अंतरराष्ट्रीय
बीजिंग, 16 सितम्बर | चीन के सिचुआन प्रांत के लक्सियन काउंटी में गुरुवार को आए 6.0 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप में तीन लोगों की मौत हो गई और 60 अन्य घायल हो गए। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, चीन भूकंप प्रशासन ने साइट पर आपदा राहत कार्य का मार्गदर्शन करने के लिए एक कार्य दल भेजा है।
आस-पास की अग्निशमन और बचाव ब्रिगेड के कुल 890 कमांडर और फाइटर जुटाए गए हैं, जबकि अन्य 4,600 बचावकर्मी स्टैंडबाय पर हैं।
घटना में कुल 737 घर ढह गए, 72 घर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए, जबकि 7,290 कुछ हद तक क्षतिग्रस्त हुए हैं।
भूकंप से प्रभावित जियामिंग टाउनशिप के रास्ते में उपरिकेंद्र क्षेत्र में ढही हुई दीवारें और घर देखे गए।
शहर के अधिकांश घरों में बिजली ठप हो गई है।
फूजी बस्ती में भारी बारिश के बीच, बचावकर्मी घर-घर जाकर क्षतिग्रस्त घरों में लोगों की तलाश कर रहे हैं और उन्हें अस्थायी आश्रयों में ले जा रहे हैं।
स्थानीय सरकार के अनुसार, गुरुवार की सुबह तक 6,900 से अधिक प्रभावित निवासियों को स्थानांतरित कर दिया गया है, और 10,000 से अधिक लोगों को अस्थायी आश्रयों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
चाइना अर्थक्वेक नेटवर्क्स सेंटर के अनुसार भूकंप सुबह 4.33 बजे आया।
प्रांतीय सरकार द्वारा स्वीकृत, सिचुआन के भूकंप राहत मुख्यालय ने स्तर-द्वितीय प्रतिक्रिया को सक्रिय कर दिया है, जो चीन के चार-स्तरीय भूकंप आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली में दूसरा सबसे बड़ा है।
कुछ दूरसंचार बेस स्टेशन और केबल क्षतिग्रस्त हो गए।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, लुझोउ हाई-स्पीड रेलवे स्टेशन को बंद कर दिया गया है।
सभी कोयला खदानों को भूमिगत परिचालन रोकने और खनिकों को खदानों से निकालने का आदेश दिया गया है।(आईएएनएस)
दरअसल, इमरान ख़ान का एक जवाब सुर्ख़ियां बटोर रहा है और लोग मज़ाक़ उड़ा रहे हैं. सीएनएन की पत्रकार बेकी एंडर्सन ने इमरान ख़ान से तालिबान की अंतरिम सरकार में शामिल हक़्क़ानी नेटवर्क के बारे में पूछा था.
एंडर्सन ने पूछा कि हक़्क़ानी नेटवर्क अमेरिकी बलों और अफ़ग़ानिस्तान में कई हिंसक हमलों में शामिल रहा है और पाकिस्तान से उसे मदद मिलती रही है.
इस सवाल के जवाब में इमरान ख़ान ने कहा, ''अमेरिका को हक़्क़ानी नेटवर्क के बारे में कोई समझ नहीं है. हक़्क़ानी ट्राइब हैं...ये पश्तून ट्राइब हैं और अफ़ग़ानिस्तान में रहते हैं. 40 साल पहले जब अफ़ग़ान जिहाद शुरू हुआ तो 50 लाख अफ़ग़ान शरणार्थी पाकिस्तान आए. इनमें से कुछ हक़्क़ानी मुजाहिदीन थे और सोवियत से लड़ रहे थे. इनका जन्म पाकिस्तान के अफ़ग़ान शरणार्थी कैंपों में हुआ है.''
इमरान ख़ान के इस जवाब पर काफ़ी तंज़ कसा जा रहा है. दरअसल, हक़्क़ानी न तो कोई ट्राइब हैं और न ही वे पश्तून हैं. अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी ने ट्वीट कर लिखा है, ''मेरे सबसे अहम पूर्वज मौलाना अबु मुहम्मद अब्दुल हक़ हक़्क़ानी मुफ़सिर देहलवी एक धर्मशास्त्री थे. इन्हें पुरानी दिल्ली में सूफ़ी संत हज़रत बक़ी बिल्लाह की मज़ार के पास दफ़नाया गया था. उन्होंने तफ़सीर-ए-हक़्क़ानी और अन्य किताबें लिखी थीं.''
हक़्क़ानी ने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा है, ''मेरा सरनेम दिल्ली के परिवार से आया. पश्तून हक़्क़ानी को यह टाइटल पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा में अकोरा खट्टक स्थित दारुल उलूम हक़्क़ानिया में पढ़ने के कारण मिला. जलालुद्दीन और उनके परिवार ज़र्दान ट्राइब से हैं. पश्तूनों में कोई हक़्क़ानी ट्राइब नहीं है. अगर जलालुद्दीन हक़्क़ानी, हक़्क़ानी ट्राइब से हैं तो इमरान ख़ान एचिसन और ऑक्सफ़ोर्ड ट्राइब हैं.''
पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मीर ने भी इमरान ख़ान के इस जवाब को ग़लत बताते हुए लिखा है, ''सीएनएन पर इमरान ख़ान को कहते हुए सुना कि हक़्क़ानी अफ़ग़ानिस्तान में ट्राइब हैं. हक़्क़ानी कोई ट्राइब नहीं हैं. ये सभी दारूल उलूम हक़्क़ानिया अकोरा खट्टक के छात्र हैं. इनमें जलालुद्दीन हक़्क़ानी भी शामिल हैं जिन्होंने सोवियत यूनियन को हराने में अहम भूमिका अदा की थी.''
पाकिस्तान में ट्विटर पर हैशटैग हक़्क़ानी और हैशटैग इमरान ख़ान ट्रेंड भी कर रहा है. हक़्क़ानी को ट्राइब बताने पर पाकिस्तान के लोग इमरान ख़ान को आड़े हाथों ले रहे हैं. पत्रकार हिज़्बुल्लाह ख़ान ने इमरान ख़ान के जवाब का वीडियो क्लिप ट्वीट करते हुए लिखा है, ''इमरान ख़ान ने कहा कि अमेरिकी हक़्क़ानी नेटवर्क को नहीं समझते हैं. उसके बाद मैंने इमरान ख़ान की समझ सुनी और उन्होंने हक़्क़ानी को पश्तून ट्राइब बताया जो अफ़ग़ानिस्तान में रहते हैं. पश्तून में कोई भी हक़्क़ानी ट्राइब नहीं है. हक़्क़ानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन हक़्क़ानी जर्दान ट्राइब से थे.''
बेकी एंडर्सन ने इमरान ख़ान से अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों के भविष्य के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''अमेरिका का जैसा संबंध भारत से है, हम भी वैसा ही संबंध चाहते हैं. संबंध एकतरफ़ा नहीं हो सकता. हम अमेरिका से सामान्य संबंध चाहते हैं. दुर्भाग्य से अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी प्रभाव के दौरान पाकिस्तान का संबंध बहुत ही बेकार था.''
इमरान ख़ान ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिए ज़रूरी है कि तालिबान के साथ बात की जाए. इमरान ख़ान ने कहा, ''तालिबान का पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण है. अगर ये समावेशी सरकार की ओर क़दम बढ़ाते हैं और सभी धड़ों को साथ लाते हैं तो अफ़ग़ानिस्तान में 40 साल बाद शांति कायम हो सकती है. लेकिन ये ग़लत राह पर आगे बढ़ते हैं तो इससे गंभीर मानवीय संकट पैदा होगा.''
इमरान ख़ान ने कहा कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय मदद की ओर देख रहा है ताकि किसी भी संकट से बचा जा सके. पाकिस्तानी पीएम ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान को बाहरी ताक़त से कंट्रोल नहीं किया जा सकता है.
पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि वो तालिबान के साथ भी रहा और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी बलों के ऑपरेशन को साथ देने का नाटक भी करता रहा. हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करता रहा है.
2018 में पाकिस्तान ने तालिबान के अहम नेता मुल्ला बरादर को जेल से छोड़ा था. कहा गया था कि अमेरिका से बात करने के लिए जेल से छोड़ा गया था. पिछले हफ़्ते तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार में मुल्ला बरादर को उप-प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की थी.
सोमवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा था कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों का मूल्यांकन करेगा. ब्लिंकन कांग्रेस में विदेश मामलों की समिति के समक्ष बोल रहे थे. ब्लिंकन ने कहा था कि पाकिस्तान के अफ़ग़ानिस्तान को लेकर कई हित हैं और कुछ ऐसे हित भी हैं जिनका अमेरिका से टकराव है.
ब्लिंकन की इस टिप्पणी पर इमरान ख़ान ने सीएनएन को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह अमेरिका की अनभिज्ञता को दर्शाता है. इमरान ख़ान ने कहा कि उन्होंने इस तरह की अनभिज्ञता कभी नहीं देखी.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार को पाकिस्तान ने अभी मान्यता नहीं दी है. पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ़ ने बुधवार को कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार को मान्यता देने पर दुनिया का 'वेट एंड वॉच' वाला रुख़ समस्या और बढ़ा सकता है. यूसुफ़ ने कहा कि पश्चिम के देशों ने 1990 के दशक में जो ग़लती की उससे अर्थव्यवस्था चौपट हुई और अफ़ग़ानिस्तान गृह युद्ध में समा गया.
तालिबान को लेकर अंतरराष्ट्रीय जगत में अभी हलचल थमी नहीं है. पाकिस्तान को लेकर शक़ केवल अमेरिका का ही नहीं बल्कि उसके पड़ोसी देश ईरान का भी बढ़ा है. हाल के दिनों में ईरान की तरफ़ से कई ऐसे बयान आए हैं जिनसे पता चलता है कि पाकिस्तान के अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ते प्रभाव से ईरान चिंतित है.
पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान आज यानी 16 सितंबर को ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन के समिट में शामिल होने रवाना हुए हैं. इस समिट में भारत, चीन और रूस भी हिस्सा ले रहे हैं. ज़ाहिर है, यहाँ भी अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा छाया रहेगा. इस समिट में ईरान के नए राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को भी बुलाया गया है. भारतीय प्रधानमंत्री मोदी वर्चुअल रूप से इस समिट को संबोधित करेंगे. (bbc.com)
(कॉपी: रजनीश कुमार)
काबुल, 16 सितम्बर | अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति अगस्त में तालिबान के कब्जे के बाद से स्थिर बनी हुई है, देश अब आर्थिक और मानवीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। जहां लोग बेहतर जीवन की तलाश में है, वहीं नई सरकार अंतरराष्ट्रीय सहायता की मांग कर रही है। 15 अगस्त के बाद से कोई बड़ी सुरक्षा घटना या सशस्त्र संघर्ष नहीं हुआ है, जब तालिबान ने देश के 34 प्रांतों में से 33 पर कब्जा कर लिया था। हालांकि एक घातक आत्मघाती बम विस्फोट और काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर गोलीबारी की घटना ने सबको दहला दिया था, जिसमें 170 से अधिक अफगान नागरिक और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।
6 सितंबर को, तालिबान ने घोषणा की कि उसके लड़ाकों ने पंजशीर पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है, एकमात्र प्रांत जो समूह के नियंत्रण से बाहर रहा था।
तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि पंजशीर में लड़ाई के दौरान कोई नागरिक हताहत नहीं हुआ, उन्होंने कहा कि प्रांत में बिजली और इंटरनेट सेवा जल्द ही फिर से शुरू हो जाएगी।
तब से पंजशीर में कोई बड़ी झड़प नहीं हुई है, हालांकि तालिबान विरोधी पूर्व नेता अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद के नेतृत्व में तथाकथित नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट ऑफ अफगानिस्तान ने पंजशीर पर कब्जा करने के तालिबान के दावे का खंडन किया है।
मुजाहिद ने कहा, "युद्ध खत्म हो गया है और असुरक्षा और लड़ाई अब अफगानों के लिए चिंता का विषय नहीं है।"
तालिबान के सेनाध्यक्ष कारी फसीहुद्दीन ने बुधवार को कहा कि अफगानिस्तान में जल्द ही देश की रक्षा के लिए एक नियमित सेना होगी।
फसीहुद्दीन ने काबुल में एक सभा में कहा, "अफगानिस्तान के पास देश की रक्षा और सुरक्षा के लिए निकट भविष्य में एक नियमित, अनुशासित और मजबूत सेना होगी और इस क्षेत्र में परामर्श जारी रहेगा। प्रस्तावित सेना के सदस्यों को अच्छी तरह से प्रशिक्षित और अनुशासित किया जाएगा। अफगानिस्तान की रक्षा और रक्षा करें।"
तालिबान सांस्कृतिक आयोग के एनामुल्लाह समांगानी ने कहा कि पूर्व प्रशासन के कुछ पुलिस अधिकारी जल्द ही काबुल और अन्य बड़े शहरों में व्यवस्था बहाल करने के लिए तालिबान अधिकारियों के अधीन काम पर लौट आएंगे।
काबुल निवासी मोहम्मद यामा ने मंगलवार को सिन्हुआ को बताया, "काबुल में तालिबान आतंकवादियों की कोई उच्च उपस्थिति नहीं है, शहर में सुरक्षा स्थिति ठीक है, कार चोरी करने वाले सभी समूह, सड़क पर लुटेरे और आपराधिक गिरोह गायब हो गए।" (आईएएनएस)
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने चेतावनी दी है कि 97 प्रतिशत अफगान 2022 के मध्य तक गरीबी रेखा से नीचे जा सकते हैं जब तक कि देश की राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का तुरंत समाधान नहीं किया जाता।
हाल ही में जारी यूएनडीपी की एक रिपोर्ट के अनुसार, नवीनतम घटनाओं और अनिश्चितताओं ने देश में लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
दुकानें, बाजार और व्यापारिक केंद्र पिछले महीने के अंत में फिर से खुल गए।
हालांकि राजधानी काबुल और अन्य प्रांतों में भोजन, दवाओं या दैनिक आवश्यकताओं की कोई कमी नहीं हुई है, लेकिन बहुत से लोगों के पास अपने दैनिक जीवन के लिए भोजन और आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं।
हाल के दिनों में, काबुल और देश के 34 प्रांतों में सरकारी कार्यालयों ने आंशिक रूप से परिचालन फिर से शुरू किया लेकिन बैंकिंग सेवा अभी तक सामान्य नहीं हुई है, हजारों ग्राहक अपनी बचत निकालने के लिए लंबी लाइनों में इंतजार कर रहे हैं।
उत्तरी कुंदुज प्रांत के मोहम्मद मंसूर ने सिन्हुआ को बताया, "संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान की केंद्रीय बैंक की संपत्ति को फ्रीज करने की रिपोर्ट और विश्व बैंक द्वारा फंड की घोषणा ने हमारी चिंताओं को बढ़ा दिया है।"
देश भर के औद्योगिक पार्कों में लगभग 5,000 छोटे कारखाने अभी भी संसाधनों की कमी के कारण बंद हैं।
28 अगस्त को, अफगान केंद्रीय बैंक ने सभी बैंकों को एक ग्राहक के लिए 200 डॉलर या 20,000 अफगानी की निकासी की साप्ताहिक सीमा निर्धारित करने का आदेश जारी किया।
कार्यवाहक प्रधान मंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद के नेतृत्व में तालिबान की कार्यवाहक सरकार के गठन के बाद, कई मंत्रालयों ने अपने पिछले कर्मचारियों से 17 सितंबर से पहले काम पर लौटने का आग्रह किया है, लेकिन महिला कर्मचारियों को आगे की सूचना की प्रतीक्षा है।
पूर्वी लोगार प्रांत की एक महिला सरकारी कर्मचारी करीमा मलिकजादा ने कहा, "नई सरकार को पुरुषों और महिलाओं को अपने कार्यालयों में फिर से शामिल होने की अनुमति देनी चाहिए और उनके वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए, हमारे पास दैनिक जीवन का खर्च उठाने के लिए कोई अन्य संसाधन नहीं है।"
उसने सिन्हुआ को बताया कि उसने सोचा था कि अफगान लोग तालिबान पर भरोसा करेंगे यदि तालिबान महिलाओं के लिए अपने वादों का सम्मान कर सकता है, जिनमें से कई को अपने बच्चों का समर्थन करने के लिए काम करना पड़ता है।
रविवार को, उच्च शिक्षा के कार्यवाहक मंत्री अब्दुल बकी हक्कानी ने कहा कि महिला छात्र उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में भाग ले सकती हैं लेकिन लड़कों से अलग कक्षाओं में।
इसबीच मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र ने देशों से अफगानिस्तान को 1.2 अरब डॉलर की राशि तत्काल प्रदान करने का आग्रह किया।
विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) से मौसमी खाद्य सहायता पहले से मूल्यांकन किए गए कमजोर परिवारों के लिए एक महीने के भोजन के साथ जारी है।
जवाब में, नई तालिबान सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने कहा, "हम जिनेवा में गिरवी रखे गए 1 अरब डॉलर के हालिया घोषणा के लिए आभारी है।"
मुत्तकी ने कहा, "अफगानिस्तान के लोगों को अभी भी दुनिया से सहायता और सहयोग की आवश्यकता है।"
सैन फ्रांसिस्को, 16 सितम्बर | टाइम की नई प्रकाशित रैंकिंग के अनुसार, एपल के सीईओ टिम कुक और टेस्ला के सीईओ एलोन मस्क जैसे टेक दिग्गज 2021 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल हैं। सीएनईटी की रिपोर्ट के अनुसार, एक वर्चुअल इवेंट के दौरान ऐप्पल ने आईफोन 13 सीरीज, ऐप्पल वॉच सीरीज 7 और अपग्रेड किए गए आईपैड का खुलासा करने के एक दिन बाद कुक को शामिल किया है।
टिम प्रोफाइल में, नाइके के सह-संस्थापक फिल नाइट ने कुक के चरित्र, करुणा और साहस की प्रशंसा की। उन्होंने यह भी नोट किया कि कुक के दशक के दौरान सीईओ के रूप में एप्पल का स्टॉक 1,000 प्रतिशत बढ़ गया है, जिससे यह दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है।
मस्क के बारे में लिखते हुए, हफिंगटन पोस्ट के सह-संस्थापक एरियाना हफिगटन ने कहा कि वह मानव संभावनाओं को बढ़ा रहे हैं।
और यह सब अपने अथक आशावादी, अंतरिक्ष-आधा-पूर्ण प्रदर्शन के साथ करके, वह एक मॉडल पेश कर रहा है कि हम अपने सामने बड़ी, अस्तित्व संबंधी चुनौतियों को कैसे हल कर सकते हैं। उसने लिखा।
दीपलनिर्ंग डॉट एआई के संस्थापक एंड्रयू एनजी ने एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग को कंपनी को अधिक सामान्य कंप्यूटिंग कार्यों के लिए ग्राफिक्स प्रोसेसिंग इकाइयों को अनुकूलित करने का निर्देश देकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आगे बढ़ाने में मदद करने का श्रेय दिया।
एनजी ने हुआंग के बारे में कहा,परिणामी प्रगति - और शक्तिशाली चिप्स - ने एक नींव रखी जो बहुत बड़े तंत्रिका नेटवर्क को समायोजित कर सकती है।
टाइम दुनिया के नेताओं, मशहूर हस्तियों, टेक कंपनी के अधिकारियों, लेखकों, संगीतकारों, एथलीटों और बहुत कुछ को उजागर करने वाली एक वार्षिक सूची साझा करता है। (आईएएनएस)
यूरोपीय संघ के न्याय आयुक्त ने कहा है कि पेगासस स्पाईवेयर जासूसी विवाद के बाद कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और राजनेताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए तेजी से कानून बनाना चाहिए.
यूरोपीय संघ के न्याय आयुक्त डिडियर रेयंडर्स ने यूरोपीय संसद से कहा है कि पेगासस स्पाईवेयर जासूसी विवाद के बाद कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और नेताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए तेजी से कानून बनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अवैध फोन हैकिंग के अपराधियों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
रेयंडर्स ने यूरोपीय संसद के सदस्यों को बताया कि यूरोपीय आयोग ने राष्ट्रीय सुरक्षा सेवाओं द्वारा अपने फोन के माध्यम से राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अवैध रूप से जानकारी जुटाने के कथित प्रयासों की "पूरी तरह से निंदा" की है.
रेयंडर्स ने कहा, "कोई भी संकेत है कि गोपनीयता की इस तरह की घुसपैठ वास्तव में हुई है तो इसकी पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए और संभावित उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों को न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए. यह निश्चित रूप से, यूरोपीय संघ के प्रत्येक सदस्य देश की जिम्मेदारी है." उन्होंने आगे कहा, "मुझे उम्मीद है कि पेगासस के मामले में सक्षम अधिकारी आरोपों की पूरी तरह से जांच करेंगे और भरोसा कायम करेंगे."
उन्होंने साथ ही कहा कि ईयू की कार्यकारी शाखा हंगरी के डेटा संरक्षण प्राधिकरण की जांच का बारीकी से पालन कर रही है, जिसमें दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान की सरकार पत्रकारों, मीडिया मालिकों और विपक्षी नेताओं की पेगासस सॉफ्टवेयर के साथ निशाना बनाने वालों में शामिल थी.
पेगासस एक स्पाईवेयर है जिसके जरिए स्मार्टफोन्स हैक करके लोगों की जासूसी की जा सकती है. यह पहली बार नहीं है जब पेगासस का नाम जासूसी संबंधी विवादों में आया हो. 2016 में भी कुछ शोधकर्ताओं ने कहा था कि इस स्पाईवेयर के जरिए युनाइटेड अरब अमीरात में सरकार से असहमत एक कार्यकर्ता की जासूसी की गई.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं जैसे वॉशिंगटन पोस्ट, गार्डियन और ला मोंड व जर्मनी में ज्यूडडॉयचे त्साइटुंग ने पेगासस जासूसी कांड की जांच में हिस्सा लिया था. जांच के बाद दावा किया गया है कि 50 हजार फोन नंबरों को जासूसी के लिए चुना गया था. इनमें दुनियाभर के 180 से ज्यादा पत्रकारों के फोन नंबर शामिल हैं.
इस बीच भारतीय सुप्रीम कोर्ट में पेगासस विवाद पर सुनवाई चल रही है. कोर्ट विभिन्न दिशा-निर्देशों की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट इस मामले में एक अहम आदेश जारी कर सकती है.
एए/सीके (एएफपी, एपी)
जापान की बूढ़ी होती आबादी को यातायात की सुविधा की जरूरत है जिसे देश स्वचालित गाड़ियों से पूरी करना चाह रहा है. हालांकि हाल ही में हुए एक हादसे ने इस राह में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित कर दिया है.
जापान के अलावा और भी कई देशों की सड़कों पर सेल्फ ड्राइविंग गाड़ियां दौड़ रही हैं, लेकिन जापान की सरकार ने टेक्नोलॉजी को तेजी से विकसित करने को एक अहम प्राथमिकता बनाया है. पिछले साल जापान कुछ स्थितियों में पूरा नियंत्रण ले लेने वाली गाड़ियों को सार्वजनिक रास्तों पर चलने की अनुमति देने वाला पहला देश बन गया.
इस हॉन्डा कार को "लेवल थ्री" की स्वायत्ता दी गई है, यानी ये कुछ निर्णय खुद ही ले सकती है. हां, आपात स्थिति में कार का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेने के लिए एक चालक का तैयार रहना जरूरी है.
बूढ़ी आबादी की चुनौतियां
सरकार ने और ज्यादा विकसित होते स्वचालित वाहनों को प्रोत्साहन देने के लिए कानून को भी बदल दिया है. अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्रालय (एमईटीआई) की 2025 तक पूरे देश में 40 स्थानों पर स्वचालित टैक्सियों पर परीक्षण करनी की व्यवस्था बनाने की योजना है.
इस नीति के पीछे एक गंभीर समस्या को सुलझाने की चाह है. जापान की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा बूढ़ी आबादी है और देश में निरंतर कामगारों की कमी रहती है. हाल ही में आई एमईटीआई की एक रिपोर्ट कहती है, "कार्गो और यातायात क्षेत्रों में चालकों की उम्र बढ़ गई है और मानव संसाधनों की कमी एक गंभीर समस्या बन गई है."
रिपोर्ट ने "बुजुर्ग चालकों की गलतियों की वजह से होने वाले काफी बुरे ट्रैफिक हादसों" की चेतावनी भी दी. अब जब मांग स्पष्ट है, तो गाड़ियां बनाने वाली स्थानीय कंपनियां तकनीक को विकसित करने के लिए तैयार हो रही हैं.
सबसे ज्यादा गाड़ियां बेचने वाली कंपनी टोयोटा माउंट फूजी की तराई में एक स्मार्ट शहर बना रही है और वहां कुछ चुनी हुई सड़कों पर उसकी "ई-पायलट" स्वचालित बसों को चालाने की योजना है.
ये बसें टोक्यो 2020 खेलों के दौरान खिलाड़ियों के रहने के लिए लिए बनाए गए विलेज में चलाई गई थीं लेकिन एक हादसे के बाद के इस परियोजना को कुछ समय के लिए रोक दिया गया था.
स्वचालित तकनीक की सीमा
एक स्वचालित बस ने एक नेत्र-बाधित पैरालंपिक खिलाड़ी को ठोकर मार दी थी और हल्का जख्मी कर दिया था. बस की स्वचालित प्रणाली को खिलाड़ी के सामने होने का पता चल गया था और बस रुक गई थी, लेकिन बस में बैठे एक चालाक ने स्वचालित प्रक्रिया को रद्द कर अपने नियंत्रण में ले लिया था.
ब्रोकरेज कंपनी सीएलएसए में जापान रिसर्च के प्रमुख और एक ऑटोमोटिव विशेषज्ञ क्रिस्टोफर रिक्टर का मानना है कि यह हादसा यह दर्शाता है कि अभी इस क्षेत्र को और कितना आगे जाना है.
उन्होंने बताया, "लोगों ने कहा था कि स्वचालित तकनीक इस तरह के नियंत्रित स्थानों के लिए तैयार है लेकिन वहां भी वो फेल हो गई." उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण जापान के लिए स्वचालित गाड़ियां "एक जरूरत बन जाएंगी."
रिक्टर ने कहा, "मैं समझ रहा हूं कि क्यों ये सरकार और गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों के लिए एक प्राथमिकता है लेकिन मुझे स्वचालित तकनीक के बड़े स्तर पर कम से कम हमारे दशक में आने के तो आसार नजर नहीं आ रहे हैं."
जापानी कंपनियां मानती हैं कि इसमें कितना समय लगेगा यह इस समय कह पाना मुश्किल है. निसान ने जब 2018 में अपनी "ईजी राइड" स्वचालित टैक्सी पर ट्रायल शुरू किया था तब कंपनी ने कहा था वो उम्मीद कर रही है कि 2020 के दशक की शुरुआत से ही ये टैक्सियां व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हो जाएंगी.
लेकिन कंपनी में रिसर्च के वैश्विक उपाध्यक्ष काजुहीरो दोई अब ज्यादा सावधान हैं. उन्होंने बताया कि स्वचालित गाड़ियों की "सामजिक स्वीकृति ज्यादा नहीं है. बहुत कम लोगों को स्वचालित ड्राइविंग का तजुर्बा है. मुझे लगता है कि बिना तजुर्बे के इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह बहुत ही नया है."
सीके/एए (एएफपी)
अमेरिका अंतरराष्ट्रीय यात्राओं की नई व्यवस्था तैयार कर रहा है. इस व्यवस्था में लोगों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को संभव बनाया जाएगा. फिलहाल ज्यादातर देशों के साथ अमेरिका ने सीमाएं बंद कर रखी हैं.
अमेरिका का कहना है कि जब कोरोना वायरस के कारण लगीं पाबंदियां हटाई जाएंगी और अंतरराष्ट्रीय यात्रा शुरू हो जाएगी, तब एक नया सिस्टम इस्तेमाल किया जाएगा. बुधवार को व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी जेफ जिएंट्स ने कहा कि अमेरिका के ट्रैवल एंड टूरिज्म बोर्ड की फिलहाल पाबंदियां हटाने की कोई योजना नहीं है.
कोरोना वायरस के लिए प्रतिक्रिया संयोजक जिएंट्स ने कहा कि अमेरिका और बाकी दुनिया में भी डेल्टा वेरिएंट के बढ़ते मामलों के चलते फिलहाल यात्राओं पर प्रतिबंध लगा रहेगा.
कैसा होगा नया सिस्टम?
अगस्त में ऐसी खबरें आई थीं कि अमेरिका ऐसे नियम बना रहा है जिनसे वैक्सीन ले चुके लोगों को यात्राओं की सुविधा दी जा सकती है. पहले भी सरकार कह चुकी है कि अमेरिका आने के लिए टीका लगवाना अनिवार्य कराए जाने पर विचार किया जा रहा है.
बुधवार को जिएंट्स ने कहा, "जब हम ज्यादा लोगों को अमेरिका की यात्रा की इजाजत देंगे, तब भी अमेरिकी लोगों को भरोसा होना चाहिए कि नई व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है." उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था ही मौजूदा पाबंदियों की जगह लेगी.
जिएंट्स ने कहा, "हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि विदेशियों को अमेरिका आने के लिए वैक्सीन लगवाना जरूरी किया जाए या नहीं."
घरेलू स्थिति भी जरूरी
अमेरिका की वाणिज्य मंत्री जीना राएमोंडो भी उस बैठक में मौजूद थीं, जहां यह चर्चा हुई. उन्होंने कहा कि कोविड के मामलों में बार बार हो रही वृद्धि यात्रा प्रतिबंधों को हटाने नहीं दे रही है. उन्होंने कहा, "हम एक मीट्रिक्स आधारित व्यवस्था लाना चाहते हैं. लेकिन वैसा करने से पहले हमें अपने यहां की स्थिति नियंत्रित करनी होगी, जिसके लिए जरूरी है कि सबको टीका लग जाए."
जिएंट्स ने कहा कि नई योजना "ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा मजबूत और स्थिर होगी." उन्होंने यह तो नहीं बताया कि कब से यह नई योजना लागू की जा सकती है लेकिन कहा, "टीकाकरण की दर पर निर्भर करता है. घरेलू स्तर पर भी और दूसरे देशों में भी." उन्होंने यात्रा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों जैसे एयरलाइंस आदि को अपने कर्मचारियों का टीकाकरण जल्द से जल्द कराने का आग्रह भी किया.
जिएंट्स ने कहा कि सरकार जल्द से जल्द प्रतिबंध हटाना चाहती है. उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग भी शामिल होगी, जिसके लिए अमेरिका की यात्रा करने वाले लोगों की जानकारियां जमा की जाएंगी.
2020 में ट्रंप सरकार ने ऐसी जानकारियां जमा करने के प्रस्ताव को तब रोक दिया था जब कुछ मंत्रियों ने निजता के अधिकार की चिंताएं जाहिर की थीं.
कब हटेंगे प्रतिबंध
कुछ औद्योगिक क्षेत्रों का मानना है कि बाइडेन सरकार 2022 से पहले यात्रा प्रतिबंध नहीं हटाएगी. अमेरिका ने पिछले साल जनवरी में ही यात्रा प्रतिबंध लगा दिए थे जब चीन में कोरोना वायरस से कई मौतें हो चुकी थीं. पहले ये प्रतिबंध सिर्फ चीन पर थे लेकिन धीरे धीरे इनमें नए देश जोड़े जाते रहे. भारत का नाम इस सूची में इस साल मई में ही जोड़ा गया था.
फिलहाल जो लोग बीते 14 दिनों में ब्रिटेन, यूरोप के शेनेगन इलाके के 26 देशों, आयरलैंड, चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और ब्राजील में रहे हों, उन्हें अमेरिका की यात्रा की इजाजत नहीं है. इसके अलावा मेक्सिको और कनाडा से भी गैर जरूरी यात्राओं पर प्रतिबंध है.
आलोचकों का कहना है कि इस सूची का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इसमें ऐसे कई देश शामिल नहीं हैं जहां कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बहुत ज्यादा हैं.
वीके/एए (रॉयटर्स)
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने एक नया समझौता किया है जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बी बनाने की तकनीक मिलेगी. अपने पड़ोस में हुए इस समझौते को चीन ने "शीत युद्ध वाली सोच" बताया है.
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और युनाइटेड किंग्डम ने मिलकर एक नया रक्षा समूह बनाया है जो विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर केंद्रित होगा. इस समूह के समझौते के तहत अमेरिका और ब्रिटेन अपनी परमाणु शक्तिसंपन्न पनडुब्बियों की तकनीक ऑस्ट्रेलिया के साथ साझा करेंगे. इस कदम को क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता के बरअक्स देखा जा रहा है.
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के साथ ऑनलाइन बैठक की. बैठक के बाद तीनों नेताओं ने नए गठबंधन का ऐलान एक वीडियो के जरिए किया.
इस गठबंधन में शामिल तीनों देश साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पानी के नीचे की क्षमताओं समेत अपनी तमान सैन्य क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए एक दूसरे से तकनीक साझा करेंगे. यह गठबंधन इसलिए अहम माना जा रहा है कि चीन के अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही के साथ संबंध लगातार खराब हो रहे हैं.
‘ऐतिहासिक समझौता'
वीडियो लिंक के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने बैठक के दौरान कहा, "आज हम एक और ऐतिहासिक कदम उठा रहे हैं और तीनों देशों के सहयोग को औपचारिक करते हुए और गहरा कर रहे हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम सभी हिंद प्रशांत क्षेत्र में लंबे समय तक शांति और स्थिरता बने रहने की अहमियत समझते हैं."
ये तीनों देश पहले से ही फाइव आइज नाम के उस गठबंधन का हिस्सा हैं जिसमें कनाडा और न्यूजीलैंड भी शामिल हैं और एक दूसरे से खुफिया सूचनाएं साझा करते हैं. ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि तीनों साझीदार एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं.
जॉनसन ने कहा, "हम अपनी मित्रता का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं और पहला काम है ऑस्ट्रेलिया को परमाणु शक्ति संपन्न पनडुब्बियां उपलब्ध कराना." जॉनसन ने इस बात पर जोर दिया कि ऑस्ट्रेलिया को उपलब्ध कराए जाने वाली पनडुब्बी में परमाणु रिएक्टर होंगे ना कि परमाणु हथियार. उन्होंने कहा, "हमारा काम परमाणु अप्रसार संधि की शर्तों के दायरे में होगा."
ऑस्ट्रेलिया को मिलेगी ताकत
इस समझौते के बाद ऑस्ट्रेलिया दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन जाएगा जिसे अमेरिका ने अपनी परमाणु पनडुब्बी की तकनीक दी है. ऐसा अमेरिका ने पहले सिर्फ ब्रिटेन के साथ किया है.
इस समझौते का अर्थ यह भी है कि ऑस्ट्रेलिया की फ्रांस से नई पनडुब्बियां खरीदने की योजना अब रद्द हो सकती है. ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि ब्रिटेन और अमेरिका के सहयोग से यह पनडुब्बी ऐडिलेड में बनाई जाएगी.
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया क्वाड समूह का भी हिस्सा हैं, जो भारत और जापान के साथ मिलकर हिंद प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी के लिए बनाया गया है. अगले हफ्ते क्वाड की पहली ऐसी बैठक होनी है जिसमें सारे सदस्य देशों के नेता आमने सामने मिलेंगे. अमेरिका में होने वाली इस बैठक के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वॉशिंगटन में होंगे.
अमेरिका-चीन तनाव
ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूके का यह समझौता भले ही एक सैन्य संगठन है लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात पर सावधानी बरती कि इसे चीन के खिलाफ एक समझौते के रूप में पेश ना किया जाए.
वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने इस समझौते की प्रतिक्रिया में फिर कहा कि पश्चिमी देश "शीत युद्ध की मानसिकता और वैचारिक पूर्वाग्रहों को झाड़ दें."
जो बाइडेन सरकार के आने के बाद अमेरिका चीन पर कई कड़े प्रतिबंध लगा चुका है. शिनजियांग और हांग कांग में मानवाधिकारों के हनन जैसे मुद्दे और कोरोना वायरस महामारी की उत्पत्ति की जांच में आनाकानी जैसे विषयो पर वह चीन की आलोचना करता रहा है.
वैसे, पिछले दिनों बाइडेन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ डेढ़ घंटा लंबी बातचीत की थी. बुधवार को बाइडेन ने कहा कि वह चीन के साथ महामारी और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर काम करने को तैयार हैं लेकिन साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की गतिविधियों से वह और उनके सहयोगी देश चिंतित भी हैं.
वीके/एए (डीपीए, एपी, रॉयटर्स)
हमजा अमीर
काबुल, 15 सितम्बर | अफगानिस्तान में तालिबान के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अमेरिका और पश्चिमी दुनिया को उन वादों की याद दिलाई है, जो अमेरिका ने इसके शीर्ष नेतृत्व को वैश्विक प्रतिबंधों और आतंकी सूची से हटाने के लिए किए थे, जिसमें इसकी सरकार की वैधता सुनिश्चित करने का वादा भी शामिल था।
तालिबान ने वाशिंगटन से अपने वादे को पूरा करने और अफगानिस्तान में सरकार की स्थापना की अनुचित आलोचना से दूर रहने का आह्वान किया है।
तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यवाहक विदेश मंत्री, अमीर मुत्ताकी ने खुलासा किया कि अमेरिका तालिबान सरकार को वैधता सुनिश्चित करने और उसके नेताओं को वैश्विक प्रतिबंध सूची से हटाने तथा दोहा समझौते में नामित आतंकवादियों की सूची से उनके नामों को हटाने के लिए सहमत हुआ था, जिसके कारण अफगानिस्तान से विदेशी बलों की वापसी हुई है।
मंत्री ने कहा, दोहा समझौते के दौरान, अमेरिका ने लिखित में दिया था कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार की वैधता सुनिश्चित करेगा और तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के नामों को वैश्विक प्रतिबंधों और नामित सूचियों से हटाना भी सुनिश्चित करेगा।
यह बयान महत्वपूर्ण है, क्योंकि पश्चिमी देश अफगानिस्तान में तालिबान के अंतरिम सेटअप की आलोचना कर रहे हैं, जिसमें उन लोगों के नाम हैं, जिनके खिलाफ वैश्विक प्रतिबंध हैं, इसके अलावा उनके सिर पर लाखों डॉलर के इनाम भी हैं।
अमेरिका के साथ ही पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कहा है कि उनके लिए संदिग्ध इतिहास और वैश्विक प्रतिबंधों के साथ फिलहाल तालिबान नेतृत्व को पहचानना मुश्किल है और वह कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते हैं।
हालांकि, तालिबान का नवीनतम बयान यह खुलासा करता है कि तालिबान नेतृत्व के लिए वैश्विक वैधता दोहा समझौते का हिस्सा है, जिस पर वाशिंगटन द्वारा परस्पर सहमति व्यक्त की गई है, निश्चित रूप से इस तरह की प्रतिबद्धता के पीछे तर्क और आधार पर भौंहें चढ़ सकती हैं।
दूसरी ओर, वाशिंगटन अंतरिम तालिबान सरकार को कोई मान्यता या वैधता देने से इनकार करना जारी रखे हुए है और इसने जोर देकर कहा है कि जब तक तालिबान अंतरराष्ट्रीय मांगों और चिंताओं को पूरा नहीं करता, तब तक कोई मान्यता नहीं दी जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मांगों में महिलाओं और अन्य जातीय समूहों के प्रतिनिधित्व के साथ एक समावेशी सरकार का गठन, महिलाओं के अधिकारों का प्रावधान और अफगानिस्तान को आतंकवादी संगठनों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह में नहीं बदलने पर सकारात्मक प्रतिबद्धता शामिल है, जो अमेरिका के साथ ही क्षेत्र और बाकी दुनिया के लिए एक प्रमुख सुरक्षा चिंता का विषय बन सकता है।
लेकिन तालिबान का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सभी मांगों को पहले ही पूरा किया जा चुका है, क्योंकि उनका दावा है कि वर्तमान अंतरिम सरकार वास्तव में एक समावेशी सरकार है।
कार्यवाहक विदेश मंत्री मुत्ताकी ने कहा, मौजूदा अंतरिम सरकार एक समावेशी सरकार है और इसमें सभी जातियों का प्रतिनिधित्व है। हमने शुरू से ही यह कहा है कि हमारी धरती को आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा और अफगानिस्तान में महिलाएं अपनी शिक्षा और काम जारी रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
उन्होंने कहा, मैं फिर से यह कहना चाहता हूं कि यह एक अंतरिम सरकार है और जब तक हम स्थायी सरकार नहीं बना लेते, तब तक व्यवस्था में बदलाव किए जाएंगे।
(आईएएनएस)
मृत्युंजय कुमार झा
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) पाकिस्तानी मदरसों से निकले अपने युवा रंगरूटों से कहता है, "जब आप आत्मघाती हमलावर के रूप में शहीद होंगे, तो शराब की नदी के अलावा 'जन्नत' (स्वर्ग) में बॉलीवुड अभिनेत्रियां आपका स्वागत करेंगी।"
फ्रांस की मीडिया फ्रांस24 द्वारा बनाया गया एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो क्लिप में पाकिस्तानी सेना का एक अधिकारी टीटीपी के सुरक्षित घरों में से एक का दौरा कर रहा है, जिसे संग्रहालय में बदल दिया गया है। इसमें टीटीपी के खिलाफ विभिन्न सैन्य अभियानों से एकत्र की गई वस्तुएं हैं।
अधिकारी कहते हैं, "उत्तरी वजीरिस्तान में विभिन्न आकार के ऐसे कम से कम 300 सेफहाउस हैं। हमने इस संग्रहालय में उनके शोकेश से लिए गए सभी उपकरण और वस्तुओं को एकत्र किया है।"
ट्विटर पर पोस्ट की गई इस छोटी सी वीडियो क्लिप में पाकिस्तानी सेना अधिकारी टीटीपी से पकड़े गए अमेरिकी हमवी को दिखा रहा है। फिर वह कैमरा क्रू को एक कमरे में ले जाता है, जहां युवा रंगरूटों का आतंकवादी संगठन द्वारा ब्रेनवॉश किया गया था।
अधिकारी ने दीवार पर रानी मुखर्जी, काजोल जैसी बॉलीवुड अभिनेत्रियों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए कहा, "इस कमरे में उन्होंने स्वर्ग की एक पूरी तस्वीर का चित्रण किया है, जो माना जाता है कि युवा आत्मघाती हमलावर की प्रतीक्षा कर रहा है। आत्मघाती हमलावर बनने वाले युवा लड़कों को यहां लाया गया और कुछ दिनों के लिए रखा गया। उन्हें बताया गया कि जब वे स्वर्ग में पहुंचेंगे तो शराब की नदी में अपनी आंखें खोलेंगे और वहां सुंदर महिलाएं खुले हाथों से उनका अभिवादन करेंगी।"
पाकिस्तानी पत्रकार गुल बुखारी ट्विटर पर कहती हैं, "यह इतना मजेदार है और इतना दुखद भी कि मैं बयां नहीं कर सकती। मेरा मतलब है काफिर अभिनेत्रियां और शराब की नदियां? ये सभी चीजें जो इस जीवन में प्रतिबंधित हैं, सबकुछ इन गरीब बच्चों को देंगे जो खुद को उड़ाते हैं।"
वीडियो क्लिप फ्रांस द्वारा बनाई गई 'शांति के लिए एक लंबी सड़क : पाकिस्तान के आदिवासी क्षेत्र' शीर्षक वाली समाचार रिपोर्ट का हिस्सा है।
रिपोर्ट कहती है, "जैसा कि तालिबान ने एक बार फिर से अफगानिस्तान पर नियंत्रण कर लिया है, हम आपको एक ऐसी जगह पर ले जाते हैं, जहां उनके सदस्यों को अक्सर शरण मिलती है। अफगान सीमा पर स्थित, पाकिस्तान के कबायली इलाकों को कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा लंबे समय से अस्थिर कर दिया गया है, जो वहां दंड से मुक्ति के साथ काम करते थे, चूंकि पाकिस्तानी कानून इस क्षेत्र में लागू नहीं होता।"
अफगान तालिबान की खुशी के बीच पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान घबराया हुआ है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर टीटीपी या पाकिस्तान तालिबान द्वारा एक दर्जन से अधिक हमले हुए हैं, जिनमें आत्मघाती हमलावरों द्वारा छह हमले शामिल हैं, जिसमें 30 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं।
पाकिस्तान ने हाल ही में तालिबान से माफी के बदले में टीटीपी लड़ाकों को हथियार सौंपने के लिए मजबूर करने के लिए कहा है, लेकिन तालिबान ने जवाब दिया कि वह टीटीपी सदस्यों को नहीं सौंपेगा और पाकिस्तानी एजेंसियों से कहा कि टीटीपी का मुद्दा अफगानिस्तान को हल करने के लिए नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी सरकार और उसके धार्मिक उलेमाओं द्वारा हल किया जाएगा।"
तालिबान नेताओं ने दोहराया कि तालिबान का रुख यह है कि किसी अन्य देश की शांति को नष्ट करने के लिए अफगान धरती का इस्तेमाल किसी के द्वारा नहीं किया जाएगा।
लेकिन पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान चिंतित है, और यह पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के बयानों में परिलक्षित होता है, जो सीपीईसी परियोजनाओं और उसके चीनी श्रमिकों पर बढ़ते हमलों के बाद अपने 'लौह भाई' चीन के भारी दबाव में है।
(यह सामग्री इंडियानैरेटिव के साथ एक व्यवस्था के तहत की जा रही है)
--इंडियानैरेटिव
एसजीके/एएनएम
काठमांडू, 15 सितम्बर| नेपाल-भारत रेलवे सेवा समझौते में संशोधन के दो महीने बाद निजी क्षेत्र की मालगाड़ी भारत से पहली बार बुधवार को नेपाल पहुंची। यह नौ जुलाई को नेपाल और भारत के बीच रेल सेवा समझौते में संशोधन के बाद संभव हुआ है, जिसमें 17 साल के अंतराल के बाद भारतीय कंटेनरों का एकाधिकार टूट गया है।
नेपाल के सीमावर्ती शहर बीरगंज में बुधवार सुबह मालगाड़ी पहुंची। नेपाल इंटरमॉडल ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट कमेटी के अनुसार, हिंद टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड की एक रैक कार्गो ट्रेन सुबह 10 बजे बीरगंज स्थित ड्राई पोर्ट पर पहुंची।
17 साल पुराने रेलवे सेवा समझौते में संशोधन ने उन बाधाओं को दूर कर दिया है, जिनका नेपाल लंबे समय से सामना कर रहा था, खासकर इसे भारतीय रेलवे माल सेवाओं के माध्यम से माल के आयात और निर्यात को लेकर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था।
भारत और नेपाल के बीच रेल संपर्क को बढ़ावा देने के लिए नए समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के तहत दोनों देशों के सभी निजी कार्गो ट्रेन ऑपरेटर अब एक-दूसरे के रेल नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकेंगे। अभी तक यह कार्य केवल सरकारी कंपनी कोनकोर ही करती थी। समझौते के तहत दोनों देश किसी तीसरे देश में माल के निर्यात या आयात के लिए भी रेल नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकेंगे।
नेपाल के निर्यातक निजी ट्रेन के जरिए अपना माल भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचा सकेंगे। भारत और नेपाल के बीच रेल संपर्क समझौता 2004 में हुआ था, मगर उसके बाद कई मौकों पर इसमें संशोधन होता रहा है। समझौते में हर पांच वर्ष में समीक्षा का प्रावधान है, ताकि उसमें आवश्यकता के अनुसार बदलाव किए जा सकें। उम्मीद जताई जा रही है कि ताजा समझौते से दोनों देशों के रेल नेटवर्क के विकास में मदद मिलेगी और उसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी होगी।
समझौता भारत की रेलवे माल सेवाओं को रक्सौल/बीरगंज के अलावा अन्य सीमा बिंदुओं से माल लाने और माल लेने की अनुमति देता है।
समिति के कार्यकारी निदेशक आशीष गजुरेल ने बताया कि हल्दिया से खाद्य उत्पादों के 90 कंटेनर लेकर ट्रेन बुधवार को ड्राई पोर्ट पर पहुंची। उन्होंने साझा किया कि हिंद टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड सप्ताह में दो बार कार्गो आयात करेगा, जबकि अन्य चार कंपनियों ने भी कार्गो परिवहन में अपनी रुचि दिखाई है।
परिवहन के लिए कार्गो कंपनियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है क्योंकि निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित कार्गो ट्रेनों को इसके लिए अनुमति दी गई है।
2004 में नेपाल और भारत के बीच हस्ताक्षरित रेलवे सेवा समझौते ने भारतीय रेलवे के एक सहयोगी संगठन, भारतीय कंटेनर निगम का एकाधिकार स्थापित किया था।
जिस तरह से नेपाल और भारत अधिक सीमा पार रेलवे नेटवर्क का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं, विशेषज्ञों और अधिकारियों ने कहा है कि इस समझौते ने नेपाल-भारत व्यापार और पारगमन क्षेत्रों में सहयोग के नए रास्ते खोले हैं।
संशोधित रेलवे सेवा समझौते का एक अन्य प्रमुख पहलू यह है कि सभी प्रकार के वैगन, जो भारत के भीतर भारतीय रेलवे नेटवर्क पर माल ढुलाई कर सकते हैं, वे भी नेपाल से माल ढो सकते हैं। पहले यह सुविधा केवल कुछ प्रकार के वैगनों तक ही सीमित थी।
अधिकारियों के अनुसार, उदारीकरण विशेष रूप से ऑटोमोबाइल के लिए परिवहन लागत को कम करेगा, जो विशेष वैगनों पर ले जाया जाता है, जो 2004 के रेलवे सेवा समझौते में सूचीबद्ध नहीं थे, क्योंकि वे तब मौजूद नहीं थे। (आईएएनएस)
योनास गार स्तोर के चुनावी अभियान का नारा था, आम आदमी. लेकिन नॉर्वे के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे स्टोर एक अरबपति हैं जो पहली नजर में कहीं से भी आम आदमी नहीं लगते.
सोमवार को आए शुरुआती नतीजों में विपक्षी वामपंथी गठबंधन के चुनाव जीतने की प्रबल संभावना बताई गई थी. इस सरकार का नेतृत्व 61 वर्षीय स्तोर के हाथों में हो सकता है, जिन्हें फिलहाल विभिन्न दलों के साथ गठजोड़ की कोशिशें करनी हैं.
स्तोर का चुनाव अभियान नॉर्वे में असमानता दूर करने के नारे पर आधारित था. उन्होंने देश में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई का मुद्दा उठाया. वैसे विकसित देशों में नॉर्वे सबसे समान समाजों में से एक है लेकिन अब तक सरकार में रही दक्षिणपंथी पार्टी के शासनकाल में देश में अरबपतियों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है.
विरासत के धनी
अपने अभियान के दौरान स्तोर ने बार-बार कहा, "अब आम लोगों की बारी है.” हालांकि उनका यह नारा उनकी जिंदगी के उलट है. वह डेढ़ करोड़ डॉलर से ज्यादा की संपत्ति के मालिक हैं. पर इसकी सफाई में वह कहते हैं, "मेरी दौलत साधारण नहीं है लेकिन मेरी बहुत सी बातें साधारण हैं.”
तीन बच्चों के पिता स्तोर कई मायनों में खानदानी विरासत के मालिक हैं. उनकी दौलत का मुख्य स्रोत स्टोव बनाने वाली उनकी पारिवारिक कंपनी को बेचने से मिला धन है. इस कंपनी को कभी उनके दादा ने दीवालिया होने से बचाया था
राजनीति भी स्तोर को विरासत में मिली है. पूर्व प्रधानमंत्री येन्स स्टोल्टेनबर्ग उनके मित्र ही नहीं मार्गदर्शक भी रहे हैं और उन्हीं के नक्शेकदम पर चलकर स्तोर आज प्रधानमंत्री पद के इतने करीब पहुंच गए हैं. स्टोल्टनबर्ग सरकार में वह 2005 से 2012 के बीच विदेश मंत्री और फिर 2012-13 में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं.
पार्टी में अंतर्विरोध
जब 2014 में स्टोल्टनबर्ग को नाटो का अध्यक्ष नामित किया गया तो लेबर पार्टी के नेता के तौर पर उनकी जगह लेने के लिए स्तोर का नाम स्वाभाविक माना गया. हालांकि आमतौर पर मजदूर-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती आई लेबर पार्टी की कमान एक अरबपति के हाथों में सौंपना बहुत से लोगों के गले नहीं उतरा था.
स्तोर की शख्सियत विरोधाभासों और विविधताओं से भरी हुई है. उन्होंने पैरिस में साइंस की पढ़ाई की तो कुछ दिन लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में भी बिताए. हार्वर्ड लॉ स्कूल में वह एक शोधकर्ता रह चुके हैं. उनकी शख्सियत में अरबपतियों की चकाचौंध है, तकनीकवेत्ताओं सी बेपरवाही भी. वह बढ़िया फ्रेंच बोलते हैं जो उन्हें एक अमीरजादे सा पेश करता है. और यही बात लेबर पार्टी के उनके वामपंथी सहयोगियों में से बहुतों को पसंद नहीं.
एक संपादक ने एक बार स्तोर के बारे में कहा था कि वह "उलटी तरफ से सामाजिक सीढ़ी चढ़े हैं”. जहाज तोड़ने वाले पिता और लाइब्रेरियन मां की संतान स्तोर पहली मई को मजदूर दिवस के मौके पर नॉर्वे का झंडा फहराने लगे हैं क्योंकि ऐसा न करने के लिए उनकी आलोचना हुई थी.
सबको खुश रखने की कला
राजनीतिक विश्लेषक योहानेस ब्रेग ने चुनाव से पहले उनके बारे में कहा था, "वह एक ऐसे नेता हैं जिनका कई बार लोग मजाक उड़ाते हैं, एक ऐसा बुद्धिजीवी तो लेबर पार्टी में बाहर का आदमी लगता है लेकिन अभियान में उन्होंने बढ़िया काम किया.”
स्तोर की भाषणकला के लगभग सभी कायल हैं. हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस खूबी का इस्तेमाल स्तोर भ्रमित करने के लिए करते हैं. उनके मार्गदर्शक स्टोल्टनबर्ग ने उन्हें पार्टी नेतृत्व सौंपते हुए कहा था, "जोनास एक असाधारण व्यक्ति हैं. वह खूब जानते हैं. और बहुत मेहनत कर सकते हैं. इस सबको वह अपने आसपास के लोगों को खुश रखने के गुण के साथ मिलाकर इस्तेमाल करते हैं.”
रिपोर्टः वीके/सीके (एएफपी)
काबुल को कब्जाने के एक महीने बाद तालिबान कई बड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है. देश में सूखा और अकाल फैल रहे हैं और डर है कि इस महीने के अंत तक 1.4 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच सकते हैं.
चार दशक लंबे युद्ध और हजारों लोगों की मौत के बाद अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुकी है. पिछले 20 सालों में विकास के नाम पर खर्च किए गए अरबों डॉलर भी स्थिति को बेहतर नहीं बना पाए.
सूखे और अकाल की वजह से हजारों लोग ग्रामीण इलाकों को छोड़ कर शहरों की तरफ जा रहे हैं. विश्व खाद्य कार्यक्रम को डर है कि इसी महीने के अंत तक भोजन खत्म हो सकता है और करीब 1.4 करोड़ लोग भुखमरी के कगार तक पहुंच सकते हैं.
जिंदा रहने का सवाल
अभी तक पश्चिमी देशों ने ज्यादा ध्यान इन सवालों पर दिया है कि नई तालिबान सरकार महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण देने का अपना वादा निभाएगी या नहीं या अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों को शरण देगी या नहीं. लेकिन कई आम अफगानियों के लिए जिंदा रहना ही मुख्य प्राथमिकता है.
काबुल में रहने वाले अब्दुल्ला कहते हैं, "हर अफगान, बच्चा हो या बड़ा, भूखा है, उनके पास आटा और खाना पकाने का तेल तक नहीं है." बैंकों के बाहर अभी भी लंबी कतारें लग रही हैं. देश के खत्म होते पैसों को बचाए रखने के लिए एक सप्ताह में 200 डॉलर से ज्यादा निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.
पूरे काबुल में जहां तहां अस्थायी बाजार लग गए हैं जिनमें लोग नकद पैसों के लिए घर का सामान बेच रहे हैं. हालांकि सामान खरीदने की स्थिति में भी बहुत कम लोग बचे हैं.
अरबों डॉलर की विदेशी मदद के बावजूद अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा ही रही थी. आर्थिक विकास लगातार बढ़ती आबादी के साथ कदम मिला कर नहीं चल पा रहा था. नौकरियां कम हैं और सरकारी मुलाजिमों को कम से कम जुलाई से वेतन नहीं मिला है.
विदेशी मदद
अधिकतर लोगों ने लड़ाई के अंत का स्वागत तो किया है लेकिन अर्थव्यवस्था के लगभग बंद होने की वजह से यह राहत फीकी ही रही है.
काबुल के बीबी माहरो इलाके में रहने वाले एक कसाई ने अपना नाम छुपाते हुए बताया, "इस समय सुरक्षा के मोर्चे पर तो हाल काफी अच्छा है, लेकिन हमारी कमाई बिलकुल भी नहीं हो रही है. हर रोज हमारे लिए हालात और खराब, और कड़वे हो जाते हैं. यह एक बहुत ही बुरी स्थिति है."
पिछले महीने काबुल से विदेशी नागरिकों के निकाले जाने की अफरा तफरी के बाद हवाई अड्डा अब खुल रहा है और मदद का सामान लिए विमान पहुंच रहे हैं. "पूरे देश के विनाश" की संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय दाताओं ने एक अरब डॉलर से भी ज्यादा के दान का वादा किया है.
लेकिन पिछले सप्ताह तालिबान के पुराने कट्टरवादी सदस्यों की सरकार बनने की घोषणा के बाद दुनिया भर के देशों की प्रतिक्रिया ठंडी रही है. अंतरराष्ट्रीय मान्यता का कोई संकेत नजर नहीं आ रहा है और ना ही अफगानिस्तान के बाहर रोक कर रखी नौ अरब डॉलर से भी ज्यादा मूल्य की विदेशी मुद्रा को छोड़ देने का भी संकेत नजर नहीं आ रहा है.
तालिबान की कई चुनौतियां
तालिबान के अधिकारियों ने कहा है कि वो पिछली तालिबान सरकार के कड़े कट्टरवादी शासन को दोहराने का इरादा नहीं रखते हैं. इसके बावजूद बाहर की दुनिया को यह मनाने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है कि वो सही में बदल गए हैं.
इसके अलावा ऐसी अटकलें भी लग रही हैं कि तालिबान के अंदर कई गुट हैं और उनके बीच गहरे मतभेद चल रहे हैं. हक्कानी नेटवर्क के समर्थकों के साथ हुई गोलाबारी में उप प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर के मारे जाने की "अफवाहों" को तालिबान ने नकार दिया है.
अधिकारियों का कहना है कि सरकार सभी सेवाओं को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रही है और सड़कें भी अब सुरक्षित हैं. लेकिन युद्ध जैसे जैसे खत्म हो रहा है, आर्थिक संकट उससे भी बड़ी समस्या बनता जा रहा है. जैसा कि एक दुकानदार ने कहा, "चोरियां नहीं हो रही हैं. लेकिन रोटी भी तो नहीं है." (dw.com)
सीके/एए (रॉयटर्स)
मलयेशियाई माताओं के एक समूह ने विदेशों में पैदा हुए बच्चों को अपनी राष्ट्रीयता देने के अधिकार से जुड़ा एक मुकदमा जीता है.
अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है और इस जीत से अन्य देशों में भेदभावपूर्ण नागरिकता कानूनों में सुधार की कोशिशों को बढ़ावा मिल सकता है. मलयेशिया पुरुषों को विदेशों में पैदा हुए बच्चों को नागरिकता देने की इजाजत देता है, लेकिन महिलाएं अब तक उसी अधिकार से वंचित थीं, क्योंकि संविधान केवल "पिता" को उनकी राष्ट्रीयता संतान को सुपुर्द करने का अधिकार देता है.
मांओं ने दी कोर्ट में चुनौती
उच्च न्यायालय में दायर एक मुकदमे में छह माताओं और अभियान समूह फैमिली फ्रंटियर्स ने तर्क दिया कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 8 का उल्लंघन करता है जो लैंगिक भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है.
इसी मामले पर हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि "पिता" शब्द में मां को भी मिलाकर पढ़ना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि मांओं के विदेश में जन्मे बच्चे मलयेशियाई नागरिकता के हकदार हैं.
पूर्व स्क्वैश चैंपियन और सात वर्षीय बेटे की मां चोंग वाई ली कहती हैं, "मैं बहुत रोमांचित हूं. यह एक बड़ी जीत है." चोंग ने बताया कि उन्होंने जश्न मनाने के लिए अपने 7 साल के बेटे को मलयेशियाई झंडे वाली टी-शर्ट पहनाई थी.
मुकदमा लड़ रहीं अन्य माताओं की तरह चोंग की शादी एक विदेशी नागरिक से हुई थी और उन्होंने विदेश में बेटे को जन्म दिया था. महिलाओं का कहना है कि नागरिकता नियम परिवारों को विभाजित करते हैं, महिलाओं को अपमानजनक संबंधों में फंसाने का जोखिम उठाते हैं और बच्चों को स्टेटलेस बना सकते हैं.
फैसले का बड़ा असर
मलेशिया की सरकार जिसने पहले इस मामले को "तुच्छ" के तौर पर बताया था, फिलहाल टिप्पणी से इनकार कर दिया है. लेकिन अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर सकती है.
यह अब तक साफ नहीं है कि मलेशिया में कितनी महिलाएं इस मुद्दे से प्रभावित हुई हैं लेकिन फैमिली फ्रंटियर्स ने कहा कि द्विराष्ट्रीय वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि लोग विदेश में काम करने के लिए भी जाते हैं.
24 देश माता और पिता को अपने बच्चों को अपनी राष्ट्रीयता देने के समान अधिकार नहीं देते हैं, और अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कानूनी जीत बदलाव ला सकती है.
एए/वीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)
कहते हैं बिल्लियों को नौ बार जिंदगी मिलती है लेकिन असलियत में अक्सर गुर्दों की बीमारी इनकी मौत का कारण बनती है. जापान में इस बीमारी का इलाज खोज निकालने के लिए बिल्ली प्रेमियों ने चंदे में लगभग 20 लाख डॉलर जुटा लिए हैं.
टोक्यो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक पहले से बिल्लियों को गुर्दों की बीमारी से बचाने के तरीकों पर शोध कर रहे थे, लेकिन कोरोनावायरस महामारी के आने के बाद से इस शोध के लिए कॉर्पोरेट जगत से मिल रही फंडिंग बंद हो गई.
समाचार एजेंसी जिजि प्रेस ने जब इन शोधकर्ताओं की समस्या पर एक लेख छापा, तो वो वायरल हो गया. उस लेख की बदौलत बिल्ली प्रेमियों ने इस रिसर्च को जारी रखने के लिए ऑनलाइन चंदा इकठ्ठा करने की मुहिम चलाई और जल्द ही हजारों लोग इससे जुड़ गए.
क्या है ये बीमारी
20 डॉलर चंदा देने वाली एक महिला ने एक संदेश में लिखा, "मैंने पिछले साल में दिसंबर में अपनी प्यारी बिल्ली को गुर्दों की बीमारी की वजह से खो दिया...मुझे उम्मीद है कि यह रिसर्च आगे बढ़ेगी और कई बिल्लियों की इस बीमारी से मुक्त होने में सहायता करेगी."
90 डॉलर देने वाले एक व्यक्ति ने कहा,"मैं हाल ही में बिल्ली की एक बच्ची को घर ले कर आया. मैं चंदा देकर उम्मीद कर रहा हूं कि यह इलाज समय रहते मिल जाए और इस बिल्ली के भी काम आए."
पालतू बिल्लियां हों या जंगल में रहने वाले उनके बड़े भाई-बहन, इन सब पर इस बीमारी का बहुत खतरा रहता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इनके जींस में एक प्रक्रिया के तहत अक्सर एक जरूरी प्रोटीन सक्रिय नहीं हो पाता है.
दोगुना जी सकेंगी बिल्लियां
इस प्रोटीन की खोज भी टोक्यो के इन्हीं शोधकर्ताओं ने की थी. इसे एआईएम के नाम से जाना जाता है और यह शरीर में मरी हुई कोशिकाओं और अन्य कचरे को साफ करने में मदद करता है. इससे गुर्दे बंद होने से बचे रहते हैं.
इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर तोरु मियाजाकी और उनके टीम इस प्रोटीन को एक स्थिर मात्रा और गुणवत्ता में बनाने के तरीकों पर काम कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि वो एक ऐसा तरीका खोज पाएंगे जिसकी वजह से बिल्लियों का औसत जीवनकाल 15 सालों से बढ़कर दोगुना हो सकता है.
मियाजाकी कहते हैं, "मैं उम्मीद कर रहा हूं कि आने वाले समय में जानवरों के डॉक्टर बिल्लियों को टीकों की ही तरह यह इंजेक्शन भी हर साल दे पाएंगे." उन्होंने आगे कहा, "अगर वो इसकी एक या दो खुराक हर साल दे पाएं तो अच्छा रहेगा."
लोकप्रिय शोध
जुलाई में लेख के छपने के कुछ ही घंटों में उनकी टीम को बिन मांगे ही 3,000 लोगों ने चंदा भेज दिया. कुछ ही दिनों में यह संख्या बढ़ कर 10,000 हो गई. यह संख्या विश्वविद्यालय को एक साल में मिलने वाले कुल चंदे से भी ज्यादा है.
सितंबर के मध्य तक पहुंचते पहुंचते चंदे में करीब 19 लाख डॉलर हासिल हो चुके थे. मियाजाकी कहते हैं, "मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरे शोध के नतीजों का लोगों को कितना इंतजार है."
एआईएम शरीर में कैसे काम करता है, इस सवाल पर उनकी टीम का शोध 2016 में 'नेचर मेडिसिन' पत्रिका में छपा था. यह टीम पालतू जानवरों के लिए ऐसा खाना भी विकसित कर रही है जिसमें ऐसा पदार्थ होगा जो बिल्लियों के खून में निष्क्रिय पड़े एआईएम को सक्रिय करमें में मदद कर सके.
सीके/वीके (एएफपी)
संयुक्त राष्ट्र ने दुनियाभर की सरकारों से आग्रह किया है कि कृषि सब्सिडी के मुद्दे पर ज्यादा उग्र सुधारवादी तरीके से सोचा जाए. अपनी एक रिपोर्ट में यूएन ने कृषि सब्सिडी में बड़े बदलावों की जरूरत बताई है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कृषि सब्सिडी पर दोबारा सोचे जाने की जरूरत है. एक रिपोर्ट में यूएन ने कहा है कि 80 प्रतिशत से ज्यादा सरकारी अनुदान या तो कीमतों को प्रभावित करता है, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है या असमानता बढ़ाता है.
कृषि सब्सिडी की व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत बताते हुए यूएन ने मंगलवार को एक रिपोर्ट जारी की है. कृषि सब्सिडी एक तरह का सरकारी खर्च है जो किसानों की मदद के लिए विभिन्न देश करते हैं. यूएन का अनुमान है कि आने वाले सालों में यह खर्च बेतहाशा बढ़ सकता है.
80 फीसदी सब्सिडी की पुनर्योजना जरूरी
संयुक्त राष्ट्र की तीन एजेंसियों ने दुनियाभर की सरकारों से आग्रह किया कि अपने कृषि क्षेत्र की मदद के लिए किए जा रहे खर्चों का पुनर्गठन करें. रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के अलग-अलग देश सालाना कुल मिलाकर लगभग 540 अरब डॉलर सब्सिडी पर खर्च करते हैं. इसमें से करीब 470 अरब डॉलर को पुनर्गठित किए जाने की जरूरत है ताकि कृषि क्षेत्र को ज्यादा स्थिर, पर्यावरण के अनुकूल और न्यापूर्ण बनाया जा सके.
विश्व खाद्य और कृषि संगठन के महानिदेशक कू डोंग्यू ने कहा कि यह रिपोर्ट सरकारों के लिए चेतावनी जैसी है. तुरंत कदम उठाने की जरूरत बताते हुए डोंग्यू ने कहा कि इससे चार चीजें बेहतर होंगीः पोषण, उत्पादन, पर्यावरण और जीवन.
सब्सिडी समाप्त न करो, बदलो
‘अरबों डॉलर का मौका' (A Multi-Billion Dollar Opportunity) नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट को अगले हफ्ते होने वाले संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व्यवस्था सम्मेलन से ठीक पहले सार्वजनिक किया गया है. इस अध्ययन के लिए संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विकास कार्यक्रम (UNDP) ने मिलकर कराया है.
रिपोर्ट के लेखकों ने जोर देकर कहा कि वे सब्सिडी खत्म करने की बात नहीं कर रहे हैं. रिपोर्ट कहती है कि सब्सिडी खत्म करने की जगह हम कृषि उत्पादकों को मिलने वाली मदद की पुनर्योजना की बात कर रहे हैं.
इस रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल जहां भी सब्सिडी दी जा रही हैं, उनमें से अधिकतर या तो कीमतों में राहत के रूप में दी जा रही है या फिर आयात-निर्यात पर कर के रूप में. कुछ जगहों पर किसी खास उत्पाद या फसल को बढ़ावा देने के लिए भी धन से मदद की जा रही है.
बढ़ता जाएगा खर्च
शोध कहता है, "यह नाकाफी है, कीमतों को प्रभावित करती है, लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाती है, पर्यावरण के लिए खतरनाक है और अक्सर असमान होती है क्योंकि छोटे किसानों के बजाय कृषि उद्योगों को प्राथमिकता देती है.”
संयुक्त राष्ट्र का यह भी अनुमान है कि आने वाले एक दशक में कृषि सब्सिडी के रूप में सरकारी खर्च तीन गुना तक बढ़ सकता है. रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक यह खर्च 18 खरब डॉलर तक पहुंच सकता है, इस कारण तुरंत कदम उठाने की जरूरत और ज्यादा है.
यूएन के मुताबिक 2020 में 81 करोड़ से ज्यादा लोग भूखमरी का सामना कर रहे थे, 2.37 अरब लोगों को सालभर समुचित भोजन नहीं मिल पाया और तीन अरब लोग एक स्वस्थ भोजन का खर्च नहीं उठा सके.
वीके/एए (एएफपी, डीपीए)
ओलाफ शॉल्त्स सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के जर्मन चांसलर पद के उम्मीदवार हैं. उनके अनुभव पर को शक नहीं हैं और वे संकट काल की स्थितियों से निपटने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन कई लोग कहते हैं कि उनमें किसी चीज की तो कमी है.
डॉयचे वेले पर सबीन किनकार्त्स की रिपोर्ट
जब एसपीडी ने आम चुनाव से एक साल से भी ज्यादा पहले चांसलर पद के उम्मीदवार के तौर पर ओलाफ शॉल्त्स के नाम की घोषणा की तो लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ. यह और भी ज्यादा चौंकाने वाला था कि पार्टी ने शॉल्त्स को चुना, जबकि वह कुछ महीने पहले ही पार्टी के नेतृत्व की दौड़ हार गए थे.
लेकिन ओलाफ शॉल्त्स ने अडिग आत्मविश्वास दिखाया है और अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई तूफानों का सामना किया है.
कोरोना वायरस संकट के दौरान उन्हें चमकने का एक अच्छा मौका मिला, जब वित्त मंत्री के रूप में उनके पास अर्थव्यवस्था और देश के नागरिकों की तूफान का सामना करने में मदद के लिए इमरजेंसी फंड से अरबों यूरो की मदद बांटने का जिम्मा रहा.
शॉल्त्स ने शांत दक्षता और अत्यधिक आत्मविश्वास के साथ वादा किया, "यह वह बजूका (एक हथियार) है, जो काम पूरा करने के लिए जरूरी था. हम यह दिखाने के लिए अपने सभी हथियार सामने रख रहे हैं कि हम ऐसी समस्या की ओर से खड़ी की जाने वाली किसी भी आर्थिक चुनौती से उबरने के लिए पर्याप्त मजबूत हैं."
संकट के समय व्यावहारिकता, करिश्मे को हरा देती है, जो इस 62 वर्षीय के शख्स हाथों में आ गई है.
एक रोबोट का खिंचाव
समय 2003 के मुकाबले बहुत दूर निकल आया है, जब जर्मन साप्ताहिक डी त्साइट ने उन्हें 'शॉल्त्सोमेट' उपनाम दे दिया था. यह उपनाम उनके नाम में ऑटोमेट शब्द लगाकर बनाया गया था. जर्मन में इसका मतलब मशीन होता है और यह शब्द सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) के राष्ट्रीय महासचिव की रोबोट जैसी क्षमता की ओर इशारा करता था.
कहा जाता था इस मशीन का काम एसपीडी की नीतियों को बेचते जाना है. इसकी शुरुआत एक विवादित लेबर मार्केट रिफॉर्म प्रोग्राम से हुई थी, जिसे 2010 नाम दिया गया था. इसमें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने वाले कुछ लोगों के लाभ में बड़ी कटौती की जानी थी. शॉल्त्स को उस दौरान पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ही जगह पर इस योजना का बचाव करना पड़ा था.
बाद में शॉल्त्स ने कहा था, "मैं वो आदमी था जिसे इस संदेश को फैलाने का काम सौंपा गया था. ऐसे में मुझे कुछ हद तक कठोरता का परिचय देना था." उन्होंने यह भी जोड़ा कि "मुझे वाकई एक अफसर जैसा महसूस हुआ था. मेरे पास कोई स्वतंत्रता नहीं थी."
उन्होंने कहा कि उनकी पहली चिंता उनकी अपनी समझ नहीं बल्कि तत्कालीन चांसलर और एसपीडी नेता जेराल्ड श्रोएडर और पार्टी के प्रति पूर्ण निष्ठा का प्रदर्शन करना था. वह कहते हैं, "मैं खुद का नहीं बल्कि पार्टी का बचाव करने की कोशिश कर रहा था."
व्यर्थ का काम
अंत में बचाव की कोशिशें व्यर्थ रहीं. न सिर्फ एसपीडी की चांसलरी सीडीयू को चली गई बल्कि ओलाफ शॉल्त्स की ऐसी छवि बन गई, जिसे बदलने में अब भी समय लगेगा. यह छवि है एक उबाऊ नौकरशाह और खुशी का अंत कर देने वाले की.
एसपीडी के अंदर बहुत से लोगों को इस इंट्रोवर्ट और हैम्बर्ग से आने वाली व्यावहारिक शख्स को खुशनुमा बनाने में बहुत समस्या हुई है जो सिर्फ उतना ही बोलता है, जितना एकदम जरूरी हो.
हालांकि शॉल्त्स ने धीरे-धीरे राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ते हुए अपना मोर्चा खोले रखा है. वह एसपीडी के महासचिव, राज्य के गृह मंत्री और हैम्बर्ग के मेयर रहे और फिलहाल जर्मनी के वित्त मंत्री और डिप्टी चांसलर हैं.
ओलाफ शॉल्त्स को पार्टी के कंजरवेटिव धड़े का सदस्य माना जाता है लेकिन उन्हें वामपंथी या दक्षिणपंथी जैसी राजनीतिक श्रेणियों में रखना भी बहुत मुश्किल है. एसपीडी के युवा संगठन जुसोस के उप प्रमुख के तौर पर उनके कई विचार सामाजिक तौर पर कट्टरपंथी और पूंजीवाद के कटु आलोचना वाले थे.
दिखावा सीखना
लेकिन शॉल्त्स को एसपीडी ज्वाइन किए एक लंबा समय बीत चुका है. वह 1975 में इसमें एक स्टूडेंट के तौर पर शामिल हुए थे और बुंडेसटाग के लिए उन्होंने 1998 में चुनाव लड़ा था. उस दौरान, शॉल्त्स ने हैम्बर्ग में अपनी वकालत शुरू की. व्यापार कानूनों में उनकी विशेषज्ञता थी. इस दौरान उन्होंने अर्थव्यवस्था और उद्यमिता के बारे में बहुत कुछ सीखा. जिसने उन पर अपनी छाप छोड़ी.
ओलाफ शॉल्त्स को यह स्वीकार करने में बहुत समय लगा कि राजनीति अपने विचार सुनाने और अपनी नीतियां बेचने का काम है. लेकिन जब 2019 के आखिरी में एसपीडी के उम्मीदवार एक-दूसरे से बहस करते हुए देश का दौरा कर रहे थे तो वित्त मंत्री बदले हुए लगे.
उनका व्यवहार ज्यादा भावुक, ज्यादा सुलभ और इन सबसे आगे मित्रवत था. इसी समय उन्होंने इस बात को भी कोई रहस्य नहीं रहने दिया था कि वे चांसलर पद के उम्मीदवारों की लाइन में हैं. लेकिन उन्हें सास्किया एसकेन और नोरबर्ट वॉल्टर बोरजंस की वामपंथी जोड़ी से करारी हार का सामना करना पड़ा.
लेकिन पार्टी के पुराने सैनिक रहे शॉल्त्स ने अपना मोर्चा बचाया. उन्होंने अपने काम पर अपना फोकस बनाए रखा और नए एसपीडी नेताओं को इसके साथ आगे बढ़ने दिया. वह वफादार बने रहे और कभी कटाक्ष नहीं किए. वे इस विचार के साथ सुरक्षित महसूस करते रहे कि पार्टी का नया नेतृत्व, जो उनके हिसाब से अनुभवहीन था, वह खुद ही गलतियां करेगा.
आने वाले महीनों में शीर्ष उम्मीदवार के तौर पर अपने नामांकन के बाद भी वे बड़ी गड़बड़ियों से बचे रहे. लेकिन उनकी लोकप्रियता की रेटिंग कम है और ग्रीन पार्टी के उभार के बाद बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि एसपीडी के पास अगली जर्मन सरकार का नेतृत्व करने का कोई भी मौका है. (dw.com)
ख़ुदा ए नूर नासिर
दोहा समझौते में मुल्ला ग़नी बरादर की अहम भूमिका रही है
तालिबान की अंतरिम सरकार में आपसी फूट पड़ गई है. तालिबान के सीनियर अधिकारी ने ये बात बीबीसी को बताई है.
उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति भवन में तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला ग़नी बरादर के समूह और एक कैबिनेट सदस्य के बीच कहासुनी हुई है.
हाल के दिनों में मुल्ला बरादर सार्वजनिक रूप से नहीं दिखे हैं. इसके बाद से ही क़यास लगाए जा रहे हैं कि तालिबान में नेतृत्व को लेकर असहमति सतह पर आ गई है.
हालांकि इन ख़बरों को तालिबान ने आधिकारिक रूप से ख़ारिज किया है.
तालिबान ने पिछले महीने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और अफ़ग़ानिस्तान को इस्लामिक गणतंत्र से इस्लामिक अमीरात बनाने की घोषणा की थी. तालिबान ने सात सितंबर को नई कैबिनेट की घोषणा की थी जिसमें सभी पुरुष हैं और शीर्ष पर वे हैं जो पिछले दो दशकों में अमेरिकी बलों पर हमले के लिए कुख्यात रहे हैं.
तालिबान के एक सूत्र ने बीबीसी पश्तो से कहा कि बरादर और ख़लील उर-रहमान के बीच आपसी कहासुनी हुई है. इसके बाद दोनों नेताओं के समर्थक आपस में भिड़ गए. ख़लील उर-रहमान आतंकवादी संगठन हक़्क़ानी नेटवर्क के नेता और तालिबान की सरकार में शरणार्थी मंत्री हैं,
विवाद क्यों छिड़ा?
क़तर स्थित तालिबान के एक सीनियर सदस्य और एक व्यक्ति, जो इस कलह में शामिल थे, उन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि पिछले हफ़्ते ऐसा हुआ था. सूत्रों के अनुसार विवाद इसलिए हुआ क्योंकि बरादर, जिन्हें अंतरिम सरकार में उप-प्रधानमंत्री बनाया गया है, वे सरकार की संरचना से ख़ुश नहीं हैं. अफ़ग़ानिस्तान में जीत के श्रेय को लेकर तालिबान के नेता आपस में उलझ रहे हैं.
रिपोर्ट्स के अनुसार बरादर को लगता है कि उनकी डिप्लोमेसी के कारण तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता मिली है जबकि हक़्क़ानी नेटवर्क के सदस्यों और समर्थकों को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान में जीत लड़ाई के दम पर मिली है. हक़्क़ानी नेटवर्क की कमान तालिबान के एक शीर्ष नेता के पास है.
बरादर तालिबान के पहले नेता हैं जिन्होंने 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फ़ोन पर सीधे बात की थी. इसके पहले इन्होंने तालिबान की तरफ़ से दोहा समझौते में अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर किया था.
दूसरी तरफ़ शक्तिशाली हक़्क़ानी नेटवर्क है जो कि हाल के वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में पश्चिमी बलों पर सबसे हिंसक हमलों में शामिल रहा है. अमेरिका ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है. इसके नेता सिराजुद्दीन हक़्क़ानी तालिबान की नई सरकार में गृह मंत्री हैं.
अफ़वाहों का बाज़ार पिछले हफ़्ते तब गर्म हुआ जब तालिबान का सबसे अहम चेहरा माने जाने वाले बरादर सार्वजनिक मौजूदगी से ग़ायब हो गए. सोशल मीडिया पर उनकी मौत की ख़बरें चलने लगीं.
बरादर कहाँ हैं?
बीबीसी से तालिबान के सूत्रों ने कहा है कि विवाद के कारण बरादर काबुल छोड़ कंधार चले गए हैं. सोमवार को बरादार के नाम पर एक ऑडियो टेप जारी किया गया जिसमें वे कह रहे हैं कि वे यात्राओं पर बाहर हैं. इस ऑडियो टेप में बताया गया है कि इस वक़्त वे जहाँ भी हैं, ठीक हैं.
बीबीसी ने इस ऑडियो रिकॉर्डिंग की जाँच नहीं की है कि इसमें किसकी आवाज़ है. इस ऑडियो टेप को तालिबान की कई आधिकारिक वेबसाइटों पर पोस्ट किया गया है.
तालिबान का कहना है कि सरकार के भीतर कोई विवाद नहीं है और बरादर सुरक्षित हैं. लेकिन बरादर अभी क्या कर रहे हैं, इसे लेकर अलग-अलग बात कही जा रही है. एक प्रवक्ता ने कहा कि बरादर कंधार सुप्रीम नेता से मिलने गए हैं, लेकिन बाद में बीबीसी पश्तो को बताया गया कि वे थक गए थे और अभी आराम करना चाहते हैं.
अफ़ग़ानों के बीच तालिबान के बयान पर शक़ की कई वजहें हैं. 2015 में तालिबान ने स्वीकार किया था कि उसने अपने संस्थापक नेता मुल्ला उमर की मौत की बात दो साल से ज़्यादा वक़्त तक छुपा कर रखी थी. इस दौरान तालिबान मुल्ला उमर के नाम पर बयान जारी करता रहा था.
बीबीसी से सूत्रों ने बताया कि बरादर काबुल पहुँचकर कैमरे के सामने आ सकते हैं और किसी भी तरह के विवाद की बात को ख़ारिज कर सकते हैं.
तालिबान के सुप्रीम नेता हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा को लेकर भी कई तरह की अटकलें हैं. वे सार्वजनिक रूप से कभी दिखे ही नहीं. उनके पास तालिबान की राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक मामलों की ज़िम्मेदारी है.
इस बीच अफ़ग़ानिस्तान के कार्यकारी विदेश मंत्री ने मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय दानकर्ताओं से मदद फिर से शुरू करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपनी मदद को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र ने अफ़ग़ानिस्तान में हालात भयावह रूप से बिगड़ने की चेतावनी दी है. इसके बाद से एक अरब डॉलर से ज़्यादा की मदद को लेकर पहल शुरू की गई है.
ट्रंप ने की थी बरादर से बात?
पिछले महीने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक रेडियो कार्यक्रम में पुष्टि की कि उनकी पिछले साल 'तालिबान के प्रमुख' से बात हुई थी.
यह प्रमुख कौन था, इसके बारे में वो साफ़-साफ़ नहीं बता सके थे. लेकिन जब रेडियो शो के होस्ट ने उनसे पूछा कि वो मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर की बात कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि 'हाँ मैंने उनसे बात की थी.'
पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने गुरुवार 26 अगस्त को कंज़रवेटिव टॉक रेडियो होस्ट ह्यू ह्यूवेट के कार्यक्रम में यह बात रखी. उन्होंने बताया था कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सुरक्षाबलों के लिए साल 2020 में जब बातचीत जारी थी तो उन्होंने यह बातचीत की थी.
रेडियो कार्यक्रम में जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने मुल्ला बरादर से बात की थी और उन्होंने उनसे क्या कहा था? तो इस सवाल पर ट्रंप ने कहा कि उन्होंने मुल्ला बरादर को साफ़ और कड़े लफ़्ज़ों में कहा था कि अगर उन्हें (अमेरिका) नुक़सान पहुँचाया गया तो वो 'तालिबान को ऐसी चोट देंगे, जो आज तक विश्व इतिहास में कभी नहीं हुई होगी.'
ट्रंप ने विस्तार से इस पर बात की थी और उन्होंने बातचीत की शुरुआत उत्तर कोरिया और किम जोंग उन से मुलाक़ात के मुद्दे से शुरू की थी.
उन्होंने कहा था, "मेरी उनसे (तालिबान नेता) बातचीत तय कराई गई और लोग कह रहे थे कि आपको यह नहीं करना चाहिए. वैसे, मैंने उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन के साथ भी बातचीत तय की थी. हमारे (अमेरिका-उत्तर कोरिया) बीच कोई परमाणु युद्ध नहीं हुआ था. मैं अगर राष्ट्रपति न होता तो ओबामा की बात सच होती और हमारे बीच परमाणु युद्ध हो चुका होता." (bbc.com)
अफ़ग़ानिस्तान की कमान तालिबान के हाथ में आने के बाद से ईरान भी आशंकित है. ईरान न केवल तालिबान से आशंकित है बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी चिंतित है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने गल्फ़ अरब के एक सीनियर अधिकारी के हवाले से कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान को लेकर अगर टकराव शुरू होता है तो चीन-पाकिस्तान एक तरफ़ होंगे और भारत, रूस, ईरान एक तरफ़. ईरान के विदेश मंत्री की भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी अफ़ग़ानिस्तान को लेकर बात हुई है.
तेहरान टाइम्स के अनुसार 12 सितंबर को ईरान के एक सांसद ने कहा था कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई प्रमुख फ़ैज़ हामिद पंजशीर घाटी में तालिबान की हिंसक कार्रवाई में शामिल थे.
ईरानी सांसद ने ये भी कहा था कि तालिबान की कैबिनेट के गठन में भी आईएसआई प्रमुख की भूमिका थी. उन्होंने कहा था कि ईरान पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी भूमिका सुनिश्चित करने की अनुमति नहीं देगा.
ऐसी टिप्पणी केवल ईरान की तरफ़ से ही नहीं बल्कि तालिबान की ओर से भी आ रही है. मंगलवार को तालिबान के प्रवक्ता सैयद ज़र्कुराल्लाह हाशमी ने टोलो न्यूज़ टीवी पर एक बहस के दौरान ईरान पर निशाना साधते हुए कहा था, ''पिछले 40 सालों में ईरान में कोई सुन्नी मंत्री नहीं बना. हमने ये कभी नहीं कहा कि शिया को कोई पद नहीं देंगे. हमारी कैबिनेट में कोई शिया मंत्री नहीं है, इसका मतलब ये नहीं है कि शियाओं को कोई पद नहीं मिलेगा.''
हाशमी की इस टिप्पणी का वीडियो क्लिप साउथ एशिया मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ने ट्वीट किया है.
पाकिस्तान का विरोध
भारत के जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिकी चुप्पी को लेकर सवाल खड़ा किया और ईरान से सहानुभूति जताई है. ब्रह्मा चेलानी ने ट्वीट कर कहा है, ''अमेरिका के लिए ईरान वैसा देश है जो राज्य प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा देता है लेकिन सऊदी अरब दुनिया भर में जिहादियों को सबसे ज़्यादा फ़ंड मुहैया कराता है और पाकिस्तान आतंकवादियों की शरणस्थली है, वे उनके पार्टनर हैं. यह दिलचस्प है कि पंजशीर में तालिबान की बर्बरता पर ईरान बोल रहा है और अमेरिका ख़ामोश है.''
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने तालिबान को लेकर ईरान के रुख़ को पाकिस्तान के लिए निराशाजनक कहा है. अपने एक वीडियो ब्लॉग में अब्दुल बासित ने कहा है, ''ईरान ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि पंजशीर प्रांत पर कब्ज़े में पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स शामिल था. ईरान की सरकार ने तेहरान में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर विरोध-प्रदर्शन की भी अनुमति दी. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पाकिस्तान तालिबान का समर्थन कर रहा है.''
ईरान क्यों कर रहा ऐसा?
अब्दुल बासित ने ईरान से निराशा जताते हुए कहा है, ''ईरान को इस मामले में कुछ भी बहुत सतर्कता से बोलना चाहिए. पाकिस्तान ईरान से संबंधों को लेकर काफ़ी संवेदनशील रहा है. हमें 18 अप्रैल, 2015 की तारीख़ याद है. पाकिस्तानी संसद ने यमन संघर्ष में सऊदी और ईरान के बीच किसी का भी पक्ष नहीं लेने का प्रस्ताव पास किया था. ईरान को याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब और उसके बीच हमेशा संतुलन बनाकर रखने की कोशिश की है. हमने दोनों देशों के बीच सेतु बनाने की कोशिश की है. लेकिन 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान पाकिस्तान के मामले में उदार नहीं रहा है.''
अब्दुल बासित ने ईरान पर आरोप लगाते हुए कहा, ''ईरान न केवल पाकिस्तान में सामुदायिक फ़साद को बढ़ावा देता रहा है बल्कि इस मामले में पश्चिम एशिया और मध्य-पूर्व में भी उसने ऐसा ही किया. कश्मीर के मामले में भी ईरान का रुख़ भारत के पक्ष में ही रहा है. हालांकि ईरान के सर्वोच्च नेता ने कश्मीरियों के पक्ष में एक बयान जारी किया था. लेकिन तेहरान इन इक्के-दुक्के बयान से आगे नहीं गया.''
बासित ने कहा, ''हमारी सरकार को इस मामले पर तेहरान से बात करनी चाहिए. अगर ईरान को पाकिस्तान से कोई दिक़्क़त है तो उसे हमारी सरकार से निजी तौर पर बात करनी चाहिए. पाकिस्तान ईरान से अच्छा रिश्ता चाहता है, लेकिन यह एकतरफ़ा नहीं हो सकता. पाकिस्तान अपने दम पर ऐसा नहीं कर सकता. तालिबान के आने से ईरान की चिंता बढ़नी लाजिमी है. लेकिन चिंता की बात है कि ईरान भारत के साथ ज़्यादा सहज दिखता है.''
बासित ने कहा, ''चाबाहार पर ईरान भारत के साथ है. हम ईरान को मुस्लिम देश के तौर पर देखते हैं. हम सुन्नी बहुल देश हैं, लेकिन हम पाकिस्तानी राष्ट्रीय हित को लेकर एकजुट हैं. ईरान को भविष्य में इसे लेकर सतर्क रहना चाहिए.''
पाकिस्तान का बढ़ता विरोध
अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका को न केवल ईरान संदिग्ध नज़र से देख रहा है बल्कि काबुल में भी लोग पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतरे थे. इन प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ तालिबान ने हवाई फ़ायरिंग की थी.
अफ़ग़ानिस्तान की आबादी में हज़ारा समुदाय का हिस्सा 10 से 20 फ़ीसदी माना जाता है. इनकी आबादी पारंपरिक रूप से मध्य अफ़ग़ानिस्तान के हज़ारात इलाक़े में है. अफ़ग़ानिस्तान कुल आबादी 3.8 करोड़ में हज़ारा अहम अल्पसंख्यक हैं.
पाकिस्तान में भी हज़ारा समुदाय के लोग हैं और पश्चिम के देशों में भी हज़ारा प्रवासी हैं. हज़ारा भी मुसलमान ही हैं और ज़्यादातर शिया हैं. दुनिया भर में सुन्नी मुसलमानों की आबादी सबसे ज़्यादा है. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान हज़ारा समुदाय को निशाने पर लेता रहा है.
तालिबान हज़ारा समुदाय के ख़िलाफ़ न केवल अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय रहा है बल्कि पाकिस्तान में भी रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारा हमेशा से भेदभाव के शिकार होते रहे हैं और तालिबान के एक बार फिर से सत्ता में आने पर ईरान की चिंता शिया मुसलमानों और सुन्नी कट्टरपंथ को लेकर बढ़ गई है.
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में जिस अंतरिम सरकार की घोषणा की है, उसमें कोई भी शिया नहीं है. तालिबान की इस सरकार की इसलिए भी आलोचना हो रही है.
पाकिस्तान पर शक़
इसी महीने छह सितंबर को अपनी साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सईद ख़ातिबज़ादेह ने तालिबान के सत्ता में आने पर चेतावनी दी थी. पंजशीर घाटी में तालिबान विरोधी नेताओं की मौत को सईद ख़ातिबज़ादेह ने शहादत कहा था. ईरानी विदेश मंत्रालय का यह बयान उसी दिन आया था जब तालिबान ने पंजशीर को भी अपने कब्ज़े में लेने की घोषणा की थी.
अफ़ग़ान और ईरानी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर पंजशीर में कथित तौर पर पाकिस्तान को तालिबान का साथ देने के मामले में आड़े हाथों लेते रहे. ये भी कहा गया कि तालिबान विरोधी मसूद के नेतृत्व वाले बल के प्रवक्ता फ़हीम दाश्ती पाकिस्तानी ड्रोन हमले में मारे गए थे.
पंजशीर में पाकिस्तान के शामिल होने पर पूछे गए सवाल के जवाब में सईद ख़ातिबज़ादेह ने कहा था, ''पंजशीर से जो ख़बरें आ रही हैं, काफ़ी चिंताजनक हैं. पिछली रात का हमला काफ़ी निंदनीय था. अफ़ग़ान नेताओं की शहादत ख़ेदजनक है. ईरान पंजशीर में विदेशी हस्तक्षेप की रिपोर्ट की समीक्षा कर रहा है. अफ़ग़ानिस्तान का इतिहास बताता है कि वहाँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विदेशी हस्तक्षेप से कुछ हासिल नहीं होता है. अफ़ग़ानिस्तान के लोग किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे.''
तेहरान टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि तालिबान को लेकर ईरान का बदल रुख़ बताता है कि वो अफ़ग़ानिस्तान में ऐसी सत्ता नहीं चाहता है, जो पड़ोसी देशों की चिंताओं को पारदर्शी तरीक़े से हल करने को तैयार नहीं है.
तेहरान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''तालिबान के शासन में अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर बाक़ी देशों की तरह ईरान भी चिंतित है. पहली चिंता यही है कि कुछ देश तालिबान को ईरान के ख़िलाफ़ काम करवाने की कोशिश कर सकते हैं. यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और तुर्की पहले से ही तालिबान के संपर्क में हैं. काबुल में एयपोर्ट को लेकर यूएई और कुछ देश पहले से ही काम कर रहे हैं.''
ईरान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद ने भी तालिबान को आड़े हाथों लिया है. अहमदीनेजाद ने हाल ही में कहा था, ''एक समूह, जिसे पड़ोसियों ने बनाया और ट्रेनिंग दी. उसने एक देश पर कब्ज़ा कर लिया और ख़ुद को सरकार कहना शुरू कर दिया. दुनिया मूकदर्शक बनी रही या समर्थन करती रही लेकिन एक अराजकता जैसी स्थिति दुनिया के सामने पैदा हुई है.''
वॉशिगंटन स्थिति थिंक टैंक इंटरनेशनल सिक्यॉरिटी प्रोग्राम के सीनियर फ़ेलो मुहम्मद अतहर जावेद ने तुर्की के सरकारी प्रसारक टीआरटी से कहा है, ''हमें अभी इंतज़ार करना चाहिए. अगर ईरान सीधे तौर तालिबान के ख़िलाफ़ जाता है तो इससे उसे ही समस्या होगी क्योंकि पश्चिम चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में ईरान विरोधी सरकार हो ताकि उस पर दबाव बढ़ाया जा सके.'' (bbc.com)
बीजिंग, 14 सितम्बर | चीन के फुजियान प्रांत में कोविड-19 के डेल्टा वैरिएंट के मामले बढ़ने के साथ, देश में स्कूलों को बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध के साथ ही वायरस के प्रसार को रोकने के लिए यात्रा प्रतिबंध भी लगा दिए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फुजियान प्रांत में शाम 6 बजे तक 120 स्थानीय रूप से प्रसारित पुष्ट कोविड-19 मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि 19 स्थानीय लक्षणहीन मामलों का पता चला है।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने मंगलवार को स्थानीय अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी। प्रांतीय महामारी विरोधी कार्यसमूह ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पुष्ट मामले पुतियन, क्वानझोउ और जियामेन शहरों में सामने आए हैं और पुतियन में नए लक्षणहीन वाहक का पता चला।
सभी संक्रमितों को इलाज के लिए अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया गया है। शुक्रवार को मामलों में नवीनतम पुनरुत्थान शुरू होने के बाद से, स्थानीय अधिकारियों ने उन करीबी संपर्कों का पता लगाने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं, जो सभी केंद्रित क्वारंटीन में हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सोमवार तक, प्रांत के दो क्षेत्रों को कोविड-19 उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों और चार को मध्यम जोखिम वाले क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
फुजियान के अधिकारियों ने प्रांत में छात्रों और शिक्षकों के लिए एक सप्ताह के भीतर बड़े पैमाने पर कोविड-19 परीक्षण पूरा करने का भी आदेश दिया है। जियामेन शहर ने कोरोनावायरस रोगियों की पहचान करने के बाद एहितायत के तौर पर कई कदम उठाए हैं।
पुतियन के प्राथमिक विद्यालय के छात्र नवीनतम प्रकोप में पहले पहचाने गए कोविड-19 रोगियों में से थे।
अल जजीरा ने बताया कि सिंगापुर से लौटे पुतियन के पुतो प्राइमरी स्कूल में एक बच्चे के माता-पिता नवीनतम प्रकोप का संदिग्ध स्रोत हैं।
वह अगस्त में सिंगापुर से चीन लौटे थे और उन्होंने अपनी क्वारंटीन अवधि भी पूरी की थी। मगर उन्हें कोविड के लक्षण विकसित होने के बाद इस महीने एक बार फिर रिपोर्ट ली गई तो वे पॉजिटिव निकले।
रिपोर्ट में कहा गया है कि फुजियान के 32 लाख की जनसंख्या वाले शहर पुतियन ने सभी निवासियों के परीक्षण का आदेश दिया है, क्योंकि संक्रमण प्रांत में 100 से अधिक लोगों में फैल गया है।
इसके अलावा, देश का सबसे बड़ा व्यापार मेला चीन आयात और निर्यात मेला, जिसे कैंटन फेयर के रूप में भी जाना जाता है, पड़ोसी ग्वांगडोंग प्रांत में आयोजित किया जा रहा है, इसे भी 12 दिनों से घटाकर पांच दिन कर दिया गया है। साउथ चाइना मॉनिर्ंग पोस्ट के अनुसार, चीन विदेश व्यापार केंद्र के निदेशक चू शिजिया ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी।
हवाई अड्डों की ओर से साझा की गई जानकारी के अनुसार, ग्वांगडोंग में कई हवाई अड्डे - जिनमें झुहाई, शेनझेन और ग्वांगझू शामिल हैं - अब फुजियान से आने वाले यात्रियों से लैंडिंग के बाद अनिवार्य परीक्षण करने की मांग कर रहे हैं, भले ही उनकी पिछले 48 घंटों में नेगेटिव रिपोर्ट आई हो।
फुजियान में भेजी गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग की टीम ने कहा कि यह संभावना है कि पुतियन में समुदायों, स्कूलों और कारखानों में मामलों का पता लगाना जारी रहेगा, जहां वर्तमान प्रकोप मुख्य रूप से केंद्रित है। (आईएएनएस)
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद जनता अपना असबाब औने पौने दाम में बेचकर देश से भागना चाहती है. लोग रोजमर्रा की चीजों और भोजन के लिए बाजारों में घरेलू सामान बेच रहे हैं.
जब से तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता संभाली है, देश से भागने की कोशिश कर रहे अफगानों की निराशा और हताशा बढ़ती जा रही है. युद्धग्रस्त देश में कट्टर तालिबान के डर से अफगान हर कीमत पर देश से भागने की कोशिश कर रहे हैं.
तालिबान के आने के साथ ही जनता को गंभीर आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में राजधानी काबुल के बाजारों में लोग सालों से जोड़े सामान को कम कीमत पर बेच रहे हैं. वह बस इससे कुछ पैसे कमाने की उम्मीद लगा रहे हैं ताकि देश से भागने में उन्हें मदद मिल सके या फिर वे अपना और अपने परिवार के सदस्यों के लिए भोजन खरीद पाए.
गंभीर आर्थिक समस्या
15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के साथ ही तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण कर लिया था. तालिबान के आने के साथ ही अफगान समाज में गंभीर अराजकता फैल गई है. स्थानीय लोगों के लिए रोजगार नहीं है या रोजगार के अवसर सिकुड़ रहे हैं. अफगान वर्तमान में अपने बैंक खाते से प्रति सप्ताह 200 डॉलर से अधिक नहीं निकाल सकते हैं. इसका मतलब है कि अफगानिस्तान में नकदी की भारी कमी है.
काबुल के एक पहाड़ी कस्बे के रहने वाले मोहम्मद अहसान काबुल के बाजार में अपने घर से दो कंबल बेचने आए हैं. वे कहते हैं, "हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं है. हम बहुत गरीब हैं, इन चीजों को बेचने को मजबूर हैं." अहसान कहते हैं कि अमीर लोग काबुल में रहते थे, लेकिन अब सभी देश से भाग गए हैं.
अहसान निर्माण क्षेत्र में काम करते थे, लेकिन बिल्डिंग निर्माण का काम निलंबित है या फिर ठप्प पड़ गया है.
काबुल के इस बाजार में अस्थायी टेबलों पर प्लेट, गिलास, शीशे के बर्तन, रसोई के बर्तन और अन्य सामान बिखरे पड़े हैं. पुरानी सिलाई मशीन, कालीन और अन्य सामान भी लोग गाड़ी या फिर अपने कंधों पर लादकर यहां बेचने के लिए ला रहे हैं.मोहम्मद अहसान उन अनगिनत अफगानों में से एक हैं जिन्होंने अपने देश में एक के बाद एक कई बदलाव देखे हैं और कठिनाइयों का सामना किया है. अहसान और अन्य अफगान तालिबान के शांति और समृद्धि के दावों से सतर्क हैं. 1996 से 2001 तक पिछले तालिबान शासन के दौरान इस तरह के दावे अधिक बार किए गए थे. अहसान कहते हैं, "आप उनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकते हैं."
एक अन्य कारोबारी मुस्तफा का कहना है कि वे अपने 'शिपिंग कंटेनर' का इस्तेमाल एक दुकान के रूप में कर रहा हैं. उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि जिन लोगों से उन्होंने सामान खरीदा है उनमें से कई देश छोड़ने की उम्मीद में सीमा की तरफ जा रहे थे. मुस्तफा कहते हैं, "पहले हम एक सप्ताह में एक या दो घरों से सामान खरीदते थे, अगर आपके पास सामान रखने की जगह है तो एक बार में आप 30 घरों के सामान खरीद सकते हैं. लोग असहाय और गरीब हैं."
मुस्तफा कहते हैं कि लोग 6 हजार डॉलर के दाम वाले माल दो हजार डॉलर में बेचने को मजबूर हो रहे हैं.
अफगानिस्तान पहले से ही सूखा और भोजन की कमी से जूझ रहा है और कोविड-19 महामारी ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ाई हैं. कोरोना के कारण देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की स्थिति और भी भयावह हो गई है.(dw.com)
एए/सीके (एएफपी)
दुबई, 14 सितम्बर | मुंबई इंडियंस के कप्तान रोहित शर्मा ने आईपीएल 2021 के दूसरे चरण के लिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में क्वारंटीन के दौरान ट्रेनिंग शुरू कर दी है। आईपीएल 2021 का दूसरा चरण 19 सितंबर से शुरू होना है। रोहित इंग्लैंड से तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह और बल्लेबाज सूर्यकुमार यादव के साथ शनिवार को यूएई पहुंचे थे। ये सभी खिलाड़ी छह दिनों के लिए क्वारंटीन में हैं।
मुंबई इंडियंस की फ्रेंचाइजी ने कप्तान के होटल में बाइसाईकिल के जरिए व्यायाम करने की फोटो ट्विटर पर साझा की।
फ्रेंचाइजी ने साथ ही फील्डिंग कोच जेम्स पामेंट का एक वीडियो शेयर किया जिसमें यूएई पहुंचने वाले खिलाड़ियों के साथ वह ड्रिल कर रहे हैं।
मुंबई इंडियंस आईपीएल की गत विजेता है और वह आईपीएल 2021 के दूसरे चरण में चेन्नई सुपर किंग्स की टीम के साथ मुकाबले से अपने अभियान की शुरूआत करेगी।
मुंबई का इसके बाद मकाबला अबु धाबी में कोलकाता नाइट राइडर्स से 23 सितंबर को होगा।(आईएएनएस)
सना, 14 सितम्बर | एक सैन्य सूत्र ने मंगलवार को जानकारी दी कि पिछले 24 घंटों में यमन के मारिब प्रांत में सऊदी के नेतृत्व वाले हवाई हमलों में कम से कम 43 हाउती विद्रोही मारे गए हैं। मारिब में सशस्त्र बलों के मीडिया सेंटर के सूत्र ने समाचार एजेंसी सिन्हुआ को बताया कि हवाई हमले में सिरवाह जिले में अग्रिम मोर्चे पर विद्रोहियों की चौकियों, सभाओं और अतिरिक्त सैन्य चौकियों को निशाना बनाया गया, जिसमें 43 लोग मारे गए और हथियारों से लैस नौ वाहनों को नष्ट कर दिया गया।
उन्होंने कहा, हवाई हमले विद्रोहियों द्वारा (यमनी) सेना के मोर्चे पर अग्रिम मोर्चे पर शुरू किए गए जमीनी हमलों की प्रतिक्रिया थे। उन्होंने दावा किया कि सरकार समर्थक सशस्त्र बलों में कोई हताहत नहीं हुआ है।
हाउती द्वारा संचालित अल-मसीरा टीवी ने अधिक विवरण दिए बिना ही सिरवाह जिले में 19 सऊदी नेतृत्व वाले हवाई हमलों की सूचना दी।
पिछले हफ्ते, हाउतीयों ने दक्षिण-पश्चिमी मारिब में राहाबा जिले पर नियंत्रण कर लिया था।
फरवरी में, हाउती मिलिशिया ने तेल-समृद्ध प्रांत, सऊदी समर्थित यमनी सरकार के अंतिम उत्तरी गढ़ पर नियंत्रण करने के प्रयास में मारिब पर एक बड़ा हमला किया था।
इसके बाद यमन का गृहयुद्ध 2014 के अंत में भड़क गया जब हाउती समूह ने देश के अधिकांश उत्तर पर नियंत्रण कर लिया और राष्ट्रपति अब्द-रब्बू मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को राजधानी सना से बाहर कर दिया।
हादी की सरकार का समर्थन करने के लिए मार्च 2015 में यमनी संघर्ष में एक सऊदी नेतृत्व वाले अरब गठबंधन ने हस्तक्षेप किया। (आईएएनएस)
-दिलनवाज़ पाशा
अमेरिका में हिंदुत्व को लेकर हुआ एक वर्चुअल सम्मेलन विवादों के बीच समाप्त हो गया है.
सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध में चले अभियानों के बीच 'डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व' नाम से हुई इस वर्चुअल कॉन्फ्रेंस में हिंदुत्व को नफ़रत से प्रेरित विचारधारा बताया गया और इस पर सवाल खड़े किए गए.
सम्मेलन के आयोजकों का कहना है कि इसका विरोध करने वालों ने उनकी आवाज़ को दबाने और पैनल में शामिल अकादमिक जगत के लोगों को डराने की कोशिश की.
वहीं इसका विरोध करने वाले लोगों और समूहों का कहना है कि ये सम्मेलन राजनीति से प्रेरित था और इसका मक़सद वैश्विक स्तर पर भारत और हिंदू धर्म की छवि ख़राब करना था.
हिंदुत्व की राजनीति को सेक्युलर करने की कोशिश
10-12 सितंबर के बीच ऑनलाइन हुए इस सम्मेलन को अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के 53 विश्वविद्यालयों के 70 से अधिक केंद्रों, इंस्टीट्यूट्स, कार्यक्रमों और अकादमिक विभागों का समर्थन प्राप्त था.
इसे अमेरिका की हार्वर्ड, स्टेनफर्ड, प्रिंस्टन, कोलंबिया, बर्कले, यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो, द यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेन्सिलवीनिया और रटजर्स जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों का सहयोग और समर्थन प्राप्त था.
आयोजकों का दावा है कि इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए दस हज़ार से अधिक लोगों ने पंजीकरण किया और साढ़े सात हज़ार से अधिक लोग इसके साथ जुड़े.
सम्मेलन के आयोजकों में शामिल प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर ज्ञान प्रकाश ने बीबीसी को बताया, "डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व सम्मेलन का मक़सद हिंदुत्व और भारत की विविधता पर उसके असर का विश्लेषण करना था. हिंदुस्तान के जो अलग-अलग धर्म हैं, अल्पसंख्यक हैं, दलित हैं, औरतें हैं उन पर हिंदुत्व का क्या असर हो रहा है, इस पर सम्मेलन के दौरान चर्चा की गई."
ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "आज जब हिंदुत्व वैश्विक स्तर पर प्रसार की कोशिश कर रहा है, तो हमने इस कॉन्फ्रेंस के जरिए ये समझने की कोशिश की है कि ग्लोबल स्तर पर इसका क्या असर हो रहा है."
आयोजकों का कहना है कि ये अमेरिका में विभिन्न अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय यूनिवर्सटियों के सहयोग से हिंदुत्व के मुद्दे पर हुआ अपनी तरह का पहला सम्मेलन है जिसमें बड़ी तादाद में अकादमिक और शिक्षा जगत के शोधार्थी और शिक्षाविद शामिल हुए. तीन दिन के इस सम्मेलन में कुल नौ सत्र हुए जिनमें 30 से अधिक वक्ताओं ने अपने विचार रखे.
इन सत्रों में ग्लोबल हिंदुत्व क्या है, हिंदुत्व की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, जाति और हिंदुत्व, हिंदुत्व की जेंडर और सेक्सुअल पॉलिटिक्स, हिंदुत्व के प्रोपेगेंडा और डिजीटल इकोसिस्टम जैसे विषयों पर चर्चा की गई.
डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्वा
इमेज स्रोत,SUHAG SHUKLA
प्रोफ़ेसर ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफर जैफरो ने अपने पेपर में ये बताया कि कैसे और क्यों हिंदुत्व 1995 के बाद वैश्विक स्तर पर बढ़ गया. हमने इस बात पर भी चर्चा की है कि कैसे हिंदुत्व विज्ञान के ख़िलाफ़ एजेंडा चला रहा है."
क्यों हुआ इस सम्मेलन का विरोध?
सोशल मीडिया पर इस सम्मेलन का ज़बरदस्त विरोध हुआ है. आयोजकों का दावा है कि सम्मेलन के ख़िलाफ़ चलाए गए ऑनलाइन अभियानों ने इस सम्मेलन में शामिल विश्वविद्यालयों के सर्वर जाम कर दिए.
बीबीसी को भेजे एक बयान में आयोजकों ने दावा किया है कि इस सम्मेलन के ख़िलाफ़ इसमें शामिल यूनिवर्सटियों के प्रेसिडेंट, प्रोवोस्ट और अन्य अधिकारियों को दस लाख के करीब ईमेल भेजे गए.
आयोजकों का दावा है कि ड्रयू यूनिवर्सिटी के सर्वर पर चंद मिनट के भीतर ही तीस हज़ार ईमेल भेज दिए गए. इस ऑनलाइन हमले की वजह से यूनिवर्सटियों को सम्मेलन के नाम वाले सभी ईमेल ब्लॉक करने पड़े.
आयोजकों का ये भी कहना है कि सम्मेलन के ख़िलाफ़ चले विस्तृत अभियान के बावजूद किसी भी यूनिवर्सिटी ने इससे अपने हाथ नहीं खींचे. हालांकि सम्मेलन की वेबसाइट दो दिन बंद रही, इसका फ़ेसबुक पेज भी बंद कर दिया गया.
सम्मेलन के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान
भारत के हिंदूवादी समूहों और कार्यकर्ताओं के अलावा अमेरिका में रह रहे हिंदू समूहों ने भी इस सम्मेलन का ज़बरदस्त विरोध किया. हिंदू अमेरिकन फ़ाउंडेशन ने इस सम्मेलन के ख़िलाफ़ एक व्यापक अभियान चलाया.
इसके विरोध की वजह बताते हुए एचएएफ़ की संस्थापक सुहाग शुक्ला ने बीबीसी से कहा, "हम 'हिंदुओं की छवि' को लेकर चिंतित नहीं है. ये कार्यकर्ता हिंदुओं के ख़िलाफ़ अपना नफ़रत भरा एजेंडा दशकों से चला रहे हैं."
"हमारी चिंता इस बात को लेकर है कि जब प्रोफ़ेसर अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर विभाजनकारी और नफ़रत भरे भाषण देंगे और ये राजनीतिक सक्रियतावाद के साथ मिल जाएगा तो इसका उदार शिक्षा व्यवस्था पर क्या असर होगा."
सुहाग कहती हैं, "शिक्षा का मकसद छात्रों को विविध विचारों को समझना और विभिन्न दृष्टिकोणों को तर्कशीलता और सम्मान से देखना सिखाना होता है. हम इसे लेकर भी चिंतित हैं कि जब हिंदुओं को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया जाएगा और बर्बर बताया जाएगा तो इसका हिंदू छात्रों और शिक्षकों पर क्या असर होगा."
'कई लोगों को धमकी भरे संदेश मिले हैं'
सम्मेलन के आयोजकों का कहना है कि उन्हें अंदेशा था कि इसका विरोध होगा लेकिन इतना भारी विरोध होगा ये उन्होंने नहीं सोचा था.
ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "हमें ये अंदेशा तो था कि इस सम्मेलन का कुछ तो विरोध होगा लेकिन एक अकादमिक सम्मेलन से ये लोग इतने डर जाएंगे, ये हमने नहीं सोचा था. हमारे पैनल में शामिल कई लोगों को धमकी भरे संदेश मिले हैं."
"ट्विटर, फोन और ईमेल पर उन्हें धमकिया दी गई हैं. गंदी भाषा का इस्तेमाल किया गया है. ख़ासकर महिलओं को बहुत गंदे और धमकी भरे मैसेज मिले हैं. सम्मेलन में शामिल कुछ शिक्षाविद धमकियों की वजह से पीछे हटे हैं. ये लोग भारत में रहते हैं और हम उनकी सुरक्षा को ख़तरा नहीं पहुंचाना चाहते हैं."
वहीं विपक्षी विचारधारा के शिक्षाविदों को शामिल न करने के सवाल पर ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "हमारे सम्मेलन का उद्देश्य साफ़ था कि हम हिंदुत्व पर चर्चा करेंगे और इसके बारे में लोगों में जागरूकता लाएंगे. हम हिंदुत्व का विरोध करते हैं. ये कोई बहस का मुक़ाबला नहीं था कि इसमें सभी पक्षों को शामिल किया जाता. बल्कि ये हिंदुत्व के मुद्दे पर अकादमिक चर्चा थी. इसलिए ही हमने दूसरे पक्ष को इसमें शामिल नहीं किया क्योंकि हम उनके एजेंडे को पहले से ही जानते हैं."
सम्मेलन के आलोचकों का तर्क है कि इस सम्मेलन में हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोशिश की गई.
प्रोफ़ेसर ज्ञान प्रकाश इस आलोचना को दरकिनार करते हुए कहते हैं, "हम हिंदुत्व और हिंदू धर्म को एक नहीं मानते हैं. ये दोनों अलग-अलग हैं. हिंदुत्व एक राजनीतिक आंदोलन है जबकि हिंदू धर्म इससे बिलकुल अलग है. हिंदुत्व के समर्थक हमेशा ये कहने की कोशिश करते हैं कि हिंदुत्व ही हिंदू धर्म है. लेकिन वास्तव में ये बिलकुल अलग-अलग हैं. हम ये मानते हैं कि हम हिंदुत्व के ख़तरे को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. हम देख रहे हैं कि पिछले छह-सात सालों या उससे पहले से हिंदुस्तान में हिंसा हुई है. वैश्विक स्तर पर भी ये लोग ये कहने की कोशिश करते हैं कि हिंदुत्व ही हिंदू धर्म है."
वहीं प्रोफ़ेसर ज्ञान प्रकाश के इस तर्क को ख़ारिज करते हुए विजय पटेल कहते हैं, "ये लोग मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुए कुछ अपराधों की वजह से समूचे हिंदू समाज को एक रंग में रंगना चाहते हैं लेकिन इस तरह के अपराध तो हिंदुओं के ख़िलाफ़ भी हुए हैं. ऐसे में कुछ असंगठित अपराधों की वजह से समूचे हिंदू समाज को बदनाम नहीं किया जा सकता है. भारत एक सहिष्णु राष्ट्र है, इस तरह के एजेंडा आधारित सम्मेलन से भारत की छवि ख़राब हुई है."
हिंदुत्व को लेकर आयोजकों के विचार क्या हैं?
प्रोफ़ेसर ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "हिंदुत्व भारत के मुसलमानों के ख़िलाफ़ है, भारत के दलितों के ख़िलाफ़ है और भारत की महिलाओं के ख़िलाफ़ है. हम हिंदुत्व की आलोचना कर रहे हैं, हिंदुस्तान की आलोचना नहीं कर रहे हैं. बहुत लोग हिंदुत्व के बारे में नहीं जानते हैं."
"विद्वान तो जानते हैं लेकिन आम लोग नहीं जानते हैं. हम ये कोशिश कर रहे हैं कि आम लोगों को भी इस विचारधारा के बारे में पता चले. हिंदुत्व अब यूरोप और अमेरिका में भी फैल रहा है और फैलने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में यहां भी इसके बारे में लोगों को जागरूक करने की ज़रूरत है."
तमाम विरोध के बाद भी ये सम्मेलन हुआ और इसमें हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की गई. लेकिन सवाल ये है कि ये सम्मेलन इतना ज़रूरी क्यों था कि भारी विरोध के बाद भी इसे आयोजित किया गया?
इस सवाल पर ज्ञान प्रकाश कहते हैं, "अगर हम इस सम्मेलन को रोक देते तो ये उन लोगों की जीत होती. वो चाहते हैं कि हिंदुत्व को हम स्वीकार कर लें. वो जो तर्क देते हैं उसे हम स्वीकार कर लें और हिंदुत्व की कोई आलोचना ना करें. इसलिए उन्होंने इस सम्मेलन को रोकने की बहुत कोशिश की, हमारे पैनल में शामिल कई लोगों को धमकी भी मिली. यदि हम इस सम्मेलन को रोक देते तो ये अकादमिक आज़ादी के ख़िलाफ़ होता. क्या हम उनके डर से बात करना भी बंद कर दें?"
प्रकाश कहते हैं, "हमारे यूनिवर्सिटी कैंपस में भी ये लोग जड़े जमाने की कोशिश कर रहे हैं. ये लोग तर्क देते हैं कि भारत का मतलब है हिंदू और हिंदू का मतलब है हिंदुत्व. हमारा मानना है कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है बल्कि एक राजनीतिक विचारधारा है जिसकी कुछ ख़ास विशेषताएं हैं जैसे ये विचारधारा जातिवाद पर चलती है, ये ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं."
"ये लोग गांधी और आंबेडकर को भी अपने हिसाब से अपनाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि दोनों ही जातिवाद के ख़िलाफ़ थे. हम अपने छात्रों को गांधी और आंबेडकर के बारे में पढ़ाते हैं. हम नहीं चाहते कि हमारे छात्र ये बात माने कि गांधी और आंबेडकर भी हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े थे."
वहीं सुहाग शुक्ला तर्क देती हैं कि उनका विरोध सम्मेलन को रद्द कराने के लिए नहीं था.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमने कभी भी सम्मेलन को रद्द करने की मांग नहीं की थी, इसलिए हमें इसमें कोई शक ही नहीं था कि ये सम्मेलन होगा. सम्मेलन के आयोजकों ने ये झूठ जानबूझकर फैलाया है कि हमारे प्रयास इसे रद्द करवाने के लिए थे. हमने इस सम्मेलन से संबंधित विश्वविद्यालयों से इससे दूरी बनाने के लिए कहा था क्योंकि ये स्पष्ट तौर पर एक विभाजनकारी और राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्यक्रम था जिसका मक़सद हिंदुओं के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाना था."
सुहाग कहती हैं, "हिंदुओं की तुलना श्वेत वर्चस्ववादियों से की जा रही है. जबकि वास्तविकता ये है कि हम ख़ुद ही श्वेत वर्चस्ववाद के पीड़ित हैं. अमेरिका में हिंदू अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक हैं. हम अमेरिका की कुल आबादी का सिर्फ़ 1.3 प्रतिशत हैं. हमें लगता है कि इस सम्मेलन के आयोजक और इसमें शामिल हुए लोग या तो अपनी समझ गंवा चुके हैं या फिर उन्हें हमारी परवाह ही नहीं है."
हिंदुओं से माफ़ी मांगे संस्थान
इस सम्मेलन को अमेरिका, यूरोप और ब्रिटेन की प्रसिद्ध यूनिवर्सटियों ने समर्थन दिया था. अब हिंदूवादी कार्यकर्ता चाहते हैं कि ये संस्थान हिंदुओं से माफ़ी मांगे.
सुहाग कहती हैं, "अब जब ये सम्मेलन हो चुका है, हमारी चिंताएं सही साबित हुई हैं. सम्मेलन से पहले भले ही विश्वविद्यालयों ने आयोजकों को संदेह का लाभ दिया हो क्योंकि अधिकतर आयोजक या तो उनके कर्मचारी हैं या फैकल्टी हैं. लेकिन अब जब इस सम्मेलन की सामग्री सामने आ चुकी है, हम उम्मीद करते हैं कि विश्वविद्यालय इसे देखेंगे ताकि उन्हें पता चल सके कि जिस सम्मेलन के साथ उनकी साख अधिकारिक तौर पर जुड़ी थी उसमें हिंदुओं के प्रति कितनी नफ़रत थी."
"सम्मेलन से जुड़े संस्थानों को अपने कैंपस के हिंदू छात्रों और शिक्षकों से संपर्क करना चाहिए और समुदाय की तरफ से व्यक्त की गई चिंताओं को गंभीरता से ना लेने के लिए उनसे माफ़ी मांगनी चाहिए. इसके अलावा विश्वविद्यालयों को इस सम्मेलन की वजह से डर, हिंसा या किसी भी तरह का ख़तरा महसूस करने वाले छात्रों के प्रति सहयोग करना चाहिए."
वहीं सभी तरह की आलोचना को खारिज करते हुए ज्ञानप्रकाश कहते हैं, "यदि आप ये चर्चा सुनेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ये एक अकादमिक चर्चा है. हिंदुत्व से जुड़े लोग चाहते हैं कि उन पर कोई चर्चा ही ना हो. भारत और हिंदुत्व एक चीज़ नहीं है. भारत एक विविध संस्कृति वाला देश है. हिंदुत्व एक कट्टरवादी राजनीतिक विचारधारा है.अब हमने ये तय किया है कि हम ना सिर्फ ये सम्मेलन कर रहे हैं बल्कि आगे भी इसे चलाए रखेंगे." (bbc.com)
एक पिता और उसका बेटा सोफे पर बैठ कर होमवर्क कर रहे हैं और मां और बेटी जमीन पर बैठे हैं. पाकिस्तान में मर्दों और औरतों के बारे में पुराने खयालात दिखाने वाली इन किताबों की आलोचना हो रही है.
पाकिस्तान में सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने इसी साल अगस्त में देश के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम (एसएनसी) में संशोधन किया और कहा कि ये संशोधन "शिक्षा प्रणाली में असमानता का अंत करने की राह में एक में एक मील का पत्थर है."
लेकिन इस नए पाठ्यक्रम की किताब जारी होने के बाद से सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसकी आलोचना की है. उनका कहना है कि किताब में महिलाओं और पुरुषों को पितृसत्तात्मक रूप से दर्शाया गया है.
विचारधारा पर आधारित
यह आक्रोश शिक्षा विशेषज्ञों, ऐक्टिविस्टों और आम लोगों द्वारा की गई इस पाठ्यक्रम की आलोचना की ही तर्ज पर है. उनका कहना है कि यह लैंगिक बराबरी, धार्मिक अल्पसंख्यकों और सांस्कृतिक विविधता को शामिल करने में असफल हो गया है.
वीमेन ऐक्शन फोरम ने एक बयान में एसएनसी को "शिक्षा संबंधी अनिवार्यताओं की जगह विचारधारा संबंधित अनिवार्यताओं पर आधारित" बताया और कहा कि यह "समाज में विभाजन की सोच के बीज बोएगा."
पांचवीं कक्षा की अंग्रेजी की किताब के आवरण पर एक पिता-पुत्र की सोफे पर पढ़ाई करते हुए तस्वीर है जबकि मां-बेटी जमीन पर पढ़ रही हैं. मां-बेटी ने हिजाब से अपने अपने सरों को भी ढक रखा है.
अधिकतर किताबों के आवरण पर छोटी बच्चियों को भी हिजाब पहने दिखाया गया है. सामान्य रूप से लड़कियां यौवनारंभ या प्यूबर्टी शुरू होने के बाद हिजाब पहनना शुरू करती हैं. उसी किताब में महिला नेताओं को "पुरुषों की समर्थक" भी बताया गया है.
असलियत से परे
लड़कियों और महिलाओं को मुख्य रूप से मां, बेटी, पत्नी और शिक्षिका के रूप में दिखाया गया है. खेलने और व्यायाम करने के चित्रों में उनके चित्र नहीं हैं. सिर्फ लड़कों को खेलते और व्यायाम करते देखा जा सकता है. लड़कियों को जिन चित्रों में जगह दी गई है उनमें वो महज दर्शक की तरह नजर आ रही हैं.
इदारा-ए-तालीम-ओ-आगाही (आईटीए) केंद्र की सीईओ बेला रजा जमील पूछती हैं, "पाकिस्तान में लड़कियां और महिलाएं इस समय खेलों में श्रेष्ठ प्रदर्शन दिखा रही हैं. वे ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. के2 जैसे पर्वतों पर चढ़ रही हैं. तो किताबें क्यों इसे प्रतिबिंबित करने की जगह शारीरिक गतिविधियों और प्रतियोगी खेलों से उन्हें बाहर कर रही हैं."
ऐक्टिविस्ट और समाजशास्त्री निदा किरमानी ने डीडब्ल्यू को बताया कि लड़कियों के पहनावे को लेकर इन किताबों में जो संदेश दिए जा रहे हैं वो महिलाओं की लाज और कपड़ों के बारे में सरकार द्वारा दिए गए संदेशों के बाद ही आए हैं.
हाल ही में प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ लोगों का गुस्सा फट पड़ा था जब उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही यौन हिंसा के लिए उनके पहनावे को जिम्मेदार बताया था.
किरमानी कहती हैं, "ऐसा लग रहा है कि ये किताबें सभी लड़कियों और महिलाओं के लिए एक ही तरह के पहनावे की बात कर रही हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि पाकिस्तान में कपड़े पहनने का सिर्फ एक तरीका नहीं है, बल्कि पर्दा करने का कई तरह का दस्तूर मौजूद है."
दक्षिणपंथी एजेंडा
संघीय शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण मंत्रालय की तकनीकी सलाहकार आयशा रज्जाक ने डीडब्ल्यू को बताया कि हालांकि महिलाओं को पुलिस और पायलट के रूप में दिखाए जाने के उदाहरण भी हैं, यह एक अपवाद है. उनके अनुसार यह एसएनसी में मौजूद "लिंग आधारित प्रतीकवाद" को और आगे बढ़ाता है.
वह बताती हैं कि एसएनसी के अति-दक्षिणपंथी समर्थक इसी तरह के उदाहरणों को चुन कर आलोचना को नकार रहे हैं और पाठ्यक्रम में एक ऐसे एजेंडा को विश्वसनीयता देने की कोशिश कर रहे हैं जिसे पाकिस्तान के धार्मिक दक्षिणपंथी समर्थकों की तुष्टि के लिए बनाया गया है.
आईटीए की जमील ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में महिलाएं पहले से भेदभावपूर्ण परंपराओं की वजह से अनुपातहीन रूप से प्रभावित हैं, वहां सर ढकने को सामान्य करने के संकेतों से उनके खिलाफ हिंसा और बढ़ सकती है.
पाकिस्तान के उच्च शिक्षा आयोग के पूर्व अध्यक्ष तारिक बनूरी ने डीडब्ल्यू को बताया कि एसएनसी में महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और सांस्कृतिक विविधता के प्रतिनिधित्व में कमी की वजह से लोगों के बीच विभाजन बढ़ेगा और देश की शिक्षा प्रणाली और "उलझ" जाएगी.
"खतरा इस बात का है कि हमारे यहां एक और पीढ़ी जो सीख रही है उस पर सवाल नहीं उठा पाएगी. यह एक घातक समस्या है." दक्षिणी प्रांत सिंध ने एसएनसी को नकार दिया है और उसे "ऊटपटांग" और "लैंगिकवादी" बताया है. (बी. मारी)




