विशेष रिपोर्ट

10-Sep-2020 7:29 PM

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 10 सितंबर (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। जिले के खैरागढ़ वन क्षेत्र के भीतरी जंगलों में प्रतिबंध के बावजूद बांस करील को वनों से सफाया किया जा रहा है। बेखौफ तरीके से अंदरूनी इलाकों में बसे वन बाशिंदे बांस की नई पौध को खुलकर हानि पहुंचा रहे हैं। वहीं जंगली बंदर भी बांस करील को चट कर रहे हैं। व्यवहारिक रूप से वन महकमे के पास इस समस्या से निपटने के लिए कारगर तरीका नहीं है।

खासतौर पर बंदरों के जरिये हो रहे नुकसान को रोकने की दिशा में भी वन अमला असहाय दिख रहा है। बताया जा रहा है कि जायकेदार सब्जी का स्वाद चखने के लिए बांस करील को अंकुरित होने के कुछ दिनों में ही लोग उखाड़ रहे हैं। लिहाजा बांस की नई पैदावार खड़ी नहीं हो पा रही है। नए बांस की उपज नहीं होने से जंगलों की रौनकता गायब हो रही है।

खैरागढ़ वन मंडल के मलैदा, जुरलाखार और भावे के घने जंगल बांस से लदे हुए हैं। हर साल वन महकमे द्वारा बांस कटाई के लिए  अभियान चलाया जाता है। कटाई के लिए चिन्हांकित बांस के कूप बनाए जाते हैं। बांस की वनोपज में गिनती होती है।

लिहाजा संरक्षित और रिजर्व जंगली क्षेत्रों में बांस की तोड़ाई महकमे की देखरेख में होती है। इसलिए शासन के निर्देश पर हर साल अलग-अलग कूपों में बांस की कटाई होती है। कटे हुए बांसों को सरकार द्वारा नीलाम किया जाता है और उससे हुए आय का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा लाभांश के तौर पर वन समितियों को दिए जाने का प्रावधान है।

मिली जानकारी के मुताबिक प्रतिबंधित बांस करील को काटने की सूरत में वन्य अधिनियम 33 (संरक्षित) और 26 (आरक्षित) के तहत सख्त अपराध दर्ज करने का प्रावधान है। इस संबंध में खैरागढ़ डीएफओ रामावतार दुबे ने ‘छत्तीसगढ़’ से कहा कि वन्य प्राणियों के द्वारा बांस करील को खाने के दौरान नुकसान पहुंचता है। वहीं वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को बांस करील नहीं तोडऩे की हिदायत समय-समय पर दी जाती है। 

इस बीच खैरागढ़ वन मंडल के कटेमा, महुआढ़ार, नक्टी घाटी, घाघरा समेत मलैदा और अन्य इलाकों में बांस करील व्यापक रूप से अंकुरित हुए हैं।

बताया जा रहा है कि साप्ताहिक बाजारों में भी इसका धड़ल्ले से कारोबार किया जा रहा है। बांस की खासियत यह है कि वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साईड का आदान-प्रदान कर प्रकृति को संरक्षित करने में अहम भूमिका अदा करता है।


28-Jul-2020 4:07 PM

    29 जुलाई : राष्ट्रीय बाघ दिवस    

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 28 जुलाई (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। राजनांदगांव जिले के घने जंगलों में भले ही बाघों का स्थाई ठिकाना नहीं है, लेकिन यहां के जंगल बाघों की निगाह में सुरक्षित कारीडोर रहा है। साल में कम से कम दो बार देश के दो बड़े प्रख्यात राष्ट्रीय अभ्यारण्य ताड़ोबा (गढ़चिरौली) और कान्हा नेशनल पार्क (मध्यप्रदेश) के बीच बाघ राजनांदगांव जिले के जंगल को एक सुरक्षित कारीडोर मानकर आवाजाही करते हैं। 

वन महकमे को बाघों की मौजूदगी के प्रमाण उनके पदचिन्हों से मिलता है।  बताया जाता है कि बाघनदी के रास्ते दोनों नेशनल पार्क से बाघों का आना-जाना होता है। यह बाघ एक तरह से इसे कारीडोर के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हालांकि बीते दो दशक में राजनांदगांव जिले में बाघों का स्थाई ठौर नहीं रहा है। 
बताया जा रहा है कि यहां की आबो-हवा पूरी तरह से अनुकूल है। पिछले कुछ सालों में बाघों का शिकार होने के कारण भी राजनांदगांव जिले से उनकी बसाहट खत्म हो गई है। ताड़ोबा और कान्हा नेशनल पार्क को बाघों के लिए ही जाना जाता है। बाघ औसतन सालभर में दो बार राजनांदगांव के भीतरी जंगलों से होकर दोनों पार्कों के बीच फासला तय करते हैं। बताया जाता है कि बाघनदी के रास्ते साल्हेवारा के जंगलों से होकर बाघ कान्हा नेशनल पार्क में पहुंचते हें। यह एक सुखद पहलू है कि बाघों  की आवाजाही के लिए यहां का जंगल अनुकूल है। 

बताया जाता है कि 70-80 के दशक में ही बाघों की नांदगांव जिले में दहाड़ सुनाई देती थी। साल्हेवारा क्षेत्र में विशेषकर बाघों का स्थाई डेरा रहता था। धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे बाघों की संख्या घटना के कारण जिले में उनकी धमक कम हो गई। इस संबंध में राजनांदगांव डीएफओ बीपी सिंह ने च्छत्तीसगढ़’ से कहा कि बाघ अब इस जिले को कारीडोर के रूप में उपयोग कर रहे हैं। एक निश्चित रास्ता बनाकर यहां से बाघों की आवाजाही होती है। 

मिली जानकारी के मुताबिक राजनांदगांव वन मंडल  925 वर्ग किमी में फैला हुआ है। बाघों के लिए बाघनदी से लेकर साल्हेवारा का इलाका बेहतर माना जाता है। इन इलाकों में पहाड़ी होने के कारण बाघों की सुरक्षा  में कोई अड़चने नहीं होती है। लंबे समय से साल्हेवारा क्षेत्र बाघों की मौजूदगी के लिए माना जाता  रहा है।
 
गौरतलब है कि 2012-13 में छुरिया इलाके में ग्रामीणों की भीड़ ने बाघ को मार डाला था। उस समय भी बाघ ताड़ोबा से भटककर राजनांदगांव जिले के जंगल में दाखिल हुआ था। दो साल पहले भी बाघनदी क्षेत्र में बाघ भटककर सडक़ में नजर आया था। कुल मिलाकर राजनांदगांव के जंगल में अनुकूल वातावरण है। बाघ के लिए हिरण और जंगली सूअरों की जिले में भरमार भी है। फिलहाल नांदगांव के जंगल से बाघों का सालों से गुजरने का सिलसिला जारी है। 


22-Jun-2020 7:57 PM

सुरेन्द्र सोनी

बलौदा (जिला जांजगीर चांपा), 22 जून। उत्तरप्रदेश के ईंट भठ्ठे में काम करने वाले 65 मजदूरों को ईंटा भठ्ठा ने पूरी मजदूरी ने देकर अकबरपुर रेलवे स्टेशन में छोड़ दिया, यहां से रेलवे ने रांची भेज दिया। रांची में भटकने के बाद प्रशासन ने छत्तीसगढ़ के बॉर्डर में उतार कर बस वापस लौट गई। पैदल ही छत्तीसगढ़ की सीमा रायगढ़ में पहुंचे। किसी तरह मजदूरों की गुहार पर अफसरों ने बस से रवाना किया गया, लेकिन बस चालक और कंडक्टर ने कोरबा बलौदा के बीच कनकी पंतोरा बेरियर के पहले ही इन्हें उतार दिया। बलौदा पुलिस थाना के बाद इन्हें जबरन उतार कर दो हजार लेकर बस चालक वहां से वापस लौट गया।

तीन चार दिनों से भूखे प्यासे मजदूर बच्चों के साथ शाम को सडक़ में खड़े रहे, लेकिन थाने से भी मदद नहीं मिली। नगर के युवक ने सूखा राशन दिया तो चूल्हा जलाकर भोजन बनाया। रात में ही मजदूरों ने मस्तूरी ब्लॉक बिलासपुर में परिजनों को वाहन के प्रबंध कराने की सूचना दिए। आज सुबह मस्तूरी बिलासपुर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और परिजनों के सहयोग से मजदूर बलौदा से सुबह 8 बजे अपने गृह ग्राम के लिए रवाना हुए।

च्छत्तीसगढ़’ संवाददाता ने रविवार शाम 5 बजे  बलौदा के सब्जी बाजार में उतरे मजदूरों को देखा। मजदूरों ने बताया कि उत्तरप्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के ईंटा भ_े में काम करने वाले महिला पुरुष और 20 बच्चे  सहित 65 मजदूरों को छत्तीसगढ़ जाने के लिए पांच दिन पहले ईंटा भ_ा मालिक ने अकबरपुर रेलवे स्टेशन में छोड़ दिया।

बारिश होने के कारण से ईंटे भ_े का काम बंद हो गया तो र्इंटा भ_ा मालिक ने काम बंद होने का हवाला देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया, जबकि कोरोना काल के लॉकडाउन में इन लोगों से भरपूर काम लिया और इनकी मेहनत की कमाई भी पूरा नहीं देकर जगह खाली करने को कहा। जहां पर श्रमिक काम बंद होने से अपने राज्य अपने गांव जाने के लिए दिनभर इधर-उधर भटकते रहे।

बेहाल मजदूरोंं की काफी जद्दोजहदऔर गुहार लगाने के बाद वहां से रेलवे के द्वारा इनको एक ट्रेन जो झारखण्ड के मजदूरों को ले कर रांची झारखण्ड जा रही थी उसी में बैठा के रांची के लिए भेज दिया, जबकि इन्हें छत्तीसगढ़ के बिलासपुर आना था। रांची झारखण्ड में इन्हें उतार दिए और अपने साधन से छत्तीसगढ़ जाने को कह रेलवेस्टेशन से बाहर कर दिए रांची में फिर से मजदूर भटकते रहे। फिर वहां के प्रशासन के द्वारा इन्हें बस की व्यवस्था कर छत्तीसगढ़ के बॉर्डर में उतार कर बस वापस लौट गए।

वहां से सभी मजदूर बच्चों सहित भारी भरकम अपना सामान लादे पैदल ही छत्तीसगढ़ की सीमा रायगढ़ में पहुंचे यहां भी इन्हें सहयोग मिलने के बजाए ताने सुनने को मिला। किसी तरह मजदूरों की गुहार उच्चाधिकारियों तक गई जहां से इनके निवास स्थान तक पहुंचाने का भरोसा दिलाया कर बस में बैठाया गया और बस रवाना हुआ, लेकिन बस चालक और कंडक्टर ने कोरबा बलौदा के बीच कनकी पंतोरा बेरियर के पहले ही इन्हें उतार दिया। इसकी जानकारी वहां बेरियर के पास कोरबा एसडीएम को हुई तो उनके चर्चा के बाद  बस चालक बलौदा के बछोद पॉइंट तक छोडऩे पर राजी हुआ। इस बीच बस चालक के द्वारा डीजल हेतु पैसे की मांग की गई तब अधिकारियों ने असमर्थता बताई और मजदूरों को ही पैसे देने को कहा। लेकिन मजदूरों का कहना है कि पैसे देने की कोई सहमति नहीं हुई थी और इसी वजह से बस चालक ने बलौदा पुलिस थाना के बाद दैनिक सब्जी बाजार के पास इन्हें जबरन उतार कर इन लोगों से दो हजार लेकर बस चालक वहां से वापस लौट गया।

अब बेसहारा, तीन चार दिनों से भूखे प्यासे मजदूर छोटे छोटे बच्चों के साथ शाम को 5 बजे बीच सडक़ में खड़े रहे। उन्होंने नजदीक बलौदा के पुलिस थाना में मदद की गुहार लगाई, लेकिन बलौदा पुलिस ने भी इन्हें दूसरे जिले से हो कह कर वहां से भगा दिया।

जांजगीर-चांपा जिले बलौदा नगर के एक युवा गोपेश गौरहा ने देखा कि मजदूर और छोटे-छोटे बच्चे भूखे प्यासे हंै तो गोपेश ने उन सभी के लिए चावल, दाल सब्जी प्याज टमाटर, सोयाबीन बड़ी, और लकड़ी, दोना पत्तल की व्यवस्था कर उन्हें भोजन बनाने के लिए दिया। चार दिनों के भूखे प्यासे श्रमिकों ने सब्जी बाजार के सेड के नीचे ही चूल्हा जला कर भोजन बनाया और खा कर रात्रि वहीं विश्राम किये। तब तक बलौदा के अधिकारियों को इसकी खबर नहीं थी, जबकि बलौदा पुलिस इन्हें पहले ही आगे के लिए चलता कर दिए थे।

रात में ही मजदूरों ने मस्तूरी ब्लाक बिलासपुर  में अपने-अपने परिजनों को यहां पहुंचने और कोई वाहन के प्रबंध करने कराने की सूचना दिए। आज सुबह मस्तूरी बिलासपुर प्रशासन,जनप्रतिनिधियों और परिजनों के सहयोग से मजदूर बलौदा से सुबह 8 बजे अपने गृह ग्राम के लिए रवाना हुए।

 

 


17-Jun-2020 7:30 PM

बड़ा नाला लबालब होने से बच्चे आंगनबाड़ी-स्कूल नहीं जा पाते

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 17 जून । कोरिया जिले का एक ऐसा आश्रित ग्राम जो बारिश में पूरी तरह अपने ग्राम पंचायत मुख्यालय से कट जाता है। बारिश के दिनों में बड़े नाले में पानी रहने के कारण कुछ बच्चे आंगनबाड़ी भी नहीं जा पाते है, तो कुछ स्कूल। वहीं जिले की बॉर्डर का अंतिम ग्राम होने के कारण विकास की किरण यहां अब तक नहीं पहुंच पाई है। काफी दूर होने के कारण अफसर ग्रामीणों की सुध नहीं लते है। यही कारण है कि ज्यादातर विकास कार्य कागजों में ही सिमट कर रह गए है। ‘छत्तीसगढ़’ ने मंगलवार को गांव जाकर हाल जाना व ग्रामीणों से बातचीत भी की।

ज्ञात हो कि कोरिया जिले के खडग़वां तहसील के ग्राम पंचायत मुगुम के आश्रित ग्राम कांसाबहरा जाने के लिए पंचायत मुख्यालय से दो किमी की दूरी तय कर एक जिंदा नाले को पार करना पड़ता है। बारिश के दिनों में इस नाले को पार करना बेहद कठिन काम होता है। ग्राम के कुछ लोगों के साथ कई मवेशी भी इस नाले के बहाव में कई बार बह चुके हैं। करीब 12 वर्ष पहले तत्कालीन संसदीय सचिव नाले तक पहुंचे थे और नाले पर पुल बनाने का आश्वासन दिया था। मंत्री बनने के बाद चुनाव के समय फिर वो नाले तक पहुंचे, वोट मांगा और इस बार फिर पुल बनाने का आश्वासन दे दिया, पर पुल आज तक नहीं बना और ग्रामीणों की परेशानियां भी खत्म नहीं हुई। वहीं ग्रामीणों को अपना राशन लेने ग्राम पंचायत मुगुम जाना पड़ता है, वह भी नाले को पार करके। वहीं कुछ बच्चों को आंगनबाड़ी जाना होता है तो 6वीं से आगे की पढ़ाई करने वाले बच्चों को भी मुगुम जाने के लिए इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में नाले को पार करने का खतरा हमेशा बना रहता है। ग्राम से बाहर जाने का दूसरा रास्ता है जो कोरबा जिले की तरफ खुलता है। धनपुर से जंगल के बीच होकर ग्रामीण मुख्य मार्ग तक पहुंच जाते है परन्तु उनको अपने काम के लिए ग्राम पंचायत मुगुम की जाना पड़ता है, जो बिना नाला पार किए नहीं जा सकते है।

कागजों पर बन गए कई विकास कार्य

ग्राम पंचायत मुगुम का आश्रित ग्राम कांसाबहरा में कई कार्य स्वीकृत हुए और कागजों पर बन भी गए। ग्रामीणों की मानें तो यहां हैडपंप के करीब स्नानागार बनाया जाना था, पैसा आया और कागजों पर स्नानागार बनकर पैसा निकल भी गया, परन्तु भौतिक रूप में अब तक किसी भी हैंडपंप में स्नानागार नहीं बन सका है। वहीं देवगुड़ी में चबूतरा निर्माण होना था, यहां त्यौहार में पूरा गांव जुटता है, परन्तु यह भी कागजों पर भी बना दिया गया।

इसी तरह इस गांव में एक भी सीसी रोड का निर्माण नहीं हुआ है। बारिश के इस मौसम में सडक़ों पर पैदल चलना भी दूभर है। पीली और चिकनी मिट्टी होने के कारण पैदल लोग फिसल कर घायल हो रहे है। सडक़ों में कई वर्षों से मुरूमीकरण तक नहीं हुआ है। इसी तरह यहां सामुदायिक भवन भी आया था, परन्तु बना आज तक नहीं है।

किसी काम के नहीं शौचालय

कांसाबहरा में 303 वोटर है, यहां की जनसंख्या में 500 के आसपास है, ऐसे में वर्ष 2017-18 में कई ग्रामीणों के शौचालय आज तक नहीं बनाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जो शौचालय बने भी है वो किसी काम के नहीं है, सिर्फ शौचालयों को खड़ा कर दिया गया, ना तो सोखता बनाया गया और ना ही शौचालय में शीट लगाई गई। वहीं शौचालय में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों को आज तक मजदूरी नहीं दी गई है, और पूरे ग्राम पंचायत को ओडीएफ घोषित कर दिया गया। ग्रामीणोंं ने कई बार मजदूरी की मांग की, परन्तु किसी ने सुध नहीं ली।

आंगनबाड़ी स्कूल जर्जर

कांसाबहरा ग्राम में स्थित आंगनबाड़ी भवन जर्जर हो चुका है, वहीं प्राथमिक स्कूल की हालत बेहद खराब है, ग्रामीणों का कहना है कि दोनों ही भवन का प्लास्टर कई बार गिर चुका है, आंगनबाड़ी भवन की छत तो एकदम ही खराब हो चुकी है। स्कूल भवन के साथ रसोईघर की दीवार भी टूट कर गिर चुकी है। वहीं ग्रामीणों की मांग है कि उनके गांव में एक सामुदायिक भवन, एक मिनी आंगनबाड़ी के साथ जल्द से जल्द नाले पर पुलिया निर्माण करवाई जाए।

इस संबंध में बैकुंठपुर विधायक अंबिका सिंहदेव का कहना है कि बारिश के मौसम में वहां ये परेशानी प्राय: देखी जाती है। उक्त पुल निर्माण के लिए मेरे द्वारा प्रस्ताव बनाने को कहा गया है, मैं मुगुम गई थी तभी मुझे वहां के लोगों ने बताया था, दूसरी ओर से वहां दो हैंडपंप का खनन कार्य भी करवाया गया है, जो हैंडपंप बिगड़े है, उन्हें भी सुधार कार्य करवाने के लिए विभाग को कहा गया है।

हाथियों का रहवास

कोरिया जिले के खडग़वां में आने वाले हाथियों का कांसाबहरा रहवास माना जाता है, कुछ माह पूर्व आए हाथी का दल यहां दो माह रूका, कुछ ग्रामीणों की फसल खाई, एक दो ग्रामीणों के घरों को हल्का नुकसान पहुंचाया, ग्रामीण बताते हैं कि इस बार दो माह रूके हाथियों दल में दो शावकों का जन्म यही हुआ, उनके बच्चे जब तक चलने लायक नहीं हो जाते, तक तक उन्हें रूकना पड़ता है, ऐसे में हाथी रात के साथ साथ दिन भी गांव में घूमते रहते थे। इस दौरान किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई थी।