संसद के वाद-विवाद अंग्रेजी में चलते रहेंगे, देश की राजनीति का जनता से कोई सरोकार नहीं होगा और वह एक छोटे से वर्ग की बपौती बनकर रह जाएगी। (गुन्नार मिर्डल,स्वीडन के प्रसिद्ध समाजशास्त्री)
विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा किसी सभ्य देश में प्रदान नहीं की जाती। विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने से छात्रों का मन विकारग्रस्त हो जाता है और वे अपने ही देश में परदेशी के समान मालूम पड़ते हैं। (रवीन्द्रनाथ टैगोर)
भारत में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं। उस भाषाओं के बीच में अंग्रेजी कैसे सम्पर्क भाषा बन सकती है, क्या दिल्ली का रास्ता लंदन से होकर गुजरता है, अंग्रेजी अलगाव पैदा करती है- जनता और नेता के बीच, राजा और प्रजा के बीच। अंग्रेजी हटेगी तो उत्तर भारत के लोग भी दक्षिण की भाषा सीखेंगे। (आलफंस वातवेल,हालैंड) (नया इंडिया की अनुमति से)
- विष्णु नागर
राहुल गांधी क्या कभी देश के प्रधानमंत्री बन सकेंगे? मुझे शक है। इसकी वजहें हैं।एक तो वे अंबानी-अडाणी पर लगातार हमलावर हैं और ये देश के दो सबसे बड़े थैलीशाह हैं।ये कभी ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना नहीं चाहेंगे,जो आज उनकी सख्त आलोचना करता हो और जो अपनी आलोचनाओं में गंभीर भी दिखता हो। जो पैदल चल कर गरीब जनता का दुख- दर्द किताबों से नहीं, अपने प्रत्यक्ष अनुभव से जान रहा हो। संभव है सत्ता आने पर कुछ ऐसा करने की कोशिश भी करे,जो इनके बुनियादी हितों के खिलाफ जाए!और कुछ करने की फिर भी कोशिश करे तो उनकी पार्टी ही उनका साथ न दे!
दूसरा अगर आज जैसी गंभीरता राहुल गांधी दिखा रहे हैं, उसके प्रति अगर वह सच्चे रह पाते हैं तो वह अकेले ऐसे राजनीतिक व्यक्ति होंगे, जिसे गरीबों का दुख-दर्द वाकई सालता हुआ लगता है। जो तीन गरीब बच्चियों को फटे कपड़ों में ठंड से कांपता देखकर इतना पिघल जाता है कि खुद भी तय करता है कि तब तक मैं ऊनी कपड़े नहीं पहनूंगा, जब तक कांपने नहीं लग जाता, जब तक ठंड बर्दाश्त से बाहर नहीं हो जाती! जिस दिन इनके शरीर पर स्वेटर होगा, मेरे शरीर पर भी होगा!
और जो अपने साथ चल रहा एक यात्री जब गर्व से कहता है कि हम तीन हजार किलोमीटर चल चुके हैं। तो राहुल गांधी उससे कहते हैं कि सुनो, तुम-हम दिन में तीन बार खाते हैं। गरीब मजदूर इससे भी ज्यादा चलता है और आधी रोटी खाकर चलता है। वास्तविक समस्या यह है कि लोगों की तपस्या का इस देश में मोल नहीं है। और भी बुरी बात यह है कि इन करोड़ों लोगों की तपस्या का फल कुछ लोग हड़प जाते हैं।
जब इस देश को गरीबों का नकली हमदर्द, अमीरों का अमीरों से अधिक असली हमदर्द नेता मिला हुआ है,जो नफरत, हिंसा और झूठ का खेल खेलने में बेहद माहिर है, वाक्चातुर है, तो अमीरउमरा मिलकर राहुल गांधी को क्यों प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे? अपने नोटों का खेल फिर से क्यों नहीं दिखाएंगे। क्यों नफरत का चक्र तेजी से नहीं घुमवाएंगे?
वैसे भारत का आदमी हमेशा उम्मीद में जीता है और हमेशा ठगा जाता है, यह भी एक कटु सत्य है।
रोमान अब्रामोविच के याट और टेलर स्विफ्ट के प्राइवेट जेट से लेकर जेफ बेजोस की अमेजन कंपनी के पूरी दुनिया में फैले गोदामों तक, खरबपतियों की जीवनशैलियां और कारोबारी दिलचस्पियां, धरती को सुलगा रही हैं.
डॉयचे वैले पर अजीत निरंजन की रिपोर्ट-
ये प्रचंडता उस समय और तूफानी हो गई जब मेकअप की सरताज काइली जेनर ने पिछली जुलाई में अपने दोस्त ट्रैविस स्कॉट के साथ एक तस्वीर पोस्ट की जिसमें उनके दो प्राइवेट जेट भी देखे जा सकते थे और कैप्शन था, "तुम मेरा वाला लोगे या अपना वाला?"
जेनर की इस पोस्ट पर वायरल होने वाले बहुत सारे ट्वीटों में से एक में ईटिंग डिसऑर्डर अभियान से जुड़ीं कारा लिसेटे ने लिखा, "यूरोप जल रहा है, जबकि काइली जेनर अपने प्राइवेट जेट में 15 मिनट की उड़ानों का मज़ा उठा रही हैं. मैं हर चीज रिसाइकिल कर सकती हूं, अपने तमाम कपड़े सेकंड हेंड खरीद सकती हूं, अपना खुद का खाना उगा सकती हूं लेकिन तब भी जेनर की एक उड़ान के फुटप्रिंट का मुकाबला नहीं कर सकती."
जेनर की इंस्टाग्राम पोस्ट ने अमीर देशों के युवाओं में पनप रहे विरोध को हवा दे दी जो अपने कार्बन फुटप्रिंट में कटौती को लेकर दबाव महसूस करते हैं. इसमें दिखता है कि दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषकों और जलवायु परिवर्तन से डरी हुई पीढ़ी के बीच कितनी खाई है, वो पीढ़ी जो नाइंसाफी से गुस्से में है और अपनी खुद की जीवनशैलियों के खर्चीले, भड़काऊ तरीकों को न छोड़ने पर भी आमादा है. 24 साल की एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, "इसीलिए मैंने कोशिश करना छोड़ दिया."
हाल में टेलर स्विफ्ट और किम कर्दिशयान जैसी शख्सियतों के प्राइवेट जेट ने वे उड़ाने भरीं जो कुछ ही घंटों की ड्राइव पर थीं. मिनटों के हिसाब से उनकी यात्राओं ने एक औसत भारतीय के सालाना उत्सर्जन के मुकाबले ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित की थी. फ्लाइट डाटा दिखाता है कि शुरुआती दिसंबर में एक रात, काइली जेनर और ट्रेविस स्कॉट के प्राइवेट जेटों ने वही उड़ान भरी, और पांच घंटे के अंतराल में कैलिफोर्निया के वान न्युस एयरपोर्ट पर उतर गए.
कार्बन प्रदूषण का 'हास्यास्पद' स्तर
फिर भी, हवा में सेलेब्रिटी के पैदा किए उत्सर्जन समन्दर में उनके उत्सर्जन के मुकाबले कुछ भी नहीं. रूसी कुलीन रोमन अब्रामोविच की 162 मीटर लंबी नाव में दो हैलीपेड और एक स्विमिंग पुल है और वो कई किलों, महलों, विमानों और लीमोसिन कारों के मुकाबले कई गुना ज्यादा सीओटू उत्सर्जित करती है. 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक अब्रामोविच की याट ने 2018 में 11,000 लोगों की आबादी वाले प्रशांत द्वीप के राष्ट्र टुवालु से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित की थी.
इस अध्ययन के अगुआ और इंडियाना यूनिवर्सिटी में रिसर्चर बिएट्रीज बैरोस कहते हैं, "ये खासतौर पर निराश कर देने वाली बात है. क्योंकि द्वीप राष्ट्र, समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी जैसे जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से सबसे ज्यादा घिरे हुए हैं."
दशकों से कार्बन उत्सर्जनो की सबसे बड़ी असमानताएं, अमीर और गरीब देशों के बीच रही हैं. अब देशों के भीतर असमानताएं साफ और गंदी जीवनशैलियो के बीच की खाई को स्पष्ट करती हैं. सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाले दुनिया के एक फीसदी शीर्ष लोग- 132000 डॉलर की सालाना पगार वाले लोग- पिछले 30 साल में कार्बन प्रदूषण की 20 फीसदी वृद्धि के जिम्मेदार हैं. वे दुनिया के तमाम बड़े शहरो में मौजूद हैं- मुंबई से लेकर मियामी तक.
उत्सर्जन असमानता पर काम कर रहे स्टॉकहोम पर्यावरण संस्थान से जुड़ी वैज्ञानिक अनीशा नजारेथ कहती हैं, "शीर्ष एक फीसदी लोग, नीचे के 50 फीसदी लोगों जितनी मात्रा खर्च करते हैं. और पैमाने के स्तर पर जाहिर है ये कार्बन बजट का एक हास्यास्पद अनुपात है."
उस टॉप आय ब्रैकट में आने वाले लोगों की खरबपतियों जैसी विलासिता भरी जीवनशैली नहीं है. भले ही प्राइवेट जेट और विशाल नावें इस पैमाने के चरम छोर पर हैं, यात्री जहाज और यात्री विमान, उनसे ठीक पीछे ही हैं.
मिसाल के लिए उड़ान, दुनिया में सबसे ज्याद प्रदूषणकारी गतिविधियों में से एक है. एविशयन यानी उड्ययन से भले ही वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का तीन फीसदी हिस्सा आता हो लेकिन उड़ान भरने वालों के लिए तो ये प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत है. जानकारों का अनुमान है कि हर साल दो से चार फीसदी वैश्विक आबादी विमान से यात्रा करती है.
इसी तरह किसी और के मुकाबले, अरबपति ज्यादा फॉसिल ईंधन जलाते हैं. साफ ऊर्जा के परामर्शदाता और स्वतंत्र लेखक केतन जोशी, अमीर देशों के मध्यवर्गीय लोगों का हवाला देते हुए कहते हैं, "दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो हमें उसी रोशनी में देखते हैं. आप भी तो किसी के काइली जेनर हैं."
अमीर जीवनशैलियों के लिए 'आश्चर्यजनक समर्थन'
शोधकर्ताओं ने इससे निपटने के तरीके निकाले हैं. टैक्स बढ़ाकर, कानूनी कमियों को भरकर और टैक्स जन्नतों पर अंकुश लगाकर नीति निर्माता, आलीशान जीवनशैलियों वाली कार्बन की भरपूर खपत की अतियों को रोक सकते हैं. धरती को गरम होने से रोकने के लिए जरूरी साफ ऊर्जा के बुनियादी ढांचे में निवेश के जरूरी पैसे भी निकल सकते हैं.
लेकिन टैक्स बढ़ाने की नीतियों का अक्सर तीखा विरोध होता है. उनसे भी, जिन्हें उनसे लाभ होगा. स्वीडन में लुंड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर स्टीफान ग्योसलिंग के मुताबिक, "असल में, अति संपन्न लोगों की जीवनशैलियों के प्रति हम हैरानी भरा समर्थन देखते हैं." ग्योसलिंग ने उड़ान के उत्सर्जनों में गैरबराबरी का अध्ययन किया है. अमीरों को आदर्श मानने वाली संस्कृतियों में पले बढ़े लोग अपनी जिंदगियों को प्रतिबंधित करने वाली नीतियों का अक्सर विरोध करते हैं.
फ्लाइट टैक्स का बोझ, मिसाल के लिए, प्रमुख रूप से अमीर लोगों को नुकसान पहुंचाएगा- खासकर बिजनेस क्लास के यात्रियों को. यूरोपीय संघ में, हवाई यात्रा का आधा खर्च 20 फीसदी सबसे अमीर वर्ग से आता है. अमेरिका और कनाडा में 79 फीसदी उड़ानों में साल में चार बार जाने वाले 19 फीसदी वयस्क होते हैं. कुछ वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञों ने फ्रीक्वेन्ट फ्लायर यानी विमान से अक्सर यात्रा करने वाले लोगों के लिए कर का सुझाव रखा है जिसमें हर अतिरिक्त उड़ान पर व्यक्ति को ज्यादा कीमत चुकानी होगी.
इन असमानताओं का मतबल उड़ानों पर टैक्स लगाने की नीतियों से सबसे सक्षम लोगों से राजस्वकी वसूली की जा सकती है. पर्यावरणीय थिंक टैंक, इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्ट के अक्टूबर में कराए एक अध्ययन के मुताबिक ग्लोबल फ्रीक्वेन्ट फ्लायर लेवी से 121 अरब डॉलर की राशि निकाली जा सकती है जो 2050 तक एविएशन को कार्बनमुक्त करने के लिए हर साल निवेश के लिए जरूरी है. हर साल छह से ज्यादा उड़ान लेने वाले, फ्रीक्वेंट फ्लायर्स को उस लेवी का 81 फीसदी चुकाना होगा. विमान से ही यात्रा करने वाले अति-संपन्न लोग, कुल आबादी का 2 फीसदी हिस्सा हैं.
नीति निर्माता, केरोसीन से चलने वाले प्राइवेट जेटों पर भी रोक लगाकर, अति संपन्न लोगों के कारण होने वाले उत्सर्जनों में कटौती कर सकते हैं. ऐसे प्रतिबंध से उड़ानों का सिर्फ एक छोटा सा प्रतिशत ही प्रभावित होगा लेकिन अरबपतियों के हाथ में साफ तकनीकों में निवेश के लिए रकम छोड़ जाएगा जो पर्यावरणीय अनुकूल उड़ानों के लिए जरूरी है. विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे शुरुआती निवेश सभी के लिए, टिकाऊ विमान ईंधन और इलेक्ट्रिक उड़ानें तैयार करने में काम आ सकेगा. जितना तेजी से उनका विस्तार होगा उतना ही तेजी से कीमतें नीचे आएंगी.
शोधकर्ताओं का जोर इस पर भी है कि शीर्ष एक फीसदी लाभार्थियों- और हर साल 37200 यूरो की कमाई वाले शीर्ष के 10 फीसदी लोगों को- जलवायु कार्रवाई अपनी खरीद तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए.
नेचर पत्रिका में 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक उपभोक्ता, निवेशक, रोल मॉडल, सांगठनिक भागीदार और नागरिक के तौर पर अमीर लोग, जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को कम करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं. इसका अर्थ ये है कि ये काम, फॉसिल ईंधन कंपनियों को कर्ज देने वाले बैंकों से अपनी जमा राशि निकालकर, स्थानीय प्रशासन की बैठकों में सार्वजनिक परिवहन के पक्ष में अभियान चलाकर या अपने कंपनी प्रबंधन को बिजनेस उड़ानों के बदले वर्चुअल बैठकें करने का दबाव डालकर किया जा सकता है.
जलवायु वैज्ञानिक और अध्ययन के शीर्ष लेखक क्रिस्टियान नीलसन कहते हैं, "अगर समाज के उच्च वर्ग के ये लोग अपनी आय और प्रभाव के दम पर सक्रियता से ये काम करते तो आज हम बदलावों की गति में और तेजी देख रहे होते. ये सुविधा औसत व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है."
लेकिन इस मामले का दूसरा पहलू भी है. दुनिया के चुनिंदा सबसे ज्यादा संपन्न लोगों और कंपनियों ने फॉसिल ईंधनों पर रोक लगाने वाली नीतियों के खिलाफ लॉबीइंग में भी पैसा झोंका हुआ है. स्टॉकहोम पर्यावरण संस्थान से जुड़ी अनीशा नजारेथ कहती हैं कि "अति-संपन्न लोगों के साथ ज्यादा बड़ी समस्या ये है कि वे अभियानों को डोनेशन देकर, राजनीतिक प्रभाव हासिल करते हैं- और इस तरह आमतौर पर बाकी तमाम लोगों की जीवनशैलियों को भी प्रभावित करते हैं." (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भोपाल में कर्णी सेना ने एक अपूर्व प्रदर्शन आयोजित किया और मांग की कि सरकारी नौकरियों, चुनावों और शिक्षण संस्थाओं में, जहां भी आरक्षण की व्यवस्था है, वहाँ सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जाए। यह कर्णी सेना राजपूतों का संगठन है। इसने जातीय आरक्षण के विरुद्ध सीधी आवाज नहीं उठाई है, क्योंकि यह खुद ही जातीय संगठन है लेकिन इस समय देश में जहाँ भी आरक्षण दिया जा रहा है, वह प्रायः जातीय आधार पर ही दिया जा रहा है। यदि सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बन जाए तो जाति भेदभाव के बिना भी देश के सभी कमजोर लोगों को आरक्षण मिल सकता है।
यह मांग तो भारत के कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा करनी चाहिए, क्योंकि कार्ल मार्क्स ने ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ में सबसे ज्यादा हिमायत इसी गरीब वर्ग की है। उन्होंने इसे सर्वहारा (प्रोलेटेरिएट) कहा है। कम्युनिस्टों की क्या कहें, देश की सभी पार्टियां थोक वोटों की गुलाम हैं। थोक वोटों का सबसे बड़ा श्रोत जातियाँ ही हैं। इसीलिए देश के किसी नेता या पार्टी में इतना दम नहीं है कि वह जातीय आरक्षण का विरोध करे। बल्कि कई अन्य जातियों के नेता आजकल अपने लिए आरक्षण के आंदोलन चला रहे हैं।
यदि कर्णी सेना के राजपूत लोग अपने आंदोलन में सभी जातियों को जोड़ लें (अनुसूचित जातियों को भी) तो वह सचमुच महान राष्ट्रीय आंदोलन बन सकता है। अनेक अनुसूचित लोग, जो स्वाभिमानी हैं और दूसरों की दया पर निर्भर रहना गलत मानते हैं, वे भी कर्णी सेना के साथ आ जाएंगे। कर्णी सेना की यह मांग भी सही है कि किसी भी परिवार की सिर्फ एक पीढ़ी को आरक्षण दिया जाए ताकि अगली पीढ़ियाँ आत्म-निर्भर हो जाएं। कर्णी सेना की यह मांग भी उचित प्रतीत होती है कि उस कानून को वापिस लिया जाए, जिसके मुताबिक किसी भी अनुसूचित व्यक्ति की शिकायत के आधार पर किसी को भी जाँच किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया जाता है।
इसमें शक नहीं है कि देश के अनुसूचितों ने सदियों से बहुत जुल्म सहे हैं और उनके प्रति न्याय होना बेहद जरूरी है लेकिन हम भारत में ऐसा समाज बनाने की भूल न करें, जो जातीय आधार पर हजारों टुकड़ों में बंटता चला जाए। भारत और पड़ौसी देशों के तथाकथित अनुसूचित और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने का उपाय जातीय आरक्षण नहीं है।
उन्हें और तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों को भी जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर आरक्षण दिया जाए। यदि हम आरक्षण का आधार ठीक कर लें तो देश में समता और संपन्नता का भवन तो अपने आप ही खड़ा हो जाएगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। कई देशों में लोकतंत्र खत्म हुआ और तानाशाही आ गई लेकिन भारत का लोकतंत्र जस का तस बना हुआ है लेकिन क्या इस तथ्य से हमें संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं। भारतीय लोकतंत्र ब्रिटिश लोकतंत्र की नकल पर घड़ा गया है। लंदन का राजा तो नाम मात्र का होता है लेकिन भारत में पार्टी-नेता सर्वेसर्वा बन जाते हैं। सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह या तो कुछ व्यक्तियों या कुछ परिवारों की निजी संपत्तियां बन गई हैं। उनमें आंतरिक लोकतंत्र शून्य हो गया है। चुनावों के द्वारा जो सरकारें बनती हैं, वे बहुमत का प्रतिनिधित्व क्या करेंगी? उन्हें कुल मतदाताओं के 20 से 30 प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते और वे सरकारें बना लेती हैं। हमारी संसद और विधानसभाओं को पक्ष और विपक्ष के दल एक अखाड़े में तब्दील कर डालते हैं। चुनावों में खर्च होनेवाले अरबों-खरबों रु. नेताओं को भ्रष्टाचारी बना डालते हैं। तब क्या किया जाए?
पिछले दिनों मैंने इन समस्याओं पर ‘आचार्य कृपलानी स्मारक व्याख्यान’ दिया था। उसके कुछ बिंदु संक्षेप में देश के सुधिजन के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं। सबसे पहले तो हम चुनाव-प्रणाली ही बंद कर दें। इसकी जगह हर पार्टी को उसकी सदस्य-संख्या के अनुपात में सांसद और विधायक भेजने का अधिकार मिले। इसके कई फायदे होंगे। चुनाव खर्च बंद होगा। भ्रष्टाचार मिटेगा। करोड़ों लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जाएंगे। अभी सभी पार्टियों की सदस्य-संख्या 15-16 करोड़ के आस-पास है। फिर वह 60-70 करोड़ तक हो सकती है। इस नई प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो भी सरकार बनेगी, उसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिल जाएगा। वह सरकार राष्ट्रीय सरकार होगी, दलीय नहीं, जैसी कि आजादी के तुरंत बाद बनी थी। इस क्रांतिकारी प्रणाली की कई कमियों को कैसे दूर किया जा सकेगा, यह विषय भी विचारणीय है।
जब तक यह नई प्रणाली शुरु नहीं होती है, हमारी वर्तमान प्रणाली में भी कई सुधार किए जा सकते हैं। सबसे पहला सुधार तो यही है कि जब तक किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलें, उसे चुना नहीं जाए। इसी प्रकार चुने हुए सांसदों की सरकार सचमुच बहुमत की सरकार होगी। उम्मीदवारों की उम्र 25 साल से बढ़ाकर 40 साल की जाए और 50 साल के होने पर ही उन्हें मंत्री बनाया जाए। संसद सदस्यों की संख्या 1 हजार से डेढ़ हजार तक बढ़ाई जाए। सभी जन-प्रतिनिधियों की आय और निजी संपत्तियों का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक किया जाए। देश में ‘रेफरेन्डम’ और ‘रिकाल’ की व्यवस्था भी लागू की जानी चाहिए। सारे कानून राजभाषा में बनें और सभी अदालतें अपने फैसले स्वभाषाओं में दें। सांसदों और विधायकों की पेंशन खत्म की जाए। उनके, अफसरों और मंत्रियों के खर्चों पर रोक लगाई जाए। अन्य सुझाव, कभी और!
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
1857 के स्वातंत्र्य-संग्राम से घबराए अंग्रेजों ने भारत की एकता को भंग करने के लिए दो बड़े षड़यंत्र किए। एक तो उन्होंने जातीय जन-गणना का जाल फैलाया और दूसरा, हिंदू-मुसलमान का भेद फैलाया। कांग्रेस और गांधीजी के भयंकर विरोध के कारण 1931 में यह जातीय-जनगणना तो बंद हो गई लेकिन हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता ने 1947 में देश के दो टुकड़े कर दिए। पिछली मनमोहनसिंह सरकार ने जातीय-जनगणना फिर शुरु की थी लेकिन उसके विरुद्ध मैंने ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ आंदोलन शुरु किया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उस जन-गणना को बीच में ही रूकवा दिया।
2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन अधूरे आंकड़ों को प्रकाशित करवाने पर रोक लगा दी थी लेकिन मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ने बिहार में उस भारत-तोड़ू जन-गणना को फिर से शुरु करवा दिया है। वैसे नीतीशकुमार के बारे में मेरी व्यक्तिगत राय काफी अच्छी है लेकिन यह भी सत्य है कि वे जरूरत से ज्यादा व्यावहारिक हैं। उन्होंने यदि बिहार के गरीब परिवारों की मदद के लिए यह जनगणना शुरु करवाई है तो वे सिर्फ गरीबों की जनगणना करवाते। उसमें जाति और मजहब का ख्याल बिल्कुल नहीं किया जाता।
लेकिन नेता लोग जाति और धर्म का डंका जब पीटने लगें तो यह निश्चित है कि वे अंधे थोक वोटों का ढोल बजाने लगते हैं। इन देशतोड़ू साधनों का सहारा लेने की बजाय नीतीश जैसे साहसी नेता को चाहिए, जैसे कि उन्होंने बिहार में शराबबंदी का साहसिक कदम उठाया है, वैसा वे कोई जात-तोड़ो आंदोलन खड़ा कर देते। उनकी इज्जत भारत कि किसी भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से ज्यादा हो जाती। वे युग पुरुष बन जाते। वे भारत के इतिहास में महामानव की उपाधि के हकदार होते।
उनकी गिनती महर्षि दयानंद सरस्वती, डाॅ. राममनोहर लोहिया और डाॅ. आंबेडकर जैसे महापुरुषों के साथ होती लेकिन नीतीशकुमार तो क्या, हमारी सभी पार्टियों के नेता वोट और नोट का झांझ पीटने में लगे रहते हैं। देश के किसी नेता में दम नहीं है कि वह इस भारततोड़ू जनगणना का स्पष्ट विरोध करे, क्योंकि मूलतः सभी एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इस जनगणना में 500 करोड़ रु. खर्च होंगे और साढ़े पांच लाख लोग मिलकर इसे पूरा करवाएंगे।
बिहार में 250 से ज्यादा बड़ी जातियां हैं और उनमें हजारों उप-जातियां हैं। एक जिले में जो ऊंची जात है, वह किसी दूसरे जिले में नीची जात है। नीची जात के कई लोग लखपति-करोड़पति हैं और ऊँची जाति के कई लोग कौड़ीपति हैं। यह जातीय जनगणना गरीबी कैसे दूर करेगी? यह बिहार जैसे पिछड़े हुए प्रांत को अब से भी ज्यादा गरीब बना देगी। गरीब तो गरीब होता है। उसकी गरीबी ही उसकी जाति है। आप उसकी गरीबी दूर करेंगे तो उसकी जाति अपने आप मिट जाएगी और आप उसकी जाति गिनेंगे तो उसकी गरीबी बढ़ती चली जाएगी क्योंकि ऊँची जातियों के लोग उसके विरूद्ध गोलबंद हो जाएंगे। (नया इंडिया की अनुमति से)
-ललित मौर्य
क्या आप जानते हैं कि भारत में सडक़ दुर्घटनों में हर घंटे 18 लोगों की जान जा रही है। वहीं इन हादसों में हर घंटे औसतन 44 लोग घायल हो जाते हैं।
यह जानकारी सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट "रोड एक्सीडेंट्स इन इंडिया 2021" में सामने आई है।
रिपोर्ट में जो आंकड़े साझा किए गए हैं उनके मुताबिक 2021 में 4,12,432 हादसे हुए थे। इन हादसों में करीब 1,53,972 बदनसीबों की मौत हो गई थी, जबकि 3,84,448 लोग किसी न किसी रूप में घायल हुए थे।
गौरतलब है कि यह रिपोर्ट राज्?यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस विभागों द्वारा एकत्र आंकड़ों और उनसे प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है।
यदि 2019 से तुलना की जाए तो इस वर्ष देश में हुए सडक़ हादसों और उनसे होने वाली मौतों और घायलों की संख्?या में अभूतपूर्व कमी दर्ज की गई है। हालांकि यह सडक़ नियमों की वजह से नहीं बल्कि कोविड-19 महामारी के प्रकोप और विशेष रूप से मार्च-अप्रैल, 2020 के दौरान हुए देशव्यापी लॉकडाउन और धीरे-धीरे अनलॉकिंग और नियंत्रण उपायों के चलते संभव हुआ है।
देखा जाए तो इन हादसों से जुड़े प्रमुख संकेतकों के मामले में 2019 की तुलना में 2021 प्रदर्शन बेहतर हुआ है। गौरतलब है कि 2021 में हुई सडक़ दुर्घटनाओं में 8.1 फीसदी और घायलों की संख्?या में 14.8 फीसदी की कमी आई है। हालांकि, 2019 की समान अवधि की तुलना में 2021 में सडक़ दुर्घटनाओं से होने वाली मृत्यु दर में 1.9 फीसदी की वृद्धि हुई है।
हालांकि यदि 2020 से तुलना की जाए तो 2021 में सडक़ हादसों में औसतन 12.6 फीसदी का इजाफा हुआ। वहीं इन हादसों में मरने वाले लोगों की संख्या में 16.9 फीसदी और घायलों के आंकड़े में 10.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।
गौरतलब है कि 2020 में कुल 3,66,138 सडक़ हादसे हुए थे, जिनमें 1,31,714 लोगों की मौत हो गई थी वहीं 3,48,279 लोग घायल हुए थे। देखा जाए तो 2020 में हर 100 हादसों में 36 लोगों की मौत हुई थी।
सडक़ नियमों की अनदेखी लोगों पर पड़ रही भारी
सडक़ सम्बन्धी नियम कितने जरूरी हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश में सीट बेल्ट नहीं लगाने से 2021 में 16,397 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इनमें से 8,438 चालक जबकि 7,959 यात्री थे। इसी तरह 2021 के दौरान कुल 46,593 व्यक्ति हेलमेट न पहनने के कारण सडक़ दुर्घटनाओं का शिकार हो गए थे।
इनमें 32,877 टू-व्हीलर चालक जबकि 13,716 सह-यात्री थे। इसी तरह रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में हेलमेट न पहनने से 93,763 लोगो घायल हो गए थे, जबकि सीट बेल्ट न लगाने से 39,231 लोगों को चोटें आईं थी।
इसी तरह जानलेवा सडक़ दुर्घटनाएं 2021 में 17.7 फीसदी की वृद्धि के साथ 2020 में 1,20,806 से बढक़र 2021 में 1,42,163 पर पहुंच गई थी। देखा जाए तो यह जानलेवा हादसे, कुल सडक़ दुर्घटनाओं का 34.5 फीसदी हिस्सा थी।
इसी तरह जानलेवा सडक़ दुर्घटनाएं 2021 में 17.7 फीसदी की वृद्धि के साथ 2020 में 1,20,806 से बढक़र 2021 में 1,42,163 पर पहुंच गई थी। देखा जाए तो यह जानलेवा हादसे, कुल सडक़ दुर्घटनाओं का 34.5 फीसदी हिस्सा थी। इतना ही नहीं रिपोर्ट से पता चला है कि सडक़ दुर्घटनाओं के मामले में 18-45 वर्ष की आयु के लोग सबसे ज्यादा दुर्भाग्यशाली थे। 2021 में इन हादसों में हुई कुल मौतों में इस आयु वर्ग की करीब 67 फीसदी हिस्सेदारी रही।
यदि वैश्विक स्तर पर भी देखें तो सडक़ दुर्घटनाओं में होने वाली 90 फीसदी मौतें निम्न और मध्यम-आय वाले देशों में होती हैं। वहीं भारत विश्व की सडक़ हादसों में होने वाली 11 फीसदी मौतों के साथ शीर्ष पर है। 2021 में ट्रैफिक नियम के उल्लंघन को देखें तो ओवर स्पीडिंग की वजह से 69.6 फीसदी लोगों की मौत हुई थी। वहीं गलत दिशा में ड्राइविंग से 5.2 फीसदी मौतें दर्ज की गई थी।
इसी तरह 46.9 फीसदी दुर्घटनाएं खुले क्षेत्रों में हुई थी, जहां आबादी नहीं थी। वहीं 54.2 फीसदी मौतें और 46.9 फीसदी चोटें खुले क्षेत्र में लोगों को लगी थी, जो इस बात को दर्शाता है कि रफ्तार कहीं ज्यादा घातक सिद्ध हुई थी।
वहीं यदि वाहनों के लिहाज से देखें तो 2021 के सडक़ हादसों में हुई कुल मौतों में दोपहिया सवारों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा करीब 45.1 फीसदी रही। इसके बाद इन हादसों में 18.9 फीसदी मौतें पैदल यात्रियों की हुई थी। जो दर्शाता है आज भी भारत में पैदल यात्री और दोपहिया चालक सडक़ों पर सुरक्षित नहीं हैं।
रिपोर्ट से पता चला है कि 2021 में देश में नेशनल हाइवे पर कुल 1,28,825 सडक़ हादसे हुए थे। जिनमें 56,007 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि इन हादसों में 1,17,765 लोग घायल हुए थे। (downtoearth.org.in/)
-डॉ. लखन चौधरी
नया साल 2023 का आग़ाज हो गया है। सभी इस साल को अपने लिए खास और बेहद खास बनाना चाहते हैं। इस तरह का संकल्प होना भी चाहिए, लेकिन बेहद खास होने के मायने समझने की जरूरत है। बेहद खास का मतलब क्या हो ? क्या होना चाहिए ? क्या हो सकता है ? यह समझना बेहद जरूरी है। जरूरी है अपनी सोच और विचारधारा को वैचारिक प्रदूषकों से बचाकर रखें।
जीवन में हमेशा याद रखी जानी चाहिए कि जीवन में बहुत सारी बातें समय के पहले समझ में नहीं आती हैं। जीवन का तर्जुबा समय के साथ ही समझ में आता है, इसके लिए चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए। कई बार इंसान छोटी-छोटी ऐसी गलतियां करता है, जिसके लिए बुद्धिमता की जरूरत ही नहीं होती है। बहुत छोटी बातें मगर कुछ महत्वपूर्णं बातें, वे बातें जो व्यक्ति को 55 की उम्र के बाद समझ में आती हैं, जीवन की असली समझदारी की बातें होती हैं। फिर इंसान अक्सर सोचता है कि यदि यही बातें उसे 25 की उम्र में समझ में आ गई होतीं तो उसकी जिन्दगी कुछ अलग ही होती ? लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
बेहतर जीवन और जीवन को बेहतर ढ़ंग से जीने के लिए दिलचस्प एवं उपयोगी बातें तथा जानकारियां पढऩी, सुननी चाहिए। अच्छे एवं बेहतर लोगों से मिलने रहना चाहिए। तरह-तरह के लोगों से मिलते जुलते रहने से इंसान को तमाम तरह के खट्टे-मीठे अनुभव सीखने को मिलते हैं। जीवन की असली समझ यही होती है। यहीं से जीवन को सीख मिलती है। यहीं से जीवन संवरता है। यहीं से जीवन में समझदारी आती है।
कोविड-19 के ढाई-तीन साल गुजर जाने के बावजूद कोरोना का खौफ गया नहीं है, कहा जाये कि जा नहीं रहा है। रह-रह कर कोरोना के मामले आते जा रहे हैं, जिससे लोगों की चिंताएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि कोरोना के नाम पर कई लोग, कंपनियां, सरकारें लोगों को जिस तरह से हिदायतें, नसीहतें दे रहीं हैं, इससे भी लोगों में भय, खौफ, डर का माहौल बना हुआ है।
इधर कोरोना कालखण्ड के बाद लोगों में ’पोस्ट कोविड साईड इफेक्ट’ भी देखने को मिल रहे हैं। तरह-तरह के मनोरोग एवं मानसिक विकृतियां उभर कर सामने आ रहे हैं। लोगों की मानसिक स्थितियां बिगड़ रहीं हैं। छोटी-छोटी और बेमतलब की बातों के लिए लोग आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठा रहे हैं। पिछले दो-तीन सालों में आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ीं हैं। लोगों की सहनशीलता तेजी से कम होती जा रही है। कई लोग इसे कोरोना के साईड इफेक्ट के तौर पर देखते हैं, तो कई लोगों का मानना है कि लोगों की अति महात्वाकांक्षाएं इसके लिए जिम्मेदार हैं। कारण जो भी हों, लेकिन परिणाम दुखद एवं अस्वीकार्य है। किसी भी परिस्थिति में इस तरह की घटनाओं से बचने एवं अपने आस-पास के लोगों को बचाने की जरूरत है।
पिछले कुछेक महिनों या कहें सालों से दुर्घटनाओं की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। सडक़ दुर्घटनाएं इतनी बड़ी संख्या में होने लगी हैं कि रोज-रोज हजारों लोगों की मौत सडक़ दुर्घटनाओं से होने लगी है। इसकी अनेकों वजह हो सकती हैं और हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह वैयक्तिक लापरवाही, जल्दबाजी एवं नासमझी है। दरअसल में हम बहुत कुछ, बल्कि सब कुछ बहुत जल्दी और दूसरों से पहले पा लेना चाहते हैं। इसी तरह की सोच एवं महात्वाकांक्षाओं की वजह से आत्महत्याएं एवं दुर्घटनाएं लगातार बढ़ी हैं, बढ़ती जा रहीं हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। इस तरह की घटनाओं को हर हाल में रोका जाना चाहिए।
दरअसल में लोग जिन्दगी को वीडियो गेम, किताबी कहानी, टीवी धारावाहिक अथवा फिल्म समझने लगे हैं, हकीकत यह है कि जीवन इस तरह की फंतासियों से नहीं चलता है, कहा जाये कि जीवन वीडियो गेम, किताबी कहानी, टीवी धारावाहिक अथवा फिल्म नहीं होती है। जीवन में यह समझने की जरूरत है कि जीवन में हर समय अपनी भावनाओं पर विश्वास करना खतरनाक भी हो सकता है। भावनाओं से जिंदगी नहीं चलती है। जीवन को बेहतर बनाने के लिए हकीकतों का सामना करना पड़ता है। जीवन की वास्तविक सच्चाईयों से गुजरना होता है, और हकीकत एचं सच्चाई कई बार बहुत कड़वे होते हैं।
आजकल लोगबाग अक्सर अपनी खूबियों एवं हुनर को जाने-परखे बगैर हर क्षेत्र में भाग्य आजमाना चाहते हैं। उस फील्ड या क्षेत्र में भी अपनी धाक जमाना चाहते हैं, जहां उनकी कोई दक्षताएं या क्षमताएं नहीं होती हैं, लिहाजा निराशा हाथ लगती है। ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यदि मैं शतरंज का अच्छा खिलाड़ी नहीं हूं तो मुझे शतरंज के बजाय दूसरा वो खेल खेलना चाहिए जो मैं जानता हूं। आजकल लोग पसंद को कॅरियर बनाना चाहते है, बगैर सोच समझे कि इस पसंद में रूचि या दक्ष्ता कितनी है ? यदि मैं केवल इसलिए शंतरंज खेलना चाहता हूं कि मुझे शतरंज खेलना पसंद है, तो यह मेरी मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है, और मुझे इसमें कभी भी बड़ी सफलता नहीं मिल सकती है।
याद रखिए, जिदंगी में हमें हमेशा असहज, असामान्य, असाधारण बुद्धि की जरूरत होती है जो कि हमें असामान्य एवं असाधारण विचारों, अनुभवों, असामान्य लोंगों से मिलती है ? ऐसा कतई नहीं है और ऐसा सोचना भी कतई जरूरी नहीं है। बहुत सामान्य तरीके से बहुत सहज तरीके से भी जीवन को बहुत अच्छे से जीया जा सकता है। कम महात्वाकांक्षाओं के साथ, कम जरूरतों के साथ, बहुत साधारण तरीके से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
नव वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। जीवन को समय की निरर्थक भागदौड़ एवं गैरजरूरी आपाधापी से बचाकर अपनी तरह से, अपने तरीके से, अपनी दक्षताओं, अपनी सीमाओं और मर्यादाओं के साथ जीने का संकल्प लें, तो 2023 आपके लिए भी यादगार हो सकता है। दुनिया की महात्वाकांक्षी भागदौड़ और सबकुछ पा लेने की अंधी होड़ एवं अंतहीन आपाधापी से बचने की जरूरत है, जिससे जीवन को बचाया जा सके, तभी जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
विश्व विद्यालय अनुदान आयोग ने एक जबर्दस्त नई पहल की है। उसने दुनिया के 500 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए हैं। वे अब भारत में अपने परिसर स्थापित कर सकेंगे। इस साल भारत के लगभग 5 लाख विद्यार्थी विदेशों में पढ़ने के लिए पहुंच चुके हैं। विदेशी पढ़ाई भारत के मुकाबले कई गुनी मंहगी है। भारत के लोग अपनी कड़ी मेहनत की करोड़ों डालरों की कमाई भी अपने बच्चों की इस पढ़ाई पर खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।
इन लाखों छात्रों में से ज्यादातर छात्रों की कोशिश होती है कि विदेशों में ही रह जाएं और वहां रहकर वे मोटा पैसा बनाएं। भारत से प्रतिभा पलायन का यह मूल स्त्रोत बन जाता है। अब जबकि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में खुल जाएंगे तो निश्चय ही यह प्रतिभा-पलायन घटेगा और देश का पैसा भी बचेगा। इसके अलावा वि.वि.अ. आयोग की मान्यता है कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा-पद्धतियां भारत में प्रारंभ हो जाएंगी, जिसका लाभ हमारे पड़ौसी देशों के विद्यार्थी भी उठा सकेंगे।
इन सब लाभों की सूची तो ठीक है लेकिन क्या हमारे शिक्षाशास्त्रियों ने इस मामले के दूसरे पहलू पर भी विचार किया है? इसके दूसरे पहलू का सबसे पहला बिंदु यह है कि भारत में चल रहे विश्वविद्यालयों का क्या होगा? ये विश्वविद्यालय पिछले डेढ़-दो सौ साल से अंग्रेजों और अमेरिकियों के नकलची बने हुए हैं? क्या वे ठप्प नहीं हो जाएंगे? जिन माता-पिताओं के पास पैसे होंगे, वे अपने बच्चों को हमारे भारतीय विश्वविद्यालयों में क्यों पढ़ाएगें? वे सब विदेशी विश्वविद्यालयों के पीछे दौड़ेंगे।
दूसरा, इन विदेशी विश्वविद्यालयों को शुल्क, पाठ्यक्रम, प्रवेश-नियम और अध्यापकों की नियुक्ति में पूर्ण स्वायत्तता होगी। वे भारत के हित की बात पहले सोचेंगे या अपने देश के हित की बात? तीसरा, क्या अब हमारे देश में इस नई शिक्षा-व्यवस्था के कारण युवा-पीढ़ी में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं पैदा हो जाएगा? चौथा, हमारे देश की सारी शिक्षा-व्यवस्था क्या तब पूर्ण नकलची बनने की कोशिश नहीं करेगी? पांचवाँ, विदेशी शिक्षा-संस्थाओं में पढ़ाई का माध्यम क्या होगा?
क्या वे भारतीय भाषाओं को माध्यम बनने देंगे? कतई नहीं। उसका नतीजा क्या होगा? प्रतिभा-पलायन रूक नहीं पाएगा। छठा, इस भाजपा सरकार को बने आठ साल हो गए लेकिन नई शिक्षा-नीति किसी कागजी शेर की तरह खाली-पीली दहाड़ मारती रहती है। उसमें किसी भारतीयता या मौलिकता का समावेश अभी तक नहीं हुआ है। जब तक सर्वोच्च अध्ययन और अनुसंधान भारतीय भाषाओं के जरिए नहीं होगा और अंग्रेजी का एकाधिकार समाप्त नहीं होगा, यह नई पहल काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-शुमाएला जाफरी
चरमराती अर्थव्यवस्था और सिर उठाता चरमपंथ पाकिस्तान के लिए बड़ी चिंता का सबब बना हुआ है। पाकिस्तान के सामने ये संकट इतना गंभीर हो चुका है कि इससे निपटने के रास्तों पर विचार करने के लिए राजधानी इस्लामाबाद में दो दिनों तक मंथन चला। ये मीटिंग थी पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की।
एनएससी पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य मसलों पर विचार विमर्श के लिए सबसे बड़ा फोरम है। इसकी मीटिंग की अध्यक्षता प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने की, जिसमें वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री और खुफिया प्रमुख के साथ सेना प्रमुख सैयद असीम मुनीर भी शामिल हुए।
मीटिंग में चर्चा किस मसले पर हुई?
दो दिन के गहन विचार विमर्श के बाद एक विज्ञप्ति जारी की गई, जिसमें अफगानिस्तान का सीधा जिक्र तो नहीं था लेकिन इसमें परोक्ष रूप से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को एक चेतावनी जरूर थी।
पीएम ऑफिस की तरफ से जारी प्रेस रिलीज़ में ये साफ लिखा गया है कि पाकिस्तान किसी भी देश में आतंकवाद को पनाह देने, इसे सम्मानित करने का समर्थन नहीं करता। पाकिस्तान अपनी आवाम की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक क़दम उठाने के लिए स्वतंत्र है।’
एनएससी ने पूरी ताकत के साथ हिंसा भडक़ाने या इसका सहारा लेने वाली सभी संस्थाओं, व्यक्तियों से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। फोरम में आतंकवाद के खिलाफ ‘नेशनल एक्शन प्लान’ को नए सिरे से तेज़ करने का फैसला किया गया। साथ ही इस बात पर जोर दिया गया केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें ऐसे सभी कदमों को लागू करने में अपनी भूमिका निभाएंगी। इसके अलावा एनएससी ने देश की कानून व्यस्था संभालने वाली सभी एजेंसियों, खासतौर पर काउंटर टेरेरिजम डिपार्टमेंट की क्षमता बढ़ाने का फैसला किया। पाकिस्तान में आतंकवाद पर काबू करने के लिए बनाई गई ये संस्था सबसे ज्यादा आतंकी हमलों के निशाने पर रही है।
प्रेस रिलीज़ के एक बड़े हिस्से में देश की लगातार बिगड़ती आर्थिक हालत का जिक्र था। इसमें कहा गया था कि फोरम को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से चल रही बातचीत की जानकारी दी गई। पाकिस्तान फि़लहाल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कार्यक्रम को पटरी पर लाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
कुछ आर्थिक विशेषज्ञ ये आशंका जता रहे हैं कि अगर वक्त रहते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद नहीं मिली, तो लगातार कम होते विदेशी मुद्रा भंडार और डॉलर की कमी की वजह से पाकिस्तान डिफॉल्टर बनने की कगार पर पहुंच जाएगा।
यहां गौर करने वाली बात है कि मदद हासिल करने के लिए अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कुछ आधार शर्ते होती हैं। मसलन सब्सिडी में कमी करना और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाना। लेकिन जनता की नाराजगी मोल लेने वाले इन कदमों पर पहल करने से पाकिस्तान की मौजूदा पीडीएम गंठबंधन सरकार हिचक रही है।
सरकार के मुताबिक देश में डॉलर की कमी की एक वजह है अफग़ानिस्तान के लिए अवैध फ्लाइट। इसे देखते हुए एनएससी ने अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने के लिए हवाला समेत अवैध मुद्रा के दूसरे सभी कारोबारों पर लगाम कसने का फ़ैसला किया है।
टीटीपी से कोई बातचीत नहीं
पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुँच रखने वाले कुछ पत्रकारों और विशेषज्ञों की मानें तो सरकार जल्द से जल्द आतंकी संगठनों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन करने पर विचार कर रही है। खासतौर पर खैबर पख्तुनख़्वा और बलूचिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों को लेकर सरकार गंभीर है। जबसे प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान ने युद्धविराम खत्म करने की घोषणा की है, तब से पाकिस्तान में कानून व्यस्था संभालने वाली एजेंसियों पर आतंकी हमले तेजी से बढ़े हैं। इसे देखते हुए पाकिस्तानी सेना ट्राइबल इलाकों में पहले से ही कई ऑपरेशन चला रही है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार आने वाले दिनों में ऐसे और भी ऑपरेशन शुरू करने वाली है।
पिछले 15 सालों में टीटीपी पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन के रूप में उभरा है। इस दौरान इसने हजारों आम लोगों के साथ सैनिकों को भी निशाना बनाया है। पिछले साल पाकिस्तान सरकार ने टीटीपी के साथ अनौपचारिक बातचीत शुरु की थी। ये बातचीत अफगान तलिबान की मध्यस्थता में हो रही थी। लेकिन पीटीटी की गैर-वाजिब मांगों की वजह से बातचीत बीच में ही बिगड़ गई। इसके बाद पिछले दिसंबर में टीटीपी ने सरकार के साथ युद्धविराम खत्म करने और पूरे देश में आतंकी हमले शुरू करने का ऐलान कर दिया।
पाकिस्तान की आवाम पहले भी टीटीपी के साथ बातचीत के खिलाफ थी। अब गृहमंत्री राना सनानुल्लाह ने हालिया इंटरव्यू में ये माना कि ‘टीटीपी ने बातचीत की पेशकश को सरकार की कमजोरी माना।
इस बात का एहसास सेना को भी हो चुका है। इसलिए सरकार अब ऐसी कोई भी पेशकश नहीं करने वाली। बल्कि हमारी तरफ से साफ बात ये है कि अब टीटीपी या किसी भी आतंकी संगठन से कोई बातचीत नहीं होगी।
एनएससी की बैठक के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी एक इंटरव्यू में साफ कहा कि ‘अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ किया जा रहा है। पाकिस्तान की सरकार पहले से ही ये दावा करती रही है कि सरहद के पास अफगानिस्तान के इलाके टीटीपी के लिए सुरक्षित पनाहगाह बने हुए हैं। टीटीपी के आका अफगानिस्तान में बैठ कर पाकिस्तान में हमलों की योजना बनाते हैं और वहीं से अंजाम देते हैं।’
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने ये भी कहा कि सरकार अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ बातचीत करेगी और उन्हें याद दिलाएगी कि दोहा समझौते में उन्होंने आतंकी संगठनों को अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देने का जो वादा अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किया था, उसका सख्ती से पालन करे।
पाकिस्तान के गृह मंत्री ने इस बात के संकेत दिए कि अगर जरूरत पड़ी तो टीटीपी के आकाओं का पीछा अफगानिस्तान में घुसकर किया जाएगा।
सलीम सैफी के मुताबिक अब ‘अच्छे तालिबान’ और ‘बुरे तालिबान’, या ‘अफगान तालिबान’ और ‘पाकिस्तान तालिबान’ के बीच फर्क करने का कोई तुक नहीं। ये सब बकवास साबित हो चुका है। उनकी नजर में सरहद के आस पास सक्रिय दोनों तालिबान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक ही विचारधारा में यकीन रखते हैं। दोनों ने ही अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले के खिलाफ जंग छेड़ी। आतंकवाद के खिलाफ इस जंग में पाकिस्तान अमेरिका का साझीदार बना तो इस बात से नाराज टीटीपी ने पाकिस्तान में आतंकी हमलों को अंजाम देना शुरू कर दिया।’ इसलिए सलीम सैफी को ऐसा कतई नहीं लगता कि पाकिस्तानी तालिबान को काबू करने के लिए अफगान तालिबान से मदद लेना फायदेमंद होगा। उनका मानना है कि अफगान तालिबान कभी भी टीटीपी के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं करेगा।
एनएससी के फैसलों पर प्रतिक्रिया
अमेरिका ने एनएससी के फैसलों का पुरजोर समर्थन किया है। अपने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि ‘पाकिस्तान को पूरा हक है, खुद को आतंकवाद से बचाने का।’
नेड प्राइस ने आगे कहा ‘पाकिस्तान की जनता आतंकी हमलों से बुरी तरह प्रभावित हुई है। अफग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को आतंकवाद के लिए अपनी जमीन नहीं इस्तेमाल होने देने का वादा निभाना चाहिए। लेकिन तालिबान सरकार या तो ऐसा करना नहीं चाहती या फिर कर नहीं पा रही।’
उधर तालिबान के रक्षा मंत्री ने राना सनाउल्लाह के उस बयान पर कड़ा ऐतराज जताया जिसमें उन्होंने टीटीपी के खिलाफ अफगानिस्तान में घुसकर कार्रवाई की बात कही थी। तालिबानी रक्षा मंत्री ने कहा कि 'इससे दोनों देशों के रिश्ते खराब होंगे। टीटीपी के आतंकी अड्डे अफगानिस्तान में नहीं, बल्कि पाकिस्तान में ही हैं।’
तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबिउल्लाह मुजाहिद ने भी पाकिस्तान सरकार से अपील की कि वो ऐसे बिना किसी आधार वाले भडक़ाऊ बयानों से बचे। उन्होंने पाकिस्तान के मंत्रियों के बयानों को ‘अफसोसनाक’ करार देते हुए कहा कि उनकी सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान या किसी दूसरे देश के खिलाफ न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि टीटीपी पर कार्रवाई को लेकर मतभेद का असर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों पर साफ दिखने लगा है। ये ऐसा रिश्ता है जिससे कमजोर करना दोनों में से किसी के हित में नहीं।
सलीम सैफी के मुताबिक तालिबान सरकार भी बड़ी मुश्किल में फंसी हुई है। ‘उन्हें पता है पूरी दुनिया में अगर कोई अफगानिस्तान के साथ खड़ा रहने वाला देश था, वो पाकिस्तान था। खाने पीने की चीजों से लेकर इलाज के लिए दवाइयों की सप्लाई के मामले में वो इस्लामाबाद की राह देखते रहे हैं। इसे वो तोडऩा नहीं चाहेंगे। लेकिन उनकी हरकतों से ऐसा भी नहीं लगता कि टीटीपी के आतंकियों को पकडऩे में वो पाकिस्तान का साथ देंगे।’
सीनियर जर्नलिस्ट जाहिद हुसैन की नजऱ में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ त्वरित सैन्य करवाई से भले ही इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन ये इस जटिल समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
जाहिद कहते हैं ‘अब भी मसले की तह तक जाने की बजाय पूरा ज़ोर सिफऱ् सतह पर लगी आग को बुझाने में लगाया जा रहा है। आज की तारीख में हमें अपनी आतंकवाद विरोधी रणनीति की गंभीर समीक्षा की जरूरत है, जो अब तक अपने मक़सद को हासिल करने में नाकाम साबित हुई है।’
टीटीपी का बढ़ता खतरा
सबसे बड़ा खतरा तो पाकिस्तान की मौजूदा सरकार के ऊपर ही मंडरा रहा है। टीटीपी ने हालिया धमकी में ये साफ कर दिया है कि वो अब तक आम लोगों और सेना के जवानों को निशाना बना रहे थे। अब सरकार में शामिल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेताओं पर हमले तेज करेंगे।
टीटीपी ने ये भी कहा है कि अगर ये दोनों पार्टियां उनके संगठन के खिलाफ बनी रहीं, तो उनके नेताओं को नहीं छोड़ेंगे। इन्होंने आम लोगों को भी चेतावनी दी है कि वो इन नेताओं के इर्द-गिर्द न जाएं। टीटीपी ने खासतौर पर विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी और शहबाज शरीफ का नाम लया है।
आर्थिक मोर्चे पर क्या होगा?
एनएससी की बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने वाले किसी रोड मैप पर गहन विचार का जिक्र नहीं है। लेकिन एक बात पर सहमति जरूर दिखी- आईएमएफ के कार्यक्रम को वापस पर पटरी पर लाने के लिए सभी लोग मिल जुलकर काम करें।
जानकारों की मानें तो अगर बैठक में इस तरह की सहमति बनी है तो इसका मतलब साफ है कि पीडीएम की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार जल्द ही कुछ सख्त फैसले ले सकती है, जो अब तक वो लोगों का समर्थन खोने के डर से नहीं ले रही थी।
12 पार्टियों की गठबंधन सरकार के लिए इमरान ख़ान की बढ़ती लोकप्रियता पहले से ही चुनौती बनी हुई है। ये बात सभी सर्वेक्षणों में साफ तौर पर कही जा रही है कि अगले आम चुनाव में इमरान खान की जीत तय है। लेकिन एनएससी की बैठक में ये बात साफ कर दी गई कि सरकार के पास अब तेजी से फैसले लेने के सिवा कोई चारा नहीं।
सीनियर जर्नलिस्ट सैयद तलत हुसैन भी मानते है कि ‘सरकार की निर्णय लेने में अक्षमता देश को डिफॉल्ट जैसी स्थिति में धकेल रही है। इन्हें अब सोचना होगा कि अब ये ज़्यादा दिनों तक चीजों को टाल नहीं सकते। आईएमएफ प्रोग्राम को जारी रखने के लिए सरकार को उनकी शर्तें माननी ही होंगी।’ हालांकि सरकार ने इस दिशा में प्रयास किए। जैसे कि बिजली बचाने के लिए बाजारों को रात के 8.30 बजे तक और शादी घरों को रात 10 बजे तक बंद करना फैसला। लेकिन सरकार के इन आदेशों का कारोबारी लोगों ने कड़ा विरोध किया। ख़ासतौर पर पंजाब और खैबर पख्तुनवा प्रांत में जहां विपक्षी तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी की सरकार है। मीडिया में भी सरकार की इन नीतियों का मज़ाक उड़ा गया।
देश के जाने माने बिजनेस संवाददाता शाहबाज़ राना ने 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' में अपनी छपी रिपोर्ट में ये दावा किया कि आईएमएफ़ प्रोग्राम बहाल करने के लिए बिजली और गैस की क़ीमतों में वृद्धि और दूसरे टैक्सों में बढ़ोतरी में आशंका की वजह से महंगाई दर 24।5 फ़ीसदी तक पहुंच गई।
इस दिशा में पाकिस्तान की वित्त राज्य मंत्री डॉक्टर आयशा पाशा की तरफ़ से संकेत ये है कि आईएमएफ के साथ जो बातचीत नवंबर में टल गई थी वो अब जेनेवा में नौ जनवरी को हो सकती है। इसका मतलब ये है कि बैठक के बाद करेंसी एक्सचेंज रेट को लेकर कुछ कड़े फैसले लिए जा सकते हैं। (bbc.com/hindi)
-सचिन कुमार जैन
जैन समाज ने श्री सम्मेद शिखर क्षेत्र के बारे में सरकार द्वारा बनाई जा रही नीति पर एक ठोस पक्ष लेते हुए एक महत्वपूर्ण सन्देश भी दिया है। सन्दर्भ यह है कि झारखंड सरकार ने जैन समाज के पवित्र स्थान श्री सम्मेद शिखर को ‘एक पर्यटन क्षेत्र’ के रूप में वर्गीकृत किया है। सरकार का तर्क यह है कि जब कोई स्थान ‘पर्यटन क्षेत्र’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, तभी सरकार उन स्थानों के विकास के लिए योजना बना सकती है। अगर सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित नहीं किया जाएगा तो वहां सरकार कोई व्यय नहीं कर पाएगी।
इसके दूसरी तरफ जैन समाज का पक्ष है। जो यह मानता है कि धर्म के अपने कुछ खास व्यवहार होते हैं, सिद्धांत होते हैं। अगर सरकार सम्मेद शिखर को पर्यटन क्षेत्र घोषित करेगी, तो इससे वहां की व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
वास्तव में यह प्रकरण धर्म और धार्मिक स्थलों में सरकार के दखल-अंदाजी और धर्म की राजनीति का सबसे प्रासंगिक उदाहरण है। जब सरकार धर्म और धार्मिक स्थलों की व्यवस्था में दखल देना शुरू करती है, तब उसका मुख्य मकसद आर्थिक लाभ कमाना होता है। दूसरा मकसद राजनीतिक हितलाभ होता है। सरकार ‘सार्वजनिक धन’ का उपयोग खास धर्मों के संरक्षण के लिए करके राजनीतिक लाभ अर्जित करने का प्रयास करती है।
जैन समाज ने हिंदुत्ववादी सोच के ठीक विपरीत पक्ष लिया है। आज हम देख रहे हैं कि पूरे देश में हिन्दू समाज यह चाहता है कि उसके ईश्वर की मूर्तियाँ भी सरकार बनाये, मंदिरों की शिखर भी सरकार बनाए, धर्मशालाएं भी सरकार बनाये, धार्मिक स्थलों के प्रचार का काम भी सरकार ही करे और इससे आगे बढक़र धार्मिक स्थलों को विलासिता के केंद्र बना दे। मूलत: सिद्धांत तो यह है कि समाज को धर्म का प्रबंधन करना चाहिए, लेकिन राजनीति ने सरकारों को धर्म का प्रबंधक बना दिया है और इस काम में हिंदुत्ववादी राजनीति ने हमेशा मुख्य भूमिका निभाई है।
ऐसा लगता है कि आज के समय में धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थल बनाने के लिए या धर्म की राजनीति करने के लिए सार्वजनिक/सरकारी धन का उपयोग एक अच्छी बात मान लिया गया है, जबकि वास्तव में यह एक अनैतिक और असंवैधानिक नीति है। जो धार्मिक समुदाय यह मानते हैं कि उनके धर्मों का प्रबंधन सरकार को करना चाहिए, वे भीतर से बेहद कमज़ोर, पिलपिले और असुरक्षित धार्मिक समुदाय हैं। जऱा सोचिये कि सार्वजनिक/सरकारी धन से धार्मिक स्थलों के विज्ञापनों में ईश्वर/आराध्य के समानांतर सरकारी नुमाइंदों और जनप्रतिनिधियों के प्रचार वाले विज्ञापनों का प्रकाशन समाज को उचित और नैतिक मानना चाहिए? वह भी सरकारी खर्चे पर!
जैन धर्म के पालकों ने वास्तव में यह सन्देश दिया है कि अपने धर्म और धार्मिक स्थलों का सरकारीकरण और राजनीतिकरण होना उन्हें कतई मंज़ूर नहीं है। जैन समाज खुद अपने धार्मिक स्थलों का संचालन और प्रबंधन करेगा। सरकार कुछ करोड़ रुपये व्यय करके, धर्म और समुदाय की भूमिका को नियंत्रित नहीं कर सकती है।
सरकार की भूमिका केवल इतनी है कि वह धार्मिक स्थलों की क़ानून-व्यवस्था को बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाये और यह सुनिश्चित करे कि देश के संविधान की व्यवस्था और मूल्यों के खिलाफ कोई व्यवहार न किया जाए।
- प्रकाश दुबे
आग और धारदार पत्थर को पहला वैज्ञानिक शोध मानने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तैयार हों या न हों, आम धारणा यही है। जीभ के स्वाद और जीवनशैली की सुविधा ने प्रागैतिहासिक मानव को वैज्ञानिक शोध के लिए प्रेरित किया। स्वाद और सुविधा बटोरने की ललक में वैज्ञानिक शोध हुए।
वैज्ञानिक अनुसंधानों की बदौलत बेहतर जिंदगी की खटपट आसान हुई। रोगों से निजात पाने और दुनिया मुटठी में करने का हौसला बढ़ा। वहीं सबको भरपेट भोजन और बेहतर सुविधाएं दिलाने का लक्ष्य बदलकर व्यक्तिगत और सामूहिक लाभ की तलाश करने वालों के मुनाफे का गणित बनता गया। 16 जुलाई 1946 को जूलियस राबर्ट ओपनहाइमर परमाणु विस्फोट का प्रयोग करने में सफल हुए। बम बना। लाखों लोग मारे गए। धरती अब तक भारी विध्वंस का परिणाम भुगत रही है।
अमेरिका की नागासाकी और हिरोशिमा पर बमबारी के बाद वेदना को व्यक्त करते हुए ओपनहाइमर ने श्रीमदभगवत्गीता के कृष्ण की उक्ति दोहराई। कहा- मैं काल (मृत्यु), दुनिया का विनाशकर्ता बना। विज्ञान के अहंकारी और मुनाफाखोर प्रयोग से अशांत कुछ वैज्ञानिकों ने पाश्चाताप करना चाहा। अल्फ्रेड नोबल की जन्मभूमि स्वीडन। पिता ने रूस में कारोबार किया। 1864 में नाइट्रोग्लिसरिन से प्रयोगशाला में विस्फोटक बना चुके थे। 25 नवम्बर 1867 को बारूद यानी डायनामाइट को इंग्लैंड से पेटेंट पा लिया। कहते हैं सगा भाई प्रयोग में प्राण गवां बैठा था। मिलते जुलते नाम के व्यक्ति की मौत के बाद खबर छपी-मौत का सौदागर चला गया। उस पल ने अल्फ्रेड नोबल को नोबल पुरस्कार आरंभ करने के लिए प्रेरित किया।
ओपनहाइमर भौतिकशास्त्री और नोबल रसायनशास्त्री। नोबल पुरस्कार शांति प्रयासों के लिए भी दिया जाता है। यह महत्वपूर्ण है। विकास के लिए बारूद से चट्टानें तोडक़र भवन, बस्तियों, महामार्गों, कारखानों, हवाई अड्?डों का निर्माण किया जाता है। आतंकवादी और अपराध माफिया बारूदी विस्फोट कर मासूमों की जान लेते हैं। अपना उल्लू सीधा करते हैं। वैज्ञानिक और उनकी नकेल थामने वाली सत्ता विकास की आड़ में होने वाले विध्वंस और विनाश के प्रयोग रोकने को कम अहमियत नहीं देती। एक सौ आठवें विज्ञान कांग्रेस में महिला सशक्तिकरण, किसान और जनजाति समुदाय पर विमर्श की पहल महत्वपूर्ण है। उद्घाटन के बाद ही ब्ल्यू इकानामी पालिसी पर सचिव स्तर के अधिकारी ने समूचे प्रारूप पर बात रखी। सागर, मौसम आदि के बारे में केन्द्र सरकार का पृथ्वी विज्ञान विभाग शोध कराता रहता है। अटल बारी वाजपेयी सरकार के मंत्री सुंदर लाल पटवा ने सागर मंथन कर रत्नों की खोज का आदेश जारी किया था। पृथ्वी विज्ञान विभाग के सचिव डा रविचंद्रन के प्रारूप का खुलासा होने पर पता लगेगा कि मछुआरों की जिंदगी में आमूल परिवर्तन लाने में विज्ञान कितना सहायक है? मोटा अनुमान यह, कि सिर्फ मछली पालन जैसे व्यवसाय से करोड़ों लोगों का जीवन स्तर सुधारा जा सकता है। इस तरह के शोध और अनुसंधान प्रयोगशालाओं के बाहर संबंधित समुदाय तक पहुंचना जरूरी है। कृषि अनुसंधान के बावजूद किसान आत्महत्याएं नहीं रुक रही हैं। सही तालमेल के अभाव में?
विज्ञान को घर-घर पहुंचाने की डा एपीजे अब्दुल कलाम वाली ललक की प्रशंसा होती है। उस राह पर चलने वाले विरले हैं। राष्ट्रपति भवन से बाहर निकलने के बाद डा कलाम देश भर के युवजनों को वैज्ञानिक वातावरण से जोड़ रहे थे। गुवहाटी में विद्यार्थियों को संबोधित करते समय उन्होंने अंतिम सांस ली। पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक हमारे वैज्ञानिकों के जाने का लाभ तो होगा, इस काम के लिए विज्ञान सेना तैयार करने की आवश्यकता है। सूर्य ग्रहण से लेकर अनेक कुदरती घटनाओं के बारे में गहराई तक संशय और अंधविश्वास के कारण अनेक समस्याएं उपजती हैं।
विकास की अवधारणा में विकेन्द्रीकरण की अनदेखी से कई बातें छूट जाती हैं। बिजलीघर बनाते समय सही मीटर रीडिंग, ऊर्जा की न्यूनतम खपत जैसे सरकारी उपाय आधे मन से किए गए। सडक़ और भवन निर्माण में फ्लाईएश का उपयोग नहीं होता तो राख के पहाड़ खेतों को लीलते जाते। देश के कम ही राज्य हैं जहां बालू और पत्थर की अवैध खुदाई और तस्करी नहीं होती। मध्य अंचल के मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इस गैरकानूनी कारोबार में राजनीतिक हस्तियों की भागीदारी सर्वविदित है।
15 अक्टूबर 2022 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने ऐलानिया कहा था कि मंत्री, जन प्रतिनिधि तक को जेल भेजने से नहीं हिचकेंगे। संबंधित विभागों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। जिस देश में आत्मनिभ्रर उद्योजक ड्रोन तैयार करने की क्षमता रखता है वहां हवाई निगरानी से करोड़ों की लूट से प्रकृति को विकृत करने और नौकरशाहों को भ्रष्ट करने पर अंकुश लगाने का कीमिया विज्ञान के पास है नहीं, या उसका प्रयोग नहीं होता? भ्रष्टाचार के विरुद्ध निरपेक्ष भाव से कार्रवाई करना तभी संभव है, जब विज्ञान के उपकरण उपलब्ध हों। उनका वाजिब इस्तेमाल हो। पांच-जी के युग में प्रवेश करने के बावजूद संचार सुविधा गड़बड़ाती है।
पता नहीं, विज्ञान कांग्रेस के प्रतिनिधियों का क्या अनुभव रहा? आम नागरिक तो कामरूप से कच्छ तक इसे भुगत रहा है। भरपूर बिजली और बेहतर संचार सुविधा के घोड़े पर सवारी किए बगैर आन लाइन शिक्षा दूरदराज के देहातों तक नहीं पहुंच सकती। ग्रामोपयोगी विज्ञान की दिशा में बहुत कुछ करना शेष है। खेतों को रसायनिक खाद और कीटनाशकों से मुक्त करने के सस्ते उपाय नहीं हैँ। कचरे का वर्गीकरण लोगों की समझ में ठीक से नहीं आया। उसके निस्तारण पर चर्चा कर वैज्ञानिक उपयोगी समाधान खोज लें तो अस्पतालों और महंगी दवाओं की मार से देश बचेगा।
युवा वैज्ञानिकों ने कई सस्ते तरीके ईजाद किए हैं। देश की आजादी के बारे में तरह तरह के मापदंड हैं। सबकी अपनी परिभाषाएं। नागरिक को साफ पेयजल और निस्तारण के लिए शौचालय उपलब्ध कराने वाले देश को ही सही अर्थ में आजाद और आत्मनिर्भर कहा जा सकता है। शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगकी को सस्ता, सुबोध और सरल बनाने पर ही यह संभव है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत से अंग्रेजों को विदा हुए तो 75 वर्ष हो गए लेकिन भारत के भद्रलोक पर आज भी अंग्रेजी सवार है। देश का राज-काज, संसद का कानून, अदालतों के फैसलों और ऊँची नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। ज्यों ही इंटरनेट, मोबाइल फोन और वेबसाइट का दौर चला, लोगों को लगा कि अब हिंदी और भारतीय भाषाओं की कब्र खुद कर ही रहेगी। ये सब आधुनिक तकनीकें अमेरिका और यूरोप में से उपजी हैं। वहाँ अंग्रेजी का बोलबाला है। ये तकनीकें भारत में भी तूफान की तरह फैल रही थीं।
जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे लेकिन मोबाइल फोन, इंटरनेट या वेबसाइटों का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्हें मजबूरन अंग्रेजी (कामचलाऊ) सीखनी पड़ती थी लेकिन भारत के भद्रलोक को अब पता चला है कि उल्टे बाँस बरेली पहुंच गए हैं। हिंदी के श्रेष्ठ अखबार ‘भास्कर’ ने जो ताजातरीन सर्वेक्षण छापा है, वह भारतीय भाषा प्रेमियों को गदगदायमान कर रहा है। उसके अनुसार देश के 89 प्रतिशत लोग स्वभाषाओं का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी लिखने, बोलने, समझनेवालों की संख्या देश में सिर्फ 12.85 करोड़ याने मुश्किल से 10 प्रतिशत है।
सिर्फ ढाई लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा अंग्रेजी बताई है। कितने शर्म की बात है कि हमारे देश में इन ढाई लाख लोगों की मातृभाषा भारत के 140 करोड़ लोगों की दादीभाषा बनी हुई है? लेकिन खुशी की बात यह है कि 90 के दशक में इंटरनेट की 80 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में होती थी, अब वह 50 प्रतिशत के आस-पास लुढ़क गई है याने लोग स्वभाषाओं का इस्तेमाल बड़ी फुर्ती से बढ़ाने लगे हैं।
इंटरनेट ने अनुवाद को इतना सरल बना दिया है कि आप दुनिया की प्रमुख भाषाओं की सामग्री कुछ क्षणों में ही अपनी भाषा में बदल सकते हैं। अनुवाद का उद्योग आजकल अकेले भारत में 4.27 लाख करोड़ रु. का हो गया है। जाहिर है कि भारत में सिर्फ विदेशी भाषाओं से ही देशी भाषाओं में अनुवाद नहीं होता, स्वदेशी भाषाओं में भी एक-दूसरे का अनुवाद होता है। भारत में दर्जनों भाषाएं हैं, इसीलिए यह दुनिया का सबसे बड़ा अनुवाद उद्योग घराना शीघ्र ही बन जाएगा।
इससे भारत की एकता सबल होगी और पारस्परिक भाषाई विद्वेष भी घटेगा। भारत की फिल्में भारत में ही नहीं, पड़ौसी देशों में भी बड़े उत्साह से देखी जाती हैं। यदि उनका रूपांतरण भी उनकी भाषाओं में सुलभ होगा तो इन सब देशों की एकता और सांस्कृतिक समीपता में वृद्धि होगी।
भारतीय जनता को भी पड़ौसी देशों के अखबारों और फिल्मों का लाभ इस अनुवाद प्रक्रिया के जरिए जमकर मिलता रहेगा। यदि संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में हम भाषाई सेतु खड़ा कर सकें तो कुछ समय में ही हम संपूर्ण आर्यावर्त्त क्षेत्र को यूरोप से अधिक संपन्न और शक्तिशाली बना सकते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
6 जनवरी को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रम के बारे में कुछ बातें -
3 जनवरी की देर शाम दिल्ली से कनिष्क का व्हाट्सएप कॉल आता है कि 6 जनवरी को पिताजी की स्मृति में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।
कनिष्क ने यह भी कहा कि वे मुझे इस आयोजन में जरूर आना है। कनिष्क ने दस बारह दिनों पहले मुझे इसकी सूचना भी दे दी थी।
कनिष्क देश के प्रखर बुद्धिजीवी और भारत के युवा प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रमुख सलाहकार, हम सबके बेहद अज़ीज़ श्री देवी प्रसाद त्रिपाठी के कनिष्ठ पुत्र हैं।
देवी प्रसाद त्रिपाठी अपने आप में किसी मिथक से कम नहीं थे। वे एक दुर्लभ किस्म के बुद्धिजीवी थे जो साहित्य, कला, संस्कृति तथा राजनीति में एक साथ निरंतर आवाजाही कर सकते थे। जो अपनी स्मृति और वाकपटुता से सबको चमत्कृत कर सकते थे और अपने ज्ञान से सबको अभिभूत। भारतीय बौद्धिक सांस्कृतिक जगत में वे बेहद चमकीले नाम थे। उनकी सोहबत और दोस्ती का दायरा पूरी दुनिया में फैला हुआ था।
फैज अहमद फ़ैज़, अभिमन्यु अनत, ऋत्विक घटक, अमर्त्य सेन, अमिताभ घोष, मृणाल सेन, अशोक वाजपेयी, प्रकाश कारथ, सीताराम येचुरी, विवान सुंदरम, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अपूर्वानंद, पवन वर्मा, रमेश दीक्षित, राजनाथ सिंह जैसे साहित्य राजनीति और अन्य अनुशासन का ऐसा कौन शख्स है जो डी.पी.त्रिपाठी की दोस्ती के दायरे में न आता हो।
नेपाल में कोई भी प्रधानमंत्री हो वह डी.पी. त्रिपाठी का मुरीद न हो ऐसा मुमकिन ही नहीं है। नेपाल और मॉरिशस उनका दूसरा घर भी था।
हिंदी फिल्म की मशहूर अभिनेत्री मनीषा कोइराला के वे भारत में लोकल गार्जियन थे। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री मौली शर्मा की दिल्ली में पढ़ने वाली सुपुत्री के और मेरे बेटे कबीर के भी वे दिल्ली में लोकल गार्जियन थे।
जेएनयू के वे पहले वामपंथी प्रेसिडेंट चुने गए थे। बाद में सीताराम येचुरी हुए।
ज्योति बसु और बंगाल से उनका गहरा नाता रहा है। बाद में वे भारत के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रमुख सलाहकार हुए। वे राजीव गांधी के अंतिम दिनों तक उनके साथ रहे।
उनकी बौद्धिकता के अनेक किस्से मशहूर हैं जिसमें हजारों मोबाइल नंबर का याद रहना, अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, उर्दू के पढ़े हुए सैकड़ों किताबों के पृष्ठ दर पृष्ठ रखना, सैंकड़ों मित्र परिवार के बच्चों के नाम भी उन्हें मुखाग्र याद थे।
रायपुर से जुड़ी हुई एक घटना मुझे याद आ रही है। विश्वरंजनजी उन दिनों छत्तीसगढ़ में डीजीपी थे।
डी.पी. त्रिपाठी रायपुर आए हुए थे। वे हमेशा की तरह रात में समय निकालकर मेरे साइंस कॉलेज कैंपस स्थित शासकीय आवास में आए हुए थे। बातचीत के दौरान अचानक फिराक गोरखपुरी का जिक्र छिड़ गया। मैंने उन्हें बताया कि फिराक गोरखपुरी के नवासा विश्वरंजन रायपुर में डीजीपी हैं।
डी.पी. त्रिपाठी ने मुझसे कहा कि विश्वरंजन से बात करवाओ। मैंने उनकी विश्वरंजन से बात करवा दी। दूसरे दिन हम लोग उनसे मिलने पहुंचे। विश्वरंजनजी प्रतीक्षा कर रहे थे। बातचीत शुरू होते ही विश्वरंजन ने कहा कि जब वे पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तब उन दिनों स्टूडेंट के बीच यह चर्चा होती थी कि भारत में कोई जीनियस है तो वे डी.पी.त्रिपाठी ही हैं।
फैज़ अहमद फैज़ को भारत बुलाने का और दो तीन दिन तक इलाहाबाद को फैज़ के रंग में रंग देने का दुस्साहस केवल डी. पी. त्रिपाठी ही कर सकते थे। मंच पर एक साथ फैज़ अहमद फैज़, महादेवी वर्मा और फिराख गोरखपुरी को एक साथ बैठाने का साहस भी केवल डी.पी. त्रिपाठी के लिए ही संभव था। यह उन दिनों की बात है जब वे इलाहाबाद में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हुआ करते थे।
इस तरह के अनेकों किस्से डी.पी.त्रिपाठी की शख्सियत के साथ जुड़े हुए हैं। उनकी शख्सियत की एक खूबी यह भी थी की वे हर किसी की मदद के लिए तत्पर रहते थे जैसे गोया वे कोई देवदूत या फरिश्ता हों।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर उनकी सर्वाधिक पसंदीदा जगह थी। दिल्ली जाने पर अक्सर दोपहर की रसरंग महफिल वहीं जमती थी। कई बड़े साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों को उन्होंने वहीं अंजाम दिया था।
मृत्यु से पहले उन्होंने देश भर में फैल रही सांप्रदायिकता को लेकर एक बड़ा आयोजन भी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित किया था। जिसमें देशभर के नामचीन बुद्धिजीवियों को उन्होंने इस कार्यक्रम में आमंत्रित भी किया था। वह एक यादगार कार्यक्रम था जिसे भुला पाना मुश्किल है।
नई दिल्ली के उसी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उन पर केंद्रित आयोजन को लेकर में बेहद भावुक हो रहा हूं।
कल यानी 6 जनवरी को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनकी अनेक उज्जवल स्मृतियां मुझे घेर लेंगी और मैं जानता हूं कि मन ही मन मैं उन स्मृतियों को सबकी नजर बचाकर नमन करने भी लग जाऊंगा क्योंकि अब वे स्मृतियां ही मेरे पास शेष बची रह गई हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुनाया है कि कोई मंत्री यदि आपत्तिजनक बयान दे दे तो क्या उसके लिए उसकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? यह मुद्दा इसलिए उठा था कि आजम खान नामक उ.प्र. के मंत्री ने 2016 में एक बलात्कार के मामले में काफी आपत्तिजनक बयान दे दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों में से चार की राय थी कि हर मंत्री अपने बयान के लिए खुद जिम्मेदार है। उसके लिए उसकी सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इस राय से अलग हटकर न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्न का कहना था कि यदि उस मंत्री का बयान किसी सरकारी नीति के मामले में हो तो उसकी जिम्मेदारी सरकार पर डाली जानी चाहिए। शेष चारों जजों का कहना था कि संविधान कहता है कि देश में सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता का जो भी दुरूपयोग करेगा, उसे सजा मिलेगी। ऐसी स्थिति में अलग से कोई कानून थोपना तो अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता का हनन होगा।
संविधान की धारा 19 (2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो भी मर्यादाएं रखी गई हैं, वे पर्याप्त हैं। चारों न्यायाधीशों की राय काफी तर्कसंगत प्रतीत होती है लेकिन जज नागरत्न की चिंता भी ध्यान देने लायक है। आखिर मंत्री का बयान प्रचारित इसलिए होता है कि वह मंत्री है। वह सरकार का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन उसके व्यक्तिगत बयानों के लिए सरकार को जिम्मेदार कैठे ठहराया जा सकता है? इसके अलावा यह तय करना भी आसान नहीं है कि उसका कौनसा बयान व्यक्तिगत है और कौनसा उसकी सरकार से संबंधित है।
मैं सोचता हूं कि इस मामले में जैसा कानून अभी उपलब्ध है, वह पर्याप्त है। कानून की नई सख्तियाँ लागू करने से भी ज्यादा जरूरी है कि हमारे मंत्री और नेता लोग खुद पर ज़रा आत्म-संयम लागू करें। उनका मंत्रिमंडल और उनकी पार्टी उन्हें मर्यादा में रहना सिखाए। दुखद स्थिति यह है कि पार्टी और सरकार के सर्वोच्च नेता भी अनाप-शनाप बयान देने से बाज नहीं आते।
अखबार और टीवी चैनल भी उन जहरीले चटपटे बयानों को उछालने का मजा लेते हैं। यदि हमारी खबरपालिका अपनी लक्ष्मण-रेखाएँ खींच दे तो इस तरह के जहरीले, कटुतापूर्ण और घटिया बयानों पर किसी का ध्यान जाएगा ही नहीं। जो नेतागण इस तरह के बयान देने के आदी हैं, उनकी पार्टी उन पर कड़े प्रतिबंध भी लगा सकती हैं, उन्हें दंडित भी कर सकती हैं। यदि हमारी खबरपालिका और पार्टियां संकल्प कर लें तो वे नेतागण की इस बदजुबानी को काफी हद तक रोक सकती हैं। अदालतों के सहारे उन्हें रुकवाने से यह कहीं बेहतर तरीका है। (नया इंडिया की अनुमति से)


