विचार / लेख
जेम्स लेंडेल
जब गाजा में युद्ध अब भी जारी है और वेस्ट बैंक में हिंसा लगातार बढ़ रही है, ऐसे वक्त में फिलीस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र हासिल करने की संभावनाएं पहले से कहीं ज़्यादा कम होती चली गईं।
फलीस्तीनियों की इस नाउम्मीदी के बीच यूरोपीय देशों ने जब फिलीस्तीन को बतौर राष्ट्र मान्यता देने का फ़ैसला किया तो इससे ये हकीकत नहीं बदलेगी कि इस राह में कई बड़े रोड़े हैं।
नॉर्वे, स्पेन, आयरलैंड ने फलीस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने का एलान 22 मई को किया है।
इस ऐलान से यूरोप के दूसरे देशों पर भी दबाव बढ़ेगा कि फलीस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करें। इन देशों में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी भी शामिल हैं।
अरब के एक राजनयिक ने कहा, ‘ये बहुत महत्वपूर्ण है। ये दिखाता है कि यूरोपियन इसराइल सरकार के कुछ भी ना सुनने के रवैये से ऊब चुके हैं। इससे यूरोपीय संघ पर भी दबाव बना है।’
इसराइली मंत्रियों का कहना है कि इस फैसले से हमास का हौसला बढ़ेगा और ये आतंकवाद को पुरस्कृत करना है।
इसराइल की मानें तो इससे बातचीत के ज़रिए समझौते की संभावनाएं और घटी हैं।
फिलीस्तीन को मान्यता और देशों का रुख
करीब 139 देश फिलीस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देते हैं।
10 मई को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य देशों में से 143 ने फिलीस्तीन को संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता दिलाने के पक्ष में वोटिंग की। ये सदस्यता सिर्फ संप्रभु देशों को मिलती है।
संयुक्त राष्ट्र में फिलहाल फिलीस्तीन को पर्यवेक्षक यानी ऑब्जर्वर का दर्जा हासिल है। इससे फिलीस्तीन को संयुक्त राष्ट्र में सीट तो मिलती है लेकिन वोट देने का अधिकार नहीं मिलता है।
फिलीस्तीन को कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से भी मान्यता मिली है। इनमें अरब लीग और ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) शामिल हैं।
जब 22 मई को यूरोपीय देशों ने फिलीस्तीन को मान्यता दी तो ओआईसी ने इसका स्वागत किया।
ओआईसी ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप है और इससे फिलीस्तीनियों के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।
यूरोप के कुछ देशों ने फिलीस्तीन को पहले ही राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी हुई है।
इनमें हंगरी, पोलैंड, रोमानिया, चेक रिपब्लिक, स्लोवाकिया, बुल्गारिया जैसे देश शामिल हैं। इन देशों ने फिलीस्तीन के लिए अपना ये रुख 1988 में अपना लिया था।
स्वीडन, साइप्रस और माल्टा संयुक्त राष्ट्र को मान्यता देने वाले कुछ और देश हैं। लेकिन कुछ दूसरे यूरोपीय देशों और अमेरिका का कहना है कि मध्य-पूर्व के संघर्ष के लिए दीर्घकालीन राजनीतिक समाधान के तहत ही फ़लस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी जाएगी।
इसे दो राष्ट्र सिद्धांत भी कहा जाता है। इसके तहत इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के लिए अपना देश, अपनी सरहद होने की बात कही जाती है।
अमेरिका नहीं बताता है वक्त
यूरोपीय देश और अमेरिका के बीच इस पर मतभेद है कि फिलीस्तीन को राष्ट्र कब माना जाए।
आयरलैंड, स्पेन और नॉर्वे का कहना है कि वो ऐसा करने की राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू कर रहे हैं।
इन देशों का तर्क है कि मौजूदा संकट का स्थायी समाधान तभी निकल सकता है, जब दोनों पक्ष किसी तरह का राजनीतिक लक्ष्य बना सकें।
इन देशों पर घरेलू स्तर पर इस बात का राजनीतिक दबाव भी रहा कि वो फिलीस्तीन के पक्ष में ज़्यादा समर्थन दिखाएं।
अतीत में कई पश्चिमी देशों का रुख़ ये रहा है कि फिलीस्तीन को राष्ट्र मानना अंतिम शांति समझौते का इनाम होना चाहिए।
यानी शांति समझौता करो और बदले में राष्ट्र के तौर पर मान्यता इनाम में पाओ।
ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड कैमरन और कुछ दूसरे यूरोपीय देश ने बीते कुछ महीनों में फ़लस्तीन के मसले पर अपना रुख़ बदला है।
इनका कहना है कि फिलीस्तीन को पहले मान्यता देनी चाहिए, इससे राजनीतिक समाधान का माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी।
फ्रांस का रूख
फरवरी में फ्ऱांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था- फ्रांस के लिए फ़लस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देना कोई टैबू नहीं है।
मई की शुरुआत में फ्ऱांस ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन की सदस्यता दिलाने के पक्ष में वोटिंग की थी।
अमेरिका ने निजी स्तर पर अपने यूरोपीय सहयोगियों से इस बारे में बात की थी।
मगर अमेरिका ज़्यादा सतर्क है और वो स्पष्ट समझ चाहता है कि इस नीति का व्यावहारिक रूप क्या होगा।
फिलीस्तीन और कुछ सवाल
पर्दे के पीछे की मुख्य बहस ये है कि दबदबा रखने वाले इन देशों को फ़लस्तीन को कब मान्यता देनी चाहिए?
कब इसराइल और फिलीस्तीन लोगों के बीच औपचारिक शांति वार्ता शुरू होनी चाहिए?
इसराइल और सऊदी अरब कब अपने राजनयिक संबंधों को सामान्य करेंगे? कब इसराइल कुछ कार्रवाई करने में विफल रहता है या कब फिलीस्तीन कुछ कार्रवाई करते हैं?
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये देश चाहते हैं कि राजनयिक मुकाम हासिल करने के किसी बड़े पल में फिलीस्तीन को मान्यता दी जाए।
पश्चिमी देश के एक अधिकारी ने कहा, ‘ये एक बड़ा दांव है, जिसे पश्चिमी देशों को चलना है। हम इस बाजी को जाने नहीं देंगे।’
दिक्कत कहाँ आ रही है?
दिक्कत ये है कि अगर अहम सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं तो फिलीस्तीन को राष्ट्र की मान्यता देना बस सांकेतिक कदम ही है।
सरहदें क्या होंगी? राजधानी कहाँ बनेगी? दोनों पक्ष ऐसा करने के लिए पहले क्या कदम उठाएंगे?
ये कुछ मुश्किल सवाल हैं, जिस पर सहमति नहीं बनी है और न ही दशकों से इनके संतोषजनक जवाब मिले हैं।
आज की तारीख़ में कुछ और यूरोपीय देश हैं जो ये मानते हैं कि एक अलग फ़लस्तीन देश होना चाहिए।
इस बात के समर्थक ख़ुशी में झूमेंगे और विरोधी इसे ग़लत बताएंगे।
ऐसे में ज़मीन पर फ़लस्तीनी लोगों की हक़ीक़त बदलने की संभावना कम ही है। (bbc.com/hindi)


