विचार / लेख

बस कुछ हिस्से चमका दिए जाते हैं ताकि...
19-May-2026 6:33 PM
बस कुछ हिस्से चमका दिए जाते हैं ताकि...

-संजय श्रमण

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट आई है, बड़े शहरों में शहरी सीवर और नालों के पानी का खेती में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है और सेहत के साथ गंभीर खिलवाड़ हो रहा है। शहरों की ज़मीन का पानी सूख रहा है और किसान बेचारे कहीं से भी पानी लेने को मजबूर हैं।

ये सब देखकर भारत के नगरीकरण और उससे जुड़ी समस्याओं पर बहस होनी चाहिए, लेकिन नहीं होगी।

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नगर, नागर, नगरीकरण और नागरिकता - ये भारतीय सभ्यता के लिए आधारभूत विशेषताएं रही हैं। हमने हड़प्पा मोहनजोदड़ो के जमाने से नगर बसाए हैं। इस देश की सभ्यता और संस्कृति के निर्माता नाग लोग रहे हैं, उन्हीं से नागरी और देवनागरी शब्द आए हैं।

लेकिन हड़प्पा के पतन के बाद बहुत सदियों तक हमारे समाज में नगरों के ख़िलाफ़ एक मनोविज्ञान निर्मित हुआ है। प्रोफ़ेसर निहार रंजन रे ने इसपर लिखा है। भारत में हड़प्पा के बाद हमारा समाज काफ़ी हद तक सामूहिक रूप से साथ रहने, साथ भोजन करने साथ नहाने और साथ काम करने में अक्षम होता गया है।

जब आप कई लोगों के साथ मिलकर कुछ अच्छा नहीं कर पाते हैं तो क्या होगा? यही होगा जो आज दिल्ली में हो रहा है। राजधानियाँ और राज-नगर उनकी स्वच्छता और व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। लेकिन भारत में राजधानी या महानगर का अर्थ स्वच्छता और व्यवस्था के अर्थ में क्या हो सकता है आप जानते ही हैं।

भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया को देखिए। जैसे गाँवों में कोई जजमान अपने कारिंदों या कमीनों को सिर्फ जिंदा रहने भर की जमीन दे देता था और कहता था ‘बच्चू अब काम पे लग जा.’ गांवों में जाकर देखिए बहुत बूढ़े लोगों से बात कीजिए आपको पता चलेगा भारत में गांव कैसे बसाए जाते थे। गांव पटेल या गांव का मुखिया अपने गाँव के लिए लोहा, लकड़ी, चमड़ा, कपड़ा, मिट्टी आदि-आदि के कारीगरों और सफ़ाई करने वालों को दूसरे गांवों या इलाकों से बुलवाते थे।

 ये गऱीब कारीगर वहाँ आकार बसते थे, उनके अछूत या सछूत होने के अनुसार उन्हें ‘उचित दिशा’ और ‘उचित दूरी’ पर जगह दे दी जाती थी. फिर जजमानी के सिस्टम में उन्हें उनकी मेहनत का मुआवजा साल में चार छह बार दिया जाता था। वे अपना काम और रहने की जगह नहीं बदल सकते थे, ना जमीन  खऱीद सकते थे, उन्हें अपने आवास, अपने पानी, अपने भोजन की व्यवस्था ख़ुद करनी होती थी। वे गाँव से या गाँव के व्यवस्थापकों से इस संबंध में कोई माँग नहीं कर सकते थे।

अब आज के शहरों को देखिए. ठीक यही मॉडल चल रहा है. इसे मैं भारत में ‘शहरीकरण का जजमानी मॉडल’ कहता हूँ।

शहरों की झुग्गी झोपडिय़ों में जाइए। वे लोग गाँव से शहर कैसे आते हैं? ठीक उसी तरह जैसे जजमानी व्यवस्था में होता था। बस अंतर इतना है कि पहले जजमान बुलाता था, आजकल कारखाना और बाजार बुलाता है। गांव आकर बसने वालों की फि़क्र ना जजमान को होती थी, ना आजकल शहरी नियंताओं और बाजार को होती है. वे कारीगर और गऱीब मज़दूर आदि कहीं भी जियें मरें, कुछ भी खायें पियें इन्हें कोई मतलब नहीं, बस अपनी औक़ात में रहते हुए अपना अपना काम करते रहिए। गांव में सोशल मोबिलिटी को रोकने में जजमानी सिस्टम बहुत ताकतवर भूमिका निभाता था। अब उसने शहर में आकर नया अवतार धर लिया है।

हड़प्पा के पतन के बाद नगरों के सामूहिक जीवन की शैली का पतन कैसे और क्यों हुआ? इसपर गहरी रिसर्च की आवश्यकता है। आपको सोलह महाजनपदों के काल में असल में महानगर दिखाई देंगे। रामायण महाभारत आदि में नगरों का वर्णन है, अशोक और उनके जैसे अन्य राजाओं के चक्रवर्तित्त्व के ऐतिहासिक अनुभव से राम, कृष्ण रावण, कौरव, पांडव आदि की कथाएँ जन्मीं। ये मगध साम्राज्य का शिखर काल था। फिर क्या हुआ? भारत में गुप्त काल में अचानक कुछ हुआ है। भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार एकदम से बहुत कमजोर हुआ है फिर इष्ट-देव, ईश्वर और ईश्वरभक्ति का जन्म हुआ। उसके बाद आज तक भारत लडख़ड़ा रहा है।

भारत के इस सभ्यतागत और नैतिक पतन पर कोई गंभीर बात करना भी कठिन है।

आज तो असंभव सा हो गया है।

दिल्ली में सीवर के पानी से ‘हरी-भरी’ मल्टीविटामिन सब्जी की खेती कोई छोटी-सी बात नहीं है. जमीन का पानी सूख रहा है और गरीब किसानों के पास कोई और उपाय नहीं है. ये कुदरत का तरीका है, आप जो विटामिन खाकर ‘छोड़ते’ हैं, वे आपकी थाली में वापस आ जाते हैं. कुदरत कह रही है तुम जो मुझे दोगे मैं वही तुम्हें दूँगी-‘तेरा तुझको अर्पण’

 

क्या ये दिल्ली तक सीमित है?

नहीं, हर बड़े शहर में यही हो रहा है। हर शहर अपनी नालियों, सीवर लाइनों और कचरे की गाडिय़ों के ज़रिए जो कुछ शहर के बाहर भेजता है, वो सब अगली सुबह ऐसी सब्जी-भाजियों के साथ वापस हमारी थालियों में आ जाता है - तेरा तुझको अर्पण।

ये शहर के प्रबंधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति का मामला नहीं है। आप कितनी ही योजनाएँ और नियम-कानून बना लीजिए। कुछ नहीं होगा। जो लोग भारत के मन को गहराई से जानते हैं, वे समझते हैं कि असल मुद्दा क्या है।

असल में ये नैतिकता का मामला है। भारत हद दर्जे का अनैतिक समाज बन चुका है। अब हमें सडक़ पर नंगी नाचतीं समस्याएं भी नजऱ नहीं आतीं।

आप जंगल किनारे बसे बहुत छोटे गांवों में जाइए। आपको गांव में घुसते हुए, बाहर निकलते हुए और गाँव के भीतर एक अलग तरह की साफ़ सफ़ाई नजऱ आएगी। आप किसी बड़े शहर में घुसिए, घुसते और निकलते समय आपको कचरे का पहाड़ नजऱ आएगा। शहर के अंदर भी भयानक गंदगी मिलेगी, बस कुछ हिस्से चमका दिए जाते हैं ताकि कुछ लोग सफ़ाई के भ्रम में जी सकें।

भारत में एक आम आदमी की व्यक्तिगत नैतिकता और सामूहिक नैतिकता अब तेजी से सवालों के घेरे में आ रही है। पहले ये सवाल ढँका छुपा रहता था, अब नहीं छुपेगा। अब तो ख़ुद भारतीय जो इसमें पैदा होते हैं मजे से जीते हैं, वे ख़ुद पनाह मांगने लगे हैं।

विकास के लिए विज्ञान और तकनीक तो हमने उधर ले ली, लेकिन सभ्यता-बोध कहाँ से लायेंगे?


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