संपादकीय
गुजरात के गृहमंत्री ने 21 से 27 अक्टूबर तक किसी का भी ट्रैफिक चालान काटने से मना कर दिया है। उन्होंने दीवाली के मौके पर इसे जनता को तोहफा कहा है, और चुनाव के करीब पहुंच रहे गुजरात में इसे वहां की बड़ी हिन्दू आबादी को लुभाने वाला एक फैसला कहा जा रहा है। उन्होंने मंच और माईक से सार्वजनिक घोषणा करते हुए कहा कि इस एक हफ्ते गुजरात टै्रफिक पुलिस कोई जुर्माना नहीं वसूलेगी। कल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर अपनी मुफ्त की रेवड़ी वाली बात को दुहराते हुए दिखे, और उन्होंने मध्यप्रदेश में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि टैक्स देने वाले जब यह देखते हैं कि उससे वसूले गए टैक्स से मुफ्त की रेवड़ी बांटी जा रही है, तो टैक्सपेयर सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। उन्होंने कहा- मुझे गर्व है कि देश में एक बड़ा वर्ग है जो देश को रेवड़ी कल्चर से मुक्ति दिलाने के लिए कमर कस रहा है।
ये दोनों ही बातें कल की हैं, दोनों ही बातें गुजरात से निकले लोगों की कही हुई है। गुजरात के गृहमंत्री हर्ष संघवी चालान से छूट की देश की यह अपने किस्म की पहली रेवड़ी जब बांट रहे थे, तभी गुजरात से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी एक दूसरे मंच से रेवड़ी कल्चर के खिलाफ बोल रहे थे। पिछले कुछ महीनों में रेवड़ी कल्चर का यह एक नया जुमला नरेन्द्र मोदी की तरफ से शायद इसलिए आया कि हिमाचल और गुजरात में चुनाव होने जा रहे हैं, इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी ताल ठोंकते हुए चुनाव में उतरी हुई है, और इस पार्टी का पुराना इतिहास रहा है कि यह तरह-तरह की लुभावनी रियायतों और तोहफों वाला चुनावी घोषणापत्र लाती है, और शायद उसे काफी हद तक पूरा भी करती है। ऐसी चुनावी घोषणाओं पर रोक लगाने के लिए भाजपा के एक बड़े नेता जो कि सुप्रीम कोर्ट के वकील भी हैं, वे एक जनहित याचिका लेकर अदालत में हैं, और अदालत ने केन्द्र सरकार, राजनीतिक दलों, और चुनाव आयोग से इस पर उनकी राय भी पूछी है। मोदी के उछाले गए रेवड़ी-कल्चर शब्दों का मौका इन विधानसभा चुनावों के ठीक पहले का भी था, और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चलने के बीच भी था। लेकिन अब यह भी समझने की जरूरत है कि हिन्दुओं के साल के एक सबसे बड़े त्यौहार पर अगर कानून तोडऩे की छूट का यह चुनावपूर्व तोहफा गुजरात में दिया जा रहा है, तो आने वाले बरसों और चुनावों में इसका क्या असर होगा?
अगर इस घोषणा को गैरकानूनी करार देते हुए इस पर रोक नहीं लगाई गई, इस पर अदालती फटकार नहीं लगी, तो फिर बाकी राजनीतिक दलों के लिए, और बाकी प्रदेशों के लिए मैदान खुला रहेगा। और फिर वह मैदान चुनाव के पहले के महीनों में ही नहीं खुलेगा, वह बारहमासी और पांचसाला हो जाएगा। बंगाल में दुर्गा पूजा के हफ्ते में चालान नहीं होंगे, गोवा में क्रिसमस से नए साल तक न सडक़ों पर चालान होंगे, और न ही पिये हुए लोगों पर कोई कार्रवाई होगी, और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के पंजाब में तो ऐसी रियायत पूरे पांच बरस देनी होगी। और जैसा कि आज के हिन्दुस्तान का हाल सुप्रीम कोर्ट ने अभी दो दिन पहले के अपने ताजा फैसले में लिखा है, यह तो जाहिर है ही कि देश के तकरीबन तमाम प्रदेशों में ये रियायतें हिन्दू त्यौहारों पर ही मिलेंगी, और बाकी धर्मों के लोग अपने-अपने फिलीस्तीन जहां चाहें वहां ढूंढ लें।
कल जब गुजरात के मुख्यमंत्री दीवाली का यह तोहफा दे रहे थे, तो सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला आए भी दो दिन हो चुके थे, पूरा फैसला लोगों के सामने था जो कि कह रहा था कि अगर नफरत फैलाने वाले बयानों पर किसी प्रदेश में खुद होकर कार्रवाई नहीं की गई, तो उसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा, और वहां के अफसरों को कटघरे में बुलाया जाएगा। वह बात नफरत की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया था कि आज देश में, देश में जगह-जगह, या देशभर में देश का लोकतांत्रिक चरित्र खत्म किया जा रहा है, और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। निशाना बनाने का यह काम इस तरह भी हो सकता है कि केन्द्र और राज्य सरकारें गले-गले तक किसी एक धर्म को मनाने में लग जाएं, सरकारी खजाना उस धर्म की भक्ति में झोंक दिया जाए, और बिना कुछ कहे बाकी धर्म हाशिए पर धकेल दिए जाएं। गुजरात का यह ताजा फैसला उसी तरह का है। यह अल्पसंख्यकों के बारे में, या गैरहिन्दू धर्मों के बारे मेें कुछ नहीं कह रहा, लेकिन हिन्दू त्यौहार के मौके पर यह गैरकानूनी रियायत बिना कुछ कहे भी दूसरे धर्मों को उनकी औकात याद दिला देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने नफरत के भाषणों के खिलाफ एक कड़ा रूख तो दिखाया है, लेकिन धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता के जो जलते-धधकते मामले हैं, उन्हें देश की यह सबसे बड़ी अदालत मोटेतौर पर अनदेखा करके ही चल रही है। आज जरूरत देश की साम्प्रदायिक स्थिति को एक समग्रता से देखने की है, यह भी सवाल करने की है कि किसी एक धर्म को देश या किसी प्रदेश का राजकीय धर्म कैसे बनाया जा रहा है? लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कई बेंचें असुविधा से भरे इस काम से बचती दिख रही हैं, और यह समकालीन इतिहास इस बचने को भी दर्ज करते चल रहा है। फिलहाल किसी को गुजरात के इस फैसले के खिलाफ अदालत जाना चाहिए क्योंकि यह महज धार्मिक या साम्प्रदायिक मामला नहीं है, यह एक ऐसा गैरकानूनी मामला भी है जो सडक़ों पर लोगों की हिफाजत खत्म करता है। और ऐसा करना किसी सरकार का हक नहीं है। हो सकता है कि गुजरात के गृहमंत्री को यह अच्छी तरह मालूम हो कि यह आदेश अदालत में एक सुनवाई भी खड़ा नहीं रहेगा, और उसके बाद भी उन्होंने इसे चुनाव के पहले जनता के बीच खपाने के लिए ही कहा हो, लेकिन ऐसी मिसालों का विरोध होना चाहिए। इस हरकत से, और ऐसी चुनिंदा रियायत से गुजरात में जनता का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश भी यह दिखती है।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
देश के सबसे प्रमुख सरकारी अस्पताल, दिल्ली के एम्स में सांसदों को खास हक देने वाला एक फैसला डॉक्टरों के संगठन के भारी विरोध के बाद वापिस लिया गया है। इस फैसले में सांसदों, और उनकी सिफारिश पर आने वाले दूसरे मरीजों के लिए कई किस्म के विशेषाधिकार तय किए गए थे, और इसके लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने अपने अफसरों और डॉक्टरों को लिखित-निर्देश दिए थे कि किसी सांसद के इलाज के लिए आने पर किस तरह खास इंतजाम किए जाएं, तुरंत डॉक्टर तक ले जाया जाए, बिना देर किए सबसे अच्छा इलाज कराया जाए, इसके लिए फोन और मोबाइल पर लोग तैनात रहें, और किसी सांसद की सिफारिश पर आने वाले मरीज की भी अलग से मदद की जाए। डॉक्टरों के संगठनों ने एम्स के डायरेक्टर के इस आदेश का जमकर विरोध करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को लिखा था कि आज जब यह देश वीआईपी संस्कृति के खिलाफ लड़ रहा है, उस वक्त एम्स सांसदों के लिए इस तरह का खास इंतजाम कर रहा है जिससे कि बाकी मरीजों का इलाज का हक, और उनका इलाज दोनों बुरी तरह प्रभावित होंगे। डॉक्टरों ने केन्द्र सरकार को याद दिलाया कि सरकारी अस्पतालों को कभी यह नीति नहीं बनानी चाहिए कि कुछ चुनिंदा लोगों का बेहतर इलाज, और बाकी तमाम लोगों का कमजोर इलाज। उन्होंने कहा कि चिकित्सा सेवा के मामले में इस तरह की गैरबराबरी बिल्कुल मंजूर नहीं की जा सकती, और यह डॉक्टरों की ली गई शपथ के भी खिलाफ है, और देश के हर डॉक्टर की आत्मा के भी खिलाफ है। केन्द्रीय मंत्री को यह भी याद दिलाया गया कि इस तरह का आदेश डॉक्टरों पर हिंसक हमले करने वालों का भी हौसला बढ़ाएगा क्योंकि अध्ययन करने पर यह पता लगा है कि ऐसी हिंसा का 80 फीसदी हिस्सा राजनेता, या उनसे जुड़े हुए लोग करते हैं।
गनीमत यह है कि यह आदेश निकलने के एक हफ्ते के भीतर ही इसे वापिस लेना पड़ा, और जिस तरह एम्स की ओर से लोकसभा सचिवालय को इस आदेश की चि_ी भेजी गई है, उससे यह जाहिर होता है कि लोकसभा की पहल पर इस तरह का आदेश निकला होगा। देश संसद के रेस्त्रां में सांसदों के रियायती खाने को लेकर पहले से विचलित चल रहा था, और उस रेस्त्रां के रेटकार्ड को देखकर लोग हैरान होते थे कि खाना इतना रियायती भी किया जा सकता है। इसके साथ-साथ लोग सांसदों को मिलने वाले वेतन, पेंशन, मकान और सफर की सहूलियत जैसी बातों को भी गिनाते थे, और इन तमाम बातों को मिलाकर मानो हिकारत काफी पैदा नहीं हो रही थी कि अस्पताल में इलाज का यह नया हुक्म निकाला गया था जिसमें हिन्दुस्तान के सांसदों, और उनकी सिफारिश पर पहुंचने वाले लोगों को दूसरे मरीजों से पहले, उनसे ऊपर रखा गया था, और अस्पताल को हुक्म दिया गया था कि इन लोगों से बारातियों की तरह पेश आया जाए। जनता के बीच यह मुद्दा उठ पाए, उसके पहले ही हौसलेमंद डॉक्टरों के संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया, और सांसदों को आम नागरिकों से ऊपर का इलाज का दर्जा शुरू होने के पहले ही खत्म हो गया। यह बात हैरान करती है कि देश में आज जागरूकता के इस दौर में भी लोग जनता के हकों को इस हद तक कुचलने का दुस्साहस रखते हैं, और दूसरे मरीजों की कतार को धकेलते हुए खुद पहले इलाज पाने की ऐसी बेशर्मी रखते हैं। किसी लोकतंत्र में वीवीआईपी शब्द, और ऐसे दर्जे एक सामंती मिजाज का सुबूत रहते हैं, और धिक्कार के लायक रहते हैं।
हम समय-समय पर ऐसे वीआईपी हकों के खिलाफ लिखते आए हंै जिनमें सिर्फ सांसद और विधायक नहीं रहते, जज और अफसर भी रहते हैं। हर प्रदेश में हाईकोर्ट के जज जिस तरह सायरन बजाती पायलट गाडिय़ों के साथ सडक़ पर दूसरों को किनारे धकेलते हुए चलते हैं, वह अपने आपमें एक बहुत ही शर्मनाक हरकत रहती है, लेकिन अभी तक कोई जज ऐसे नहीं मिले हैं जिन्होंने ऐसी सामंती सहूलियतों से मना किया हो। जो जज अदालत में गिने-चुने घंटे बैठते हैं, और साल में डेढ़ सौ दिन से अधिक छुट्टियां लेते हैं। कुछ बरस पहले एक जनहित याचिका लगी थी जिसमें सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि वह साल में कुल 193 दिन क्यों काम करता है जबकि वह मामलों से लदा हुआ है। इसी जनहित याचिका के मुताबिक देश के हाईकोर्ट साल में 210 दिन काम करते हैं, और जिला अदालतें 245 दिन। इस जनहित याचिका ने याद दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट का ही एक आदेश है कि जज साल में कम से कम 225 दिन काम करें। यह अंग्रेजों के समय से चले आ रही एक वीआईपी संस्कृति है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट जज साल में पांच बार बड़ी-बड़ी छुट्टियां लेते हैं, गर्मियों में 45 दिन, सर्दियों में 15 दिन, होली पर एक हफ्ते, और दशहरा-दीवाली पर पांच-पांच दिन। जब देश की सबसे बड़ी अदालत खुद अपने ही नियमों के खिलाफ इस तरह सामंती सहूलियत का मजा लेती है, तो जाहिर है कि इस लोकतंत्र में बाकी किस्म की सत्ता भी आम जनता के हकों के ऊपर अपना दावा करेगी, और एम्स का यह ताजा हुक्म उसी का एक सुबूत था।
लोकतंत्र में लोगों के बीच इस तरह का फर्क एक जुर्म है। लोकतंत्र में जुर्म की परिभाषा महज संसद के बनाए कानून से, सरकारों के बनाए नियम से, और अदालतों के फैसलों से तय नहीं होते। लोकतंत्र में जनता के बीच सार्वजनिक पैमानों से भी यह तय होता है कि कौन सी बातें जुर्म हैं। जब तथाकथित वीवीआईपी लोगों के काफिले रफ्तार से ले जाने के लिए चौराहों पर आम जनता को रोका जाता है, एम्बुलेंसों को रोक दिया जाता है, तब दूसरों के हक को कुचलते हुए कुछ चुनिंदा लोग अपनी निहायत गैरजरूरी और नाजायज हड़बड़ी दिखाते हैं। सडक़ पर साइकिल से जाते हुए एक मजदूर के हक के मुकाबले किसी मंत्री-मुख्यमंत्री, जज और अफसर का हक अधिक कैसे हो सकता है? एक मजदूर के काम के मुकाबले इनका काम अधिक महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है? दरअसल लोकतंत्र की बुनियादी समझ के मुताबिक तो वीआईपी और वीवीआईपी शब्द बड़ी गालियां हैं, और लोगों को याद होगा कि पूरी दुनिया के इतिहास में लालबत्ती को वेश्याओं के इलाके का एक प्रतीक माना जाता था। आज हिन्दुस्तान जैसे सामंती और तथाकथित लोकतांत्रिक देश में बड़े-बड़े ताकतवर लोग उसी लालबत्ती को अपने सिर पर सजाए चलने को अपना गौरव मानते हैं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए, और देश के लोगों को डॉक्टरों के उन संगठनों का अहसान मानना चाहिए जिन्होंने केन्द्र सरकार के कर्मचारी होने के बावजूद सरकार और संसद के ऐसे विशेषाधिकार का जमकर विरोध किया, और उसे हटवाकर दम लिया। इसके बजाय तथाकथित वीआईपी लोगों को उस वक्त प्राथमिकता देना बेहतर होगा जब इन्हीं अस्पतालों में भैंसे पर सवार होकर कोई मरीजों को ले जाने के लिए पहुंचेगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
महाराष्ट्र की वर्धा नाम की जिस जगह पर गांधी ने बहुत समय गुजारा था, वहां पर उनकी स्मृति में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय है। यह केन्द्रीय विश्वविद्यालय कई वजहों से अच्छी और बुरी चर्चा में रहता है। लेकिन अब तीन दिन पहले की इसकी एक ताजा चि_ी बड़ी दिलचस्प है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने सारे लोगों को लिखा है कि परिसर की गौशाला में गौबारस के पावन पर्व पर 21 अक्टूबर को सुबह 8.30 बजे गाय और बछड़े के पूजन का आयोजन किया गया है। सभी विद्यार्थियों, अध्यापकों, कर्मचारियों से अनुरोध है कि इस पूजन में सपरिवार अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने का कष्ट करें। आज देश भर में भाजपा शासित प्रदेशों में और केन्द्र सरकार के संस्थानों में हिन्दू धर्म को देश के अकेले धर्म के रूप में एकाधिकार दिलवाने के लिए लगातार एक मुहिम चल रही है। यह उसी मुहिम का एक हिस्सा है।
छत्तीसगढ़ में भी हम कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में इसी तरह की पूजा-पाठ और हवन देख चुके हैं, जिसकी तस्वीरें विश्वविद्यालय बड़े गर्व से सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है। देश के प्रधानमंत्री और दूसरे बड़े सत्तारूढ़ नेता, भाजपा के कई मुख्यमंत्री, और अब कांग्रेस के भी मुख्यमंत्री लगातार मंदिरों में जाते दिखते हैं। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों में फर्क महज इतना है कि वे दूसरे धर्मों के कार्यक्रमों में भी चले जाते हैं, भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री अपने धर्म तक सीमित रहते हैं, और इनमें किसी गैरहिन्दू की तो अधिक गुंजाइश भी नहीं है। लेकिन इस धार्मिक भेदभाव से धीरे-धीरे देश का एक माहौल जो बड़ी मुश्किल से आधी सदी में जाकर कुछ हद तक धर्मनिरपेक्ष सरीखा हो पाया था, वह तबाह हो गया है, और अब संविधान में संशोधन करके इसे एक हिन्दू राष्ट्र बनाए बिना भी सरकारों की तमाम कोशिशें इसे तमाम व्यवहारिक बातों के लिए हिन्दू राष्ट्र बना चुकी हैं। जेल से गलत तरीके से वक्त के पहले रिहा किए जाने वाले सामूहिक बलात्कारियों को माला और आरती सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने ही मिल रही हैं, और किसी भी तरह के छोटे-मोटे जुर्म के आरोपी मुसलमानों के परिवार और कारोबार को कुछ घंटों के भीतर बुलडोजर मिल रहा है। हिन्दुस्तान की न्यायपालिका कभी इतनी बेबस और लाचार नहीं दिखी थी कि वह रात-दिन टीवी पर चलने वाले ऐसे नजारों को भी अनदेखा करना शायद अपनी हिफाजत के लिए बेहतर समझती है। उसे न तो सरकारों के संपूर्ण-हिन्दूकरण में कोई दिक्कत दिख रही है, और न ही पुलिस और प्रशासन के पूरी तरह साम्प्रदायिक हो जाने में। यह सिलसिला उन सत्तारूढ़ लोगों के लिए सहूलियत का है, और उनका हौसला बढ़ा रहा है जो कि पूरे देश को एक भगवा रंग में रंग देना चाहते हैं।
जिन विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की पढ़ाई होनी चाहिए, वहां पर एक धर्म के हवन-पूजन का सिलसिला चला हुआ है, देवी-देवताओं के साथ-साथ अब वहां गाय-बछड़े की पूजा भी हो रही है, और उसका बड़ा जलसा हो रहा है, जिसका न तो पढ़ाई से कोई लेना-देना है, और न ही देश की धर्मनिरपेक्षता से। जो जाहिर तौर पर सोच-समझकर एक धर्म को बाकी सब पर लादने की एक हिंसक और हमलावर कोशिश है जो कि पूजा की शक्ल में पेश की जा रही है। यह बात साफ है कि देश की आबादी के गैरहिन्दू तबकों में यह सब देखकर एक निराशा है, और नाराजगी है। उनके बीच यह बात घर कर रही है कि वे सब दूसरे दर्जे के नागरिक हैं, और तमाम नागरिक हक अगर पाने हों, तो उन सबको भी हिन्दू हो जाना चाहिए। देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को जिस रफ्तार के साथ तहस-नहस कर दिया गया है, वह अविश्वसनीय है। दस बरस पहले किसी से यह कल्पना करने को कहा गया होता कि किसी एक धर्म की तानाशाही हिन्दुस्तान पर इस हद तक हावी हो सकती है, तो शायद लोग आसानी से इस बात को नहीं मानते। लेकिन अब इसे साबित करने के लिए किसी सुबूत की भी जरूरत नहीं बची है क्योंकि यह चारों तरफ सरकारी स्तर पर अच्छी तरह से स्थापित है।
दिक्कत यह है कि आज संसद में एक ही सोच का बाहुबल, देश की अधिकतर विधानसभाओं में उसी सोच का बाहुबल ऐसा है कि वह किसी अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की तरह चारों तरफ पहुंच रहा है, और अपना झंडा गाड़ रहा है। मतदाताओं के बीच इस सोच ने लोकतांत्रिक संसदीय चुनावों को एक धार्मिक जनगणना की तरह बनाकर रख दिया है। इस बात को हिन्दुस्तान के गैरहिन्दू तो भुगत ही रहे हैं, वे हिन्दू भी भुगत रहे हैं जिनकी ऐसी हमलावर सोच पर कोई आस्था नहीं है। दुनिया के बाकी देशों में जो सभ्य और विकसित लोकतंत्र हैं वे लगातार यह पा रहे हैं कि हिन्दुस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता न्यायपूर्ण नहीं रह गई है, एक धर्म की स्वतंत्रता रह गई है, और बाकी धर्मों के लिए इसका अकाल पड़ गया है। इससे आज तो जितना नुकसान हो रहा है, जितना खतरा दिख रहा है, वह तो है ही, इससे भी अधिक बढक़र इसका नुकसान आने वाले बरसों में दिखेगा जब अगली पीढिय़ां अपने इर्द-गिर्द ऐसी ही धार्मिक हिंसा को देखते हुए बड़ी होंगी, और उन्हें यह समझ आएगा कि यही नवसामान्य हिन्दुस्तान है। उन्हें दिक्कत तब होगी जब वे विकसित लोकतंत्रों में काम करने जाएंगे, और उन्हें पता लगेगा कि हिन्दुस्तान के भीतर के धार्मिक भेदभाव और साम्प्रदायिक हिंसा की वजह से उन्हें उन देशों में शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी। धर्मान्धता सिर्फ अफगानिस्तान या ईरान जैसे देशों को अछूत नहीं बनाती, हिन्दुस्तान जैसे देश के खिलाफ भी दुनिया के कई देशों में संसदों में चर्चा हो चुकी है, और कई देशों के संवैधानिक संगठन भारत के इस भेदभाव पर फिक्र कर चुके हैं। ऐसी साम्प्रदायिकता से हिन्दुस्तान अपनी संभावनाओं से कोसों दूर रह जाएगा क्योंकि आबादी के कई हिस्सों को विकास की मूलधारा से काटकर रखने का नुकसान तो हो ही रहा है।
हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अभी अपने सबसे बुरे दौर से भी गुजर रही है, और वह इससे उबरने की कोशिश भी कर रही है। कल दशकों बाद कांग्रेस ने एक औपचारिक चुनाव से गांधी-परिवार के बाहर के एक सबसे पुराने नेता मल्लिकार्जुन खडग़े को अपना अध्यक्ष चुना है। आज किसी भी राजनीतिक पार्टी में संगठन के चुनाव में जितनी पारदर्शिता हो सकती है, उससे बहुत अधिक पारदर्शिता के साथ कांग्रेस के संगठन चुनाव हुए हैं, और देश के एक सबसे बुजुर्ग और सबसे अनुभवी दलित नेता को इस चुनौती भरे दौर में इस पार्टी की अगुवाई मिली है। इसे ओहदा मिलना कहना बिल्कुल गलत होगा, खडग़े को यह सिर्फ एक बहुत बड़ी चुनौती मिली है।
कांग्रेस 2014 के बाद से लगातार जमीन खोते जा रही थी, और 2019 के चुनाव के बाद वह हाशिए पर जा चुकी दिख रही थी। लेकिन संसद में सीटें कम होने से कांग्रेस को खारिज कर देना ठीक नहीं है क्योंकि भाजपा के वोटों से आधे वोट रह जाने पर भी कांग्रेस देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, न सिर्फ लोकसभा चुनाव में मिले वोटों के आधार पर, बल्कि देश के हर हिस्से में अपनी मौजूदगी की वजह से भी। भाजपा के अलावा कांग्रेस ही अकेली ऐसी पार्टी है जो देश भर में है, और शायद कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं जहां अभूतपूर्व कामयाब भाजपा की भी मौजूदगी न हो, लेकिन कांग्रेस की मौजूदगी वहां भी होगी। इसलिए कांग्रेस के बिना अगले कई बरस तक हिन्दुस्तानी लोकतंत्र का कोई विपक्ष नहीं हो सकता, और विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस के सामने ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है, और अभूतपूर्व चुनौती तो पिछले कई बरसों से बनी हुई है ही। खडग़े ने जिस दौर में, करीब 80 बरस की उमर में यह चुनौती पाई है, वह सचमुच ही मुश्किल है, और गांधी परिवार की मौजूदा पीढ़ी के साथ काम करने की एक अजीब सी नौबत भी है।
दरअसल कांग्रेस के पिछले चुनाव जब हुए थे, तब सोनिया गांधी की लीडरशिप नहीं थी, और पिछले दो-ढाई दशक सोनिया और राहुल लगातार पार्टी के अध्यक्ष रहे, किसी औपचारिक चुनाव की कोई जरूरत भी नहीं हुई, और सफलता या असफलता के बावजूद उनकी लीडरशिप को कोई चुनौती भी नहीं थी। लेकिन 2019 का चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ दिया, और तमाम लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद वे दुबारा अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुए। उनकी जिद के चलते कांग्रेस पिछले दो-तीन बरस से एक बड़े असमंजस के दौर से गुजर रही थी, सोनिया गांधी अनमने ढंग से कामचलाऊ अध्यक्ष बनी हुई थीं, और पार्टी के भीतर के दो दर्जन बड़े नेताओं ने पारदर्शी चुनाव और पार्टी में सुधार की मांग को लेकर एक किस्म से खुली बगावत कर रखी थी। बड़े-बड़े कुछ नेताओं ने फेरबदल न होने पर पार्टी छोड़ भी दी, लेकिन कुल मिलाकर जिस किस्म के चुनाव की मांग की गई थी, वैसा चुनाव कल पूरा हुआ है, और किसी को भी चुनाव लडऩे से रोका नहीं गया, सबको मौका था, गुप्त मतदान हुआ, मिलीजुली मतगणना हुई, गांधी परिवार ने किसी का खुला समर्थन नहीं किया, और मल्लिकार्जुन खडग़े करीब 90 फीसदी वोट पाकर निर्विवाद रूप से अध्यक्ष बने।
इस पूरी पृष्ठभूमि में अब अगर उनके कार्यकाल को देखें, तो जितनी बड़ी चुनौती भाजपा और उसके सहयोगी दलों से चुनाव लडऩे की है, उतनी ही बड़ी चुनौती इस बात की भी है कि अध्यक्ष के अपने कार्यकाल में वे सोनिया परिवार के साथ किस तरह के संबंध रखते हैं, किस तरह उनकी लीडरशिप की खूबियों का इस्तेमाल करते हैं, किस तरह उनकी शोहरत को पार्टी के लिए काम में लाते हैं। यह कांग्रेस का सबसे मुश्किल और चुनौतीभरा दौर है, लोग उन्हें सोनिया-परिवार की पसंद का अध्यक्ष भी मानते हैं, और ऐसे में पार्टी को बांधकर रखने वाले इस परिवार के साथ वे कैसे संबंध रखते हैं, इस पर भी पार्टी के भीतर उनकी कामयाबी टिकेगी। यह बात बहुत जाहिर है कि आज भी न सिर्फ देश के मतदाताओं के बीच बल्कि कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी सोनिया-परिवार पार्टी के किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले अधिक लोकप्रिय है। यह तो राहुल गांधी की जिद थी कि उनके परिवार के बाहर से अध्यक्ष चुने जाएं, इसलिए यह नौबत आई, वरना कितनी भी चुनावी शिकस्त होने पर भी इस परिवार से अधिक बड़े कोई नेता पार्टी में नहीं है, और पार्टी के लोगों को मंजूर नहीं हैं। लेकिन अब यह बात साफ है कि कन्याकुमारी से कश्मीर तक की अभूतपूर्व पदयात्रा पर निकले हुए और धूप में तपकर निखरते हुए राहुल गांधी कांग्रेस के लिए आज सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। एक किस्म से इतनी ताकत पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष के मुकाबले एक दूसरे शक्ति केन्द्र की तरह हो सकती है। और कांग्रेस को, सोनिया परिवार को इस बात का ख्याल रखना पड़ेगा कि उसके आभा मंडल के पीछे निर्वाचित अध्यक्ष दब और छुप न जाएं। पार्टी को मुसीबत से उबारना है तो उसे अपने लोकप्रिय चेहरे को अलग रखना होगा, और निर्वाचित अध्यक्ष की सत्ता को अलग रखना होगा। आज अगर पार्टी के भीतर या मतदाताओं के सामने एक ऐसी तस्वीर जाएगी कि एक बुजुर्ग, वरिष्ठ, और तजुर्बेकार अध्यक्ष के रहते हुए भी सोनिया-परिवार पिछली सीट पर बैठकर कार चला रहा है, तो इससे परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनाने का पूरा मकसद ही शिकस्त पाएगा। पार्टी के भीतर सबसे अधिक, अपार ताकत रखते हुए भी इस परिवार को संगठन के मामलों में अपने को दूर रखना होगा, और तभी राहुल गांधी की यह साख बन पाएगी कि वे सचमुच ही पार्टी के बाहर का अध्यक्ष चाहते थे। अगर यह परिवार मालिक की तरह खुद घर बैठकर खडग़े से मैनेजर की तरह काम करवाएगा, तो पार्टी के और बुरे दिन आएंगे, राजनीतिक के साथ-साथ व्यक्तित्व की ईमानदारी की साख भी चौपट होगी। यह एक बड़ी चुनौती रहेगी कि आमतौर पर मुसाहिबों और खुशामदखोरों से घिरे हुए सोनिया-परिवार को संगठन पर अपनी ताकत और पकड़ के इस्तेमाल से अपने को रोकना होगा, अपने को बचाना होगा। इसके साथ-साथ खडग़े के लिए भी यह एक चुनौती रहेगी कि संगठन में वे सोनिया-परिवार के प्रतिद्वंद्वी या विरोधी की तरह न दिखें, और इस परिवार की लोकप्रियता का पार्टी के पक्ष में अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। यूपीए सरकार के वक्त मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की जोड़ी ने यह कर दिखाया था। सोनिया की शासन क्षमता शून्य थी, और मनमोहन सिंह की वोटरों के बीच अपील भी तकरीबन उतनी ही थी। लेकिन मनमोहन सिंह ने दस बरस संगठन के साथ संबंध और सरकार दोनों को बखूबी निभाया था। खडग़े इतने पुराने और इतने किस्म के कामों से आगे बढ़े हुए नेता हैं कि उनके लिए यह बात नामुमकिन नहीं है, मुश्किल जरूर हो सकती है। आज उनकी, कांग्रेस की, और सोनिया-परिवार की साख के लिए यह जरूरी है कि इस परिवार के साथ परस्पर सम्मान का एक संबंध रखते हुए वे कांग्रेस पार्टी को मुसीबत से उबारने की एक स्वायत्त कोशिश करें। किसी भी अगले चुनाव में पार्टी को इस परिवार की लोकप्रियता का सहारा तो मिलते ही रहेगा, फिलहाल उसे देश भर में अपने संगठन को जिंदा और मजबूत करना चाहिए, और भारत का चुनावी-लोकतांत्रिक इतिहास खडग़े और सोनिया-परिवार के इस दौर को बारीकी से दर्ज करेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक बड़ी अफसर प्रमिला पैटन ने अभी कहा है कि रूसी सैनिकों को एक फौजी रणनीति के तहत वियाग्रा देकर यूक्रेन के मोर्चे पर भेजा जा रहा है ताकि कैद की जाने वाली यूक्रेनी महिलाओं, और वहां के बच्चों, आदमियों को बलात्कार करके तमाम यूक्रेनी आबादी में दहशत पैदा की जा सके, और उन्हें हताश किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र जो कि आमतौर पर देशों के बीच विवाद में निष्पक्ष बने रहने की भरसक कोशिश करता है, उसकी अफसर की कही गई यह बात भयानक है, और अगर यह सच है तो यह एक नए किस्म का युद्ध अपराध है। वैसे तो दुनिया में जब कभी आम जिंदगी से हटकर कुछ भी होता है, तो उसका पहला शिकार औरतें और बच्चे होते हैं। चाहे यह पर्यटन हो, प्राकृतिक या मानव निर्मित विपदाओं की वजह से बेदखली हो, किसी जंग की वजह से देश छोडक़र जाने को मजबूर आम जनता हो, हर किस्म के अचानक और बुरे हालात की पहली मार औरत-बच्चों पर पड़ती है, और यूक्रेन में भी वही हो रहा है। जिस तरह यूक्रेन से आज करोड़ों लोगों को देश छोडक़र जाना पड़ रहा है, और दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ रही है, उससे भी सेक्स-शोषण और मजबूरी में सेक्स के कारोबार के शिकार औरत-बच्चों की भयानक कहानियां अगले कई बरस तक आती ही रहेंगी। लेकिन अपनी फौज को बलात्कारी बनाकर उस तैयारी से भेजने की बात दुनिया की सारी कहानियों से आगे बढक़र दिल दहलाती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की इस महिला अधिकारी की इस बात पर बांग्लादेश से निर्वासित और भारत में शरण पाकर बसी हुई लेखिका तसलीमा नसरीन ने लिखा है कि रूसी सैनिकों को वियाग्रा देकर यूक्रेन भेजा गया है ताकि वे बलात्कार कर सकें, लेकिन 1971 के जंग में पाकिस्तानी फौज ने दो लाख बांग्लादेशी महिलाओं से बलात्कार किया था और उनके पास वियाग्रा भी नहीं थी। तसलीमा ने जो लिखा है वे बातें उस वक्त भी हिन्दुस्तानी, पूर्वी पाकिस्तानी (अब बांग्लादेश) और दुनिया के मीडिया में खुलासे से आई थीं कि किस तरह पश्चिम पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) से आई हुई फौजों ने अपने ही देश के पूर्वी हिस्से की क्रांति को कुचलने के लिए जुल्म ढहाए थे, जिसके तहत महिलाओं से बड़े पैमाने पर बलात्कार किए गए थे। इन्हीं तमाम स्थितियों का जिक्र करते हुए, और पूर्वी पाकिस्तान से भारत में आने वाले करीब एक करोड़ शरणार्थियों का जिक्र करते हुए भारत ने इस जंग में दखल दी थी, और पाकिस्तान की फौज का आत्मसमर्पण करवाया था, और पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाए थे। आज दुनिया के अधिकतर हिस्सों से जंग के बीच फौजों के संगठित बलात्कार की खबरें आती हैं, और उन्हें जंग का एक हिस्सा मानकर चला जाता है।
महिलाओं पर जंग का पहला वार शुरू होता है, और वह अंत तक चलते रहता है। लेकिन महिलाओं से भेदभाव के मामले में हमलावर देशों की सरकारें या वहां के फौजी अकेले नहीं रहते। आज जब यूक्रेन पर रूस के परमाणु हमले के खतरे पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा चल रही है, अटकलें लगाई जा रही हैं, तब परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का कैसा असर होगा, यह सुनना अपने आपमें दहशत तो पैदा करता ही है, लेकिन वैज्ञानिकों के निकाले गए कुछ निष्कर्ष आज ही एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक इंटरव्यू में सामने आए हैं जो कि विज्ञान के लैंगिक भेदभाव को बताते हैं। यह भला किसने सोचा होगा कि परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिकों से यह एक ऐसी विनाशकारी तकनीक बन रही है जो कि औरत और मर्द में भेदभाव करेगी! वैज्ञानिक नतीजे बतलाते हैं कि परमाणु विस्फोट के बाद जो विकिरण फैलता है, या फैलेगा, उसका असर आदमियों के मुकाबले औरतों के बदन पर अधिक होगा, और वयस्कों के मुकाबले बच्चों के बदन पर अधिक होगा। यह तकनीक इस तरह के भेदभाव के साथ जनसंहार करने के लिए बनाई नहीं गई है, लेकिन वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि चाहे किसी परमाणु-बिजलीघर से फैले हुए परमाणु विकिरण की बात हो, या परमाणु हथियारों से, महिलाओं के बदन पर इसका असर पुरूषों के
बदन के मुकाबले अधिक होता है। जंग की दुनिया की इस सबसे खतरनाक तकनीक का असर भी इस तरह भेदभाव का हो सकता है यह बात किसी को शायद सूझी भी नहीं होगी, लेकिन यही हकीकत है।
और यह बात महज दुश्मन देशों के बीच फौजियों की की हुई नहीं होती है। देश के भीतर ही जो पुलिस या पैरामिलिट्री हथियारबंद लोग होते हैं, वे भी हथियारबंद संघर्ष के कई मोर्चों पर इस तरह के जुर्म करते मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर के नक्सल मोर्चे पर कई बार पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर स्थानीय गरीब आदिवासी ग्रामीण महिलाओं के साथ बलात्कार और उनके यौन शोषण के आरोप लगते रहे हैं। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना रहा है कि बीते करीब दो दशक में बलात्कार को आदिवासी समुदाय का आत्मविश्वास तोडऩे के लिए भी एक मौन सहमति या अनुमति दी गई थी, ताकि समुदाय का आत्मगौरव खत्म हो, उनका आत्मविश्वास कुचल जाए। इस बारे में बिना अधिक सुबूतों के अधिक खुलासे से लिखना ठीक नहीं होगा, लेकिन अभी कुछ बरस पहले तक की पुलिस ज्यादती के दौर में बस्तर में, उत्तर-पूर्वी राज्यों में जगह-जगह सुरक्षाबलों पर इस तरह के आरोप लगते आए हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया भर में हथियारबंद वर्दीधारियों के बीच बलात्कार को एक और हथियार की तरह इस्तेमाल करने की एक संस्कृति रही है, और उसे जिस तरह आज शायद रूस वियाग्रा देकर बढ़ावा दे रहा है, उसे कुछ सरकारें अनदेखा करके भी बढ़ावा दे सकती हैं। जब दुनिया के किसी और कोने में इस तरह की फौजी रणनीति सामने आती है, तब बाकी देशों को भी अपने भीतर लगने वाले ऐसे आरोपों, और उनकी अनदेखी के बारे में सोचना चाहिए, आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन करना चाहिए।
ईरानी महिलाओं पर हिजाब की बंदिश लादने वाली वहां की इस्लामिक सरकार के खिलाफ जो आंदोलन चल रहा है, वह अभूतपूर्व है। ईरान में करीब 40 बरस पहले शाह की सरकार के खिलाफ तख्तापलट से जो इस्लामिक सरकार आई थी, उसके खिलाफ तब से अब तक इतना मजबूत कोई आंदोलन चला नहीं था। औरत-मर्द की गैरबराबरी वाले ईरानी समाज में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि हिजाब को लेकर आंदोलन हो, और उसमें छात्र-छात्राओं से लेकर बूढ़ों तक सब शामिल हैं, और लड़कियों-औरतों के अलावा लडक़े और मर्द भी शामिल हैं। दुनिया की निगाहों से दूर कट्टर इस्लामी काबू वाले इस देश से भी आज जिस तरह हजारों वीडियो बाहर आ रहे हैं, वे बतलाते हैं कि सरकार के लिए आज वहां चुनौती न सिर्फ बहुत बड़ी है, बल्कि पूरी तरह अभूतपूर्व भी है। ईरानी महिलाएं और लड़कियां हिजाब से आजादी चाहती हैं।
लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि ऐन इसी वक्त हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट एक मामले से जूझ रहा है जिसमें भाजपा की सरकार वाले कर्नाटक में सरकार स्कूली पोशाक के साथ हिजाब पहनने वाली लड़कियों के हिजाब उतरवा चुकी है क्योंकि वह पोशाक का हिस्सा नहीं है। अब हिजाब बांधने का हक मांगती हुई मुस्लिम छात्राएं सुप्रीम कोर्ट में हैं। ऐसा भी नहीं है कि हिन्दुस्तान में हर मुस्लिम छात्रा हिजाब बांधना चाहती है। हिन्दुस्तान के मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा बिना बुर्के और बिना हिजाब वाला है। और हिन्दुस्तान के इस स्कूल-यूनिफॉर्म के मुद्दे को योरप के फ्रांस जैसे कई देशों के ताजा कानूनों से जोडक़र देखने की जरूरत है जहां पर सार्वजनिक जगहों पर मुस्लिम महिलाओं के बुर्के पर रोक लगाई जा रही है कि वह योरप की आजाद संस्कृति के खिलाफ है। जिस तरह ईरान में हिजाब न पहनने पर वहां की नैतिकता-पुलिस लड़कियों और महिलाओं को मार-मारकर जेल में डाल रही है, उसी तरह फ्रांस के समुद्र तटों से उन मुस्लिम महिलाओं को हटा दिया जा रहा है जो कि गर्दन से पांव तक पूरे बदन को ढांकने वाली बुर्किनी (बुर्के और बिकिनी को मिलाकर बनाया गया शब्द) पहनी हुई रहती हैं। योरप में कई जगहों पर यह माना जा रहा है कि ऐसे धार्मिक रिवाज मुस्लिमों को वहां के स्थानीय समाज के साथ घुलने-मिलने में बाधा बन रहे हैं।
अब हिन्दुस्तान और योरप की चर्चा के बाद कुछ अमरीका की चर्चा जरूरी है जहां पर अभी कुछ महीने पहले अमरीकी इतिहास के सबसे संकीर्णतावादी जजों से भर गए सुप्रीम कोर्ट ने 50 बरस पहले से महिलाओं को गर्भपात का मिला हुआ हक खारिज कर दिया है। अब गर्भ के शुरू के दो-चार हफ्तों के बाद कोई गर्भपात नहीं हो सकता, वह सजा के लायक जुर्म करार दिया गया है। वहां पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बहुत बड़ा जनमत खड़ा हो गया है और दुनिया के इस एक सबसे विकसित देश में आज आधी आबादी आधी सदी का यह हक खो बैठी है। अमरीकी समाज यह नहीं समझ पा रहा है कि दकियानूसी सोच वाले जो जज सुप्रीम कोर्ट में बहुमत में आ गए हैं, वे आने वाले महीनों में और कौन-कौन से तबाह करने वाले फैसले देंगे।
इन अलग-अलग बातों की चर्चा एक साथ इसलिए की जा रही है कि इन सबमें एक बात एक सरीखी है। ये सारी की सारी बातें एक महिला की अपनी पसंद को लेकर है कि उसे अपनी पोशाक से लेकर अपने बदन, और अपनी कोख तक पर अपना हक मिलना चाहिए। ईरान में हर महिला हिजाब के खिलाफ नहीं हैं, और वहां आंदोलन कर रही जनता उन महिलाओं का हिजाब उतरवाने के लिए सडक़ों पर नहीं हैं जो उन्हें पहनना नहीं चाहतीं। आंदोलन इसलिए है कि लोगों को अपनी मर्जी से पहनने या न पहनने के हक की आजादी रहे। इसी तरह हिन्दुस्तान में स्कूली पोशाक में हिजाब पहनने की मांग करने वाली छात्राओं की भी मांग यही है कि यह उनकी पसंद होना चाहिए कि वे हिजाब पहने या न पहनें। योरप में भी फ्रांस और कुछ दूसरे देशों में बुर्के और बुर्किनी पर लगाई गई रोक को बहुत से लोग इसलिए गलत मान रहे हैं कि यह रोक महिला से उसकी पसंद के हक को छीन रही है। अमरीका में महिलाओं का और बाकी तमाम लोगों का सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध इसलिए चल रहा है कि यह फैसला महिला के गर्भपात के फैसले का हक छीनता है।
इन सब बातों को एक साथ देखें तो मामला महिला की पसंद का है कि पोशाक से लेकर अपने गर्भ तक उसकी अपनी पसंद चलनी चाहिए। अब दिलचस्प और अटपटी बात यह है कि इससे जूझ रही सरकारें ईरान, हिन्दुस्तान, फ्रांस, और अमरीका जैसे देशों की सरकारें हैं। इनमें से सिर्फ अमरीका की सरकार है जो कि खुद आंदोलनकारी महिलाओं के साथ खड़ी है, और जो अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूरी तरह असहमत है। आज मुद्दा सरकारों का अकेले का न होकर अदालतों का हो गया है। हिन्दुस्तान में भी कर्नाटक के यूनिफॉर्म मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने सरकार से सहमति जताई है, और छात्राओं को पोशाक के साथ हिजाब पहनने का हक देने से मना कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में भी दो जजों में से एक इसी सोच के निकले, और दोनों जजों में असहमति की वजह से हिजाब का मामला अब बड़ी बेंच के लिए भेजा गया है।
दुनिया के अलग-अलग लोकतंत्रों या तानाशाहियों में, धार्मिक कट्टरता या बहुत अधिक लोकतांत्रिक उदारता की वजह से महिलाओं को हक देने के मामले में जो तंगदिली सरकारों से लेकर अदालतों तक सामने आ रही है, वह सारी तंगदिली बहुत हद तक मर्दों के बनाए हुए कानूनों और सामाजिक रिवाजों पर टिकी है। आज दुनिया में बहुत साफ-साफ यह समझने की जरूरत है कि महिलाओं को अपनी पोशाक और अपने बदन पर हक मिलना चाहिए, और उनके हिस्से का हक कोई सरकार या अदालत तय न करे। इस हिसाब से आज अगर ईरान में इस निहत्थी, अहिंसक नागरिक क्रांति के चलते सरकार भी उखाडक़र फेंक दी जाए, तो वह भी जायज होगा। हिन्दुस्तान की सरकारों और अदालतों को, और बाकी देशों में भी सरकारों और अदालतों को यह समझना चाहिए कि दबाव डालकर किसी महिला से धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाज मनवाना, या छीनना, दोनों ही गलत है। आज दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर चल रहे इन मुद्दों को एक साथ जोडक़र देखना जरूरी है।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
केरल में अभी कुछ दिन पहले एक तांत्रिक ने एक पति-पत्नी को दौलत दिलाने के लालच में ऐसा फंसाया कि वे मानव बलि देने के लिए तैयार हो गए। देवी को खुश करने के नाम पर पहले एक बलि दी गई, फिर कहा गया कि देवी अब तक खुश नहीं हुई है, तो दूसरी बलि दी गई, और इन लाशों का मांस पकाकर खाया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े करके घर के कई कोनों में गाड़ दिए गए, और अब जब सारी गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, तो केरल के लोग हक्का-बक्का हैं कि उनके बीच के लोगों ने यह कैसा काम किया है। यह बात कुछ अधिक हैरान इसलिए भी करती है कि केरल हिन्दुस्तान में सबसे अधिक पढ़ा-लिखा राज्य है, वहां के लोग तरह-तरह के कामगार हैं, दुनिया के कई कोनों में जाकर काम करते हैं, वहां राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की आवाजाही भी रहती है, और वहां के लोग शहरी समाज से कटे हुए किसी जंगल के लोग नहीं हैं। विज्ञान और टेक्नालॉजी की केरल के लोगों में सबसे अधिक समझ है, और इसलिए यह बात हैरान करती है। यह तांत्रिक एक मुस्लिम है जिसने एक हिन्दू दम्पत्ति को झांसा देकर मानव बलि के लिए तैयार किया, और ताजा जानकारी यह भी कहती है कि यह तांत्रिक पति के सामने ही उसकी पत्नी से सेक्स करता था, और इन सबसे देवी के खुश होने का दावा भी करता था। इस मामले की बाकी जानकारी दिल दहलाने वाली है, और इस तरह से बलि देकर इंसानी गोश्त खाने का यह भयानक मामला है।
केरल के इस ताजा मामले से एक बार फिर यह बात मजबूती के साथ स्थापित होती है कि विज्ञान, टेक्नालॉजी, या दूसरे किसी किस्म की आधुनिक औपचारिक शिक्षा लोगों को कितना भी समझदार बना ले, धर्म में उन्हें झांसा देने की, उनसे गलत काम करवाने की अपार क्षमता उससे ऊपर ही रहती है। अब जिस केरल के लोग सारे हिन्दुस्तान में तकनीकी दक्षता के लिए जाने जाते हैं, अंग्रेजी टायपिंग से लेकर चिकित्सा विज्ञान में टेक्नीशियन तक, हर किस्म के काम में केरल के लोगों को बेहतर माना जाता है, या वे अधिक दिखते हैं। वामपंथी प्रभाव वाला राज्य होने की वजह से केरल में सामाजिक जागरूकता भी काफी रही है, लेकिन इस ताजा हादसे से ऐसा लगता है कि समाज में हर कोई बराबर हद तक प्रभावित नहीं हो पाते हैं। तमाम विकास और शिक्षा के बावजूद अंधविश्वास कुछ लोगों में इतना गहरा बैठा है, धर्मान्धता इतनी गहरी बैठी है कि लोग मानव बलि और इंसानी गोश्त खाकर देवी को खुश कर रहे हैं। वैसे हम कई बार इस बात को लिखते हैं कि धर्म कई तरह की हिंसा सिखाता है, और धर्म का बुनियादी मिजाज हिंसक ही रहता है। वह अपने धर्म से परे के लोगों के साथ किसी भी दर्जे की हिंसा करने का आदी भी रहता है। ऐसे में अपनी देवी को खुश करने के लिए कुछ दूसरे लोगों की बलि दे देने में धर्मान्ध और अंधविश्वासी लोगों को लगता है कि अधिक दिक्कत नहीं हुई है। और अब तक जो जानकारी आई है उसके मुताबिक यह काम करने वाले लोग मानसिक रोगी भी नहीं पाए गए हैं। आमतौर पर इस किस्म के जुर्म में शामिल लोगों के बारे में लोग तुरंत ही उनके मानसिक रोगी होने का निष्कर्ष निकाल लेते हैं। लेकिन इस मामले को देखकर लगता है कि धर्म अपने आपमें एक बहुत खतरनाक मानसिक रोग है।
हिन्दुस्तान में अभी सौ-डेढ़ सौ बरस पहले तक किसी भी बड़े निर्माण के वक्त, उस जगह पर मानव बलि देने का एक रिवाज था। बड़े-बड़े पुल या बांध बनाते हुए बलि दी जाती थी, और कुछ जगहों पर तो उसका जिक्र करते हुए शिलालेख अब तक लगे हुए हैं। आमतौर पर इसके लिए गरीब दलितों को छांटा जाता था, जिनकी मौत पर कोई बवाल भी खड़ा नहीं होता था। धर्म की यह गजब की खूबी है कि जिस दलित की छाया भी किसी धार्मिक आयोजन पर नहीं पडऩी चाहिए, उस धार्मिक आयोजन में दलित को बलि चढ़ाने पर कोई रोक नहीं थी। धर्म समाज की जाति व्यवस्था की बुनियाद में भी रहा है, और समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था ने धर्म के साथ मिलकर एक-दूसरे को अधिक हिंसक भी बनाया है। केरल के मानव बलि के इस मामले को कुछ देर के लिए अलग भी रख दें, तो भी हिन्दुस्तान में धर्म की हिंसक शक्ल पर गौर करने की जरूरत है। हर गली-मुहल्ले में या किसी घर में होने वाले धार्मिक कार्यक्रम रास्ता रोकने से लेकर लाउडस्पीकर तक कई तरह से अराजक और हिंसक दिखते हैं, और एक-दूसरे के देखादेखी किसी एक धर्म के भीतर भी, और फिर मुकाबले में दूसरे धर्मों में भी यह अराजकता बढ़ती चलती है। अंधविश्वास धर्म का एक अनिवार्य तत्व है क्योंकि वैज्ञानिक सोच तो धर्म को पूरे का पूरा खारिज ही कर देती है, इसलिए वैज्ञानिक सोच को दफन करके ही उसके ऊपर धर्म का साम्राज्य खड़ा हो पाता है। पिछले कुछ चुनावों से हिन्दुस्तान में लगातार धर्म, धर्मान्धता, और धार्मिक हिंसा को इतना बढ़ावा दिया जा रहा है कि वह लोगों की लोकतांत्रिक सोच को पूरी तरह कुचलकर रख दे, और वोटर न्यायसंगत, तर्कसंगत तरीके से कुछ सोच ही न पाएं। ऐसा सिलसिला देश के लोगों की वैज्ञानिक सोच को भी खत्म करता है, और मानव बलि से नीचे भी कई किस्म के हिंसक पाखंड समाज में होते रहते हैं जो कि पुलिस और खबरों तक नहीं आ पाते। अब इसी मामले में अगर दो लोगों की बलि नहीं दी गई होती, उसका भांडाफोड़ नहीं हुआ रहता, तो देवी को खुश करने के नाम पर पति के सामने पत्नी से बलात्कार की बात तो कभी सामने आ भी नहीं पाती। और यह बात केरल में ही नहीं है, अधिकतर प्रदेशों में कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है कि भूतप्रेत उतारने के नाम पर, या बच्चा पैदा करवाने के नाम पर धर्मों से जुड़े हुए तरह-तरह के तांत्रिक या दूसरे धर्मों के लोग बलात्कार करते हैं। सबसे तकलीफ की बात यह है कि अंधविश्वास के शिकार परिवार ऐसे बलात्कार से सहमत भी रहते हैं, और इसके गवाह भी रहते हैं। जिन लोगों को ऐसी घटना एक अकेली घटना लगती है, किसी बीमार दिमाग का काम लगती है, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि एक देश और समाज के रूप में हिन्दुस्तान धर्म और धर्मान्धता का शिकार होकर, हिंसा को मान्यता देकर एक बीमार दिमाग वाला समाज बन ही चुका है, और इसकी हिंसा तरह-तरह से लोगों को अपना शिकार बना रही है, यह एक और बात है कि यह हिंसा आमतौर पर पुलिस और खबरों तक पहुंचने जितनी गंभीर नहीं रहती है, इसलिए अनदेखी रह जाती है।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अपने आपको हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी और देशभक्त कारोबारी साबित करने वाले, स्वघोषित बाबा, रामदेव की ताजा बकवास सामने आई है जिसमें किसी नशाविरोधी सार्वजनिक कार्यक्रम में वह मुस्लिम लोगों के नाम लेकर उनके नशा करने के बारे में बोल रहा है। रामदेव ने मंच और माईक से जब कई बार यह कहा कि सलमान खान का बेटा ड्रग्स लेते हुए पकड़ाया और जेल गया, तो लोगों ने उन्हें सुधारा, और कहा कि वह सलमान का नहीं, शाहरूख खान का बेटा था, तो रामदेव ने कहा कि शाहरूख का बच्चा ड्रग्स लेते पकड़ा गया, और सलमान भी ड्रग्स लेता है। उन्होंने कहा आमिर ड्रग्स लेता है या नहीं, यह पता नहीं, पूरा बॉलीवुड आज ड्रग्स की चपेट में है, एक्ट्रेस का तो भगवान ही मालिक है। फिर बॉलीवुड से परे इतिहास में जाकर उन्होंने कहा कि इस्लाम में अगर कोई शराब पी ले, या उसे हाथ भी लगा दे, तो उसे नापाक कहते हैं, लेकिन जिन्ना दारू पीता था, अच्छा हुआ मर गया।
वैसे तो रामदेव नाम का यह बकवासी आदमी किसी गंभीर टिप्पणी के लायक नहीं है, लेकिन जब वह इस देश में एक साम्प्रदायिक नफरत को फैलाने की ऐसी खुली और हिंसक कोशिश करता है, तो उसकी इस बदनीयत के खिलाफ लिखना भी जरूरी है। चूंकि देश के हर कस्बे तक इसके सामानों की दुकानें खुल चुकी हैं, यह खुद कई टीवी चैनलों का मालिक है, देश के सबसे मान्यता प्राप्त, और जीवनरक्षक इलाज, एलोपैथी के खिलाफ तरह-तरह की बकवास करने के बाद माफी मांगने को मजबूर हो चुका है, और फिर भी इसकी आदत जाती नहीं है, इसलिए इसकी बकवास के पीछे की साम्प्रदायिकता को उजागर करना जरूरी है।
लोगों को याद होगा कि यूपीए सरकार के समय उसे हटाने की नीयत से गांधी टोपी की आड़ में अन्ना हजारे ने जो बेईमान आंदोलन शुरू किया था, उसने मनमोहन सिंह सरकार को इस हद तक बदनाम करने में कामयाबी पाई थी कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह आसान हो गई थी। उस आंदोलन में रामदेव भी शामिल था, और देश भर में महज अकेली कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा उठाकर रामदेव ने धर्म से लेकर आध्यात्म तक, और राष्ट्रवाद से लेकर फर्जी फतवों तक का सहारा लिया, और कांग्रेसविरोधी और मोदी समर्थक अभियान चलाया। टीवी के कार्यक्रमों में रामदेव मोदी सरकार आने पर 35 रूपये में डॉलर, और 35 रूपये में पेट्रोल दिलवाने की मुनादी कर रहा था, और विदेश से कालाधन लाकर देश के हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख रूपये डलवाने की गारंटी भी दे रहा था। आज जब डॉलर और पेट्रोल दोनों ही मनमोहन सरकार के वक्त से डेढ़ गुने से अधिक महंगे होते दिख रहे हैं, तो बाबा की बोलती बंद है। अब उसे न डॉलर दिखता, न डीजल-पेट्रोल, और 15 लाख रूपये की बात तो वह सहूलियत के साथ भूल ही चुका है।
अब इस आदमी की नफरती नीयत इस ताजा भाषण से उजागर होती है जिसमें वह नशे के सिलसिले में चार मुस्लिमों के नाम लेता है, मानो मुस्लिमों के अलावा इस देश में और कोई नशा करते ही नहीं हैं, और न ही इतिहास में जिन्ना के अलावा कोई शराबी हुआ है। यह आदमी सलमान खान के ड्रग्स लेने की बात को इस दमखम से बोल रहा है कि मानो इसने खुद पतंजलि में सलमान खान का ड्रग टेस्ट किया हो। सच तो यह है कि आज सलमान खान अपनी आर्थिक क्षमता और रामदेव के आर्थिक साम्राज्य दोनों के मुताबिक हजार करोड़ रूपये का मानहानि का दावा करे, तो रामदेव की अकल पल भर में ठिकाने आ जाएगी। फिल्म इंडस्ट्री में कौन-कौन नशा नहीं करता है, इसका अंदाज लगाने के लिए भी रामदेव को एक और मुस्लिम कलाकार मिलता है, और वह कहता है कि आमिर ड्रग्स लेता है या नहीं, यह पता नहीं। कुल मिलाकर यह है कि नशे के संदर्भ में रामदेव को मुस्लिमों के अलावा और कोई नहीं दिखता। और यह बात मासूम बात नहीं है। इसके साथ-साथ नशे के सिलसिले में जब यह भगवाधारी, जटाजूटी, साधूनुमा आदमी कहता है कि एक्ट्रेस का तो भगवान ही मालिक है, तो यह बॉलीवुड की तमाम अभिनेत्रियों पर शक की उंगली भी उठाता है। इस आदमी को लोग दो वजहों से माफ करते आए हैं, बहुत से लोगों का यह मानना है कि साधू के हुलिए में जो भगवाधारी है, उसके सौ कतल माफ होते हैं, और ऐसे धर्मालु लोग रामदेव की हर बकवास को भक्तिभाव से सुनते हैं। दूसरे जो लोग रामदेव की हकीकत को जानते-समझते हैं, वे लोग इसे बुनियादी-बकवासी मानकर एक गैरगंभीर की तरह अनदेखा कर देते हैं। लेकिन हम इस पर इसलिए लिख रहे हैं कि हम भगवे की आड़ में नफरत फैलाने की ऐसी साम्प्रदायिक हरकत को अनदेखा करने की गैरजिम्मेदारी दिखाना नहीं चाहते। यह आदमी परले दर्जे का काईयां और धूर्त है, यह समय-समय पर अपने कारोबार के लिए तिरंगे झंडे की आड़ लेता है, राष्ट्रवाद की आड़ लेता है, योग और ऋषिमुनियों की आड़ लेता है। यह भाड़े के हत्यारे की तरह का सुपारी-आंदोलनकारी है जो कि किसी नाजुक वक्त पर किसी चुनिंदा निशाने के खिलाफ आंदोलन और अभियान का ठेका लेता है। कोई हैरानी नहीं होगी कि इसने आज बॉलीवुड के एक मुस्लिम-विरोधी तबके से ऐसी बकवास करने की कोई सुपारी ली हो। सलमान खान एक ऐसे पेशे में हैं कि वे शायद इस देश की जनता के एक बड़े धर्मान्ध और मुस्लिम-विरोधी तबके की नाराजगी लेना न चाहें, क्योंकि फिल्मों के दर्शक तो वे लोग भी होते हैं। वरना यह सही मौका है कि रामदेव को एक सबक सिखाया जाए, अदालत में घसीटा जाए, और यह साबित करने को कहा जाए कि सलमान खान ड्रग्स लेते हैं, यह साबित करे। अदालत में यह भी पूछा जाना चाहिए कि नशे के सिलसिले में इसे महज मुस्लिम नाम क्यों याद आते हैं? रामदेव की सोच के एकदम करीब वाले हिन्दुस्तान के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने तो अपने शराब पीने की बात को बहुत रहस्य बनाकर भी नहीं रखा था, और उनकी शराब के बारे में जानकारी हजारों लोगों को थी। रामदेव को ऐसी मिसालें इसलिए नहीं सूझतीं कि इनसे मुस्लिमों को बदनाम करने का उसका मौका कुछ कमजोर हो जाएगा। हम सार्वजनिक जीवन के किसी भी चर्चित और बड़े व्यक्ति की ऐसी साजिशों को अनदेखा करने के खिलाफ हैं, और इन्हें सार्वजनिक रूप से धिक्कारा जाना चाहिए, इनकी बदनीयत का भांडाफोड़ किया जाना चाहिए।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हिन्दी टीवी पर पारिवारिक मनोरंजन के नाम पर तरह-तरह की कुंठा और भड़ास को बढ़ाने की बेताज महारानी एकता कपूर अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर एक मामले में घिरी हैं, और जजों की आलोचना का शिकार हो रही हैं। पारिवारिक साजिशों, कटुता और कुटिलता के अंतहीन धारावाहिक बना-बनाकर एकता कपूर ने हिन्दुस्तान की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए पारिवारिक जहर घोल रखा है, लेकिन आज का अदालती मामला एक दूसरे धारावाहिक को लेकर है। एकता कपूर ने अपने ओटीटी प्लेटफॉर्म की एक वेबसिरीज में एक सैनिक की पत्नी को लेकर एक किरदार गढ़ा है, और इसे लेकर बिहार की एक जिला अदालत ने एक पूर्व सैनिक की शिकायत पर एकता कपूर के खिलाफ वारंट जारी किया है, उसके खिलाफ एकता कपूर सुप्रीम कोर्ट पहुंची हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने सुनवाई के दौरान कहा कि एकता कपूर इस देश की युवा पीढ़ी का दिमाग प्रदूषित कर रही हैं। वे लोगों को किस तरह का विकल्प दे रही हैं? जजों ने यह भी साफ किया कि सिर्फ इसलिए कि वे बड़े वकील की सेवाएं ले सकती हैं, सुप्रीम कोर्ट उनकी बात सुनने को मजबूर नहीं है। जजों ने कहा कि यह अदालत उनके लिए काम करती है जिनके पास आवाज नहीं है।
इस मामले से दो-तीन बुनियादी सवाल उठते हैं। एकता कपूर द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दी दर्शकों के लिए फैलाई जा रही मानसिक गंदगी के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं। और चूंकि गंदगी के दर्शक हमेशा ही रहते हैं, अपराध कथाओं की पत्रिकाएं टीवी पर अपराध के कार्यक्रम आने के पहले तक किसी भी दूसरी पत्रिका से अधिक बिकती थीं। जब तक कम अक्ल लोग अपने लिए बेहतर सामग्री छांटने के लायक नहीं रहेंगे, न सिर्फ घटिया सीरियल चलेंगे, बल्कि घटिया अखबार, घटिया टीवी समाचार चैनल अधिक कामयाब रहेंगे, और हैं भी। लेकिन एकता कपूर की इस गंदगी से परे इस मामले से जुड़ा हुआ एक अलग बुनियादी सवाल और है जिसे अनदेखा करना हम नहीं चाहते। जब सुप्रीम कोर्ट के दो जज एकता कपूर को फटकार लगा रहे हैं, तो हमारे लिए भी यह आसान हो जाता है कि हम भी गड्ढे में गिरे हुए हाथी को दो लात मार दें। लेकिन अदालत की इस फटकार से परे भी इस मुद्दे को लेकर यह समझने की जरूरत है कि एक भूतपूर्व सैनिक ने अगर किसी सीरियल की कहानी में एक सैनिक की पत्नी के किरदार को सैनिकों का अपमान माना है, तो क्या इस आधार पर किसी फिल्मकार के खिलाफ अदालत में मामला दर्ज होना चाहिए, और उसकी गिरफ्तारी होनी चाहिए? ऐसा होने पर कल के दिन मुम्बई के किसी मोहल्ले के लोग अदालत जा सकते हैं कि उनके इलाके को मुजरिमों का अड्डा बताया गया है, और इससे उनका इलाका बदनाम हो रहा है, वहां की प्रापर्टी के रेट गिर रहे हैं। अनगिनत हिन्दी फिल्मों में गांव के सबसे बड़े गुंडे और बलात्कारी को ठाकुर बताया गया है, तो क्या ठाकुर लोग इसका विरोध करें कि उनकी जाति बदनाम हो रही है? तमाम सूदखोर, काईयां कारोबारी बनिया बताए जाते हैं, तो क्या बनिया जातियां ऐसे किरदारों का विरोध करें? एक जिला अदालत के सोचने की सीमाएं रहती हैं। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की असीमित संभावनाओं की व्याख्या करने की सही जगह नहीं रहतीं, लेकिन जब इस मामले से जुड़ी एक अपील सुप्रीम कोर्ट में चल रही है, और सुप्रीम कोर्ट के जज एक सीरियल की सामग्री पर टिप्पणी कर रहे हैं, तो यह सामग्री और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बुनियादी बहस है, और इस पर जमानत अर्जी से अलग भी बात होनी चाहिए।
आज अगर एक लेखक या फिल्म-सीरियल निर्देशक एक काल्पनिक कथानक में भी किसी किरदार को इसलिए नकारात्मक दिखाने से रोक दिए जाएं कि उससे सैनिकों के परिवारों की भावनाओं को ठेस पहुंच रही है, तो फिर ऐसे कौन से नकारात्मक किरदार हो सकते हैं जिनसे किसी तबके की भावना का ठेस न पहुंचे? कहीं किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी, कहीं जाति की भावना को, और कहीं किसी पेशे से जुड़े हुए लोगों की भावनाओं को। और भला ऐसा कौन सा तबका हो सकता है जिसके भीतर कोई गलत लोग न हों, या जिसके लोग कोई गलती न करते हों? और सेना को या अदालत को किसी अतिरिक्त सम्मान और पवित्र भावना से देखने की जरूरत इसलिए नहीं है कि देश और समाज के बाकी तबकों की तरह इन तबकों में भी सभी किस्म के गलत लोगों को यह देश देख चुका है। सेना के लोगों को बेईमानी और भ्रष्टाचार करते हुए, देशद्रोह करते हुए दुश्मन देश के लिए जासूसी करते भी हर कुछ महीनों में पकड़ा जाता है। इसलिए जहां किसी रचनात्मक कलाकृति, या लेखक-फिल्मकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात आती है, तो किसी एक नकारात्मक किरदार से किसी तबके की भावनाओं को आहत होने की बात मानने लायक नहीं है। अगर ऐसी तंग सीमाएं लागू की जाएंगी, तो अच्छी रचनात्मकता भी खत्म हो जाएगी, एकता कपूर की रचनात्मकता हो सकता है कि घटिया दर्जे की भी हो। लेकिन जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बुनियादी बात की जाएगी, तो उसमें संदेह का लाभ न सिर्फ अच्छे रचनाकारों को मिलता है, बल्कि बुरे रचनाकारों को भी मिलता है। स्वतंत्रता को अनिवार्य रूप से उत्कृष्टता के साथ जोडक़र नहीं देखा जा सकता। इस देश में आजाद रहने का जितना हक एक पुलिस को है, उतना ही हक एक चोर को भी है। जुर्म पर सजा के पहले और बाद बुरे लोग भी आजाद ही रहते हैं, और यही लोकतंत्र है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जिला अदालत के जारी किए हुए वारंट के खिलाफ सुनवाई करते हुए इस सीरियल पर भी टिप्पणी की है, जबकि यह सीरियल इस अदालत में बहस का मुद्दा नहीं था, और जिस निचली अदालत में यह बहस चलनी है, उसके छोटे से जज पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की भारी-भरकम टिप्पणियों का एक नाजायज असर भी हो सकता है। इसलिए अब अभिव्यक्ति की इस किस्म की आजादी पर बहस बिहार के एक जिले की अदालत में आसान भी नहीं रह गई है। कल सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, उसके इस पहलू को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि जजों ने निचली अदालत के न्याय क्षेत्र के पहलुओं पर अपनी राय दी है, जो कि निष्पक्ष न्याय की संभावनाओं को घटा सकती है।
एकता कपूर के आलोचकों को यह सिलसिला आज अच्छा लग सकता है, लेकिन कल अगर ऐसी ही अदालती नजीरों की बुनियाद पर श्याम बेनेगल जैसे किसी अच्छे निर्देशक की फिल्म या सीरियल पर भी रोक लगा दी जाएगी कि उसके किसी किरदार के काम किसी तबके को नाराज कर रहे हैं, तब क्या होगा? जब देश की सबसे बड़ी अदालत कुछ कहती है तो उसके दूरगामी प्रभावों को भी सोच लेना चाहिए। आज घेरे में एकता कपूर है, कल यही मिसाल बेहतर लोगों पर भी लागू होगी, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बनेगी। यह मामला सोच-समझकर आगे बढऩे का है, सुप्रीम कोर्ट जजों की तीखी बातों पर तालियां बजाने का नहीं है।
हिन्दुस्तान की इन दिनों की खबरें देखें तो कहीं हरियाणा में मस्जिद में घुसकर नमाज पढ़ते लोगों की पिटाई, और गांव से निकालने की धमकी दिखाई देती है, तो कहीं यूपी के बागपत में एक मुस्लिम की पीट-पीटकर हत्या करने वाले और जयश्रीराम का नारा लगाकर फरार होने वाले चार हिन्दू युवकों को गिरफ्तार किया गया है। इसके पहले कर्नाटक के एक मदरसे में घुसकर जबर्दस्ती वहां पूजा करने वाले कुछ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। दिल्ली में भाजपा के सांसद परवेश वर्मा ने अभी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से एक समुदाय के पूरे बहिष्कार की बात कही है और कहा है कि इस समुदाय की अक्ल ठिकाने लगानी है तो फिर इनकी दुकानों का बहिष्कार करो, इनके लोगों के ठेलों से कुछ न खरीदो, और इन्हें रोजगार भी न दो।
हिन्दुस्तान में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता है जब मुस्लिमविरोधी लोग देश में कहीं न कहीं इस तरह की हरकतें न करते हों, या इस तरह के फतवे जारी न करते हों। हर कुछ हफ्तों में भीड़त्या दिखाई पड़ती है जिसमें जानवर ले जा रहे डेयरी कारोबारी भी पीट-पीटकर मारे जाते हैं, या किसी के पास किसी भी तरह का गोश्त मिलने पर उसे गोमांस के शक में मार दिया जाता है। देश की अदालतें मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों पर बहसों से भरी हुई हैं, और ऐसा लगता है कि तमाम देश ही इस एक समाज में सुधार करने पर आमादा है। कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के बाल और कान न दिखने पर मानो हिन्दू छात्र-छात्राओं का मन पढ़ाई की तरफ से हट जा रहा है, और मुस्लिम बच्चियों के पढऩे की संभावना को भी हिजाब हटाने की जिदतले दफन कर दिया जा रहा है। पूरा का पूरा देश एक ऐसे जुनून से भर दिया जा रहा है कि जो कुछ मुस्लिम है, वह गलत है, उसमें सुधार और मरम्मत होनी चाहिए, रिवाजों में मरम्मत के साथ-साथ मुस्लिमों की मरम्मत भी होनी चाहिए, और इन तब तक सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए जब तक ये भूखे मरकर सुधर न जाएं, बदल न जाएं। नफरत के ऐसे सैलाब के बीच झांसा और धोखा देने के लिए तरह-तरह की बातें की जाती हैं, मुस्लिमों का डीएनए हिन्दुस्तान के हिन्दुओं के डीएनए वाला ही बताया जाता है, और ऐसे डीएनए-भाई को कूट-कूटकर उसका कीमा बना देने का भाईचारा दिखाया जाता है।
दिक्कत यह नहीं है कि समाज का एक छोटा हिस्सा इतना हिंसक हो गया है, और लोकतंत्र के सारे संवैधानिक स्तंभ इस तरह बेअसर हो गए हैं, बेरहम हो गए हैं कि वे एक स्कूली बच्ची की पढ़ाई छुड़वा देने की कीमत पर भी उसका हिजाब उतरवाने पर आमादा हैं मानो उसके हिन्दू सहपाठियों की पढ़ाई उसके बाल और कान देखकर बेहतर हो जाएगी। यह पूरा सिलसिला कम खतरनाक है, अधिक खतरनाक है देश की बहुसंख्यक आबादी के बहुसंख्यक हिस्से का ऐसी हिंसा की तरफ से बेपरवाह हो जाना। यह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में अब एक नया सामान्य वातावरण है, एक नवसामान्य माहौल। हिंसा जितनी खतरनाक होती है उससे कहीं अधिक खतरनाक हिंसा के लिए बर्दाश्त होती है। अब मुस्लिमों के साथ हिंसा हिन्दुस्तान के मीडिया के एक बड़े हिस्से में तो तब तक खबर नहीं बनती, जब तक सोशल मीडिया का एक हिस्सा उसके सुबूत पेश नहीं कर देता। कुछ इंसानों का कातिल हो जाना उतना खतरनाक नहीं है जितना कि कातिलों के लिए लोगों के मन में सम्मान हो जाना है, बलात्कारियों के लिए मन में इज्जत, और हाथों में माला आ जाना है। आज हिन्दुस्तान में मुस्लिम को मारने वाले, उनकी महिलाओं से बलात्कार करने वाले लोगों का सम्मान, सामान्य हो गया है, यह लोगों के बीच मान्य हो गया है। अधिक खतरनाक यह बर्दाश्त है, और लोकतंत्र इससे जीत नहीं सकता।
हिन्दुस्तान का लंबा इतिहास रहा है जिसमें पिछले सैकड़ों बरस तो कई धर्मों के लोगों के सहअस्तित्व के रहे हैं। जब लोकतंत्र नहीं था, अदालतें नहीं थीं, तब भी लोग एक-दूसरे को बर्दाश्त करते हुए साथ जी लेते थे। राजाओं के वक्त भी इस तरह की हिंसा मुमकिन नहीं थी। अधिकतर जगहों पर कई धर्मों के रिवाज साथ-साथ चल जाते थे। लोकतंत्र आने के बाद जो सौ फीसदी बराबरी की संवैधानिक सोच थी, वह अभी दस बरस पहले तक तो तकरीबन ठीक-ठाक चलती रही, लेकिन इन दस बरसों में यह पूरी तरह कुचलकर खत्म कर दी गई। पौन सदी के पहले जो लोकतंत्र नहीं था, और लोकतंत्र ने आधी सदी के सफर में जो कुछ सीखा था, उस स्लेट को इन दस बरसों में पूरा ही साफ कर दिया गया है। मतलब यह कि लोकतंत्र में जितना सभ्य होने की गुंजाइश थी उससे सौ गुना अधिक क्षमता उसकी असभ्य होने की है, और उसने बहुत रफ्तार से असभ्य होकर एक हिंसक शक्ल अख्तियार कर ली है। यह बात तय है कि देश के हालात अगर कभी बेहतर भी होंगे, तो भी इस हिंसा और नफरत से उबरने में उसे कई गुना अधिक वक्त लगेगा, उस वक्त के मुकाबले जो कि उसने हिंसक और नफरतजीवी होने में लगाया है। लोगों को अपनी आने वाली पीढिय़ों की भी फिक्र करना चाहिए कि इतनी नफरत के बीच, इतनी हिंसा के बीच, वह किस तरह जिंदा रहेगी, कितनी महफूज रहेगी।
मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा बड़े दिलचस्प आदमी हैं। उन्होंने हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक मॉडल की रक्षा का जिम्मा अकेले ले लिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह इन दिनों सिर्फ पूजा-पाठ और कन्या-कल्याण के सिलसिले में ही खबरों में आते हैं, राज्य के बाहर की मामलों को लेकर एक हमलावर-हिन्दुत्व तेवरों के साथ खड़े हुए सिर्फ नरोत्तम मिश्रा दिखते हैं। और ऐसे तेवर चूंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बड़े सुहाते हैं, इसलिए चैनल एक-दूसरे से गलाकाट मुकाबले में उनके कहे हुए एक-एक शब्द को कैमरों और माइक्रोफोन पर सोखते हुए उसे लोगों के सामने परोसने की हड़बड़ी में रहते हैं। हाल के बरसों में मध्यप्रदेश के ये गृहमंत्री बहुत से लेखकों, कलाकारों, अभिनेताओं, कार्टूनिस्टों को कानूनी कार्रवाई की धमकियां देते आए हैं, गिरफ्तारी की चेतावनी देने में भी वे देश के अव्वल मंत्री हैं। यह एक बड़ा अजीब सा संयोग है कि नरोत्तम मिश्रा उन्हीं मुद्दों पर अधिक भडक़ते दिखते हैं जिनके पीछे कोई मुस्लिम नाम होता है। जिस तरह सांड के बारे में कहा जाता है कि वह लाल कपड़ा देखकर भडक़ता है, नरोत्तम मिश्रा हरा कपड़ा देखकर भडक़ते हुए दिखते हैं।
अब अभी ताजा मामला एक निजी बैंक के एक वीडियो-इश्तहार का है जिसमें आमिर खान और कियारा अडवानी एक नए शादीशुदा जोड़े की तरह दिखाए गए हैं, और इसमें परंपरागत बिदाई के बाद दुल्हन दूल्हे के घर नहीं जाती, बल्कि दूल्हा दुल्हन के घर जाता है, वहां दुल्हन की मां दोनों की आरती करती है। यह इश्तहार सवाल करता है कि सदियों से जो प्रथा चल रही है वही क्यों चलती रहेगी? जो लोग विज्ञापन के कारोबार की बहुत मामूली और सतही समझ रखते हैं, उन लोगों को भी यह मालूम है कि विज्ञापन की योजना कोई विज्ञापन एजेंसी बनाती है, उसके लोग कथानक लिखते हैं, कोई फिल्मकार टीम उस पर इश्तहार बनाती है, और उसमें सबसे कम दखल कलाकारों का होता है जो कि उन्हें दिए गए कपड़े पहन लेते हैं, दिए गए डायलॉग बोल देते हैं, बताए मुताबिक मुस्कुरा या रो देते हैं। अब ऐसे में जिस बैंक का यह इश्तहार है उसे चेतावनी देने के बजाय, विज्ञापन एजेंसी को चेतावनी देने के बजाय अगर मध्यप्रदेश के गृहमंत्री सिर्फ आमिर खान को चेतावनी दे रहे हैं, तो इसके पीछे की उनकी नीयत को आसानी से समझा जा सकता है। इसी इश्तहार में परंपराओं को तोडऩे का ठीक उतना ही काम तो दुल्हन बनी हुई हिन्दू अभिनेत्री कियारा अडवानी ने भी किया है जो कि दूल्हे को ब्याह कर घर लेकर आई है। लेकिन नरोत्तम मिश्रा को इस दुल्हन का काम नहीं खटक रहा, सिर्फ आमिर खान के बारे में उनका कहना है कि इस तरह की चीजों से धर्म विशेष की भावनाएं आहत होती हैं, और उनका मानना है कि उन्हें (आमिर खान को) किसी की भावनाओं को आहत करने की इजाजत नहीं है।
यह बहुत ही विरोधाभासी बात है कि एक तरफ तो भाजपा यह कहती है कि सैकड़ों बरस बाद दिल्ली पर एक हिन्दू का राज लौटा है। दूसरी तरफ देश भर में जगह-जगह, बात-बात पर हिन्दू भावनाएं इस तरह और इस हद तक आहत हो रही हैं जैसी कि कांग्रेसी या किसी दूसरी सरकार के रहते भी नहीं हुई थीं। आज हिन्दू पहले के मुकाबले सबसे अधिक खतरे में दिख रहे हैं क्योंकि देश भर में जगह-जगह वे अपनी भावनाओं को आहत पा रहे हैं। अब ये जख्म देश में एक हिन्दूवादी सरकार के रहते, और अधिकतर प्रदेशों में हिन्दूवादी सरकारों के रहते कैसे पैदा हो रहे हैं, यह हैरानी की बात है। सैकड़ों बरसों में हिन्दू भावनाएं हिफाजत से थीं, और अब वे खतरे में पड़ गई हैं, यह कैसी अजीब बात है? खुद भाजपा के भीतर बड़े-बड़े मुस्लिम नेताओं ने हिन्दू लड़कियों से शादियां की थीं, बड़े-बड़े भाजपा नेताओं की बेटियों ने मुस्लिम नौजवानों से शादियां की थीं, लेकिन कभी भी इस देश पर लव-जेहाद नाम का खतरा नहीं मंडराया था। पता नहीं कैसे देश के सबसे आक्रामक हिन्दूवादी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से देश इस लव-जेहाद के खतरे में बुरी तरह डूब गया है, या शायद पहली बार उसका अहसास हुआ है, क्योंकि मुस्लिम मर्दों के हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर कभी भाजपा ने भी अपने मुस्लिम नेताओं को नोटिस जारी नहीं किया था, इसके खिलाफ कोई सलाह जारी नहीं की थी। मुस्लिमों के खिलाफ सबसे अधिक बोलने और लिखने वाले नेताओं में से एक, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की अखबारनवीस बेटी ने एक मुस्लिम से शादी की, लेकिन तब भी हिन्दू धर्म खतरे में नहीं आया था। जब से उत्तरप्रदेश में योगीराज आया, देश में मोदीराज आया, और मध्यप्रदेश में नरोत्तम मिश्रा गृहमंत्री बने, तब से हिन्दुत्व पता नहीं कैसे इस बुरी तरह खतरों से घिर गया है! यह एक बहुत फिक्र की नौबत है कि देश में सेंसर बोर्ड के रहते हुए, केन्द्र सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय रहते हुए, विज्ञापनों पर निगरानी रखने वाले संगठन के रहते हुए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नजर रखन वाले संगठन के रहते हुए, और प्रेस कौंसिल जैसी संवैधानिक संस्था के रहते हुए भी मध्यप्रदेश के गृहमंत्री को पूरे देश में अभिव्यक्ति पर नजर रखनी होती है, और पूरे देश में हिन्दुत्व की रक्षा करनी पड़ती है। यह बात हिन्दुत्व के तमाम झंडाबरदारों के लिए फिक्र की है कि एक प्रदेश के गृहमंत्री के कंधे चाहे कितने ही मजबूत हों, वे आखिर कितना बोझ उठा सकते हैं? ऐसा लगता है कि नरोत्तम मिश्रा योगी आदित्यनाथ के बाद अपने आपको हिन्दुत्व के सबसे बड़े रक्षक की तरह पेश कर रहे हैं, और आगे तो फिर हिन्दुत्ववादी ताकतों और संगठनों को यह सोचना होगा कि इन मजबूत कंधों पर और कौन-कौन सी जिम्मेदारियां डाली जाएं। आज यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि अगर नरोत्तम मिश्रा जैसा गृहमंत्री मध्यप्रदेश मेें न हो, तो फिर पूरे देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें, और मुस्लिम लेखक-कलाकार क्या-क्या नहीं करेंगे? लगातार मेहनत से अपने आपको हिन्दुत्व-रक्षक की तरह पेश करते हुए नरोत्तम मिश्रा ने एक मिसाल कायम की है, और जैसे-जैसे देश में हिन्दुत्व पर खतरा बढ़ेगा, वैसे-वैसे नरोत्तम मिश्रा का महत्व बढ़ेगा, उनकी जरूरत बढ़ेगी। आगे-आगे देखें, होता है क्या।
टेक्नालॉजी किस तरह हिन्दुस्तान के एक प्रतिष्ठित समझे जाने वाले, और अहमियत रखने वाले पेशे और कारोबार को प्रभावित कर रही है, यह देखना हो तो मीडिया और सरकार को देखना चाहिए। सरकार के नियम मीडिया के तौर-तरीकों को, नीति-सिद्धांतों को, परंपराओं को किस तरह बदल रहे हैं, यह कागजों पर लिखा दिखता है। केन्द्र सरकार और बहुत सी राज्य सरकारों ने मीडिया को इश्तहार देने के जो नियम बनाए हैं, वे पहले तो इस कारोबार को, और फिर उसी वजह से पत्रकारिता के पेशे को कुचल रहे हैं। इसमें एक सिलसिला तो पुराना है जो कि अखबारों के एकाधिकार के वक्त से चले आ रहा है जिसके तहत केन्द्र सरकार की एक एजेंसी अखबारों की प्रसार संख्या तय करती है। और इस एजेंसी के नियमों को पूरा करने के लिए अखबारों का पूरा कारोबार फर्जी आंकड़ों पर खड़ा किया जाता है, इन आंकड़ों से अखबारों के केन्द्र सरकार के विज्ञापनों के रेट भी तय होते हैं, और कई राज्य सरकारें केन्द्र सरकार के इसी रेट को ज्यों का त्यों मान लेती हैं। अब प्रसार संख्या का यह खेल पूरी तरह से जालसाजी के आंकड़ों पर टिका रहता है, और मीडिया-कारोबार पर लिखने वाले लोग यह लिखते आए हैं कि अधिक प्रसार संख्या दिखाने के लिए बड़े अखबार किस तरह लाखों कॉपियां ऐसी छापते हैं जो कि छापते ही ट्रकों में भरकर लुग्दी कारखाने भेज दी जाती हैं, दुबारा कागज बनाने के लिए। बहुत से अखबार तरह-तरह की प्रतिबंधित योजनाएं लागू करते हैं ताकि फर्जी या असली ग्राहक जुटाए जा सकें, और उससे सरकारी रेट बढ़वाया जा सके, और फिर उस रेट को दिखाकर बाजार का रेट भी बढ़वाया जा सके। लेकिन इस फर्जीवाड़े से परे पहले से एक बात तो यह भी चली आ रही थी कि अखबारों में समाचार और विचार ऐसे छपें जिन्हें अधिक से अधिक लोग पढ़ें, फिर चाहे वे गैरजिम्मेदार और सनसनी के हों, लोगों को लुभाने और भडक़ाने वाले हों, या झूठे भी हों। यह पूरा सिलसिला तो पहले से चले आ रहा था, और इसे आज की टेक्नालॉजी से जोडक़र देखना गलत होगा।
लेकिन अब छपे हुए अखबारों से परे की बात करें, तो पहले तो समाचार चैनलों जैसा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बाजार में बढ़ते चले गया, और अपने गलाकाट मुकाबले में उसने फर्जी दर्शक संख्या जुटाने का संगठित जुर्म किया। लोगों को याद होगा कि मुम्बई में किस तरह ऐसी ही फर्जीवाड़े में कुख्यात टीवी पत्रकार-मालिक अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी हुई थी, और फर्जी दर्शक संख्या जुटाने वाला पूरा गिरोह गिरफ्तार हुआ था। अब हालत यह है कि भारत में इस दर्शक संख्या को गिनने के लिए जो संस्था बनी है, उसका एनडीटीवी से लेकर जीन्यूज तक बहुत से समाचार चैनलों ने बहिष्कार कर दिया है क्योंकि वह नाजायज तौर-तरीके इस्तेमाल करके कुछ खास लोगों को बढ़ावा देने की एक मशीन बन गई है। फिर मानो मीडिया को तबाह करने के लिए यह भी काफी नहीं था, तो ऑनलाईन मीडिया विकसित हुआ, और उस पर पहुंचने वाले दर्शकों या पाठकों की गिनती के तरीके निकले। यहां से मीडिया मालिकों के हाथ एक हथियार भी लगा कि किस तरह किसी समाचार, फोटो, विचार, या वीडियो तक पहुंचने वाले लोगों को गिना जाए, वहां पर उनका कितना वक्त गुजरता है इसे जोड़ा जाए। यह औजार मीडिया मालिकों के हाथ भी है, और इंटरनेट-तकनीक की मेहरबानी से यह बाजार के हाथ भी है। अब सरकारी या कारोबारी इश्तहारों के लिए यह एक पैमाना बना दिया गया है कि अलग-अलग कितने लोग किसी वेबसाईट पर रोज पहुंचते हैं, या उस पर कितना वक्त गुजारते हैं। किसी समाचार पर आधा मिनट अगर लोग नहीं गुजारते हैं, तो कुछ पैमाने उन्हें उस समाचार का पाठक ही नहीं मानते। ऐसे पैमानों से अब सरकारी इश्तहार तय होते हैं, और ऑनलाईन मीडिया, पत्रकारिता की पुरानी परंपराओं को कचरे की टोकरी में डालकर इन्हीं पैमानों के मुताबिक काम करने लगा है। अब वेबसाईट पर हिट्स बढ़ाने के लिए लोग वहां पर दस-दस किस्म के भविष्यफल देने लगे हैं, पूरे देश और दुनिया के सेक्स और जुर्म की खबरों से वेबसाईट पाट दी गई हैं, और तरह-तरह की नग्न या अश्लील तस्वीरों से लोगों को वहां खींचा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि सरकारी पैमाने भी ऐसी तमाम हिट्स को गिनते हैं, और उसी के मुताबिक इश्तहार के रेट और इश्तहार तय करते हैं। जाहिर है कि गांवों मेें सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पम्प के समाचार के मुकाबले उर्फी जावेद के कपड़े न पहनने के समाचार और फोटो को हजार गुना लोग देखेंगे, और लोगों को धोखा देने वाले भविष्यफल को हजारों लोग रोजाना ही नशे की तरह इस्तेमाल करेंगे। फिर मानो इतना भी काफी नहीं हो, तो अब यह पैमाना तय कर दिया गया है कि जिस समाचार पर लोग तीस सेकेंड नहीं रूकेंगे, उसे पढ़ा हुआ भी नहीं गिना जाएगा। नतीजा यह है कि तीस सेकेंड से कम में पूरा पढ़ लिए जाने लायक समाचार को वेबसाईटें अब तरह-तरह से पानी मिलाकर लंबा बनाती हैं, बीच-बीच में इश्तहार डालकर समाचार के वाक्य दूर तक खींचती हैं, और यह गारंटी करती हैं कि लोगों के तीस सेकेंड उस पर लग ही जाएं। मतलब यह कि लोगों का वक्त बर्बाद करने, काम की जानकारी को छुपाने, प्रदेश या शहर का नाम शुरू में न बताने, और लोगों को गैरजरूरी कचरा पढ़वाने से अब अधिक सरकारी कमाई हो सकती है। नतीजा यह हुआ है कि पत्रकारिता की जिस तकनीक और परंपरा में कम से कम शब्दों में जानकारी देने को बेहतर समझा जाता था, सबसे शुरू में ही बुनियादी जानकारी देना जरूरी समझा जाता था, आज सरकारें इसका ठीक उल्टा करने पर अधिक भुगतान कर रही हैं। जिन लोगों ने बेहतर अखबारनवीसी की हुई हैं, उनका तजुर्बा और उनका तौर-तरीका आज के कारोबारी और सरकारी पैमानों पर नुकसान का सौदा हो गया है। समाचार लिखने के जो तरीके सदियों से चले आ रहे थे, उन्हें दशकों में खत्म कर दिया गया है। जैसे भविष्यफल को छापना नाजायज माना जाता था, वह आज वेबसाईटों की हिट्स बढ़ाने का हथियार हो गया है, जैसी अश्लीलता किसी वक्त लोगों को कोर्ट पहुंचा सकती थी, वह आज कारोबारी कामयाबी तक पहुंचा रही है। बाजार के तो कोई उसूल होते नहीं हैं, लेकिन अब सरकारें भी टेक्नालॉजी के औजारों की सहूलियत से खुश हैं, और उन्होंने भी मीडिया से किसी भी उसूल की उम्मीद रखना बंद कर दिया है।
अखबारों के फर्जी आंकड़ों से होते हुए, टीवी समाचार चैनलों की फर्जी दर्शक संख्या के बाद अब वेबसाईटों के फर्जी हिट्स तक, मीडिया-कारोबार ने काफी तरक्की कर ली है। और अब आगे सोशल मीडिया पर, ट्विटर और फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर फर्जी बोट्स के सहारे अपने कारोबार को अधिक दिखाने का एक नया फर्जीवाड़ा चल रहा है, और वह भी उजागर होना शुरू हो गया है। लेकिन जिस तरह जुर्म की दुनिया नकली नोटों पर चलती है, उसी तरह आज का मीडिया कारोबार सरकारों की मेहरबानी से नकली आंकड़ों पर चल रहा है, ऐसे में पाठक और दर्शक को पत्रकारिता के किन्हीं सिद्धांतों की उम्मीद नहीं करना चाहिए। इन दिनों कुछ समाचार वेबसाईटें बिना इश्तहारों के चल रही हैं, और वे अपने पाठकों से एक भुगतान लेती हैं, या दान मांगती हैं। मीडिया में शायद यही एक हिस्सा अभी ईमानदार रह गया दिखता है जो कि सिर्फ पाठकों के प्रति जवाबदेह है, किसी फर्जीवाड़े के प्रति नहीं।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
तमिलनाडु में दक्षिण भारत की एक मशहूर अभिनेत्री नयनतारा और उनके पति विग्नेश शिवन ने जुड़वां बच्चों के होने की घोषणा की है। अभी चार महीने पहले ही इनकी शादी हुई थी, और ये बच्चे सरोगेसी से होने की खबर है। तमिलनाडु सरकार इस मामले में जांच करवा रही है कि शादी के तुरंत बाद सरोगेसी से बच्चे होना सरोगेसी कानून के खिलाफ है, और यह कैसे हुआ? आज हिन्दुस्तान के कानून के मुताबिक शादी के पांच साल बाद ही बच्चे न होने पर कोई जोड़ा सरोगेसी से बच्चे पाने की कानूनी औपचारिकता पूरी करके उसकी कोशिश कर सकते हैं। दूसरी तरफ बच्चों को गोद लेने के कानून भी बहुत कड़े हैं, और उसके लिए भी बड़ी लंबी-चौड़ी प्रतीक्षा सूची हमेशा ही रहती है, महीनों की कानूनी औपचारिकता पूरी करनी पड़ती है। इसलिए यह भी आसान नहीं है कि कोई इस तरह जुड़वां बच्चे ले लें। इसलिए ऐसा लगता है कि सरोगेसी कानून को तोडक़र उस तकनीक से ये बच्चे हासिल किए गए हैं। इसके पहले भी बॉलीवुड के कुछ सबसे चर्चित लोगों ने बिना शादी के भी सरोगेसी से बच्चे पैदा किए, और शाहरूख खान जैसे बड़े कलाकार ने स्वाभाविक तरीके से हुए दो बच्चों के बाद सरोगेसी से तीसरा बच्चा पाया था। बाद में केन्द्र सरकार ने सरोगेसी के कानून को बड़ा कड़ा बनाया ताकि गरीब महिलाओं की कोख किराये पर लेकर लोग मनचाहे या मनमाने बच्चे पैदा न करें। अब यह मामला दक्षिण के मशहूर फिल्म कलाकारों से जुड़ा होने की वजह से इस नये कानून के बारे में एक नई जागरूकता भी लाएगा। तमिलनाडु सरकार की यह भी एक साहसी पहल है कि वह मशहूर लोगों के मामले में भी जांच करवाने की घोषणा कर रही है।
भारत में अभी एक-दो बरस पहले तक निजी चिकित्सा उद्योग के भीतर कृत्रिम गर्भाधान या इस तरह की दूसरी तकनीक बेचने वाले बड़े अस्पतालों ने यह सिलसिला चला रखा था कि वे गरीब महिलाओं को अपनी कोख किराये पर देने के लिए तैयार करते थे, और संपन्न जोड़ों के शुक्राणु और अंडे से ऐसी महिलाओं को गर्भवती करके सरोगेसी से बच्चे पैदा करवाते थे। ऐसे एक-एक मामले में अस्पताल लाखों रूपये लेते थे, और गरीब महिलाओं को भी इसमें लाख-दो लाख रूपये मिल जाते थे। लेकिन इंसानी जिस्म के ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ जब आवाज उठने लगी तो केन्द्र सरकार ने एक कड़ा कानून बनाया और अमीर जोड़ों की गर्भाधान और संतान जन्म की तकलीफ से बचने के लिए सरोगेसी तकनीक के इस्तेमाल पर रोक लगाई। अब शादीशुदा जोड़े कुछ दूसरी तकनीकों को आजमाने के पहले, शादी के पांच बरस हो जाने के पहले सरोगेसी के लिए नहीं जा सकते। फिर कोई कोख कानूनी रूप से किराये पर नहीं ली जा सकती, और इसके लिए अंग प्रत्यारोपण की तरह कई किस्म की और रोक भी लगाई गई है। उन सबकी यहां पर चर्चा प्रासंगिक नहीं होगी, लेकिन इस एक मामले से खड़े हुए विवाद से देश भर में लोगों के चौकन्ना हो जाने की जरूरत है। सरोगेसी की कानूनी शर्तें पूरी हो जाने के बाद भी बहुत सी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है, इसलिए कोई भी व्यक्ति इस रास्ते से बच्चे पाने की बात को आसानी से छुपा नहीं पाएंगे। फिर जब चर्चित लोग खुद होकर ऐसी घोषणा करते हैं, तो उन्हें और भी सावधान रहने की जरूरत है कि उनके खिलाफ कानूनी जांच शुरू हो सकती है। कुछ ऐसा ही कानून बच्चों को गोद लेने का भी है, और चर्चित लोग भी रातों-रात बच्चों को गोद नहीं ले सकते।
यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि क्या सचमुच ही सरोगेसी या अंग प्रत्यारोपण कानून को इतना कड़ा बनाए जाने की जरूरत है। दरअसल इस देश का तजुर्बा इस मामले में बहुत खराब रहा है, और जब जरूरतमंद किडनी मरीजों को भी दान में किडनी लेने की जरूरत पड़ती है, तब भी कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए एक-दो बरस तक लग जाते हैं, और कई मरीजों की मौत भी हो जाती है। लेकिन सरकार को कानून कड़े इसलिए बनाने पड़े क्योंकि देश के कुछ महानगरों में ऐसी बस्तियां हैं जिनके हर घर से लोग किडनी बेच चुके हैं। जब गरीबी इतनी रहती है कि लोग अपने बदन का एक हिस्सा बेचकर बाकी परिवार को जिंदा रखने को बेबस रहते हैं, तब ऐसी बेबसी के बाजार को रोकने के लिए सरकार को कानून तो कड़ा बनाना ही पड़ता है। यह एक अलग बात है कि देश के बाकी तमाम कानूनों में जिस तरह छेद ढूंढकर लोग रास्ता निकाल लेते हैं, ठीक उसी तरह आज भी किडनी ट्रांसप्लांट जैसे बाजार चल रहे हैं जिनमें खरीदी हुई किडनी से जिंदगी बचाई जा रही है। अगर सरोगेसी का कानून नहीं बनता, तो बहुत धड़ल्ले से गरीब महिलाओं के बदन कारखानों की तरह इस्तेमाल होते रहते, जिसका खतरा अब कुछ कम हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ सोचने की एक बात यह भी है कि सरोगेसी से दूसरों के लिए बच्चे पैदा करने वाली मां अगर इस काम के एवज में अपने परिवार के लिए कुछ कमाई कर सकती है, तो क्या उसे किडनी बेचने की तरह का प्रतिबंधित काम मानना ठीक है? यह एक लंबी और अलग बहस हो सकती है, लेकिन सामाजिक हकीकत यही है कि अगर एक गरीब महिला दूसरों के लिए एक बच्चा पैदा करके अपने बच्चों की कुछ बरस की जिंदगी बेहतर बना सकती है, तो इस बारे में बहस जरूर होनी चाहिए, हम अभी इस बारे में अपनी कोई राय नहीं दे रहे हैं। भुगतान करके सरोगेट-मां पाने की ताकत रखने वाले लोगों की जरूरत, और उस जरूरत को पूरा करके अपनी पारिवारिक जरूरत पूरा करने वाली महिला की बेबसी को एकदम से खारिज करना ठीक नहीं है, और इस पर आगे बहस होनी चाहिए। फिलहाल दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग से यह जो नया बखेड़ा सामने आया है, इसकी रौशनी में सरोगेसी कानून की बाकी बारीकियों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने इस्तीफा दे दिया है। पिछली दिनों वे बौद्ध धर्म के एक बड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे जिसमें करीब दस हजार लोगों ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की बताई हुई 22 प्रतिज्ञााओं को दुहराया था। इसमें एक प्रतिज्ञा में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने की शपथ भी शामिल है। इस बात को हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करार देते हुए भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर हमला किया था और इस मंत्री से लेकर केजरीवाल तक से इस्तीफा मांगा था। सोशल मीडिया पर केजरीवाल को हिंदू विरोधी करार देते हुए गुजरात चुनाव में उनकी सक्रियता को घेरने की कोशिश भी की गई थी। ऐसे ही सारे विवाद के बीच मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कल पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यह साफ किया कि वे अंबेडकरवादी हैं, और अपनी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक वे इस कार्यक्रम में और दस हजार लोगों के साथ शामिल हुए थे जिसमें बाबा साहब की दिलवाई गई 22 प्रतिज्ञाएं दुहराई गई थीं। उन्होंने इस इस्तीफे में खुलासे से लिखा कि ये प्रतिज्ञाएं केंद्र की भाजपा सरकार ने भी बाबा साहब की किताबों में छपवाई है और ये प्रतिज्ञाएं हर वर्ष देश में हजारों जगहों पर करोड़ों लोग दुहराते हैं। भाजपा इस कार्यक्रम और उनकी मौजूदगी को लेकर आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल पर नाजायज हमला कर रही और इस गंदी राजनीति के खिलाफ वे (राजेंद्र पाल गौतम) मंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं।
एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ केजरीवाल, इन दोनों के साथ दिक्कत यह हो गई है कि इन दोनों ने देश की आजादी के ऐसे प्रतीकों को गोद लेने का काम किया है जिन्हें वे प्रतीक से अधिक पसंद नहीं करते। भाजपा और केजरीवाल दोनों ही भगत सिंह और अंबेडकर को बड़ा आदर्श मानकर अपने मंचों पर पेश करते हैं, केजरीवाल ने तो सरकारी दफ्तरों से गांधी तक की तस्वीरें हटवा दीं, और सिर्फ भगत सिंह और अंबेडकर की तस्वीरें लगवाई हैं। यही काम गांधी की तस्वीर के साथ-साथ भाजपा ने किया है। उसने सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में से एक प्रतिमा बनवाई है, और पटेल को कांगे्रस पार्टी की तरफ से इतिहास में तिरस्कृत साबित करते हुए पटेल को अपना आदर्श बनाया है, जबकि पटेल ने गांधी हत्या के बाद लगातार आरएसएस की नीतियों का विरोध करते हुए इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया था और इसे गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार विचारधारा ठहराया था। लेकिन पटेल की तमाम धर्मनिपरेक्ष बातों को अलग रखते हुए भाजपा उनके संघ-विरोधी लिखे हुए को अनदेखा करते हुए पटेल के नाम का इस्तेमाल करती है। ठीक इसी तरह भाजपा अंबेडकर की बुनियादी नसीहतों को आज दिल्ली सरकार के इस मंत्री के संदर्भ में अनदेखा कर रही है, मंत्री पर हमला कर रही है, और अंबेडकर का नाम भी जप रही है। अगर बौद्ध धर्म में आने वाले लोगों को अंबेडकर ने हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने के लिए कहा था, तो उसमें क्या गलत कहा था? और अगर वह प्रतिज्ञा हिंदू धर्म छोडक़र बौद्ध धर्म में जाने वाले लोग हर बरस दुहराते हैं तो उसमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कहां है? आज कुछ मुस्लिमों को भाजपा ने हिंदू बनाया है, तो क्या वे अब भी पांच वक्त नमाज पढ़ते रहेंगे? भाजपा का इस मामले को लेकर इस मंत्री का विरोध एक बहुत बड़ा पाखंड है जो कि गुजरात चुनाव के हिसाब से खड़ा किया हुआ दिखता है, वरना भाजपा को यह बात साफ करना चाहिए कि अंबेडकर की तैयार की हुई प्रतिज्ञाओं से वह सहमत है या असहमत है? ऐसा भी नहीं कि उनसे भाजपा के असहमत होने से बौद्ध हो चुके कल के हिंदू दलितों की सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है। जैसे आक्रामक हिंदुत्व तेवरों की वजह से दलितों ने करोड़ों की संख्या में बौद्ध बनना बेहतर समझा, ठीक वैसे ही आज आम आदमी पार्टी के इस मंत्री ने इस मुद्दे पर मंत्री पद छोड़ देना बेहतर समझा है। अब गेंद अरविंद केजरीवाल और भाजपा दोनों के पाले में है। अंबेडकर की फोटो टांगने वाली केजरीवाल की पार्टी को अब यह साबित करना है कि अंबेडकर की प्रतिज्ञा को दुहराने की वजह से अगर वे अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, या मंजूर कर रहे हैं, तो इसके बाद उन्हें अंबेडकर का नाम लेने का भी हक है क्या? अगर उनमें इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि अपने एक बौद्ध मंत्री को वे अंबेडकर की दिलवाई प्रतिज्ञा दुहराने का हक दे सकें, तो उन्हें भारतीय लोकतंत्र में राजनीति करने का क्या हक है? ठीक इसी तरह भाजपा को भी आज यह साबित करना होगा कि एक बौद्ध राजनेता के इस प्रतिज्ञा के दुहराने से अगर उसे यह हिंदू देवी-देवताओं का अपमान लग रहा है, तो फिर उसे अंबेडकर का नाम लेकर राजनीति क्यों करनी चाहिए क्योंकि अंबेडकर की तो बुनियादी सोच ही यही थी। और अगर इस सोच पर चलने की वजह से अंबेडकर के एक धार्मिक अनुयाई को अपनी धार्मिक मान्यता दुहराने का भी हक भाजपा नहीं देती, तो फिर उसे अंबेडकर की फोटो का अगला कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
यह बहुत अच्छी नौबत है कि आम आदमी पार्टी के एक मंत्री ने तो अपनी धार्मिक, सामाजिक, और राजनैतिक प्रतिबद्धता साफ करते हुए मंत्री पद छोड़ देना बेहतर समझा है। राजेंद्र पाल गौतम ने अपने इस्तीफे में लिखा है- पिछले कुछ वर्र्षाें से मैं लगातार देख रहा हूं कि मेरे समाज की बहन-बेटियों की इज्जत लूटकर उनका कत्ल किया जा रहा है, कहीं मूंछ रखने पर हत्याएं हो रही हैं, कहीं-कहीं मंदिर में प्रवेश करने पर और मूर्ति छूने पर अपमान के साथ पीट-पीटकर हत्या की जा रही है, यहां तक कि पानी का घड़ा छू लेने पर बच्चों तक की दर्दनाक हत्याएं की जा रही हैं, ऐसे जातिगत भेदभाव की घटनाओं से मेरा दिल हर दिन छलनी होता है। दशहरे के दिन आयोजित बौद्ध कार्यक्रम में तो इस मंत्री ने देश की आज की दलितों की हालत पर कुछ नहीं कहा था, और बौद्ध समाज की एक प्रचलित प्रतिज्ञा को ही दुहराया था। लेकिन अब भाजपा के हमलों के बाद इस्तीफा देते हुए उन्होंने जो कहा है, उस पर केजरीवाल और भाजपा दोनों को अपना रूख साफ करना होगा। वोटों के लिए अंबेडकर की फोटो, और उनके अनुयाईयों का तिरस्कार साथ-साथ नहीं चल सकता। ऐसा ही काम देश में कुछ राजनीतिक दल सरदार पटेल को लेकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर, विवेकानंद और सावरकर को लेकर कर रहे हैं। सावरकर को गांधी से ऊपर साबित करने की कोशिश करते हुए भाजपा और उसकी सोच के संगठन यह बात पूरी तरह से अनदेखी कर देते हैं कि गाय खाने के बारे में सावरकर की सोच कैसी वैज्ञानिक थी, और उसके ठीक खिलाफ अभियान चलाते हुए आज की हिंदुत्ववादी ताकतें सावरकर की तस्वीर पर दांव भी लगाते चलती हैं।
आखिर में यह बात साफ होनी चाहिए कि इस मुद्दे पर अपने मंत्री से लिए हुए, या मंत्री के दिए हुए इस्तीफे पर आम आदमी पार्टी अपना रूख बताए, और अंबेडकर की फोटो रखे या हटाए। ठीक यही सवाल भाजपा के भी सामने है कि अगर वह अंबेडकर से असहमत है, इस हद तक असहमत है कि वह अंबेडकर की नसीहत की वजह से अगर किसी दलित मंत्री का जीना हराम कर रही है, तो फिर उसे भी अंबेडकर का नाम लेकर वोट नहीं मांगने चाहिए। देश के अंबेडकरवादी दलितों के सामने यह परखने का एक मौका है कि केजरीवाल और भाजपा की असलियत क्या है।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तरप्रदेश के मेरठ का एक पर्चा किसी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है जिसमें प्रशांत कबाड़ी नाम का आदमी सभी पुराने सामानों का कबाड़ खरीदने के लिए अपने फोन नंबर के साथ प्रचार कर रहा है। ऐसे दूसरे पर्चों से यह पर्चा इस मामले में अलग है कि इसके ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में हिन्दू कबाड़ी छपा हुआ है। कबाड़ के काम में बहुत से इलाकों में मुस्लिम अधिक लगे रहते हैं, क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई कम रहती है, किसी काम में पैसा लगाने की उनकी क्षमता कम रहती है, और कबाड़ा का काम वे बिना किसी ट्रेनिंग के भी कर सकते हैं। शायद मुस्लिम कबाडिय़ों की बहुतायत के बीच यह हिन्दू कबाड़ी अपने हिन्दू होने की घोषणा करते हुए हिन्दुओं के बीच एक प्राथमिकता पाने की उम्मीद कर रहा है। देश की आज की हालत का यह एक नमूना है कि लोगों से उम्मीद की जा रही है कि वे अपना कबाड़ा भी किसी दूसरे धर्म के खरीददार को न बेचें।
हिन्दुस्तान में यह जहर बहुत बुरी तरह फैला है, और जिन लोगों को यह लगता था कि यह और अधिक नहीं फैल सकता, उन्हें यह आए दिन हैरान करता है। अब जगह-जगह लोग किसी मुस्लिम ड्राइवर के आने पर टैक्सी को वापिस भेज देने के फतवे दे रहे हैं, तो कहीं मुस्लिम या दलित डिलीवरी मैन के आने पर उससे खाना लेने से मना कर रहे हैं। जब शहरों में यह हो रहा है तो जाहिर है कि गांवों में स्कूलों में अगर दलित महिला का पकाया दोपहर का खाना खाने से दूसरी जातियों के बच्चे और उनके मां-बाप तो मना कर ही सकते हैं। यह भी जगह-जगह हो रहा है, और जहां कहीं ऐसे बहिष्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग हो पाती है, वहीं पर यह बात खबर बन पाती है, बाकी जगहों पर इसे भुला दिया जाता है, अनदेखा कर दिया जाता है। और हालत यह है कि अभी एक कार्यक्रम में आरएसएस के मुखिया ने यह भाषण दिया है कि वर्ण और जाति व्यवस्था जैसी चीजें अतीत की बातें हैं, और इसे भुला दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जाति व्यवस्था की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है, और वर्ण और जाति जैसी अवधारणाओं को पूरी तरह त्याग देना चाहिए।
जो लोग आरएसएस की, या दूसरे हिन्दूवादी संगठनों की सोच को जानते हैं वे मोहन भागवत के बयान का एक और मतलब भी समझ सकते हैं। आज हिन्दुस्तान में दलित, आदिवासी, और ओबीसी आरक्षण जाति व्यवस्था के आधार पर ही है। जाति व्यवस्था को भुला देने को कहने का एक मतलब यह भी निकलता है कि आरक्षण को भी भुला दिया जाए। देश के कुछ दूसरे नेताओं ने भागवत के इस बयान में छुपे हुए खतरों को तुरंत ही पहचान लिया। लोगों को याद होगा कि जब विश्वनाथ प्रताप सिंह हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने पर पूछे गए एक आलोचनात्मक सवाल के जवाब में कहा था कि सिर्फ ऊंची जातियों के लोगों को यह लग सकता है कि आज जाति व्यवस्था खत्म हो गई है, यह ठीक वैसे ही है जैसे कि जूते पहने हुए पांवों को यह पता नहीं चलता कि उनके जूतोंतले कौन से नंगे पांव कुचले जा रहे हैं, जूतोंतले कुचलने का दर्द नंगे पांव वालों को ही होता है। ठीक यही नौबत आज आरएसएस के मुखिया के बयान के साथ है। दशहरे पर संघप्रमुख के बयान पर कांग्रेस के एक सबसे मुखर नेता दिग्विजय सिंह ने तुरंत ही यह सवाल उठाया है कि क्या अगला सरसंघचालक कोई गैरब्राम्हण होगा? उन्होंने पूछा है कि क्या कोई एससी-एसटी, या ओबीसी व्यक्ति सरसंघचालक पद के लिए मंजूर किया जाएगा? क्या आरएसएस अल्पसंख्यकों को भी सदस्य बनाएगा?
आरएसएस के मुखिया के जाति व्यवस्था के बयान को मेरठ के एक कबाड़ी के पर्चे के साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। जब बिना पर्चों के भी जगह-जगह जुबानी बातचीत में अल्पसंख्यक समुदाय के बीच यह बात चलती है कि लोगों को अपने धर्म के लोगों से ही लेन-देन करना चाहिए, तो फिर जाति व्यवस्था या धर्म व्यवस्था के कमजोर होने की सोच खोखली लगती है। हालांकि मोहन भागवत ने धर्म व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं कहा है, और केवल हिन्दुओं के बीच की जाति व्यवस्था या वर्ण व्यवस्था के बारे में ही कहा है, लेकिन यह जाति व्यवस्था कहीं से भी कमजोर पड़ी हो, कहीं पर भी अप्रासंगिक हो, ऐसा नहीं है। इसे परखने के लिए आरएसएस के मुखिया अपने कार्यकर्ताओं के लिए यह निर्देश जारी कर सकते हैं कि देश में कहीं भी कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढक़र बारात ले जाना चाहे, तो आरएसएस के स्वयंसेवक लाठियों के घेरे में उसे हिफाजत मुहैया कराते हुए ले जाएं। जहां कहीं जाति व्यवस्था की हिंसा सिर उठा रही है, वहां आरएसएस अपने स्वयंसेवक झोंके, तो उसे हकीकत का सामना करना पड़ेगा, हकीकत की जानकारी तो उसे पहले से है। अगर जाति व्यवस्था को खत्म करना है, तो इस व्यवस्था के तहत सैकड़ों-हजारों बरस से चले आ रहे ढांचे को तोडऩा होगा, और दलित-आदिवासी, या दूसरी जातियों के लोगों की खानपान की आजादी को मान्यता देनी होगी। जाति व्यवस्था इस तरह से खत्म नहीं हो सकती कि हर कोई खानपान, आचार-व्यवहार, पोशाक और बोलचाल पर ब्राम्हणवादी, शुद्धतावादी नियमों को मानने लगे। वह जाति व्यवस्था का खात्मा नहीं होगा, वह ब्राम्हणवाद को लागू करना ही होगा। इसलिए जाति व्यवस्था को गैरजरूरी और खत्म हो चुकी मानने वाले लोगों को इन सब बातों के जवाब भी देने होंगे कि अगर तमाम हिन्दू एक ही जाति के गिने जाएंगे, तो उनके भीतर संस्कारों और पसंद की कैसी आजादी रहेगी? ऐसे असुविधाजनक सवालों के जवाब दिए बिना आरएसएस प्रमुख केवल बयान देकर काम नहीं चला सकते। उन्हें मेरठ के इस हिन्दू कबाड़ी के पर्चे पर भी बयान देना चाहिए।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
हर दिन अपने आसपास से आ रही ऐसी खबरों से सामना हो रहा है जिनमें नाबालिग लड़कियों को बरगला कर बालिग नौजवान या आदमी घर से भगाकर ले जा रहे हैं, उनके साथ बलात्कार कर रहे हंै, और जल्द ही गिरफ्तार भी हो जा रहे हैं। अभी कल ही छत्तीसगढ़ में एक जिला युवक कांग्रेस अध्यक्ष को गैंगरेप में तीन दूसरे नौजवानों के साथ गिरफ्तार किया गया, और पन्द्रह साल की नाबालिग लडक़ी को साथ ले जाकर, कोल्डड्रिंक में नशा मिलाकर बलात्कार करवाने वाली उसकी सहेली को भी गिरफ्तार किया गया है। एक दूसरे मामले में दो-तीन नाबालिग लड़कियों को गुजरात ले जाने वाले बालिग और शादीशुदा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। मोबाइल फोन की मेहरबानी से लोगों की लोकेशन पुलिस को आसानी से मिल जाती है, और लोग तेजी से गिरफ्तार भी कर लिए जाते हैं। ऐसे में एक हैरानी यह होती है कि रोजाना छपने वाली इन खबरों के बावजूद लोग बलात्कार भी कर रहे हैं, और नाबालिग लड़कियों को लेकर भाग भी रहे हैं। यह बात भी तय है कि ऐसे लोगों को कई बरस की कैद होना एक तय सी बात रहती है, फिर भी न तो नाबालिग लड़कियों का ऐसे झांसे में फंसना कम हो रहा है, और न ही बालिग लोगों का ऐसा जुर्म करना घट रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसी घटनाएं हर दिन क्यों हो रही हैं? क्या किशोरियों में अपनी हिफाजत, अपने बदन की हिफाजत को लेकर समझ विकसित नहीं हो पा रही है? या उनका देहशोषण करने वाले लोगों को यह खतरा समझ क्यों नहीं आ रहा है कि कुछ मिनटों का मजा पाने के बाद उनके लिए सजा इंतजार कर रही है? सबसे पहली बात तो यह कि ऐसे देहशोषण या बलात्कार से जिन लड़कियों का सबसे अधिक नुकसान होता है, उनके भीतर समझ और जागरूकता क्यों पैदा नहीं की जा रही है? एक तरफ तो हिन्दुस्तान के बड़े हिस्से में लड़कियों को अधिक आजादी देने के सभी दुश्मन रहते हैं। और दूसरी तरफ आजादी के लायक समझ देने में दिलचस्पी किसी की नहीं रहती। यह पीढ़ी मोबाइल और मोबाइक की है, और कमउम्र लड़कियों को भी पढ़ाई और खेलकूद के लिए दूर-दूर तक अकेले जाना ही होता है। ऐसे में अगर अपने खुद के लिए उनमें समझ नहीं है, तो वे कई वजहों से किसी भी तरह के झांसे में फंस सकती हैं, और बरसों के लिए तकलीफ और बदनामी की शिकार हो सकती हैं। दूसरी तरफ हम विकसित देशों में इसी उम्र की लड़कियों को देखते हैं जो कि अपने पसंद के लडक़ों के साथ उठती-बैठती हैं, अपने बराबरी के लोगों से रिश्ता रखती हैं, और जैसे जुर्म का शिकार वे हिन्दुस्तान में होती हैं, वैसे जुर्म विकसित देशों में सुनाई नहीं पड़ते। इसलिए लड़कियों को आजादी मिलने से वे अधिक खतरे में पड़ती हैं, यह सोच गलत है। लड़कियां उन समाजों में अधिक खतरे में पड़ती हैं, जहां पर लोग अधिक खतरनाक हैं, और जहां पर ऐसे लोग कानून के खतरे की तरफ से बेफिक्र भी हैं।
ऐसा लगता है कि अब स्कूल की बड़ी कक्षाओं में लड़कियों को उनके शरीर के बारे में अधिक पढ़ाने की जरूरत है, और समाज में जो खतरे हैं उनसे परिचय कराने की भी। फिर आज जिस तरह मोबाइल फोन और कैमरों के मार्फत ब्लैकमेल करने लायक तस्वीरें और वीडियो आसानी से बना लिए जाते हैं, उनके बारे में भी लड़कियों को सावधानी सिखाने की जरूरत है। आज न स्कूल इस बारे में कुछ करते, और न ही घर के लोग कोई स्वस्थ बातचीत इस बारे में करना चाहते हैं। घरवालों को लगता है कि महज प्रतिबंध लगा देने से सब ठीक हो जाएगा, जबकि ऐसा होता नहीं है। इस बात को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि बालिग होने के पहले के कई बरस लड़कियों के तन-मन ऐसे बदलाव से गुजरते हैं कि उन्हें कई किस्म की नई जरूरतें पैदा होती हैं। इन जरूरतों के वक्त उनका किसी धोखे में फंस जाना एक आसान बात रहती है, और किशोरियों के लिए मनोवैज्ञानिक और कानूनी परामर्श का इंतजाम अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने की तकनीक के लिए अब तमाम शिक्षक-शिक्षिकाओं का बीएड या एमएड करना जरूरी है, उसी तरह ऐसे तमाम शिक्षकों को मनोवैज्ञानिक परामर्श की एक सीमित और बुनियादी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए ताकि वे स्कूल के बच्चों की मदद कर सकें। इस देश में पेशेवर मनोचिकित्सकों और परामर्शदाताओं की बहुत अधिक कमी है, इसलिए समाज यह उम्मीद नहीं कर सकता कि बच्चों की नई पीढ़ी को जरूरत के वक्त परामर्शदाता मिल जाएंगे। इसके लिए स्कूलों जैसी संगठित जगह का ही इस्तेमाल करना होगा, और वहां पर शिक्षक-शिक्षिकाओं को परामर्शदाता बनाना सबसे आसान और असरदार काम हो सकता है। उनकी ट्रेनिंग के लिए ऐसे वीडियो तैयार किए जा सकते हैं जिनमें पेशेवर प्रशिक्षक उन्हें बच्चों की समस्याएं सुलझाने के लायक तैयार कर सकें। सरकारों की अधिक दिलचस्पी इस काम में शायद इसलिए नहीं होती है कि नाबालिग लड़कियों का वोट नहीं होता, और सरकार और समाज यह मानकर चलते हैं कि ऐसी लड़कियों के लिए उनका परिवार ही जिम्मेदार है।
आए दिन सामने आ रही ऐसी घटनाओं को देखते हुए कुछ जनसंगठनों को यह पहल करनी चाहिए कि वे प्रयोग के तौर पर कुछ सरकारी या निजी स्कूलों में लड़कियों को अधिक जागरूक और जिम्मेदार बनाने का काम करें। यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इसमें मदद कर सकते हैं, और लड़कियों को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, जागरूक और जिम्मेदार बनाना ही उन पर से खतरों को घटाने का एक तरीका हो सकता है। सरकार के कई विभाग और कई समाजसेवी संगठन इस काम में अपनी जिम्मेदारी ढूंढ सकते हैं।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
आज जब हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में यह कह चुका है कि सबसे गरीब तबके की इंसाफ तक पहुंच मुश्किल हो गई है, उस वक्त देश की बहुत सी अदालतों का रूख जाहिर तौर पर गरीबों के खिलाफ दिख रहा है। बहुत से मामलों में तो चुनाव लडक़र सरकार में आने वाले लोग गरीबों के लिए अधिक हमदर्दी दिखाते दिखते हैं क्योंकि गरीबों के वोट गिनती में अधिक होते हैं, और वे अधिक वोट भी देते हैं। लेकिन जिन जजों को कोई चुनाव नहीं लडऩा रहता, उन्हें अपनी सहूलियतें तो अच्छी लगती हैं, लेकिन गरीबों के हक की उन्हें परवाह नहीं दिखती है। ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दी गई चुनौती के दौरान सामने आया। वहां एक सडक़ हादसे में एक कामगार की मौत हुई थी, और उसे मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने जो मुआवजा दिया था उसमें उसकी माहवारी कमाई 25 हजार रूपये जोड़ी गई थी। ट्रिब्यूनल ने यह हिसाब लगाया था कि यह कामगार हर महीने ट्रैक्टर के लिए लिए गए कर्ज का साढ़े 11 हजार रूपये महीना भुगतान मरने तक करते रहा। इससे ट्रिब्यूनल ने 25 हजार रूपये महीने की कमाई का अंदाज लगाया, और उस हिसाब से उसकी मौत का मुआवजा देने का आदेश दिया। लेकिन जब ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में मामला गया तो वहां जज ने उसकी मासिक आय 7 हजार रूपये मानी, और मुआवजे को घटा दिया। अभी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को खारिज किया और कहा कि ट्रिब्यूनल ने सही सोचा था, और हाईकोर्ट ने पता नहीं किस गोपनीय वजह से इस आदमी की कमाई घटाकर हिसाब बनाया है, जिसका कि कोई औचित्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जज के खिलाफ काफी कड़ी टिप्पणी की है।
एक दूसरा मामला झारखंड का है जहां हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है और कहा है कि क्या किसी के गरीब होने से उसे जमानत पाने का हक नहीं है? अदालत ने हाईकोर्ट के कई फैसलों को देखा जिनमें संपन्न आरोपियों से बड़ी रकम जमा कराकर हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी, और यह भी नहीं देखा था कि उन पर लगे आरोपों में जुर्म किस किस्म के थे। अभी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई फैसले देखकर हाईकोर्ट को फटकारा है, और जमानत के लिए रकम जमा करने की ऐसी शर्तों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्तें कानून के मुताबिक सही नहीं है। खबरें बताती हैं कि झारखंड हाईकोर्ट ने दहेज से लेकर धोखाधड़ी तक, और बलात्कार से लेकर पॉक्सो एक्ट तक के मामलों में बड़ी रकम जमा कराकर जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे सभी मामलों में जमानत को लेकर झारखंड हाईकोर्ट फिर से सुनवाई करे। सुप्रीम कोर्ट जजों ने कहा कि अगर कोई आरोपी बड़ी रकम जमा नहीं कर सकते, उनके पास पैसे नहीं है, तो इससे उन्हें जमानत देने से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यहां पर वही होते दिख रहा है, जज ने किस आधार पर ऐसा फैसला किया, यह हमारी समझ से परे है।
ये दो अलग-अलग मामले हाईकोर्ट जजों की एक संपन्न सोच का सुबूत हैं। एक तरफ एक कामगार की कमाई को मानने के लिए जज तैयार नहीं हैं, जबकि नीचे के ट्रिब्यूनल ने एक बड़ा ही न्यायसंगत हिसाब सामने रखा था। और दूसरी तरफ पैसे वालों को जमानत देना, गरीब को मना कर देना, यह भी न्याय व्यवस्था का एक भयानक पहलू है। हिन्दुस्तान में अदालत तक पहुंचने के पहले न्याय व्यवस्था जहां पुलिस के स्तर से शुरू होती है, वहां पर भी गरीब और अमीर का फर्क पहले दिन से दिखने लगता है। गरीब के खिलाफ आनन-फानन एफआईआर दर्ज हो जाती है, और पैसे वालों के खिलाफ एफआईआर करवाने के लिए गरीब को अदालत तक जाना पड़ता है, और वहां की मशक्कत के बाद कुछ मामलों में अदालती हुक्म से पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ती है। तकरीबन पूरे हिन्दुस्तान में पुलिस का रूख गरीबविरोधी रहता है, अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासीविरोधी रहता है, महिलाविरोधी रहता है। पुलिस की जांच के स्तर से ही सवर्ण, संपन्न, ताकतवर, और पुरूष के पक्ष में एक पूर्वाग्रह हावी रहता है। यह मामले के अदालत पहुंचने तक और मजबूत हो जाता है क्योंकि ऐसे ताकतवर तबकों के लोग अदालत तक अधिक रिश्वत देने की हालत में रहते हैं, अधिक महंगे वकील रख पाते हैं, और अधिक अदालती तिकड़मों को जुटा पाते हैं। नतीजा यह होता है कि गरीब के इंसाफ पाने की गुंजाइश बहुत ही कम रहती है। जिन दो अदालती मामलों को लेकर हम आज इस पर चर्चा कर रहे हैं, उन दोनों ही मामलों में गरीब लोग या उनके परिवार किस तरह हाईकोर्ट तक पहुंचे होंगे, इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। जिला स्तर या उससे छोटी अदालतों तक भी किसी गरीब के पहुंचने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है, और वे अदालत में मुकदमा भी लड़ते हैं, और अपने वकील की फीस की मांग और उम्मीद से भी लड़ते हैं। ऐसे में अगर हाईकोर्ट के जजों का रूख गरीबविरोधी रहता है, तो उनमें से कितने ऐसे होंगे जो कि ऐसे रूख के खिलाफ, ऐसे फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जा सकें?
हमारा खयाल है कि भारत के जजों को देश की सामाजिक हकीकत का एक कोर्स करवाना चाहिए, और उसके बाद ही उन्हें इंसाफ करने की कुर्सी पर बिठाना चाहिए। बिना सामाजिक असलियत जाने, और बिना सामाजिक सरोकार समझे कोई भी जज गरीब की तकलीफ को नहीं समझ सकते, और उन्हें फैसला देने का अधिकार उन्हें लोगों का भाग्य-विधाता बना देता है, और यह सिलसिला बहुत बेइंसाफी का है। भारतीय समाज में सत्ता के जितने ओहदे हैं, उन सबको सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि आईएएस-आईपीएस जैसी ताकतवर नौकरियों में आने वाले लोगों को भी देश की आधी गरीब आबादी के प्रति सरकारी जिम्मेदारी नहीं पढ़ाई जाती है। अब जिस तरह से अरबपतियों को लोकसभा और विधानसभा में टिकटें मिल रही हैं, जिस तरह से वे जीतकर आ रहे हैं, उससे भी ऐसा लगता है कि उनमें सामाजिक सरोकार की कोई जगह नहीं रहती है। इसीलिए आज सत्ता पर बैठे अधिकतर लोग पूरी बेशर्मी से अपनी काली कमाई के महल बनाते हैं, और उन्हें किसी तरह की कोई शर्म-झिझक भी नहीं रहती। हिन्दुस्तान में ताकत की तमाम कुर्सियों को सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ाने की जरूरत है। अगर सबसे बड़ी नौकरियों वाले लोगों को छांटने के बाद उन्हें इस हकीकत की ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी, तो वे लोग काले अंग्रेजों की तरह राज करते रहेंगे। देश की बहुत सी अदालतों के जजों का भी यही हाल है कि वे जमीन से कट चुके हैं, और अपने हवाई महलों में रहते हुए मनमाने फैसले दे रहे हैं। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए, और जनता को ऐसे सरकारी, संसदीय, राजनीतिक, और अदालती फैसलों के खिलाफ खुलकर लिखना चाहिए।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अभी अमरीका में बसे हुए एक भारतवंशी ने इस बात पर अध्ययन किया कि बॉलीवुड की फिल्मों का बायकॉट करने के जो फतवे ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर संगठित तरीके से चलाए जाते हैं, उनके पीछे क्या नीयत रहती है, और उनका क्या असर होता है। मुम्बई फिल्म उद्योग को लेकर तरह-तरह के बहिष्कार के हैशटैग ट्विटर पर चलाए जाते हैं, और अब यह आम जानकारी है कि इनके पीछे कौन सी ताकतें होती हैं। इस अध्ययन में भी यह मिला कि बायकॉट के फतवे देने वाले ऐसे लोग एक खास धार्मिक विचारधारा से जुड़े हुए हैं, और ऐसे फतवों के अलावा उनका अभियान साम्प्रदायिक नफरत भी रहता है। इससे यह भी निकलकर सामने आया कि ऐसे बहिष्कार के फतवों से सिनेमाघरों में फिल्मों पर चाहे जो असर पड़ता हो, मोटेतौर पर मुस्लिम कलाकारों के बहिष्कार के अभियान से उन्हें आगे काम मिलने में परेशानी होती है क्योंकि फिल्म निर्माता यह सोचते हैं कि इतने विवाद में क्यों पड़ा जाए।
आज इंटरनेट पर टेक्नालॉजी की मदद से ऐसे एप्लीकेशन बनाए गए हैं जो कि एक साथ सैकड़ों ट्विटर हैंडल को चलाते हैं। बात की बात में कुछ दर्जन लोग इनकी मदद से ट्विटर पर एक अभियान शुरू कर सकते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे कानून की मेहरबानी से जिसका विरोध करना हो उसके परिवार को हत्या और बलात्कार की धमकी भी दे सकते हैं, और उस पर कोई कार्रवाई न होने की गारंटी रहती है। देश की सबसे बड़ी अदालत के किसी जज के परिवार को इसी तरह की धमकी अगर मिली होती, तो अब तक केन्द्र सरकार से लेकर ट्विटर तक सभी कटघरे में होते, लेकिन लोकतंत्र में नौबत इतनी खराब होने के पहले भी कानून का राज कायम होने की गुंजाइश होनी चाहिए। अब जब तक देश का कानून जागता नहीं है, जब तक केन्द्र या राज्य सरकारों को सोशल मीडिया पर ऐसे जुर्म के खतरे समझ नहीं आते हैं, तब तक इन खतरों को आम जनता को ही समझना होगा।
आज सोशल मीडिया पर हालत यह है कि किसी विचारधारा के प्रति समर्पित भक्तमंडली या भाड़े के लोग मिलकर किसी का भी जीना हराम कर सकते हैं। कानून ऐसे हमलों से किसी को नहीं बचाता, बल्कि हमलावर-मुजरिमों को ही बचाता है। नतीजा यह होता है कि जिस तरह एक वक्त गांवों में जमींदारों के लठैत रहते थे, और वे जमींदार की मर्जी से जिसे चाहे उसे कूट आते थे, आज भी हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया में ऐसे ही लठैत रात-दिन अतिसक्रिय हैं, और इस देश के साम्प्रदायिक सद्भाव को खत्म करने में जुटे हुए हैं। आज अगर अमरीका में बैठे हुए कोई व्यक्ति हिन्दुस्तान में ऐसे अभियान के खिलाफ नीयत की शिनाख्त कर सकता है, तो यह काम भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती? जो सरकार बात-बात में ट्विटर के साथ इस बात को लेकर भिड़ जाती है कि उसे कौन-कौन से हैंडल बंद करने हैं, वह सरकार अपना घर क्यों नहीं देखती कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी के तहत जो लाखों ट्विटर अकाऊंट रात-दिन नफरत फैला रहे हैं, उन पर रोक लगाए। और यह रोक लगाने के लिए ट्विटर पर उनके खाते बंद करवाना तो दूर रहा, भारत सरकार ऐसे खुले जुर्म के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई भी नहीं कर रही है। यह सिलसिला देश की हवा को और जहरीला बनाते चल रहा है, और अब लोगों को यह लगने लगा है कि साम्प्रदायिकता, हिंसा, और तरह-तरह के दूसरे जुर्म की धमकियां फैलाना अब इस लोकतंत्र में कानूनसम्मत हो चुका है। मुजरिमों का ऐसा भरोसा किसी भी लोकतंत्र को तबाह करने के लिए बहुत है।
हमें इस बात को लेकर भी बहुत हैरानी होती है कि केन्द्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों की जो सलाहकार समितियां हैं, और जिनमें कई पार्टियों के सांसद मेंबर हैं, वहां भी ऐसे जुर्म के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पा रही है। लोकतंत्र ने जनता को जो बराबरी का हक दिया था, आज उसे कोई विचारधारा, कोई संगठन अपने लठैतों को चुनिंदा निशानों के पीछे लगाकर उनका जीना हराम कर रहे हैं, और कानून उनकी मदद के लिए मौजूद नहीं है। इस ताजा अध्ययन ने यह पाया है कि बॉलीवुड में ऐसे मुस्लिम कलाकारों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है जिनकी शादी हिन्दुओं से हुई है, ताकि आगे जाकर उन्हें काम मिलने में दिक्कत हो। इसके पीछे उस विचारधारा का सीधा-सीधा हाथ है जो कि अपनी पार्टी से बाहर की ऐसी शादियों को लव-जेहाद कहती है, और हिंसा की हद तक धमकियां देती है। यह भारत सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तानी नागरिकों के खिलाफ इसी जमीन से चल रहे ऐसे नफरती-हिंसक अभियान पर कार्रवाई करे। कहने के लिए तो भारत का आईटी एक्ट इतना कड़ा है कि उससे बचने की गुंजाइश नहीं रहती है, लेकिन खुले साइबर-सुबूतों के बाद भी सरकार का कार्रवाई न करना बहुत ही शर्मनाक है। यह लोकतंत्र के भीतर अपने से असहमत लोगों का जीना हराम करने का बहुत बड़ा जुर्म है, और जनता के बीच से सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर सवाल उठने चाहिए। जब तक अदालतों पर कोई सीधा हमला नहीं होता है, तब तक अदालतें आज की तारीख में आम जनता के हकों को लेकर बेपरवाह दिख रही हैं, और ऐसे में जनता के बीच ही एक जागरूकता उठ खड़ी होना जरूरी है, वही एक रास्ता दिखता है।
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक पहुंचे राहुल गांधी की एक आमसभा चल रही थी, और बारिश होने लगी। उन्होंने बिना रूके भाषण देना जारी रखा। इसकी तस्वीर कुछ फोटोग्राफरों ने कैद कीं, और सोशल मीडिया पर वे तस्वीरें छा गईं। यह बात भी खबर में नहीं आई कि राहुल गांधी ने उस मौके पर भाषण में क्या कहा, बस बारिश की परवाह किए बिना भाषण देना लोगों को छू गया। कुछ लोगों ने यह भी याद किया कि अभी साल-दो साल के भीतर ही शरद पवार भी महाराष्ट्र में इसी तरह भीगते हुए भाषण देते दिखे थे। कुछ लोगों ने दोनों तस्वीरों को जोडक़र एक कार्टून भी बनाया। हालांकि बारिश में कुछ देर भीग जाना सरहद पर गोलियां खाने सरीखा नहीं है, इसमें कोई बहुत बड़ी बहादुरी नहीं है, लेकिन आज देश की आबादी का एक हिस्सा नफरत से इतना थका हुआ है, उसकी वजह से इतनी दहशत में है कि उसने राहुल की इस पदयात्रा को हाथोंहाथ लिया है क्योंकि यह नफरत की बात नहीं कर रही है। लोगों के लिए हिन्दुस्तान में आज यह बात कुछ अटपटी है कि कोई नेता लगातार जनता के बीच चले, रोज कई भाषण दे, फिर भी नफरत की कोई बात न करे। इसलिए राहुल एक ठंडी और ताजी हवा के झोंके की तरह हैं जो कि नफरत से झुलसे हुए देश को राहत दे रहे हैं। उनकी एक तस्वीर ने लोगों को इतना छू लिया है कि मानो लोग किसी भली चीज को छूने के लिए तरसे हुए थे। जिस तरह रेगिस्तान में ठूंठ की तरह सूखा हुआ खजूर का पेड़ भी हरियाली लगता है, उसी तरह आज हिन्दुस्तान में गैरनफरती बातें राहुल को एक नायक की तरह पेश कर रही हैं।
यह मौका राहुल की चर्चा का कम है, यह देश के हालात पर चर्चा का अधिक है। नफरत इस हद तक बढ़ाई जा रही है कि यहां सामाजिक संस्कृति पर हमला करके धार्मिक कट्टरता उसे लहूलुहान कर दे रही है। आज की ही खबर है कि मध्यप्रदेश और गुजरात में बजरंग दल सरीखे निगरानी दस्तों ने नवरात्रि के गरबा कार्यक्रमों में पहुंचे गैरहिन्दुओं को ढूंढ-ढूंढकर निकालकर पीटा, और इन दोनों प्रदेशों में कई जगहों पर इसे लेकर तनाव खड़ा हो गया है। यह बहुत नई बात भी नहीं है, और पिछले कई बरस से ऐसा ही तनाव हर नवरात्रि पर होते आया है। जो बात हमारी समझ से परे है वह यह कि अगर किसी एक धर्म के आयोजक दूसरे धर्मों के लोगों को कट्टरता से बाहर रखना चाहते हैं, उसके लिए कानून भी अपने हाथ में लेने से नहीं हिचक रहे हैं, तो फिर दूसरे धर्मों के लोगों को ऐसे आयोजनों में शामिल होकर तनाव और टकराव क्यों बढ़ाना चाहिए? अगर आयोजकों ने जगह-जगह गैरहिन्दुओं के दाखिले पर रोक के नोटिस लगा रखे हैं, तो ऐसे आयोजनों में गैरहिन्दुओं को जाना क्यों चाहिए? इन लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि हिन्दू धर्म के जो अधिक कट्टर और अधिक हिंसक लोग हैं, वे तो अपने ही धर्म के दलितों को किसी भी सवर्ण धार्मिक कार्यक्रम में नहीं घुसने देते, गांवों में आज भी सडक़ किनारे के चाय ठेलों पर दलितों के लिए अलग कप-गिलास रहते हैं, जिन्हें इस्तेमाल के बाद धोकर रखना भी उन्हीं की जिम्मेदारी रहती है। जो समाज अपने भीतर इतना हिंसक भेदभाव करता है, उस समाज में, उसके कट्टर धार्मिक कार्यक्रमों में घुसने की कोशिश दूसरे धर्म के लोगों को क्यों करनी चाहिए? इसलिए अब जब सामाजिक संस्कृति मारी गई है, और एक हिंसक धर्मान्धता राज कर रही है, तो किसी तबके को इस टकराव को बढ़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि हर टकराव हवा में और अधिक जहर घोलते चलेगा।
जैसे ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा की चर्चा की, तो तुरंत ही यह दिखने लगा कि इस देश को जोडऩे की जरूरत कितनी है, क्यों है, और किस तरह इस देश को टुकड़ों में तोड़ दिया गया है। आज राहुल सरीखे नेता की जरूरत इसलिए है कि देश के अलग-अलग धर्मों के, अलग-अलग जातियों के लोगों को एक साथ रखना नामुमकिन सा हो गया है क्योंकि उन्हें बहुत बड़ी योजना और साजिश के तहत एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया है। अब तक राहुल गांधी जितना पैदल चले हैं, उन्हें भारत के मीडिया में कोई कवरेज चाहे न मिला हो, उन्हें जनसमर्थन भरपूर मिल रहा है। कदम-कदम पर घरेलू लोग भी सामने आकर उनसे लिपट रहे हैं, उनके साथ चल रहे हैं, जबकि रोजाना लंबा सफर तय करते हुए वे धीरे नहीं चल पा रहे हैं। फिर भी लोग हैं कि अपने बच्चों के साथ आ रहे हैं, बच्चे हैं कि राहुल से लिपट रहे हैं, और उनके साथ चल रहे हैं। जो एक बहुत ही साधारण बात होनी चाहिए थी, वह बात आज अनोखी सी लग रही है, क्योंकि बाकी देश की हवा बहुत जहरीली हो चुकी है। आज देश के सुप्रीम कोर्ट को भी देखें तो उसमें अलग-अलग कई अदालतों में धार्मिक नफरत के मामले इतने अधिक दिख रहे हैं कि ऐसा लगता है कि इस देश का सबसे बड़ा काम ही आज नफरत करना हो गया है, और अदालतों का काम ऐसी नफरत से जूझना रह गया है। ऐसे माहौल में भारत जोड़ो के शब्द ही लोगों को एक किस्म से राहत दे रहे हैं कि राजनीति में रहते हुए भी कोई व्यक्ति किस तरह जोडऩे की बात कर सकते हैं।
एक बार फिर नवरात्रि के गरबा को लेकर हो रहे तनाव की बात पर लौटें तो यह समझने की जरूरत है कि कोई भी धर्म अपने आम मिजाज की तरह, और अपने बनाए जाने के मकसद के मुताबिक, अपने सबसे कट्टर लोगों के कब्जे में जाता ही है। जो सांस्कृतिक आयोजन धर्म का सामाजिक विस्तार रहते थे, वे भी अब धीरे-धीरे कट्टर बना दिए गए हैं, और ऐसे में किसी भी धर्म को दूसरे धर्म के आयोजनों में दाखिल होने के बारे में सोचना नहीं चाहिए। इसी हिन्दुस्तान में अभी एक दशक पहले तक जो सामाजिक समरसता बची हुई थी, वह इन कुछ बरसों में ही पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और यह खात्मा एक हकीकत बन चुका है। इसलिए यहां पर अभी आदर्श की अधिक बातों की कोई गुंजाइश उन आयोजनों में नहीं है जिनके पीछे कट्टर आयोजक हैं। इसलिए न सिर्फ दूसरे धर्मों के लोगों को ऐसे आयोजनों से दूर रहना चाहिए, बल्कि इन धर्मों के समझदार और सद्भावना वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे ऐसे कट्टर आयोजनों में शामिल होना चाहते हैं?
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कोलकाता के अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर एक बड़ी सी तस्वीर छापी है जो कि एक दुर्गोत्सव की है। यह दुर्गा पूजा का ही सालाना वक्त चल रहा है, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं है सिवाय दुर्गा प्रतिमा में दुर्गा के हाथों मारे जाते महिषासुर के। महिषासुर की जगह गांधी जैसे दिखने वाले एक व्यक्ति की प्रतिमा बनाई गई है, और इसके पीछे हिन्दू महासभा का यह आयोजन है जिसमें गांधी को दानव की तरह पेश किया गया है। कहने को कल ही देश भर में गांधी जयंती मनाई गई, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित तमाम लोगों ने गांधी को याद किया। लेकिन इस देश में गोडसे के भक्त हैं कि वे कहीं गांधी की तस्वीर को गोलियां मारते हैं, तो मध्यप्रदेश से गोडसे की भक्त, भाजपा की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर गांधी को गालियां देती हैं, और गोडसे की स्तुति करती हैं। इस बीच ऐसे संगठनों के लोग भी गांधी की स्तुति करते दिखते हैं जो कि जाहिर तौर पर गांधी-हत्या के पीछे शामिल थे, लेकिन आज हिन्दुस्तान में किसी भी तरह की सामाजिक मान्यता पाने के लिए गांधी स्तुति जरूरी रहती है, इसलिए वे भी मन मारकर गांधी जयंती पर श्रद्धांजलि देते दिखते हैं। अब ममता बैनर्जी के राज पश्चिम बंगाल में दुर्गा के हाथों गांधी का एक बार फिर कत्ल करवाते हुए हिन्दू महासभा के लोगों का कलेजा ठंडा पड़ा होगा क्योंकि पौन सदी पहले वे गांधी के शरीर को ही मार पाए थे, गांधी की सोच अब भी जिंदा है।
कुछ लोग हैरान हो सकते हैं कि गांधी के इस देश में यह हत्यारी सोच किस तरह आज भी चली आ रही है। ऐसे हैरान-परेशान लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जो लोग छोटे-मोटे हिंसक संगठनों की तरह हमलावर तेवरों के साथ गांधी पर आज भी गोलियां चलाते हैं, उनके संगठन उतने छोटे भी नहीं हैं जितने छोटे वे दिखते हैं। आज भी जो एक हत्यारी सोच गोडसे को स्थापित करने में लगी है, वह बढ़ते-बढ़ते गांधी स्मृति संस्थानों तक पहुंच चुकी है, और गांधी-हत्या में कटघरे तक पहुंचने वाले, और सुबूत न होने से छूटने वाले सावरकर को गांधी के समानांतर खड़ा करने की कोशिश में लगी हुई है। गांधी स्मृति संग्रहालय के ट्रस्टी केन्द्र सरकार तय करती है, और इस समिति की पत्रिका ‘अंतिम जन’ के कवर पेज पर सावरकर को लेकर भीतर सावरकर की स्तुति छपी है और उनका लिखा हुआ छपा है। इस समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद हैं, और इसका औपचारिक प्रकाशन गांधी के मुकाबले सावरकर को खड़ा करने में लगा है। इस तरह की कोशिशें सरकार के कई अलग-अलग संगठन कर रहे हैं, और इन कोशिशों की नीयत समझना मुश्किल भी नहीं है।
हिन्दू महासभा जैसे छोटे दिखने वाले संगठनों के मार्फत जिस तरह गोडसे-पूजा हो रही है वह हिन्दुस्तानी जनता के बर्दाश्त का इम्तिहान है जो कि हर बरस कई बार कई तरह से लिया जाता है। जिस तरह किसी बीमारी से बचाव का टीका उसी बीमारी के वायरस की छोटी-छोटी मात्रा देकर लगाया जाता है, उसी तरह हिन्दुस्तान में गांधी के हत्यारों का महिमामंडन धीरे-धीरे करके इस हत्यारी सोच को मान्यता दिलाई जा रही है। जब किसी झूठ को हजार बार दुहराया जाता है, तो वह काफी लोगों द्वारा सच मान लिया जाता है। सावरकर से लेकर गोडसे तक का महिमामंडन तरह-तरह से किया जा रहा है, और गांधी के साथ जुड़े हुए राष्ट्रपिता नाम के शब्द को चुनौती भी लगातार दी जा रही है। आने वाले वक्त में जल्द ही सावरकर को भारतरत्न की उपाधि भी दी जा सकती है, और गांधी से राष्ट्रपिता की उपाधि हटाने की मांग तो चल ही रही है। यह भी समझने की जरूरत है कि भाजपा से जुड़े हुए संगठनों के लोग लगातार जिस तरह यह कोशिश करते हैं, और बीच-बीच में खुद भाजपा के औपचारिक नेता जिस तरह गांधी पर हमला करते हैं, और गोडसे-सावरकर की स्तुति करते हैं, इन सबको कतरा-कतरा मनमानी मानना गलत होगा। यह सब हिन्दुत्व की उस हमलावर सोच का हिस्सा हैं जो कि गांधी को मार डालने की वकालत करती है। देश में आज कई मुद्दों पर जनता का बर्दाश्त बढ़ाया जा रहा है। मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक माहौल खड़ा करके बहुसंख्यक हिन्दू तबके के अधिक से अधिक लोगों के बीच ऐसे हिंसक बर्दाश्त को बढ़ाया जा रहा है। इसी तरह कहीं मांसाहार के खिलाफ, तो कहीं लोगों की गैरहिन्दू उपासना पद्धति के खिलाफ, तो कहीं उनके पहरावे के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। तमाम मुस्लिमों को आतंकी साबित करने के लिए दुनिया भर के मुस्लिम देशों की मिसालें ढूंढ-ढूंढकर लाई जा रही हंै, और उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सिलसिला लगातार चल रहा है, और यह सिर्फ हिन्दू महासभा जैसे छोटे दिखते संगठन की अकेले की सोच हो, यह सोचना भी नासमझी होगी।
कोलकाता में दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक, और जागरूकता से भरे हुए त्यौहार का ऐसा हिंसक, हत्यारा, और साम्प्रदायिक इस्तेमाल भी अगर इस देश के प्रधानमंत्री और बंगाल की मुख्यमंत्री को कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार नहीं कर सकता, तो फिर यही मानना होगा कि उनके मन में हिन्दू महासभा की इस प्रतिमा को लेकर कोई शिकायत ही नहीं है। एक तरफ तो बंगाल की इस बार की ही साज-सज्जा में कहीं पर किसी विदेशी कलाकार की पेंटिंग्स दिखती हैं तो कहीं ईसाईयों के सबसे बड़े तीर्थस्थान वेटिकन को दिखाते हुए दुर्गा पूजा की साज-सज्जा की गई है। बंगाल ऐसे उदार राजनीतिक विचार वाले धार्मिक समारोहों का प्रदेश है, लेकिन वहां पर हिन्दू महासभा जैसे नफरतजीवी लोगों ने गांधी की हत्या का ऐसा धार्मिक बेजा इस्तेमाल किया है। क्या इस देश में किसी हिन्दू की धार्मिक भावनाओं को इससे ठेस पहुंचती है?
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तरप्रदेश के कानुपुर में एक मंदिर से मुंडन कराकर लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रॉली एक तालाब में जा गिरी, और 27 लोग मारे गए। ट्रैक्टर चला रहे आदमी के बेटे का ही मुंडन था, और तमाम लोग रिश्तेदार और करीबी लोग थे। मुंडन से लौटते हुए रास्ते में सभी ने शराब पी थी, और ड्राइवर खुद नशे में अंधाधुंध रफ्तार से ट्रैक्टर-ट्रॉली दौड़ा रहा था। अब जब हादसा हो ही गया है तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि ट्रैक्टर-ट्रॉली का इस्तेमाल सिर्फ सामान ढोने के लिए होना चाहिए, और अगर इसमें लोगों को ढोया गया तो उस पर कड़ी कार्रवाई होगी।
यह हादसा उत्तरप्रदेश में जरूर हुआ है, लेकिन देश के अधिकतर हिस्सों में ट्रैफिक नियमों का यही हाल है। ट्रैक्टर-ट्रॉली के अलावा ट्रक और दूसरे मालवाहक इंसानों को ढोकर चलते हैं। इनमें किसी तरह की कोई हिफाजत तो हो नहीं सकती है, और ऐसा भी नहीं कि ये किसी धार्मिक या पारिवारिक कार्यक्रम में आने-जाने वाले लोग ही हों, कारोबारी गाडिय़ों में मुसाफिरों को ले जाने का काम ग्रामीण भारत में जगह-जगह देखने मिलता है। और अभी जब एक बड़े कारोबारी की कार हादसे में मौत हुई, और केन्द्र सरकार ने कारों में पीछे की सीट पर बैठे हुए लोगों के लिए भी सीट बेल्ट जरूरी करने की बात कही, तो लोगों ने देश भर से गाडिय़ों की छतों पर लबालब सवार लोगों की तस्वीरें पोस्ट कीं कि ये कौन सा सीट बेल्ट लगाएंगे? इंसान की जिंदगी इस कदर सस्ती मान ली गई है कि उसे बचाने की कोई भी कोशिश न की जाए, तो भी सरकार की साख पर अब सवाल नहीं उठते। एक वक्त था जब राजनीतिक सभाओं के लिए लोगों को इसी तरह ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रकों में ढोया जाता था। अब लोग खुद अपने हक की मांग करने लगे हैं, और वे बसों या दूसरी मुसाफिर गाडिय़ों के बिना किसी सभा की भीड़ बढ़ाने नहीं जाते। नतीजा यह है कि रेत-गिट्टी की तरह इंसानों को ढोना कुछ घटा है। लेकिन यह सिर्फ राजनीतिक सभाओं में घटा है, देश के शहरों में खुद सरकारी गाडिय़ां और मशीनें मजदूरोंं को ढोकर चलती हैं, बुलडोजरों पर मजदूरों को ढोया जाता है, और मौत होने पर मुख्यमंत्रियों के पास राहत देने के लिए तो अपार ताकत है ही।
अब हिन्दुस्तान में किसी भी तरह का सरकारी सुधार अदालती दखल के बिना होना मुमकिन नहीं रह गया है। और तो और हिंसक कोलाहल करते हुए जुलूस और बारात भी अदालती दखल के बिना रोकने की कल्पना सरकार नहीं करती, बल्कि अदालती हुक्म के बाद भी नहीं रोकती। ऐसे में अगर मुसाफिर ढोने वाले ऑटोरिक्शा तीन सवारियों के बजाय एक मिनी बस की तरह डेढ़-दो दर्जन सवारियां लेकर चलते हैं, तो इन्हें न रोकने के सरकारी फैसले के खिलाफ अदालत जाने के अलावा लोगों के पास और रास्ता क्या है? ऐसी गाडिय़ां सडक़ों पर अपने मुसाफिरों के अलावा भी दूसरों के लिए भी खतरनाक होती हैं, और इन पर रोक लगाने का काम जनता की भीड़ अगर करेगी, तो उस पर वही अफसर तरह-तरह के जुर्म लगा देंगे जिन पर ऐसी गाडिय़ों को रोकने की कानूनी जिम्मेदारी बनती है। लोगों के बीच यह जागरूकता आना जरूरी है कि सडक़ों पर ट्रैफिक नियम तोडऩे देना सरकार का हक नहीं है, बल्कि इन नियमों को लागू करवाना जनता का हक है।
अब ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के अलग-अलग हाईकोर्ट को अपनी वेबसाईट बनानी चाहिए, और सोशल मीडिया पेज बनाने चाहिए जहां पर लोग कानून तोड़े जाने के खिलाफ सुबूत पोस्ट कर सकें। यह बात अदालतें बरसों से मान रही हैं कि उन तक दौड़ लगा पाना आम लोगों के बस के बाहर की बात है। अब जरिया यही हो सकता है कि लोग अदालतों के सोशल मीडिया पेज पर कानून तोडऩे के वीडियो पोस्ट करें, और अदालतें अपना सोशल मीडिया-मित्र तैनात करके ऐसे मामलों पर सरकार से जवाब-तलब करे। किसी हाईकोर्ट को तो ऐसी पहल करनी पड़ेगी, और आज जब मोबाइल फोन और इंटरनेट का वक्त आ चुका है, तब जनता से यह उम्मीद करना कि वह सरकार से शिकायतों को लेकर कोई वकील तय करके अदालत तक जाए। अब लोगों को अदालत तक एक आसान और मुफ्त की पहल मुहैया कराना जरूरी है। कायदे की बात तो यह होती कि जिलों में पुलिस और प्रशासन ने ही ऐसी पहल की होती क्योंकि कानून तोड़े जाने की शिकायत तो सरकार के काम में मदद के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन सरकारों में संगठित भ्रष्टाचार इतना अधिक है कि कानून तोडऩे वालों से माहवारी वसूलना एक बेहतर काम है, आसान काम है, बजाय कानून लागू करने के। उत्तरप्रदेश का यह ताजा हादसा ऐसे ही संगठित भ्रष्टाचार का एक सुबूत है, और यह बात पूरे देश में इसी एक प्रदेश में कोई अनोखी बात नहीं है, अधिकतर राज्यों में हाल ऐसा ही है, और जहां हादसा हो गया है वहां की बात सिर चढक़र दिख रही है। बाकी राज्यों को भी अपना-अपना घर सुधारना चाहिए, और इंसानी जिंदगियों को भ्रष्टाचार के लिए खत्म करना बंद करना चाहिए। किसी भी सरकार को कानून तोडऩे वालों को ऐसी छूट देने का कोई हक नहीं है, और अगर सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं, तो फिर जनता को सोशल मीडिया पर इसके सुबूत लगातार पेश करना चाहिए, हो सकता है कि किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को इस पर कार्रवाई करना जरूरी लगे।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तरप्रदेश के वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के एक अतिथि व्याख्याता मिथिलेश गौतम को विश्वविद्यालय ने उनकी एक फेसबुक पोस्ट पर खड़े-खड़े बर्खास्त कर दिया है, और विश्वविद्यालय के अहाते में उनके घुसने पर रोक लगा दी है। मिथिलेश गौतम ने लिखा था- महिलाओं को नौ दिन के नवरात्र व्रत से अच्छा है कि नौ दिन भारतीय संविधान और हिन्दू कोड बिल पढ़ लें, उनका जीवन गुलामी और भय से मुक्त हो जाएगा, जय भीम।
नाम और जय भीम इन दोनों से यह जाहिर है कि मिथिलेश गौतम दलित समाज के दिखते हैं, और उन्होंने हिन्दू धर्म की मान्यताओं के मुकाबले भारतीय संविधान का गुणगान करते हुए हिन्दू महिलाओं को संविधान पढऩे की एक साधारण और पूरी तरह कानूनी सलाह दी थी। लेकिन इस सलाह पर विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. सुनीता पांडेय के दस्तखत से जारी बर्खास्तगी की चिट्ठी में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के छात्रों ने 29 सितंबर को सोशल मीडिया पर डॉ. गौतम की पोस्ट के खिलाफ शिकायती पत्र दिया। डॉ. गौतम की इस हरकत से विश्वविद्यालय के छात्रों में आक्रोश फैलने, माहौल खराब होने, और इम्तिहान और दाखिला बाधित होने की वजह से राजनीति शास्त्र के अतिथि प्रवक्ता डॉ. गौतम को तुरंत ही बर्खास्त करते हुए विश्वविद्यालय परिसर में उनके आने पर रोक लगाई जाती है। 29 सितंबर को ही छात्रों ने यह शिकायत की, और उसी दिन यह बर्खास्तगी हो गई। इस रफ्तार से ही यह जाहिर है कि यह इंसाफ किस तरह का हुआ होगा। और यह बात तो समझ से परे है ही कि हिन्दू महिलाओं को भारतीय संविधान और हिन्दू कोड बिल पढऩे की सलाह देना किस तरह एक दलित का जुर्म करार दिया जा सकता है?
जो हिन्दू धर्म हिन्दुस्तान में अपनी आबादी के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताने में लगे रहता है, वह हिन्दू धर्म जनगणना निपट जाने के बाद अपने तथाकथित लोगों के भीतर से दलितों और आदिवासियों को कुचलने और काटने में जुट जाता है। दलितों को हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि जब भारत सरकार से कमेटी मेडिकल कॉलेज की जांच के लिए आती है तो घर बैठे रिटायर्ड चिकित्सा-प्राध्यापक को भी मेहनताने पर ला-लाकर मेडिकल कॉलेज के शिक्षकों की गिनती बढ़ाकर दिखाई जाती है ताकि मान्यता मिल जाए। उसी तरह देश में सबसे अधिक हिन्दू आबादी साबित करने के वक्त हिन्दू समाज के सबसे आक्रामक शुद्धतावादी लोगों को भी दलित और आदिवासी हिन्दू लगने लगते हैं, और जनगणना के तुरंत बाद ये अवांछित लोग उन्हें सरकारी दामाद लगने लगते हैं, और तुलसी दास के शब्दों में ताडऩ के अधिकारी लगने लगते हैं, यानी मार खाने लायक। अब एक दलित ने अगर हिन्दू धर्म के पूजा-पाठ के किसी रिवाज के मुकाबले देश के संविधान को पढऩा बेहतर बताया है, तो इसे जुर्म करार देते हुए उसकी नौकरी खत्म कर दी गई। और बात सही भी है कि किसी भी धर्म के अस्तित्व को सबसे बड़ा खतरा किसी संविधान से ही हो सकता है, और खासकर तब जब वह संविधान समाज सुधार की बात भी करता हो, और धर्म के सबसे कट्टरपंथी शुद्धतावादी ऐसे किसी संभावित सुधार के खिलाफ लगे रहते हों। अभी महात्मा गांधी के नाम पर बनाए गए इस विश्वविद्यालय ने मेहरबानी यही की है कि इस दलित के मुंह और कान में पिघला हुआ सीसा भर देने की सजा नहीं सुनाई है, महज नौकरी से निकाला है।
हिन्दुस्तान के विश्वविद्यालयों के चाल-चलन को देखें, तो हैरानी होती है कि इनका विश्व से क्या लेना-देना हो सकता है? इनका तो अपने देश से, अपने ही प्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, देश के संविधान से कोई लेना-देना नहीं है, संविधान की चर्चा जहां एक जुर्म है, वैसे संस्थान भला क्या खाकर विश्व की बात कर सकता है? दुनिया के महान विश्वविद्यालय खुले शास्त्रार्थ से ही पनप सकते हैं, पनपते हैं। गहरे अंधेरे कुएं, या लंबी अंधेरी सुरंग जैसे दिमाग वाले लोग विश्व शब्द इस्तेमाल करने का भी हक नहीं रखते। जिनको संकुचित धार्मिक मान्यताओं के मुकाबले एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रावधानों की चर्चा भी बर्दाश्त नहीं है, वे विश्व से कौन सा ज्ञान ले सकते हैं, और कौन सा ज्ञान विश्व को दे सकते हैं? अगर एक दलित की दी गई सलाह कट्टरपंथी, तंगदिमाग, शुद्धतावादी हिन्दू पुरूषप्रधान लोगों को इतनी खटक रही है, तो उन्हें कार्रवाई के कोड़े मारकर एक सवालिया दलित की नौकरी खाने से अधिक हौसले का कुछ करके दिखाना चाहिए। उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए कि वे अपने धर्म की मान्यताओं को बेहतर कैसे बना सकते हैं। सवाल को विश्वविद्यालय के अहाते में घुसने से रोक देना यह बताता है कि यह संस्थान विश्वविद्यालय बनने के लायक नहीं है। जहां सवालों पर रोक लगे वह जगह समझदारी की किसी भी बात के लायक नहीं है।
आज हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज के नाम पर एक शुद्धतावादी-कट्टरपंथी हमलावर सोच हावी है, और वह अपने आपको मानो इस विशाल समाज का सरगना मान चुकी है। इस स्वघोषित अगुवाई को आज की सत्ता से भी बेहिसाब ताकत हासिल है, और ऐसे ही हमलावर हिन्दुत्व की वजह से दलितों और आदिवासियों को इस धर्म-समाज से परे दूसरे रास्ते सूझते हैं। जो दलित अपने को एक वक्त हिन्दू मानते थे, वे बीती पौन सदी में लगातार ऐसे हिन्दुत्व को छोड़-छोडक़र दूसरे धर्मों में गए। दूसरी तरफ जिन आदिवासियों ने अपने को कभी हिन्दू नहीं माना, उन्होंने भी अपने आदिवासी-धर्म को छोडक़र अगर कोई दूसरा धर्म अपनाया है, तो उन्होंने हिन्दुत्व नहीं अपनाया। यह बात जाहिर है कि हिन्दू धर्म के भीतर वर्ण व्यवस्था के पांवों के भी नीचे की जगह पाने से बेहतर यह है कि दलित और आदिवासी ऐसे दूसरे धर्म में रहें जहां उन्हें कम से कम इंसान तो माना जाता है। महात्मा गांधी के नाम पर बनाए गए इस विश्वविद्यालय से गांधी का नाम तो पहले हटा देना चाहिए, और फिर वहां बेधडक़ दलितविरोधी काम करना चाहिए, कम से कम गांधी का नाम बदनाम न हो।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
किसी भी विकसित लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट को आम लोग एक अदालत मान लेते हैं। दरअसल यह बहुत से जजों की अलग-अलग, और मिलीजुली कई किस्म की अदालतें का एक समूह होता है जिसका फैसला वैसा ही हो सकता है जैसा कि उसे लिखने वाले जज हों। किसी एक वक्त में एक मामला एक जज से एक किस्म का फैसला पा सकता है, और अगर वह किसी दूसरे जज के सामने पड़ा होता, तो हो सकता है कि फैसला उसका ठीक उल्टा भी होता। और हर मामले में ऐसी पुनर्विचार याचिका की गुंजाइश नहीं होती कि एक जज के फैसले से असहमति के बाद दूसरे अलग जज उस मामले को सुने ही सुनें। फिर यह भी रहता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सोच क्या है, वे खुद अपनी निजी विचारधारा के चलते किन मामलों को सुनना चाहते हैं, या किन मामलों को किन जजों की बेंच में भेजना चाहते हैं। ऐसे कई मुद्दे रहते हैं जिनकी वजह से देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले अलग-अलग किस्म के आते हैं, फिर भी हिन्दुस्तान इस मायने में अमरीका जैसे देश से बिल्कुल अलग है जहां पर जजों की निजी विचारधारा, उनकी पसंद और नापसंद सार्वजनिक रूप से अच्छी तरह दर्ज होती है, और फैसला आने के पहले ही लोग यह विश्लेषण कर लेते हैं कि जजों के कितने बहुमत से कैसा फैसला आएगा। वहां के जजों के मुकाबले हिन्दुस्तानी जजों के पूर्वाग्रहों की पहचान उतनी मजबूत नहीं रहती है, और यहां पर फैसले कई बार चौंकाने वाले भी रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भारत में भी अब बहुत से जजों को लेकर पहले से यह शिनाख्त बन जाती है कि वे किस विचारधारा के हैं, और उनसे किसके पक्ष में फैसले की उम्मीद की जानी चाहिए।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अभी एक शानदार फैसला दिया है जिसमें भारत की महिलाओं के हक एक बार फिर से, कुछ अधिक दूर तक परिभाषित किए गए हैं। जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ की अगुवाई में जस्टिस ए.एस. बोपन्ना, और जस्टिस जे.बी.पारदीवाला ने अभी गर्भपात के अधिकार पर फैसला देते हुए महिलाओं के गर्भवती होने को उनके शादीशुदा होने से अलग कर दिया है, और यह साफ मान लिया है कि अविवाहित महिला भी सेक्स-संबंधों का उतना ही बुनियादी अधिकार रखती है जितना कि एक शादीशुदा महिला, और इस तरह से एक अविवाहित महिला भी गर्भपात की बराबरी की हकदार है, और वह उन्हीं पैमानों की हकदार है जो कि एक शादीशुदा महिला के गर्भपात के मामले में लागू होते हैं। यह एक संयोग ही रहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सुरक्षित गर्भपात दिवस के दिन आया। एक दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने इस मामले पर फैसला देते हुए यह माना है कि शादीशुदा जिंदगी में भी एक महिला पति की सेक्सहिंसा का शिकार हो सकती है, और अगर उसकी सहमति के बिना, उसकी मर्जी के खिलाफ अगर ऐसा सेक्स हुआ है, तो इसके बाद के गर्भपात का हक उसे है। अदालत ने यह भी साफ किया है कि महिला को ऐसे गर्भपात के लिए सेक्स उसकी मर्जी के खिलाफ हुआ होने को साबित करने की जरूरत नहीं होगी। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि भारत सरकार ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में अपना यह पक्ष रखा है कि वह शादीशुदा जिंदगी के भीतर मर्द द्वारा जबर्दस्ती किए गए सेक्स को भी बलात्कार मानने के खिलाफ है। अब सुप्रीम कोर्ट ने आज गर्भपात के इस मामले में इस स्थापित कानून के खिलाफ फैसला दिया है जो कि पत्नी से जबर्दस्ती सेक्स को भी रेप नहीं मानता। सुप्रीम कोर्ट ने कल के इस फैसले में मैरिटल रेप पर तल्ख टिप्पणियां की हैं, और कहा है कि सेक्सहिंसा के लिए यह मान लेना लापरवाही होगी कि केवल अजनबी ऐसा करते हैं, परिवारों के भीतर महिलाएं लंबे समय से ऐसी हिंसा झेलती हैं, और अगर कानून इसे अनदेखा करेगा तो यह रेप की शक्ल भी ले लेता है। अदालत ने यह साफ किया कि चाहे मौजूदा कानून के तहत मैरिटल रेप अपराध नहीं है, लेकिन गर्भपात कानून के तहत पत्नी के साथ जबरिया संबंध बनाना रेप माना जाएगा, और ऐसे रेप से होने वाली संतान को जन्म देना और पालना महिला को सजा देने सरीखा होगा।
एक तरफ जब दुनिया का सबसे विकसित और संपन्न देश अमरीका आज गर्भपात के मुद्दे पर दो फांक हो चुका है। वहां के दो प्रमुख राजनीतिक दल तो इस बंट ही गए हैं, इन दोनों दलों के परंपरागत समर्थक भी इस पर बुरी तरह बंट गए हैं, और अब अमरीका के अधिकतर राज्य इसे लेकर अपने अलग कानून बना रहे हैं क्योंकि वहां के सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से गर्भपात के फैसले का अधिकार छीन लिया है। वहां के सुप्रीम कोर्ट जजों के बारे में पहले से यह आशंका चली आ रही थी कि उनमें पिछले दकियानूसी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के मनोनीत किए गए जजों की बहुतायत है, और वे गर्भपात के खिलाफ फैसला देंगे, और वैसा ही हुआ। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका में गर्भपात के खिलाफ वही सोच काम करती है जो सोच चर्च से निकली है। धर्म को मानने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं से इस अधिकार को छीन लेने का हिमायती रहा है। दूसरी तरफ भारत किसी भी मायने में अमरीका के मुकाबले कम धर्मालु देश नहीं है, और यहां के कई धर्मों में तो किसी जीव-जंतु को भी नुकसान पहुंचाने के खिलाफ नसीहतें हैं। लेकिन गर्भपात के मामले में हिन्दुस्तान एकदम से उदारवादी हो जाता है, क्योंकि अनचाही लड़कियों के बीच लडक़ों की चाहत पूरी करने का यही एक जरिया रहता है। खैर, अभी हम उस मुद्दे पर जाना नहीं चाहते क्योंकि आज मामला महिला की निजी पसंद का है, उसके अपने फैसले का है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अच्छा फैसला दिया है जिसमें शादीशुदा और गैरशादीशुदा महिलाओं के सेक्स, मां बनने, या गर्भपात के फैसलों को बराबर माना है। दूसरी बात यह कि शादीशुदा जिंदगी में पति के हाथों बलात्कार की शिकार होने वाली महिला को भी यह हक दिया है कि वह चाहे तो गर्भपात करवा सकती है। इस फैसले से अमरीकी सुप्रीम कोर्ट जैसी अदालतों को भी कुछ सीखना चाहिए। फिलहाल भारतीय महिला का एक और अधिकार कम से कम कानूनी रूप से मजबूत स्थापित हुआ है, जो कि कम राहत की बात नहीं है। इस फैसले से यह भी साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से जैसे भी निजी पूर्वाग्रहों की आशंका देश को हो, उनके मातहत काम करने वाले जजों की बेंच उन पूर्वाग्रहों की फिक्र किए बिना अपने अलग सोच के फैसले दे सकती हैं।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन अभी गुजरा, तो बिना हो-हल्ले के चले गया। उनके प्रशंसकों में से कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी कही यह बात याद दिलाई कि उन्हें उम्मीद है कि इतिहास उनके साथ अधिक रहमदिल रहेगा। यह बात मनमोहन सिंह ने अपने कटु आलोचकों की बातों के जवाब में कही थीं। ऐसे आलोचकों का अधिकांश हिस्सा इस बात के लिए उनका सबसे बड़ा आलोचक रहता था कि वे कम बोलते थे, धीमा बोलते थे, साधारण जुबान बोलते थे, दावे नहीं करते थे, और सपने तो बिल्कुल ही नहीं दिखाते थे। इन बातों की वजह से उनकी खिल्ली उड़ाने वाले लोगों की कमी नहीं थी, और ऐसे लोग उन्हें मौनमोहन सिंह कहा करते थे। आज पता नहीं लोगों को वह काम और सिर्फ काम करने वाला, और तकरीबन मौन रहने वाला प्रधानमंत्री याद पड़ रहा है। शायद इसलिए भी ऐसा हो रहा है कि वे बोलते कम थे, लेकिन उनके वक्त डॉलर की कीमत 62 रूपये ही थी, जो कि आज 82 रूपये की करीब हो गई है। उनके वक्त पेट्रोल 71 रूपये था, और डीजल 55 रूपये, अब आज तो इनके सौ-सौ रूपये पार करने के बाद लोग इस बारे में सोचना भी बंद कर चुके हैं कि आज क्या रेट है। गैस का सिलेंडर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री के वक्त 410 रूपये का था, जो कि अब 11 सौ रूपये के पार है। देश की कमाई और नौकरियों के आंकड़े भी उस वक्त बहुत ऊपर थे, और आज मटियामेट हैं। लेकिन फिर भी इस देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को मलाल इस बात का है कि मनमोहन सिंह के वीडियो पर्याप्त संख्या में यूट्यूब पर नहीं हैं, और यही हिन्दुस्तानी वोटरों के एक तबके का सबसे बड़ा मलाल है।
लेकिन ऐसा मलाल उस वक्त और देखने लायक हो जाता है जब आज सोशल मीडिया पर मौजूद पुरानी तस्वीरें, पुराने ट्वीट, पुराने फेसबुक पोस्ट, पुराने बैनर-पोस्टर, और पुराने वीडियो देखने मिलते हैं। उस वक्त मनमोहन सिंह के खिलाफ सबसे अधिक बोलने वाले, उनकी सबसे अधिक खिल्ली उड़ाने वाले बहुत दमदार भाषण देने वाले लोगों के जो वीडियो आज सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं, वे यह भी याद दिलाते हैं कि लोगों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। जिस तरह के भाषण उस समय, 2014 के पहले तक प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उतर चुके नरेन्द्र मोदी ने दिए, वे आज कब्र फाडक़र उनका पीछा कर रहे हैं। उस वक्त स्मृति ईरानी ने 410 रूपये की गैस के खिलाफ सिलेंडर लेकर जिस तरह के प्रदर्शन किए थे, उसके पोस्टर आज उनका भी पीछा कर रहे हैं। लोगों को खासकर एक वीडियो बार-बार देखने में बड़ा मजा आ रहा है जिसमें 62 रूपये के डॉलर वाले वक्त के मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाते हुए मोदी कहते दिखते हैं कि जिस देश का रूपया गिरता है, उस देश का प्रधानमंत्री गिरा हुआ रहता है। रूपये के गिरते हुए दाम को लेकर मोदी की कही हुई और भी कई बातें आज उनका पीछा कर रही हैं। और लोगों के मन में, सोशल मीडिया पर उनकी जुबान से बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि जब रूपया एक डॉलर में 82 जितना गिर जाता है, तब प्रधानमंत्री कहां रहता है? क्या ऐसे रेट वाले रूपये वाला प्रधानमंत्री गिरा हुआ रहता है या उठा हुआ रहता है?
दरअसल चुनाव और राजनीति की गर्मी में अकेले मोदी ही नहीं, कुछ और नेता भी ओछी बातें कहते हैं, और इन्हीं बातों का इतिहास लोगों को औसत दर्जे का नेता, या बड़ा नेता बनाता है। और मोदी तो केन्द्र सरकार या अपनी पार्टी के केन्द्रीय संगठन में एक दिन भी काम किए बिना सीधे प्रधानमंत्री की दौड़ में पहुंचे हुए एक प्रादेशिक नेता थे, जिनका पेट्रोलियम और डॉलर से सीधे कोई वास्ता नहीं पड़ा था, इसलिए उनसे तो बोलने में कई तरह के गलत काम हुए, लेकिन श्रीश्री रविशंकर और रामदेव जैसे तथाकथित आध्यात्मिक लोग भी उस वक्त डॉलर और पेट्रोल के दाम तय कर रहे थे, और टीवी स्टूडियो में बैठकर नौजवान पीढ़ी को बरगला रहे थे कि उन्हें 70 रूपये लीटर का पेट्रोल अच्छा लगेगा या 35 रूपये लीटर का? यही दोनों डॉलर भी 35 रूपये में दिला रहे थे, और विदेशों से कालाधन लाकर हर हिन्दुस्तानी के खाते में 15-15 लाख रूपये भी डाल रहे थे, जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने उस वक्त कहा था। लोगों की कही हुई कुतर्क की बातें दूर तक उनका पीछा करती हैं, और यूट्यब, इंटरनेट, सोशल मीडिया, और वॉट्सऐप की मेहरबानी से अब यह पीछा कभी खत्म ही नहीं होता है। यह अलग बात है कि अपने करोड़ों भक्त होने का दावा करने वाले ऐसे स्वघोषित आध्यात्मिक दुकानदार पूरी बेशर्मी से अब नये दावे करने में जुटे रहते हैं क्योंकि उनका इस बात पर अपार भरोसा है कि दुनिया में जब तक बेवकूफ जिंदा हैं, तब तक धूर्त भूखे नहीं मर सकते।
लेकिन राजनीति, आध्यात्म या सामाजिक जीवन के कुछ कामयाब और मशहूर लोग अगर सचमुच में महानता हासिल करना चाहते हैं, तो जिंदगी और चाल-चलन की बुनियादी ईमानदारी के अलावा उन्हें ऐसे झूठे दावे करने से भी बचना चाहिए। देश के प्रधानमंत्री के बड़े-बड़े दावों वाले वीडियो कुछ बरस के भीतर ही खुद उनकी बेइज्जती करते नजर आएं, यह बात किसी को भी महानता तक नहीं ले जा सकती। आज ऐसे वक्त कम बोलने की ताकत और खूबी समझ पड़ती है कि बड़बोलापन महानता तक पहुंचाने का एक्सप्रेस-हाईवे नहीं है, वह राह का रोड़ा भर है। बहुत से लोगों को इस नौबत को देखकर नसीहत लेना चाहिए। भक्तिभाव से परे जब किसी नेता का ईमानदार मूल्यांकन होता है, तो इनमें से कोई भी बात अनदेखी नहीं की जाती, यह याद रखते हुए ही लोगों को बोलना चाहिए। लेकिन लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि जब उनकी पार्टी के लोग बलात्कार करते पकड़ाएं, हत्या करते पकड़ाएं, और वे उस पर भी मुंह न खोलें, उनकी पार्टी की सरकारें मुजरिमों की तरह काम करें, फिर भी उस पर उनका मुंह न खुले, तो ऐसी चुप्पी की गूंज भी इतिहास से जाती नहीं है। और अब फेसबुक और ट्विटर जैसी मुफ्त की डायरियों की शक्ल में लोगों के पुराने कहे हुए, और न कहे हुए, सभी का रिकॉर्ड अच्छी तरह दर्ज रहता है।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे का राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया तो खुद जापान में इस पर की गई फिजूलखर्ची का जमकर विरोध हो रहा है। इस पर करीब सौ करोड़ रूपये खर्च होने का अंदाज है, और इस सरकारी खर्च से परे उन 217 देशों का खर्च अलग है जिनके प्रतिनिधि इस अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे थे। जापानी और बौद्ध परंपरा के अनुसार 8 जुलाई को हुई इस हत्या के बाद 15 जुलाई को ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था, और अब महीनों बाद यह प्रतीकात्मक राजकीय अंतिम संस्कार हुआ है जिसमें उनकी अस्थियों को श्रद्धांजलि दी गई है, और इसमें भारतीय प्रधानमंत्री सहित दर्जनों देशों के मुखिया पहुंचे हैं। यह कुछ दिनों के भीतर दुनिया का एक दूसरा बड़ा अंतिम संस्कार है, इसके ठीक पहले ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के अंतिम संस्कार में भी ऐसे ही दुनिया भर से लोग जुटे थे। जापान में अभी इस अंतिम संस्कार पर खर्च को लेकर कई सर्वे हुए जिनमें पता लगा कि देश की आधी से ज्यादा आबादी इसे गलत खर्च मान रही है। राजधानी टोक्यो में दस हजार लोगों ने दो दिन पहले इस अंतिम संस्कार को रद्द करने की मांग करते हुए जुलूस निकाला, और प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर एक व्यक्ति ने विरोध करते हुए खुद को आग लगा ली।
जापान बहुत गरीब देश नहीं है, लेकिन अंतिम संस्कार पर जनता के पैसों से एक बड़ा खर्च करने का वहां विरोध हो रहा है। जहां सरकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री के राजकीय अंतिम संस्कार का विरोध करते हुए हजारों लोग जुलूस निकाल रहे हैं, उस समाज की जागरूकता को समझने की जरूरत है। हिन्दुस्तान में सत्ता पर बैठे हुए नेता अपनी पसंद और नापसंद पर, अपनी सनक पर, और अपने शौक पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपये खर्च कर देते हैं। जिस देश की आधी आबादी सरकारी रियायती या मुफ्त के अनाज की वजह से जिंदा है, उस देश में एक-एक प्रतिमा पर तीन-तीन हजार करोड़ रूपये खर्च कर दिए जाते हैं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने अंबेडकर और कांशीराम के साथ अपनी प्रतिमाएं खड़ी करने के लिए, और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के चट्टानी बुत बनवाने के लिए शायद हजार करोड़ से अधिक खर्च किए थे, और अब हर चुनाव के वक्त उन हाथियों को ढांकने के लिए दसियों लाख रूपये और खर्च होते हैं। जनता के बीच यह जागरूकता होनी चाहिए कि वह नेताओं की फिजूलखर्ची पर सवाल उठा सके। ऐसे सवाल उठाने के लिए हिम्मत भी लगती है, और सरकारों में बर्दाश्त भी लगता है। आज एक असुविधाजनक सवाल के जवाब में अगर बुलडोजर निकल पड़ते हैं, तो कोई क्या खाकर ऐसे सवाल उठा सकते हैं? लेकिन ऐसी चुप्पी का भुगतान लोकतंत्र को करना होता है जिसमें जनता के खजाने को पांच बरस के निर्वाचित नेता इस अंदाज से लुटाते हैं कि सौ-दो सौ बरस पहले के कोई हिन्दुस्तानी राजा अपने गले की माला लुटा रहे हों। वैसे राजाओं के दिन लद गए, सामंत भी अब नहीं रहे, लेकिन जनता के पैसों पर मनमानी करने की आदत नहीं गई, बल्कि यह ऐसे लोगों को भी लग गई है जो कि सादगी का दावा करते थकते नहीं हैं।
अब यहां पर एक सवाल और उठता है कि किसी के गुजरने पर उसके शरीर को मेडिकल कॉलेज को दान करके एक सामाजिक जिम्मेदारी भी पूरी की जाती है, और फिजूल के अंतिम संस्कार से भी बचा जाता है। लेकन हम सिर्फ आम लोगों को ही ऐसा त्याग करते देखते हैं, किसी भी चर्चित और बड़े व्यक्ति, खासकर सत्तारूढ़ या सत्ता से जुड़े हुए नेता का शरीर कभी चिकित्सा शिक्षा के लिए पहुंचते नहीं दिखता। जबकि हालत यह है कि जिंदा रहते हुए ये नेता खुद को समाज की प्रेरणा मानकर चलते हैं, और उनकी गुजर जाने पर उनकी स्मृतियों को उनके साथी या अनुयायी प्रात:स्मरणीय बताते हैं, यानी दिन की शुरुआत उनकी स्मृतियों से की जानी चाहिए। ऐसे लोग अपना शरीर मेडिकल साईंस को देने की घोषणा क्यों नहीं कर जाते? इससे तो अंतिम संस्कार पर होने वाला अंधाधुंध खर्च भी बचेगा, लकडिय़ां या जमीन पर जगह भी बचेगी, और वे किसी काम भी आ सकेंगे। जब अमरीका में 15-20 बरस पहले भूतपूर्व राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन का निधन हुआ, तो अमरीकी सरकार में छुट्टी रखी गई थी। उस दिन का हर कर्मचारी-अधिकारी का वेतन रीगन के राजकीय अंतिम संस्कार के खर्च में जोड़ दिया गया था, और इस तरह यह खर्च तीन हजार करोड़ रूपये से अधिक आंका गया था। खर्च का यह भयानक आंकड़ा देखने के बाद अमरीका में इस तरह की छुट्टी देना शायद बंद कर दिया गया था।
हम घूम-फिरकर फिर जनता के पैसों की बर्बादी की अपनी फिक्र पर आते हैं, तो सत्तारूढ़ नेता मरने के बाद तो जनता पर जितना भी बड़ा बोझ बनते हों, वे जीते-जी भी कम बड़ा बोझ नहीं रहते हैं। जिन नेताओं को गली के कुत्ते भी न काटें, वे भी सरकारी खर्च पर बंदूकबाज साथ लिए चलते हैं। सत्ता से जुड़े लोग अपने घर-दफ्तर में न सिर्फ हिफाजत बल्कि बाकी बातों के लिए भी सरकारी खर्च करवाते हैं। इन सबका जमकर विरोध होना चाहिए। आज सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी निकालना आसान है कि किन कर्मचारियों की तैनाती कहां हैं, कितनी गाडिय़ां कहां तैनात हैं, और सत्तारूढ़ नेताओं पर जनता का कितना पैसा खर्च हो रहा है। लोकतंत्र में पारदर्शिता की उम्मीद करने वाली संस्थाओं को यह चाहिए कि न सिर्फ सूचना के अधिकार के तहत, बल्कि तरह-तरह के फोटो और वीडियो से भी यह जानकारी जुटाते चलें कि कहां-कहां पर जनता के पैसों की बर्बादी हो रही है। और ऐसे सुबूत लेकर उन जजों के सामने भी जाना चाहिए जो कि राजनेताओं से कहीं अधिक बढक़र ऐसी बर्बादी करते हैं, और जनता को सडक़ों पर से दूर धकेलते हुए सायरनों के साये में सडक़ों का सफर तय करते हैं। कम से कम कुछ ऐसे छोटे राजनीतिक दल हो सकते हैं जो कि ऐसी अय्याशी में नहीं लगे रहते, और उन्हें तरह-तरह से ऐसे असुविधाजनक सवाल उठाने चाहिए। लगातार सवाल उठाए बिना लोकतंत्र में और कोई जरिया तो है नहीं कि लोगों को कटघरे में खड़ा किया जा सके। जनता के पैसों की फिजूलखर्ची के इस हमाम में तो नेता, अफसर, जज, सभी बिना तौलियों के हैं, इसलिए इनमें से किसी को कोई शर्म तो आनी नहीं है, जनता के बीच से ही मतदाताओं की जागरूकता के लिए ऐसे सवाल उठाने होंगे।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


