विशेष रिपोर्ट

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Date : 18-Sep-2019

3 बरस से पहाड़ी कोरवा सहित दर्जनों का पीएम आवास अधूरा

क्रांति कुमार रावत

उदयपुर, 18 सितंबर (छत्तीसगढ़)। सरगुजा जिले के विकासखंड उदयपुर अंतर्गत दूरस्थ वनांचल क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत केसमा के आश्रित ग्राम बनकेसमा लालपुर और डेवापारा में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की स्थिति बद से बदतर है। ग्रामीणों का आरोप है कि 3 साल पहले आवास बनाना शुरू कर आधा-अधूरा छोड़ दिया। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है, तो कहीं निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं। अब कोई एक कमरे में सांप बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक कमरे में, तो कोई आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे-खिड़कियों के बांस का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर है।

विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवा जन जाति की बिहानी बाई ने बताया कि पीएम आवास का निर्माण 3 साल पहले शुरू हुआ था और अभी तक निर्माण कार्य अधूरा है। पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम द्वारा इसका निर्माण कार्य कराया जा रहा था और आधा अधूरा निर्माण कराकर छोड़ दिया गया। अब बिहानी बाई अपने पति सालिक राम और बच्चों के साथ एक कमरे में सांप-बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक ही कमरे में किसी तरह गुजर बसर करने को मजबूर हैं क्योंकि आवास के बनने वाले दो कमरों में से एक का तो निर्माण छत डाल कर कर दिया गया है, परंतु सामने वाले कमरे का छत अभी तक भी खुला हुआ है।

आवास हितग्राही बिहानी बाई के पति सालिक राम ने बताया कि पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम के द्वारा निर्माण के लिए आवंटित राशि आहरण करा कर अपने पास रख लिया गया अब ना तो मकान निर्माण का काम पूरा करा रहा है और ना ही और कोई जवाब दे रहा है। पूछने पर केवल यही बताता है कि निर्माण का काम करवा दूंगा।

इसी तरह जमती बाई फूलों बाई गुड्डी बाई और सुखनी बाई चारों हितग्राहियों के आवासों का निर्माण एक साथ एक ही जगह पर तीन साल पहले शुरू कराया गया था। आवास का डिजाइन कुछ इस तरह से है जैसे कोई बाउंड्री बनाया जा रहा है। बीच-बीच में पतले-पतले कॉलम खड़े कर दिए हैं। अब ना तो छत है ना ही दीवार है न दरवाजे और न खिड़कियां हैं। इस बाउंड्री के अंदर घास फूस का छप्पर लगाकर हितग्राही अपना मवेशियों को बांध कर रखते हैं।

जमती बाई के पति सुनील ने बताया कि ग्राम पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम ने यह कहकर कि तुम लोग पहाड़ी कोरवा हो और आवास का निर्माण नहीं कर पाओगे, इसलिए निर्माण की राशि मुझे दे दो, मैं बहुत जल्दी ही निर्माण कार्य पूरा करा दूंगा। चार आवासों के एक साथ निर्माण के विषय में पूछने पर सुनील ने बताया, हमारा घर पहाड़ी के ठीक नीचे जंगल के किनारे हैं, वहां हाथियों का हमेशा आना-जाना लगा रहता है। इसलिए हमारे खानदान के 4 परिवार के सदस्यों के नाम से इस स्थान पर एक साथ ही आवास का निर्माण किया जा रहा था। इन आवासों का आकार भी बहुत छोटा है और शुरू कराते ही कुछ दिनों के बाद पंचायत के सचिव ने काम बंद करा दिया। अब जो भी यहां की हालत है, आपके सामने है।

बनकेसमा की ही निवासी पहाड़ी कोरवा महिला सांझी बाई अपने लकवा ग्रस्त पति सोमारू के साथ आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे खिड़कियों के बाँस की ठठरी का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर हैं। पूछने पर उसने भी बताया कि पंचायत के सचिव कामेश्वर राम ने ही निर्माण का जिम्मा लिया था परंतु आधा-अधूरा ही छोड़ दिया। उसके पति की हालत भी ऐसी नहीं है कि वह आधे-अधूरे काम को पूरा कर सके। एक पहाड़ी कोरवा वृद्ध महिला अपने पति के इलाज का जिम्मा देखे घर बनवाये या फिर पेट की चिंता करे। यही कहानी मनीराम, लझरु, सोहन और सनी राम की भी है।

ग्राम पंचायत केसमा के ही आश्रित ग्राम लालपुर में भी प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना की स्थिति बदतर है। लालपुर निवासी ग्रामीण आदिवासी जीतू राम ने मक्का लगे हुए बाड़ी की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इसी स्थान पर आवास का निर्माण होना था, परंतु आज तक भी खाते में रकम नहीं आने की वजह से आवास का निर्माण प्रारंभ नहीं किया जा सका है उसके नाम की राशि लगभग 80,000 रूपए किसी अन्य के खाते में जाना भी बताया जा रहा है।

 लालपुर निवासी एक अन्य ग्रामीण प्रेमसाय की कहानी किसी अजूबे से कम नहीं है। आवास निर्माण के नाम पर चिन्हित स्थान पर निर्माण में लगने वाले कॉलम के लिए छड़ में रिंग बांध कर 1 साल पहले छोड़ दिया गया है। इसके बाद ना तो कोई निर्माण सामग्री आई और ना ही काम शुरू हुआ। छड़ में जंग लगने की वजह से वह भी खराब होना शुरू हो गया है। इनके द्वारा यह भी बताया गया कि 2 साल पहले ग्राम पंचायत के सचिव द्वारा आवास निर्माण कराए जाने के नाम पर रकम पूरा निकलवा कर ले जाया गया है परंतु निर्माण आज तक शुरू नहीं कराया गया है। इन्होंने जांच कराकर संबंधित सचिव पर कार्रवाई की बात भी कही है।

लालपुर निवासी जवाहर सूरजलिया राजकुमार घूमी बाई और महकूल सिंह के भी आवासों की यही कहानी है। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है।

ग्राम पंचायत केसमा के अंतर्गत ही ग्राम डेवापारा में सबलसाय आत्मज कष्टू और सुखसाय जो कि दोनों भाई है, उनके आवास निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं और किसी तरह की भी ना तो कोई दीवार और ना ही कोई कॉलम नजर आता है। पास में ही स्थित सीसी रोड में कुछ र्इंट और कुछ गिट्टी और थोड़ी बहुत रेत पड़ी हुई दिखाई देती है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना से संबंधित मोबाइल ऐप में देखने पर इन दोनों आवासों के लिए आबंटित पूरी राशि का आहरण हो चुका है और निर्माण कार्य पूर्ण दिखाई देता है।

इस संबंध में तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि कुछ हितग्राहियों के कहने पर मेरे द्वारा उन लोगों का निर्माण कार्य कराया जा रहा है। बारिश और स्थानांतरण की दिक्कत की वजह से कार्य अधूरा है। बारिश खत्म होते ही काम पूरा कराया जाएगा। कुछ निर्माण कार्य नेट में पेंडिंग दिखा रहा था, इसलिए उन लोगों का निर्माण कार्य पूर्ण दिखाया गया है।

इस संबंध में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत उदयपुर पारस पैकरा से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है, जांच कराकर बता पाऊंगा।

बॉक्स

 ग्रामीण विकास मंत्रालय से जारी आंकड़े जो कि मोबाइल ऐप से प्राप्त हुए उनकी बात करें तो ग्राम पंचायत केसमा में कुल योग्य लाभार्थी 187 है। स्वीकृत आवास 127 है। पहली किश्त का भुगतान जिनको किया गया ऐसे हितग्राही 98 है। दूसरी किश्त का भुगतान किया गया सहित कई 96, तीसरी किश्त जिसका भुगतान किया गया ऐसे हितग्राही 87 हैं और जिनका आवास पूर्ण हो चुका है ऐसे हितग्राही 72 हैं। इन आधे अधूरे आवासों की स्थिति मोबाइल ऐप से देखने पर ज्यादातर आवास पूर्ण दिखाए जा रहे हैं और आबंटित राशि का भी आहरण पूर्ण दिखाया जा रहा है।


Date : 15-Sep-2019

पत्थलगांव-ठाकुरपोड़ी में आए 11 हाथी, कॉलर आईडी से मिल रही जानकारी

जितेन्द्र गुप्ता

छत्तीसगढ़ संवाददाता
पत्थलगांव, 15 सितंबर। 
वन मण्डल कापु से शनिवार सुबह 4 बजे हाथियों का दल पत्थलगांव से 7 किलोमीटर की दूरी में स्थित ग्राम ठाकुरपोड़ी के कक्ष क्रमांक पी 991 पहुंचा जिसकी सूचना पत्थलगांव वनमंडल के अधिकारियों को भी मिली एवं आसपास के गाँव वालों को एहतियात के तौर पर सतर्क करते हुए फारेस्ट की टीम को हाथियों पर नजर रखने कहा। पत्थलगांव के एसडीओ के साथ सभी स्टॉफ लगे हुए हैं। वहीं 11 हाथियों के दल में एक गौतमी हाथी भी है जो फीमेल है। उसके गले में कॉलर आईडी लगी हुई है। जिससे वह विभाग के अधिकारियों को सेटेलाईट के द्वारा हर छ: घंटे में सूचना प्राप्त होती रहती है। हाथियों के दल में निगरानी करने में वन विभाग को काफी आसानी हो जाती है। 

 मुख्य बातें जैसे ही गौतमी हाथी दल के पत्थलगांव में आने की खबर लगी तो पत्थलगांव एसडीओ आर.आर. पैकरा ने अंकित कुमार एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता को साथ लेकर ग्राम ठाकुरपोड़ी  में आये गौतमी हाथी के दल को देखने निकल गए। अंकित कुमार का परिचय बता दें ये केंद्र सरकार से डेपुटेशन में छतीसगढ़ तीन साल के लिए आये हैं। ये हाथी के विशेषज्ञ है। इनका काम है हाथियों के आने-जाने के रास्तों से लेकर उनके फोटो लेकर डाटा कलेक्ट करना जिससे उन्हें हाथियों के बारे में रिसर्च किया जा सके। अंकित कुमार एवं इनकी पूरी टीम ने ही वर्ष 2018 जून में सरगुजा के मैनपाट में गौतमी हाथी को बेहोश कर उसके गले में कॉलर आईडी लगाई थी। कॉलर आईडी लगाने वाली टीम  के मुख्य हिस्सा रहे हैं। 

रास्ते में हमारे संवाददाता को उन्होंने बताया कि अभी पूरे छतीसगढ़ में हाथियों के 6 दल में रेडियो कॉलर आईडी लगाई गई थी जिसमें से 3 कॉलर आईडी खराब हो गई है। वर्तमान में तीन दल जिसमें एक गौतमी दल, एक गणेश दल एवं एक प्यारे दल में रेडियो कॉलर आईडी लगी हुई है जिससे इन तीनों दलों के लोकेशन की जानकारी हमें हर 6 घंटे में प्राप्त होती रहती है। कुछ 20 मिनट के सफर के बाद हम ठाकुरपोड़ी पहुँच गए और सड़क से लगभग एक से दो किलोमीटर अंदर खेत से लगी हुई काफी पेड़ों के बीच हाथियों के दल अपने खाने-पीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी, वहीं कुछ दूर में ही गाँव के लगभग 500 से 700 आदमी इन हाथियों को देखने पहुंचे हुए थे। उन सभी को हाथियों से काफी दूर रहने कहा गया था।

उस समय 5 बजकर 35 मिनट हो रहे थे एक से डेढ़ घंटे में अँधेरा होने को था और अँधेरा होने पर उन  हाथियों को ढूंढना इतना आसान नहीं इसलिए जल्दी-जल्दी हाथी के विशेषज्ञअंकित एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता साथ गये। हाथी से करीब 70 से 80 मीटर की दूरी  में उन्होंने हमारे संवाददाता को रोककर इससे ज्यादा नजदीक जाने से मना कर दिया एवं उनके ंसाथ आये हाथियों के जानकार सहयोगी में से एक व्यक्ति को मेरे साथ रहने कहकर अंकित एवं एक महावत हाथी के काफी नजदीक लगभग 50 मीटर तक पहुंचकर पेड़ की ओट से अपने लाये कैमरे से हाथियों के फोटो लिए। लगभग 30 से 40 फोटो अलग-अलग एंगल से लेकर जिसमें गौतमी हाथी भी थी उनके कई फ़ोटो लिए खासकर रेडियो कॉलर आईडी लगी गौतमी हाथी के काफी फोटो लिए लगभग 40 से 60 मिनट के बाद अँधेरा हो ही गया और फिर हम सभी को वहां से वापस लौटना पड़ा। 

 हाथियों के विशेषज्ञ अंकित कुमार ने बताया वो इतनी दूर से आए ही इसीलिए थे की गौतमी हाथी एवं उस दल का फोटो ले सकंू जिससे गौतमी हाथी लगे रेडियो कॉलर आईडी के सही लगे होने एवं उन सभी हाथियों के बारे में कई जानकारी को एकत्रित कर सकंू। गौतमी हाथी के लगे कॉलर आईडी के बारे में बताया कि उसमें हमेशा नजर रखी जाती है कि उसके लगे होने से हाथी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। उसमें बैटरी लगी हुई है। उस बैटरी की उम्र 6 साल है। हमें 6 साल तक जानकारी मिलती रहेगी। उन्होंने हाथियों के बारे में कई अहम जानकारी दिया जिसमें उन्होंने कहा कि हमारे छतीसगढ़ में छोटे छोटे जंगल होने के कारण इन हाथियों को यहां वहां भटकना पड़ता है। जंगलों का कम होना जंगलों के आसपास घर बनाकर रहते लोगों बिजली की बड़ी लाईनों के जंगलों के पास से गुजरना एवं जंगलों में सड़क बनाने जैसी बातों के चलते हाथियों के जंगल बंटते जा रहे हंै। वे जंगल का एरिया छोटा होने के कारण हाथियों को काफी मुश्किलें हो रही है।  उन्हें खाने पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन जंगलों में उपलब्ध नहीं हो रहे है एवं उन जंगलों में भी लोगों का आना-जाना बना रहता है जिससे हाथियों को इधर-उधर भागना पड़ता है। हाथी हिंसक नहीं होते हैं। उन्हें परेशान करने की वजह से वे आक्रामक हो जाते हैं। इसलिए इन हाथियों से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।

हाथियों के नजदीक कभी भी नहीं जाना चाहिए। ज्यादा नजदीक जाने पर ही ये हाथी लोगों के ऊपर हमला कर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हाथी से काफी दूरी बना कर रहे। इस गौतमी दल के बारे में अपने लैपटॉप से जानकारी निकालकर उन्होंने बताया कि पिछले साल भी ये दल यहीं से गुजरा है एवं हो सकता है कि बगल के कुनकुरी जंगल तक जाए क्योंकि पिछले वर्ष लगभग एक हफ्ते तक ये दल कुनकुरी के जंगलों में बिताया था। हाथी जहां-जहां जाते हंै। वो जगह इनके घूमने की जगह बन जाती है। जहां-जहां हाथी कभी भी जाते हैं उन जगहों में हाथी वापस आ सकते है। संभावना ये भी रहती है कि हाथी के दल की स्थिति के अनुसार वे अपने रहने एवं उस जगह से दूर चलने की सोचते हं।  जिसमें महिला हाथियों के प्रेग्नेंट होने एवं बच्चे देने के कारण कुछ दिन वो दल रूक भी जाते हैं। अभी इस दल में तीन हाथियों में दांत है। तीन छोटे-छोटे बच्चे भी साथ है। कुल मिलाकर 11 हाथी विचरण कर रहे हैं।


Date : 11-Sep-2019

मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस 

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 11 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
मदनवाड़ा-कोरकोट्टी नक्सल हमले की नए सिरे से न्यायिक जांच के राज्य सरकार के आदेश ने नक्सल घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे एक सिपाही की आऊट-ऑफ टर्न (ओटी) प्रमोशन को लेकर चल रही कानूनी जंग को मानो पंख लगा दिया है। 

12 जुलाई 2009 को हुए इस वारदात में गोलियों की बौछार के बीच चालक प्रधान आरक्षक ओंकार देशमुख (बैच 494)ने तत्कालीन एसपी विनोद चौबे के वाहन को धड़धड़ाते हुए निकालते नक्सलियों के पहले हमले को अपनी सूझबूझ से असफल कर दिया। जबकि वाहन में एसपी के सुरक्षाकर्मी संजय यादव को लगभग 50 से अधिक गोलियां लगी। वहीं एसपी के फालोवाहन के ड्रायवर बी. सीतराम राजू कमर में गोली लगने से घायल हुए थे। बाद में पूरी लड़ाई के खात्मे तक एसपी चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए। 

बताया जाता है कि बहादुरी के साथ नक्सलियों से भिडऩे के एवज में राज्य सरकार ने जवानों को ओटी के तहत प्रमोशन देने का ऐलान किया था। शुरूआत में मौखिक रूप से चालक देशमुख को सूची में नाम होने की जानकारी दी गई। लड़ाई में शामिल होने के लिए तत्कालीन दुर्ग रेंज आईजी मुकेश गुप्ता और रक्षित निरीक्षक गुरजीत सिंह को जहां वीरता पदक से नवाजा गया, वहीं 18 जवानों को ओटी दिए जाने का ऐलान किया, लेकिन चालक देशमुख का नाम गायब हो गया। 

 वारदात स्थल पर जाने से पहले विभागीय रोजनामचे में देशमुख की रवानगी का उल्लेख है। सूची में नाम नहीं होने के बाद प्रधान आरक्षक सन्न रह गया। बताया जाता है कि ओटी दिए जाने से पहले हुए विभागीय कथन में पूरी लड़ाई को लेकर एक अफसर की गैरमौजूदगी पर सही जानकारी देना ओंकार देशमुख को भारी पड़ गया। सूची में नाम नहीं होने के बाद यह सुरक्षाकर्मी अफसरों की चौखट पर पहुंच कर वास्तविक स्थिति को बयां करते थक गया। आखिरकार 2015 में हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए ओंकार देशमुख ने अपील की। 

बताया जाता है कि एक शीर्ष अफसर की आंखों में खटकने के कारण ओंकार को उसके हक से वंचित कर दिया गया। जबकि लड़ाई के दौरान बख्तरबंद वाहन में सवार सीआरपीएफ के एक चालक को सरकार ने ओटी दिए जाने की सिफारिश की। ओंकार देशमुख ने अपने साथ हुए कथित हेरफेर को लेकर हाईकोर्ट में पुख्ता दस्तावेज पेश किए है। 

पूर्व एसपी प्रवीर दास ने भी देशमुख के नाम का उल्लेख नहीं होने पर हैरानी जताई थी। वहीं पूर्व एसपी बीएन मीणा ने दोबारा पत्र लिखकर राज्य सरकार से ओटी देने की सिफारिश की थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लड़ाई के दौरान कंट्रोल रूम के जरिए परिजनों को देशमुख के शहीद होने की जानकारी भी दे दी थी। 

पूरी लड़ाई में देशमुख कोरकोट्टी गांव में हुए नक्सली हमले के गवाह है। बताया जाता है कि एक आला अधिकारी ने लड़ाई में अपनी भूमिका को दमदारी से दिखाने के लिए कई तरह का बदलाव कर दिया। नतीजतन देशमुख इसी कुच्रक में फंसकर ओटी से वंचित हो गए। उधर लड़ाई में बतौर साहसी होने देशमुख को राजधानी रायपुर में एक कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सम्मानित किया। लेकिन सरकार में बैठे एक अफसर के इशारे पर इस सुरक्षाकर्मी को ओटी देने से दूर कर दिया गया।

बताया जाता है कि प्रधान आरक्षक के अपील के जवाब में सरकार ने दुर्ग रेंज के आईजी रहे मुकेश गुप्ता के अभिमत के आधार पर ओटी नहीं देने की हाईकोर्ट में जानकारी दी है। प्रधान आरक्षक की ओर से नक्सल जंग में जाने से पहले के कई प्रामणिक दस्तावेज जमा किए गए है। महकमे के कई अफसरों ने प्रधानआरक्षक के साथ हुए बर्ताव पर अफसोस भी जाहिर किया। अब जबकि सरकार ने इस वारदात की न्यायिक जांच की घोषणा की है तो प्रधान आरक्षक हाईकोर्ट से न्याय मिलने की आस में है।

 


Date : 10-Sep-2019

नान जनहित याचिकाओं की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने बनाई नई बेंच, सुनवाई तय 

रायपुर/बिलासपुर, 10 सितंबर (छत्तीसगढ़ )। बहुचर्चित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला मामले की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में नई बैंच बनाई गई है। कोर्ट आधा दर्जन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। बताया गया कि याचिकाओं में पांच घोटाले की जांच की मांग को लेकर दायर की गई थी। जबकि एक याचिका नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है, जिसमें एसआईटी जांच रोकने की मांग की गई है। सुनवाई के लिए गुरूवार और शुक्रवार का दिन नियत किया गया है। 

जस्टिस पी सैमकोशी और जस्टिस आरपी शर्मा की पीठ नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला प्रकरण की सुनवाई करेगी। एक बार में एक याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई होगी। 12 तारीख को सबसे पहले हमर संगवारी संस्था की याचिका पर सुनवाई होगी। बाकी अन्य याचिका  सुदीप श्रीवास्तव, राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय, मिड डे मिरर व अनिल टुटेजा और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है। 

याचिकाकर्ताओं में से श्री कौशिक को छोडक़र बाकी ने ईओडब्ल्यू की पिछली सरकार के कार्यकाल में जांच पर सवाल खड़े किए थे और इस घोटाले की सीबीआई अथवा एसआईटी जांच की मांग की गई थी। सरकार बदलने के बाद घोटाले की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। मामले की जांच चल रही है। प्रकरण में कई नए खुलासे भी हुए हैं। इससे परे नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने नान घोटाले की जांच के लिए एसआईटी के गठन पर सवाल उठाए हैं और उन्होंने इसके गठन को ही चुनौती दी है। 

मिड डे मिरर संस्था ने फर्जी राशन कार्ड के जरिए घोटाले का आरोप लगाया था। इस मामले में भी सुनवाई होगी। बताया गया कि कोर्ट ने पहले डे-टू-डे 26 अगस्त से 2 सितंबर तक सीजे के डिवीजन बैंच में इस मामले की सुनवाई निर्धारित की थी।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले से संबंधित याचिकाकर्ता जो भी दस्तावेज सबमिट करना चाहे 14 अगस्त तक कर दें। मगर, प्रकरण से जुड़े दस्तावेज ट्रांसलेट करके कोर्ट को उपलब्ध नहीं कराया जा सका। इसको लेकर याचिकाकर्ताओं ने माफी मांगी। इसके बाद नई बैंच को सुनवाई का जिम्मा सौंपा गया है। 

आरोप है कि छत्तीसगढ़ में राइस मिलरों से लाखों क्विंटल घटिया चावल लिया गया और इसके बदले करोड़ों रुपये की रिश्वतखोरी की गई। इसी तरह नागरिक आपूर्ति निगम के ट्रांसपोर्टेशन में भी भारी घोटाला किया गया। इस मामले में 27 लोगों के खिलाफ मामला दर्र्ज किया गया था। जिनमें से 16 के खिलाफ 15 जून 2015 को अभियोग पत्र पेश किया गया था। फिलहाल सभी आरोपी जमानत पर हैं। 

 

 


Date : 09-Sep-2019

निर्देश के बाद भी बीमा कंपनी से भुगतान नहीं 

बैकुंठपुर, 9 सितंबर (छत्तीसगढ़)। ‘छत्तीसगढ़’ की खबर के असर के बाद कोरिया जिले की खरीफ फसल वर्ष 2014 में मौसम आधारित फसल बीमा योजना में हुए घोटाले में राज्य सरकार ने बीमा कंपनी को दोषी मानते हुए अंतर की राशि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ एक माह की समय सीमा पर भुगतान करने के लिए निर्देशित किया था, परन्तु आज तक बीमा कंपनी ने राशि जमा नहीं की। दूसरी ओर राज्य शासन ने बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, परन्तु उप संचालक कृषि ने पत्र को दबा कर रख किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की। सूचना के अधिकार से मामले की जानकारी सामने आई।

इस संबंध में आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता का कहना है कि जिला कृषि विभाग के अधिकारी जानबूझ कर बीमा कंपनी को बचाने में जुटे हैं। यही कारण है कि 22 मई 2019 को जारी इस पत्र को उप संचालक कृषि ने ना सिर्फ दबा कर रखा, वरन किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की। सरकार ने राजनांदगांव और कोरिया के किसानों को बीमा कंपनी को किसानों की राशि 12 प्रतिशत के ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है, उस आदेश को भी कंपनी ने नहीं माना। 

जानकारी के अनुसार राज्य के कृषि विकास एवं कल्याण विभाग ने 23 मई 2019 को जारी अपने आदेश में कोरिया और राजनांदगांव में मौसम आधारित फसल बीमा योजना खरीफ वर्ष 2014 में बीमा कंपनी द्वारा किसानों के साथ आंकड़ों में जालसाजी एवं धोखाधड़ी को सही माना था। राज्य सरकार ने बीमा कंपनी ने उल्लेखित प्रावधानों का उलंघ्घन करते हुए प्रमाणित जानकारी निर्धारित समयातंराल में संचालनालय कृषि को नहंीं दी थी। ऐसे मेें मौसमी राज्य सरकार ने आंकड़ों के आधार पर अंतर दावा राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ कृषकों को एक माह की समय सीमा में भुगतान करने को कहा था परन्तु बीमा कंपनी ने समयावधि निकल जाने के बाद भी किसानों की राशि नहीं लौटाई। जिसके बाद राज्य सरकार ने उपसंचालक कृषि कोरिया को बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा कृषि विकास कल्याण विभाग को अवगत कराने निर्देशित किया था। दो माह बीत जाने के बाद भी उप संचालक कृषि ने किसी भी तरह की कार्रवाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। आरटीआई एक्टिविस्ट रमाशंकर गुप्ता ने आरटीआई के तहत जानकारी निकाली तो इस बात का खुलासा हुआ है। 

क्या था मामला
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत क्षेत्र के आदिम जाति सेवा सहकारी समिति माड़ीसरई के 25 गांव के 546  कृषकों को कुल रकबा 76 2.15 हेक्टे. के लिए बीमा कंपनी पर धोखाधड़ी कर कम मुआवजा बांटने की शिकायत सामने आई थी। तत्कालीन कलेक्टर नरेन्द्र दुग्गा ने जांच के निर्देश दिए और जांच के बाद कंपनी दोषी पाई गई। मामले में कृषि उपसंचालक को कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा गया। जिसके बाद पुलिस ने दस्तावेज मांगे। कृषि विभाग के कार्यालय से दो बार दस्तावेज चोरी हो गए। फिर रायपुर से दस्तावेज पहुंचे और पुलिस को सौंप दिए गए। बावजूद इसके एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसी बीच दिसंबर में बीमा कम्पनी के प्रतिनिधि तत्कालीन कलेक्टर से मिले और मामला पलटने लगा। 

इधर, आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता एफआईआर का दबाव बनाए हुए थे। शिकायतकर्ता व अन्य के द्वारा उच्च न्यायालय में फसल बीमा के एक अन्य मामले में दायर याचिका खारिज हो गई।जिसे कोरिया जिले में हुए घोटाले से जोडक़र कृषि उप संचालक ने बीमा कंपनी पर एफआईआर को औचित्यहीन बताते हुए कलेक्टर जनदर्शन में दिए गए शिकायतकर्ता के समस्त शिकायत आवेदनों को निरस्त करने को कहा और तत्कालीन कलेक्टर ने तत्काल मामले को विलोपित भी कर दिया। 

इसकी जानकारी आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता को लगी। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी। दबाव बनाता देख कृषि उप संचालक ने 28  फरवरी 2019 को दोषी बीमा कंपनी बजाज एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पत्र लिख कर कहा कि किसानों को कम क्षतिपूर्ति देने की शिकायत रमाशंकर गुप्ता द्वारा करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का दबाव डाला जा रहा है तथा प्राथमिकी शिकायतकर्ता द्वारा राजनांदगांव में दर्ज की गई। जिस संबंध में पुलिस अधीक्षक राजनांदगांव के निर्णय, वक्तव्य को संलग्न कर इस कार्यालय को प्रेषित करें। जिससे कि कोरिया में एफआईआर को रद्द किया जा सके। वहीं प्रशासन अब भी हर संभव बीमा कंपनी को बचाने में जुटा हुआ है।

साक्ष्य के साथ की गई छेड़छाड़
बीमा कंपनी बजाज एलाएंस द्वारा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेट मुंबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किये गए थे। जो पूर्व में भेज गये आंकड़ों से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह करने की कोशिश की गई। इसके बाद भी बीमा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेड मुबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किए गए जो पूर्व में भेजे गए से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह किया गया।

कोरिया जिले में किसानों को मौसम आधारित फसल बीमा योजनांतर्गत अधिकृत बीमा कंपनी बजाज एलायंस द्वारा कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र के ग्राम माडीसरई के कृषकों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि दिए जाने के मामले में बीमा कंपनी पर प्राथमिकी दर्ज करने के मामले को लेकर उप संचालक कृषि द्वारा अनुमति मांगी गई थी।

 जिस पर शासन ने नियमानुसार बीमा कंपनी पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश जारी किये थे। लेकिन संचालनालय द्वारा आदेश को कई माह से दबाकर रखा गया। जिस कारण किसानों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि देने के आरोप से घिरे बीमा कंपनी पर अब तक आपराधिक धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मामले में कृषि विभाग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी की संलिप्तता होने के कारण इस मामले को दबाने का प्रयास करने का भी आरोप है।

 


Date : 07-Sep-2019

एमजीएम ने बैंक लोन के लिए 50,000 करोड़ के घोटाले वाली कंपनी को सहयोगी बताया था!

रायपुर, 7 सितंबर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के डीजी स्तर के निलंबित अधिकारी मुकेश गुप्ता को उनके खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट से स्थगन की राहत तो मिल गई है, लेकिन उनके खिलाफ चल रही जांच में अब तक हासिल कागजात उनके लिए आगे चलकर दिक्कत खड़ी करने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट का स्थगन अब तक दर्ज तीन एफआईआर पर ही है, लेकिन कई और मामलों की जांच चल रही है जिसमें उनकी अगुवाई में रायपुर में बन रहे एक बहुत बड़े अस्पताल का मामला भी है।

मुकेश गुप्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य बनने से लेकर कुछ महीने पहले तक इस अस्पताल के काम को बहुत आगे बढ़ाया था। उनकी दूसरी पत्नी मिक्की की मौत की जांच की मांग मिक्की की मां और भाई बरसों से करते आ रहे थे, और अब भूपेश सरकार ने यह जांच शुरू करवाई है। मिक्की की स्मृति में बने एक बहुत बड़े आंखों के अस्पताल एमजीएम को लेकर यह जांच चल रही है कि उसके लिए इतने बड़े-बड़े दान कैसे जुटाए गए, और ट्रस्ट का काम सरकारी नियमों के मुताबिक चल रहा है या नहीं। इसे लेकर ट्रस्ट नियंत्रित करने वाले प्रशासनिक अधिकारी और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, दोनों की ओर से कागजात जुटाए जा रहे हैं, और बैंकों से, ट्रस्टियों से तरह-तरह के कागज अधिकारियों को मिले हैं।

इन कागजों में एक कागज आज अचानक भारी सनसनीखेज साबित हो रहा है जिसमें एमजीएम ट्रस्ट ने अस्पताल के लिए बैंक लोन लेते हुए ट्रस्ट के महत्वपूर्ण सहयोगी संस्थानों के नाम की एक लंबी लिस्ट बैंक को दी थी। कई बरस पहले बैंक में जमा किए गए बहुत से लोन-कागजातों में ऐसी लिस्ट में प्रदेश की 66 बड़ी कंपनियों, फर्मों, और लोगों के नाम हैं जो कि जनता की जानकारी में अरबपति लोग हैं।

लेकिन इनमें प्रदेश के बाहर की एक ऐसी कंपनी को भी एमजीएम ने अपना महत्वपूर्ण एसोसिएट बताया है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जांच चल रही है, और जिसके सारे डायरेक्टर आज जेल में हैं। पीएसीएल इंडिया लिमिटेड नाम की दिल्ली स्थित इस कंपनी ने निवेशकों से देश भर में लगभग 50 हजार करोड़ रूपए इक_े कर लिए थे और अब दीवाला निकाल देने के बाद सरकार इसकी संपत्तियों को जब्त करके पूंजीनिवेशकों को उनकी लगाई गई रकम का कुछ हिस्सा देने की कोशिश कर रही है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी सरकार ने अपने छोटे-छोटे दफ्तरों के स्तर पर भी ऐसे लुटे हुए निवेशकों के दावा फॉर्म भरवाने का काम किया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की बनाई हुई जस्टिस लोढा कमेटी की निगरानी में इस कंपनी की जब्त संपत्तियों से पूंजीनिवेशकों की रकम निकालने की कोशिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि पीएसीएल नाम की इस कंपनी ने निवेशकों के धन को लूटने के लिए ही ऐसी योजना बनाई थी।

अब छत्तीसगढ़ में एमजीएम ट्रस्ट के बैंक में जमा किए हुए कागजातों में इस कंपनी का नाम इम्पॉर्टेंट एसोसिएट के रूप में निकलने से मुकेश गुप्ता के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। इस ट्रस्ट में मुकेश गुप्ता खुद ट्रस्टी तो नहीं हैं, लेकिन सारे ट्रस्टी उनके एकदम करीबी लोग हैं, और इस अस्पताल को उन्हीं के नाम से जाना भी जाता है। इसके साथ-साथ बैंक कर्ज के कागजात में स्टेट बैंक ने अपने अंदरुनी कागजातों में इस कर्ज को भरोसेमंद बताने के तथ्यों और तर्कों में मुकेश गुप्ता को इसके पीछे की मुख्य ड्राइविंग फोर्स भी लिखा है। बैंक ने मुकेश गुप्ता से हुई बातचीत का जिक्र भी इस लोन के सिलसिले में किया है, और उनकी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका इस ट्रस्ट के पीछे बताई है।

जिन 66 कंपनियों, फर्मों, और लोगों को मिक्की मेमोरियल ट्रस्ट के इम्पॉर्टेंट एसोसिएट बताया गया है उनमें केन्द्र सरकार की एक सबसे बड़ी पब्लिक सेक्टर कंपनी एसईसीएल (साऊथ इस्टर्न कोल लिमिटेड), का नाम भी है। इस लिस्ट में आधा दर्जन दूसरे ट्रस्टों के नाम भी हैं।

 

इनके नामों का उपयोग ट्रस्ट के बंैक लोन के लिए किस तरह किया गया है इसकी जानकारी जांच एजेंसियां बैंकों से निकालने की कोशिश कर रही हैं। एक बड़े जांच अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ को मिले कुछ कागजातों को सही बताते हुए कहा है कि बैंक अफसर जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं, और इस ट्रस्ट के नाम से खोले और बंद किए गए दर्जनों बैंक खातों की जानकारी देने में आनाकानी कर रहे हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि इस जांच पर किसी अदालत की कोई रोक नहीं है, और अगर जरूरत पड़ी तो बैंक की संबंधित ब्रांच पर छापा मारकर वहां से कागजात जब्त किए जाएंगे।


Date : 05-Sep-2019

शिक्षा का अलख जगाने रोज गांवों में फेरा लगा रहा, नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में भृत्य तेजराम बने मिसाल

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 5 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
शिक्षा के प्रति गहरे लगाव ने एक चपरासी के रोज ड्यूटी के बाद लोगों के चौखट पर पहुंचकर नौनिहालों को स्कूल भेजने की मुहिम ने नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में शिक्षा का अलख जगा दिया है। मदनवाड़ा हाईस्कूल में पदस्थ भृत्य तेजराम निषाद स्कूल में शिक्षकों और विद्यार्थियों को पानी पिलाने समेत अन्य कार्य करने के बाद रोजाना साइकिल से धूर नक्सलग्रस्त गांवों का फेरा लगाकर अशिक्षा के जाल में फंसे ग्रामीणों को बच्चों को स्कूल भेजने पर जोर दे रहे हंै। अब बच्चों को पढ़ाने स्वमेव ग्रामीण सामने आने लगे हैं। 

तेजराम निषाद ने स्कूल में दर्ज संख्या को बढ़ाने के लिए यह सकारात्मक कदम उठाया है। कुछ दिनों में मदनवाड़ा, कारेकट्टा, मुंजाल, रेतेगांव, कलवर, हुरवे व हरेली गांव से विद्यार्थियों ने स्कूल में दाखिला लेना शुरू किया। तेजराम की कोशिशों से अब स्कूल की दर्ज संख्या में खासी वृद्धि हो गई है। 

बताया जाता है कि मदनवाड़ा हाईस्कूल खुलने के करीब दो वर्ष तक एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया था। जिससे शिक्षकों और अन्य कर्मियों को विद्यार्थियों की गैरमौजूदगी खलती रही। ऐसे में शिक्षकों के सामने आने से पहले चपरासी निषाद ने गांवों में फेरा लगाकर ग्रामीणों को स्कूली शिक्षा महत्व से अवगत कराया। तालीम हासिल नहीं करने के स्थिति में बच्चों को भविष्य में होने वाली दिक्कतों से रूबरू कराया। बताया जाता है कि शुरूआत में ग्रामीण तेजराम को देखकर बिदकने लगे थे, लेकिन चपरासी की जिद ने आखिरकार रंग लाया और मदनवाड़ा स्कूल विद्यार्थियों से गुलजार होने लगा। 

करीब पांच साल पहले 2014-15 स्वीकृत स्कूल भवन 16-17 में पूर्ण हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों को स्कूल में लाने के लिए तेजराम ने एक सकारात्मक कदम उठाया। बताया जाता है कि मानपुर में पदस्थ रहे निषाद ने खुद प्रशासन से मदनवाड़ा में अपनी पदस्थापना करने का आग्रह किया। मदनवाड़ा में नक्सलियों की तेज आमदरफ्त की परवाह किए बगैर निषाद ने गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों को अपने साथ जोड़ा। नतीजतन आज मदनवाड़ा हाईस्कूल में शिक्षक आधुनिक और तकनीकी शिक्षा से बच्चों को दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए तैयार कर रहे हंै।

 ज्ञात हो कि तेजराम ने शिक्षा का उन्मुक्त वातावरण बनाने के लिए अपनी बेटी को मानपुर से मदनवाड़ा में दाखिल कराया। नतीजतन उनकी बेटी ने कक्षा 10वीं में 73 फीसदी अंक हासिल की। वर्तमान में वह अंबिकापुर स्थित प्रयास विद्यालय में तालीम ले रही हंै।

कलेक्टर ने कहा सम्मानित करेंगे
चपरासी तेजराम निषाद की सराहना करते कलेक्टर जेपी मौर्य ने कहा कि निश्चित ही यह अनुकरणीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि ऐसे निष्ठावान कर्मियों से अन्य शिक्षकों को सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आगामी गणतंत्र दिवस में उनको प्रशासन की ओर से सम्मानित किया जाएगा। शिक्षा के प्रति लगाव से ही ऐसे बेहतरीन कार्य किए जा सकते हंै।

 


Date : 04-Sep-2019

शिक्षक नहीं, महीनों से स्कूल बंद गेट खुला, कार्यालय में ताला

5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष रिपोर्ट

चन्द्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 4 सितंबर।
कोरिया जिले के झांपर का प्राथमिक स्कूल एक शिक्षक की लापरवाही के कारण सत्र शुरू होने के बाद से आज तक नहीं खुला है। पूर्व में ‘छत्तीसगढ़़’ ने वर्ष 2016  में इस स्कूल को एक साल से बंद रहने को लेकर खबर का प्रकाशन किया था, तब से स्कूल के हालात कुछ बदले थे परन्तु एक बार फिर महीनों से स्कूल बंद पड़ा हुआ है और नए सत्र में एक भी दिन स्कूल नहीं खुल पाया है जिससे अभिभावकों में काफी नाराजगी है। इतना होने के बावजूद झांपर बी ग्रेड का स्कूल है।

इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी संजय गुप्ता का कहना है कि मामले की जांच कर विधिवत कार्रवाई की जाएगी। कोरिया जिले के दुर्गम क्षेत्र में स्थित ग्राम झांपर भरतपुर जनपद के देवसील ग्राम पंचायत अंतर्गत आता है। यह सोनहत के रामगढ़ से 7 किमी दूर  है। यहां वर्ष 2008  में एक प्राथमिक शाला भवन का निर्माण कराया गया ताकि क्षेत्र के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मिल सके। दो शिक्षकों की नियुक्ति की गई जिनमें से एक का तबादला हो चुका है। शेष एक शिक्षक लम्बे समय से नदारत हैं। वर्ष 2016  के दिसंबर माह में जब ‘छत्तीसगढ़़’ यहां पैरी नदी पार कर पहुंचा था तब स्कूल बंद था, खबर के प्रकाशन के बाद तत्कालिन कलेक्टर एस प्रकाश दुर्गम क्षेत्र झांपर पहुंचें थे और उन्होनें एक पढ़े लिखे स्थानीय युवक को स्कूल में अध्यापन का जिम्मा सौंपा था, उस युवक को पढ़ाने के एवज में मानदेय भी दिया जाता था। इस बीच उनका स्थानंातरण हो गया और स्कूल में पढ़ा रहे युवक का मानदेय बंद कर दिया गया। 

गांव के जगदेव, जगन्नाथ, रधुनाथ, बलदेव, शिवधन सिंह, विश्वनाथ, सुखमन, धर्मपाल ने बताया कि दो वर्ष पहले जब पूरा प्रशासन गांव में आया था तब स्कूल खुलने लगा था और पढ़ाई होने लगी थी, परन्तु अब तो लम्बे समय से विद्यालय बंद पड़ा हुआ है, नए सत्र में एक भी दिन स्कूल नहीं खुल पाया है। एक मात्र शिक्षक जो आते ही नहीं है। स्कूल का गेट खुला रहता है। कार्यालय में हमेशा ताला लटका रहता है। बच्चों को पहाड़ा गिनती तक नहीं आती। स्कूल का शौचालय अधूरा है। मध्यान्ह भोजन का हाल बुरा है। 

15 अगस्त में नहीं फहरा झंडा
15 अगस्त के दिन इस स्कूल में झंडा नहीं फहराया गया। जिसके बाद भरतपुर तहसील में आने वाले इस गांव झांपर के अभिभावक अपने बच्चों के साथ भरतपुर बीईओ से मिले। उन्होनें स्कूल के शिक्षक के बारे में शिकायत की और अपने बच्चों के भविष्य के लिए चिंता जाहिर करते हुए दूसरे शिक्षक को पदस्थ करने की मांग की। परन्तु किसी भी तरह की बात नहीं बनी, जिसके बाद ग्रामीणों ने दोबारा ‘छत्तीसगढ़़’ को मामले की जानकारी दी। 

उल्लेखनीय है कि झापर दूरस्थ ग्राम है। आवागमन के लिए सडक़ भी नहीं है। वर्ष 2016  में यहां के दो भाई बहनों की सर्पदंश से मौत हो गई थी जिनके पीएम के लिए अस्पताल तक ले जाने में दो दिन लगा था।

 

 


Date : 31-Aug-2019

मकान-नौकरी के लिए ओलंपियन लगा रही दौड़, छग की पहली ओलंपियन की भूपेश-रमन से गुहार

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 31 अगस्त(छत्तीसगढ़)।
साल 2016 में रियो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी के रूप में मैदान में उतरकर छत्तीसगढ़ की पहली ओलंपियन बनी रेणुका यादव पूर्ववर्ती भाजपा सरकार द्वारा मकान और डीएसपी की नौकरी दिए जाने की घोषणा के पूरी नहीं होने से परेशानी के दौर से गुजर रही हैं। अब यह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मकान-नौकरी को लेकर राजनेताओं और अफसरों की दहलीज के चक्कर लगा रही है। 

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले कार्यकाल में रेणुका को आशियाना और नौकरी देने का ऐलान किया था। खेल के जरिए छत्तीसगढ़ को पहचान दिलाने के बाद रेणुका को जल्द ही सरकार की घोषणा से मांग के पूरी होने की उम्मीद थी। रियो ओलंपिक में चयन के बाद रेणुका को प्रदेश में यूथ-टैलेंट का प्रतीक माना गया। मुफलिसी के बाद भी रेणुका ने खेल में अपनी दमखम से खुद को भारतीय महिला हॉकी टीम में स्थापित किया। वर्तमान में रेणुका 2020 में टोक्यो में प्रस्तावित ओलंपिक की तैयारी भी कर रही हैं। 

बताया जाता है कि करीब तीन साल से रेणुका छत्तीसगढ़ सरकार के अलग-अलग राजनेताओं और अफसरों से अपनी व्यथा को जाहिर कर चुकी हंै। प्रदेश के नामचीन खिलाडिय़ों को 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर सरकार द्वारा सम्मान समारोह में शामिल हुईं रेणुका ने मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से पूर्ववर्ती सरकार के वादों से अवगत कराया। बताया जाता है कि ओलंपियन यादव नई सरकार से उम्मीद लगाए बैठी हंै। 

गौरतलब है कि रेणुका की पारिवारिक जिंदगी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं है। बेहद ही निर्धन परिवार की रेणुका में उत्कृष्ट हॉकी खिलाड़ी बनने की जिद थी। इसलिए वह अपने पिता और माता के साथ दूध का कारोबार करने के बाद खेल के लिए वक्त निकालती थी। यह बताना भी लाजिमी है कि रेणुका के खेल को निखारने के लिए मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित अकादमी ने हाथ आगे बढ़ाया। तमाम चुनौती को पार करते हुए रेणुका राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनीं।

 इस संबंध में रेणुका यादव ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि पुरानी सरकार ने घर और डीएसपी की नौकरी देने का ऐलान किया था। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. सिंह से मिलकर मदद की गुजारिश की है। रेणुका ने बताया कि मौजूदा सीएम भूपेश बघेल से भेंटकर मांग पूरा करने का आग्रह किया है। 

गौरतलब है कि राज्य की ही पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सबा अंजुम को सरकार ने सीधे डीएसपी नियुक्त किया है। जबकि ओलंपिक जैसे खेल के महाकुंभ का हिस्सा बन चुकी रेणुका को लेकर सरकार ने सुध नहीं ली है।

 

 


Date : 30-Aug-2019

मरवाही से चुनाव लड़ते ही नेताम ने की थी जोगी की शिकायत, 18 साल में 5 कमेटियां और 3 रिपोर्ट बनीं, तीनों खिला

बिलासपुर, 30 अगस्त(छत्तीसगढ़)। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जाति को लेकर संतकुमार नेताम की शिकायत 18 साल पुरानी है जब जोगी ने तत्कालीन विधायक रामदयाल उइके के इस्तीफा देने के बाद मरवाही सीट से चुनाव लडऩे का फैसला लिया। नेताम के पक्ष में भाजपा के दिग्गज वकील सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में पैरवी कर चुके हैं लेकिन उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लेकर संदेह था। नेताम ने भाजपा छोडक़र अब कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। 

सिविल इंजीनियर संतकुमार नेताम भाजपा के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ में पदाधिकारी थे जब सन् नवंबर 2000 में मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पद संभाला। उनकी जाति को लेकर नेताम ने पहली शिकायत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग को की। यह मुद्दा उनके सामने तब आया जब मरवाही सीट से भाजपा के तत्कालीन विधायक रामदयाल उइके ने इस्तीफा दे दिया और इस सीट से जोगी की उम्मीदवारी घोषित की गई। उस समय आयोग के अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया थे। आयोग ने 16 अक्टूबर 2001 को अजीत जोगी का आदिवासी जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। भूरिया कमेटी ने छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्य सचिव को जोगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी दिया। इस आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। तत्कालीन चीफ जस्टिस की कोर्ट ने आयोग के फैसले पर 22 अक्टूबर 2001 को स्थगन दे दिया। इस मामले में नेताम भी प्रतिवादी थे।  मामले की सुनवाई होती रही। नेताम की ओर से पैरवी करने सुप्रीम कोर्ट से अरूण जेटली (स्व.) और रविशंकर प्रसाद भी पहुंचे।  इसके बाद 15 नवंबर 2006 को हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि आयोग को किसी की जाति निर्धारित करने या उसका प्रमाण पत्र रद्द करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने नेताम पर 10 हजार रुपये कास्ट किया साथ ही कहा कि इस केस में पक्षकार और सरकार के खर्च की वसूली भी उनसे की जाये। 

जनवरी 2007 में इस फैसले के ख़िलाफ़ नेताम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। वहां भी नेताम के पक्ष में स्व. अरूण जेटली के अलावा रविशंकर प्रसाद और राजीव धवन जैसे नामी वकीलों ने पैरवी की। 

सुनवाई लम्बी चली। 13 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। इसमें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को जाति निर्धारण का अधिकार नहीं होने के हाईकोर्ट के फैसले को यथावत रखा गया लेकिन राज्य सरकार को ‘माधुरी पाटिल केस’ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई गाइडलाइन के मुताबिक उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति बनाई जाये। सुप्रीम कोर्ट  के आदेश के परिपालन में 13 जनवरी 2012 को आदिवासी विकास विभाग के तत्कालीन सचिव मनोज पिंगुआ की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। इस समिति ने 22 जून 2013 को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने जोगी को आदिवासी नहीं माना। समिति की रिपोर्ट में कई खामियों का उल्लेख करते हुए इसे सितम्बर माह में अजीत जोगी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 

हाईकोर्ट ने जोगी की याचिका स्वीकार की और राज्य सरकार को नोटिस तामील की। नोटिस मिलने के बाद राज्य सरकार ने पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट को ही वापस ले लिया और कोर्ट से कहा कि वह नये सिरे से कमेटी बनाकर रिपोर्ट देगी। इसके बाद राज्य सरकार ने आईएएस सी. मुरुगन और आशीष भट्ट की अलग-अलग कमेटियां बनाई, जो किसी-किसी कारण से रिपोर्ट नहीं दे सके। इसके बाद आदिवासी विकास विभाग की सचिव रीना बाबा कंगाले की अध्यक्षता में समिति बनाई। इस समिति ने भी 27 जून 2017 को सौंपी गई रिपोर्ट में जोगी को आदिवासी नहीं माना और तत्कालीन बिलासपुर कलेक्टर ने जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। इसे अजीत जोगी ने फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट को उन्होंने दो बड़ी खामियों की ओर ध्यान दिलाया। एक तो इस समिति के गठन के बारे में राजपत्र में कोई प्रकाशन नहीं हुआ था, दूसरा समिति के अध्यक्ष, सचिव और उपाध्यक्ष तीनों ही पदों पर अकेले रीना बाबा कंगाले का नाम था और उनके ही हस्ताक्षर थे। जोगी को स्थगन मिला और कोर्ट ने नई समिति गठित करने का निर्देश दिया। इसके बाद तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने डीडी सिंह की अध्यक्षता में समिति बनाई थी,जिसकी रिपोर्ट 23 अगस्त 2019 को सामने आई है। 

याचिकाकर्ता नेताम का कहना है कि जब उन्होंने जोगी की शिकायत की तो शुरू में पार्टी की ओर से साथ मिला पर बाद में उन्हें पूरी लड़ाई अकेले लडऩी पड़ी। दौड़-धूप व अदालत में उसके लाखों रुपये खर्च हुए। इस बीच उसे लगातार प्रलोभन और दबाव का सामना भी करना पड़ा। यह सिलसिला अभी इस माह समिति की रिपोर्ट आने के पहले तक चला। 

 नेताम का कहना है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का रवैया जोगी के प्रति नरम था, जिसके कारण पार्टी के लोगों ने भी उनसे दूरी बना ली। नेताम ने इसी के चलते भाजपा से इस्तीफा दे दिया। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। 


Date : 27-Aug-2019

जोगी परिवार को बड़ा झटका, छिन सकती है मरवाही सीट, कमेटी के फैसले को याचिकाकर्ता नेताम ने सत्य की जीत बताया, अमित जोगी ने कहा नौटंकी

कलेक्टर करेंगे छानबीन समिति का आदेश मिलने पर कार्रवाई 

राजेश अग्रवाल
बिलासपुर, 27 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को अमान्य करने के हाईपावर कमेटी के फैसले का जिले की राजनीति में दूरगामी असर पडऩे वाला है। मरवाही सीट से उनका निर्वाचन न केवल निरस्त हो सकता है बल्कि वे आगे किसी भी आदिवासी सीट से चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। इसका असर उनके पुत्र अमित जोगी की राजनीति पर भी पड़ेगा क्योंकि तब उनका भी आदिवासी होने का दावा समाप्त हो जाएगा। बिलासपुर कलेक्टर ने समिति की रिपोर्ट या आदेश मिलने के बाद कार्रवाई की बात कही है। अमित जोगी ने इस फैसले को नौटंकी करार देते हुए अदालत में चुनौती देने की बात कही है, वहीं इस मामले में लड़ाई लडऩे वाले संतकुमार नेताम ने फैसले को सत्य की जीत बताते हुए स्वागत किया है। 

ज्ञात हो कि बिलासपुर के इंजीनियर संतकुमार नेताम ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही सुरक्षित सीट के मौजूदा विधायक अजीत जोगी के खिलाफ बीते 10 साल से विभिन्न आयोग व अदालतों में मुकदमे लड़ रहे हैं। उन्होंने जोगी के आदिवासी होने के दावे को चुनौती थी। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने नेताम की शिकायत पर जोगी के आदिवासी जाति के प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया था। इसे जोगी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि आयोग को जाति का निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। उसने आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया था। इसके बाद नेताम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले कुछ फैसलों में दिये गए गाइडलाइन के मुताबिक हाईकोर्ट को निश्चित समय में इस मामले को सुनने तथा राज्य सरकार को जाति छानबीन के लिए उच्च स्तरीय जांच कमेटी बनाने का निर्देश दिया था। 

तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में आईएएस रीना बाबा कंगाले की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय छानबीन समिति बनाई गई थी, जिसने 27 जून को 2017 को जोगी के जाति प्रमाण पत्रों को अमान्य कर दिया था। इसके बाद 30 जून को तत्कालीन बिलासपुर कलेक्टर ने उनके जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिये थे। हाईकोर्ट में इस समिति के गठन को ही अवैधानिक बताते हुए जोगी ने याचिका दायर की थी, जिसके बाद इस कमेटी की रिपोर्ट को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने विधिपूर्वक नई उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति बनाने का निर्देश दिया था। 

21 फरवरी 2018 को सरकार ने आदिवासी विकास विभाग के सचिव डीडी सिंह की अध्यक्षता में एक अन्य समिति बनाई, जिसने 26 अगस्त को जोगी के आदिवासी होने के प्रमाण पत्रों को अमान्य कर दिया है। पिछली बार जून 2017 में समिति की रिपोर्ट मिलने पर तत्कालीन कलेक्टर ने जोगी की जाति का प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया था। इस रिपोर्ट के पालन में जोगी परिवार को आदिवासी वर्ग के समस्त लाभ मिलने बंद हो सकते हैं। इससे मरवाही सीट पर उनका निर्वाचन भी निरस्त हो सकता है। प्रावधान यह भी है कि आरक्षित वर्ग के प्रमाण पत्र के आधार पर मिले सभी लाभ की भी रिकव्हरी की जाए और पाया जाता है कि प्रमाण पत्र फर्जी है तो आपराधिक प्रकरण भी दर्ज किया जाए। 

चूंकि अजीत जोगी के ही जाति प्रमाण पत्र को अमान्य कर दिया गया है इसलिए उनके पुत्र अमित जोगी का भी आदिवासी दर्जा छिन जाएगा। वे भी सुरक्षित सीट मरवाही से विधायक बनते रहे हैं।

जिले की मरवाही सीट जोगी परिवार की परम्परागत सीट है, जो आदिवासियों के लिए सुरक्षित है। यदि उन्हें हाईपावर कमेटी के फैसले के खिलाफ किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन नहीं मिलता है तो वे आदिवासी होने की पात्रता खो देंगे, इससे उन्हें किसी भी आदिवासी सीट से चुनाव लडऩे का अवसर नहीं मिलेगा। अमित जोगी के निर्वाचन की वैधता को लेकर उनकी सन् 2013 के चुनाव में प्रतिद्वन्द्वी रहीं समीरा पैकरा ने भी जाति व जन्म प्रमाण पत्रों की वैधता पर अलग चुनौती दे रखी है, जो हाईकोर्ट में विचाराधीन है। पेन्ड्रा थाने में पैकरा ने अमित जोगी के खिलाफ इसे लेकर रिपोर्ट भी दर्ज करा चुकी हैं। 

विधानसभा चुनाव में जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस उम्मीद से बहुत कम सीटों पर सिमट गई थी। बसपा के साथ मिलकर उन्होंने कुल सात सीटें हासिल की। बसपा ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा, जोगी की पार्टी इस चुनाव में मैदान में नहीं उतरी। इस बीच उनके बेहद करीबी साथियों समेत अनेक बड़े नेताओं सहित जमीनी कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोडक़र कांग्रेस का दामन थाम लिया। लगातार झटके खाने के बाद हाल ही में पार्टी ने दंतेवाड़ा उप-चुनाव लडऩे की घोषणा की है। नगरीय निकाय तथा पंचायत चुनाव लडऩे का निर्णय भी लिया गया है। ऐसे में हाईपावर कमेटी के फैसले से जोगी व उनके परिवार को होने वाली राजनीतिक क्षति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 

यह संयोग है कि दस दिन पहले ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जाति सम्बन्धी प्रत्येक विचाराधीन मामले का निराकरण एक माह के भीतर करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सबसे पहले बड़ा फैसला जोगी के मामले में ही आया है। 

जोगी के जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देने वाले संतकुमार नेताम ने इस फैसले को अंतिम बताते हुए दावा किया कि इसे अब कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि चुनौती दी भी गई तो जोगी को तत्काल कोई राहत नहीं मिलेगी क्योंकि फैसला देने वाली कमेटी ने निर्णय ही सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन पर किया है। उन्होंने कहा कि कई साल लम्बी लड़ाई के बाद आखिर आदिवासी समाज को न्याय मिला है। उन्होंने मरवाही सीट से निर्वाचन निरस्त करने, आदिवासी के रूप में पिता-पुत्र द्वारा लिए गए लाभ की रिकव्हरी करने तथा आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। 

दूसरी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व विधायक अमित जोगी ने इसे ‘भूपेश छानबीन समिति’ बताते हुए कहा है कि समिति ने कोरे कागज में अपने दस्तख़त करके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंप दिया था। सुनवाई केवल नौटंकी थी। सभी कानूनी प्रक्रियाओं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और न्यायालय के दृष्टांतों के विपरीत बेतुका फैसला लिया गया, जिसे उच्च-न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जायेगी। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे साथ अन्याय नहीं होगा। 

छानबीन समिति ने बिलासपुर कलेक्टर को कार्रवाई के लिए निर्देशित किया है लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रिपोर्ट कलेक्टोरेट आई नहीं है। कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने कार्रवाई क्या की जा रही है, पूछे जाने पर कहा, पहले समिति का आदेश तो आ जाने दीजिए। 

 


Date : 27-Aug-2019

नक्सलगढ़ में लड़ते सिपाही से निरीक्षक बने अफसर ने मारे 41 नक्सली

अफसर लक्ष्मण केंवट को वीरता पदक के साथ महकमें से मिली रही शाबासी

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 27 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पुलिस और नक्सलियों की निर्णायक लड़ाई में राजनांदगांव के धूर नक्सलग्रस्त गातापार जंगल में पदस्थ इंस्पेक्टर लक्ष्मण केंवट अपनी बहादुरी की वजह से सुर्खियां बटोर रहे हैं। हाल ही में दूसरी बार वीरता पदक लेने वाले लक्ष्मण केंवट की नक्सलियों से लोहा लेने के जज्बे को देखकर अफसर उन्हें उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस की ‘वन टाईम प्रमोशन’ नीति से आरक्षक से सीधे उपनिरीक्षक बने केंवट ने सरकार के उम्मीद पर खरा उतरते हुए अब तक 41 नक्सलियों को ढेर किया है।  केंवट के निशाने में आए नक्सलियों पर करीब 1.50 करोड़ रूपये का इनाम घोषित था। 

वर्ष 2007 में बतौर आरक्षक सूरजपुर जिले में महकमें में शामिल   केंवट ने वन-टाईम प्रमोशन नीति के तहत खुद को नक्सल इलाके में 10 साल के लिए झोंक दिया। बीजापुर में अपने पहले नक्सल मुठभेड़ में केंवट ने अपने बूते नक्सलियों को खदेडऩे की मुहिम शुरू की। साल 2014 में बीजापुर से सटे गुंडापुर गांव में एक नक्सली को मारकर केंवट ने अपना सफर शुरू किया। इस कामयाबी के लिए महकमें ने सीधे उपनिरीक्षक से निरीक्षक पद पर पदोन्नत कर दिया। 

वर्ष 2012 से बीजापुर में ‘लाल आंतक’ से भिड़ते हुए केंवट ने अपने सेना के साथ दो साल में 27 नक्सलियों को मार गिराया। बीजापुर में लगातार नक्सलियों के बढ़ती पैठ को कमजोर करने के लिए केंवट ने टीमवर्क के रूप में अपने मातहत जवानों के साथ औसतन हर सप्ताह नक्सलियों को घेरकर ढ़ेर करने का अभियान जारी रखा। बीजापुर में अपनी पदस्थापना के दौरान केंवट की साहसिक और लड़ाकू होने की कृतियां राजधानी रायपुर तक पहुंच गई। इस बीच केंवट के अदम्य साहस को देखते हुए शीर्ष अफसरो ने वीरता पदक के लिए उनके नाम की सिफारिश की। बताया जाता है कि अब भी केंवट के नाम अब भी आधा दर्जन वीरता पदक दिए जाने का प्रस्ताव महकमें में मौजूद है। 

बीजापुर में  रहते हुए केंवट ने नक्सलियों की गोरिल्लावार तकनीकी की बारीकियों को बखूबी समझा। नतीजनत नक्सलियों को उनके ही तकनीकी लड़ाई में केंवट ने मात देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंवट गोरिल्लवार में पारंगत होकर नक्सलियों पर भारी पडऩे लगे। इसके बाद 2017 में राजनांदगांव जिले के उत्तरी इलाके साल्हेवारा और गातापार क्षेत्र में बीजापुर और सुकमा से नक्सलियों की बड़ी फौज के आमद देने की खुफिया सूचना के बीच केंवट ने यहां मोर्चा संभाल लिया। 

गातापार थाना के प्रभारी बनते ही केंवट ने नक्सलियों को घेरने के लिए योजनाबद्ध तरीके से हमला करना शुरू कर दिया। पठारी इलाका होने के बावजूद हार्डकोर महिला नक्सली जमुना को मारकर केंवट ने  नक्सलियों के महाराष्ट-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन की बुनियाद पर करारा प्रहार किया। जमुना को इससे पहले कई अफसरो ने घेरने की नाकामयाब कोशिश की। जमुना के मारे जाने के बाद नक्सलियों की बौखलाहट खुलकर सामने आने लगी।  अपने साथी की मौत होने के बाद से नक्सलियों की स्मॉल एक्शन टीम ने केंवट पर नजर रखनी शुरू कर दी। इसकी परवाह किए बगैर केंवट ने 3 अगस्त को एमएमसी जोन को नेस्तानाबूत करते हुए मिलिट्री इंचार्ज सुखेदव उर्फ लक्ष्मण समेत 7 नक्सलियों को मार गिराया।  इस घटना से नक्सलियों के विस्तार नीति को तगड़ा झटका लगा है। 

बताया जाता है कि नक्सलियों के लिए दर्रेकसा इलाका ‘ट्रांजिट रूट ’ के रूप में माना जाता है। नक्सलियों पर हर थोड़े दिन में प्रहार कर केंवट के अब महकमें में एक काबिल अफसर के रूप में गिनती हो रही है। 

चुनौतियों को अवसर में बदलकर केंवट बने मिसाल-डीआईजी
नक्सलियों से जूझते केंवट को महकमे के शीर्ष अधिकारियों से लगातार शाबासी मिल रही है। राजनांदगांव रेंज डीआईजी आरएल डांगी का कहना है कि केंवट में चुनौतियों को अवसर में बदलने का हुनर है। उनका कहना है कि नक्सलियों से लड़ते हुए इस अफसर ने नई मिसाल पेश की है। यह जज्बा ऐसे अफसरों के लिए सीख हो सकता है जो नक्सली इलाकों में अपनी तैनाती से बचने व समय काटने की सोच रखते हैं। केंवट ने पुलिस जवानों के मनोबल को बढ़ाने को जहां साहस दिखाया है वहीं नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को देश की आन-बान से जोड़ा भी है। डीआईजी का कहना है कि मौका मिलने पर हर अफसर और जवान को ऐसे अभियान में बढ़ चढक़र हिस्सा लेना चाहिए।

 


Date : 22-Aug-2019

राज्यपाल के फर्जी दस्तखत से चिट्ठी, 
कांग्रेस विधायक खरीदने का जिक्र,
डीजीपी को जुर्म कायम करने दिया

विशेष संवाददाता
रायपुर, 22 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
 छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुईया उईके के नकली दस्तखत से एक सनसनीखेज चिट्ठी बनाई गई है जिसमें उनकी तरफ से किसी भाजपा कार्यकर्ता को कांग्रेस विधायक खरीदने कहा गया है। यह चिट्ठी उनके पिछले कार्यालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के लेटरहैड पर टाईप है, और उसे छत्तीसगढ़ के किसी भाजपा कार्यकर्ता मोहित राम को लिखा बताया गया है। इस 'छत्तीसगढ़' ने जब यह पत्र भेजकर राज्यपाल का पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने इसे फर्जी बताया, और कहा कि वे पुलिस महानिदेशक को इस पर जुर्म कायम करने के लिए कह रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसके पहले भी उनके फर्जी दस्तखत बनाकर एक और चिट्ठी जारी की गई थी। 

राज्यपाल ने 'छत्तीसगढ़' को बताया पूरा किस्सा
राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके ने 'छत्तीसगढ़' के संपादक को फोन करके इस बारे में खुलासे से बताया कि किस तरह से पिछले कुछ हफ्ते से ऐसी जाली चिट्ठियां बनाकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी विधायकों के पते पर भेजी गई थीं। चूंकि विधायकों के पते सही नहीं लिखे हुए थे इसलिए ये चिट्ठियां प्रेषक के पते पर छिंदवाड़ा वापिस लौट गईं। उन्होंने बताया कि इन चिट्ठियों को भेजने वाले ने अपना नाम जितेन्द्र ठाकुर लिखा था। लेकिन छिंदवाड़ा में उनका नाम सब जानते हैं, और उनके पीए का नाम जितेन्द्र सोलंकी है, इसलिए ऐसी कई चिट्ठियां उनके पते पर पहुंचीं, जो कि उन्होंने भेजी ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे छिंदवाड़ा पुलिस में इस बारे में पहले ही रिपोर्ट दर्ज करा चुकी हैं, और पुलिस जांच कर रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का अंदाज है कि छिंदवाड़ा का कौन व्यक्ति यह काम कर रहा है, लेकिन जांच में साबित होने तक वे उसका नाम लेना उचित नहीं समझती हैं। उन्होंने कहा कि वे छत्तीसगढ़ पुलिस को अपना संदेह बता देंगी ताकि जांच में आसानी हो सके। उन्होंने फोन पर यह भी बताया कि लोकसभा चुनाव के मतदान के ठीक एक दिन पहले उनके फर्जी दस्तखत बनाकर ऐसी ही एक दूसरी  चिट्ठी फैलाई गई थी जिसमें लिखा गया था कि वे (अनुसुईया उईके) सुमित्रा महाजन और सुषमा स्वराज जैसी महिला नेताओं की उपेक्षा के खिलाफ भाजपा से इस्तीफा दे रही हैं। 

मतदान के ठीक पहले ऐसी चिट्ठी बनाकर लोगों को वॉट्सऐप पर भेजी गई थी। उन्होंने बताया कि छिंदवाड़ा पुलिस को जांच में कुछ समय लग रहा है क्योंकि वॉट्सऐप से जानकारी उसके अमरीका स्थित सर्वर से पुलिस जुटा रही है। उन्होंने कहा कि इस चिट्ठी में जैसे फूहड़ और बचकाने तरीके से बातें लिखी गई हैं, वे किसी विचलित और विक्षिप्त दिमाग की उपज लगती हैं, और उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि छत्तीसगढ़ पुलिस इस अपराधी तक पहुंच जाएगी। 


Date : 16-Aug-2019

पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ 

 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 16 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पेन्ड्रा इलाके को जिला बनाने के 21 साल पहले मप्र विधानसभा में लिये गए निर्णय को अमल में लाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा दांव खेला है। जो काम अजीत जोगी अपने तीन साल और डॉ. रमन सिंह 15 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में नहीं कर पाये सात माह के भीतर उन्होंने कर दिखाया है। जोगी दम्पत्ति ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है, वहीं लोग आंकलन में लगे हैं कि इस निर्णय का राजनीतिक असर क्या होने वाला है। प्रशासनिक दृष्टि से जिले के रूप में बिलासपुर का कद घट जायेगा लेकिन संभाग के रूप में उसका वर्चस्व बना रहेगा। इस घोषणा के बाद प्रदेश के दूसरे स्थानों से जिला बनाने की मांग बलवती होने लगी है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी में 16 अगस्त को इसी मुद्दे पर एक बैठक भी रखी गई है। 

दो दिन से पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही इलाके में जश्न का माहौल है। आदिवासी बाहुल्य, वनाच्छादित इस क्षेत्र के लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी हो गई है। स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही नाम से एक नया जिला बनाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही प्रदेश में अब 27 की जगह 28 जिले हो जायेंगे। वर्तमान जिला मुख्यालय बिलासपुर से पेन्ड्रा की दूरी नई सडक़ के रास्ते 101 किमी तथा मरवाही की 135 किलोमीटर है। मरवाही विकासखंड के अंतिम ग्राम बेलझिरिया की दूरी जिला मुख्यालय से 240 किमी है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के कारण करीब चार दशक से इसे अलग जिला बनाने की मांग होती रही है। इसके लिए अधिवक्ता संघ, सर्वदलीय नागरिक मंच आदि ने आंदोलन तो किये ही हैं, हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। सभी राजनीतिक दल इस मांग का समर्थन तो करते रहे लेकिन जिले का निर्माण नहीं किया गया। 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी स्वयं इसी क्षेत्र से आते हैं, पर वे भी अपने तीन साल के कार्यकाल में इस मांग को पूरी नहीं कर पाये। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में नौ नये जिलों की घोषणा की थी लेकिन पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही को छोड़ दिया था। उनके इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता रहा। कुछ लोग इसके पीछे तर्क देते हैं कि मरवाही इलाके में कुछ भी हो जाये, जोगी का प्रभुत्व बरकरार रहेगा, इसलिए जिला बना देने से भी किसी दूसरे को राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला है। अब यह देखना है कि मुख्यमंत्री बघेल ने सिर्फ चुनावी वायदा पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया है या फिर इसके पीछे जोगी परिवार के तिलस्म को तोडऩे का मकसद भी है। 

केबिनेट की पिछली बैठक में मुख्यमंत्री बघेल ने लम्बित जाति विवाद के मामलों को एक माह के भीतर निपटाने का निर्णय लिया था, जिसे जोगी को लेकर चल रहे जाति विवाद से भी जोडक़र देखा गया था। इसके बाद अब यह दूसरा फैसला मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके के मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर मोड़ पायेगा या नहीं देखना दिलचस्प होगा। 

दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला की पहल पर पेन्ड्रारोड को जिला बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था और इसके बाद तीन जुलाई 1998 को राजपत्र में जिला बनाने की अधिसूचना प्रकाशित भी की जा चुकी थी। इसी दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, जिसके चलते अधिसूचना के अमल पर विराम लग गया। अब पहली बार निर्वाचित कांग्रेस की सरकार ने 21 साल बाद इस बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा कर दिया है। जिले के नाम को लेकर भी खींचतान रही है, जिसे देखते हुए इसे पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही जिला जैसा लंबा नाम देकर सबको संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही के विधायक अजीत जोगी 15 अगस्त को कोटा विधायक डॉ. रेणु जोगी के साथ पेन्ड्रा में ही थे। जोगी ने इस घोषणा पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि अब उन्हें भरोसा हो गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की करनी और कथनी में कोई फर्क़ नहीं है। वे जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कोटा की विधायक डॉ. रेणु जोगी ने भी कहा कि इस घोषणा से उनके जीवन का बहुत बड़ा संकल्प आज पूरा हो गया है।  नये जिले की घोषणा होते ही दो दिन से पेन्ड्रारोड में जश्न का माहौल है। लोगों ने रैलियां निकाली, मिठाईयां बांटी और आतिशबाजी की। 

नये जिले का कलेक्टोरेट फिलहाल गुरुकुल में बनाये जाने की संभावना है। यहां काफी जगह है। वैसे यहां पहले से ही अतिरिक्त जिलाधीश, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के कार्यालय हैं, साथ ही जिला स्तर के कई संस्थान भी स्थापित हैं।  पेन्ड्रा को नया जिला बनाने से बिलासपुर जिले का तीसरी बार विभाजन हो चुका है। पहले बिलासपुर जिले के अधीन जांजगीर-चाम्पा, कोरबा और मुंगेली आते थे, जो अलग जिले बनाये जा चुके हैं। पहले दो सन् 1998 में संयुक्त मध्यप्रदेश के दौरान तथा मुंगेली को छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2011 में जिला बनाया गया। पुराने जिले का पंडरिया वाला हिस्सा कबीरधाम (कवर्धा) जिले में शामिल किया जा चुका है। नये जिले में कोटा अनुभाग को शामिल किये जाने की संभावना नहीं है किन्तु कोटा विधानसभा के कुछ क्षेत्र नये जिले में आएंगे।
 नये जिले में पेन्ड्रा और मरवाही को अलग-अलग अनुभाग में बांटा जा सकता है। जिला मुख्यालय बिलासपुर पहुंचने में कई दूरस्थ गांवों के लोगों को पूरा एक दिन लग जाता है। जिला स्तर के अधिकारी भी इस क्षेत्र का दौरा करने से कतराते हैं। भौगोलिक दूरी, दुर्गम और पहुंचविहीन गांवों से भरे यह इलाका अब विकास की नई ऊंचाईयों को छू सकता है।

बिलासपुर जिला इस विभाजन के बाद छोटा हो जायेगा। हालांकि इससे वर्तमान का सिर्फ एक अनुभाग पेन्ड्रा ही अलग होने जा रहा है, पर यहां की अधिकांश आबादी नये जिले में चली जायेगी। मुंगेली जिले के गठन के बाद अचानकमार अभयारण्य का अधिकांश हिस्सा बिलासपुर से कट चुका है, नये जिले में अभयारण्य के बाकी हिस्से भी जा सकते हैं। फिलहाल शिवतराई तक का हिस्सा बिलासपुर के पास है। जिले में तखतपुर-कोटा, बिल्हा, मस्तूरी, बिलासपुर अनुभाग शेष रहेंगे। धार्मिक नगरी रतनपुर के बिलासपुर का हिस्सा बने रहने की संभावना है।
 जिला छोटे हो जाने के बावजूद बिलासपुर का महत्व बरकरार रहेगा। पेन्ड्रारोड में रेल कनेक्टिविटी है किन्तु वहां बहुत सी एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती हैं। हालांकि नया जिला बनने के बाद रेलवे वहां अपनी सुविधा का विस्तार कर सकता है। कटनी, दिल्ली रूट का यह प्रमुख स्टेशन है। पर्यटन स्थल अमरकंटक के लिए पर्यटक यहीं पर उतरते हैं। बिलासपुर संभागीय मुख्यालय भी है। पहले से पांच जिले बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा, मुंगेली और रायगढ़ इसके अधीन हैं अब छह जिले हो जायेंगे। कोटा, मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके में कांग्रेस की अच्छी पकड़ रही है। हालांकि पार्टी से अलग होने के बाद जोगी परिवार को मतदाताओं ने तवज्जो दी है। विधानसभा, लोकसभा में किसी तरह का बदलाव फिलहाल नहीं होना है तथापि अलग जिला पंचायत के गठन हो जाने पर स्थानीय लोगों को राजनीति में भागीदारी का अधिक मौका मिलेगा। 

मुख्यमंत्री बघेल ने केवल एक जिले की घोषणा अपने 15 अगस्त के उद्बोधन में की है। हालांकि सारंगढ़, चिरिमिरी-मनेन्द्रगढ़, प्रतापपुर-वाड्रफनगर, पत्थलगांव, अम्बागढ़ चौकी, पृथक भाटापारा जिला बनाने की मांग लगातार होती रही है। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस का रुख इन मांगों पर सकारात्मक भी रहा है। इन स्थानों में अब जिला बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है। मनेन्द्रगढ़-चिरिमिरी में इसे लेकर एक बैठक भी नागरिक मंच ने 16 अगस्त को रखी है। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर व माधव राव सप्रे की समृद्ध स्मृतियां 
घोषित नया जिला पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अमरकंटक की तलहटी पर बसा है। नर्मदा नदी, सोन नदी का उद्गम स्थल भी इसी की सीमा पर है। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्मृतियों को पेन्ड्रा जीता है। सन् 1918 में यहां के सेनेटोरियम में वे अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए काफी दिनों तक रुके। संयुक्त मध्यप्रदेश के प्रथम समाचार पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन माधवराव ‘सप्रे’ ने पेन्ड्रारोड से सन् 1900 में शुरू किया था। यह करीब तीन साल तक छपा। दोनों विभूतियों की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए इलाके के कई संस्थान और समितियों को उनका नाम दिया गया है। यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रदेश को पहला मुख्यमंत्री अजीत जोगी के रूप में इसी क्षेत्र से मिला। 

 

 


Date : 05-Aug-2019

कुपोषण की मार, बीजापुर में 36 फीसदी बच्चे जद में, करोड़ों खर्च पर, साल दर साल बढ़ रहा आंकड़ा

मोहम्मद ताहीर खान

बीजापुर, 5 अगस्त (छत्तीसगढ़)। बीजापुर की स्थिति कुपोषण के मामले में बेहद ही दयनीय है। यहां 36 फीसदी बच्चे अब भी कुपोषण की जद में है। जिले में  27886 नौनिहालों में से 10732 बच्चे यानि कि 36 फीसद बच्चे कुपोषण जैसी गंभीर बीमारी का दंश झेल रहे हैं। कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए सरकार द्धारा करोड़ों रूपये फूंके जाने के बाद भी इसमें में कोई सुधार नहीं आ सका है बल्कि स्थिति और भी भयावह हुई है।

बीजापुर जिला न केवल नक्सलवाद से बल्कि कुपोषण जैसी गंभीर बीमारी का भी दंश झेलने को मजबूर है। यहां 0 से 5 वर्ष के 27886 बच्चों में से 10732 बच्चे कुपोषण से ग्रसित है। जिसमें से 3633 बच्चे ऐसे हैं जो गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए जिले के कोने कोने में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा 1090 आंगनबाड़ी केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं। यहां संचालित अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति भी बहुत ज्यादा बेहतर नहीं है। 1090 आंगनबाडी केद्रों में से 348 आंगनबाडी केन्द्र तो ऐसे हैं जो किराये के मकान या फिर झोपडिय़ों में संचालित हैं।  इस तरह कुपोषण से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से जिन आंगनबाडिय़ों का संचालन सरकार द्वारा किया जा रहा है उन्हे ही पोषण की जरूरत है।  

पिछले कुछ सालों से  कुपोषण का ये आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक 2014 में 7078 बच्चे कुपोषित पाये गये। साल  2015 में ये आंकड़ा बढक़र 10868 के पास पहुंच गया। जबकि 2016 में 10600 बच्चे कुपोषण के शिकार पाये। तो वहीं 2017 में 10160 बच्चे कुपोषित पाये गये।  

वर्ष 2018 में 3633 बच्चे ऐसे पाये गये जो कुपोषण से गंभीर रूप से बीमार थे। ऐसे बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्रों में लाकर 15 दिनों तक डायटिशिन की निगरानी में  पौष्टिक आहार खिलाकर सुपोषित किया जाता है। जिले में इस वक्त स्वास्थ्य विभाग द्वारा 4 पोषण पुनर्वास केन्द्र संचालित किये जा रहे है। इन पोषण पुनर्वास केन्द्रों में साल 2018 में केवल 558 बच्चे ही सुपोषित हो पाये हैं। और इस साल के 7 महीनों में केवल 135 बच्चे ही सुपोषित हो पाये हैं।

इस मामले को लेकर सीएमएचओ डॉक्टर बीआर पुजारी का कहना है कि अभी स्वास्थ्य विभाग द्वारा चार पोषण पुनर्वास केंद्र( एनआरसी)चलाया जा रहा है। बीजापुर ,भोपालपटनम में दस-दस तथा भैरमगढ़ व उसूर में पांच पांच बैड के केंद्र चल रहे है। डॉक्टर पुजारी ने बताया कि उन्हें आईसीडीएस से जो आंकड़े मिले है। उनके मुताबिक 3 हज़ार 500 सौ बच्चों को एनआरसी में भर्ती करने की जरूरत हैं। उन्होंने बताया कि इसमें गंभीर कुपोषित बच्चों को 15 दिनों तक डायटीशियन डॉक्टरों की देख रेख में भर्ती किया जाता है। दिन में आठ टाइम उन्हें स्पेशल टाइड दिया जाता है। श्री पुजारी के मुताबिक अभी गंगालूर में भी एक एनआरसी खोलने पर विचार चल रहा है। ताकि उस क्षेत्र के लोगों को इसका लाभ मिल सके।

 

 


Date : 04-Aug-2019

7 इनामी नक्सली के सफाए से एमएमसी जोन को तगड़ा झटका

बस्तर के रास्ते नांदगांव से अमरकंटक तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की नक्सल कोशिशें ध्वस्त

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 4 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
नक्सल मोर्चे में राजनांदगांव पुलिस के हाथ शनिवार को मिली एक बड़ी नक्सल कामयाबी ने बस्तर के रास्ते राजनांदगांव से अमरकंटक तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की नक्सल कोशिशों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। बागनदी की सीमा पर विपरीत मौसम के बावजूद 50 लाख के  7 नक्सलियों को एकमुश्त ढ़ेर कर पुलिस ने नक्सलियों के एमएमसी जोन को भी जोरदार झटका दिया है। बस्तर से लगातार ‘पलायन’ कर रहे नक्सलियों के लिए यह इलाका एक सुरक्षित मार्ग के रूप में बन गया था। पुलिस की मुस्तैदी से मिली सफलता के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस रास्ते से बेखौफ नक्सल आवाजाही पर विराम लगेगा। 

बताया जाता है कि नक्सलियों ने बस्तर से बड़ी पैमाने पर राजनांदगांव, बालाघाट और कवर्धा की सीमा पर  नक्सलियों को शिफ्ट किया है। लंबे समय से नक्सलियों के शीर्ष नेताओं की एमएमसी जोन में आवाजाही हो रही है। छत्तीसगढ़ की गुप्तचर एजेंसियों को नक्सलियों के बड़े नेताओं के समय-बे-समय पहुंचने की पुख्ता जानकारी भी है। एमएमसी जोन को संगठित कर नक्सली पुलिस को पीछे ढक़ेलने की लंबे समय से नापाक कोशिश कर रहे हैं। बताया जाता है कि कल घटनास्थल पर किसी शीर्ष नेता की अगुवानी करने के लिए दर्रेकसा दलम और विस्तार दलम के 25 से अधिक नक्सली मौजूद थे। नक्सली लगातार सीमावर्ती इलाकों में मूवमेंट करते हुए पुलिस को चुनौती दे रहे थे। कल हुए मुठभेड़ से यह बात भी पुख्ता हुई है कि नक्सली  घातक हथियारों से लैस है। 

मुठभेड़ के बाद पुलिस ने  मौके से एके-47 समेत कुछ अत्याधुनिक हथियार बरामद किए हैं। बताया जा रहा है कि इस मुठभेड़ के साथ ही दर्रेकसा दलम का अस्तित्व भी खतरे में है। यह भी चर्चा है कि मारे गए नक्सलियों में अधिकांश दर्रेकसा दलम से है। वहीं  2 महिला नक्सली विस्तार दलम से जुड़े हुए थे। इस बीच मारे गए नक्सलियों पर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में 50 लाख से अधिक का ईनाम घोषित था। अकेले राजनांदगांव पुलिस ने सभी पर 34 लाख का ईनाम तय किया था। 

हाल ही के कुछ महीनों में नक्सली लगातार पुलिस के हाथों मारे जा रहे हैं। बीते कुछ दिनों में राजनांदगांव पुलिस ने अपने बूते नक्सलियों को करारा जवाब दिया है। राजनांदगांव पुलिस ने दो माह पहले टाडा दलम की महिला कमांडर जमुना को मार गिराया था। इस घटना के बाद टाडा दलम की नींव हिल गई। लंबे समय से राजनांदगांव पुलिस नक्सलियों के बड़े ठिकाने पर धावा बोलने की योजना पर काम कर रही थी। आखिरकार पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी सफलता के साथ 7 नक्सलियों को मार गिराया। राजनांदगांव पुलिस के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस बीच कल की घटना के बाद पुलिस उम्मीद कर रही है कि अब बागनदी के रास्ते नक्सलियों की बढ़ती रफ्तार कम होगी। माना जाता है कि मुठभेड़ के जरिए नांदगांव पुलिस ने सुरक्षित माने जाने वाले इस नक्सल मार्ग को पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है। साथ ही राजनांदगांव जिले से लेकर कवर्धा सीमा तक पुलिस ने सख्त पहरा भी बिठा दिया है।

रेड कारीडोर बनाने के भुलावे में न रहें नक्सली - डीआईजी डांगी
राजनांदगांव रेंज डीआईजी आरएल डांगी ने कल की कामयाबी को नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि रेड कारीडोर बनाने के स्वप्र देख रहे नक्सलियों का मंसूबा कभी भी पूरा नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पुलिस नक्सलियों को मुख्यधारा में वापस लाने की लगातार कोशिश कर रही है। इसके बावजूद नक्सली ढीडपन में अपने हरकतों के कारण पुलिस के हाथों मारे जा रहे हैं। पुलिस इंसानियत के तकाजे को देखते हुए नक्सलियों की घर वापसी कराने की कोशिश कर रही है। श्री डांगी ने कहा कि रेड कारीडोर बनाने का सपना रात ढलने के साथ ही खत्म होने जैसा है। श्री डांगी ने नक्सलियों के दोहरे मुखौटे को लेकर भी कटाक्ष किया है। उनका कहना है कि स्थानीय नक्सलियों के साथ भेदभाव कर शीर्ष नेतृत्व दीगर राज्यों के नक्सलियों को महत्व देता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में अब स्थानीय बाशिंदे दल में शामिल नहीं हो रहे हैं। जिससे नक्सल संगठन डगमगा रहा है। श्री डांगी ने एक बार फिर जनता को संदेश देते अपील करते कहा कि नक्सली किसी के हितैषी नहीं है। वह सिर्फ स्थानीय मुद्दों को जरिए लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। डीआईजी ने मुठभेड़ में शामिल गातापार के थाना प्रभारी लक्ष्मण केंवट समेत अन्य जवानों को बधाई देते इनाम देने की घोषणा की है।

 


Date : 01-Aug-2019

दारू के समुद्र का रेट घोटाला पहुंच रहा 300 करोड़...

विशेष संवाददाता
रायपुर, 1 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
छत्तीसगढ़ सरकार के एक सबसे कुख्यात और भ्रष्ट आबकारी विभाग में बरसों से राज करने वाले संविदा अफसर एस.आर. सिंह को धरती निगल गई है, या आसमान खा गया है, पता नहीं, लेकिन एसीबी-ईओडब्ल्यू उन्हें खोजने की बात जरूर कर रही है। भाजपा सरकार के पिछले पूरे पन्द्रह बरसों में आबकारी विभाग पर अकेले राज करने वाले, बार-बार संविदा नियुक्ति पाने वाले एस.आर. सिंह के भ्रष्टाचार की जांच किसी किनारे पहुंचती दिख रही है।

जानकार सूत्रों के अनुसार अलग-अलग कंपनियों से अलग-अलग ब्रांड की शराब खरीदने में रेट तय करते हुए जो घपले पकड़े गए हैं, वे कागजातों पर साबित होते दिख रहे हैं। एसीबी-ईओडब्ल्यू ने आबकारी विभाग के कई अफसरों और कर्मचारियों के बयान लेने के बाद अब इस भ्रष्टाचार का जो हिसाब लगाया है, उसमें एस.आर. सिंह के काम के एक हिस्से में ही तीन सौ करोड़ रूपए से अधिक का भ्रष्टाचार कागजों पर अब तक मिल गया है। 

भाजपा सरकार के रहते हुए भी आबकारी विभाग का भ्रष्टाचार सबकी जानकारी में था, और विभागीय अफसरों से लेकर मंत्री तक सबकी भागीदारी इसमें चर्चा में रहती थी। इस विभाग में पूरे भाजपा शासनकाल में मंत्री इसी एक भ्रष्ट अधिकारी एस.आर. सिंह के मार्फत सारा काम करते रहे, और कई मामलों में इस अफसर के ऊपर के अफसरों को भी सिर्फ दस्तखत करने के लिए कह दिया जाता था। अभी जांच में यह बात सामने आ रही है कि एस.आर.सिंह के बनाए गए कागजों पर ऐसी ही कार्रवाई करने के हुक्म मंत्री की तरफ से रहते थे। एस.आर. सिंह को रिटायर होने के बाद भी संविदा पर नियुक्त करने का सिलसिला ऐसा चला कि एक के बाद एक, आधा दर्जन से अधिक बार एस.आर. सिंह को संविदा नियुक्ति मिलती चली गई, और यह अफसर आबकारी विभाग को किसी स्थाई बार मालिक की तरह चलाते रहा। इसे बीच में रखकर शासन में बैठे सारे बड़े लोग अपनी मर्जी से शराब कंपनियों को कुचलने का काम करते रहे, या उन्हें सिर पर बिठाने का काम करते रहे। सरकार की शराब खरीदी की मनमानी के खिलाफ कुछ शराब कंपनियां हाईकोर्ट तक गईं कि सरकार कारोबारियों के बीच कैसा भेदभाव कर रही है। 

शराब के रेट तय करने में हुए भ्रष्टाचार की जांच जारी है, और अब तक एस.आर. सिंह के खिलाफ करीब तीन सौ करोड़ की गड़बड़ी पकड़ाई है, और आगे जांच जारी है। 

करोड़ों की संपत्ति का पता चला था...
एसआर सिंह के यहां अप्रैल में एक साथ छापेमारी हुई थी। छापे के दौरान उनकी करीब 15 करोड़ की संपत्ति का खुलासा हुआ है। इसमें रायपुर के बोरियाकलां में एक मकान, बिलासपुर में 2 मकान और 1 प्लाट का पता चला है। उनके मध्यप्रदेश के अनूपपुर में 3 मकान और जमीन हैं।
समुद्र राम सिंह का मुंगेली में करीब 10 एकड़ का फार्म हाउस भी है। साथ ही उनकी कई अन्य संपत्तियों के दस्तावेज भी मिले हैं। अनूपपुर में ही 40-50 एकड़ का भव्य फार्म हाउस का पता चला है। रायपुर, बिलासपुर और मध्यप्रदेश के करीब 8 ठिकानों में एक साथ कार्रवाई की गई थी। तब से एसआर सिंह गायब हैं। उनका देवपुरी के रावतपुरा कॉलोनी के अलावा बिलासपुर के नेहरू नगर में भी बंगला है। 

 

 


Date : 30-Jul-2019

जिंदगियां बचाने का ऐसा जुनून, नक्सल इलाके में इस तरह काम कर रहे हैं दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी

मोहम्मद ताहीर खान


बीजापुर, 30 जुलाई (छत्तीसगढ़)। यहां स्वास्थ्य महकमे के एक दो नहीं बल्कि तीन दर्जन से ज्यादा स्वास्थ्य कर्मियों पर लोगों की जिंदगी बचाने का ऐसा जुनून है कि वे अपनी मौत की परवाह किए बिना ही हर दिन मौत का सामना करते हुए हजारों लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं। 

सीएमएचओ  डॉंक्टर बी.आर. पुजारी बताते हैं कि इन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। मगर जिले में पदस्थ कर्मचारियों की बदौलत ये काम आसान हो जाता है। डॉ पुजारी का कहना है कि इन कर्मचारियों का हौसला बनाये रखने के लिए वे खुद भी अपने कर्मचारियों के साथ ऐसे इलाकों में पहुंचकर मेडिकल कैंप लगाते हैं।

 बीजापुर जिले के उन इलाकों में जहां लोकतंत्र नहीं बल्कि लालतंत्र का बोलबाला है। ऐसे दुर्गम इलाकों में अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर स्वास्थ्य कर्मी लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा रहे है। कभी उपनते नदी नालों में लकड़ी के बने पतले से नाव पर सवार होकर  तो कभी पहाड़ी रास्ते पर कई किलोमीटर पैदल चलकर हजारों आदिवासियों को मौत के मुंह से बाहार निकालते हैं। पहाड़ी रास्ते पर बड़ी मुश्किल से चढ़ाई करते टै्रक्टर पर सवार होकर जाते हंै तो कभी बाईक तो कभी कई किमी पैदल ही पहुंच कर पेड़ के नीचे मरीजों का ईलाज करते हंै। 
जिले में पदस्थ तीन दर्जन से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन ऐसी ही मुसीबतों का सामना करते हुए नक्सल  इलाके में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाते हैं। दरअसल जिले का करीब 40 फीसदी इलाका ऐसा है जहां सीधे तौर पर माओवादियों की हुकूमत चलती है। ऐसे में इन इलाकों तक पहुंचने के लिए आजादी के सात दशक बाद भी  सरकार सडक़ या नदी नालों में पुल पुलिये का निर्माण नहीं करवा पाई है। नतीजतन ये पूरा इलाका शेष भारत से पूरी तरह से कटा हुआ है। ऐसे में इन इलाकों के बाशिंदों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बहुत कठिन और चुनौती से भरा काम होता है। 

मगर जिले के भोपालपटनम, भैरमगढ, गंगालूर, पामेड, बीजापुर, फरसेगढ, कुटरू, चेरपाल  और मिरतुर में पदस्थ स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर इन इलाकों में पहुंचते हैं। पेड़ के नीचे मेडिकल कैम्प लगाकर ऐसे इलाके के मरीजों का ईलाज करते हैं। 

उल्लेखनीय कि  अशिक्षा और जागरूकता के अभाव में इस इलाके के ग्रामीण अंधविश्वास के कैद से बाहर नहीं निकल पाये हैं।   जब बीमार पड़ते हैं तब ये अस्पताल नहीं पहुंचकर गांव में ही सिरहा-गुनिया या जाड-फूंक का सहारा लेते हैं। इस कारण कईयों दफे छोटी-छोटी बीमारियों की वजह से ये आदिवासी वक्त बेवक्त ही काल के गाल में समा जाते हैं। 

 

 


Date : 28-Jul-2019

घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में अब 5 बाघ इनमें से एक पन्ना रिजर्व से भटका

29 जुलाई विश्व टाइगर दिवस

चन्द्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 28 जुलाई । कोरिया जिला स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बीते एक साल से बाघों की संख्या में इजाफा होकर 5 हो गया है,जबकि गर्भवती बाघिन ने 1 बच्चे को जन्म दिया है, 5 बाघों में एक पन्ना टाइगर रिजर्व से भटककर आया पन्नालाल बताया जा रहा है।

इस संबंध में पार्क के रेंजर एमएस मर्शकोले का कहना है पार्क क्षेत्र में बाघों के भोजन के लिए पर्याप्त भोजन के कारण बाघिन और उसका शावक के साथ 3 और बाघ इन दिनों देखे जा रहे है, खुशी की बात ये है हमारे उद्यान में बाघिन ने एक शावक को जन्म दिया और दोनो सुरक्षित और स्वस्थ भी है। इसके अलावा एक बाघ सोनहत रेंज में बीते कई दिनों से है जबकि एक जनकपुर और एक कमर्जी क्षेत्र में है। जनकपुर में घूम रहा बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व से आया हुआ लग रहा है। जिसे पन्नालाल के नाम से जाना जाता है।

जानकारी के अनुसार जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बीते जनवरी माह से एक बाघिन यहां देखी गयी, बाद में विभाग को पता लगा कि वो गर्भवती है, उस पर विभाग ने नजऱ बनाये रखी, जून माह के अंतिम दिनों में उसने एक शावक को जन्म दिया, बाघिन के शावक के जन्म देने पर पार्क के अधिकारियों और कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गयी, उन्होंने इसकी जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को भी दी। बीते दो माह से पार्क के कर्मचारियों में माँ और बच्चे के पगमार्क इकठ्ठे किये, इसी बीच लगभग 4 वर्ष की उम्र का एक जवान बाघ सोनहत परिक्षेत्र में देखा गया, उसकी तस्वीरे भी ट्रैप कैमरे ने कैद की, उस पर भी विभाग नजऱ बनाये हुए है, लगभग 12 से 15 जानवरों का अभी तक वो शिकार कर चुका है, फिलहाल उसे सोनहत रेंज के गिधेर में देखा गया है।  वहीं संजय गांधी पार्क से लगा गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान का जनकपुर और कमर्जी परिक्षेत्र में एक-एक बाघ की जानकारी विभाग के पास है। 

जनकपुर में विचरण कर रहा बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व से भटक कर आया पन्ना लाल बताया जा रहा है। बताया जाता है पन्नालाल पहले बांधवगढ़ में कई दिनों तक देखा गया, और फिर अचानक वहां से गायब हो गया, इधर गुरु घासीदास पार्क के जनकपुर में उसे देखे जाने पर उससे जुड़ी जानकारी जुटा कर भेजा गया, जिससे पता चला कि ये बाघ और कोई नही पन्नालाल ही है। जबकि कमर्जी में विचरण कर रहा एक बाघ ने 4 गाय भैस का शिकार कर चुका है। 
बारिश से हो रही है दिक्कत

बारिश शुरू होते ही पार्क क्षेत्र में लगे बेशकीमती ट्रैप कैमरों को विभाग ने निकाल लिए, ताकि वो खराब ना हो सके, जिसके बाद बाघों को ट्रैप नही किया जा पा रहा है। 

दूसरी ओर बाघिन और उसके एक बच्चे को कुछ गांव वालों ने देखा और दोनों के पगमार्क को विभाग ने पाया है, बारिश में कारण उनके पगमार्क भी मिलना काफी मुश्किल हो गया है। हालांकि विभाग मां और बच्चे पर नजऱ बनाये हुए है। विभाग की माने तो ये सोनहत रेंज के आसपास ही है। 

घोषित हो सकता है टाइगर रिजर्व
वर्ष 2001 में अस्तित्व में आये गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में वैसे तो कई बार बाघ आये और यहां से चले गए, वर्ष 2005 के बाद लंबे समय तक बाघ यहाँ नही दिखे, वर्ष 2019 के जनवरी माह से यह क्षेत्र बाघों के यहां आने और उनके रहने के लिए शानदार क्षेत्र के रूप में सामने आया, उसका मुख्य कारण है बाघों के लिए मिलने वाला पर्याप्त भोजन, यहां बड़ी मात्रा में नील गाय, हिरण, चीतल देखे जा रहे है, जो बाघों के यहां निवास करने का बड़ा कारण है। अब ये टाइगर रिजर्व बनने की घोषणा के काफी करीब है।

बदलाव से आया परिवर्तन
राज्य में नई सरकार बनते ही पार्क के अधिकारियों को बदला गया, पार्क में बदले अधिकारियों ने बाघों के संरक्षण को लेकर गंभीर प्रयास किये, उन्होंने यहां रहने वाले ग्रामीणों को समझाइश के साथ शिकारियों पर तेज नजऱ बनाई, कइयों को पकड़ का जेल भेजा, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब इस पार्क में 5 बाघ मौजूद है।

धारियों से होती है अलग पहचान
वाइल्ड लाइफ के जानकार नरेंद्र बताते है बाघ के शरीर की धारियां हर बाघ में अलग होती है, इन धारियों से हर बाघ की अलग पहचान होती है, इनकी दोनो ओर की धारियो का डेटा एकत्रित है, जिसके आधार पर सबकी अपनी अलग पहचान है।


Date : 27-Jul-2019

स्काईवॉक, यह महंगा-खरीदा, आधा-पढ़ा उपन्यास पूरा पढऩा बड़े घाटे का सौदा होगा

सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नई प्रदेश सरकार आने के बाद से लगातार यह सवाल खड़ा है कि भाजपा सरकार ने शहर के बीच लोहे का एक ढांचा बनाकर सडक़ के ऊपर हवाई पैदलपथ बनाना शुरू किया था, उसका अब क्या होगा? कांग्रेस ने पिछले बरसों में विपक्ष में रहते हुए इस स्काईवॉक का जमकर विरोध किया था, उस पर भाजपा सरकार ने करीब 50 करोड़ खर्च किए थे, और अभी करीब 25 करोड़ की लागत बाकी है। उसका काम पिछली सरकार के रहते हुए ही निर्माण कंपनी के दीवालिया हो जाने की वजह से रूक गया था, और नई सरकार ने उस पर विचार जारी रखा है कि उसे पूरा किया जाए या उसे हटा दिया जाए। 

एक सरकार के रूप में भूपेश-सरकार के लिए यह फैसला आसान इसलिए नहीं है कि इसे हटाकर 50 करोड़ का नुकसान करने की बदनामी हाथ लगेगी, और इसे पूरा करेंगे तो और अधिक बर्बादी होगी, और यह बात भी सामने आएगी कि कांग्रेस का विरोध बोगस था। इसलिए सरकार जाहिर तौर पर सभी तबकों से, जानकारों और विशेषज्ञों से बात कर रही है। हमने भी इस अखबार में कुछ बार इस बारे में लिखा था, लेकिन कोई ठोस राय नहीं दी थी क्योंकि विशेषज्ञों को इस पर सोचना चाहिए। 

अब जब कई तबकों की राय सामने आ चुकी है, और राज्य सरकार के सामने एक कंपनी ने शहर के बीच से गुजरने वाली जी.ई. रोड पर दुर्ग से नया रायपुर तक एक हल्की ट्रेन चलाने का प्रस्ताव रखा है, तो तस्वीर कुछ साफ हो रही है। इस जी.ई. रोड पर इस स्काईवॉक का हिस्सा एक किलोमीटर लंबा ही है, लेकिन इसकी वजह से इस सडक़ पर ऊपर कोई फ्लाईओवर बनना नामुमकिन हो जाता है, या ऐसी कोई ट्रेन चलने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। इन दो किस्म की संभावनाओं को देखें तो यह बात साफ होती है कि स्काईवॉक से इस शहर को हासिल तो शायद बहुत कम होगा, लेकिन आगे की इन दो संभावनाओं के विकल्प पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। इस शहर में पिछले बरसों में दो बड़ी सडक़ें शहर के बीच बनाई गई हैं जिनसे तमाम शहर पर ट्रैफिक का बोझ कुछ कम हुआ है। लेकिन ट्रैफिक है कि इस रफ्तार से बढ़ते चल रहा है कि सडक़ों के बढऩे की रफ्तार उसका मुकाबला नहीं कर पा रही है। फिर यह भी है कि भिलाई की तरफ कुम्हारी से लेकर नया रायपुर तक जी.ई. रोड पर ट्रैफिक का दबाव कम होने का कोई जरिया बना नहीं है, कैनाल रोड, और एक्सप्रेस हाईवे इस सडक़ का विकल्प नहीं हैं, वे दूसरे इलाकों को जोड़ते हैं। 

ऐसे में यह बात अब साफ है कि स्काईवॉक को भूल जाना बेहतर है, और जी.ई. रोड पर भिलाई से लेकर मंदिर हसौद के पहले तक या तो एक फ्लाईओवर बनाना होगा, या फिर एक ट्रेन शुरू करनी होगी ताकि लोगों को सार्वजनिक यातायात मिले, तेज सडक़ मिले, और शहर के बीच सडक़ों पर से दबाव कम हो। स्काईवॉक के बारे में विशेषज्ञों से परे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की यह बात भी ध्यान देने लायक है कि इस शहर में 40-45 डिग्री तक जाने वाली गर्मी में इस फौलादी ढांचे के भीतर से लोग किस तरह आ-जा सकेंगे? 

भविष्य की संभावनाओं को खत्म करने का हक किसी पीढ़ी को नहीं रहता। शहर के एक छोटे से हिस्से में पैदल चलने वाले लोगों की सहूलियत के हिसाब से बनाए जा रहे स्काईवॉक से अगर हमेशा के लिए आर-पार पुल-ट्रेन की संभावना खत्म होती है तो ऐसी योजना काम की नहीं है। जिस कंपनी ने अभी छत्तीसगढ़ सरकार के सामने एक प्रस्तुतिकरण दिया है, और बिना सरकारी लागत के इसे बनाने का, और 30 बरस तक खुद टिकट लेकर उसके बाद सरकार को दे देने का जो प्रस्ताव रखा है, उससे यह बात जाहिर है कि इस सडक़ के ऊपर ट्रेन चलाना मुमकिन है, और उसका अध्ययन करके ही यह प्रस्ताव रखा गया है। 

जिस तरह किसी खरीदे गए उपन्यास को आधा पढऩे के बाद जब समझ पड़ता है कि उपन्यास बेकार है, तो दाम चुका देने की वजह से बाकी का आधा फालतू उपन्यास पढऩा समझदारी नहीं होती, उसी तरह रायपुर के इस स्काईवॉक को पूरा करना अब समझदारी नहीं दिख रही क्योंकि इसके बनने से भविष्य की संभावनाएं खत्म हो रही हैं जो कि इस शहर के लिए अधिक जरूरी हैं। राज्य सरकार को इसे हटाकर एक ट्रेन की योजना पर काम करना चाहिए जिससे शहर में गाडिय़ों की भीड़ से दम घुटना और न बढ़े। 

 


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