विचार / लेख
-नितिन ठाकुर
अमेरिका में ट्रंप के होने का जितना शुक्र पुतिन और जिनपिंग मनाते होंगे उतना कोई नहीं मनाता होगा।
डिप्लोमेसी की सारी किताबों, रणनीतियों, पैटर्न को धता बताते हुए डोनाल्ड ट्रंप आत्ममुग्धता से संचालित ऐसे नेता हैं, जिसे ‘डैडी’ सिंड्रोम है। वो खुद को दुनिया का बाप समझते हैं। नाटो के महासचिव मार्क रट ने एक बार हंसी मजाक में उनको कह दिया कि कई बार डैडी को सख्ती से बात करनी पड़ती है, तब से वो सच में ऐसा मान बैठे हैं। दावोस में उन्होंने ये बात इतराते हुए खुद दोहराई भी। ऐसा नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने पहले कभी डैडी जैसा फील ना किया हो। अथाह शक्ति का नशा ऐसा भ्रम खोपड़ी में भरता है लेकिन जितनी अश्लीलता से ट्रंप ताकत का शो ऑफ करते हैं वो हमारी याद में किसी ने नहीं किया। क्लिंटन, बुश, ओबामा, बाइडेन चाहे जितनी सख्त बात कहें या चेतावनी दें मगर सभी के शब्द खूंटे से बंधे थे।
पहले कार्यकाल में ट्रंप का बुली स्वभाव उतना समझ नहीं आया था। वो थोड़े सनकी या झक्की दिखते थे पर इस बार वो ‘इतिहास’ बना देने की चाहत से उतरे हैं। गोली से बचने के बाद मुमकिन है उनको ऐसा भी लगा हो कि आसमान के देवता उनसे कोई महत्वपूर्ण काम कराना चाहते हैं। लोगों की बांह मरोडऩा और फिर तोडऩे की हद पर पहुंच कोई ऐसी बात मनवा लेना जिसे सामनेवाला नॉर्मल कंडीशन में ना मानता उनकी रियल पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा पार्ट है। दूसरा ये कि अगर वो आपसे एक बार बात मनवा लेते हैं तो कोई गारंटी नहीं कि बांह मरोडऩे का दूसरा मौका जल्दी फिर ना आए। तीसरा, वो मानते हैं कि अमेरिका ने पश्चिम पर बहुत अहसान किए हैं और दुनिया को सही दिशा में हांकने का हक केवल अमेरिका को है, और उसका राष्ट्रपति होने की वजह से उन्हें है। ट्रंप आपको अहसान तले दबे देखना चाहते हैं। अगर उनसे बात करते हुए आपके शब्दकोश में खुशामदी मुहावरे नहीं हैं तो आप उन्हें रूखे लगेंगे।
ट्रंप की हरकतों ने उन्हें बहुत अलोकप्रिय बना दिया है। उनकी अलोकप्रियता भारत में उनकी सफलता के लिए हवन कर रहे भक्तों से लेकर नाटो के बरगद नीचे कभी सुरक्षित महसूस करते देशों तक फैली है। आज ना ताइवान को भरोसा है कि बिजनेस की तरह दुनिया चला रहे ट्रंप उसकी हिफाजत में आगे बढ़ेंगे ना जापान को जिसने अपना सैन्य बजट बढ़ा लिया है। शायद उसने गुप्त रूप से परमाणु बम भी बना लिए। यूक्रेन को अब मदद बंद है, जो हथियार यूरोप उनको दे रहा है उसके पैसे अमेरिकी खाते में जमा कराने पड़ रहे हैं। ऐसे में ये भी क्लीयर है कि रूस और यूक्रेन जंग में ट्रंप का वजऩ किस पलड़े में है। अमेरिकी जनता के बीच हाल में हुए सर्वे बताते हैं कि लोग उनके इस कार्यकाल में बहुत असहज हैं। वो एक तरह का एम्बेरेसमेंट हैं, जिसे उनके जाने के बाद तक महसूस किया जाएगा। कोई नहीं जानता कि अमेरिका ने जितनी मेहनत से अन्य मुल्कों से रिश्ते सुधार थे वो ट्रंप के जाने पर फिर कितने दिन में सुधरेंगे, और अमेरिका इसकी कीमत क्या चुकाएगा। एक संभावना है कि ट्रंप की ये नीति कोई रिपब्लिकन उनसे भी ज़्यादा कट्टरता से आगे बढ़ाए। यदि ऐसा होता है तो कनाडाई पीएम के शब्दों में जो ‘नियम आधारित वल्र्ड ऑर्डर’ ध्वस्त हो रहा है उसके खंडहर तक नहीं बचेंगे। बचेंगे बस ट्रंप जैसे नेता जो पीडि़त और हमलावर में फर्क किए बगैर चाहते हैं कि छोटा औकात में रहे ताकि दुनिया में बड़ों का राज रहे जिससे शांति कायम होगी। वो ऐसी शांति बनाए रखने के लिए नोबेल चाहते हैं। इस सदी का सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य तो तब साकार हुआ जब जनता के चुने वेनेजुएलन राष्ट्रपति को रातोंरात ट्रंप के सैनिक किडनैप कर ले गए और उसी देश की नेता विपक्ष चापलूसी में गिरते हुए नोबेल पगलू ट्रंप को अपना नोबेल सौंपने के लिए उत्सुक दिखी। ट्रंप बिल्कुल नहीं सोचते कि उनकी इस नंगई पर मुंह दबाए पूरी दुनिया हंसती है।
इस बीच एक बात है। शाहबाज शरीफ ने इस ओपन सीक्रेट को लपक लिया कि ट्रंप को मक्खन कैसे लगाया जाए। वो जोकरों की तरह हर प्लेटफार्म पर ताली बजाते, नकली हंसी हंसते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति की परिक्रमा लगाते दिखते हैं। चूंकि ट्रंप को उनका सेना प्रमुख पसंद है इसलिए शरीफ बेचारे एक तरह से घरेलू राजनीति में भी ट्रंप के पसंदीदा आदमी की खुशामद को मजबूर हैं। थोड़ा कम पॉलिटिकली प्रोफेशनल इमरान खान ये सब करने को तैयार नहीं थे। वो मुक्त विदेश नीति बनाने चले थे, बिना ये सोचे कि पश्चिम पर अहसान की धारणा में डूबे अमेरिका ने तो वाकई पाकिस्तानी सरकारों पर हमेशा अहसान किया है। फिर आप पुतिन की बगल में खड़े कैसे हो जाएंगे?
थोड़ी देर पहले मशहूर पत्रकार फरीद जक़ारिया को सुन रहा था, जहां वो दूसरे विश्वयुद्ध को जीतनेवाले अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट को याद कर रहे थे। ब्रिटेन और सोवियत यूनियन बिना अमेरिकी ताकत के उस जंग को जीत नहीं सकते थे लेकिन ये अहसास होने के बावजूद कभी रूजवेल्ट ने स्टालिन और चर्चिल को समन नहीं किया बल्कि खराब तबीयत के बावजूद अपनी व्हील चेयर पर कासाब्लांका, तेहरान और याल्टा जाकर इन लोगों से मिले ताकि सभी को बराबरी महसूस करा सकें। इस जंग का जिक्र दावोस में विजेता की तरह ट्रंप ने किया था ताकि बाकियों को नीचा दिखा सकें। इसी तरह ना बर्लिन की दीवार गिरने पर कोल्ड वॉर के विजेता बुश ने गोर्बाचोव को नीचा दिखाया था। वो भारत का भी जिक्र करते हैं जिसके साथ दो दशक अमेरिका ने एक सहयोगी की तरह व्यवहार किया लेकिन ट्रंप ने बैलेंस शीट देखकर तय किया कि वो नई दिल्ली के साथ कैसे पेश आएंगे। जक़ारिया कह रहे थे कि आप किसी को अपना सच्चा सहयोगी सिर्फ समानता के अहसास से ही बना सकते हैं।
बहरहाल, ट्रंप ताकत की भाषा समझते हैं जो वो दिखा रहे हैं। उनमें रूस या चीन से टकराने की ताकत नहीं है। वो नॉर्थ कोरिया के सामने विनम्र हैं। उनका ज़ोर सिर्फ वहां चल रहा है जिसे वो कमजोर मानते हैं। गाजा के सीने पर बोर्ड ऑफ पीस बनाकर वो दुनिया को दिखा देना चाहते हैं कि उनका विजऩ यूएन लेवल का है जबकि वो अपने बोर्ड की मेंबरशिप डॉलर्स में बेच रहे हैं। ट्रंप बेइंतहां ताकत और बेशुमार पैसे से संतुलन खो चुके व्यक्ति की सच्ची छवि हैं। वो इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में दुनिया के लिए एक लेसन हैं कि कैसे नेताओं को शेष बची सदी में सत्ता से दूर रखना है। आत्ममुग्ध, इतिहास बनाने के लिए झक्की और एक हाथ ले एक हाथ दे वाले नायक कब खलनायक बन जाते हैं पता नहीं चलता।


