विचार / लेख

छत्तीसगढ़ के दण्ड-धारी सैनिक
19-Apr-2026 9:58 PM
छत्तीसगढ़ के दण्ड-धारी सैनिक

-डॉ.परिवेश मिश्रा

साढ़े चार हजार की आबादी वाला लेन्ध्रा सारंगढ़ जिले में एक अपेक्षाकृत बड़ा गांव है। किसान-ठेकेदारों के माध्यम से पुरानी पारम्परिक बसाहट को जब कृषि प्रधान गांव के रूप में पुनर्स्थापित किया गया तो शुरुआती परिवार रिकॉर्ड का हिस्सा बन गये। 

1707 मे जब तक औरंगजेब की मृत्यु नहीं हुई, भारत के इस हिस्से के मूल निवासी वन-आश्रित अपनी जीवन शैली में थोड़ी सी खेती के साथ मस्त और संतुष्ट थे। पहले मराठों और फिर अंग्रेजों के आने के साथ साथ राजाओं से राजस्व-कर वसूली में अनाप-शनाप बढ़ोतरी हुई और राजाओं के सामने नये खेत तैयार कर उपज बढ़ाने की आवश्यकता मजबूरी बन गयी। अच्छी किसानी मे उस्ताद माने जाने वाली कृषि-आधारित जातियों की पूछ-परख बढ़ी। ऐसी अनेक जाति समूहों का सारंगढ़ में भी आगमन हुआ। अधरिया उनमे से एक थे।

छोटी, बिखरी और अक्सर में अक्सर अस्थाई बसाहटों को गांव का रूप दे कर कृषि-आधारित जीवन शैली विकसित होना शुरू हुई। गांव को ठेके पर दिया जाने लगा। ठेकेदार किसान ‘गौंटिया’ कहलाये। ठेका केवल गौंटिया के वंशजों में हस्तांतरणीय होता था। यदि पुत्र नहीं हुआ तो गौंटिया की मृत्यु पर ठेका उसकी पत्नी और यहां तक कि अविवाहित बेटी को भी हस्तांतरित होता था। उसका जि़म्मा था गांव बसाना, नये खेत तैयार करना और करवाना। इसके लिये सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना। तालाब खोदे गये, जहां ज़रूरी और संभव हुआ बहते पानी को रोका गया। ठेका दिये जाने के समय पर तमाम शर्तें जो राज्य के वाजिब-उल-अजऱ् में दर्ज थीं, समझा दी जाती थीं। वाजिब-उल-अजऱ् गांव के प्रशासन का एक तरह का संविधान था। कुछ शर्तें ऐसी थीं जिनके उल्लंघन पर ठेका निरस्त किये जाने का प्रावधान था। ऐसी एक शर्त थी कि गांव में भूख से किसी की मृत्यु नहीं होना चाहिये। ठेकेदार के बाकायदा हस्ताक्षर लिये जाते थे। जिसे हम साक्षरता समझते हैं वह नहीं थी तो क्या – कोई तीर का चिन्ह बनाकर हस्ताक्षर करता तो कोई सीढ़ी का। सीढ़ी में तीन पायदान बनाकर उस हस्ताक्षर पर कोई पहले कब्जा कर चुका है तो बाद में आने वालों के सामने दो या चार या पांच पायदान बनाकर अपना विशिष्ट हस्ताक्षर इज़ाद करने का विकल्प मौजूद रहता। आज होती तो यह व्यवस्था अंग्रेज़ी में ‘बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मॉडल’ या ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप’-मॉडल के नामों से जानी जाती।

लेन्ध्रा के पहले गौंटिया अघरिया थे। शुरुआत करने के लिये चार अन्य गांवों से अपनी जाति के चार परिवारों को बुला कर बसाया। कुछ और परिवार भी आ कर बसे। इनमे माली थे। तेली, कलार, और हलवाई थे। ये रैयत कहलाये। गांव के चौकीदार का पद गांड़ा और झांखर या बैगा के लिये आरक्षित था। वे नियुक्त हुए। स्थानीय बोली मे जोर से आवाज देने या चिल्लाने के लिये नरियाना शब्द प्रयुक्त होता है। हर साल ‘पुस-पुन्नी’ के दिन ‘नरिहा’ की नियुक्ति होती थी (या कहें नियुक्ति का नवीनीकरण होता था)। इस तरह एक राउत (यदुवंशी) का परिवार भी बसा। यह व्यक्ति रोज सुबह घरों की दहलीज पर पहुंच कर नरियाता और घर का मालिक मवेशियों को इसके हवाले कर देता। शाम को इस का दोहराव होता जब नरिहा मवेशियों को वापस सौंपने पहुंचता। दिन भर मवेशी गांव से बाहर जिस जमीन पर चरते वह राजा की थी सो नरिहा साल मे एक बार एक सेर घी गौंटिया के माध्यम से राजा तक पहुंचाता। बढ़ई, लोहार, नाई, धोबी, सब बसे। उनकी सेवाओं के बदले र राज्य की ओर से सबको टैक्स-फ्ऱी जमीन दी गयीं।

रैयत को खेत तैयार कर फसल लेने के लिये टैक्स के साथ वाली जमीनें दी गईं। टैक्स इक_ा करने की जिम्मेदारी गौंटिया की थी। गौंटिया के पास जो जमीन थी वह ‘भोगरा’ जमीन कहलाती थी और टैक्स-फ्ऱी थी। उसके पास गांव की सरहद के भीतर रैयती भूमि का कुछ हिस्सा रख कर और टैक्स अदा कर खेती करने का विकल्प मौजूद था।

रैयतों मे एक थे बुद्धूराम। उस काल मे सरनेम जैसे शब्दों की जगह जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होता था सो वे बुद्धूराम कलार के रूप मे जाने गये। बाद की पीढिय़ों ने सरनेम के रूप मे ‘डनसेना’ शब्द का उपयोग किया जो आज भी लेन्ध्रा मे बुद्धूराम के वंशजों की पहचान है।

प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय था जब इस ‘सरनेम’ का अस्तित्व नहीं था। उस काल मे वर्तमान दुर्ग जि़ले के बालोद नामक स्थान पर एक राजपूत राजा का राज्य था। एक कलार लडक़ा भी था जिसकी मित्रता राजा के बेटे से थी। दोनो ‘महाप्रसाद’ थे-रिश्ते मे दोस्त से भी बढ़ कर। एक दिन कलार लडक़े ने महसूस किया कि उसका महाप्रसाद कलार लडक़े की बहन पर बुरी नजऱ और नीयत रखता है। विचलित कलार लडक़ा राजा के पास पहुंचा। महाप्रसाद वाले रिश्ते के विस्तारित रूप मे राजा उसका ‘फूल बाप’ था। लडक़े ने फूल बाप से सवाल पूछा – अगर आपके घर मे बाहरी कुत्ता आ कर गंदगी करे तो आप क्या करेंगे? राजा ने कहा – मार दूंगा।

लडक़े ने वही किया। अगले दिन जब उसने महाप्रसाद को अपने घर पर पाया तो मार दिया। पर ये तो बहुत बड़ी घटना हो गयी थी। सारे राजपूत हथियारों के साथ पहुंच गये और कलारों के साथ उनका बड़ा युद्ध हुआ। किंतु राजा नहीं पहुंचा। वह अपनी दी सलाह के परिणाम से नैतिक रूप से बंधा था। राजपूतों का नेतृत्व रानी कर रही थी। किंतु युद्ध का परिणाम राजपूतों के विरुद्ध जाता देख राजा का संयम जाता रहा और वह भी मैदान में उतर गया। कलारों को यह बात सरासर अनुचित जान पड़ी। आखिर लडक़े ने राजा की सलाह पर ही तो यह कदम उठाया था।

राजा से दुखी और निराश कलारों ने फ़ैसला कर लिया कि अब न सिफऱ् यहां नहीं रहना बल्कि सब ने शपथ ली कि अब यहां का पानी भी नहीं पीना है। कलारों के हाथों में हथियारों के रूप मे सिफऱ् डण्डे थे। उसी के साथ उन्होंने बालोद से बिदा ले ली। समाज में माना जाता है कि डण्डों के साथ निकले इसी समूह को ‘डण्ड-सेना’ कहा गया जो कालांतर में डनसेना या डड़सेना के नामों से जाने गये। परम्परागत रूप से इस समूह को शराब बनाने की कला मे निपुणता के लिये भी जाना जाता था।

लगभग पचास साल पहले तक भी सारंगढ़ राज्य मे शराब का सेवन लुकते-छिपाते ही होता था। कम होते हुए भी यह राज्य के राजस्व के लिये आकर्षक स्रोत तो हमेशा ही रहा। शराब बनाने के लिये केवल महुए का उपयोग होता था। गन्ने या गुड़ का प्रवेश हाल के दशकों की घटना है। राज्य के काल में कलार इस काम में अधिक सामने आते थे। लेकिन जैसे-जैसे इस व्यवसाय का आर्थिक पक्ष मज़बूत होता गया, इसे हथियाने की रेस में जाति-बंधन तोड़ कर सभी शामिल होते गये। बुद्धूराम डनसेना के पास शराब व्यवसाय के लिये समय नहीं रहा हो यह बात समझ में आती है। सभी रैयतों की तरह उनके हिस्से भी तीस-पैंतीस एकड़ जमीन को उपजाऊ बनाने की जिम्मेदारी आयी थी।

समय के साथ परिवार बढ़ते रहे। लेंध्रा में कल बुद्धूराम डनसेना की आठवीं पीढ़ी से मुलाकात हुई। सहयोगी लोकनाथ डनसेना के भाई जदूनाथ डनसेना की हाल में मृत्यु हुई है। परिवार के सत्यनारायण उफऱ् रामजी, सुशील, कुंजबिहारी उफऱ् पिंटू, पप्पू, रोशन और एश्वर्य डनसेना से भेंट कर सांत्वना दी।


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