विशेष रिपोर्ट

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Date : 22-Jul-2019

पूर्व गृहमंत्री पैकरा और कई आईएएस के खिलाफ चिटफंड धोखाधड़ी का जुर्म दर्ज

छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 22 जुलाई।
महासमुंद जिले के खल्लारी थाने में सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, संचालकों, प्रचारक और अनुमति देने वाले अफसरों के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। दर्ज एफआईआर में निदेशक बनवारी लाल बघेल, वकील सिंह बघेल, राजीव गिरी समेत पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा, आईएएस रीना बाबा साहेब कंगाले, सिद्धार्थ कोमल परदेसी, भीम सिंह, नीलकंठ टेकाम, और अमृतलाल ध्रुव के नाम शामिल हैं। तीस जून 2019 को यह रिपोर्ट खल्लारी थाना के ग्राम खट्टी निवासी दिनेश पानीकर ने दर्ज कराई है।

इसी थाने में इसके एक हफ्ते पहले ऐसी ही एक दूसरी रिपोर्ट भी दर्ज हुई है जिसमें इन आईएएस अफसरों के अलावा एक आईपीएस अफसर रतन लाल डांगी का नाम भी है, और कुछ दूसरे आईएएस अफसरों के नाम भी हैं। लेकिन महासमुंद पुलिस ने ये दोनों एफआईआर वेबसाईट से हटा दी हैं, और इस अखबार की संवाददाता द्वारा जाकर वहां पूछने पर भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी। बड़े-बड़े अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाने से राज्य शासन और पुलिस मुख्यालय के अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं।

पीडि़त दिनेश पानीकर ने दर्ज एफआईआर में कहा है कि वह रोजी मजदूरी कर जीवन यापन करता है। उसने सनशाईन इंफ्राबिल्ड कारर्पोरेशन लिमिटेड में कुल 13 लाख 11 हजार 881 रुपये जमा किए थे। यह रकम मंैने खेत बेचकर जमा किए थे। इसमें मेरे और मेरे परिजनों के नाम से भी जमा निवेश हंै। उक्त कंपनी ने साढ़े 6 साल में रकम दो गुना देने का लालच दिखाया था। मैंने यह रकम उक्त कंपनी के कार्यालय अक्षत नगर पानी टंकी के पास मुकुटनगर में जमा किए थे। यह कंपनी रुपये वापिस न कर दफ्तर में ताला लगाकर भाग गई। कंपनी के  निदेशकों, संचालकों आदि के खिलाफ मैंने उच्च न्यायालय में भी आवेदन दिया था। 

दर्ज एफआईआर के अनुसार एसडीओपी और उच्च न्यायालय के आदेश के बाद दिनेश के अलावा एक अन्य शिकायतकर्ता नंदकुमार निषाद डूमरपाली खल्लारी के आवेदन पर सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, संचालकों और अनुमति देने वाले अफसरों के खिलाफ धारा 420 और 34 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है।

एफआईआर में पीडि़त दिनेश पानीकर के आवेदन की नकल भी संलग्न है जिसमें पुलिस अधीक्षक, थाना प्रभारी, छग प्रवर्तन निदेशालय, पीएमओ को संबोधित करते हुए सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, सदस्यों एवं अन्य के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का अनुरोध किया गया है। 

शिकायतकर्ता का कहना है कि वह मजदूर हंै, अपनी जमा पूंजी और जमीन बेचकर रकम जमा की थी। कंपनी द्वारा रकम नहीं लौटाने पर अन्य निवेशकों के साथ थाना प्रभारी को इसकी शिकायत की थी लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कंपनी के निदेशक बनवारी लाल बघेल, वकील सिंह बघेल, राजीव सिंह, संजीव सिंह, सुरेन्द्र सिंह, धरम सिंह, कोर समिति के सदस्य राजीव गिरी और सीमा गिरी द्वारा संचालन छत्तीसगढ़ में किया जा रहा था। इस कंपनी के स्टार प्रचारक रामसेवक पैकरा थे।
कंपनी को बंद करने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कंपनी छत्तीसगढ़ में कार्यरत रही। 

अधिकारी रीना बाबा साहेब कंगाले, अमृतलाल ध्रुव, सिद्धार्थ कोमल परदेसी, भीम सिंह और नीलकंठ टेकाम  इस कंपनी को क्लीन चिट देते रहे। जिसके कारण कोर समिति के सदस्य मुझे लगातार दिलासा देते रहे और भ्रम में रखा। इसी कंपनी के खिलाफ वर्ष 2015 में अंबिकापुर के थाना बौलौद और रायपुर के न्यू राजेन्द्र नगर में भी धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है।

 

 

 


Date : 20-Jul-2019

रिटायर्ड अफसरों की जारी सरकारी चाकरी के लिए क्रेडा ने 13 लाख वसूली निकाली

'विशेष संवाददाता
रायपुर, 20 जुलाई (छत्तीसगढ़)।
रिटायर्ड अफसरों के बंगलों पर सरकारी कर्मचारियों की बेगारी का मामला कुछ बढ़ रहा है। अभी प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त एम.के. राऊत के बंगले पर निजी सेवा करने वाले एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी के रिटायर हो जाने पर उसने अपने विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, में संविदा नियुक्ति की अर्जी दी। अर्जी आने पर लोगों को पता लगा कि विभाग में ऐसा भी कोई कर्मचारी काम करता है जिसे बीस बरस से दफ्तर में किसी ने देखा नहीं था। 

विभाग ने उसकी संविदा अर्जी खारिज कर दी क्योंकि उसी ओहदे पर बिना काम के बहुत से कर्मचारी विभाग में काम कर रहे हैं। यह कर्मचारी एम.के. राऊत के रिटायर हो जाने के बाद भी उन्हीं के बंगले पर लगा हुआ था, और उसे ग्रामीण विकास के एक दफ्तर में ही रहने के लिए उस वक्त से एक कमरा मिला हुआ था जब राऊत पंचायत-ग्रामीण विकास विभाग के सचिव थे। अब वह कमरा भी खाली करा लिया गया है। 

लेकिन एक दूसरे सरकारी दफ्तर में एक और नजारा सामने आया है। छत्तीसगढ़ शासन की सौर ऊर्जा एजेंसी क्रेडा के तीन कर्मचारी क्रेडा के सीईओ रहे एक आईएएस डी.एस. मिश्रा की निजी सेवा में लगे हुए थे। वे क्रेडा से हट गए, सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए, और शासन ने उन्हें राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। लेकिन ये कर्मचारी वहीं काम करते रहे। अब जब ग्रामीण विकास में यह मामला सामने आया, तो क्रेडा के अधिकारियों ने भी यह निकाला कि उनके कौन से कर्मचारी कहां काम कर रहे हैं। इस पर निकला कि डी.एस. मिश्रा के रिटायर होने के बाद से जो कर्मचारी उनकी सेवा कर रहे हैं उन तीनों के वेतन-भत्ते मिलाकर तेरह लाख रूपए से अधिक की वसूली क्रेडा ने निकाली है, और इसके लिए आयोग को नोटिस भेजा है। डी.एस. मिश्रा अपने सेवाकाल में एक बहुत ही कडक़ अफसर माने जाते थे, और उन्हीं की सेवा में लगे हुए ऐसे तीन लोगों के काम के एवज में तेरह लाख रूपए से अधिक का वसूली का नोटिस चौंकाने वाला है। 

ऐसा पता लगा है कि एसीबी-ईओडब्ल्यू में कर्मचारियों की ओर से यह शिकायत की जा रही है कि सरकारी कर्मचारियों से बेजा काम करवाकर उन्हें जिन विभागों से भुगतान करवाया जा रहा है उसकी वसूली या तो उनकी सेवा लेने वाले अफसरों-रिटायर्ड अफसरों से की जाए, या उन अधिकारियों से की जाए जिन्होंने अपने विभाग के लोगों की ऐसी नाजायज ड्यूटी लगाई है। 

ऐसे बहुत से मामलों के जानकार एक बड़े अफसर ने कहा कि खुले बाजार में ड्राइवर की सेवाएं आठ हजार रूपए महीने पर मिल जाती हैं, लेकिन निजी कामों के लिए झोंक दिए गए सरकारी ड्राइवरों की तनख्वाह पच्चीस हजार रूपए तक पड़ती है। इसी अनुपात में घरेलू कामकाज के लिए रखे गए नौकरों, और चौकीदारों का वेतन बनता है। बड़ी तनख्वाह और भत्ते पाने वाले लोग निजी खर्च पर ऐसे सेवक रखें तो उन्हें एक तिहाई या एक चौथाई खर्च पर वे मिल जाएंगे, लेकिन तीन-चार गुना शासकीय खर्च का ऐसा बेजा इस्तेमाल इस राज्य में एक आम बात बन गई है। 


Date : 19-Jul-2019

वन अधिकार से बैगाओं में उम्मीद

बाबा मायाराम
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में बैगा आदिवासी जंगल और जमीन का अधिकार लेने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं। वे गांव-गांव में दावा फार्म भर रहे हैं और नजरी नक्शा भी बना रहे हैं। व्यक्तिगत के साथ सामुदायिक वन अधिकार के लिए भी दावा कर रहे हैं। 
हाल ही में पंडरिया विकासखंड के गांवों में जाने का मौका मिला। पहले नवापारा- राजिम के सक्षम केंद्र में नए वन अधिकार कानून ( नुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी ( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006) पर कार्यशाला थी। इसमें छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों से प्रतिभागी शामिल थे। यहां सामुदायिक अधिकार पर विस्तृत जानकारी दी गई। प्रेरक के रामगुलाम सिन्हा, जुनास दीप आदि ने प्रशिक्षण दिया।

प्रेरक संस्था से जुडक़र काम करने वाले नरेश बुनकर मुझे बैगा आदिवासियों के गांव ले गए। नरेश बुनकर बैगा आदिवासियों के बीच लम्बे समय से काम कर रहे हैं। 4 से 6 फरवरी (2019) के बीच करीब डेढ़ दर्जन गांवों का दौरा किया। इन गांवों में कुछ खुडिय़ा बांध, जो मनियारी नदी पर बना है, की तलहटी में बसे हैं। और कुछ डोंगर ( पहाड़) पर बसे हैं, जो पंडरिया के आगे मैकल पहाडिय़ों में जंगलों के बीच रह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति के अंतर्गत आते हैं। बैगाओं का जीवन प्रकृति पर निर्भर रहा है। वे बेंवर (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) खेती करते थे। बेंवर को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जानते हैं। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल में दहिया खेती कहते हैं। कहीं झूम व पेंदा खेती भी कहा जाता है। 

बेंवर खेती में छोटे- पेडों व झाडिय़ों को काटकर बिछाया जाता है। झाडिय़ों के सूखने पर फिर उनमें आग लगाई जाती है। फिर जली राख में कई फसलों के बीजों को एक साथ फेंक दिया जाता है, जो बारिश होने पर ये बीज उग आते हैं और पक जाते हैं। जैसे-जैसे फसलें पक कर तैयार होती जाती हैं, वैसे-वैसे बैगा काटते जाते हैं। तीन साल में इसका स्थान बदल जाते थे,जिससे जमीन फिर से उर्वर बन जाए।  इस कारण इसे स्थानांतरित खेती भी कहते हैं।

बेंवर में बैगा कुटकी, सांवा, कांग, मडिय़ा, मक्का, ज्वार, राहर ( अरहर),उड़द, सिकिया, बदरा ( दाल) , झुंझरू, रवांस, डेंगरा, खीरा, बड़े लांझी आदि बोते थे। अब बैगा बेंवर नहीं करते हैं। लेकिन वे अब भी इन पौष्टिक अनाजों की खेती उनके खेतों में करते हैं।   
जंगल से उन्हें कई तरह के कांदा भी मिलते हैं, जो उनके भूख के दिनों के साथी हैं। इनमें डूनची कांदा, कनिहा कांदा, रबी कांदा, सेंदू कांदा, लोरनी कांदा, गीठ कांदा, कौजारी कांदा, सिडवां कांदा इत्यादि। जंगल से कई प्रकार की हरी पत्तेदार भाजियां भी मिलती हैं। जैसे सिरौती भाजी, पकड़ी भाजी, दौबे भाजी, सिहाड़ भाजी, कचनार, कोयलार, तिनपनिया, करमत्ता, चाटी और तिवड़ भाजी है। जंगल से मिलने वाले फलों में चार, तेंदू, महुआ, कुल्लू लासा (गोंद), हर्रा, बहेड़ा इत्यादि मिलते हैं। इसे गैर खेती भोजन भी कहते हैं। 

पौष्टिक अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए बैगाओं ने बांहपानी गांव में अनाजों की प्रदर्शनी भी लगाई थी। जिसमें जन स्वास्थ्य सहयोग गनियारी के देशी बीजों के जानकार होमप्रकाश साहू, बैगाओं के बीच काम करनेवाले मध्यप्रदेश के नरेश विश्वास आदि शामिल हुए थे। प्रेरक संस्था ने देशी बीजों के संरक्षण व संवर्धन में अनूठा काम किया है। उनके देशी धान की करीब 350 किस्में हैं। इसके अलावा बाड़ी ( किचिन गार्डन) का काम भी कर रही है। प्रेरक संस्था ने जैविक खेती व घरों की बाडिय़ों ( किचिन गार्डन) का काम किया है। 
घमेरी गांव के मानसिंह बैगा कहते हैं कि अब जो चीजें हमें जंगलों से मिलती थी अब उनमें कमी आ रही है। उनका गांव भी बोइरहा डोंगर में था, लेकिन वहां गुजर होना मुश्किल था, इसलिए अब वे खुडिय़ा बांध की तलहटी में आकर बस गए। 
वे आगे बताते हैं कि हमने जमीन की लड़ाई लड़ी और वन अधिकार का पट्टा भी पाया। अब हम सामूहिक सामुदायिक पट्टे के लिए कोशिश कर रहे हैं। कांदावानी और बांहपानी पंचायत में उन्होंने सामुदायिक पट्टा भी हासिल किया है।

गांव बचाओ समिति के नरेश बुनकर ने बताया कि वनाधिकार के लिए बैगाओं को लम्बी लड़ाई लडऩी पड़ी है। पिछले वर्ष 2018 में यहां बैगा आदिवासियों ने टाईगर रिजर्व कोरिडोर के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती है। गांवों तक यह खबर पहुंची कि अब कान्हा, भोरमदेव और अचानकमार अभयारण्य तक टाईगर रिजर्व कोरिडोर बनेगा। इसलिए बैगाओं की जंगल से निस्तारी पर रोक लगेगी। वन संरक्षण के नाम पर बैगाओं के जीवन पर आए इस संकट से बैगा संगठित हुए और इसके खिलाफ खड़े हो गए। 

वर्ष 2018 के मार्च महीने में तीन दिवसीय पदयात्रा तय हो गई थी। लेकिन पदयात्रा की शुरूआत में वनविभाग और पुलिस दल-बल के साथ यहां पहुंची और उनके ( नरेश बुनकर) समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। यह खबर पाते ही बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्र हुए और कुकदर थाना पहुंच गए, जहां उनको (नरेश बुनकर) और उनके साथियों को गिरफ्तार करके रखा गया था। यात्रा की शुरूआत में आदिवासियों की लड़ाई में अग्रणी नरेश बुनकर समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया।  कुछ ही समय में जनदबाव में सभी को छोडऩा पड़ा और लिखकर यह आश्वासन देना पड़ा कि टाईगर रिजर्व कोरिडोर नहीं बनेगा। 

लेकिन इसके बावजूद भी पदयात्रा का कार्यक्रम नहीं रूका और यह पदयात्रा 17 मार्च को बांहपानी से चलकर 19 मार्च को पंडरिया तक गई। वहां गांधी चौक में बैगा सम्मेलन रखा गया जिसमें वनाधिकार और आदिवासियों की समस्याओं पर चर्चा हुई और संबंधित अधिकारियों को समस्याओँ से संबंधित ज्ञापन दिया गया।  कुल मिलाकर, इस पूरी लड़ाई में बैगा आदिवासियों की जीत छोटी जीत हुई और इससे उनमें हिम्मत आई। और बाद में दो पंचायतों बांहपानी और कांदावानी पंचायत को सामुदायिक पट्टा का अधिकार भी मिला।

इसी प्रकार, डोंगर के ऊपर के गांव बांहपानी, भलिन दादर, धुरसी, कांदावानी, कानाखेरू, छीरपानी, ठेंगाटोला, ढपरापानी में भी बैगा इसमें लगे हैं। बैगाओं की जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उनकी जंगल आधारित खाद्य व भोजन व्यवस्था थी जिसमें अब कमी आ रही है। एक तो जलवायु बदलाव व मौसम बदलाव हो रहा है। जंगल कम हो रहे हैं। पानी के परंपरागत स्रोत भी सूख रहे हैं। कुछ गांवों में दूर से पानी लाना पड़ता है। उनकी जीवनशैली व खेती भी बदल रही है। बैगाओं का जीवन कठिन हो रहा है।     

अब नए वन अधिकार कानून से बैगाओं में आस जगी है। इलाके के और भी गांव वन अधिकार के तहत् उनके अधिकार पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। और नई कांग्रेस की सरकार ने इस दिशा में पहल शुरू की है, खुद सरकारी महकमे ने जगह-जगह कार्यक्रमों के माध्यम से वन अधिकार कानून के दावा फार्म भरने की जानकारी और लोगों को इसके लिए उत्साहित कर रही है। इस सबसे बैगाओं की आंखें भी उम्मीद से चमक रही हैं। वे गांव – गांव से दावा फार्म भर रहे हैं। और प्रेरक संस्था में उनकी मदद कर रही है। जंगल और आदिवासी एक दूसरे के पूरक है। बैगाओं का जीवन जंगल पर है और जंगल के बारे में उनकी जानकारी, मान्यताएं और परंपरागत ज्ञान से जंगल के संरक्षण में भी मदद मिल सकती है। 
 

 

 


Date : 18-Jul-2019

रमन सिंह का गोद गांव मदनवाड़ा बेहाल दस साल में 10वीं में सिर्फ दस पास

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 18 जुलाई। 
नक्सल प्रभावित मदनवाड़ा में शिक्षा को लेकर अलख जगाने की प्रशासनिक और राजनीतिक कोशिशें फिसड्डी साबित हुई हंै। शिक्षा के जरिए नक्सलियों के फैले जाल को तोडऩे के लिए राज्य सरकार ने हाईस्कूल खोल दिया। दशकभर में हाईस्कूल से 10 वीं के महज 10 विद्यार्थी ही उत्तीर्ण होकर उच्च शिक्षा के लिए बाहर निकले।  पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गोद लिए इस गांव में शिक्षा का स्तर साल-दर-साल गिरता ही जा रहा है। 

 मदनवाड़ा में शुरूआत के पांच साल एक भी छात्र उत्तीर्ण नहीं हुआ। हाईस्कूल खोले जाने की घोषणा के बाद   शिक्षक और विद्यार्थियों दोनों का टोटा रहा। नक्सल वारदात की वजह से सुर्खियों में रहे इस गांव में सरकारी मशीनरी की धमक जरूर बढ़ी है। 10 साल के भीतर बीते तीन साल में 5-5 विद्यार्थियों ने उत्तीर्ण  होकर शाला का थोड़ा मान बढ़ाया। 

संस्था के प्राचार्य पूरन सिंह जाड़े ने बताया कि वर्तमान में मात्र 29 विद्यार्थी अध्ययनरत हंै। जिसमें दो छात्र चालू शिक्षा सत्र में गैरहाजिर है। यानी 27 विद्यार्थी तालीम ले रहे हंै। बताया जाता है कि पूर्व सीएम रमन सिंह के गांव को गोद लेने के बाद विकास का पहिया थोड़े ही दिन घुमा।  सरकार ने  पांच शिक्षकों की पदस्थापना भी कर दी। जिसमें एक महिला शिक्षक भी शामिल है।  वर्ग-2 के दो और 3 व्याख्याता पंचायत स्कूल में पदस्थ है। 

प्राचार्य के मुताबिक ग्रामीणों की उदासीनता से शिक्षा के लिए एक उन्मुक्त वातावरण नहीं बन पा रहा है। इसके लिए जागरूकता का अभाव एक बड़ी समस्या है। बताया जाता है कि कुल 29 विद्यार्थियों में कक्षा नवमीं में 19 और 10वीं में मात्र 10 छात्र अध्ययरत हैं। मदनवाड़ा के इर्द-गिर्द करीब दर्जनभर गांव हंै। दोरदे, कलवर, बोरकन्हार और मसियापारा समेत कुछ गांवों में बच्चे पढ़ाई छोड़ घरेलू काम कर रहे हैं।

  इस संबंध में डीईओ जीडी मरकाम ने कहा कि किसी दिन दौरा कर वस्तुस्थिति की जानकारी लूंगा। दस साल में यदि सिर्फ कुछ छात्र उत्तीर्ण हुए हंै तो वाकई यह गंभीर मसला है। उधर मदनवाड़ा में पदस्थ शिक्षक भी विद्यार्थियों की कम मौजूदगी को लेकर फिक्रमंद है। बताया जाता है कि स्टॉफ की ओर से परिजनों के बीच जाकर बच्चों को स्कूल में दाखिला लेने पर जोर दे रहे हैं। इसके बाद भी हालत  सुधरी नहीं है।

 

 


Date : 17-Jul-2019

आजादी के 70 साल बाद भी यहां नहीं पहुंचा विकास, कड़ेनार के बच्चे तबेले से भी बुरे हाल में पढऩे मजबूर

शंभू यादव

कोण्डागांव, 16 जुलाई। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान वर्ष 1888 में कोण्डागांव जिले के बड़ेडोंगर में स्कूल की स्थापना हो चुकी थी। यहां स्कूल की स्थापना वर्ष 1888 में तो हो चुकी है, लेकिन आज भी जिले के कई ऐसे गांव हैं जहां स्कूल के नाम पर केवल एक झोपड़ी है। इतना ही नहीं उसमें पढ़ाने के लिए मात्र एक शिक्षक ही पदस्थ हैं।  हम बात कर रहे हैं मर्दापाल के कड़ेनार में संचालित स्कूलों की। यहां के स्कूल आज भी टीन के शेड के नीचे संचालित होते हैं। फिर चाहे मौसम कोई भी हो, बच्चों को यहीं बैठकर अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करनी होती है।

  कोण्डागांव जिला के मर्दापाल मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर, सुदूर अंचल में बसा है ग्राम पंचायत कड़ेनार। इस पंचायत की स्थिति के बारे में बात करें तो यहां पहुंचने के लिए आज भी कोई सड़क नहीं है। यदि ग्रामीणों को मुख्यालय पहुंचना होता है तो वह जंगल के अंदर से पगडंडी मार्ग से होते हुए मुख्यालय तक पहुंचते हैं। ऐसे गांव में शिक्षा का अलाव जलाए रखना अपने आप में एक चुनौती साबित होता है। इसके बाद भी ग्राम पंचायत कड़ेनार में प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं का स्थापना किया गया है। तत्कालीन सरकार ने कड़ेनार गांव में शिक्षा के अलाव जलाए रखने के लिए स्कूलों की स्थापना तो कर दी लेकिन शायद वे इन स्कूलों को वर्तमान समय में भूल चुके हैं। क्योंकि यहां संचालित स्कूल की स्थिति किसी तबेले से कम नहीं है। फिर भी यहां पदस्थ शिक्षक व अन्य कर्मी अपना काम बखूबी निभा रहे है।


एक की हालत सुधरी, तो दो की हालत जस के तस
कड़ेनार गांव में 3 प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं का संचालन हो रहा है। इनमें से एक ग्राम पंचायत कड़ेनार मुख्यालय में, मदोड़ा में एक प्राथमिक शाला और इसी तरह प्राथमिक शाला तिरीनबेड़ा का संचालन हो रहा है। इन तीन स्कूलों में से पंचायत मुख्यालय में संचालित स्कूल के लिए किसी तरह छोटा सा भवन तो बना दिया गया है, लेकिन तिरीनबेड़ा और मदोड़ा दोनों स्कूलों की हालत किसी तबेला घर से कम नहीं है। ऐसा नहीं है कि यहां के शिक्षक और ग्रामीण गांव विकास के साथ-साथ स्कूल विकास की इच्छा ना रखते हो। वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए कई बार शासन-प्रशासन के अधिकारियों से लेकर मंत्री स्तर तक स्कूल की समस्या बता चुके हैं। एक ओर गांव के अनपढ़ ग्रामीण शिक्षा की महात्व को जानते हुए स्कूल भवन की लंबे समय से मांग करते आए है, लेकिन आफरसाही जगत में शिक्षा के लिए किए गए मांग को हर बार अनसुनी कर दिया जाता है। 

चुनाव  करवाना था बनवा दिया स्कूल भवन
गांव के बुजुर्ग और जानकारों ने जानकारी देते हुए बताया, गांव में दो नहीं बल्कि इन तीनों स्कूलों की हालत एक जैसी थी, तीनों स्कूल तबेला नुमा झोपड़े में ही संचालित होते थे। अब जब प्रशासन को इन स्कूल भवन के माध्यम से विधानसभा और लोकसभा चुनाव संपन्न करवाना था तो कड़ेनार मुख्यालय में संचालित स्कूल में भवन का निर्माण करवाया गया। निर्माण के बाद स्कूल में पहले तो चुनाव कार्य संपन्न हुआ उसके बाद कही जाकर बच्चों के लिए स्कूल के द्वार बच्चों के लिए खोले गए। ग्रामीणों ने प्रशासन पर यह भी आरोप लगाते हुए कहा कि, लंबे समय से गांव में स्कूल भवन की मांग करते आए हैं लेकिन प्रशासन कोई ना कोई बहाना करके टालमटोल करते आई है। लेकिन जब स्वयं के उपयोग की बारी आई तो प्रशासन ने स्कूल भवन का निर्माण करवा दिया। 

वर्ष 2007-08 में भवन के लिए 4 लाख  हुए थे स्वीकृत
प्राथमिक शाला तिरीनबेड़ा के शिक्षक रतन लाल कश्यप (सहायक शिक्षक एलबी) ने चर्चा के दौरान बताया कि, प्रथमिक शाला तिरीनबेड़ा की स्थापना वर्ष 1998 में शिक्षा गारंटी के तहत की गई है। रतन लाल कश्यप उसी समय से इस स्कूल में पदस्थ है। उन्होंने आगे बताया कि, वर्ष 2005 में इस स्कूल का शिक्षा गारंटी से प्राथमिक शाला में उन्नयन किया गया। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2007-08 भवन निर्माण के लिए लगभग 4 लाख रुपए की स्वीकृति भी शासन स्तर से मिली, लेकिन स्वीकृति के 10 साल बाद भी यहां भवन निर्माण नहीं हो पाया है। भवन के ना होने से पहली से लेकर पांचवीं तक के सभी 33 स्कूली बच्चें एक ही झोपड़ी के अंदर बैठ कर पढ़ाई करते हैं। यहां पढऩे के दौरान कई बार ऐसे हालत भी उत्पन्न हो जाते है कि, पठन-पाठन सामग्री भींग जाते है। 

इसी क्षेत्र के विधायक रहे पूर्व शिक्षा मंत्री
ग्राम पंचायत कड़ेनार राजस्व जिला कोण्डागांव के नक्शे में ही शामिल है, लेकिन यह विधानसभा और पुलिस जिला नारायणपुर का एक हिस्सा है।  इसी क्षेत्र से केदार कश्यप भाजपा के विधायक रहे और प्रदेश सरकार में वे स्कूल शिक्षा मंत्री भी बनाए गए थे।  

जल्द ही स्कूल भवन का निर्माण करवाया जाएगा
इस मामले पर कोण्डागांव के शिक्षा अधिकारी राजेश मिश्रा से चर्चा किया गया तो उन्होंने कहा कि, पूर्व में कड़ेनार क्षेत्र में काफी परेशानी थी, जिसके कारण वहां स्कूल भवन निर्माण नहीं हो पाया। अब पंचायतों के माध्यम से भवन का निर्माण करवाया जाएगा। वहीं इस मामले पर कोण्डागांव के कलेक्टर नीलकंठ टीकाम ने कहा कि, पूर्व वर्ष में कड़ेनार माओवाद गढ़ हुआ करता था। अब यहां परिस्थितियां बदल चुकी है। जल्द ही यहां शाला भवन का निर्माण कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं इस गांव में बच्चों को आवासिय सुविधा देने के लिए छात्रावास-आश्रम का भी संचालन किया जाएगा। 


Date : 15-Jul-2019

दो नेताओं पर कार्रवाई से भाजपा सकते में डेढ़ दशक सत्ता में रहे नेता अब शासन के निशाने पर

राजनांदगांव, 15 जुलाई (छत्तीसगढ़)। हाल ही में राजनांदगांव जिले में राज्य सरकार ने कथित गड़बडिय़ों का हवाला देकर दो भाजपा नेताओं के खिलाफ सख्त कदम उठाकर भाजपा में खलबली पैदा कर दी है। बताया जाता है कि राज्य सरकार के पास भाजपा नेताओं की कारगुजारियों का पुलिंदा है। लिहाजा सरकार के पास कार्रवाई के लिए पुख्ता आधार है। 

राजनांदगांव जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष सचिन बघेल को निलंबित कर सरकार ने कार्रवाई का आगाज किया है। भाजपा के कोषाध्यक्ष सौरभ कोठारी दूसरे भाजपा नेता हैं। जिनके प्रतिष्ठान पर नियम विरूद्ध कृषि उत्पाद की बिक्री किए जाने का आरोप है। राज्य सरकार ने कोठारी के गोदाम और दुकानों को सील कर दिया है। 

बताया जाता है कि भाजपा नेताओं के कथित आर्थिक कारनामों को लेकर सरकार के पास कई अहम दस्तावेज हैं। बताया जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में जिला भाजपा से जुड़े एक प्रमुख नेता पर भी शिकंजा कसा जा सकता है। यह पहला मौका है जब राज्य में सत्तासीन होने के बाद कांग्रेस ने जिला स्तर के भाजपा नेताओं को निशाने में रखा है। सिलसिलेवार हो रही कार्रवाई के बाद कई भाजपा नेता अपने ऊपर कार्रवाई की आशंका मात्र से हड़बड़ाए हुए हैं। बताया जाता है कि सरकार के मिजाज को भांपते हुए कुछ नेताओं ने प्रदेश संगठन से भी मदद के लिए गुहार लगाई है। 

सचिन बघेल और कोठारी से पहले राज्य सरकार ने जिले के ही पूर्व विधायक रामजी भारती को अनुसूचित जाति आयोग पद से हटाने का फरमान जारी किया था। हाईकोर्ट से स्थगन मिलने के बाद भारती अपने पद को बचाने में कामयाब रहे। जबकि बघेल को जवाब देने के लिए 15 दिन की मोहलत मिली है। कोठारी के निजी प्रतिष्ठान में सील लगाकर सरकार ने सीधे उनके कारोबार को एक तरह से चौपट किया है। बताया जाता है कि कोठारी के दुकान में कार्रवाई करने के लिए राज्य कृषि विभाग के अफसरों ने दबिश दी थी। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार भाजपा नेताओं के साथ किसी भी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं है। 

उधर दोनों भाजपा नेताओं पर हुए कार्रवाई पर संगठन में ही मतभेद है। विरोधी खेमे में इस कार्रवाई से खुशी की लहर है। भाजपा के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने पूरे मामले में राज्य सरकार की कार्रवाई का दबे स्वर स्वागत किया है। माना जा रहा है कि सत्ता में काबिज रहे ऐसे नेताओं को उनके ही संगठन से समर्थन नहीं है। फिलहाल बघेल और कोठारी पर हुई सरकार की सख्ती ने दूसरे भाजपा नेताओं की नींद उड़ा दी है।

बाक्स में ... कृषि विभाग के एक अफसर पर टेड़ी हुई सरकार की नजर
भाजपा कोषाध्यक्ष सौरभ कोठारी के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हुई कार्रवाई के बाद अब कृषि विभाग के एक अफसर की भाजपा नेताओं के साथ बने रिश्तों की भी जांच हो रही है। बताया जा रहा है कि उक्त अफसर ने कृषि उत्पाद में गोपनीय साझेदार बनकर कृषि केंद्रों के संचालकों के साथ लंबी कमाई की है। चर्चा है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में भी उक्त अफसर ने खुलकर घालमेल किया है। बताया जा रहा है कि किसानों को कीटनाशक दवाईयों एवं अन्य कृषि दवाओं पर मिलने वाली सब्सिडी को भाजपा नेताओं के साथ मिलकर हजम कर लिया है। बात यह भी है कि किसान आमतौर पर सामान खरीदी के बाद बिल नहीं मांगते हैं। इसी की आड़ में उक्त अफसर ने  सब्सिडी दर्शाते हुए दुकानदारों के साथ अपनी जेब भरी है। यह खबर राज्य सरकार के कानों तक पहुंच गई है। माना जा रहा है कि सब्सिडी में हुए घोटाले की जांच भी हो सकती है। भाजपा सरकार में उक्त अफसर का राजनांदगांव जिले में कार्यकाल लंबा रहा है। समझा जाता है कि सरकार विभागीय जांच के अलावा उक्त अफसर को राजनांदगांव जिले से बाहर का रास्ता दिखा सकती है।

 


Date : 12-Jul-2019

'लाल गलियारा' की  चाल फोर्स के दखल से धीमी, स्व. विनोद चौबे व 29 जवानों की शहादत के दस साल में नक्सल चुनौतियां बौनी

राजनांदगांव, 12 जुलाई।  दस साल पहले मानपुर के कोरकोट्टी व मदनवाड़ा में हुए वीभत्स नक्सल हमले में तत्कालीन एसपी विनोद चौबे और 29 जवानों की शहादत की घटना के बाद राजनांदगांव जिले का दक्षिणी क्षेत्र मानपुर नक्सल मकडज़ाल से बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेने लगा। हालांकि अभी भी नक्सलियों का एक बड़े हिस्सें में पैठ कायम है। 'लाल गलियारा ' बनाने की फिराक में जंगल में आंतक मचा रहे नक्सलियों को पीछे ढ़केलते फोर्स आगे बढ़ते दिख रही है। नक्सलियों की आमदरफ्त पर पुलिस काफी हद तक अंकुश लगाने में कामयाब हुई है।

 12 जुलाई 2009 को कोरकोट्टी में एसपी विनोद चौबे व 29 जवान शहीद हो गए थे। यह पहला मौका था जब पुलिस के इतिहास में किसी आईपीएस अफसर को शहादत मिली। इस घटना के बाद केंद्र सरकार ने भी नक्सल समस्या की गंभीरता को समझा और राज्य के साथ कई हिस्सो में ऑपरेशन शुरू किया।

 पुलिस के ऑपरेशन के साथ सरकार ने विकास के रास्ते नक्सलियों की दखल को कम किया। यही कारण है कि आज मानपुर इलाके की तस्वीर बदल गई है। 

नक्सलियों के अंदरूनी आवाजाही को रोकने के लिए पुलिस ने ताबड़तोड़ बेसकैंप खड़े कर दिए। बाद में कुछ बेसकैंपों को थाना का दर्जा दिया गया। मानपुर के औसतन हर 10 किमी में पुलिस थाना व कैंप के जरिए अपनी धाक जमा चुकी है। नक्सलियों को रणनीतिक तौर पर कमजोर करने के लिए मुख्य ठिकानो में पर बैसकैंप तैयार कर लिए गए है। महाराष्ट्र और कांकेर की सरहद पर राजनांदगांव पुलिस का सख्त पहरा है। मानपुर और औंधी क्षेत्र में सड़क मार्ग का जाल फैल गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने कई योजनाओं को मूर्तरूप दिया है। 

बीते दस साल में पुलिस के संसाधन में इजाफा हुआ है। प्रशासनिक मशीनरी को भी जंगल में काम करने के लिए भयमुक्त माहौल मिला है। यद्यपि मानपुर में नक्सल धमाको की गंूज को पुलिस ने कम किया है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि राजनांदगांव का उत्तरी इलाका बकरकट्टा अब नक्सलियों के नए ठिकाने में बदल गया है। नक्सलियों ने इस क्षेत्र में भी जवानों को निशाना बनाया है। करीब तीन साल पहले उपनिरीक्षक युगल वर्मा समेत दो जवान शहीद हो गए थे। 
नक्सलियों के लिए यह इलाका पहाड़ी होने की वजह से शरणस्थली बना है। राजनांदगांव जिले के रास्ते लाल गलियारा बनाने में डटे नक्सलियों को पुलिस ने कभी हद तक रास्ते में लाने का प्रयास किया है। नक्सल मोर्चे में अभी भी पुलिस लंबी लड़ाई करते कई चुनौतियोंं से निपटना है। यह सच है कि मानपुर अब नक्सल चंगुल से बाहर निकलता विकास की राह में बढ़ रहा है।


Date : 06-Jul-2019

कमाई कई गुना बढ़ाकर मान ली, और दस्तावेजी खर्च को भी अनदेखा कर दिया...

एसीबी का कारनामा सीएम की जांच के घेरे में

रायपुर, 6 जुलाई (छत्तीसगढ़)। आबकारी विभाग के एक बाबू को बचाने के लिए राज्य सरकार के ईओडब्ल्यू/एसीबी के अधिकारी किस कदर जुट गए हैं, यह हैरान करने लायक मामला है। इस संस्था के अधिकारियों ने अपने ही डाले गए छापे में मिली जानकारी के खिलाफ जाकर इस बाबू पर चल रहे अदालती मामले का खात्मा करवाने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं को जिस तरह कुचला है, उससे यह विभाग खुद ही एक अपराध करते दिख रहा है।

बिलासपुर के आबकारी विभाग के एक बाबू, दिनेश दुबे, के खिलाफ एक शिकायत के आधार पर 2017 में एक मामला दर्ज हुआ था, और इस पर 2018 में जांच का आदेश हुआ, और उसी वर्ष जांच पूरी भी हो गई। इसमें इस बाबू के पास करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति मिलना पाया गया था। लेकिन अभी पिछले पखवाड़े अचानक एसीबी में कुछ सबसे बड़े अफसरों ने एकाएक इस बाबू की फाईल का ऐसा मूल्यांकन किया कि उस पर रियायतों की बौछार कर दी, उसकी कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर उसे सही मान लिया, और उसके खर्च को एकदम जमीन पर लाकर यह साबित कर दिया कि उसकी संपत्ति अनुपातहीन है ही नहीं, और रातोंरात इसके खिलाफ चल रहे मामले का खात्मा बनाकर बिलासपुर की एक अदालत में पेश कर दिया गया। 

बिलासपुर और रायपुर में आबकारी विभाग और एसीबी के जानकार और विश्वसनीय सूत्रों से मिले कागजों के मुताबिक यह साबित होता है कि किसी शासकीय सेवक की आय और व्यय की गणना के लिए एसीबी के जो नियम हैं, उनको सबको दरकिनार करते हुए दिनेश दुबे के मामले में गणना की गई। जबकि इस कर्मचारी के बारे में आबकारी विभाग के चपरासियों ने एसीबी दफ्तर में यह लिखित जानकारी दी थी कि किस तरह नोटबंदी के दौरान 2016 में दिनेश दुबे ने उनके खातों में लाखों रूपए के हजार-पांच सौ के नोट डलवाकर बाद में उसमें से रकम निकलवा ली थी। अभी की जांच में इस तथ्य को पूरी तरह अनदेखा करके रिपोर्ट बनाई गई। 

एसीबी किसी भी शासकीय सेवक की तनख्वाह का 60 फीसदी खर्च मानता है, लेकिन इस एक मामले में इस बाबू का खर्च तनख्वाह का कुल 30 फीसदी माना गया। कागजात बताते हैं कि यह कर्मचारी 1993 से लेकर 2008 तक बिलासपुर में काम करने के लिए रायगढ़ और कोरबा से रोज आ-जाकर नौकरी करते रहा। और इसी दौरान उसने 1995 से 2008 तक अपनी नौकरी के बाहर संगीत की शिक्षा देना भी बताया है जिससे उसने 8 लाख रूपए से अधिक की कमाई बताई है। इस जांच में इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया गया है कि इस कर्मचारी ने क्या खुद संगीत कहीं सीखा था, क्या वह संगीत सिखाने में सक्षम था, और क्या दूसरे शहर से आना-जाना करते हुए, वह भी विभाग की इजाजत के बिना आना-जाना करते हुए क्या उसके लिए संगीत सिखाना संभव था? 

जानकार सूत्र बताते हैं कि जांच में यह साफ-साफ मिला था कि इस कर्मचारी ने विभाग से न तो ऐसे किसी काम को करने की इजाजत ली थी, और न ही उसने ऐसी कोई कमाई विभाग को बताई थी। जब शासकीय कर्मचारी को आयकर देने के उद्देश्य से सारी कमाई बतानी पड़ती है, तब भी दिनेश दुबे ने ऐसी कोई कमाई नहीं बताई थी। अब अचानक उसने एसीबी जांच में ऐसा दावा किया, और एसीबी ने उसे आंख मूंदकर मान भी लिया है। 

अब जब शिकायत होने के बाद एसीबी के प्रभारी भूपेश बघेल ने सामान्य प्रशासन मंत्री की हैसियत से इस मामले की फाईल बुलवाई है, तो एसीबी में हडक़म्प मचा हुआ है। ऐसा पता चला है कि रातोंरात खात्मा पेश करने वाले एसीबी बिलासपुर के डीएसपी अजितेश सिंह 15 दिनों की छुट्टी पर चले गए हैं ताकि अदालत से लेकर शासन तक के सामने कोई जानकारी देने की नौबत न रहे। यह जांच अजितेश सिंह ने ही की थी, और अभी एसीबी के डीजीपी बी.के. सिंह के आदेश से इस मामले का खात्मा भी उन्होंने ही अदालत में पेश किया है। इस बारे में पूछने पर एसीबी के आईजी का काम देख रहे, एडीजी जी.पी. सिंह ने कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है, और उन्होंने कहा कि यह मामला अदालत में है, इसलिए वे इस पर कुछ कहना नहीं चाहते। एसीबी के सूत्र बताते हैं कि जी.पी. सिंह को परे रखकर ही यह फैसला लिया गया है, और उन्हें भी इसकी जानकारी तब मिली जब खात्मा अदालत में पेश हो चुका था। 

जांच के कागजात बताते हैं कि दिनेश दुबे ने खेती से अपनी कमाई अंधाधुंध बढ़ाकर दिखाई थी, जबकि उस जमीन में परिवार के 9 लोग शामिल हैं, और आयकर कटौती के समय अगर ऐसी आय की घोषणा नहीं की जाती है, तो उसे किसी जांच के समय वैध नहीं माना जाता। 
जांच में एक और साफ गड़बड़ी को अनदेखा किया गया है जिसमें इस कर्मचारी ने एक मकान को 2011 में खरीदना बताया गया है। उसने शासन को सूचित किया था कि यह रकम उसे अपने एक पुराने मकान को करीब 20 लाख रूपए में बेचकर मिली थी, और उससे उसने यह मकान खरीदा। जांच में कागजात से यह साफ हुआ है कि उसने यह मकान दिसंबर 2013 में बेचा था, और नया मकान मार्च 2011 में खरीदा जा चुका था। अब बेचने के पौने तीन साल पहले उस रकम से मकान खरीदना कागजात में ही साबित हो रहा है। लेकिन इस बात को भी जांच में अनदेखा कर दिया गया है। 

इस आरोपी, दिनेश दुबे, की पुत्री विदेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है, लेकिन वहां उसकी फीस, हवाई जहाज से आने-जाने के खर्च को गिना ही नहीं गया है। इसी तरह एक और मकान की खरीदी के लिए रकम कहां से आई इसका कोई खुलासा इस कर्मचारी ने विभाग को नहीं दिया था, लेकिन जांच में उसे भी अनदेखा किया गया है। 

ऐसी और भी बहुत सारी रियायतों के चलते इस कर्मचारी की कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर मान लिया गया है, और उसके खर्च को लगभग गिना ही नहीं गया है। अब यह पूरा मामला मुख्यमंत्री कार्यालय की जांच का विषय बन गया है, और सरकार के बड़े-बड़े लोग इस बात पर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार में पकड़े गए और दस्तावेजी सुबूतों वाले किसी व्यक्ति को बचाने के लिए एसीबी ने इतनी रफ्तार से पूरी तरह गलत कार्रवाई कैसे की है? 


Date : 29-Jun-2019

उत्तरा विदानी-सुरेश नरेडिय़ा

बागबाहरा/ महासमुन्द, 29 जून। महासमुन्द जिले के बागबाहरा विकास खंड के ग्राम टेमरी के दो किसानों के नाम पर फर्जी पट्टा, ऋण पुस्तिका बनाकर सेंन्ट्रल बैंक से हजारों  का कर्ज  किसी अन्य के द्वारा लेने का मामला सामने आया है। चूंकि खसरा नंबर आन लाईन है, इसलिए ऋण पुस्तिका में जब कर्ज की बात सामने आई तो वे हैरान हैं। इनकी जमीन इस वक्त कर्ज नहीं पटाने के एवज बैंक में बंधक है और इससे इन किसानों को कर्ज मिलना भी संभव नहीं है। इनके सामने रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।  
इनका कहना है कि जिन कागजात  से लोन लिया गया है इसमें तहसीलदार, पटवारी, किसान समेत सारे लोगों के हस्ताक्षर फर्जी हैं। ये काम किसका है, यह जांच का मुद्दा है। हैरानी की बात यह भी है कि  लोन देने से पहले बैंक ने इस बात की तफ्तीश भी नहीं की कि किसानों के नाम पर जमा किए गए नो ड्यूज सही हंै अथवा नहीं। 

सेन्ट्रल बैंक महासमुंद के  फील्ड अफसर देवाशीष का कहना है कि बैंक से उन्हें 2014 में कर्ज दिया गया। इसके लिए बकायदा गांव जाकर जमीन देखी गई। सारे कागजात देखे गए। लेकिन लोन लेने वाला फर्जी था, इसकी जानकारी बैंक कैसे कर सकता है। जब इन्होंने लोन लिया तब आनलाईन वर्क नहीं हो रहा था। हाल ही में कम्प्यूटर पर अपडेट करने के बाद किसानों को जानकारी मिली।

इधर किसानों ने थाने में इसकी शिकायत की है। थानेदार का कहना है कि पहले मामले की जांच करेंगे तभी रिपोर्ट लिखेंगे। 
कलेक्टर ने कहा है कि शीघ्र ही मामले की तह तक जाकर किसानों के साथ इंसाफ किया जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। यहां केवल दो किसान ही सामने आये हैं, लेकिन न जाने कितने ही किसानों के साथ इस तरह का आघात हुआ होगा।  
किसान नेक राम, उम्र 30 साल, पिता बिरसिंग, जाति तेली, ग्राम करहीडीह टेमरी कहता है-मेरी भूमि स्वामी हक की पटवारी हल्का नंबर 58-47 , ऋण पुस्तिका क्रमांक 1944384 पर कुल रकबा 1.15 हेक्टेयर भूमि है। जिस पर मेरे फर्जी हस्ताक्षर और ऋण पुस्तिका निकालकर पता नहीं किसने मेरे नाम से सेंट्र्ल बैंक महासमुन्द से 75 हजार रुपये का लोन लिया है। पांच साल के भीतर इसे पटाना है। मेरी आमदनी इतनी नहीं कि मैं कर्ज पटा सकूं। सामने धान की बोआई करना है। इसके लिए मुझे सोसायटी से खाद,बीज,दवाई चाहिए।  जमीन गिरवी हो चुकी है।
मैं अपने बच्चों और परिवार को क्या जवाब दूं और कैसे उनके हिस्से की रोटी बचाऊं। मन तो कर रहा है कि आत्महत्या कर लूं। 

मैंने कभी अपनी औकात से अधिक किसी से कर्ज नहीं लिया। मैं और मेरा परिवार बैंक के इतिल्ला के बाद खाना-पीना छोडक़र सिर्फ इस बात की चिंता में हैं कि हमारे साथ ऐसा क्यों किया गया? मेरे नाम से शपथ पत्र और नो ड्यूज भी है साहब, जिसके बारे में मैं जानता तक नहीं। मेरा हस्ताक्षर मिला लीजिये, नकली है। 

इसी तरह किसान भुलऊ राम उम्र 30 साल पिता बिसहत का कहना है-मेरी भूमि स्वामी हक की ग्राम टेमरी स्थित पटवारी हल्का नंबर 47 खसरा नंबर 5 की 1.37 हेक्टेयर जमीन पर पता नहीं किसने 90 हजार रुपये का ऋण ले रखा है। सेंट्रल बैंक से। बैंक से पत्र आया तो सबसे पहले परिवार वालों ने मुझ पर ही संदेह किया। बाद में पता चला कि इसी तरह नेक राम को कर्ज से लाद दिया गया है, तो परिवार के लोग चुप हुए।  हमारे कागजात का फर्जी नकल, तहसीलदार का फर्जी हस्ताक्षर, पटवारी का फर्जी हस्ताक्षर कर आखिर किसने ऐसा खेल होगा? अब सिर्फ एक ही रास्ता है कि मौत को गले लगा लूं लेकिन इससे मुझे ही गुनाहगार समझेंगे परिवार के लोग। कहेंगे परिवार पालने के डर से आत्महत्या कर लिया।  इन दोनों किसानों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से किसान होने के नाते निवेदन किया है कि मामले की जांच करंे और उनकी जमीन बचा लें।  
 


Date : 15-Jun-2019

कोरिया का उप स्वास्थ्य केंद्र, 4 कुर्सी, 2 खाट, यहीं जचकी
आधा दर्जन गांव के डेढ़ हजार इस पर निर्भर
चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 15 जून (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के ग्राम पंचायत बेलिया के आश्रित ग्राम पलारीडांड़ में संचालित यह उप स्वास्थ्य केन्द्र बीते 12 बरस से इस तरह चल रहा है। आधा दर्जन गांवों के डेढ़ हजार लोग इस पर निर्भर हैं। ग्रामीणों की मानें तो सन 2007 से शुरू इस स्वास्थ्य केन्द्र की सुध लेने कोई नहीं आया है। 

इस संबंध में बीएमओ डॉ आरपी सिंह का कहना है कि यहां के लिए नए भवन की स्वीकृति हो चुकी है लेकिन निर्माण शुरू नहीं हो सका है। फिलहाल वहां पर एएनएम एवं पुरूष स्वास्थ्य कार्यकर्ता के द्वारा टीकारण, मलेरिया जांच एवं अन्य स्वास्थ्य संबंधी सलाह एवं सेवाएं दी जा रही हैं। 

यह उप स्वास्थ्य केन्द्र सुदूर वनांचल ग्राम पलारीडांड़ में स्थित है यह उपस्वास्थ्य केन्द्र कच्चे  खपरैल एवं जर्जर मकान में संचालित है। यहां पर किसी भी भी प्रकार की कोई सुविधाएं नहीं है। महज औपचारिकता बतौर एक बोर्ड जरूर लगाया गया है जिसमें स्वास्थ्य कर्मचारी का नाम एवं उनके द्वारा किए जाने वाले टीकाकरण का समय व दिनांक भर लिखा जाता है। इस उपस्वास्थ्य केन्द्र पर ग्राम कछाड़ी, लोलकी, पलारीडांड़ ठकुरहत्थी जोगिया और मझगवां के लगभग 1500 से अधिक लोग निर्भर हंै। 

चार कुर्सियां, दो खाट
बाहर  एक बोर्ड लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। बाहर कपड़े भी सूख रहे हंै। वहीं अंदर चार कुर्सियां और  दो रस्सी वाली खाट लगा दी गई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रसव जांच कराने अथवा अचानक प्रसव होने की स्थिति में ग्रामीण कैसे करते होंगे? शासन के नियमों पर गौर करें तो उप स्वास्थ्य केन्द्र में मलेरिया, सिकल जांच, प्रसव पूर्व जांच और जरूरत पडऩे पर प्रसव भी कराया जाना होता है। यहां की महिलाओं ने बताया कि क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है। रास्ता भी खराब है, अपातकालीन परिस्थिति में हमें भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।  

नया भवन स्वीकृत पर निर्माण ठंडे बस्ते में 
पलारीडांड़ का उपस्वास्थ्य केन्द्र निजी कच्चे मकान में सचंालित जरूर है लेकिन स्वास्थ्य विभाग की मानें तो इसका किराया विभाग को नहीं देना पड़ता है। पालारीडांड के लिए नया भवन भी स्वीकृत भी हुआ है ,पर इसे सरकारी उदासीनता या लापरवाही  लंबे समय से  निर्माण नही हो पाया है।  

नई सरकार से उम्मीदें
भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में इस पर कोई घ्यान नहीं दिया। सरकार बदलने के बाद ग्रामीणों को एकउम्मीद पुन: जगी है कि  उपस्वास्थ्य केन्द भवन का निर्माण होगा। हांलाकि क्षेत्र के ग्रामीण इसे ग्राम कछाड़ी में बनाने की मांग कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा को इसका लाभ मिल सके। 


Date : 13-Jun-2019

सरकारी बदली पर आबकारी में तबादले का लम्बा खेल, करोड़ों के आरोप से घिरे बाबू की फिर वहीं पोस्टिंग

एसीबी ने पिछले साल पकड़ी थी 5 करोड़ की अवैध कमाई

प्लेसमेंट कर्मचारियों ने बताया था अपने साथियों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार 

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 13 जून।
आबकारी विभाग के जिस बाबू के खिलाफ़ करोड़ों रुपये की अवैध कमाई के आरोप में एंटी करप्शन ब्यूरो ने छापामार कार्रवाई की थी उसे फिर बिलासपुर में पदस्थ कर दिया गया है। कुछ दिन पहले ही आबकारी उपायुक्त ने आयुक्त को रायपुर पत्र लिखकर उसे यहां पदस्थ नहीं करने को लेकर आगाह भी किया था। इसके बावजूद आरोपों से घिरे बाबू को यहां स्थानांतरित कर दिया गया है। 

आबकारी विभाग में मनचाही जगह पर पोस्टिंग का लम्बा खेल चल रहा है। इस खेल में लिप्त लोगों पर सत्ता बदलने का भी असर नहीं हुआ है। 12 जून को आबकारी विभाग के अवर सचिव मरियानुस तिग्गा ने लिपिक दिनेश कुमार दुबे को बिलासपुर स्थानांतरित करने का आदेश जारी किया है। पूर्ववर्ती सरकार में आबकारी विभाग के मंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले बिलासपुर के सहायक आयुक्त आबकारी कार्यालय के सहायक ग्रेड- दो बाबू दिनेश कुमार दुबे की अवैध कमाई की लम्बी चौड़ी शिकायत प्रधानमंत्री से लेकर विभागीय मंत्री व अधिकारियों को तथा एंटी करप्शन ब्यूरो को की गई थी। शिकायत में उसके द्वारा की जा रही अवैध वसूली के तरीकों का खुलासा किया गया था बल्कि यह भी बताया गया था कि उनके दबाव के चलते कई प्लेसमेंट कर्मचारियों को आत्महत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। 

एंटी करप्शन ब्यूरो के तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक अजितेश सिंह ने शिकायतों और उसके साथ मिले दस्तावेजों की जांच की। सही पाये जाने पर बीते साल 12 अप्रैल को उसके ठिकानों पर छापा मारा था। यह पाया गया कि उसने 9 साल की नौकरी में वेतन के रूप में केवल 20 लाख रुपये आहरित किये जबकि उसकी मौजूदा सम्पत्ति 5 करोड़ रुपये से अधिक है। छापेमारी के बाद एसीबी ने उसके खिलाफ़ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा, 13 (1 ई) और 13 (2) के तहत अपराध कायम किया। एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच में बाबू के पास से कुदुदंड में 1200 वर्ग फ़ीट का एक दो मंजिला मकान, एक वर्ग फ़ीट का एक मकान, गंगा नगर में एक आलीशान बंगला, भारती नगर में दो हजार वर्गफ़ीट का मकान, पत्नी के नाम पर चकरभाठा में दो एकड़ जमीन, एसबीआई में चार संयुक्त खाते मिले जिनमें दस लाख रुपए जमा हैं। बाबू दुबे की बेटी यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के दस्तावेज भी हाथ में आये। 

मस्तूरी के पास ग्राम पाराघाट निवासी बाबू दिनेश कुमार दुबे ने  2009 से आबकारी विभाग में लिपिक पद में नौकरी शुरू की थी।  इस हिसाब से 9 साल में वेतन 20 लाख रुपए होता है लेकिन एसीबी ने पाया कि उसके पास लगभग 5 करोड़ की संपत्ति है।

शराब दुकान के कर्मचारियों ने दुबे के खिलाफ़ शिकायत में कई गंभीर आरोप लगाये थे। उन्होंने दुबे को पांच करोड़ नहीं बल्कि 11 करोड़ का आसामी बताया था। सन् 2017 में उसके बैंक खाते का विवरण देते हुए शिकायत हुई। यह बताया गया कि तीन महीने में उसने शासकीय दुकानों से दो करोड़ रुपये से अधिक वसूली की। उसने अपने बेटे-बेटी के नाम पर रिकरिंग खाता खोल रखा है, जिसमें 10 हजार रुपये हर माह जमा होते हैं। नोटबंदी के दौरान कर्मचारियों और भृत्यों के खाते में उसने पांच लाख रुपये से अधिक जमा कराये। फर्जी परमिट देकर लाखों रुपये लेना और शासन को करोड़ों का नुकसान पहुंचाने की शिकायत  भी उसके खिलाफ है। 

इसके अलावा ट्रांसपोर्टरों से लाखों रुपये की रिश्वत तथा कमीशन का आरोप भी कर्मचारियों ने दुबे पर लगाया। शिकायत यह भी थी कि एक भाजपा कार्यकर्ता के साथ सरकारी वाहनों में बैठकर दुबे यह वसूली करता है। 

एक अन्य शिकायत में कर्मचारियों ने दुबे के साथ-साथ तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी एल.एल. ध्रुव के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की मांग की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि उन पर दुकान बंद होने और खुलने से पहले अधिक दाम पर शराब बेचने के लिए दबाव डाला जाता है। ऐसा नहीं करने पर नौकरी से निकालने और जेल भेजने की धमकी दी जाती है। प्लेसमेंट कर्मचारियों ने कहा था कि इनके दबाव के चलते कई कर्मचारी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने इन दोनों अधिकारियों, कर्मचारियों को हटाने की मांग की थी। 

दुबे को फिर बिलासपुर में पदस्थ किये जाने की जानकारी मिलने पर सहायक आयुक्त कार्यालय के सभी अधिकारी कर्मचारियों ने सहायक आयुक्त को ज्ञापन देकर दुबे को यहां पदस्थ नहीं करने की मांग रखी। इस पर बीते 24 मई को सहायक आयुक्त ने आयुक्त को पत्र लिखकर आवश्यक कार्रवाई के लिए अनुशंसा सहित लिखा। कर्मचारियों, प्लेसमेंट कर्मचारियों और आबकारी विभाग के बिलासपुर में पदस्थ प्रभारी अधिकारी के विरोध के बावजूद भ्रष्टाचार, अवैध वसूली की गंभीर शिकायतों से घिरे लिपिक दुबे को यहां पदस्थ कर दिया गया है, जिससे मालूम होता है कि आबकारी विभाग में तबादले का लम्बा खेल शुरू हो चुका है। 


Date : 10-Jun-2019

हाथियों को हक देने कोरबा जिले में एलिफेंंट रिजर्व पर राज्य का विचार
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 10 जून।
हाथियों की समस्या  निपटाने के लिए सरकार ठोस कार्ययोजना तैयार कर रही है। इस कड़ी में बरसों से लंबित कोरबा के लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने पर विचार हो रहा है। खास बात यह है कि करीब 8 सौ वर्ग किमी का यह इलाका घना जंगल है और कोयला खदानें भी हैं। यह सब देखकर पिछली सरकार एलीफेंट रिजर्व पर रूचि नहीं ले रही थी। 

विधानसभा के बजट सत्र में भी अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने लेमरू एलीफेंट रिजर्व के प्रस्ताव पर भी जानकारी चाही थी। यह विषय विधानसभा के प्रश्न-संदर्भ समिति के पास है। समिति ने इसको लेकर सरकार से जानकारी भी ली है, लेकिन वनमंत्री मोहम्मद अकबर ने 'छत्तीसगढ़' से चर्चा में सिर्फ इतना ही कहा कि हाथियों की समस्या गंभीर है और इस पर कैबिनेट में चर्चा होगी। 

माना जा रहा है कि हाथियों की समस्या के गंभीर रूप धारण करने के बाद अब कैबिनेट इसके निराकरण की दिशा में कोई ठोस फैसला ले सकती है। हाल यह है कि हाथी अब रायपुर शहर की सीमा तक पहुंच गए हैं। जशपुर-सरगुजा, कोरिया और कोरबा में हाथियों का उत्पात जारी है। अब तक कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि यह समस्या इसलिए भी गंभीर हो रही है कि प्रदेश में एलीफेंट रिजर्व नहीं है। जबकि केन्द्र सरकार ने वर्ष-2007 में कोरबा का लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व करने की घोषणा की थी, लेकिन राज्य सरकार का रूख सकारात्मक नहीं रहा। यही वजह है कि एलीफेंट रिजर्व अधिसूचित नहीं किया जा सका। 

सरकार बदलते ही अब प्रदेश में हाथियों की समस्या से निपटने के लिए चिंतन-मनन का दौर चल रहा है। बताया गया कि खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस सिलसिले में बैठक भी ले चुके हैं। बैठक में वनमंत्री मोहम्मद अकबर के साथ-साथ मुख्य सचिव सुनील कुजूर और अन्य अफसर भी थे। सूत्र  बताते हैं कि श्री बघेल ने लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने के पुराने प्रस्ताव पर गहन मंत्रणा भी हुई है। 

सरकार और वन्यप्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व बनाने से हाथियों की समस्या से काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। हसदेव अरण्ड के इस इलाके में भरपूर पानी है। इससे हाथियों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। मगर, इसको लेकर कई तरह की दिक्कतें भी हैं। यह पूरा इलाका कोयले से भरा पूरा है। एसईसीएल की तीन खदानें हैं। इसमें से दो बंद हो चुकी है और एक खदान चालू है। चूंकि यहां अंडरग्राउंड माइनिंग हो रही है इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं है। मगर, कई और खदानों के लिए निजी कंपनियों को पीएल दिया जा चुका है। ऐसे में एलीफेंट रिजर्व बनाना आसान नहीं है। इसको लेकर कंपनियों का भी काफी कुछ दबाव रहेगा।

बताया गया कि केन्द्र के प्रस्ताव के बाद एलीफेंट रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया भी रमन सरकार में शुरू हुई थी। खनन संभावनाओं को देखते हुए लेमरू वनपरिक्षेत्र के 817 वर्ग किमी क्षेत्र को घटाकर 4 सौ किमी कर दिया गया था। बाद में यह भी प्रस्ताव अधिसूचित नहीं किया जा सका। चर्चा है कि कंपनियों के दबाव की वजह से ऐसा नहीं हो पाया है। मगर, भूपेश सरकार अब पुराने प्रस्ताव के मुताबिक ही एलीफेंट रिजर्व बनाने की दिशा में काम कर रही है। इस सिलसिले में कोरबा डीएफओ से वनविभाग ने जानकारी भी बुलाई है और कोरबा डीएफओ में आंकड़ों समेत तमाम जानकारियां भेज भी दी गई है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में लेमरू वनक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने का वादा किया था। सरकार अब इस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। इस पर जल्द ही फैसला होने की उम्मीद है।  


Date : 08-Jun-2019

अपनी जमीन पर तालाब बना दान 

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 8 जून (छत्तीसगढ़)। एक-एक इंच जमीन के लिए रिश्तों में आज जहां कड़वाहट आ जाती है वहीं ग्राम पकरिया के तीन भाईयों ने लगभग 10 लाख रुपये खर्च कर गांव के लोगों की आम निस्तारी के लिए अपनी 4 एकड़ जमीन पर तालाब बना दिया। आज इस तालाब की  पूजा अर्चना की गई और इसका गवाह पूरा गांव बना। 

तखतपुर से 6 किलोमीटर दूर ग्राम पकरिया में बिना किसी सरकारी मदद के गांव के लोगों की आम निस्तारी के लिए तालाब खोदवाने का अनुकरणीय कार्य गांव के ही ठाकुर परिवार ने किया। शिक्षक  रामस्नेही क्षत्री, अधिवक्ता रवि क्षत्री व कृषक रामू क्षत्री गांव में हर वर्ष होने वाले जल संकट से रूबरू हुआ करते थे। गांव में मात्र एक सरकारी तालाब है। इस तालाब में गर्मी आते-आते सूख जाता था। इसके बाद गांव में ग्रामीणों और जानवरों के लिए आम निस्तारी के लिए समस्या खड़ी हो जाती थी। गांव में संसाधन पानी की कम हो जाने के कारण ग्रामीण परेशान हो जाते थे। 

इस तकलीफ को देखते हुए तीनों भाईयों ने लगभग तीन साल पहले निर्णय लिया कि गांव में लोगों को आम निस्तारी की पानी की समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए गांव में ही तालाब का निर्माण कराया जाए। इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए पिछले तीन वर्षों से लगातार  प्रयास चल रहा था। पकरिया तखतपुर मुख्य मार्ग पर ही इनकी 4 एकड़ जमीन है, जिसकी कीमत वर्तमान में 50 लाख रूपये है। इस कीमती जमीन को उन्होंने तालाब के खोदने के लिए चयन किया।  इस जमीन को पिछले तीन साल गांव के ही मजदूरों को रोजगार भी उपलब्ध कराया। कुछ कार्य जेसीबी से करवाकर तालाब को तैयार कराया गया। आज 2019 में जून माह में तालाब तैयार हो गया, जिसकी पूजा अर्चना पूरे विधि-विधान से की गई। इस तालाब में पानी भरने के बाद गहराई का पता चल सके इसके लिए लगभग 30 फीट लकड़ी का खम्भा 6 जून को बिलासपुर से लाया गया। इसे बीच तालाब में पूजा अर्चना के बाद लगाया गया। तालाब की गहराई पता करने का यह पारम्परिक तरीका है। पूजा-अर्चना में मुख्य यजमान रागिनी रवि क्षत्री थीं। पुजारी रघुनंदन दीवान ने पूजा अर्चना  पूरी कराई। 

ठाकुर परिवार के तीन भाई रामस्नेही, रवि और रामू ने मिलकर एक परोपकार की एक मिसाल कायम की। उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के अपनी जेब से ही पैसे खर्च कर तीन साल में इस तालाब का निर्माण करवाया जिसमें लगभग 10 लाख रूपये खर्च हो गए। पर आज इस बात को लेकर वे राहत महसूस कर रहे हंै कि वे आने वाली उनकी पीढ़ी को हमेशा गांव वाले इस बात के लिए भी याद रखेंगे।  

सरई का खम्भा क्यों?
नये तालाब में जो खम्भा लगाया जाता है वह सरई की लकड़ी का होता है। ऐसी मान्यता है कि सरई तालाब के पानी को  शुद्ध रखता है और जो भी पानी में गंदगी होती है उसे यह सरई की लकड़ी  सोंख लेती है।

 


Date : 25-May-2019

सुप्रीम कोर्ट से मंजूर कैम्पा के करोड़ों रुपयों की अफसरों ने की राजधानी रायपुर में बर्बादी और अफरा-तफरी

तिलक देवांगन
रायपुर, 25 मई (छत्तीसगढ़)।
महाराजबंध तालाब के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के नाम पर वन विभाग ने साढ़े 5 करोड़ रूपए फूंक दिए, पर काम पूरा नहीं हो पाया। हाल यह है कि वन विभाग निर्माण कार्य को पूरा बताकर तालाब को नगर निगम को सौंपने के लिए तैयार है, लेकिन निगम उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। निगम का कहना है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी काम थोड़ा बहुत ही हुआ है। निगम के पदाधिकारी इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। यह पूरा मामला देश में पेड़ों की कटाई के एवज में सुप्रीम कोर्ट में जमा कराई गई रकम का है जो कि राज्यों को वृक्षारोपण के लिए कैम्पा योजना के तहत आबंटित की जाती है।

करीब डेढ़  साल पहले वन विभाग ने कैम्पा मद की राशि से शहर के महाराजबंध तालाब के लिए करीब साढ़े 7 करोड़ मंजूर कर वहां संरक्षण, संवर्धन व सौंदर्यीकरण का काम शुरू कराया था, लेकिन अधिकांश काम अब भी अधूरे पड़े हैं। खासकर तालाब सफाई, गार्डन, नाली, चारदीवारी, पाथवे, लाइटिंग, ड्रेनेज सिस्टम, घाट निर्माण, बैठक व्यवस्था व टायलेट, पानी शुद्धिकरण उपकरण काम अभी भी अटका हुआ है। जबकि इस तालाब का संरक्षण, सौंदर्यीकरण तेलीबांधा तालाब की तरह होना था। तत्कालीन वन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने उस समय पद पर काबिज सीसीएफ अरुण पांडेय व रायपुर डीएफओ उत्तम गुप्ता को बुलाकर जमकर फटकार लगाई थी। उन्होंने लोगों और निगम पदाधिकारियों की शिकायत पर स्वीकृत राशि से तालाब संरक्षण और सौंदर्यीकरण का काम समय पर पूरा करने के निर्देश दिए थे, पर वन विभाग ने इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं कराया। जमीनी स्तर पर तालाब का हाल बेहाल हो गया है। 

बताया गया कि जानकारी के मुताबिक तालाब सौंदर्यीकरण के लिए कैम्पा मद से करीब 7 करोड़ 41 लाख खर्च की योजना बनाई थी। इस पर 5 करोड़ से अधिक रुपये खर्च कर दिए गए हैं। दिसंबर 2018 तक की जानकारी के हिसाब से मंजूर राशि में से करीब पौने 3 करोड़ खर्च होना बाकी है। तत्कालीन वन मंत्री, विधायक श्री अग्रवाल को तालाब सौंदर्यीकरण में भारी गड़बड़ी की शिकायत मिली है। दूसरी ओर लगातार शिकायत के बाद वन विभाग ने अब नगर निगम को एक पत्र लिखकर तालाब को वापस निगम को सौंपने की बात कही है। पत्र में कहा गया है कि तालाब सौंदर्यीकरण को लेकर विवाद चल रहा है, ऐसे में वहां आगे काम कराना मुश्किल है, पर निगम फिलहाल तालाब को अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। निर्माण कार्यों पर एनजीटी की रोक भी लगी हुई है। 

निगम जोन-6 कमिश्नर विनय मिश्रा का कहना है कि निगम पदाधिकारियों, पार्षदों व क्षेत्र के लोगों की शिकायत मिल रही है कि तालाब का काम पूरा नहीं हो पाया है। दूसरी ओर वन विभाग, तालाब का काम पूरा कराने के बजाय उसे वापस निगम को सौंपने की तैयारी में है। निगम कमिश्नर को वहां से एक पत्र भी लिखा गया है, जिसमें विवाद के चलते काम पूरा न कराने और निगम को सौंपने की बात कही गई है। उनका कहना है कि तालाब में करोड़ों रुपये फूंक दिए गए है, पर वहां काम पूरा नहीं हो पाया है। ऐसे में निगम फिलहाल उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि निगम की ओर से वहां फिर से करोड़ों रुपये खर्च किए जाएंगे। 

निगम जोन छह अध्यक्ष सालिक सिंह ठाकुर का आरोप लगाते हुए कहना है कि तालाब सौंदर्यीकरण में भारी गड़बड़ी हुई है। तालाब के तीन ओर पाथवे का काम भी पूरा नहीं हो पाया है। लाइटिंग, नाली अधूरी है। लोहे की लगी ग्रिल पुरानी हो चुकी है या जंग लगकर टूट रही है। जलकुंभी ऊपर से हटा दिए गए हैं। तालाब सीमांकन का काम पूरा नहीं हो रहा है। वन विभाग को सीमांकन करा कब्जा हटाने की मांग की जा रही है, पर वहीं से प्रतिवेदन नहीं भेजा जा रहा है। ऐसे में तालाब के एक ओर कब्जा बना हुआ है। नाप-जोख के हिसाब से जिस ओर कब्जा है, वहां तालाब में 20 फीट तक कब्जा है।  उनका कहना है कि वन विभाग आधे-अधूरे सौंदर्यीकरण वाले तालाब को निगम को सौंपने का प्रयास कर रहा है, लेकिन निगम उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना है कि वहां करीब साढ़े  5 लाख खर्च किए गए हैं, पर काम कहीं नहीं दिख रहा है। ऐसे में निगम को वहां सौंदर्यीकरण व अन्य कार्यों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे और निगम ऐसा नहीं चाहता। उन्होंने तालाब सौंदर्यीकरण व सीमांकन आदि में गड़बड़ी की जांच की मांग की है। 

 


Date : 22-May-2019

शिकायत के बाद आईटी ने सवा सौ एकड़ जमीन अटैच की

विशेष संवाददाता
रायपुर, 22 मई (छत्तीसगढ़)।
आयकर विभाग ने बेनामी पूंजी निवेश को पकडऩे की एक बड़ी कार्रवाई करते हुए रायपुर के एक बड़े कारोबारी पगारिया परिवार की बेनामी जमीनों को जब्त किया है। इस परिवार ने आदिवासियों की जमीनों को अपने परिचित आदिवासियों के नाम पर खरीदा, और उसे अपने कब्जे में भी रखा। बेनामी पूंजी निवेश का यह ऐसा बड़ा मामला है जिसमें राजनीतिक प्रभाव से होने वाली कमाई से ये जमीनें खरीदने की बात जांच में स्थापित हुई है। आयकर विभाग की कार्रवाई में अभी दो आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई ऐसी करीब 14 करोड़ रूपए की जमीन पकड़ाई है। और इन दो आदिवासियों ने एक लखेश्वर बघेल मौजूदा कांग्रेस विधायक हैं, और बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी हैं। दूसरे आदिवासी, राजेश कर्मा एकदम ही गरीब किसान हैं जिसके नाम पर करोड़ों की जमीन खरीदी गई है। इन तीनों नामों से कई जिलों में खरीदी गई 136 एकड़ से अधिक जमीनें आयकर विभाग ने अटैच कर ली हैं।

रायपुर के उपमहापौर रहे, और मैट्स यूनिवर्सिटी के चांसलर गजराज पगारिया, और उनके छोटे भाई सुशील पगारिया ने अपने अलावा अपनी मां की ओर से भी ऐसी बेनामी जमीनें खरीदी थीं। आयकर विभाग को शिकायत मिलने के बाद जब जांच की गई तो पाया गया कि पारिवारिक संपत्ति बंटवारे में रायपुर के जिला न्यायाधीश की अदालत में जो बंटवारानामा दस्तखत किया गया, उसमें भी इन सारी आदिवासी जमीनों को आपस में बांटा गया, और अदालत के डिक्रीनामे में ऐसी सारी आदिवासी जमीन सुशील पगारिया के हिस्से में दे दी गई। 
आयकर विभाग द्वारा अटैच की गई जमीनों में से सौ एकड़ से कुछ कम जमीन लखेश्वर बघेल के नाम की है, 25 एकड़ से कुछ अधिक जमीन स्व. ईश्वरी बघेल के नाम की है, और 18 एकड़ से अधिक जमीन राजेश कर्मा के नाम की है।

जानकार सूत्रों के मुताबिक आयकर विभाग की जांच में सुशील पगारिया ने बताया कि पारिवारिक-कारोबारी विवाद में मां और भाई की लिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर उसे जेल में रखा गया था। उसके जेल में रहते हुए ही गजराज पगारिया और उनकी मां ने एक बंटवारानामा तैयार करके जिला न्यायाधीश की एक जिला अदालत में पेश किया, और सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत के लिए जेल से एक जिला अदालत लाया गया। इस बंटवारेनामे में सैकड़ों जमीनों के खसरा नंबर थे जिन्हें बांटा गया था, और मौके पर ही सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत करने पड़े। बाद में जेल से छूटने पर उन्होंने यह पाया कि आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों को बड़े भाई ने सुशील के नाम पर ही डाल दिया। 

इसके बाद आयकर विभाग की एक जांच में सुशील पगारिया ने यह बेनामी पूंजी निवेश मंजूर भी किया। 

बस्तर जिले की तहसील बस्तरनार में एक आदिवासी राजेश कर्मा से आयकर विभाग ने उनके नाम पर दर्ज कई जमीनों के बारे में पूछताछ की। इस पर राजेश कर्मा ने एक से अधिक तरह के बयान विभाग को दिए जिसमें एक में उन्होंने इन जमीनों को अपना नहीं माना, और बयान में कहा कि उनकी सालाना आय कुल दस हजार रूपए है, और उन्होंने बैंक के अपने खाते का भी कभी उपयोग नहीं किया है। उन्होंने विभाग को दिए गए बयान में कहा कि न तो उनकी आय करयोग्य रही, न ही उन्होंने कभी आईटी रिटर्न भरा, और न ही उनके पास पैन है। 

वे थोड़ी सी खेती और महुआ बीनकर काम चलाते हैं, और खुद कोई जमीन नहीं ले पाए हैं। उन्होंने बयान में बताया कि उनके पिता गरीबी रेखा के नीचे दर्ज हैं, और उन्हें इंदिरा आवास, सरकारी गैस कनेक्शन मिला है। राजेश कर्मा ने पुरखों की तीन एकड़ जमीन के अलावा अपने पास कोई भी जमीन होने से मना कर दिया था। 
लेकिन आयकर विभाग को दिए गए एक बयान के बाद अपने वकील की तरफ से उन्होंने उनके नाम पर खरीदी गई जमीन अपनी होने का दावा किया, जिसे आयकर विभाग ने मानने लायक नहीं पाया, और ऐसी जमीनों को अटैच कर लिया। 

इस मामले में गजराज पगारिया के छोटे भाई सुशील पगारिया का भी एक लंबा बयान आयकर विभाग ने लिया है जिसमें उन्होंने खुलासे से आदिवासी जमीनों को लेने की जानकारी दी है, और बहुत सी सनसनीखेज बातें भी हलफनामे पर विभाग को बताई है। सुशील पगारिया ने बताया कि गजराज पगारिया के साथ उनका एक संयुक्त कारोबार रहा है, और दो नंबर के पैसों से उनके परिवार ने लखेश्वर बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर आदिवासी जमीनें खरीदी हैं। उन्होंने आयकर जांच में बताया कि चूंकि वे आदिवासी जमीन कानूनन नहीं खरीद सकते, इसलिए उनके परिवार ने नगद भुगतान करके लखेश्वर बघेल, श्रीमती भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर  ऐसी जमीनें खरीदीं। सुशील पगारिया ने बताया कि उनका पारिवारिक व्यवस्थापन विलेख रायपुर की अदालत में पेश किया गया था, और उसमें भी इन जमीनों का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि वे इन जमीनों की पूरी सूची खसरा-रकबा सहित विभाग को दे रहे हैं। 

सुशील पगारिया ने विभाग के सवाल के जवाब में हलफनामे पर आयकर को कहा  कि इन जमीनों के लिए नगद रूपया राजनीतिक रूप से की गई अघोषित कमाई से आया है। सुशील ने बताया कि उनके बड़े भाई गजराज पगारिया राजनीति में हैं, जनता कांग्रेस दल (जोगी) के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी हैं, और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करते हैं। सुशील पगारिया ने यह भी कहा कि गजराज पगारिया 1994 से 1999 तक रायपुर के उपमहापौर थे। इन सब कामों से इनके पास बड़ी मात्रा में नगद रकम इक_ा हुई, और इसका कोई हिसाब नहीं है। इन्हीं नगद रूपयों से वे आदिवासी जमीनें आदिवासियों के नाम पर खरीदी गईं। इस बयान में कहा गया कि 1994 से लेकर 2004 तक इस तरह कमाई गई रकम से आदिवासी जमीनें खरीदी गईं। 
आयकर विभाग को दिए बयान में सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि गजराज पगारिया पहले 1990 से 1994 तक कांग्रेस नेता श्री विद्याचरण शुक्ल के साथ रहे, फिर पांच साल रायपुर के उपमहापौर रहे, और इस पूरे दौर में उन्होंने नगद सृजन किया। बाद में जोगी कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे, और वहां भी नगद सृजन का बहुत बड़ा काम हुआ। उन्होंने बताया कि लखेश्वर बघेल से उनके परिवार का बहुत अच्छा संबंध है, और लखेश्वर बघेल पगारिया परिवार की ही एक रिहाइशी इमारत महावीर प्लाजा में रहते हैं। 

सुशील पगारिया ने आयकर विभाग को बताया कि अदालत में 2017 में पारिवारिक संपत्ति के व्यवस्थापन की डिक्री हो जाने के बाद भी जमीनों के कागजात गजराज पगारिया ने उन्हें नहीं दिए हैं, इसलिए वे विभाग को कागजात नहीं दे सकते। सुशील पगारिया ने बताया कि बंटवारे के समय वे जेल में थे, और गजराज पगारिया, उनकी मां ने बंटवारे के कागज बनवाए थे, उन्हें इस पर दस्तखत करने के लिए जेल से सीधे लाया गया था, इसलिए उन्हें यह मालूम भी नहीं था कि अदालत से आदिवासी जमीन की जानकारी छुपाकर, उसे फैसले में रखवाकर अदालत को गुमराह किया गया है। ऐसी जमीनें बस्तर के अलावा महासमुंद जिले में भी लखेश्वर बघेल के नाम पर जमीन खरीदी गई है, लेकिन इनके कागज गजराज पगारिया के पास ही हैं। 

आयकर विभाग ने सुशील पगारिया से नगद रकम आने और उसे रखने के बारे में भी कई सवाल किए। सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि जिन आदिवासियों के नाम पर जमीनें खरीदी गईं उसमें उन आदिवासियों का कोई पैसा नहीं लगा है। 

विभाग को गजराज पगारिया की ओर से दिए गए लिखित जवाब में कहा है कि वे चूंकि राजनीति में सक्रिय रहे, इसलिए उन्होंने कारोबार चलाने का जिम्मा (इस केस के शिकायतकर्ता, अपने छोटे भाई सुशील पगारिया को दे दिया था।) उन्होंने विभाग को अपने वकील की तरफ से तैयार किए गए अंग्रेजी के एक लंबे जवाब में यह भी कहा कि आज उनका भाई सुशील पगारिया इस मामले का शिकायतकर्ता है, लेकिन हकीकत यह है कि इन जमीनों की सुशील पगारिया द्वारा खरीदी की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि पारिवारिक बंटवारे में सुशील पगारिया ने इन जमीनों को जुड़वाया। गजराज पगारिया ने विभाग को एक जवाब में कहा है कि बंटवारे में लिखित शर्तों से यह साफ होता है कि ये जमीनें न केवल शिकायकर्ता सुशील पगारिया के मालिकाना हक की हैं, बल्कि शुरू से ही उनके कब्जे में भी है, और उनसे गजराज पगारिया का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने किसी भी बेनामी संपत्ति से अपने किसी भी रिश्ते की बात नकार दी है। 

राजेश कर्मा ने बाद में एक हलफनामा देकर अपने नाम पर बताई गई सारी संपत्ति को अपना कहा और यह कहा कि आयकर विभाग ने उनका जो बयान लिया था उसे वह पूरी तरह समझे बिना दे चुके थे, और इस हलफनामे से वे इस सारी संपत्ति को अपना खरीदा हुआ बता रहे हैं। 

कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने आयकर विभाग को दिए गए हलफिया बयान में कहा कि वे चुनाव आयोग के समक्ष अपनी सारी संपत्ति का हलफनामा 2018 में दे चुके हैं, और उसके अलावा उनके पास कोई भी और चल-अचल संपत्ति नहीं है। लखेश्वर बघेल ने सुशील पगारिया के हलफनामे की बातों को गलत कहा है, और कहा है कि उन्होंने उनके और पत्नी के नाम की सारी जमीनों को अपनी पारिवारिक कमाई से खरीदा है। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि पगारिया परिवार के बंटवारे में उनकी संपत्तियों को दिखाना कोई साजिश है, और वे उसके खिलाफ अलग से मुकदमा करेंगे। 

फिलहाल विभाग ने लखेश्वर बघेल, उनकी पत्नी स्व. भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर खरीदी गई ऐसी सारी संपत्ति जिसका जिक्र पगारिया परिवार के बंटवारे में सुशील पगारिया को देने का किया गया है, उसे अटैच कर लिया है। 

सुशील पगारिया का कहना है कि...
आयकर विभाग की इस कार्रवाई के बारे में पूछने पर सुशील पगारिया ने इस अखबार ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि जब वे जेल में बंद थे, और कैंसर से बुरी तरह पीडि़त थे, मुंबई में उनका कैंसर का इलाज चल रहा था, तब उन्हें अचानक अदालत बुलाकर संपत्ति का बंटवारा दस्तखत करवाया गया था। ये कागज उन्होंने पहले नहीं देखे थे इसलिए उनको इसमें आदिवासी जमीन उनके हिस्से में डाल देने की जानकारी भी नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे पिछले कई बरस से कैंसर के शिकार हैं, और दुबारा इलाज के लिए जब उन्हें यहां से डॉक्टर मुंबई भेज रहे थे, तब उनके बड़े भाई गजराज पगारिया और उनकी मां ने इलाज के लिए भी उनकी जमानत का विरोध किया था और हाईकोर्ट तक में अपने वकील खड़े किए थे। अब जब अदालत से बंटवारा हो गया है, तो भी गजराज पगारिया किसी संपत्ति के कोई कागज उन्हें नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने तमाम बातें सच-सच आयकर विभाग को शपथपत्र पर बता दी हैं, और हर सवाल का जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे में बेनामी आदिवासी जमीनों को बड़े भाई और मां ने उनके (सुशील पगारिया के) हिस्से में डाल दिया है, और यह बात पता लगते ही उन्होंने खुद ही इसे आयकर को बताया है, और हाईकोर्ट में भी इसके खिलाफ शिकायत की है कि अदालती बंटवारे में ऐसा किया गया है। उन्होंने कहा कि जिस अदालत में बंटवारा हुआ, उसे भी गजराज पगारिया ने अंधेरे में रखा और वहां सच को छुपाया।


Date : 08-May-2019

अतुल पुरोहित

भोपाल, 8 मई (छत्तीसगढ़)। देश में चार चरणों के मतदान के बाद भोपाल संसदीय सीट देश की सबसे चर्चित सीट में से एक है। भारतीय जनता पार्टी का फोकस अब इसी सीट पर ज्यादा है। यही वजह है कि संघ की आंतरिक रिपोर्ट के बाद भाजपा ने बड़े नेताओं को भोपाल संसदीय क्षेत्र में उतार दिया है। जो गली-गली जाकर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। हाल ही में संघ और भाजपा नेताओं की बैठक के बाद गुजरात के प्रभारी ओम माथुर को भोपाल चुनाव की कमान सौंपी गई है। जबकि यहां प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे पहले से चुनाव में जुटे हैं। 

मप्र में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के इकमात्र ऐसे नेता हैं, जो अभी तक 150 से ज्यादा सभाएं कर चुके हैं। संघ के दखल के बाद तय हुआ कि शिवराज दिन में दूसरी संसदीय क्षेत्रों में प्रचार करेें, जबकि शाम को प्रज्ञा के समर्थन में भोपाल में सभाएं कर रहे हैं। प्रदेश में पहले एवं दूसरे चरण की 13 सीटों पर मतदान हो चुका है। अब से इन क्षेत्रों में काम कर रहे भाजपा नेता भी भोपाल में समय देंगे।

भाजपा के मोर्चें अभी तक दूसरे संसदीय क्षेत्रों में काम कर रहे थे, लेकिन आज से भाजयुमो, महिला मोर्चा, अल्पसंख्यक मोर्चा, अजा-अजजा मोर्चा, पिछड़ा वर्ग मोर्चा भी सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार में जुट रहे हैं। 

भोपाल से प्रज्ञा भारती का नाम तय होने के बाद भाजपा कार्यकर्ता असंतुष्ट होकर घर बैठ गए। पिछले कुछ दिनों तक भाजपा कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता थी, लेकिन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे द्वारा ब्लॉक स्तर पर बैठक लेने के बाद स्थानीय विधायक, पदाधिकारियों को मैदान में उतार दिया है। इसके बाद से विधयाक, पार्षद एवं अन्य पदाधिकारी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर घूम रहे हैं। बूथ स्तर पर बैठकों का दौर जारी है। 

आज पार्टी अध्यक्ष अमित शाह खुद यहां साध्वी के पक्ष में प्रचार करने आएंगे। वे यहां एक बड़ा रोड शो भी करेंगे। इस दौरे को खास और वोटर्स तक अपनी सीधी पहुंच बनाने के लिए बीजेपी ने स्पेशल 5 की टीम बनाई है, जो विभिन्न समीकरणों के अनुसार तमाम रणनीतियां निर्धारित करेंगे। ये स्पेशल 5 की टीम राष्ट्रीय उपाध्यक्षों की है, जिसमें प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे, गुजरात प्रभारी ओम प्रकाश माथुर, प्रभात झा, स्टार प्रचारक शिवराज सिंह चौहान और स्टार प्रचारक उमा भारती शामिल हैं, जो भोपाल पर अपने पूरी नजर जमाए हुए हैं। वहीं शाह के रोड शो को सफल बनाने के लिए बीजेपी राष्ट्रीय महासचिव और  प्रभारी अनिल जैन को जिम्मेदारी सौंपी गई हैं। हालांकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और गुजरात प्रभारी ओम प्रकाश माथुर तो पहले ही भोपाल में डेरा डाल लिया है, वे अब चुनाव होने तक मध्य प्रदेश में रहेंगे। 

 


Date : 07-May-2019

गोरेलाल तिवारी
अनुदान योजना का लाभ राजादेवरी कसडोल विकासखण्ड का वनों से आच्छादित राजादेवरी के 42 गांव तथा अभ्यारण्य क्षेत्र के 15 ग्रामों में छुटपुट हुई रबी फसल धान की हरियाली स्वाभाविक रूप से देश के उन्नत प्रांत पंजाब को याद दिलाती है ।उक्त क्षेत्र की हरियाली जहां भीषण तपन पर ठंडकता आत्मा को तृप्त करती है वहीं पूरे क्षेत्र की हरियाली अच्छी फसल की जगी उम्मीद ने किसानों को प्रफुल्लित कर दिया है। 
कसडोल, 7 मई।  विकास खण्ड के 230 ग्रामों जिसमें नगरपंचायत कसडोल एवम टुंड्रा सहित 110 ग्राम पंचायत शामिल हैं। इसमें राजादेवरी क्षेत्र के 42 गांव तथा अभ्यारण्य क्षेत्र बार कोठारी के करीब 15 गांव में रबी फसल धान की खेती हुई है। क्षेत्र में अनाज की रबी फसल धान ,गेहूं की खेती के अलावा दलहन तिलहन की खेती पर भी किसानों ने ध्यान दिया है। 

कृषि विभाग  के अनुसार कसडोल क्षेत्र में 11हजार एकड़ में धान की खेती के अलावा करीब 3हजार एकड़ से अधिक कृषिभूमि में गेहूं की फसल किसानों ने लिया है । गेहूं के फसल की कटाई मिजाई का काम सम्पन्न हो गया है । कृषि विभाग ने कहा है कि दलहन तिलहन की भी करीब 1500 एकड़ में खेती होने का अनुमान है । इसमें मैदानी क्षेत्रों के ग्राम मोहतरा चरौता छेछर ,भडरा,सिनोधा ,कोसमसरा सेमरिया मालिडीह नवापारा नारायणपुर खैरा, बरबसपुर आंवराई अर्जुनी आदि करीब 50 ग्रामों में भी छुटपुट दलहन तिलहन के अलावा गेहूं धान की खेती हुई है । एक अनुमान के अनुसार मैदानी क्षेत्रों के ग्रामों जिसमें टुंड्रा इलाके के कुछ ग्राम भी शामिल है एक हजार से अधिक कृषि भूमि में धान की खेती हुई है ।

धान की हरियाली 
कृषि विकास खण्ड कार्यालय से मिंली जानकारी के अनुसार कसडोल विकास खण्ड क्षेत्र के राजा देवरी 42 गांव तथा बार कोठारी अभ्यारण्य क्षेत्र के बार ,चरौदा,मुड़पार ,पांडादाह ,दोन्द ,लाटा दादर ,मोहदा, ढेबी, ढेबा, लोरिद खार ,अकलतरा देवगांव गबोद आदि करीब 15 ग्रामों में भी रबी फसल धान की खेती किया गया है । उक्त ग्रामों सहित राजादेवरी क्षेत्र के 42 गांव में कई गई सर्वेक्षण किसानों से की गई जानकारी तथा कृषि विभाग ने 10 हजार एकड़ से अधिक कृषि भूमि में रबी फसल धान की खेती हुई है । 

पूरा राजा देवरी क्षेत्र की मनमोहक हरियाली तपती धूप में ठंडक हवा शुकुन देने लगती है । राजदेवरी 42 गांव जोंक नदी के बीचों बीच दो भागों में बंटी हुई है । जिसके पूर्वी जोंक के अंतर्गत थरगांव कुशगढ़ ,कुशभांठा ,बरपानी, सोनपुर नगरदा नगेड़ी ,नगेड़ा,छाता बिलारी ,कुरमाझर आदि पंचायतों सहित 20 गांव करीब आते हैं । इसी तरह पश्चिमी जोंक के अंर्तगत चांदन देवरी, देवगांव, बाघमाडा, देवरूनग छतवन रिकोकला अमरूवा दुमरपाली रंगोरा चेचरापाली ,बया कोसम सरा, धमलपुरा,कोरकोटी पंचायत सहित 22 गांव आते हैं । हालात का जायजा लेने पर उन्नत कृषक विजय बरिहा ,इंद्रजीत पटेल ग्राम देवगांव ,मुन्नालाल नायक ,घूरऊठाकुर चान्दन, प्रदीप नायक सुखरी ,दरसराम नेताम छतवन ,भोजराम यादव ,उमाशंकर यादव ,बादल प्रधान ,लक्ष्मण पटेल ग्राम रंगोरा ,सन्तोष पटेल लक्षमी लाल नायक चेचरापाली नें बताया है कि रबी फसल धान अच्छी पैदावार होने की उम्मीद जगी है।

 दलहन तिलहन खेती बोर से
 राजा देवरी क्षेत्र का 42 गांव तथा बार,कोठारी वनक्षेत्र के 15-20 ग्रामों में निजी बोर भूमि गत जल स्रोत के माध्यम से ही ब्यापक स्तर पर रबी फसल धान,गेहूं,दलहन तिलहन की खेती होते आ रही है । हरेभरे जंगलों ,पहाड़ों की वादियों से घिरे इस क्षेत्र में जोंक नदी ,कन तरा नाला सहित छोटे बड़े नदी नालों का प्रचुर जल स्रोत है । यही वजह है कि खरीफ फसल धान को अंतिम पानी की जरूरत पड़ती है तो किसान बोर की सिंचाई से पूरा करते हैं पिछले 3 दशक से जहां प्रारम्भ में मध्यम वर्गीय कृषक ही बोर उत्खनन कराकर रबी फसल लेते थे ।किंतु प्रदेश और केंद्र सरकार की कृषि उन्नत कृषि अनुदान योजना का लाभ सीमांत और लघु कृषक भी पिछले 3 दशक से लेने लगे हैं। राजादेवरी क्षेत्र में विद्युतीकरण का जाल बिछा हुआ है । यही वजह है कि लगातार बोर की संख्या में इजाफा हो रहा है। क्षेत्र के किसानों  के अनुसार करीब 3500 बोर कनेक्शन खेतों में होने का अनुमान है। इसी तरह वन क्षेत्र जहां अभ्यारण्य बार कोठारी परिक्षेत्र के ग्रामों में सौर ऊर्जा बोर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जिसकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

रबी फसल का आकर्षण बढ़ा 
कसडोल विकासखण्ड कृषि विकास अधिकारी नें समय से पूर्व वांच्छित धान गेहूं दलहन तिलहन बीजों को उपलब्ध कराया गया है जिसके कारण ब्यापक स्तर पर रबी फसल की खेती संम्भव हुई है। इसी तरह जिला सहकारी बैंक शाखा कसडोल एवम टुंड्रा के अंतर्गत 14 कृषि साख समितियों के गोदामों में खाद की व्यवस्था की गई थी। पूरे क्षेत्र की धान फसल में हरियाली छाई हुई है। इस साल दिसंबर  में मौसम की बेरुखी की वजह से जमीन गीली रहने के कारण धान बोनी का काम जनवरी तक 70 प्रतिशत ही हो पाई थी। शेष 15 फरवरी तक पूरा कर लिया गया है। धान में ज्यादातर दूध भराई तथा धान की बालियां निकलनी शुरू हो रही है । किसानों का कहना है कि अधिकतर जल्द पकने वाली अर्ली व्हेराईटी का धान ज्यादा बुवाई किया गया है । फसल में बीमारी से निजात मिंली है , किंतु लो वोल्टेज एवम बिजली घण्टों तक बंद रहने की समस्या से किसान चिंतित हैं । राजदेवरी क्षेत्र तथा अभ्यारण्य क्षेत्र में यदि जल स्रोत को एनीकटों के माध्यम से संरक्षण मिल जाय तो रबी फसल की खेती में बेतहाशा वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 

 

 


Date : 30-Apr-2019

1 मई मजदूर दिवस 

चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 30 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की लंबित मजदूरी नहीं मिल रही है। कई मजदूरों के खाते होल्ड पर हंै, जिसके कारण उनकी बेटियों की शादी नहीं हो पा रही है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत हुए कार्यों का भुगतान एक साल से लंबित है। कई मनरेगा मजदूरों को साल भर से  काम  नहीं मिला है।

मजदूरों के खाते पर होल्ड के संबंध में लीड बैक मैनेजर श्री नायक कहते हंै कि केवायसी नहीं होने के कारण खाते पर आटोमैटिक होल्ड लग चुका है, ऐसे में खाता धारक को स्वयं बैंक जाना होगा, तभी होल्ड हटेगा, कुछ लोगों का होल्ड हटा है।  वहीं मर्सरा में मजदूरी के संबंध में सप्लायर संदीप जायसवाल का कहना है कि मर्सरा का काम डीएमएफ मद से करवाया जा रहा है। उक्त कार्य के भुगतान का बिल बीते एक साल से  लंबित है। यह सही है कि ग्रामीणों की मजदूरी मनरेगा  भुगतान नहीं होने के कारण फंसी हुई है। 

इस संबंध में  छग प्रदेश आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री डॉ विनय शंकर सिंह का कहना है कि गांव गांव में होल्ड खातों को लेकर जन जागरण चलाया जाएगा। पूर्व सरकार की कार्यप्रणाली में कई खामियां थी अब मजदूरों के हितों का ध्यान रखते हुए उनकी समस्याओं के निदान की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। वहीं भाजपा के जिला महामंत्री देवेन्द्र तिवारी का कहना है कि मनरेगा का भुगतान काफी दिनों से लंबित है, इसके लिए प्रशासनिक प्रयास के साथ कांग्रेस की सरकार को भी मामले में संजीदगी दिखाने की जरूरत है। इस दिशा में वे भी सार्थक पहल करेंगे।

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले में मजदूरों के खाते  होल्ड पर हंै, उन्हें बैंक  जाना होगा ये कोई उन्हें बताने वाला नहीं है।  मनरेगा की मजदूरी सालों से लटकी है, डीएमएफ के तहत कराए गए कार्यो की मजदूरी भी एक साल से अटकी हुई है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत कराए कार्यो में  कुछ ठेकेदारों का सामग्री भुगतान तो कर दिया गया है, परन्तु मनरेगा का भुगतान नहीं हो पा रहा है।

इधर, ग्राम पंचायतों में रोजगार सहायकों के आगे प्रशासन बेबस है। ग्राम नेरूआ के कई मजदूरों को काम इसलिए नहीं मिला क्योकि उन्होंने रोजगार सहायक से काम करने की डिमांड की। अब अफसरों से इसकी कई शिकायत के बाद भी रोजगार सहायक को  हटाया नहीं गया है। यही हाल ग्राम कोरमो, बडगांवखुर्द, बरौता, सहित ज्यादातर भरतपुर तहसील के कई ग्राम पंचायत ऐसे है जहां मजदूरों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। चूंकि रोजगार सहायक ही मनरेगा में मजदूरों के काम की डिमांड भेजते है, ऐसे में हर ग्राम पंचातय में उनके चहेतों मजदूरों को  डिमांड भेजकर उन्हें ही काम पर रखते हैं।

बेटियों की शादियां रुकीं
इन दिनों विवाह  का सीजन है।  जिले के भरतपुर तहसील के दर्जनों ग्राम पंचायत के मजदूरों के खाते  बीते एक साल से होल्ड पर हैं जिसके कारण वे  आर्थिक तंगी से गुजर रहे हंै।  बेटियों की शादी रुक गई है। ग्राम पंचायत खमरौद निवासी रामकली अपनी बेटी प्रेमवती का विवाह नहीं कर पा रही है, बीते 2 वर्ष से उसका खाता  होल्ड पर है।   खाते में पैसा होते हुए भी  वह मजबूर है। ग्राम गिधेर के परशुराम मोहरनिया की बेटी का विवाह भी इसी कारण से रूका हुआ है। ग्राम नेरूआ के दया सिंह नाहर और ग्राम बरौता की गीता पति भनि की बेटी का विवाह भी इसी कारण रूका हुआ है। इसके अलावा, उदयभान, सुरजपाल सिंह, धरमू, श्यामवती, इतवरिया, लक्ष्मनिया, माहबली सहित भरतपुर तहसील के लगभग हर ग्राम पंचायत की यही कहानी है। 

अब मजदूरी के लिए परेशान
विकासखंड भरतपुर के ग्राम पंचायत मर्सरा ग्रामीण आत्माराम, ठाकुर प्रसाद यादव, कैलाश, शंकर, छोटेलाल, राममन यादव, माया देवी, गोपीचंद्र, राकेश, भोली, सुनील, भारती, लगनधारी यादव, लक्ष्मीनारायण ने बताया कि उनकी मांग पर 40 लाख रू कच्ची डेम का साईड रिटर्निंगवाल, आरसीसी नाली, पाईप लाईन एवं वेस्ट वियर निर्माण का कार्य स्वीकृत किया गया था। इस कार्य के लिए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा को निर्माण एजेंसी नियुक्त किया गया था। जिसके द्वारा फरवरी 2018 में कार्य प्रारंभ किया गया। जिसमें उक्त ग्रामीण मजदूरों ने कार्य किया इसके साथ ही ट्रैक्टर भी काम पर लगाये गये थे। ठेकेदार द्वारा 10-15 लाख रूपये का कार्य कराने के बाद डीएमएफ की राशि नहीं मिलने के कारण कार्य को बंद कर दिया। ऐसे में बीते 1 साल से ज्यादा समय से कार्य में लगे सभी मजदूरों को उनकी बकाया मजदूरी के साथ ट्रैक्टर का भाड़ा भी नहीं मिला है। 

जंगल गिट्टी पीओआर ग्रामीणों ने भरा 
ग्राम पंचायत मर्सरा में कच्ची डेम पर अधूरे निर्माण में जिस गिट्टी का उपयोग किया गया, गिट्टी तोडऩे  में लगी मजदूर गुलबसिया, बिग्गी बाई, श्यामवती बताती है उन्होंने गिट्टी तोडक़र 50 चट्टा निर्माण कार्य मेंं दिया, जबकि जंगल में गिट्टी तोड़वाने के लिए गांव के चंद्रा यादव, शंकर यादवा और जय प्रकाश के नाम पर वन विभाग ने पीओआर काटा और उन्होंने विभाग को 10 हजार रू दंड भी दिया, परन्तु उनकी मजदूरी अब तक नहीं मिली है।

बांद का काम रुका
वर्ष 1985 में मर्सरा गांव के रामदास और चतुरगुन यादव ने नाले के पानी को रोका और डीजल पंप के सहारे गेहूं की फसल उगाने लगे। वर्ष 1996 में ग्रामीण आगे आए और इस बांध को बड़ा रूप दिया, तब ग्रामीणों ने खुद से पहले 60 हजार और फिर 40 हजार चंदा कर बांध की मरम्मत की। वर्ष 2012-13 में तत्कालीन डीएफओ के मेचियो ने ग्रामीणों की हौसला अफजाई की और उन्हें नहर बनाने में सरकारी मदद की। उसके बाद आई बारिश में बांध फूट गया, तत्कालीन कलेक्टर ने बांध की मरम्मत के लिए 20 लाख रू दिए, और बांध की पिचिंग के लिए ढाई लाख रू भी मिले। आज भी  मजदूर रामदास और चतुरगुन कहतेे हैं  कि  हमारी मांग पर कलेक्टर ने 40 लाख रू दे दिए, परन्तु अब हम सब मजदूरी को लेकर परेशान है और काम भी बंद  है।

 

 


Date : 29-Apr-2019

ईओडब्ल्यू की जांच में तेजी

रायपुर, 29 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। ईओडब्ल्यू ने ई-टेंडरिंग घोटाले की पड़ताल तेज कर दी है। साइबर एक्सपर्ट की मदद से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के सभी डाटा निकाल लिए गए हैं।  इसके बाद अब संबंधित विभाग के अफसरों से पूछताछ शुरू हो रही है। ईओडब्ल्यू ने इस सिलसिले में चिप्स के अफसरों को पूछताछ के लिए बुलाया है। 

ईओडब्ल्यू के एसपी इंदिरा कल्याण एलेसेला ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि साइबर एक्सपर्ट की मदद से सारे डाटा निकाल लिए गए हैं। इसका मिलान हो रहा है और संबंधित विभाग के अफसरों से पूछताछ भी की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि चिप्स के अफसरों को पूछताछ के लिए बुलाया गया है। साथ ही साथ बिलासपुर निगम और एक अन्य विभाग के अफसरों से भी पूछताछ की जाएगी। 

कहा जा रहा है कि ई-टेंडरिंग घोटाले करने के लिए बनाए गए फर्जी इमेल आइडी और आइपी नंबरों को साइबर एक्सपर्ट ने रिकवर कर लिया है। जांच के दौरान उन कम्प्यूटरों को भी चिन्हाकित कर लिया गया है, जिसके जरिए निविदा जारी की गई थी लेकिन, साफ्टवेयर के माध्यम से इसे निकाल लिया गया है।

बताया गया कि साईबर एक्सपर्ट की मदद से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के डाटा निकाल लिए गए हैं। गौरतलब है कि 17 विभागों के अधिकारियों द्वारा 4601 करोड़ के टेंडर में 74 ऐसे कम्प्यूटर का इस्तेमाल निविदा अपलोड करने के लिए किया गया था। उसी कंम्प्यूटर से निविदा की सारी औपचारिकता भी पूरी की गई थी। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 10 से 20 लाख के 108 करोड़ रुपए के टेंडर मैन्युअली जारी किए गए थे। जिन 74 कंप्यूटरों से टेंडर निकाले गए उसी से टेंडर वापस भरे भी गए। ऐसा 1921 निविदाओं में किया गया था।
यह भी कहा गया कि नवंबर 2015 से मार्च 2017 के बीच 74 कम्प्यूटर के जरीए 1459 निविदा जारी की गई थी। चर्चा है कि चिप्स के दफ्तर से फर्जी ई-मेल एड्रेस बनाए गए थे। इसे उपयोग करने के बाद कम्प्यूटर से मिटा दिया गया था। इसकी भी पड़ताल हो रही है। संबंधित विभागों से पूछताछ और जानकारी लेने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। 


Date : 28-Apr-2019

कई बार हो चुकी है शिकायत, कार्रवाई शून्य

रामानुजगंज, 28 अप्रैल। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत रामचंद्रपुर विकासखंड में 22 करोड़ 85 लाख 85 हजार रुपए खर्च कर 24 हजार 792 शौचालय बनाए गए हैं।जिले के विकासखंड को गत 29 सितंबर 2017 को ओडीएफ घोषित किया गया है परंतु जमीनी हकीकत इससे परे है। विकासखंड के 82 ग्राम पंचायतों में ऐसा कोई ग्राम पंचायत नहीं है जो खुले में शौचमुक्त हो। अभी भी हजारों शौचालय अपूर्ण है वहीं बने शौचालयों के अधिकांश दरवाजे टूट गए। वहीं कईयों के छप्पर भी उजड़ गए हैं।स्थिति ऐसी है कि शौचालयों के लिए बने ढक्कन आज भी गांव गांव में सैकड़ों की संख्या में जहां तहां पड़े हुए हैं जो ओडीएफ घोषित होने के डेढ़ वर्ष बाद भी नहीं लग पाए है। रामचंद्रपुर विकासखंड में शौचालय निर्माण में बरती गई अनियमितता एवं फर्जीवाड़े की शिकायत कई बार उच्च अधिकारियों एवं मुख्यमंत्री तक की गई  है।                                     
गौरतलब है कि रामचंद्रपुर विकासखंड के 82 ग्राम पंचायतों में स्वच्छ भारत मिशन अंतर्गत शौचालय का निर्माण कराया गया जिसमें 12 ग्राम पंचायतों में 12 हजार प्रति शौचालय राशि भुगतान की गई।ग्राम पंचायत विजयनगर,चेरा, सुंदरपुर,जामवंतपुर, कमलपुर, मेघुली,सलवाही,मरमा,डिंडो,बगरा है। विकासखंड के करीब-करीब सभी ग्राम पंचायतों में प्रशासन के दबाव में तो ओडीएफ घोषित कर दिया गया परंतु स्थिति यह है कि कोई भी ऐसा ग्राम पंचायत नहीं है जो पूर्णत: खुले में शौच मुक्त हो। ओडीएफ ग्राम पंचायत के नाम से पूरे विकासखंड में शासकीय रुपयों का बंदरबांट किए जाने का आरोप ग्रामीणों ने लगाया है। हजारों ऐसे हितग्राही हैं जिनके नाम से तो शौचालय कागजों में पूर्ण कर लिया गया परंतु आज भी उनके शौचालय पूर्ण नहीं हो पाए हैं। विकासखंड का ऐसा कोई भी गांव नहीं होगा जहां से शौचालयों में हुए अनियमितता की शिकायत उच्च अधिकारियों से नहीं की गई हो परंतु आज तक किसी भी ग्राम पंचायत में इसकी जांच नहीं हो पाई है।                            
भूपेश बघेल ने जांच कराने की कही थी बात 
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल विधानसभा चुनाव के पूर्व रामानुजगंज के लरंग साय कम्युनिटी हॉल में कांग्रेस के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे तब इनके सामने कई ग्राम पंचायतों के लोगों द्वारा शौचालयों में हुए अनियमितता की शिकायत की थी। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने पर शौचालयों में हुई गड़बड़ी की जांच की बात मंच से भूपेश बघेल द्वारा कही गई थी।                                                                  
टीएस सिंह देव ने भी कहा था जांच कराएंगे- पंचायत मंत्री टीएस सिंह देव भी विधानसभा चुनाव के पूर्व ग्राम पंचायत महावीरगंज में कांग्रेसी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे तब उनके सामने भी शौचालय निर्माण में हुए अनियमितता की शिकायत हुई थी तो उन्होंने कहा था कि यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनती है तो हम इसकी जांच अवश्य कराएंगे।                         

 जांच ठंडे बस्ते में डाला
रामचंद्रपुर विकासखंड में शौचालय निर्माण के नाम पर हुए फर्जीवाड़े की शिकायत के बाद जनपद सीईओ द्वारा जांच कमेटी गठित की गई थी परंतु उक्त जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।                                       

 मनरेगा पीओ ने दिया इस्तीफा 
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत हुए शौचालय निर्माण में बड़ी फर्जीवाड़े के उच्च स्तरीय जांच की सुगबुगाहट के बीच तत्कालिक मनरेगा पीओ द्वारा व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया गया है। विकासखंड में अभी भी हजारों शौचालय अपूर्ण हैं उन्हें कब पूर्ण किया जाएगा यह भी एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।


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