विचार / लेख

‘मैल्कम एक्स’ के 101वें (19 मई) जन्मदिन पर...
19-May-2026 6:58 PM
‘मैल्कम एक्स’ के 101वें  (19 मई) जन्मदिन पर...

-मनीष आजाद

दुनिया जितना ‘मार्टिन लूथर किंग’ को जानती है, उतना उन्हीं के समकालीन ब्लैक लीडर ‘मैल्कम एक्स’ को नहीं जानती। जबकि आज उनके विचार कहीं ज्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं।

1966 में शुरू हुआ ब्लैक पैंथर आंदोलन सीधे-सीधे ‘मैल्कम एक्स’ के विचारों और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित रहा है। ब्लैक पैंथर की स्थापना के ठीक एक साल पहले 21 फरवरी 1965 को मैल्कम एक्स को उस समय 15 गोलियाँ मारी गईं, जब वे ‘हरलेम’ में एक लेक्चर देने जा रहे थे।

मैल्कम एक्स के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है कि मैल्कम एक्स का पूरा जीवन व उनके विचार काले लोगों के दूसरे महान नेता ‘मार्टिन लूथर किंग’ का एक तरह से ‘एंटीथीसिस’ रचता है। दोनों के विचारों व व्यक्तित्व की छाया थोड़ा बदले रूप में हमारे यहां के दलित आंदोलन में भी दिखाई पड़ती है। इसलिए मैल्कम एक्स को समझने का प्रयास कहीं न कहीं अपने देश के दलित आंदोलन को भी समझने का प्रयास है।

मैल्कम एक्स का जन्म 19 मई 1925 को अमेरिका के ‘ओमाहा’ में एक गरीब परिवार में हुआ था। इनके पिता एक राजनीतिक व्यक्ति थे और काले लोगों के आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदार थे। इसके अलावा प्रसिद्ध ब्लैक लीडर और ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’ अभियान के जनक ‘मार्कस गार्वे’ [Marcus Garvey] के समर्थक थे। इसी कारण से वे गोरों के प्रतिक्रियावादी गुप्त संगठन ‘कू क्लक्स क्लान’ [Ku Klux Klan] के निशाने पर थे। अंतत: जब मैल्कम एक्स महज 6 साल के थे तो 1931 में उनके पिता की हत्या इसी संगठन के कुछ लोगों ने कर दी। इस घटना ने मैल्कम को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया और गोरों के प्रति नफरत के बीज बो दिए। इसके अलावा एक अन्य घटना ने मैल्कम को बुरी तरह हिला दिया था। एक बार उनके घर में आग लग गई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया। फायर ब्रिगेड वालों ने जब देखा कि आग एक काले के घर में लगी है तो बिना आग बुझाए ही वापस लौट गए। बाद में अमेरिकी लोकतंत्र के प्रति उनके जो विध्वंसक विचार बने, उनमें इन घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब वह किशोरावस्था में थे तो उन्हें किसी छोटे अपराध के लिए 6 साल जेल की सजा काटनी पड़ी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि मैंने अपने जीवन की अधिकांश पढ़ाई इसी दौरान की। जेल से निकलने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू होती है। सबसे पहले उन्होंने ईसाई धर्म छोडक़र मुस्लिम धर्म ग्रहण कर लिया और काले मुस्लिम लोगों के संगठन ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ के सदस्य हो गए। उस दौरान ईसाई धर्म को गोरों के साथ जोडक़र देखा जाता था। इसी कारण इस दौरान बहुत से काले लोगों ने सामूहिक तौर पर प्रतिक्रियास्वरूप ईसाई धर्म छोडक़र इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। यहीं से मैल्कम एक्स के समाजवाद के प्रति झुकाव की भी शुरुआत होती है। गोरों की राष्ट्रीयता के विरुद्ध ‘नेशन ऑफ इस्लाम’, ‘ब्लैक नेशनलिज्म’ की बात करता था। इसलिए नौजवानों के बीच यह बेहद लोकप्रिय था।

नेशन ऑफ इस्लाम के लीडर ‘इलियाह मुहम्मद’ की कथनी और करनी में अंतर देखने और खुद समाजवाद की तरफ झुकने के कारण दोनों में काफी तनाव आ गया और अंतत: मैल्कम एक्स ने नेशन ऑफ इस्लाम छोडक़र ‘मुस्लिम मास्क’ की स्थापना की और अंतत: सेकुलर विचारधारा तक पहुँचते हुए अपनी मृत्यु के कुछ ही समय पहले ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ अफ्रो-अमेरिकन यूनिटी’ की स्थापना की।

इसी समय मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी सक्रिय थे। उनका ‘सिविल राइट्स मूवमेंट’ अपने उभार पर था। कालों के मताधिकार को व्यवहार में हासिल करने के लिए प्रसिद्ध ‘सेल्मा मार्च’ 1964 में ही हुआ था। इस घटना के 50 साल होने पर ‘सेल्मा’ नाम से एक फिल्म भी रिलीज हुई थी जो काफी चर्चित हुई थी।

बहरहाल ‘मैल्कम एक्स’ और ‘मार्टिन लूथर’ दोनों ही समस्या और समाधान को दो विपरीत नजरिए से देख रहे थे।

मार्टिन लूथर किंग को अमेरिकी लोकतंत्र के मूल्यों में काफी विश्वास था और वे इन मूल्यों और अमेरिकी राजनीति के बीच एक अंतर्विरोध व तनाव देख रहे थे। सरल शब्दों में कहें तो वे इसी व्यवस्था में अमेरिकी लोकतंत्र के ‘मूल्यों’ को जमीन पर उतारते हुए काले लोगों के अधिकारों की गारंटी चाहते थे।

जबकि मैल्कम ऐसे किसी अमेरिकी मूल्य के अस्तित्व से ही इंकार करते थे। बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र को ‘मैल्कम एक्स’ एक साम्राज्य के रूप में देखते थे। और इसके विध्वंस में ही काले लोगों की मुक्ति देखते थे। बाद में समाजवाद की ओर झुकने के बाद उन्होंने काले लोगों की मुक्ति को गोरे उत्पीडि़त मजदूरों व अन्य शोषित समुदायों के साथ जोडक़र देखना शुरू किया।

मैल्कम एक्स का कहना था कि अमेरिका विदेशों में ही नहीं बल्कि देश के अंदर भी एक उपनिवेश बनाए हुए है जिसमें मुख्यत: काले लोग और यहां के मूल निवासी ‘रेड इंडियंस’ हैं। मैल्कम एक्स का यह कथन सत्य के काफी करीब है।

कोलंबस के आने के समय आज के अमेरिका में वहां के मूल निवासियों की संख्या करीब 1 करोड़ 50 लाख थी। 1890 तक आते-आते यह महज 2 लाख 50 हजार तक रह गई। यानी 98 प्रतिशत लोग यूरोपीय लोगों की क्रूरता के शिकार हो गए। इस पर एक बहुत ही प्रामाणिक डॉक्यूमेंट्री ‘द कैनरी इफेक्ट’ है।

‘हावर्ड जिन’ ने अपनी किताब A PeopleÓs History of the United States में साफ बताया है कि अमेरिकी लोकतंत्र वहां के मूल निवासियों के जनसंहार और काले लोगों की गुलामी पर खड़ा है। मैल्कम एक्स इसी अर्थ में ‘भीतरी उपनिवेश’ की बात कर रहे थे। ऐसा ही भीतरी उपनिवेश ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी है। ऑस्ट्रेलिया के इस भीतरी उपनिवेश पर ‘जॉन पिल्जर’ ने बहुत ही बेहतरीन फिल्म ‘यूटोपिया’ बनाई है।

इसी संदर्भ में मैल्कम एक्स ने अल्जीरिया के क्रांतिकारी ‘फ्रांह्ल5 फैनॉन’ की बहुचर्चित किताब The Wretched of the Earth का कई बार जिक्र किया है। इसी अर्थ में एक जगह मैल्कम एक्स ने लिखा है- ‘‘यदि गोरों की वर्तमान पीढ़ी को उनका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे खुद ‘गोरे-विरोधी’ हो जाएंगे।’’ इस कथन के बहुत ही गहन मायने हैं।

हम भी भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि यदि ब्राह्मणों और ऊँची जाति की वर्तमान पीढ़ी को उसका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे भी ‘ब्राह्मणवाद विरोधी’ हो जाएंगी।

मार्टिन लूथर किंग जहां काले लोगों के गोरों के साथ एकीकरण के हिमायती थे वहीं मैल्कम इसके खिलाफ थे। और वर्तमान व्यवस्था में इसे असंभव मानते थे। इसलिए वे हर क्षेत्र में कालों की ‘अलग पहचान’ के हिमायती थे। काले लोगों में पैदा हुए मध्य वर्ग के वे मुखर आलोचक थे। उनके अनुसार यही वर्ग गोरे लोगों के साथ एकीकरण के लिए लालायित रहता है। भले ही इसके लिए उसे अपनी आत्मा ही क्यों न बेचनी पड़े। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की तरफ से देखें तो यह एकीकरण काले लोगों के एक हिस्से को राजनीतिक रूप से नपुंसक बनाने की साजिश है। इस संदर्भ में मैल्कम एक्स ने एक बहुत ही अच्छा रूपक दिया है। उन्होंने कहा कि जब आप मछली पकडऩे के लिए चारा डालते हैं तो मछलियों को लग सकता है कि आप उनके दोस्त हैं और उनके लिए चारा डाल रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि चारे के ऊपर एक हुक भी लगा है जो उन्हें अपने समुदाय से अलग करके उनकी जान ले लेगा। मैल्कम एक्स के इस कथन को हम अपने देश में भी लागू करके इसकी सच्चाई को परख सकते हैं।

हिंसा-अहिंसा के सवाल पर भी इन दोनों के रास्ते अलग थे। मार्टिन लूथर जहां अहिंसा के पुजारी थे और साधन को साध्य से ज्यादा पवित्र मानते थे वहीं मैल्कम एक्स इस जड़ता से मुक्त थे। और इस संदर्भ में उनका रुख काफी लचीला था। उनका कहना था कि स्वतंत्रता के लिए ‘हिंसा सहित जो भी जरूरी साधन हो’ उसका प्रयोग किया जाना चाहिए। ‘स्वरक्षा’ के लिए हथियारबंद होने का भी नारा मैल्कम एक्स ने दिया। ब्लैक पैंथर पार्टी पर इसका काफी असर हुआ। विशेषकर ब्लैक पैंथर पार्टी के संस्थापक ‘बॉबी सील’ पर इसका काफी असर हुआ। ब्लैक पैंथर पार्टी का पहला ही प्रदर्शन सशस्त्र था जिस पर इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

मैल्कम एक्स अपने अंतिम समय में काले लोगों की मुक्ति को दुनिया के तमाम शोषितों के साथ जोडक़र देख सके। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की उनकी समझ लगभग वही थी जो उस समय के तमाम कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की थी। इसीलिए वे कालों व अन्य शोषित लोगों की मुक्ति को इस व्यवस्था में असंभव मानते थे। इस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के ध्वंस पर ही शोषितों की असली स्वतंत्रता कायम होनी है। इसी संदर्भ में अपनी मृत्यु के कुछ ही समय पहले मैल्कम एक्स ने कहा था कि स्वतंत्रता की कीमत मृत्यु है।

मैल्कम एक्स ने अपनी जीवनी ‘एटोबायोग्राफी ऑफ मैल्कम एक्स’ नामक मशहूर किताब एलेक्स हेली को बोलकर लिखवाई जो काफी चर्चित हुई।

आज हम जिन समस्याओं से रूबरू हैं, उसमें मैल्कम एक्स का जीवन और उनके विचार पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।


अन्य पोस्ट