विशेष रिपोर्ट

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Date : 15-Jan-2020

संतोषी मरकाम

पिछले साल 26 और 27 दिसंबर को जम्मू कश्मीर के राजौरी तहसील में स्थित एक ईंट-भट्टे से 91 मजदूरों को मुक्त कराया गया। इनमें महिला और पुरुषों के अलावा 41 बच्चे भी शामिल हैं। ये सभी छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चापा जिले के रहने वाले हैं।

नई दिल्ली, 15 जनवरी (द वायर)। बंधुआ मजदूरी प्रथा को 44 साल पहले यानी 1976 में भले ही गैर-कानूनी घोषित किया गया हो, लेकिन अब भी रह-रहकर इसे जुड़ी खबरें आती ही रहती हैं। लेकिन न तो मुख्यधारा का मीडिया इन ख़बरों को जगह देता है और न ही सरकार द्वारा इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कोई पुख़्ता कदम उठाए जाते हैं।

केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के जम्मू की राजौरी तहसील में दो ईंट-भ_ों से बीते साल 26 और 27 दिसंबर 91 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाया गया। ये सब मजदूर 24 परिवारों के हैं। इनमें महिला और पुरुषों के अलावा 41 बच्चे भी शामिल हैं, जिनमें से कुछ को बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया था। महिलाओं में से कुछ फिलहाल गर्भवती हैं।

ये सारे लोग छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चापा जिले के विभिन्न गांवों से हैं। इन्हें छुड़ाने की कार्रवाई दिल्ली के कुछ एनजीओ की पहल पर स्थानीय प्रशासन की अगुवाई में पूरी हुई।

यह बचाव कार्य राजौरी तहसील में फंसे एक 25 वर्षीय मजदूर अजय कुमार द्वारा संभव हो पाया। अजय को इससे पहले फरवरी 2019 में हिमाचल प्रदेश के एक ईंट-भ_े से बंधुआ मजदूरी से छुड़ाया गया था। लेकिन चूंकि उसका कोई पुनर्वास नहीं हुआ था, इसलिए वो दोबारा दूसरे एजेंट के चंगुल में फंस गए।

अजय कुमार को बंधुआ मजदूरी से पहले कैसे छुड़ाया गया था, इस बारे में उन्होंने बताया, ‘पांच साल पहले राजू राजा नाम का एक जमादार (एजेंट) हमारे घर आया था। उसने हमें काम दिलाने की बात कहीं तो मैं अपने परिवार (बीवी-बच्चों) के साथ आ गया।’

वे कहते हैं, ‘पहले उसने हमें हरियाणा के राजा तालाब के एक ईंट-भ_े में काम पर लगा दिया। वहां हमने दो साल काम किया था लेकिन हमें पैसा नहीं दिया गया। उसके बाद हमें श्रीनगर ले जाया गया था। वहां भी हमने काम किया लेकिन पैसा नहीं मिला। मालिक हमारे साथ मारपीट करता था। मेरे छोटे-छोटे बच्चों से भी काम कराता था। श्रीनगर से दोबारा हमें हरियाणा लाया गया।’

उन्होंने आगे बताया, ‘हमें पलवल के करीब बल्लभगढ़ के ईंट-भ_े में ले जाया गया था, बाद में वहीं से हमें मुक्त कराया गया था। जिस समय हमें छुड़ाया गया, तब घर जाने के लिए किराया का भी पैसा नहीं था। थोड़ा बहुत जो पैसा था उससे मेरी बहन और दो बच्चों को छत्तीसगढ़ भिजवा दिया। हम वहीं मज़दूरी के लिए इधर-उधर भटक रहे थे, ताकि कुछ पैसों का जुगाड़ हो और हम घर जा सकें। उसी दौरान एक दूसरा जमादार मिला, जिसने कहा कि दो महीना काम करो तो पैसा दूंगा फिर तुम घर चले जाना।’

दोबार काम मिलने के बाद अजय का दर्द कम नहीं हुआ क्योंकि वे एक बार फिर बंधुआ मजदूरी के चंगुल में फंस गए थे।

उन्होंने बताया, ‘हम हरियाणा में ही उसके पास तीन महीना काम किया, लेकिन उसने भी कुछ नहीं दिया। कभी-कभार दो-पांच सौ दे दिया करता था। उससे हमारे खाने-पीने का इंतज़ाम भी ठीक से नहीं हो पाता था। कभी खाते तो कभी भूखे ही रह जाते थे।’

इस बीच राजू राजा दोबारा आया हरियाणा के ईंट-भ_े के मालिक से अजय कुमार पर कर्ज होने की बात कहकर उन्हें, उनकी पत्नी और उनके रिश्तेदारों को दोबारा अपने साथ जम्मू कश्मीर ले गया।

अजय कहते हैं, ‘राजू राजा हमें राजौरी के एक ईंट-भ_े में छोड़ दिया। वहां हमसे बहुत काम करवाया जाता था। वहीं मेरा तीसरा बच्चा पैदा हुआ। मेरी पत्नी को डिलीवरी के लिए अस्पताल ले जाने के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं थे। पैसा मांगने पर मालिक ने कहा कि यहीं ईंट-भ_े में बच्चा पैदा करो, कोई पैसा नहीं मिलेगा। डिलीवरी के समय मेरी पत्नी को काफी दिक्कत झेलनी पड़ी। कई दिनों तक वह दर्द से कराहती रही। बाद में हमारे ही कुछ बुजुर्ग लोगों ने घरेलू नुस्खों के जरिये उसे ठीक किया।’

अजय का राष्ट्रीय बंधुआ मजदूर उन्मूलन अभियान समिति (एनसीसीबीएल) से कैसे संपर्क हुआ, यह पूछने पर अजय ने ‘द वायर’ को बताया कि उनके गांव के एक बंधुआ मजदूर को कहीं और से छुड़ाया गया था, उसके पास इस संगठन के कार्यकर्ताओं का फोन नंबर था। उससे नंबर लेकर उनसे संपर्क किया गया।

छुड़ाए गए 91 लोगों में से एक मनीषा ने भी अपनी आपबीती बताई।

मनीषा छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के छोटे रबेली गांव की हैं। पांच बच्चों की मां मनीषा ने बताया कि उनका परिवार पिछले पांच साल से ऐसे ही भटक रहा है। अपने रिश्तेदारों और मां-बाप की मौत के दौरान भी वह घर नहीं जा सकीं।

ये बताते हुए वह रो पड़ीं। दुखी होकर वे कहती हैं कि मेरे पांचों बच्चे भी मेरी ही तरह अनपढ़ रह जाएंगे।

उन्होंने बताया, ‘एजेंट राजू राजा ने हमें हरियाणा से श्रीनगर ले जाकर एक आदमी के पास छोड़ दिया था। बाद में उसने हमें राजौरी के एक ईंट-भट्टे में दस लाख में बेच दिया था। ऐसा भ_े का मालिक कहता था। वहां पर हमें बंधक की तरह रखा जाता था। कहीं आने-जाने नहीं दिया जाता था।’

मनीषा के अनुसार, महिलाओं के साथ मालिक अभद्र व्यवहार करता था, गाली-गलौज करता था। परिवार को खाने के लिए एक या दो किलो चावल फोटो खींचकर देता था, जिससे उन्हें तीन-चार दिन पेट भरना होता था।

वे कहती हैं, ‘हम एक समय खाते थे तो एक समय भूखे पेट काम करते थे। बच्चों को भी भूखा रहना पड़ता था। अगर मांगते थे तो कहता था कि देने के लिए यहां तुम्हारे बाप ने कुछ रखा है क्या। तुम लोग यहां बंधुआ मज़दूर हो, वैसे ही रहो। हमारे बच्चों के काम नहीं करने से पर वह उनसे भी मारपीट करता था। बीमार पडऩे पर भी दवाई के लिए पैसा नहीं होता था। ऐसे ही मुश्किल से काम करना पड़ता था।’

एक और मजदूर सूरज कुमार की आपबीती भी लगभग वैसी ही है। वे बताते हैं कि उनको उनके ही इलाके के माखन और कोमल नामक दो व्यक्तियों ने छत्तीसगढ़ के उनके गांव से लेकर आए थे।

उन्होंने बताया, ‘माखन और कोमल ने हमें हरियाणा के ईंट-भ_े में काम दिलाया था। वहां पर हमें मज़दूरी मिली थी। बाद में हीरालाल नामक व्यक्ति ने मुझे और मेरे भाई को श्रीनगर लेकर आया। वहां हमने लगभग 22 हजार रुपये (प्रति व्यक्ति) का काम किया था। मालिक ने हीरालाल को पैसा दिया लेकिन उसने हमें कुछ भी नहीं दिया।’

वे कहते हैं, ‘उसके बाद हमें विजय नामक व्यक्ति राजौरी में दुर्गेश के ईंट-भ_े में ले गया। वहां भी हमें मजदूरी नहीं दी जाती थी। खर्चे के लिए कभी 500 तो कभी 600 रुपये दिए जाते थे। उससे हमें राशन-पानी, कपड़े सभी जरूरतों को पूरा करना पड़ता था। खाने के लिए बहुत तंगी होती थी।’

सूरज ने बताया, ‘हमें रात के एक-दो बजे भी उठाकर काम करवाया जाता था। सोने भी नहीं दिया जाता था। गालियां देते थे, मारपीट करते थे। मालिक ने दो मजदूरों की बहुत पिटाई की थी। महिलाओं के साथ भी वह गाली-गलौज करता था। कहता था, मैंने तुम लोगों को बीस लाख में खरीदा है, वो पैसा भरो और चले जाओ।’

राजौरी से मुक्त कराई गईं ज्योति कोहली जांजगीर-चांपा जिले के बस्ती बाराद्वार गांव की हैं। फिलहाल वो गर्भवती हैं और उनका डेढ़ साल का एक बच्चा भी है।

उन्होंने बताया, ‘हमको वहां रहने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं थी। तिरपाल के नीचे रहना पड़ता था। नाली के पानी से नहाना पड़ता था, पीने के लिए पानी नहीं मिलता था। हम नाली का पानी पीने को मजबूर थे।’

ज्योति कहती हैं, ‘रात के एक-दो बजे मालिक उठाता और काम करने के लिए कहता था। दो या तीन दिन में एक बार हमें एक-दो किलो चावल दिया जाता था, जिससे एक समय खाकर एक समय खाली पेट रहकर हमें काम करना पड़ता था।’

एक अन्य मजदूर ममता सिधार ने बताया कि उनको भी राजू राजा ने राजौरी के ठेकेदार अमजद खान और किशोर के हाथों बेचा था। अमजद खान और किशोर ईंट-भ_े के पार्टनरशिप में थे।

ममता ने बताया, ‘महिलाओं को वहां बहुत तकलीफ झेलनी पड़ती थी। कोई महिला गर्भ से होती थी तब भी उसे काम करना पड़ता था। बीमार पडऩे से भी दवा नहीं दी जाती थी। हाथ में पैसे भी नहीं होते थे। हम गुलामों की तरह जी रहे थे।’

ममता सिसकते हुए कहती हैं, ‘हम ऐसे दर-दर भटकना नहीं चाहते, हमारा पुनर्वास हो। हमें बंधुआ मजदूरी से मुक्ति का प्रमाण-पत्र मिले।’

इन बंधुआ मज़दूरों को छुड़ाने में अहम भूमिका निभाने वाले मानव अधिकार कार्यकर्ता निर्मल गौराना बताते हैं कि आज देश के खेतीहर मजदूरों की स्थिति बहुत ही बुरी है। देश में सबसे ज्यादा बंधुआ मज़दूर खेतिहर मजदूर ही हैं।

निर्मल ने सवाल उठाया, ‘क्या मनरेगा और राज्य सरकार की तमाम योजनाएं दम तोड़ रही हैं, जिसकी वजह से खेतिहर मजदूर और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को दूसरे राज्यों में काम की तलाश में पलायन करना पड़ रहा है, जहां न तो उन्हें सामाजिक सुरक्षा, काम की सुरक्षा मिलती है और न ही सही ढंग से मजदूरी मिल पाती है।’

निर्मल ने कहा, ‘ये गरीब और अनपढ़ हैं इसलिए ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं जहां से वे वापस अपने घर नहीं लौट पाते। ये 24 परिवार छत्तीसगढ़ के अलग-अलग गांवों के रहने वाले हैं, उन्हें अलग-अलग मानव तस्कर पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में लेकर गए। उनको बेचा गया हालांकि सरकार इसे मानने को तैयार नहीं है कि ये बंधुआ मजदूर हैं और मानव तस्करी के शिकार हुए हैं। सरकार ये बताए कि मानव तस्करी और बंधुआ मज़दूरी की परिभाषा क्या है?’

निर्मल से मिली जानकारी के मुताबिक, इन बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने के प्रति प्रशासन का रवैया सुस्त और उदासीन था। राष्ट्रीय बंधुआ मजदूर उन्मूलन अभियान तरफ से राजौरी प्रशासन को इन बंधुआ मजदूरों को लेकर एक शिकायत ई-मेल के जरिये भेजी गई थी।

उनका आरोप है कि 19 दिसंबर को ये शिकायत राजौरी के जिला कलेक्टर को भेजा गया था। जिला कलेक्टर ने उसका कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद मजबूरन एक टीम ने खुद जाकर जिला कलेक्टर को शिकायत पत्र दिया। उसके बाद उन्होंने बताया कि एक टीम बनाई गई है, जो उन्हें छुड़ाएगी।

बहरहाल 26 और 27 दिसंबर को उन्हें छुड़ा लिया गया। अभी ये लोग नई दिल्ली के प्रभातारा हॉस्टल में रखा गया हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठनों की मदद से उन्हें रहने और खाने-पीने का इंतजाम हो रहा है। एक अन्य संगठन इन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा रहा है।


Date : 12-Jan-2020

आजादी के 70 वर्षों बाद भी बिजली आज तक नहीं, बिजली के अभाव में कोई भी अपनी बेटी देने के लिए तैयार नहीं 

मनेन्द्रगढ़, 12 जनवरी (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले के मनेन्द्रगढ़ विकासखंड में एक गांव ऐसा है जहां आजादी के 70 वर्षों बाद भी बिजली आज तक नहीं पहुंच सकी है। गांव अंधकार में डूबा हुआ है। सडक़ और पानी की भी व्यवस्था नहीं है जिसकी सजा अब यहां के विवाह योग्य युवकों को भुगतनी पड़ रही है, क्योंकि बिजली के अभाव में कोई भी यहां अपनी बेटी देने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। 

सविप्रा उपाध्यक्ष गुलाब कमरो के संज्ञान में यह आते ही उन्होंने कहा कि गांव में शहनाई बजेगी। इसके लिए आचार संहिता समाप्त होते ही गांव में बिजली, पानी और सडक़ की समस्या शीघ्र दूर किए जाने कारगर प्रयास किए जाएंगे। 

मनेंद्रगढ़ तहसील से लगभग दस किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत खैरबना स्थित है। इस गांव के बांधपारा इलाके में लगभग 25 घर हैं जहां करीब डेढ़ सौ की आबादी है जिसमें ज्यादातर आदिवासी उरांव जाति के हैं। बांधपारा में आज तक बिजली नहीं पहुंची है। ग्रामीणों को केरोसिन भी नहीं मिलता है। बिजली के अभाव ने यहां के लोगों की दिनचर्या ही बदल कर रख दी है। शाम होने से पहले ही लोग भोजन-पानी की तैयारी शुरू कर देते हैं वहीं बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका असर पड़ता रहा है, लेकिन अब जो परेशानी सामने आई है उससे गांव में रहने वाले कई माता-पिता की नींद उड़ चली है। गांव में सडक़, बिजली, पानी की सुविधा नहीं होने से कोई भी अपनी बेटी का विवाह इस गांव में नहीं करना चाह रहा। 

‘छत्तीसगढ़’ ने जब गांव का दौरा किया तो श्यामवती रामबाई, बिराजू, छोटेलाल, रामचरण, धनीराम, रामगोपाल, राजाराम, रमेश, रामप्रकाश, नीराबाई, पुष्पा सहित कई ग्रामीण जमा हो गए और गांव में बिजली, पानी, सडक़ की कमी से होने वाली परेशानियां बयां करने लगे। इस बीच सुशीला नामक एक महिला ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि वह अपने बेटे की शादी का रिश्ता लेकर सूरजपुर जिले के फूलपुर गांव गई हुई थी जहां लडक़ी वालों ने यह कहते हुए रिश्ता करने से इंकार कर दिया कि जिस गांव में सडक़, बिजली, पानी नहीं है वहां हम अपनी बेटी नहीं देंगे। उसने कहा कि यह सुनकर उसे गहरा सदमा पहुंचा है। तिजिया नामक महिला ने कहा कि वह भी इस बात से चिंतित है कि जरूरी सुविधाएं  नहीं होने की वजह से आखिर हमारे गांव में कौन अपनी बेटी देगा। वहीं अन्य ग्रामीणों ने कहा कि आदिवासियों का गांव है, हमारा विकास हो, इसकी चिंता किसे है। अक्सर चुनाव के समय बड़े नेता आते हैं और झूठे आश्वासन देकर यहां से चले जाते हैं। 


Date : 03-Dec-2019

सलमान रावी
नई दिल्ली, 3 दिसंबर । छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुडा में जून 2012 में सुरक्षाबलों के कथित नक्सल एनकाउंटर में 17 लोगों की मौत हुई थी जिनमें नाबालिग भी शामिल थे। इस मामले की जांच के लिए बनी जस्टिस वीके अग्रवाल कमिटी ने राज्य सरकार को बीते महीने रिपोर्ट सौंप दी।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि है कि मारे गए सभी लोग स्थानीय आदिवासी थे और उनकी ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई थी और न ही उनके नक्सली होने के सुबूत हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों को बहुत करीब से दहशत में गोली मारी गई जबकि सुरक्षाबल के जवान आपस की क्रॉस फायरिंग में घायल हुए। इस घटना के तुरंत बाद 2012 में बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने सारकेगुडा का दौरा किया था।
छत्तीसगढ़ के बीजापुर के सुदूर जंगली इलाके में स्थित सारकेगुडा के पुलिस कैम्प से लगी हुई नदी पर एक पुल है। ये पुल एक अघोषित सीमा है। पुल से पहले एक पुलिस थाना और अर्धसैनिक बलों का एक कैम्प है। कहा जाता रहा कि भारत सरकार का अधिकार क्षेत्र उस पुल की सीमा पर खत्म हो जाता है और पुल के उस पार माओवादियों की सामानांतर सरकार यानी जनताना सरकार का इलाका है। कोई पुलिसवाला इस पुल को अकेले पार करने का जोखिम नहीं उठा सकता था। बाहर से आए लोगों के लिए वहाँ जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
साल 2012 के 28 जून की आधी रात को खबर मिली कि सारकेगुडा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हुई है जिसमे कई माओवादी मारे गए हैं। छह पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी कही जा रही थी जिन्हें इलाज के लिए निकट के बड़े शहर भेज दिया गया था। आश्चर्य वाली बात थी कि मारे जाने वाले लोगों में 8 नाबालिग बच्चे भी थे।
ये इलाका सारकेगुडा थाने और पुलिस कैम्प लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर था और इस इलाके तक पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर का सफर करना होता था।
मैं रात में ही घटनास्थल के लिए निकल गया। तब तक मेरे फोन की घंटियाँ बजने लगीं। स्थानीय लोगों ने मुझे बताना शुरू किया कि ये मुठभेड़ माओवादियों के साथ हुआ ही नहीं है। वहां आसपास के ग्रामीण इलाके ही हैं। चूँकि आधिकारिक रूप से कुछ भी पता नहीं चल पाया इसलिए मैं घटनास्थल के लिए चलता चला गया। लगभग दोपहर के 12 बज रहे थे जब मैं सारकेगुडा थाने के पास पहुंचा। लेकिन वहां तक घने जंगलों से गुजरते हुए कच्चे रास्ते को तय करना बहुत मुश्किल काम था। रास्ते में सुरक्षाबलों और पुलिस के कई चेक पोस्ट मिले जो बंद थे।
पुलिसकर्मी हमें आगे बढऩे नहीं देना चाहते थे। जमकर तलाशियों का दौर शुरू हुआ और किसी तरह हम सारकेगुडा पहुँच पाए। पैदल पुल पार कर हम माओवादियों के जनताना सरकार के इलाके में पहुँच गए।
उस पेड़ की तस्वीर जिस पर कई गोलियां लगी। पेड़ पर लगकर लौटी गोलियां सुरक्षाबलों को भी लगी थीं। पुलिस के लोग गाडिय़ों को आगे जाने नहीं दे रहे थे। इस कारण गाड़ी वहीं छोड़ आगे का सफर पैदल तय किया।
राजपेंटा गाँव पहुंचे तो मातम छाया हुआ था। जगह-जगह गोलियों के खाली खोखे नजर आ रहे थे और लोगों में मातम। ग्रामीणों के आरोप थे कि हमारे पहुँचने से पहले ही पुलिस के अधिकारियों ने वहां पहुंचकर गाँव के लोगों को धमकाने का आरोप लगाया। उनका आरोप सीआरपीएफ के डीआईजी और स्थानीय थाने के अधिकारियों पर था।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के तत्कालीन छत्तीसगढ़ के आईजी जुल्फिकार हसन ने मुझे बताया था कि सुरक्षाबलों को खबर मिली थी कि सारकेगुडा से 10 किलोमीटर दूर सिलगर में माओवादी छापामारों के जमा होने की सूचना मिली थी। इस कारण अर्ध-सैनिक बल के जवान और स्थानीय पुलिस ने रात में ही अभियान शुरू किया था। उन्होंने बताया कि कुछ ही दूरी पर रात के अँधेरे में उन्होंने कुछ लोगों का मजमा देखा था। उन्हें लगा कि सब माओवादी वहीं जमा हैं। पुलिस का दावा था कि उन पर गोलिया चलीं जिसके बाद उन्होंने जवाबी कार्रवाई में गोलियां चलायीं। पुलिस ने घटनास्थल से हथियार बरामद होने का दावा भी किया था। मगर इस मामले का गंभीर पहलू यह था कि घटनास्थल से एक भी अत्याधुनिक हथियार बरामद नहीं किया गया था। 
कोट्टागुडा ग्राम के प्रधान ने घटना के बाद बीबीसी से बताया था कि स्थानीय आदिवासी बाशिंदों की बैठक चल रही थी। इस बैठक में वो आने वाले बीज पनडुम त्यौहार को किस तरह मनाया जाए? इस पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने बताया की ग्रामीण बात कर रहे थे और बच्चे भी वहां मौजूद थे जो खेल रहे थे और बातें सुन रहे थे।
उन्होंने बताया, उसी वक्त चारों तरफ से सुरक्षाबलों के जवानों ने सबको घेर लिया था। पूरा अँधेरा था। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि बैठक में कोई भी नक्सली नहीं मौजूद था। वो ये भी कहते हैं कि सुरक्षाबलों के जवान चारों तरफ से गोलियां चला रहे थे।
सारकेगुडा की कमला काका और उनके साथ गाँव में मौजूद आदिवासियों ने बीबीसी को बताया था कि सुरक्षा बलों के जवानों को माओवादियों की गोली नहीं बल्कि ख़ुद की गोलियां लगी हैं।
मैंने जो रेडियो रिपोर्ट की थी उसमें मैंने कमला काका का इंटरव्यू भी लिया था। वो कह रही थीं, हम सब बीच मैदान में बैठे थे। चारों तरफ से गोलियां चल रही थीं। वही गोलियां सुरक्षाबल के जवानों को आपस में लगी हैं। उनकी गोलीबारी में गाँव के बैल मरे, सूअर मरे। जो लोग भाग रहे थे उन पर सुरक्षाबलों के जवान गोलियां चला रहे थे। उन्हें खुद की गोलियां लगी हैं और वो कह रहे हैं माओवादियों ने गोलियां चलायीं हैं। बैठक में सिर्फ ग्रामीण थे।
कमला ने बताया था कि अँधेरे में पुलिसकर्मी इस तरह फैले हुए थे कि वो खुद पर ही गोलियां चला रहे थे। कई गोलियां पेड़ से टकराकर वापस सुरक्षा बलों के जवानों को ही लग रही थीं।
कमला के साथ-साथ कोट्टागुडा में मौजूद ग्रामीण, मारे गए बच्चों के बारे में बताते हुए सिसक-सिसक कर रोने लग रहे थे। वो कह रहे थे कि जो बच्चे मारे गए थे वो दरअसल वो बच्चे थे जो रोज पुलिस कैम्प में सुरक्षाबलों के जवानों के साथ फुटबॉल खेलते थे। उन्होंने कहा था, हमारे गाँव के सब बच्चों को सुरक्षाबलों के जवान पहचानते थे। उनसे रोज मिलते थे। फिर भी उन्हें मार दिया। हम सदमे में हैं।
कमला के अलावा इसी गाँव की शशिकला तेलम का भी आरोप था कि पुलिस ने उनके भाई इरपा रमेश को मार दिया। उनका कहना था कि पुलिस अगले दिन सुबह-सुबह जब गाँव आई तो रमेश अपनी झोपड़ी की खिडक़ी से झाँक रहा था।
इसी गांव के मुत्ता काका का आरोप है कि गाँव से ही पुलिस रमेश को उठाकर ले गयी थी। पहले रमेश की पिटाई की गयी और बाद में उन्हें गोली मार दी गयी।
वहीं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने जो घायल जवानों की मेडिकल रिपोर्ट बीबीसी को दी थी। उसमें सिर्फ एक जवान हवालदार के. राजन के पैर में छर्रे के जख्म की बात कही गई थी, जबकि बाकी के पांच जवानों के शरीर पर अत्याधुनिक हथियारों की गोलियों के जख्म थे। उन्हीं हथियारों के जो सिर्फ पुलिसवालों के पास ही रहते हैं।
जिन जवानों को अत्याधुनिक हथियारों की गोलियां लगीं उनमें कोबरा बटालियन के गयेंद्र सिंह, वहीदुल इस्लाम, अरुनव घोष, किशन कुमार और एसएस राणा शामिल थे जिनका इलाज रायपुर के अस्पताल में चला था।
इस मामले नें जब तूल पकडऩा शुरू कर दिया था तब कांग्रेस ने घटना से सम्बंधित अपनी रिपोर्टें में आरोप लगाए थे कि सारकेगुडा और कोट्टागुडा में मारे गए ग्रामीणों में आठ नाबालिग बच्चे हैं जिनकी उम्र 13 साल से लेकर 16 साल के बीच है। घायलों में भी तीन नाबालिग बच्चे हैं। उस वक्त छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विपक्ष में थी और उसने मामले की जांच अपने विधायक कवासी लखमा से करवाई। फिर जो रिपोर्ट उन्होंने पार्टी हाईकमान को भेजी उसमें घटना को एक मानवसंहार की संज्ञा दी गयी थी।
मजेदार बात है कि उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी और गृह मंत्री थे पी. चिदंबरम। चिदंबरम ने अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा था कि मरने वाले सभी लोग माओवादी ही थे। मगर पार्टी के अंदर से पैदा हो रहे दबाव के कारण वो कहने पर मजबूर हुए कि अगर किसी ग्रामीण की मौत हुई है तो वो इसके लिए खेद प्रकट करते हैं।
बाद में सामजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के दबाव में सरकार ने 11 जुलाई 2012 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय के सेवानिवृत जज वी।के अग्रवाल के नेतृत्व में एक जन आयोग का गठन किया।
नवम्बर के पहले सप्ताह में आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है जिसे राज्य की कैबिनेट और फिर विधानसभा में पेश किया जाना है। इसलिए रिपोर्ट में क्या कहा गया है, सरकार आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बता रही है।
लेकिन रिपोर्ट का अध्ययन करने वाले सरकार और पुलिस के सूत्र बताते हैं कि आयोग ने पूरे मामले को फर्जी मुठभेड़ पाया है क्योंकि सुरक्षाबल के बटालियन का नेतृत्व करने वाले डीआईजी एस इलांगो और डिप्टी कमांडेंट मनीष बर्मोला का कहना है कि उनके अपने हथियारों से एक भी गोली नहीं चलाई गई थी।
इसका मतलब ये हुआ कि ग्रामीणों की तरफ से गोली ही नहीं चलाई गयी थी। क्योंकि अगर ग्रामीणों की तरफ से गोली चली होती उस सूरत में अपने बचाव में सुरक्षाबलों ने गोली चलाई होती।
सारकेगुड़ा में मुठभेड़ की जगह पर बीबीसी संवाददाता सलमान रावी रिपोर्ट में मामले की जांच पर भी गंभीर सवाल उठाये गए हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रवक्ता ने बीबीसी संवाददाता अलोक पुतुल से कहा कि उनकी सरकार जल्द ही जस्टिस अग्रवाल की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए मामले में कड़ी कार्रवाई करेगी।(बीबीसी)
 

 


Date : 23-Nov-2019

पुनपल्ली में कहीं शौचालय में दीमक का घर तो कहीं शौचालय ही धराशाई, डेढ़ सालों से अधूरे, हितग्राही खुले में शौच करने को मजबूर
छत्तीसगढ़ संवाददाता
दोरनापाल, 23 नवंबर।
 सुकमा जिले के पुनपल्ली में कहीं शौचालय में दीमक का घर तो कहीं शौचालय ही धराशाई हो गया है। यहां शौचालय पिछले डेढ़ सालों से अधूरे हैं जिससे हितग्राही खुले में शौच करने को मजबूर हैं।

‘छत्तीसगढ़’  की टीम पुनपल्ली पहुंची तो पाया कि गांव की पदाम मल्ले पति बंडी का शौचालय डेढ़ साल से अधूरा है क्योंकि शौचालय तो बना पर सेप्टिक टैंक नहीं और शौचालय में दीमक भी अपना घर बना चुकी। इतना ही नहीं गांव में डेढ़ साल पहले बनी एक अधूरे शौचालय की दीवारें पूरा होने से पहले ही धरासाई हो गई।

कोंटा के विभागीय आंकड़ों के अनुसार पंचायत में 216 में से 176 शौचालय पूर्ण बताए जा रहे हैं और 82 पंचायत मुख्यालय की बात की जाए तो 5 शौचालय ही उपयोगी बताए जा रहे हैं। हितग्राहियों को अब तक इसका लाभ नहीं मिल पाने से खुले में शौच करने को मजबूर हैं। काम भी शुरू हुआ पैसे भी आहरित किए गए पर इसके बावजूद न तो शौचालय का काम पूरा हुआ और न ही प्रशासन खुले में शौच को रोक पाई । पुनपल्ली में ठेके पर शौचालय का काम कर रहे माड़वी देवा ने पंचायत सचिव गोपी राजपूत पर कमीशन खोरी का आरोप लगाते हुए बताया कि 12000 के प्रत्येक शौचालय पर 500 रुपये कमीशन सचिव काट लेता है । 

एक तरफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शहरों की बजाए गांवों को विकसित करने प्रयास रत हैं और जिला प्रशासन भी योजनाओं को गांव-गांव पहुंचाने पुरजोर लगा रही है वहीं प्रशासनिक अमला कागजों में गांवों को ओडीएफ घोषित करने में लगा होता है जबकि धरातल पर योजनाएं मुंगेरीलाल के सपनों सी नजर आती है। इसी तरह के हालात गांव के लगभग शौचालयों में देखने को मिले। कहीं दीवारें अधूरी तो कहीं कहीं सेफ्टिक टैंक गायब। दीमक शौचालयों में और हितग्राही खेतों में नजर आते हैं। अधूरा शौचालय शौच का नहीं नहाने के काम आ रहा है।

पंचायत सचिव पर लगा शौचालयों पर कमीशनखोरी का आरोप
पूरे मामले पर ग्रामीणों की परेशानी जानने के बाद जब ‘छत्तीसगढ़’ की टीम गांव में ठेके पर काम कर रहे मिस्त्री माड़वी देवा तक पहुंची तो मामला कुछ और नजर आया। मिस्त्री ने सचिव पर पैसे रोकने का आरोप लगाते हुए बताया कि सचिव 500 रुपये प्रति शौचालयों पर कमीशन काटता है। क्योंकि शौचालयों का पैसा हितग्राहियों के खातों में न आकर सीधे सरपंच-सचिवों के खातों में जाता है। मिस्त्री ने बताया कि 20 शौचालयों का निर्माण उसके द्वारा किया गया था। 12000 रुपये के हिसाब से 240000 रुपये बनता है मगर 110000 रुपये ही उसके हाँथ में आए है जबकि सभी शौचालयों का पूरा पैसा आहरित कर सचिव एक साल से घुमा रहा है। इस मामले पर जब सचिव गोपी राजपूत से हमारे संवाददाता ने फोन पर सम्पर्क किया तो सचिव द्वारा गोलमोल जवाब दिया जा रहा था और कमीशन वाले मामले पर कुछ भी कहने से मना कर दिया ।

आधे-अधूरे निर्माण कागजों में बताए जा रहे हैं पूरे 
गौरतलब है कि ग्राम पंचायत पुनपल्ली में डेढ़ सालों में 150 से अधिक शौचालयों का निर्माण जरूर कराया गया पर वे अनुपयोगी साबित हुए हैं क्योंकि निर्माण का आज भी अधूरे हैं। मगर वार्ड पंचों की मानें तो कागजों में वे सभी काम पूरे कर लिए गए और आहरण भी पैसों का हो चुका है। ‘छत्तीसगढ़’ की टीम जब पड़ताल पर गांव पहुंची तो पाया कि एक शौचालय जिसका निर्माण डेढ़ साल पहले हुआ, न तो सेफ्टिक टैंक बनी, न दरवाजा, ये शौचालय हितग्राही की काम तो नहीं आया मगर दीमक का आशियाना जरूर बन गया है।  हितग्राही पदाम मल्ले पति बंडी को आज भी शौचालय के पूरे होने का इंतजार है।

वहीं कवासी हूँगा सेफ्टिक टैंक का काम पूरा न होने की वजह से खुले में शौच कर रहे और शौचालय का उपयोग नहाने के लिए कर रहे। रास्ते पर संवाददाता अमन भदौरिया को एक धराशायी शौचालय की दीवारें भी दिखी जो डेढ़ साल पहले बनी थी और पूरा होने से पहले ही गिर गई ।

प्रधानमंत्री शौचालय योजना जब से आई है अब तक गांव में 5-6 लोगों को ही लाभ मिला। 160 परिवार हैं पर जितने शौचालय बने सब अधूरे बने, जिम्मेदार इसका दुरुपयोग और लेट-लतीफी कर रहे हैं। कमीशनखोरी की बात मुझे भी पता चला है। लोग योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। रात में अगर सांप या जहरीले कीड़े के से कुछ होता है तो जिम्मेदार कौन होगा। अधिकारियों को कार्यवाही कर शौचालयों को पूरा करवाना चाहिए। 

कामा बारसे, वार्ड पंच पुनपल्ली
ग्राम पंचायत मुख्यालय में कुल कितने शौचालय बने हैं इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है। मैं जानकारी निकालकर बताता हूँ। लगभग 255 शौचालय हमारे पंचायत में स्वीकृत है। सरपंच-मिस्त्री-गांव वाले मिलकर जैसे-जैसे बनाते हैं मैं पैसे देता गया। 140 से अधिक शौचालय पूरे कर लिए गए हैं कुछ शौचालय अधूरे भी हैं। जिसके पैसे भी हमारे पास है। कुछ काम पूरे नहीं किए जाने की वजह से पैसे नहीं दिया। शौचालयों पर 500 रुपये कमीशन का जो आरोप लगा है जो भी बोल रहा हो उस पर मैं कुछ भी नही कह सकता हूँ।

गोपी राजपूत, पंचायत सचिव, पुनपल्ली
 मेरे पास किसी तरह की लिखित शिकायत नही आई है । ‘छत्तीसगढ़’  के माध्यम से मुझे इसकी जानकारी मिल रही है। मामला संज्ञान में आया है तो मैं इसकी जांच करवाऊंगा उसके बाद आगे की कार्यवाही होगी । जिले में जितने भी गांवों में शौंचालय के काम अधूरे हैं कारणों का पता लगाकर काम शुरू करवाया जाएगा और लोगों को स्वच्छता के दृष्टिकोण से जागरूक भी किया जाएगा। इस हेतु शासन-प्रशासन प्रयासरत है निश्चित तौर पर आगे बेहतर काम किया जाएगा ।
नूतन कुमार कंवर, सीईओ जिला पंचायत ,सुकमा


Date : 21-Nov-2019

गांव ने जमीन छीनी तो दो साल जंगल में, झोपड़ी टूटी तो अब चार साल से गुफा में!

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 21 नवंबर। आज के डिजीटल युग में तमाम सुविधाओं के बीच में लोगों को रहने की आदत हो गयी है, थोड़ी देर के लिए भी असुविधा का सामना नहीं कर सकते, ऐसे में आज 21वीं सदी में कोई व्यक्ति अपने परिवार के साथ पहाड़ों की गुफा में निवास कर सकता है इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसा सोचकर ही हमें आदिमानव की याद आ जाती है जो जंगलों व गुफाओं में रहा करते थे ऐसा दृश्य आज भी दिख जाये तो इससे आश्चर्य और कुछ नहीं होगा।

वहीं इस संबंध में गणेशपुर के सामाजिक कार्यकर्ता नागेश्वर सिंह बताते हैं कि पहली बार 2015 में जब वो जंगल गए तो उन्होंने गुफा में निवास करते एक परिवार देखा, उन्होंने उसे गांव में चलने को कहा, पर वो नहीं माना, उसके बाद उन्होंने प्रयास करके उक्त परिवार का राशन कार्ड बनवाया, दो किमी अंदर जंगल में रहने के कारण उनका पुत्र पढऩे नहीं जा पाता है। आज भी उक्त परिवार गुफा में ही, अंधेरे में रह रहे हंै। मेरे लिए भी यह आश्चर्य की बात है।

आज हर परिवार के पास अपना घर है, गरीब परिवार भी किसी तरह गांव में अपने टूटे-फूटे घर में निवास कर रहा है ऐसे समय में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसके पास एक इंच भी भूमि नहीं है गांव वालों के द्वारा बहिष्कार कर दिये जाने के बाद वह जंगल की गुफा में रहने को मजबूर है वह भी ऐसे समय में जब सरकार गरीबों का पक्का मकान बनाकर देने की योजना चला रही है। ऐसा ही एक दुर्लभ मामला कोरिया जिले में देखने को मिला। इसकी जानकारी मिलने के साथ ही ‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता जंगल में पहाड़ के बीच पहुंचा तो देखा कि एक परिवार पहाड़ की चट्टानों से बनी गुफा में समाज से दूर एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है। मजबूरी व हालात ने इस परिवार को जंगल की गुफा में रहने को मजबूर कर दिया। आज कई वर्षों से परिवार चट्टान की गुफा में निवास कर रहा है लेकिन प्रशासन को इसकी खबर तक नहीं लग पाई। तमाम असुविधाओं को झेलते हुए आदि मानव की तरह यह परिवार कई वर्षों से गुमनामी की जिंदगी जंगली जानवरों के बीच गुजार रहा है। पूर्व में जिस गांव पंचायत का निवासी था वहां के जनप्रतिनिधियों ने भी कभी इस परिवार को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। जंगल की गुफा में निवास करने के कारण शासन की किसी योजना का लाभ इस परिवार को नहीं मिल रहा है। इस परिवार के पास अपने नाम की एक इंच की भी भूमि नहीं है जिसके चलते परिवार मेहनत मजदूरी के साथ जंगल के कंदमूल खाकर अपना जीवन गुजार रहा है।

परिवार की जिंदगी कट रही जंगल की गुफा में

कोरिया जिले के खडग़वां ब्लाक अंतर्गत ग्राम दुग्गी का एक परिवार के हालात ऐसे बने कि परिवार का मुखिया अपने परिवार के साथ आज पांच वर्षों से जंगल व पहाड़ की गुफा में रहने को मजबूर है, जहां जंगली जानवरों का चौबीस घंटे खतरा रहता है।

जानकारी के अनुसार खडग़वां जनपद अंतर्गत ग्राम दुग्गी निवासी देवनारायण पठारी अपनी पत्नी राजकुमारी तथा एक 5-6  वर्षीय पुत्र के साथ जंगल की गुफा में रहने को मजबूर हैं। जहां किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है। इस परिवार के मुखिया देवनारायण ने बताया कि मैं पहले ग्राम दुग्गी में रहता था लेकिन हालात ऐसे बने कि तीन साल तक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहा इसके बाद बीते 4 साल साल से गढ़पहाड़ के नीचे बनी चट्टान की गुफा में निवास कर रहा हूं।

उसने बताया कि उसकी मजबूरी इस तरह की हुई कि वह आज परिवार समाज व गांव से दूर गुफा में रहने को मजबूर है। लगता है कि अब पूरी जिंदगी यहीं कटेगी। जिस जगह पर यह परिवार रहता है उसे क्षेत्रीय ग्रामीण छातापखना कहते हंै। विशाला चट्टान पर एक गुफा प्राकृतिक रूप से बनी हुई है। जिसमें सिर झुकाकर ही अंदर प्रवेश किया जा सकता है। जिसके भीतर प्रवेश करने पर कुछ लोगों के रहने भर के लिए तंग स्थान है जिसमें  यह परिवार निवास करता है। रात के दौरान परिवार गुफा के मुख्य द्वार को ढंक लेते है। इसी तरह हर दिन की जिंदगी खतरों व अभावों के बीच गुजर रही है। उसने गुफा को अंदर से सफेद मिट्टी से रंग दिया है। ताकि अंदर साफ नजर आ सके।

गांव में थी थोड़ी जमीन वह भी लुट गई

जंगल की गुफा में रह रहे परिवार के मुखिया देवनारायण ने ‘छत्तीसगढ़ ’ को बताया कि वह पहले ग्राम दुग्गी में रहता था, जहां उसकी थोड़ी भूमि थी लेकिन वह विवादित भूमि को लेकर गांव वालों द्वारा एकतरफा फैसला करके उसकी भूमि को लूट लिया गया। इसके बाद गांववालों द्वारा उसका बहिष्कार कर दिया गया । जिसके बाद उसे गांव छोडऩा पड़ा। वह गांव से दूर जंगल में झोपड़ी बनाकर करीब दो साल तक रहा, वह गिर गई, फिर गढ़पहाड़ के पास छातापखना गुफा में चार साल से लगातार निवास कर रहा है। उसने बताया कि उसे सरकारी योजना में सिर्फ राशन कार्ड का लाभ रहा है।

पास के गांव गणेशपुर के नागेश्वर सिंह की पहल पर कुछ माह पूर्व उसका राशन कार्ड बनवा दिया गया है इसके अलावा किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला। जंगल के कंदमूल खोजकर खाते हैं और मजदूरी करते हैं। इसी तरह दिन कट रहा है। वहीं उसकी पत्नी राजकुमारी ने बताया कि उसका पति जहां उसे रखेगा वहीं तो रहना होगा। इस तरह परिवार तीन वर्षों से गुफा में निवास कर रहा है।

बच्चे की पढ़ाई की सता रही चिंता

गुफा में रहने वाले देवनाराण पठारी को इस बात की ज्यादा चिंता नहीं है कि वह गुफा में जिंदगी काट रहा है बल्कि उसे इस बात की ज्यादा चिंता है कि उसका बच्चा पढ़ाई नहीं कर पा रहा है। उसने बताया कि उसकी जिंदगी तो कट जायेगी लेकिन बच्चे का भविष्य क्या होगा। उसके पास तो घर भी नहीं है और ना ही कमाने के लिए खेती की जमीन है। बच्चे की पढ़ाई के लिए स्कूल भी दूर है ऐसे में मैं क्या करू मुझे समझ नहीं आ रहा। बच्चे व मेरे परिवार का भविष्य मेरे ना रहने पर क्या होगा।


Date : 20-Nov-2019

गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बढ़ा बाघों का कुनबा, हुए आधा दर्जन, केंद्र-राज्य सरकार की सीधे मॉनिटरिंग

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 20 नवंबर। कोरिया जिले में स्थित क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश का सबसे बड़े गुरू घासीदास नेशनल पार्क में एक बाघ की और बढ़ोतरी हो गई है। बाघों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकार के आला अफसर ना सिर्फ पार्क की स्वयं मॉनिटरिंग कर रहे हैं बल्कि इस पार्क को कैमरा ट्रैपिंग प्रोटोकाल में शामिल कर लिया गया है, जिसके तहत जहां बाघों का रहवास क्षेत्र है वहां कैमरा ट्रैपिंग करने के लिए नक्शा तैयार कर कैमरे लगाने का कार्य सरकार करेगी।

इस संबंध में गुरू घासीदास पार्क के डायेक्टर इमोत्स्यु आओ का कहना है कि बड़ी खुशी की बात है कि हमारे यहां बाघों की संख्या में इजाफा हो रहा है, अब केन्द्र और राज्य सरकार हमारे पार्क की मॉनिटरिंग के साथ कई तरह के संसाधन उपलब्ध करा रही है, आने वाले समय में इनके संरक्षण को लेकर और कई नई सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

जानकारी के अनुसार गुरू घासीदास नेशनल पार्क में बाघों की संख्या अब आधा दर्जन का आंकडा छू गई है। यह खुशी की बात है कि यहां लगातार बाघों की बढ़ोतरी हो रही है। सिर्फ पार्क के सोनहत परिक्षेत्र में 4 टाइगर हैं।

पार्क रेंजर एमएस मार्सकोले की माने तो फरवरी 2019 से यहां बाघों का आना शुरू हुआ है, जो आगे बढ़ता ही गया है। नया छठवां मेहमान अब हमारे यहां का ही माना जा रहा है, बाघ के दोनों ओर की धारियां किसी और स्थान के बाघ से मैच नहीं हो पाई है।

उल्लेखनीय है कि परिक्षेत्राधिकारी श्री मार्सकोले और उनकी टीम 9 माह से लगातार बाघों पर नजर बनाए हुए है। उन्होनें पार्क में वाहनों की गति पर ब्रेेक लगाई, असमाजिक तत्वों और शिकारियों पर पैनी नजर बनाने के लिए विशेष रणनीति बनाई, इसके अलावा पार्क में ग्रामीणों को बाघों के संरक्षण को लेकर समझाईश देने में कामयाबी पाई।

आमने-सामने है इलाका

सोनहत में वन्य जीवों की भारमार होने, पर्याप्त पानी और घनघोर जंगल में कई ऐसे स्थान हैं, जहां आम आदमी नहीं पहुंच सकता, यही कारण है बाघों ने अपना आशियाना बनाया है। बीते माह आए नए मेहमान ने अपना इलाका बना लिया है। सोनहत से रामगढ़ जाने वाले मुख्य मार्ग के एक ओर एक बाघ का इलाका है, जबकि सडक़ के दूसरी ओर दूसरे बाघ का इलाका है।  कई बार दोनों बाघों के साथ-साथ फुटमार्क भी मिले हैं। दूसरी ओर मादा बाघिन के साथ उसके एक शावक के फुटमार्क भी कई स्थानों पर पाए गए हंै। शावक बाघिन के पीछे ही रहता है, पार्क के अफसर यह पता नहीं लगा पाए हैं कि जन्मा शावक नर है या मादा।

कब-कब बढ़े नेशनल पार्क में टाईगर

फरवरी  2019 में पहली बार 1 नर बाघ को देखा गया 

अप्रेल   2019 में एक मादा बाघिन का पता चला

जून    2019 में बाघिन ने एक बच्चे को जन्म दिया

जुलाई  2019 में नर बाघ जनकपुर परिक्षेत्र में देखा गया, जिसमें कॉलर लगा हुआ है

जुलाई  2019 में एक बाघ पार्क के कमर्जी परिक्षेत्र में पाया गया

अक्टूबर 2019 में एक नर बाघ पार्क के सोनहत परिक्षेत्र. में पाया गया

विशेषज्ञों ने सिखाई टै्रपिंग की नई तकनीक

पार्क परिक्षेत्र में में 19 नवंबर को वाईल्ड लाईफ के विशेषज्ञों ने पार्क के वन अमला व अधिकारियों को वन्य जीवों के कैमरा टै्रपिंग प्रोटोकाल के संबंध में प्रशिक्षण प्रदान कर इसकी बारिकीयों से अवगत कराया। इस प्रशिक्षण कार्यशाला में सीनियर वाईल्ड लाईफ रिसर्चर आशीष वालेकर, तथा सहायक संचालक तमोल पिंगला एलिफें रिजर्व के जयजीत केरकेट्टा द्वारा पार्क क्षेत्र में शेरों व टाईगरों को कैमरों से टै्रपिंग कैसे की जाये उसकी जानकारी साझा की। अभी तक दक्ष तकनीकी तौर पर जिले के वन क्षेत्रों से वन्य जीवों की टै्रपिंग की जाती थी जो पर्याप्त नहीं था। अब स्पष्ट तौर पर नक्शा तैयार कर वन्य जीवों की आधुनिक तरीके से नई तकनीक का उपयोग करते हुए टै्रपिंग की जाएगी जिससे उनकी सही स्थिति का पता चल सके।

प्रशिक्षण में बताया गया कि अब पार्क की निगरानी राज्य स्तर से किये जाने के साथ-साथ केंद्र सरकार की वाईल्ड लाईफ के अधिकारियों द्वारा सीधी निगरानी भी होगी। इधर, राज्य वाईल्ड लाईफ द्वारा पार्क का नये सिरे से नक्शा तैयार किया जा रहा है और बारिकी से इस दिशा में मॉनिटरिंग होगी।

 गौरतलब है कि जिले में स्थित गुरू घासीदास नेशनल पार्क में वर्ष के शुरूआती दौर में अधिकारियों को पार्क क्षेत्र से गुजरे मुख्य मार्ग पर शाम ढलने के बाद शेर दिखाई दिया था। इसके बाद से पार्क अधिकारियों द्वारा क्षेत्र में कई तरह की पाबंदिया लगा कर शेर की निगरानी के लिए कैमरे लगाये गये थे ताकि शेर की हर गतिविधि के साथ लोकेशन को दर्ज किया जा सके।

पार्क में होंगे और कड़े नियम

अब पार्क नेशनल की सीमा में पिकनिक मनाने को पूर्ण रूप से प्रतिबंध कर दिया गया है। पार्क क्षेत्र में वाहनों की गति सीमा तय कर दी गई है, लोगों की आवाजाही पर निगरानी रखी जा रही है। अब दिन के समय आसानी से बाघ किसी को भी नजर आने लगे हैं। टाईगर के कुनबे में एक सदस्य की बढ़ोतरी के बाद से फिर पार्क अधिकारियों की हलचल बढ़ी है। बताया जाता है कि गुरू घासीदास नेशनल पार्क को केंद्र सरकार के नये प्रोजेक्ट में शामिल करने की कवायद तेज हो गई है। पूर्व में ही गुरू घासीदास नेशनल पार्क को टाईगर रिजर्व बनाने की दिशा में भी प्रस्ताव भेजा जा चुका है।

बाइक छोड़ भाग खड़ा हुआ ग्रामीण

जानकारी के अनुसार एक सप्ताह पूर्व दिन के समय रामगढ़ से सोनहत आ रहे एक बाइक सवार के सामने कुछ दूरी पर बाघ नजर आया था। बाघ चुपचाप सडक़ पार कर अपने रास्ते जंगल की ओर चला गया था। परन्तु बाईक चालक डर के मारे बाइक को सडक किनारे गड्ढे में गिरा भाग खड़ा हुआ और कुछ दूरी पर जाकर ग्रामीणों के पास पहुंचा और फिर ग्रामीणों की मदद से उसकी बाइक गड्ढे से निकाली गई थी।


Date : 20-Oct-2019

कर्ज में डूबे हाऊसिंग बोर्ड-आरडीए को एक करने तैयारी, भष्टाचार के प्रकरणों की जाँच भी 

शशांक तिवारी
रायपुर, 20 अक्टूबर (छत्तीसगढ़)।
सरसरकार भारी भरकम कर्ज में डूबी हाऊसिंग बोर्ड और आरडीए का विलय कर सकती है। दोनों ही संस्थाओं पर सैकड़ों करोड़ का कर्ज है। दोनों को एक कर कर्ज के मकडज़ाल से मुक्त कर बेहतर संस्था बनाने की योजना पर काम चल रहा है। 

आवास एवं पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में सिर्फ इतना ही कहा कि हाऊसिंग बोर्ड और आरडीए को एक करने पर विचार चल रहा है। बताया गया कि कुछ साल पहले तक हाऊसिंग बोर्ड और आरडीए को बेहतर संस्था माना जा रहा था, जिसमें हाऊसिंग बोर्ड का काम शुरूआती दौर में बेहतर रहा, लेकिन पिछले पांच सालों में यह संस्था भी भारी भरकम कर्ज के बोझ तले दब गई। इसके लिए पिछली सरकार के नीति निर्धारकों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

आरडीए तो तकरीबन दिवालिएपन की कगार पर है। अकेले कमल विहार बसाने के लिए तकरीबन एक हजार करोड़ कर्ज लिए गए थे। यह योजना फेल हो गई और आरडीए पर करीब 5 सौ करोड़ का कर्जा बकाया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आवास पर्यावरण विभाग की समीक्षा बैठक ली थी, जिसमें दोनों ही संस्था आरडीए और हाऊसिंग बोर्ड के क्रियाकलापों पर चर्चा हुई थी। दोनों ही संस्थाओं के  भारी भ्रष्टाचार और कर्ज में डूबे होने पर मुख्यमंत्री ने चिंता जताई थी। और साथ ही साथ उन्होंने भ्रष्टाचार के प्रकरणों की जांच के लिए निर्देशित किया था। इस दौरान विभागीय मंत्री मोहम्मद अकबर भी थे। चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने दोनों संस्थाओं को एक करने पर भी विचार करने के लिए कहा था। सूत्रों के मुताबिक विभाग में दोनों को एक कर नया रूप देने पर मंथन चल रहा है। 

विभाग से जुड़े अफसरों का मानना है कि दोनों संस्थाओं को एक करने से स्थापना व्यय में कमी आएगी। चूंकि दोनों की काम की प्रकृति एक ही है। इसलिए इसमें दिक्कत नहीं आएगी। जहां तक दोनों संस्थाओं को कर्ज से मुक्त करने की बात है, तो इस दिशा में प्रयास चल रहा है। हाऊसिंग बोर्ड के ऐसे मकान व दुकानें, जो नहीं बिक रही हैं, उसकी कीमत कम करने की तैयारी चल रही है। इस सिलसिले में जल्द ही कैबिनेट की बैठक में फैसला हो सकता है। 12 सौ करोड़ के 7 हजार से अधिक मकान व दुकानें नहीं बिक पाई हैं। इनमें से 27 सौ मकान व दुकानें ऐसी हैं, जिन्हें बने एक साल से  ज्यादा हो गया है, फिर भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। कीमत कम करने से लोग बड़ी संख्या में मकान लेने के लिए आगे आने की उम्मीद है और इससे बोर्ड को कर्ज से उबरने में भी मदद मिलेगी। कुछ इसी तरह आरडीए को भी कर्ज से उबारने के लिए रणनीति तैयार की जा रही है। 

 कमल विहार और अन्य संपत्तियों को बेचकर कर्जे से बाहर निकलने की कोशिश हो रही है। रायपुर विकास प्राधिकरण की माली हालात खराब है। कमल विहार के कारण खराब हुई माली हालत के कारण रायपुर विकास प्राधिकरण कोई नई योजना पर काम ही नहीं कर रहा है। बहरहाल, कर्ज मुक्ति के उपायों के बाद दोनों संस्थाओं को एक कर नया स्वरूप दिया जा सकता है। 

आरडीए-हाऊसिंग बोर्ड में  अनियमितता की पड़ताल...
सरकार आरडीए और हाऊसिंग बोर्ड व नया रायपुर में अनियमितता पर सख्ती दिखाई है। फिलहाल डिटेल ऑडिट कराकर आय-व्यय की विस्तृत जानकारी ली जा रही है। ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद अनियमितता के प्रकरणों पर कार्रवाई की जाएगी।


Date : 01-Oct-2019

स्वच्छ भारत अभियान, एक ही नाम पर दो शौचालय, राशि जारी लेकिन शौचालय नहीं, कोरिया जिला ओडीएफ घोषित

2 अक्टूबर स्वच्छ भारत अभियान के 5 वर्ष पूरे होने पर विशेष रिपोर्ट

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 1 अक्टूबर। स्वच्छ भारत अभियान में टेक्निकल टाइपिंग मिस्टेक कर पंचायतों में एक ही नाम के हितग्राहियों को दो-दो बार राशि जारी कर दी गई। किसी नाम में एक अक्षर हटा दिया गया तो किसी में स्पेस देकर दुबारा उस नाम से राशि जारी कर दी गई। एक ही हितग्राही का मनरेगा से भी और एसबीएम से भी शौचालय स्वीकृत हो गया। मजे की बात तो यह कि इस कार्य की मॉनिटरिंग में लगी स्वच्छ भारत अभियान की टीम ने अभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया और एक ही शौचालय के लिए दो-दो तो कभी तीन बार राशि जारी कर दी गई। ‘छत्तीसगढ़’ ने जब स्वच्छ भारत अभियान की सरकारी वेबसाईड खंगाली तो इसका खुलासा हुआ।

इस संबंध में कलेक्टर डोमन सिंह का कहना है कि मामले की जांच करवाई जाएगी, खामियां पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई होगी।

जानकारी के अनुसार बीते वर्ष 2013-14 से 2017-18  तक 90,779 शौचालयों का निर्माण का सर्वे हुआ, जिसमें वर्ष 2013-14 में 26 12 बनाए जा चुके थे, जिसमें बाद 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत हुई और 2017-18  तक 8 8 ,16 7 शौचालयों का निर्माण पूर्ण होना बताया गया। जिसके बाद पूरा जिला ओडीएफ घोषित कर दिया गया। ये आंकडें केन्द्र सरकार की वेबसाईड मिनिस्ट्री ऑफ वॉटर एंड सेनिटेशन पर उपलब्ध है। सरकारी साईट पर छत्तीसगढ़ ने जिले के सभी तहसील के एक दो ग्राम पंचायतों को खंगाला, बैकुंठपुर के कंचनपुर और झरनापारा, भरतपुर के भगवानपुर, बहराशी, खडगवां के मेरो, इंदरपुर, बचरापोडी, सोनहत के ग्राम पंचायत सोनहत, मझारटोला की एंट्री किए गए डेटा को देखा, हर ग्राम पंचायत में 15 से 20 नाम ऐसे पाए गए जिन्हें मनरेगा और एसबीएम दोनों से शौचालय के 12 हजार रू जारी किए गए हैं, इसके अलावा कुछ पंचायतों में सिर्फ हितग्राही का नाम है पिता के नाम पर तीन अक्षर एंट्री कर दिए गए हैं, ऐसे सैकडों नामों को एंट्री किया गया है। चंूकि कम्प्यूटर एक नाम सिर्फ एक बार ही ले सकता है, इसलिए इन नामों में हल्का सा अंतर कर दो बार सॉफ्टवेयर में इंद्राज कर दिया गया। जैसे झरनापारा में rajesh पिता duhan singh फैमिली आई डी 78 942345 को को एसबीएम से राशि दी गई, और फिर इस नाम में RAJESH KUMAR  पिता DUHAN SINGH फैमिली आई डी 78 774547 करके दोबारा मनरेगा से भी स्वीकृति दे दी गई। इसी तरह कंचनपुर में dubraj bsaant  को एसबीएम से दो बार राशि जारी की गई, दूसरी बार दुबराज के नाम में एक स्पेश दे दिया गया। इसी तरह मेरो में shiv nath Pawan sai को दुबारा देने के लिए shiv nath Pawan sai कर कई लोगों के नाम से राशि दुबारा जारी कर दी गई है।

पंचायतों में 2 दर्जन से ज्यादा हितग्राही एक ही नाम के

स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण की बेबसाईट में कोरिया जिले की जो जानकारी इंद्राज की गई है उसका अवलोकन करने से स्पष्ट हो रहा है कि एक ग्राम पंचायत में 2 दर्जन से ज्यादा हितग्राही एक नाम के ही हैं साथ ही उनके पिता का नाम भी एक ही है। दूसरी ओर ग्राम पंचायतों के पदाधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं है। जानबूझ कर तकनीकी कमी करके बेबसाईट में फर्जी नामों को भी इंद्राज कर दिया गया है। दरअसल, स्वच्छ भारत अभियान संविदाकर्मियों के भरोसे है, मॉनिटरिंग के आभाव में एक ही नाम से दो-दो बार राशि जारी कर दी गई, जिन्हें इस कार्य के लिए रखा गया है उसमें भारी लापरवाही बरती गई है। यदि इसका भौतिक सत्यापन किया जाए तो इसमें करोड़ों की गड़बड़ी उजागर हो सकती है।

नाम है पर नहीं बने शौचालय

दूसरी ओर हर पंचायत में कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि उनके नाम से पैसा तो आया परन्तु शौचालय आज तक नहीं बना और राशि निकाल ली गई। खडगवां बचरापोडी ग्राम पंचायत के राकेश मोतीराम, राधेश्याम स्व सज्जनसाय, अशोक कुमार मोहरसाय, रविकुमार सुन्दरसाय, आन्नदराम रामलाल, गुलाबचंद शिवपूजन, नारेन्द्र कुमार श्रीकांत, सुन्दरसाय बीरन, कन्हैयालाल सुन्दरसाय, राजेशकुमार काशीराम, राजू काशीराम, लक्ष्मण रामंिसह, रामकुमार राम सिंह का कहना है कि उनके नाम से शौचालय स्वीकृत हुए हैं परन्तु आज तक बनाए नहीं गए हैं।

कब कितने बने शौचालय

तहसील       2014-2015        2015-16    2016 -17   2017-18

बैकुंठपुर     6 93  5198               13247           8 96 1

भरतपुर 28 5  7335        9218             925

खडगवां 394   4716        58 25             8 432

मनेन्द्रगढ़     46 2  38 35       106 31           1050

सोनहत 243   38 58        1916             552


Date : 28-Sep-2019

भोपाल के हनीट्रैप का शहद छत्तीसगढ़ के मंत्री, अफसरों तक लाता था वनमंत्री का खासमखास...

विशेष संवाददाता
रायपुर, 28 सितंबर (छत्तीसगढ़़)।
मध्यप्रदेश की सरकारी सत्ता में गहरे तक पैठ बना चुके हनीट्रैप के छत्तीसगढ़ कनेक्शन बढ़ते चले जा रहे हैं। अभी मिली जानकारी के मुताबिक इस राज्य में एक पिछले वन मंत्री के लेन-देन का बहुत सा काम देखने वाले, और उस विभाग से एनजीओ को फंड दिलवाने वाले एक नाम का पता चला है जिसे भोपाल के हनीट्रैप गिरोह की एक युवती ने पूछताछ में बताया है। 

भोपाल के उच्चस्तरीय सूत्रों के मुताबिक पूछताछ में एक युवती ने छत्तीसगढ़ के एक पिछले वनमंत्री के साथ काम करने वाले एक तरूण का नाम बताया है जिसने उसे मंत्री और कुछ अफसरों से मिलवाया था। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के इस हनीट्रैप में लोगों को सेक्स में फंसाकर ब्लैकमेल करने, या उनसे सरकारी रकम मंजूर करवाने के काम में लगी महिलाओं के छत्तीसगढ़ में भी कई मंत्रियों और अफसरों के साथ संबंध सामने आए हैं। 

ऐसे में जब मध्यप्रदेश के जांच अफसर अधिकृत तौर पर कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं, तब हाथ के लिखे हुए दो पन्ने अभी सामने आए हैं जो हनीट्रैप की एक महिला के नाम वाले हैं, और जिनमें छत्तीसगढ़ के बहुत से नामों के साथ लेन-देन का जिक्र है। ये पन्ने सोशल मीडिया से तैरते हुए पहुंचे हैं, और इनमें कुछ वक्त पहले तक छत्तीसगढ़ में सबसे ताकतवर रहे अफसरों और मंत्रियों के नाम हैं, इससे कितना भुगतान मिला, या कितना बाकी है, या किस तरह मिला इसे केवल संख्याओं में लिखा गया है, उनके साथ पूरी रकम नहीं लिखी गई है। लेकिन यह बात साफ है कि छत्तीसगढ़ सरकार के कुछ विभागों से इन युवतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ के ही कुछ दलालों ने जाल बिछाकर करोड़ों रूपए के काम मंजूर करवाए थे, और उनमें से कई काम पूरे न करने पर भी उनके बिल लगाकर भुगतान की कोशिश की गई थी। 

इनमें बस्तर इलाके के लिए वन विभाग के तहत कई करोड़ के काम मंजूर करवाए गए थे, और ढाई करोड़ से अधिक के काम में से सरकार बदल जाने से 50 लाख से कम का ही भुगतान हो पाया था। विभाग के अफसर बताते हैं कि एक पिछले वनमंत्री के दबाव में उन्हें इन संगठनों को काम देना पड़ा, और बाद में सरकार बदली, जांच हुई, तो पता लगा कि काम हुआ ही नहीं है, केवल बिल लगा दिया गया था। 

यह भी पता लगा है कि मध्यप्रदेश पुलिस होटलों और क्लबों के कमरों के रजिस्टर या रिसेप्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग से भी इन युवतियों से मिलने वाले नेताओं, अफसरों, और पत्रकारों-कारोबारियों की शिनाख्त कर रही है। इनमें से एक युवती ने पुलिस का गवाह बनना मंजूर किया है, और उससे पुलिस को सुबूत भी मिलते चल रहे हैं, और जानकारी के आधार पर पुलिस जांच आगे भी बढ़ रही है। 

छत्तीसगढ़ में सरकार के पास यह जानकारी पहुंची है कि यहां के सरकारी दफ्तरों में स्थानीय दलाल इन युवतियों को लेकर पहुंचते थे, और मंत्रियों के बंगलों से लेकर कुछ विभागों के रेस्ट हाऊस तक में उनसे मुलाकात करवाई जाती थी। पिछले एक वनमंत्री के जिस दलाल का नाम सामने आया है, उसने वन विभाग से कई और तरह के काम भी करवाए थे, और विभाग में यह आम चर्चा थी कि यह दलाल वनमंत्री का पूंजीनिवेश भी करता है। 

इस बीच छत्तीसगढ़ में स्थानीय स्तर पर पूरी तरह से छत्तीसगढ़ी हनीट्रैप के मामले भी सामने आ रहे हैं जो कि सरकार से भी जुड़े हुए हैं, और सरकार से बाहर के लोगों से भी। अभी कुछ महीने पहले रायपुर में एक पेशेवर स्टिंग ऑपरेटर के घर छापा मारकर बहुत से उपकरणों में जो सेक्स रिकॉर्डिंग जब्त की गई थी, उससे भी बहुत से मामले मिलने की चर्चा है, हालांकि अभी तक पुलिस ने ऐसी कोई जानकारी जारी नहीं की है। भोपाल का यह भांडाफोड़ होने के पहले से छत्तीसगढ़ में ऐसा सिलसिला चल रहा था, लेकिन अब भोपाल से छत्तीसगढ़ मंत्रालय और दूसरे दफ्तरों का सीधा रिश्ता भी जुड़ गया है, और इसकी जांच इस राज्य की पुलिस के बजाय मध्यप्रदेश पुलिस के हाथ है। 


Date : 27-Sep-2019

दंतेवाड़ा की जीत किसकी, हाट-बाजार योजना, और सुपोषण की?

छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 27 सितंबर।
 दंतेवाड़ा उपचुनाव में मतदाताओं ने भूपेश बघेल सरकार के कामकाज पर मुहर लगाई है। चुनाव से दो महीने पहले शुरू हुई सुपोषण अभियान और हाट बाजार योजना, धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में भी अपना प्रभाव छोडऩे में सफल रही है। इसका चुनाव में कांग्रेस को काफी फायदा मिला। इससे परे भाजपा को अपने पक्ष में सहानुभूति लहर चलने का भरोसा था। कार्यकर्ता भी एकजुट थे, लेकिन पार्टी के रणनीतिकार अपने पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब नहीं हो पाए। चुनाव प्रचार के बीच अंतागढ़ को लेकर मंतूराम पवार के खुलासे ने भी भाजपा की नैय्या डुबोने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी की नक्सल हत्या के बाद लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां से करीब साढ़े पांच हजार वोटों की बढ़त मिली थी। पार्टी ने उनकी पत्नी ओजस्वी मंडावी को चुनाव मैदान में उतारकर एक तरह से सहानुभूति लहर पैदा करने की कोशिश की। ओजस्वी शिक्षित महिला हैं और शहरी इलाकों में उनके पक्ष में सहानुभूति भी देखने को मिली। भाजपा ने दंतेवाड़ा, बचेली, किरंदुल और गीदम के नगरीय इलाकों में विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया था। यहां भाजपा ने स्थानीय नेताओं के बजाए चुनाव प्रचार की कमान शिवरतन शर्मा को सौंपी थी। साथ ही साथ पूर्व मंत्री महेश गागड़ा को भी लगाया गया था। पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ दंतेवाड़ा के पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी भी चुनाव खत्म होने तक वहां डटे रहे। चौधरी ने अपने कलेक्टर रहते वहां कराए गए कार्यों का उल्लेख कर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट मांगे, लेकिन वे बेदम साबित हुए। पूर्व सीएम अजीत जोगी भी अपने प्रत्याशी के समर्थन में धुंआधार प्रचार किया। 

जोगी पार्टी के उम्मीदवार का हाल यह रहा कि प्रत्याशी सुजीत कर्मा अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। उन्हें नोटा से भी कम वोट मिले। दूसरी तरफ, सीएम भूपेश बघेल ने चुनाव प्रचार अभियान शुरू होने से पहले ही सरकार के 8 महीने के कामकाज पर ही वोट देने की अपील की थी। यद्यपि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यहां से पिछड़ी थी। लेकिन इस बार उन्होंने जमकर प्रचार किया। कांग्रेस का चुनाव संचालन उद्योग मंत्री कवासी लखमा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने संभाल रखी थी। 

कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा के पति महेन्द्र कर्मा की भी हत्या नक्सलियों ने की थी, लेकिन वे पिछला चुनाव मामूली वोटों से हार गई थीं। उनके पुत्र छविन्द्र कर्मा की नकारात्मक बयानबाजी से भी उन्हें नुकसान का अंदेशा जताया जा रहा था। इन सबके बावजूद कांग्रेस को यहां सरकार की मुख्यमंत्री हाट बाजार योजना और सुपोषण अभियान के साथ-साथ वनोपज की खरीदी के लिए की गई व्यवस्था के चलते काफी समर्थन मिला। हाट बाजार योजना के तहत हाट बाजार में डाक्टरों की टीम बीमार लोगों का मुफ्त इलाज करती है। साथ ही उन्हें निशुल्क दवाईयां भी उपलब्ध कराई जाती है। इस योजना का असर यह हुआ कि हर हाट बाजार में इलाज के लिए बीमार आदिवासी सरकारी एम्बूलेंस तक पहुंचने लगे है। यह एक  योजना है कि जिसका नक्सली भी विरोध नहीं कर पाए। एक जानकारी के मुताबिक अंदरूनी इलाकों में भी करीब 20 हजार से अधिक आदिवासी खुद चलकर  उपचार कराने पहुंचे थे। 
इसी तरह सरकार की सुपोषण अभियान का भी काफी असर देखने को मिला।  आदिवासी इलाकों में मध्यान्ह भोजन के साथ-साथ अंडे का भी वितरण किया गया। जबकि पिछली सरकार अंडा बांटने से कतराती रही है। इसी तरह 15 से अधिक वनोपज का समर्थन मूल्य पर खरीदी का भी आदिवासियों के बीच अच्छा संदेश गया और वे एक तरह से बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर वनोपज को बेचने की मजबूरी नहीं रह गई थी। यही नहीं, लोहंडीगुड़ा में आदिवासियों की जमीन वापस देने से भी विशेषकर बस्तर संभाग में सकारात्मक असर हुआ है। कांग्रेस-भाजपा से परे किरंदुल और अंदरूनी इलाकों में सीपीआई का भी अच्छा प्रभाव है, लेकिन कांग्रेस ने सीपीआई के वोटों पर भी सेंधमारी की है। सीपीआई को हमेशा यहां 10-15 हजार वोट आसानी से मिलते रहे हैं, लेकिन इस बार सीपीआई प्रत्याशी भीमसेन मंडावी जमानत नहीं बचा पाए। कुल मिलाकर सीपीआई के वोटों पर भी कांग्रेस ने सेंधमारी की है। 
चुनाव प्रचार के बीच अंतागढ़ उपचुनाव के मंतूराम पवार के खुलासे से भी भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई। उन्होंने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, अजीत जोगी और अन्य भाजपा नेताओं का नाम वापसी के लिए लेन-देन के आरोप लगा दिए। मंतूराम पवार भाजपा में थे और उनके वार से भाजपा के बड़े प्रचारक पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह पूरे समय सफाई देते ही नजर आए। इससे कांग्रेस को हमलावर होने का मौका मिला और उन्होंने चुनाव में खूब भुनाया। आखिरी के दिनों में सीएम भूपेश बघेल ने शहरी इलाकों में डटकर प्रचार किया और उनके धुंआधार प्रचार से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन गया। कुल मिलाकर कांग्रेस की देवती कर्मा पिछले चुनावों में दंतेवाड़ा से सबसे ज्यादा जीतने वाली प्रत्याशी रही हैं। कांग्रेस भारी जीत से गदगद है और चित्रकोट पर कब्जा बरकरार रखने की तैयारी में जुट गई है। 


Date : 27-Sep-2019

कोरिया में ऐतिहासिक-प्राकृतिक दर्शनीय स्थलों की भरमार, विश्व पर्यटन दिवस आज

चन्द्रकांत पारगीर
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बैकुंठपुर, 27  सितंबर।
कोरिया जिला प्रकृति की गोद में बसा छग प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक छोटा व आदिवासी बाहुल्य जिला है। यहां वनों की सघनाता ज्यादा है इसके साथ ही यहां ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भरमार होने के साथ ही कई प्राकृतिक दर्शनीय स्थल है। जिसके चलते कोरिया जिले में पर्यटन की अपार संभावना है लेकिन इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किये गये। यदि उचित प्रयास किया जाता है तो कोरिया जिले को प्रदेश के पर्यटन नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। 

जिला गठन होने के पश्चात दो दशक से ज्यादा हो गया। वहीं छग राज्य स्थापना हुए दो दशक होने को है लेकिन कोरिया जिले के प्राकृतिक व दर्शनीय स्थलों की पहचान आज जिले में ही सिमटी है तथा कई ऐतिहासिक महत्व के धरोहर उपेक्षित पड़े हुए हैं। जिनमें खडगवां में कोटेश्वर महादेव, जनकपुर में बिखरे पड़े सतीगेट, सोनहत के बदरा स्थित रॉक पेंटिंग, पटना स्थित देवगढ़धाम, रामगढ स्थित गांगीरानी मंदिर, सोनहत का जोगीमठ सहित कई स्थान शामिल हंै। 

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में से एक अमृत धारा जल प्रपात है। इसके अलावा भी कई अन्य प्रमुख दर्शनीय व प्राकृतिक स्थल है जिसे पहचान दिलाने की जरूरत है, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अमृतधारा जल प्रपात के अलावा जिले के अन्य दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण स्थल अपनी पहचान जिले में ही नहीं बना सके। पर्यटन विकास के नाम पर सिर्फ अमृतधारा जल प्रपात स्थल का ही विकास कराया गया। जिसकी पहचान आज जिले के अलावा बाहर भी है। यहां पर हसदो नदी का पानी करीब 100 फीट से ज्यादा उचाई से गिरता है जो मनमोहक नजारा प्रस्तुत करता है। यहां पर सबसे ज्यादा सैलानी पिकनिक मनाने के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा गौर घाट जल प्रपात भी जिले के प्रमुख जल प्रपातों में से एक है जहां का नजारा भी सुन्दर है लेकिन यहां पर प्रशासन द्वारा किसी तरह की सुरक्षात्मक व्यवस्था नहीं बनाई है जिसके चलते यहां पर कई घटनाएं हो चुकी हैं तथा पहुंच मार्ग भी सही नहीं है। फिर भी यहां सैलानियों की भीड़ प्रतिवर्ष जुटती है। यदि इस जल प्रपात स्थल तक पहुंच मार्ग के साथ अन्य आवश्यक सुविधाएं तथा सुरक्षात्मक उपाय किए जाएं तो यह भी एक रमणीय स्थल है। जहां पर पहुंच कर प्रकृति के सुन्दर नजारे के साथ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। 

कई जलप्रपातों को पहचान की जरूरत
कोरिया जिले में अमृतधारा जल प्रपात गौर घाट जल प्रपात के अलावा भी कई सुन्दर जल प्रपात स्थित है जिनके बारे में पूरे जिले के लोगों को ही जानकारी नहीं है केवल क्षेत्रीय स्तर तक ही इनकी पहचान बनी हुई है। ऐसे जल प्रपात को पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है। 

जानकारी के अनुसार भरतपुर जनपद क्षेत्र में एक प्रमुख जल प्रपात रमदहा जल प्रपात है जो अपनी सुन्दरता के लिए क्षेत्र में प्रसिद्ध है लेकिन यहां पर आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है साथ ही प्रचार प्रसार के अभाव मेें इस जल प्रपात के बारे में जिले के कई क्षेत्रों के लोगों केा जानकारी ही नहीं है। रमदहा जल प्रपात जिले का एक सुन्दर जल प्रपात है जिसका नजारा काफी मनमोहक है। इसके अलावा सोनहत जनपद पंचायत क्षेत्र में बनिया वाटर फॉल प्रकृति के गोद में बसा हुआ है। घने वनों के बीच में कल कल बहती नदियां उंचाई से गिरते हुए सुन्दर जल प्रपात का नजारा बनाता है। यह भी गुमनामी के दौर से गुजर रहा है। इसके इलावा भी भरतपुर व सोनहत जनपद क्षेत्र में कई गुमनाम जलप्रपात है जिन्हे पहचान दिलाने की जरूरत है।

मुख्यालय के निकट सीता गुफा गुमनाम
कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के निकट रामायण काल के समय का एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे सीता गुफा के नाम से जाना जाता है स्थानीय लेाग इस स्थल को समुंदई के नाम से जाते है। जानकारी के अनुसार समुंदई जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से कुछ ही किमी की दूरी पर सोनहत मार्ग पर स्थित शिवघाट की ऊंची पहाड़ी में घने जंगलों के बीच में स्थित है। जिला मुख्यालय के निकट होने के बाद भी ऐतिहासिक महत्व का यह स्थल अपेक्षा के कारण विकसित नहीं हो सका है जिसके चलते यहां क्षेत्र के लोगों के अलावा जिले के दूर दराज के पर्यटक नहीं पहुंचते। यहां तक पहुंचने के लिए सडक़ भी नहीं बन पाया है। 

जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर से सोनहत मार्ग पर शिवघाट के उपरी गांव पहाड़पारा से समुंदई क्षेत्र पहुंचा जा सकता है। लेकिन सोनहत जनपद के ग्राम पहाडपारा के बाद सुव्यवस्थित मार्ग नहीं होने के कारण जंगलों के बीच पैदल ही जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक विशाल चट्टान को काटकर गुफा बना गया है जहां भगवान शिव की आराधना की जाती है। विभिन्न खास अवसरों पर गुफा के अंदर जवारा बोने के साथ साथ भजन कीर्तन भी होता है। 

मान्यता है कि भगवान राम सीता अपने वनवास के दौरान समुंदई क्षेत्र में कुछ दिनों तक इसी गुफा में रूके थे। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफा में एक साथ करीब 15-20 लोगों के बैठने की जगह है। घने वनों के बीच गुफा के निकट की वर्तमान में सुन्दर जल प्रपात भी दिखाई देता है जो करीब  150 फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता है। इसके नीचे एक और जल प्रपात है। क्षेत्र के कई लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं तथा विभिन्न त्यौहार के दौरान पूजा अर्चना करने आस पास के दर्जनों गांव के ग्रामीण पैदल पहुंचते हैं। 

हरचौका स्थित पुरातात्विक महत्व का स्थल 
 कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत हरचौका में मवई नदी जो कि छग व मप्र की सीमा को विभाजित करती है। नदी के तट पर ही चट्टानों को तरासकर गुफा बनाई गयी है जिसमें प्रत्येक दिशा में शिवलिंग है। बताया जाता है कि भगवान राम वन गमन के दौरान यहॉ पर कुछ दिनों के लिए रूके थे और शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करते थे। इसके अलावा मान्यता यह भी है महाभारत काल में पांडव भाई भी अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आये थे। एक पुजारी द्वारा गुफा के पास ही मवई नदी के तट पर स्थित चट्टान से रेत को साफ कर विशालकाय पैर का पंजा शिला में दिखाते हुए बताते है कि यह भीम का पंजा है। ऐसे ऐतिहासिक महत्व के स्थल को भी संवारने की जरूरत है तथा पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है।   

घाघरा मंदिर का अस्तित्व खतरे में 
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र अंतर्गत एक ऐतिहासिक महत्व का मंदिर ग्राम घाघरा में स्थित है जिसे घाघरा मंदिर के नाम से पहचाना जाता है जो बेहद प्राचीन मंदिर है लेकिन देख रेख के अभाव में मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड गया है। जानकारी के अनुसार 15 वी शताब्दी में ग्राम घाघरा स्थित प्राचीन घाघरा मंदिर की स्थापना की गयी थी। जिसमें शिवलिंग स्थापित है। वर्तमान में प्राचीन घाघरा मंदिर जीर्ण शीर्ण हालत में पहुॅच गया है। यदि अब भी मंदिर के अस्तित्व केा बचाने की दिशा में ध्यान नही दिया गया तो जिले का सबसे पुराने मंदिरों में से एक घाघरा मंदिर का अस्तित्व मिट जोयगा। 

कई दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के स्थल 
कोरिया जिले में  ऐतिासिक महत्व के स्थलों के साथ दर्शनीय स्थलों की कमी नही है। चांग देवी का मंदिर, नीलकंठ धाम, बौद्ध स्थल के साथ कई दर्शनीय स्थल है जिनके बारे में सिर्फ क्षेत्र के लेागों केा ही इसकी जानकारी है जिले के अन्य क्षेत्र के लोगो को जानकारी नही है। वही कोरिया जिले में क्षेत्रफल की दृष्टी से प्रदेश का सबसे बडा राष्टीय उद्यान गुरू घासीदास राष्टीय उद्यान सोनहत जनपद क्षेत्र में स्थित है। जो घने जंगलों से घिरा हुआ है यहॉ दर्जनों प्रकार के  वन जीव जंतु निवास करते है तथा कई बहुमूल्य पेड पौधों के अलावा जडी बुटी पाये जाते है।


Date : 26-Sep-2019

कोरिया में ऐतिहासिक-प्राकृतिक दर्शनीय स्थलों की भरमार

चन्द्रकांत पारगीर

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बैकुंठपुर, 26  सितंबर। 
कोरिया जिला प्रकृति की गोद में बसा छग प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक छोटा व आदिवासी बाहुल्य जिला है। यहां वनों की सघनाता ज्यादा है इसके साथ ही यहां ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भरमार होने के साथ ही कई प्राकृतिक दर्शनीय स्थल है। जिसके चलते कोरिया जिले में पर्यटन की अपार संभावना है लेकिन इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किये गये। यदि उचित प्रयास किया जाता है तो कोरिया जिले को प्रदेश के पर्यटन नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। 

जिला गठन होने के पश्चात दो दशक से ज्यादा हो गया। वहीं छग राज्य स्थापना हुए दो दशक होने को है लेकिन कोरिया जिले के प्राकृतिक व दर्शनीय स्थलों की पहचान आज जिले में ही सिमटी है तथा कई ऐतिहासिक महत्व के धरोहर उपेक्षित पड़े हुए हैं। जिनमें खडगवां में कोटेश्वर महादेव, जनकपुर में बिखरे पड़े सतीगेट, सोनहत के बदरा स्थित रॉक पेंटिंग, पटना स्थित देवगढ़धाम, रामगढ स्थित गांगीरानी मंदिर, सोनहत का जोगीमठ सहित कई स्थान शामिल हंै। 

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में से एक अमृत धारा जल प्रपात है। इसके अलावा भी कई अन्य प्रमुख दर्शनीय व प्राकृतिक स्थल है जिसे पहचान दिलाने की जरूरत है, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अमृतधारा जल प्रपात के अलावा जिले के अन्य दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण स्थल अपनी पहचान जिले में ही नहीं बना सके। पर्यटन विकास के नाम पर सिर्फ अमृतधारा जल प्रपात स्थल का ही विकास कराया गया। जिसकी पहचान आज जिले के अलावा बाहर भी है। यहां पर हसदो नदी का पानी करीब 100 फीट से ज्यादा उचाई से गिरता है जो मनमोहक नजारा प्रस्तुत करता है। यहां पर सबसे ज्यादा सैलानी पिकनिक मनाने के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा गौर घाट जल प्रपात भी जिले के प्रमुख जल प्रपातों में से एक है जहां का नजारा भी सुन्दर है लेकिन यहां पर प्रशासन द्वारा किसी तरह की सुरक्षात्मक व्यवस्था नहीं बनाई है जिसके चलते यहां पर कई घटनाएं हो चुकी हैं तथा पहुंच मार्ग भी सही नहीं है। फिर भी यहां सैलानियों की भीड़ प्रतिवर्ष जुटती है। यदि इस जल प्रपात स्थल तक पहुंच मार्ग के साथ अन्य आवश्यक सुविधाएं तथा सुरक्षात्मक उपाय किए जाएं तो यह भी एक रमणीय स्थल है। जहां पर पहुंच कर प्रकृति के सुन्दर नजारे के साथ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। 

कई जलप्रपातों को पहचान की जरूरत
कोरिया जिले में अमृतधारा जल प्रपात गौर घाट जल प्रपात के अलावा भी कई सुन्दर जल प्रपात स्थित है जिनके बारे में पूरे जिले के लोगों को ही जानकारी नहीं है केवल क्षेत्रीय स्तर तक ही इनकी पहचान बनी हुई है। ऐसे जल प्रपात को पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है। 

जानकारी के अनुसार भरतपुर जनपद क्षेत्र में एक प्रमुख जल प्रपात रमदहा जल प्रपात है जो अपनी सुन्दरता के लिए क्षेत्र में प्रसिद्ध है लेकिन यहां पर आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है साथ ही प्रचार प्रसार के अभाव मेें इस जल प्रपात के बारे में जिले के कई क्षेत्रों के लोगों केा जानकारी ही नहीं है। रमदहा जल प्रपात जिले का एक सुन्दर जल प्रपात है जिसका नजारा काफी मनमोहक है। इसके अलावा सोनहत जनपद पंचायत क्षेत्र में बनिया वाटर फॉल प्रकृति के गोद में बसा हुआ है। घने वनों के बीच में कल कल बहती नदियां उंचाई से गिरते हुए सुन्दर जल प्रपात का नजारा बनाता है। यह भी गुमनामी के दौर से गुजर रहा है। इसके इलावा भी भरतपुर व सोनहत जनपद क्षेत्र में कई गुमनाम जलप्रपात है जिन्हे पहचान दिलाने की जरूरत है।

मुख्यालय के निकट सीता गुफा गुमनाम
कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के निकट रामायण काल के समय का एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे सीता गुफा के नाम से जाना जाता है स्थानीय लेाग इस स्थल को समुंदई के नाम से जाते है। जानकारी के अनुसार समुंदई जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से कुछ ही किमी की दूरी पर सोनहत मार्ग पर स्थित शिवघाट की ऊंची पहाड़ी में घने जंगलों के बीच में स्थित है। जिला मुख्यालय के निकट होने के बाद भी ऐतिहासिक महत्व का यह स्थल अपेक्षा के कारण विकसित नहीं हो सका है जिसके चलते यहां क्षेत्र के लोगों के अलावा जिले के दूर दराज के पर्यटक नहीं पहुंचते। यहां तक पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं बन पाया है। 

जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर से सोनहत मार्ग पर शिवघाट के उपरी गांव पहाड़पारा से समुंदई क्षेत्र पहुंचा जा सकता है। लेकिन सोनहत जनपद के ग्राम पहाडपारा के बाद सुव्यवस्थित मार्ग नहीं होने के कारण जंगलों के बीच पैदल ही जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक विशाल चट्टान को काटकर गुफा बना गया है जहां भगवान शिव की आराधना की जाती है। विभिन्न खास अवसरों पर गुफा के अंदर जवारा बोने के साथ साथ भजन कीर्तन भी होता है। 

मान्यता है कि भगवान राम सीता अपने वनवास के दौरान समुंदई क्षेत्र में कुछ दिनों तक इसी गुफा में रूके थे। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफा में एक साथ करीब 15-20 लोगों के बैठने की जगह है। घने वनों के बीच गुफा के निकट की वर्तमान में सुन्दर जल प्रपात भी दिखाई देता है जो करीब  150 फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता है। इसके नीचे एक और जल प्रपात है। क्षेत्र के कई लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं तथा विभिन्न त्यौहार के दौरान पूजा अर्चना करने आस पास के दर्जनों गांव के ग्रामीण पैदल पहुंचते हैं। 

हरचौका स्थित पुरातात्विक महत्व का स्थल 
 कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत हरचौका में मवई नदी जो कि छग व मप्र की सीमा को विभाजित करती है। नदी के तट पर ही चट्टानों को तरासकर गुफा बनाई गयी है जिसमें प्रत्येक दिशा में शिवलिंग है। बताया जाता है कि भगवान राम वन गमन के दौरान यहॉ पर कुछ दिनों के लिए रूके थे और शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करते थे। इसके अलावा मान्यता यह भी है महाभारत काल में पांडव भाई भी अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आये थे। एक पुजारी द्वारा गुफा के पास ही मवई नदी के तट पर स्थित चट्टान से रेत को साफ कर विशालकाय पैर का पंजा शिला में दिखाते हुए बताते है कि यह भीम का पंजा है। ऐसे ऐतिहासिक महत्व के स्थल को भी संवारने की जरूरत है तथा पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है।   

घाघरा मंदिर का अस्तित्व खतरे में 
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र अंतर्गत एक ऐतिहासिक महत्व का मंदिर ग्राम घाघरा में स्थित है जिसे घाघरा मंदिर के नाम से पहचाना जाता है जो बेहद प्राचीन मंदिर है लेकिन देख रेख के अभाव में मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड गया है। जानकारी के अनुसार 15 वी शताब्दी में ग्राम घाघरा स्थित प्राचीन घाघरा मंदिर की स्थापना की गयी थी। जिसमें शिवलिंग स्थापित है। वर्तमान में प्राचीन घाघरा मंदिर जीर्ण शीर्ण हालत में पहुॅच गया है। यदि अब भी मंदिर के अस्तित्व केा बचाने की दिशा में ध्यान नही दिया गया तो जिले का सबसे पुराने मंदिरों में से एक घाघरा मंदिर का अस्तित्व मिट जोयगा। 

कई दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के स्थल 
कोरिया जिले में  ऐतिासिक महत्व के स्थलों के साथ दर्शनीय स्थलों की कमी नही है। चांग देवी का मंदिर, नीलकंठ धाम, बौद्ध स्थल के साथ कई दर्शनीय स्थल है जिनके बारे में सिर्फ क्षेत्र के लेागों केा ही इसकी जानकारी है जिले के अन्य क्षेत्र के लोगो को जानकारी नही है। वही कोरिया जिले में क्षेत्रफल की दृष्टी से प्रदेश का सबसे बडा राष्टीय उद्यान गुरू घासीदास राष्टीय उद्यान सोनहत जनपद क्षेत्र में स्थित है। जो घने जंगलों से घिरा हुआ है यहॉ दर्जनों प्रकार के  वन जीव जंतु निवास करते है तथा कई बहुमूल्य पेड पौधों के अलावा जडी बुटी पाये जाते है।


Date : 26-Sep-2019

भोपाल हनी ट्रैप में छत्तीसगढ़ में फंड 
देने वाले बड़े-बड़े लोग शामिल मिले
रायपुर, 26 सितंबर (छत्तीसगढ़)।
मध्यप्रदेश में भूकंप ला चुके हनी ट्रैप के तार छत्तीसगढ़ से पुख्ता जुड़े हुए मिल रहे हैं। अफसरों, मंत्रियों, और कारोबारियों को रूपजाल में फंसाकर, उनके सेक्स वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने का इतना बड़ा कारोबार देश में शायद पहली बार ही पकड़ाया है, और वह मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सत्ता को भी जकड़ा हुआ मिला है। 

मध्यप्रदेश पुलिस इस मामले की जांच बहुत ही गोपनीय तरीके से कर रही है क्योंकि इसमें भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के कई नेताओं के नाम भी जुड़े हुए हैं, और बड़े-बड़े दिग्गज ओहदों पर बैठे हुए आईएएस-आईपीएस भी हनी ट्रैप में फंसे हुए मिले हैं। यह मामला पकड़ाई गई युवतियों और महिलाओं के बयानों से परे, वीडियो रिकॉर्डिंग, और टेलीफोन कॉल डिटेल्स जैसे पुख्ता सुबूतों पर टिका हुआ बड़ा मजबूत मामला है जिसमें सरकार से सैकड़ों करोड़ के काम लिए गए, और शायद दर्जनों करोड़ की नगदी वसूली भी की गई। 

जांच करने वाले अफसरों से मिली जानकारी के अनुसार इस हनी ट्रैप में काम कर रही युवतियों ने तरह-तरह के एनजीओ के नाम से मंत्रियों और अफसरों से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट मंजूर करवाए। एक जानकारी यह भी मिली है कि इसके एवज में देह लेने के साथ-साथ कुछ अफसरों ने नगद हिस्सा भी लिया, और उस लेन-देन की जानकारी भी जांच में मिल चुकी है। 

छत्तीसगढ़ के बारे में यह पता लगा है कि 2018 में यहां पर कंपनियों के सीएसआर बजट और सरकार के एनजीओ फंड से बड़ी-बड़ी रकमें दिलवाने की साजिश में एक पति-पत्नी भी छत्तीसगढ़ में पकड़ाए थे। यह जोड़ा भी इसी तरह से सत्ता पर बैठे मंत्रियों और बड़े अफसरों से प्रोजेक्ट मंजूर करवाकर देता था, और ऐसे ही एक काम के दौरान जब नगद कमीशन देने की बात आई, तो इस जोड़े ने अपने छापे हुए नकली नोट एक बड़े अफसर को दे दिए थे। नकली नोटों की शक्ल में बहुत बड़ी रकम दी गई थी, और उससे दस गुना अधिक सरकारी रकम मंजूर की गई थी। जब यह रकम नकली नोटों की निकली, तो अफसरों ने मिलकर इस जोड़े को गिरफ्तार करवा दिया था, और वह आज तक जेल में है। 

इसी तरह भोपाल से आई हुई युवतियां छत्तीसगढ़ में मंत्रियों और अफसरों से मिलती थीं, और उनसे तरह-तरह के काम अलग-अलग एनजीओ के नाम से मंजूर करवाती थीं। इसके एवज में इन लोगों की तरह-तरह से सेक्स-सेवा की जाती थी। इसके लिए छत्तीसगढ़ के बड़े लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर भी इनके साथ वक्त गुजारते थे। 

इस अखबार 'छत्तीसगढ़' के हाथ छत्तीसगढ़ सरकार के एक बड़े व्यक्ति द्वारा पिछले बरस मंजूर किए गए एक बड़े अनुदान की एक रिकॉर्डिंग भी लगी है, लेकिन उसकी पुष्टि नहीं होने से उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। 

इसी बारे में तहकीकात करते हुए यह भी पता लगा है कि कई महीने पहले छत्तीसगढ़ में अपने आपको मॉडल कहने वाली एक युवती आंचल यादव को एक अफसर को सेक्स-वीडियो के बदले ब्लैकमेल करने का मामला सामने आया था, जिसमें उसकी गिरफ्तारी भी हुई थी, और जेल से जमानत पर छूटने के बाद उसके भाई ने ही परिवार पर अपमान का दाग करार देते हुए उसकी हत्या कर दी थी। उसके बारे में भी यही पता लगा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग के कुछ उच्चाधिकारी उसके जाल में फंसकर उसे बड़े-बड़े काम मंजूर करते थे, और कम से कम एक बड़े कारोबारी घराने का एक बड़ा अफसर उसका सरकार में उपयोग करता था। 

'छत्तीसगढ़' अखबार के हाथ इस तरह मंजूर किए गए एनजीओ-प्रोजेक्ट की जानकारी भी लगी है जिन्हें राज्य शासन के एक बड़े अफसर ने मंजूर किया था। जांच कर रही मध्यप्रदेश पुलिस ने इन तमाम लड़कियों से मिले दर्जनों सिमकार्ड के कॉल डिटेल्स तो निकाले ही हैं, इनके मोबाइल हैंडसेट पर अलग-अलग समय में इस्तेमाल किए गए ऐसे सिमकार्ड के कॉल डिटेल्स भी निकाले हैं जो आज इनके पास नहीं है, जिनका इस्तेमाल बंद हो चुका है। एक जांच अफसर के मुताबिक टेलीफोन के पुख्ता सुबूतों के आधार पर छत्तीसगढ़ के एक दर्जन से अधिक बड़े लोगों से इनके संपर्क के सुबूत मिल चुके हैं, और इन युवतियों के चलाए जा रहे एनजीओ को किस-किस मंत्री या अफसर ने प्रोजेक्ट मंजूर किए थे इसकी जांच के लिए भी टेलीफोन नंबर देखे जा रहे हैं। इनके पास से जब्त सेक्स-वीडियो संख्या में इतने अधिक हैं कि पुलिस उसके चेहरों की शिनाख्त के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों से परिचित मध्यप्रदेश पुलिस कर्मचारियों को भी जांच में शामिल कर चुकी है। 

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश चूंकि एक ही राज्य थे, इसलिए दोनों राज्यों में नेता, अफसर, दलाल, कारोबारी, और कुछ पत्रकार भी बहुत से लोगों को जानते थे, और इन महिलाओं के साथ जाकर उनका काम करवाते थे। मध्यप्रदेश में ऐसे कई पत्रकारों का नाम जानने का दावा भाजपा के एक बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने दिया है, लेकिन इस मामले को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बहुत से नेता इसलिए चुप हैं कि पता नहीं उनके किसी करीबी का वीडियो सामने न आ जाए। 

भोपाल से एक जानकार सूत्र ने यह बताया है कि इन युवतियों के पास से जब्त तकरीबन सारे ही सेक्स-वीडियो असली पाए गए हैं, और इनकी ब्लैकमेलिंग गढ़े हुए वीडियो पर नहीं थी, असली रिकॉर्डिंग पर थी। 

 


Date : 18-Sep-2019

3 बरस से पहाड़ी कोरवा सहित दर्जनों का पीएम आवास अधूरा

क्रांति कुमार रावत

उदयपुर, 18 सितंबर (छत्तीसगढ़)। सरगुजा जिले के विकासखंड उदयपुर अंतर्गत दूरस्थ वनांचल क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत केसमा के आश्रित ग्राम बनकेसमा लालपुर और डेवापारा में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की स्थिति बद से बदतर है। ग्रामीणों का आरोप है कि 3 साल पहले आवास बनाना शुरू कर आधा-अधूरा छोड़ दिया। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है, तो कहीं निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं। अब कोई एक कमरे में सांप बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक कमरे में, तो कोई आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे-खिड़कियों के बांस का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर है।

विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवा जन जाति की बिहानी बाई ने बताया कि पीएम आवास का निर्माण 3 साल पहले शुरू हुआ था और अभी तक निर्माण कार्य अधूरा है। पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम द्वारा इसका निर्माण कार्य कराया जा रहा था और आधा अधूरा निर्माण कराकर छोड़ दिया गया। अब बिहानी बाई अपने पति सालिक राम और बच्चों के साथ एक कमरे में सांप-बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक ही कमरे में किसी तरह गुजर बसर करने को मजबूर हैं क्योंकि आवास के बनने वाले दो कमरों में से एक का तो निर्माण छत डाल कर कर दिया गया है, परंतु सामने वाले कमरे का छत अभी तक भी खुला हुआ है।

आवास हितग्राही बिहानी बाई के पति सालिक राम ने बताया कि पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम के द्वारा निर्माण के लिए आवंटित राशि आहरण करा कर अपने पास रख लिया गया अब ना तो मकान निर्माण का काम पूरा करा रहा है और ना ही और कोई जवाब दे रहा है। पूछने पर केवल यही बताता है कि निर्माण का काम करवा दूंगा।

इसी तरह जमती बाई फूलों बाई गुड्डी बाई और सुखनी बाई चारों हितग्राहियों के आवासों का निर्माण एक साथ एक ही जगह पर तीन साल पहले शुरू कराया गया था। आवास का डिजाइन कुछ इस तरह से है जैसे कोई बाउंड्री बनाया जा रहा है। बीच-बीच में पतले-पतले कॉलम खड़े कर दिए हैं। अब ना तो छत है ना ही दीवार है न दरवाजे और न खिड़कियां हैं। इस बाउंड्री के अंदर घास फूस का छप्पर लगाकर हितग्राही अपना मवेशियों को बांध कर रखते हैं।

जमती बाई के पति सुनील ने बताया कि ग्राम पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम ने यह कहकर कि तुम लोग पहाड़ी कोरवा हो और आवास का निर्माण नहीं कर पाओगे, इसलिए निर्माण की राशि मुझे दे दो, मैं बहुत जल्दी ही निर्माण कार्य पूरा करा दूंगा। चार आवासों के एक साथ निर्माण के विषय में पूछने पर सुनील ने बताया, हमारा घर पहाड़ी के ठीक नीचे जंगल के किनारे हैं, वहां हाथियों का हमेशा आना-जाना लगा रहता है। इसलिए हमारे खानदान के 4 परिवार के सदस्यों के नाम से इस स्थान पर एक साथ ही आवास का निर्माण किया जा रहा था। इन आवासों का आकार भी बहुत छोटा है और शुरू कराते ही कुछ दिनों के बाद पंचायत के सचिव ने काम बंद करा दिया। अब जो भी यहां की हालत है, आपके सामने है।

बनकेसमा की ही निवासी पहाड़ी कोरवा महिला सांझी बाई अपने लकवा ग्रस्त पति सोमारू के साथ आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे खिड़कियों के बाँस की ठठरी का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर हैं। पूछने पर उसने भी बताया कि पंचायत के सचिव कामेश्वर राम ने ही निर्माण का जिम्मा लिया था परंतु आधा-अधूरा ही छोड़ दिया। उसके पति की हालत भी ऐसी नहीं है कि वह आधे-अधूरे काम को पूरा कर सके। एक पहाड़ी कोरवा वृद्ध महिला अपने पति के इलाज का जिम्मा देखे घर बनवाये या फिर पेट की चिंता करे। यही कहानी मनीराम, लझरु, सोहन और सनी राम की भी है।

ग्राम पंचायत केसमा के ही आश्रित ग्राम लालपुर में भी प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना की स्थिति बदतर है। लालपुर निवासी ग्रामीण आदिवासी जीतू राम ने मक्का लगे हुए बाड़ी की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इसी स्थान पर आवास का निर्माण होना था, परंतु आज तक भी खाते में रकम नहीं आने की वजह से आवास का निर्माण प्रारंभ नहीं किया जा सका है उसके नाम की राशि लगभग 80,000 रूपए किसी अन्य के खाते में जाना भी बताया जा रहा है।

 लालपुर निवासी एक अन्य ग्रामीण प्रेमसाय की कहानी किसी अजूबे से कम नहीं है। आवास निर्माण के नाम पर चिन्हित स्थान पर निर्माण में लगने वाले कॉलम के लिए छड़ में रिंग बांध कर 1 साल पहले छोड़ दिया गया है। इसके बाद ना तो कोई निर्माण सामग्री आई और ना ही काम शुरू हुआ। छड़ में जंग लगने की वजह से वह भी खराब होना शुरू हो गया है। इनके द्वारा यह भी बताया गया कि 2 साल पहले ग्राम पंचायत के सचिव द्वारा आवास निर्माण कराए जाने के नाम पर रकम पूरा निकलवा कर ले जाया गया है परंतु निर्माण आज तक शुरू नहीं कराया गया है। इन्होंने जांच कराकर संबंधित सचिव पर कार्रवाई की बात भी कही है।

लालपुर निवासी जवाहर सूरजलिया राजकुमार घूमी बाई और महकूल सिंह के भी आवासों की यही कहानी है। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है।

ग्राम पंचायत केसमा के अंतर्गत ही ग्राम डेवापारा में सबलसाय आत्मज कष्टू और सुखसाय जो कि दोनों भाई है, उनके आवास निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं और किसी तरह की भी ना तो कोई दीवार और ना ही कोई कॉलम नजर आता है। पास में ही स्थित सीसी रोड में कुछ र्इंट और कुछ गिट्टी और थोड़ी बहुत रेत पड़ी हुई दिखाई देती है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना से संबंधित मोबाइल ऐप में देखने पर इन दोनों आवासों के लिए आबंटित पूरी राशि का आहरण हो चुका है और निर्माण कार्य पूर्ण दिखाई देता है।

इस संबंध में तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि कुछ हितग्राहियों के कहने पर मेरे द्वारा उन लोगों का निर्माण कार्य कराया जा रहा है। बारिश और स्थानांतरण की दिक्कत की वजह से कार्य अधूरा है। बारिश खत्म होते ही काम पूरा कराया जाएगा। कुछ निर्माण कार्य नेट में पेंडिंग दिखा रहा था, इसलिए उन लोगों का निर्माण कार्य पूर्ण दिखाया गया है।

इस संबंध में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत उदयपुर पारस पैकरा से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है, जांच कराकर बता पाऊंगा।

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 ग्रामीण विकास मंत्रालय से जारी आंकड़े जो कि मोबाइल ऐप से प्राप्त हुए उनकी बात करें तो ग्राम पंचायत केसमा में कुल योग्य लाभार्थी 187 है। स्वीकृत आवास 127 है। पहली किश्त का भुगतान जिनको किया गया ऐसे हितग्राही 98 है। दूसरी किश्त का भुगतान किया गया सहित कई 96, तीसरी किश्त जिसका भुगतान किया गया ऐसे हितग्राही 87 हैं और जिनका आवास पूर्ण हो चुका है ऐसे हितग्राही 72 हैं। इन आधे अधूरे आवासों की स्थिति मोबाइल ऐप से देखने पर ज्यादातर आवास पूर्ण दिखाए जा रहे हैं और आबंटित राशि का भी आहरण पूर्ण दिखाया जा रहा है।


Date : 15-Sep-2019

पत्थलगांव-ठाकुरपोड़ी में आए 11 हाथी, कॉलर आईडी से मिल रही जानकारी

जितेन्द्र गुप्ता

छत्तीसगढ़ संवाददाता
पत्थलगांव, 15 सितंबर। 
वन मण्डल कापु से शनिवार सुबह 4 बजे हाथियों का दल पत्थलगांव से 7 किलोमीटर की दूरी में स्थित ग्राम ठाकुरपोड़ी के कक्ष क्रमांक पी 991 पहुंचा जिसकी सूचना पत्थलगांव वनमंडल के अधिकारियों को भी मिली एवं आसपास के गाँव वालों को एहतियात के तौर पर सतर्क करते हुए फारेस्ट की टीम को हाथियों पर नजर रखने कहा। पत्थलगांव के एसडीओ के साथ सभी स्टॉफ लगे हुए हैं। वहीं 11 हाथियों के दल में एक गौतमी हाथी भी है जो फीमेल है। उसके गले में कॉलर आईडी लगी हुई है। जिससे वह विभाग के अधिकारियों को सेटेलाईट के द्वारा हर छ: घंटे में सूचना प्राप्त होती रहती है। हाथियों के दल में निगरानी करने में वन विभाग को काफी आसानी हो जाती है। 

 मुख्य बातें जैसे ही गौतमी हाथी दल के पत्थलगांव में आने की खबर लगी तो पत्थलगांव एसडीओ आर.आर. पैकरा ने अंकित कुमार एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता को साथ लेकर ग्राम ठाकुरपोड़ी  में आये गौतमी हाथी के दल को देखने निकल गए। अंकित कुमार का परिचय बता दें ये केंद्र सरकार से डेपुटेशन में छतीसगढ़ तीन साल के लिए आये हैं। ये हाथी के विशेषज्ञ है। इनका काम है हाथियों के आने-जाने के रास्तों से लेकर उनके फोटो लेकर डाटा कलेक्ट करना जिससे उन्हें हाथियों के बारे में रिसर्च किया जा सके। अंकित कुमार एवं इनकी पूरी टीम ने ही वर्ष 2018 जून में सरगुजा के मैनपाट में गौतमी हाथी को बेहोश कर उसके गले में कॉलर आईडी लगाई थी। कॉलर आईडी लगाने वाली टीम  के मुख्य हिस्सा रहे हैं। 

रास्ते में हमारे संवाददाता को उन्होंने बताया कि अभी पूरे छतीसगढ़ में हाथियों के 6 दल में रेडियो कॉलर आईडी लगाई गई थी जिसमें से 3 कॉलर आईडी खराब हो गई है। वर्तमान में तीन दल जिसमें एक गौतमी दल, एक गणेश दल एवं एक प्यारे दल में रेडियो कॉलर आईडी लगी हुई है जिससे इन तीनों दलों के लोकेशन की जानकारी हमें हर 6 घंटे में प्राप्त होती रहती है। कुछ 20 मिनट के सफर के बाद हम ठाकुरपोड़ी पहुँच गए और सड़क से लगभग एक से दो किलोमीटर अंदर खेत से लगी हुई काफी पेड़ों के बीच हाथियों के दल अपने खाने-पीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी, वहीं कुछ दूर में ही गाँव के लगभग 500 से 700 आदमी इन हाथियों को देखने पहुंचे हुए थे। उन सभी को हाथियों से काफी दूर रहने कहा गया था।

उस समय 5 बजकर 35 मिनट हो रहे थे एक से डेढ़ घंटे में अँधेरा होने को था और अँधेरा होने पर उन  हाथियों को ढूंढना इतना आसान नहीं इसलिए जल्दी-जल्दी हाथी के विशेषज्ञअंकित एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता साथ गये। हाथी से करीब 70 से 80 मीटर की दूरी  में उन्होंने हमारे संवाददाता को रोककर इससे ज्यादा नजदीक जाने से मना कर दिया एवं उनके ंसाथ आये हाथियों के जानकार सहयोगी में से एक व्यक्ति को मेरे साथ रहने कहकर अंकित एवं एक महावत हाथी के काफी नजदीक लगभग 50 मीटर तक पहुंचकर पेड़ की ओट से अपने लाये कैमरे से हाथियों के फोटो लिए। लगभग 30 से 40 फोटो अलग-अलग एंगल से लेकर जिसमें गौतमी हाथी भी थी उनके कई फ़ोटो लिए खासकर रेडियो कॉलर आईडी लगी गौतमी हाथी के काफी फोटो लिए लगभग 40 से 60 मिनट के बाद अँधेरा हो ही गया और फिर हम सभी को वहां से वापस लौटना पड़ा। 

 हाथियों के विशेषज्ञ अंकित कुमार ने बताया वो इतनी दूर से आए ही इसीलिए थे की गौतमी हाथी एवं उस दल का फोटो ले सकंू जिससे गौतमी हाथी लगे रेडियो कॉलर आईडी के सही लगे होने एवं उन सभी हाथियों के बारे में कई जानकारी को एकत्रित कर सकंू। गौतमी हाथी के लगे कॉलर आईडी के बारे में बताया कि उसमें हमेशा नजर रखी जाती है कि उसके लगे होने से हाथी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। उसमें बैटरी लगी हुई है। उस बैटरी की उम्र 6 साल है। हमें 6 साल तक जानकारी मिलती रहेगी। उन्होंने हाथियों के बारे में कई अहम जानकारी दिया जिसमें उन्होंने कहा कि हमारे छतीसगढ़ में छोटे छोटे जंगल होने के कारण इन हाथियों को यहां वहां भटकना पड़ता है। जंगलों का कम होना जंगलों के आसपास घर बनाकर रहते लोगों बिजली की बड़ी लाईनों के जंगलों के पास से गुजरना एवं जंगलों में सड़क बनाने जैसी बातों के चलते हाथियों के जंगल बंटते जा रहे हंै। वे जंगल का एरिया छोटा होने के कारण हाथियों को काफी मुश्किलें हो रही है।  उन्हें खाने पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन जंगलों में उपलब्ध नहीं हो रहे है एवं उन जंगलों में भी लोगों का आना-जाना बना रहता है जिससे हाथियों को इधर-उधर भागना पड़ता है। हाथी हिंसक नहीं होते हैं। उन्हें परेशान करने की वजह से वे आक्रामक हो जाते हैं। इसलिए इन हाथियों से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।

हाथियों के नजदीक कभी भी नहीं जाना चाहिए। ज्यादा नजदीक जाने पर ही ये हाथी लोगों के ऊपर हमला कर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हाथी से काफी दूरी बना कर रहे। इस गौतमी दल के बारे में अपने लैपटॉप से जानकारी निकालकर उन्होंने बताया कि पिछले साल भी ये दल यहीं से गुजरा है एवं हो सकता है कि बगल के कुनकुरी जंगल तक जाए क्योंकि पिछले वर्ष लगभग एक हफ्ते तक ये दल कुनकुरी के जंगलों में बिताया था। हाथी जहां-जहां जाते हंै। वो जगह इनके घूमने की जगह बन जाती है। जहां-जहां हाथी कभी भी जाते हैं उन जगहों में हाथी वापस आ सकते है। संभावना ये भी रहती है कि हाथी के दल की स्थिति के अनुसार वे अपने रहने एवं उस जगह से दूर चलने की सोचते हं।  जिसमें महिला हाथियों के प्रेग्नेंट होने एवं बच्चे देने के कारण कुछ दिन वो दल रूक भी जाते हैं। अभी इस दल में तीन हाथियों में दांत है। तीन छोटे-छोटे बच्चे भी साथ है। कुल मिलाकर 11 हाथी विचरण कर रहे हैं।


Date : 11-Sep-2019

मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस 

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 11 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
मदनवाड़ा-कोरकोट्टी नक्सल हमले की नए सिरे से न्यायिक जांच के राज्य सरकार के आदेश ने नक्सल घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे एक सिपाही की आऊट-ऑफ टर्न (ओटी) प्रमोशन को लेकर चल रही कानूनी जंग को मानो पंख लगा दिया है। 

12 जुलाई 2009 को हुए इस वारदात में गोलियों की बौछार के बीच चालक प्रधान आरक्षक ओंकार देशमुख (बैच 494)ने तत्कालीन एसपी विनोद चौबे के वाहन को धड़धड़ाते हुए निकालते नक्सलियों के पहले हमले को अपनी सूझबूझ से असफल कर दिया। जबकि वाहन में एसपी के सुरक्षाकर्मी संजय यादव को लगभग 50 से अधिक गोलियां लगी। वहीं एसपी के फालोवाहन के ड्रायवर बी. सीतराम राजू कमर में गोली लगने से घायल हुए थे। बाद में पूरी लड़ाई के खात्मे तक एसपी चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए। 

बताया जाता है कि बहादुरी के साथ नक्सलियों से भिडऩे के एवज में राज्य सरकार ने जवानों को ओटी के तहत प्रमोशन देने का ऐलान किया था। शुरूआत में मौखिक रूप से चालक देशमुख को सूची में नाम होने की जानकारी दी गई। लड़ाई में शामिल होने के लिए तत्कालीन दुर्ग रेंज आईजी मुकेश गुप्ता और रक्षित निरीक्षक गुरजीत सिंह को जहां वीरता पदक से नवाजा गया, वहीं 18 जवानों को ओटी दिए जाने का ऐलान किया, लेकिन चालक देशमुख का नाम गायब हो गया। 

 वारदात स्थल पर जाने से पहले विभागीय रोजनामचे में देशमुख की रवानगी का उल्लेख है। सूची में नाम नहीं होने के बाद प्रधान आरक्षक सन्न रह गया। बताया जाता है कि ओटी दिए जाने से पहले हुए विभागीय कथन में पूरी लड़ाई को लेकर एक अफसर की गैरमौजूदगी पर सही जानकारी देना ओंकार देशमुख को भारी पड़ गया। सूची में नाम नहीं होने के बाद यह सुरक्षाकर्मी अफसरों की चौखट पर पहुंच कर वास्तविक स्थिति को बयां करते थक गया। आखिरकार 2015 में हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए ओंकार देशमुख ने अपील की। 

बताया जाता है कि एक शीर्ष अफसर की आंखों में खटकने के कारण ओंकार को उसके हक से वंचित कर दिया गया। जबकि लड़ाई के दौरान बख्तरबंद वाहन में सवार सीआरपीएफ के एक चालक को सरकार ने ओटी दिए जाने की सिफारिश की। ओंकार देशमुख ने अपने साथ हुए कथित हेरफेर को लेकर हाईकोर्ट में पुख्ता दस्तावेज पेश किए है। 

पूर्व एसपी प्रवीर दास ने भी देशमुख के नाम का उल्लेख नहीं होने पर हैरानी जताई थी। वहीं पूर्व एसपी बीएन मीणा ने दोबारा पत्र लिखकर राज्य सरकार से ओटी देने की सिफारिश की थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लड़ाई के दौरान कंट्रोल रूम के जरिए परिजनों को देशमुख के शहीद होने की जानकारी भी दे दी थी। 

पूरी लड़ाई में देशमुख कोरकोट्टी गांव में हुए नक्सली हमले के गवाह है। बताया जाता है कि एक आला अधिकारी ने लड़ाई में अपनी भूमिका को दमदारी से दिखाने के लिए कई तरह का बदलाव कर दिया। नतीजतन देशमुख इसी कुच्रक में फंसकर ओटी से वंचित हो गए। उधर लड़ाई में बतौर साहसी होने देशमुख को राजधानी रायपुर में एक कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सम्मानित किया। लेकिन सरकार में बैठे एक अफसर के इशारे पर इस सुरक्षाकर्मी को ओटी देने से दूर कर दिया गया।

बताया जाता है कि प्रधान आरक्षक के अपील के जवाब में सरकार ने दुर्ग रेंज के आईजी रहे मुकेश गुप्ता के अभिमत के आधार पर ओटी नहीं देने की हाईकोर्ट में जानकारी दी है। प्रधान आरक्षक की ओर से नक्सल जंग में जाने से पहले के कई प्रामणिक दस्तावेज जमा किए गए है। महकमे के कई अफसरों ने प्रधानआरक्षक के साथ हुए बर्ताव पर अफसोस भी जाहिर किया। अब जबकि सरकार ने इस वारदात की न्यायिक जांच की घोषणा की है तो प्रधान आरक्षक हाईकोर्ट से न्याय मिलने की आस में है।

 


Date : 10-Sep-2019

नान जनहित याचिकाओं की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने बनाई नई बेंच, सुनवाई तय 

रायपुर/बिलासपुर, 10 सितंबर (छत्तीसगढ़ )। बहुचर्चित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला मामले की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में नई बैंच बनाई गई है। कोर्ट आधा दर्जन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। बताया गया कि याचिकाओं में पांच घोटाले की जांच की मांग को लेकर दायर की गई थी। जबकि एक याचिका नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है, जिसमें एसआईटी जांच रोकने की मांग की गई है। सुनवाई के लिए गुरूवार और शुक्रवार का दिन नियत किया गया है। 

जस्टिस पी सैमकोशी और जस्टिस आरपी शर्मा की पीठ नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला प्रकरण की सुनवाई करेगी। एक बार में एक याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई होगी। 12 तारीख को सबसे पहले हमर संगवारी संस्था की याचिका पर सुनवाई होगी। बाकी अन्य याचिका  सुदीप श्रीवास्तव, राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय, मिड डे मिरर व अनिल टुटेजा और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है। 

याचिकाकर्ताओं में से श्री कौशिक को छोडक़र बाकी ने ईओडब्ल्यू की पिछली सरकार के कार्यकाल में जांच पर सवाल खड़े किए थे और इस घोटाले की सीबीआई अथवा एसआईटी जांच की मांग की गई थी। सरकार बदलने के बाद घोटाले की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। मामले की जांच चल रही है। प्रकरण में कई नए खुलासे भी हुए हैं। इससे परे नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने नान घोटाले की जांच के लिए एसआईटी के गठन पर सवाल उठाए हैं और उन्होंने इसके गठन को ही चुनौती दी है। 

मिड डे मिरर संस्था ने फर्जी राशन कार्ड के जरिए घोटाले का आरोप लगाया था। इस मामले में भी सुनवाई होगी। बताया गया कि कोर्ट ने पहले डे-टू-डे 26 अगस्त से 2 सितंबर तक सीजे के डिवीजन बैंच में इस मामले की सुनवाई निर्धारित की थी।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले से संबंधित याचिकाकर्ता जो भी दस्तावेज सबमिट करना चाहे 14 अगस्त तक कर दें। मगर, प्रकरण से जुड़े दस्तावेज ट्रांसलेट करके कोर्ट को उपलब्ध नहीं कराया जा सका। इसको लेकर याचिकाकर्ताओं ने माफी मांगी। इसके बाद नई बैंच को सुनवाई का जिम्मा सौंपा गया है। 

आरोप है कि छत्तीसगढ़ में राइस मिलरों से लाखों क्विंटल घटिया चावल लिया गया और इसके बदले करोड़ों रुपये की रिश्वतखोरी की गई। इसी तरह नागरिक आपूर्ति निगम के ट्रांसपोर्टेशन में भी भारी घोटाला किया गया। इस मामले में 27 लोगों के खिलाफ मामला दर्र्ज किया गया था। जिनमें से 16 के खिलाफ 15 जून 2015 को अभियोग पत्र पेश किया गया था। फिलहाल सभी आरोपी जमानत पर हैं। 

 

 


Date : 09-Sep-2019

निर्देश के बाद भी बीमा कंपनी से भुगतान नहीं 

बैकुंठपुर, 9 सितंबर (छत्तीसगढ़)। ‘छत्तीसगढ़’ की खबर के असर के बाद कोरिया जिले की खरीफ फसल वर्ष 2014 में मौसम आधारित फसल बीमा योजना में हुए घोटाले में राज्य सरकार ने बीमा कंपनी को दोषी मानते हुए अंतर की राशि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ एक माह की समय सीमा पर भुगतान करने के लिए निर्देशित किया था, परन्तु आज तक बीमा कंपनी ने राशि जमा नहीं की। दूसरी ओर राज्य शासन ने बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, परन्तु उप संचालक कृषि ने पत्र को दबा कर रख किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की। सूचना के अधिकार से मामले की जानकारी सामने आई।

इस संबंध में आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता का कहना है कि जिला कृषि विभाग के अधिकारी जानबूझ कर बीमा कंपनी को बचाने में जुटे हैं। यही कारण है कि 22 मई 2019 को जारी इस पत्र को उप संचालक कृषि ने ना सिर्फ दबा कर रखा, वरन किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की। सरकार ने राजनांदगांव और कोरिया के किसानों को बीमा कंपनी को किसानों की राशि 12 प्रतिशत के ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है, उस आदेश को भी कंपनी ने नहीं माना। 

जानकारी के अनुसार राज्य के कृषि विकास एवं कल्याण विभाग ने 23 मई 2019 को जारी अपने आदेश में कोरिया और राजनांदगांव में मौसम आधारित फसल बीमा योजना खरीफ वर्ष 2014 में बीमा कंपनी द्वारा किसानों के साथ आंकड़ों में जालसाजी एवं धोखाधड़ी को सही माना था। राज्य सरकार ने बीमा कंपनी ने उल्लेखित प्रावधानों का उलंघ्घन करते हुए प्रमाणित जानकारी निर्धारित समयातंराल में संचालनालय कृषि को नहंीं दी थी। ऐसे मेें मौसमी राज्य सरकार ने आंकड़ों के आधार पर अंतर दावा राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ कृषकों को एक माह की समय सीमा में भुगतान करने को कहा था परन्तु बीमा कंपनी ने समयावधि निकल जाने के बाद भी किसानों की राशि नहीं लौटाई। जिसके बाद राज्य सरकार ने उपसंचालक कृषि कोरिया को बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा कृषि विकास कल्याण विभाग को अवगत कराने निर्देशित किया था। दो माह बीत जाने के बाद भी उप संचालक कृषि ने किसी भी तरह की कार्रवाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। आरटीआई एक्टिविस्ट रमाशंकर गुप्ता ने आरटीआई के तहत जानकारी निकाली तो इस बात का खुलासा हुआ है। 

क्या था मामला
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत क्षेत्र के आदिम जाति सेवा सहकारी समिति माड़ीसरई के 25 गांव के 546  कृषकों को कुल रकबा 76 2.15 हेक्टे. के लिए बीमा कंपनी पर धोखाधड़ी कर कम मुआवजा बांटने की शिकायत सामने आई थी। तत्कालीन कलेक्टर नरेन्द्र दुग्गा ने जांच के निर्देश दिए और जांच के बाद कंपनी दोषी पाई गई। मामले में कृषि उपसंचालक को कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा गया। जिसके बाद पुलिस ने दस्तावेज मांगे। कृषि विभाग के कार्यालय से दो बार दस्तावेज चोरी हो गए। फिर रायपुर से दस्तावेज पहुंचे और पुलिस को सौंप दिए गए। बावजूद इसके एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसी बीच दिसंबर में बीमा कम्पनी के प्रतिनिधि तत्कालीन कलेक्टर से मिले और मामला पलटने लगा। 

इधर, आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता एफआईआर का दबाव बनाए हुए थे। शिकायतकर्ता व अन्य के द्वारा उच्च न्यायालय में फसल बीमा के एक अन्य मामले में दायर याचिका खारिज हो गई।जिसे कोरिया जिले में हुए घोटाले से जोडक़र कृषि उप संचालक ने बीमा कंपनी पर एफआईआर को औचित्यहीन बताते हुए कलेक्टर जनदर्शन में दिए गए शिकायतकर्ता के समस्त शिकायत आवेदनों को निरस्त करने को कहा और तत्कालीन कलेक्टर ने तत्काल मामले को विलोपित भी कर दिया। 

इसकी जानकारी आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता को लगी। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी। दबाव बनाता देख कृषि उप संचालक ने 28  फरवरी 2019 को दोषी बीमा कंपनी बजाज एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पत्र लिख कर कहा कि किसानों को कम क्षतिपूर्ति देने की शिकायत रमाशंकर गुप्ता द्वारा करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का दबाव डाला जा रहा है तथा प्राथमिकी शिकायतकर्ता द्वारा राजनांदगांव में दर्ज की गई। जिस संबंध में पुलिस अधीक्षक राजनांदगांव के निर्णय, वक्तव्य को संलग्न कर इस कार्यालय को प्रेषित करें। जिससे कि कोरिया में एफआईआर को रद्द किया जा सके। वहीं प्रशासन अब भी हर संभव बीमा कंपनी को बचाने में जुटा हुआ है।

साक्ष्य के साथ की गई छेड़छाड़
बीमा कंपनी बजाज एलाएंस द्वारा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेट मुंबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किये गए थे। जो पूर्व में भेज गये आंकड़ों से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह करने की कोशिश की गई। इसके बाद भी बीमा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेड मुबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किए गए जो पूर्व में भेजे गए से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह किया गया।

कोरिया जिले में किसानों को मौसम आधारित फसल बीमा योजनांतर्गत अधिकृत बीमा कंपनी बजाज एलायंस द्वारा कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र के ग्राम माडीसरई के कृषकों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि दिए जाने के मामले में बीमा कंपनी पर प्राथमिकी दर्ज करने के मामले को लेकर उप संचालक कृषि द्वारा अनुमति मांगी गई थी।

 जिस पर शासन ने नियमानुसार बीमा कंपनी पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश जारी किये थे। लेकिन संचालनालय द्वारा आदेश को कई माह से दबाकर रखा गया। जिस कारण किसानों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि देने के आरोप से घिरे बीमा कंपनी पर अब तक आपराधिक धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मामले में कृषि विभाग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी की संलिप्तता होने के कारण इस मामले को दबाने का प्रयास करने का भी आरोप है।

 


Date : 07-Sep-2019

एमजीएम ने बैंक लोन के लिए 50,000 करोड़ के घोटाले वाली कंपनी को सहयोगी बताया था!

रायपुर, 7 सितंबर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के डीजी स्तर के निलंबित अधिकारी मुकेश गुप्ता को उनके खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट से स्थगन की राहत तो मिल गई है, लेकिन उनके खिलाफ चल रही जांच में अब तक हासिल कागजात उनके लिए आगे चलकर दिक्कत खड़ी करने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट का स्थगन अब तक दर्ज तीन एफआईआर पर ही है, लेकिन कई और मामलों की जांच चल रही है जिसमें उनकी अगुवाई में रायपुर में बन रहे एक बहुत बड़े अस्पताल का मामला भी है।

मुकेश गुप्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य बनने से लेकर कुछ महीने पहले तक इस अस्पताल के काम को बहुत आगे बढ़ाया था। उनकी दूसरी पत्नी मिक्की की मौत की जांच की मांग मिक्की की मां और भाई बरसों से करते आ रहे थे, और अब भूपेश सरकार ने यह जांच शुरू करवाई है। मिक्की की स्मृति में बने एक बहुत बड़े आंखों के अस्पताल एमजीएम को लेकर यह जांच चल रही है कि उसके लिए इतने बड़े-बड़े दान कैसे जुटाए गए, और ट्रस्ट का काम सरकारी नियमों के मुताबिक चल रहा है या नहीं। इसे लेकर ट्रस्ट नियंत्रित करने वाले प्रशासनिक अधिकारी और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, दोनों की ओर से कागजात जुटाए जा रहे हैं, और बैंकों से, ट्रस्टियों से तरह-तरह के कागज अधिकारियों को मिले हैं।

इन कागजों में एक कागज आज अचानक भारी सनसनीखेज साबित हो रहा है जिसमें एमजीएम ट्रस्ट ने अस्पताल के लिए बैंक लोन लेते हुए ट्रस्ट के महत्वपूर्ण सहयोगी संस्थानों के नाम की एक लंबी लिस्ट बैंक को दी थी। कई बरस पहले बैंक में जमा किए गए बहुत से लोन-कागजातों में ऐसी लिस्ट में प्रदेश की 66 बड़ी कंपनियों, फर्मों, और लोगों के नाम हैं जो कि जनता की जानकारी में अरबपति लोग हैं।

लेकिन इनमें प्रदेश के बाहर की एक ऐसी कंपनी को भी एमजीएम ने अपना महत्वपूर्ण एसोसिएट बताया है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जांच चल रही है, और जिसके सारे डायरेक्टर आज जेल में हैं। पीएसीएल इंडिया लिमिटेड नाम की दिल्ली स्थित इस कंपनी ने निवेशकों से देश भर में लगभग 50 हजार करोड़ रूपए इक_े कर लिए थे और अब दीवाला निकाल देने के बाद सरकार इसकी संपत्तियों को जब्त करके पूंजीनिवेशकों को उनकी लगाई गई रकम का कुछ हिस्सा देने की कोशिश कर रही है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी सरकार ने अपने छोटे-छोटे दफ्तरों के स्तर पर भी ऐसे लुटे हुए निवेशकों के दावा फॉर्म भरवाने का काम किया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की बनाई हुई जस्टिस लोढा कमेटी की निगरानी में इस कंपनी की जब्त संपत्तियों से पूंजीनिवेशकों की रकम निकालने की कोशिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि पीएसीएल नाम की इस कंपनी ने निवेशकों के धन को लूटने के लिए ही ऐसी योजना बनाई थी।

अब छत्तीसगढ़ में एमजीएम ट्रस्ट के बैंक में जमा किए हुए कागजातों में इस कंपनी का नाम इम्पॉर्टेंट एसोसिएट के रूप में निकलने से मुकेश गुप्ता के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। इस ट्रस्ट में मुकेश गुप्ता खुद ट्रस्टी तो नहीं हैं, लेकिन सारे ट्रस्टी उनके एकदम करीबी लोग हैं, और इस अस्पताल को उन्हीं के नाम से जाना भी जाता है। इसके साथ-साथ बैंक कर्ज के कागजात में स्टेट बैंक ने अपने अंदरुनी कागजातों में इस कर्ज को भरोसेमंद बताने के तथ्यों और तर्कों में मुकेश गुप्ता को इसके पीछे की मुख्य ड्राइविंग फोर्स भी लिखा है। बैंक ने मुकेश गुप्ता से हुई बातचीत का जिक्र भी इस लोन के सिलसिले में किया है, और उनकी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका इस ट्रस्ट के पीछे बताई है।

जिन 66 कंपनियों, फर्मों, और लोगों को मिक्की मेमोरियल ट्रस्ट के इम्पॉर्टेंट एसोसिएट बताया गया है उनमें केन्द्र सरकार की एक सबसे बड़ी पब्लिक सेक्टर कंपनी एसईसीएल (साऊथ इस्टर्न कोल लिमिटेड), का नाम भी है। इस लिस्ट में आधा दर्जन दूसरे ट्रस्टों के नाम भी हैं।

 

इनके नामों का उपयोग ट्रस्ट के बंैक लोन के लिए किस तरह किया गया है इसकी जानकारी जांच एजेंसियां बैंकों से निकालने की कोशिश कर रही हैं। एक बड़े जांच अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ को मिले कुछ कागजातों को सही बताते हुए कहा है कि बैंक अफसर जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं, और इस ट्रस्ट के नाम से खोले और बंद किए गए दर्जनों बैंक खातों की जानकारी देने में आनाकानी कर रहे हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि इस जांच पर किसी अदालत की कोई रोक नहीं है, और अगर जरूरत पड़ी तो बैंक की संबंधित ब्रांच पर छापा मारकर वहां से कागजात जब्त किए जाएंगे।


Date : 05-Sep-2019

शिक्षा का अलख जगाने रोज गांवों में फेरा लगा रहा, नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में भृत्य तेजराम बने मिसाल

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 5 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
शिक्षा के प्रति गहरे लगाव ने एक चपरासी के रोज ड्यूटी के बाद लोगों के चौखट पर पहुंचकर नौनिहालों को स्कूल भेजने की मुहिम ने नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में शिक्षा का अलख जगा दिया है। मदनवाड़ा हाईस्कूल में पदस्थ भृत्य तेजराम निषाद स्कूल में शिक्षकों और विद्यार्थियों को पानी पिलाने समेत अन्य कार्य करने के बाद रोजाना साइकिल से धूर नक्सलग्रस्त गांवों का फेरा लगाकर अशिक्षा के जाल में फंसे ग्रामीणों को बच्चों को स्कूल भेजने पर जोर दे रहे हंै। अब बच्चों को पढ़ाने स्वमेव ग्रामीण सामने आने लगे हैं। 

तेजराम निषाद ने स्कूल में दर्ज संख्या को बढ़ाने के लिए यह सकारात्मक कदम उठाया है। कुछ दिनों में मदनवाड़ा, कारेकट्टा, मुंजाल, रेतेगांव, कलवर, हुरवे व हरेली गांव से विद्यार्थियों ने स्कूल में दाखिला लेना शुरू किया। तेजराम की कोशिशों से अब स्कूल की दर्ज संख्या में खासी वृद्धि हो गई है। 

बताया जाता है कि मदनवाड़ा हाईस्कूल खुलने के करीब दो वर्ष तक एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया था। जिससे शिक्षकों और अन्य कर्मियों को विद्यार्थियों की गैरमौजूदगी खलती रही। ऐसे में शिक्षकों के सामने आने से पहले चपरासी निषाद ने गांवों में फेरा लगाकर ग्रामीणों को स्कूली शिक्षा महत्व से अवगत कराया। तालीम हासिल नहीं करने के स्थिति में बच्चों को भविष्य में होने वाली दिक्कतों से रूबरू कराया। बताया जाता है कि शुरूआत में ग्रामीण तेजराम को देखकर बिदकने लगे थे, लेकिन चपरासी की जिद ने आखिरकार रंग लाया और मदनवाड़ा स्कूल विद्यार्थियों से गुलजार होने लगा। 

करीब पांच साल पहले 2014-15 स्वीकृत स्कूल भवन 16-17 में पूर्ण हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों को स्कूल में लाने के लिए तेजराम ने एक सकारात्मक कदम उठाया। बताया जाता है कि मानपुर में पदस्थ रहे निषाद ने खुद प्रशासन से मदनवाड़ा में अपनी पदस्थापना करने का आग्रह किया। मदनवाड़ा में नक्सलियों की तेज आमदरफ्त की परवाह किए बगैर निषाद ने गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों को अपने साथ जोड़ा। नतीजतन आज मदनवाड़ा हाईस्कूल में शिक्षक आधुनिक और तकनीकी शिक्षा से बच्चों को दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए तैयार कर रहे हंै।

 ज्ञात हो कि तेजराम ने शिक्षा का उन्मुक्त वातावरण बनाने के लिए अपनी बेटी को मानपुर से मदनवाड़ा में दाखिल कराया। नतीजतन उनकी बेटी ने कक्षा 10वीं में 73 फीसदी अंक हासिल की। वर्तमान में वह अंबिकापुर स्थित प्रयास विद्यालय में तालीम ले रही हंै।

कलेक्टर ने कहा सम्मानित करेंगे
चपरासी तेजराम निषाद की सराहना करते कलेक्टर जेपी मौर्य ने कहा कि निश्चित ही यह अनुकरणीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि ऐसे निष्ठावान कर्मियों से अन्य शिक्षकों को सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आगामी गणतंत्र दिवस में उनको प्रशासन की ओर से सम्मानित किया जाएगा। शिक्षा के प्रति लगाव से ही ऐसे बेहतरीन कार्य किए जा सकते हंै।

 


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