विचार / लेख

खून के छीटों के निशान सूख जाते हैं
23-May-2024 2:02 PM
खून के छीटों के निशान सूख जाते हैं

 प्रकाश दुबे

 देश की राजधानी दिल्ली  में 25 बरस पहले 10 जनवरी की रात को कार ने छह लोगों को कुचल दिया। कार थी-अनेक रईसों के सपने में दिखने वाली बीएम डब्ल्यू ई38 और मरने वाले आधा दर्जन लोगों में से तीन पुलिस अधिकारी थे।  लोदी कालोनी जैसी समृद्ध कालोनी में  गोल्फ लिंक में कार बरामद की गई।  नौजवान संजीव ने कीड़े मकोड़ें की तरह मसल दिया। उसके पिता हथियारों के कारोबारी सुरेश नंदा थे और वह भारतीय नौसेना के अध्यक्ष का पोता था।

ठीक चार महीने बाद 30 अप्रैल को देश की राजधानी में एक और वारदात हुई। कुतुब मीनार से नजऱ आने वाले इमली के पेड़ों को समर्पित शराबघर टेमरिंड में चहल पहल थी। नौजवान ने शराब मांगी। मना करने पर उसने गोली दाग दी। साकी का नाम था-जेसिका लाल। गोली चलाने वाले को पहचानने वाले मनु शर्मा के नाम से जानते थे। बार में मौजूद पुलिस अधिकारी सहित कुछ लोग जानते थे कि वह हरियाणा से लोकसभा सदस्य विनोद शर्मा का लाडला है। उसका नाम है- सिद्धार्थ वशिष्ट।

25 साल बाद। दिल्ली से दूर सांस्कृतिक पहचान वाले शहर पुणे में शनिवार अलविदा कह चुका था। मध्यरात्रि के बाद दोपहिए  को कार ने ऐसी टक्कर मारी कि पीछे बैठी युवती कई कदम दूर जाकर गिरी और फिर नहीं उठी। चालक युवक को अस्पताल पहुंचाया गया। डाक्टरों ने बताया कि उसकी सांसें पूरी हो चुकी हैं।

इन वारदातों से कुछ मिलते जुलते सवाल उठते हैं।  दिल्ली की चौड़ी सडक़ पर मस्ती में कार चलाने वाले युवक को मध्यरात्रि में, धुंधलके वाली सर्द कोहरा लपेटे रात में रोकने की पुलिस वालों को जरूरत क्या थी? नहीं भी रोका तो वे सडक़ से 25 कदम दूर नहीं रह सकते थे? जिस देश में महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के साथ साल भर में अधिकतम सात दिन शराबबंदी की जाती है, और बाकी दिन गली कूचे से लेकर देर रात तक आसानी से मदिरा उपलब्ध है, वहां अदना सी साकी को और पिला दे कहने पर मना करने की जुर्रत करनी ही क्यों चाहिए? और तीन दिन से यह सवाल सब जगह घुमड़ रहा है कि नाबालिग बच्चे का इतना सा कसूर है कि थोड़ी सी गले से उतार ली। बाप की दी करोड़ों की पोर्श गाड़ी पर हवा खाने और गले को फिर तर करने रवाना हुआ।

तीनों किस्सों में अनेक समानताएं हैं। पुणे के पुलिस थाने में दो मौतों से घबराए लाडले को पिज्जा बर्गर देकर संयत करना चाहा। अमीर बिल्डर दोस्त के बेटे से बदसलूकी रोकने की चिंता में डूबे एक  विधायक ने बच्चे बेकसूर बताया। प्रकरण-1 नंदा परिवार की सारी कोशिशों के बावजूद मात्र नौ साल बाद 2008 में संजीव को सिर्फ दो साल की सजा सुनाई गई। अच्छे चाल चलन के कारण इस आधार पर माफी मिल गई कि वह जुर्माना भरेगा और सुप्रीम कोर्ट के सुझाए तरीके से समाज सेवा करेगा। प्रकरण-2 मनु शर्मा के पिता की दौलत और ताकत के सामने जन आक्रोश ठंडा नहीं हुआ इसलिए आजीवन कारावास की सजा मिली। आप किसी से जाकर पूछना कि मनु कब घर लौट आया? हरियाणा-पंजाब से लेकर दिल्ली तक उसके अपनों की ताकत और रसूख का पता लग जाएगा।

ऐसे में अगर  नाबालिग बच्चे का खयाल रखते हैं तो उत्तेजित मत होइए।  इन लोगों ने सबक नहीं लिया कि उनके अपने पुलिस वाले 25 बरस पहले निर्ममता से कुचले गए थे। कार के पसंदीदा नंबर प्लेट के लिए दक्षिणा का लेन देन होता है। यह जानते हुए सवाल करते हैं कि बिना नंबर प्लेट की गाड़ी सडक़ पर कैसे दौड़ रही थी? नंबर होता तब क्या कार किसी को कुचलने से मना करती? मणिपुर में महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाले हत्या करने से नहीं चूके। उनमें से किसी को जेसिका लाल जैसा न्याय नहीं मिला। देह हिंसा की हर शिकार को निर्दयता से बचाकर निर्भया वाला सम्मान मिलना आज भी अपवाद की श्रेणी में दर्ज होता है।

संवेदनशील नागरिकों के अपशब्द सहने की कीमत पर यही कहूंगा कि एक किशोर और दो नौजवानों को दोषी ठहराने वाले, अंगुली उठाने वाले सोचें कि आए दिन ताकत के बूते कितने लोग छुट्?टा घूमते हैं। है किसी पहलवान मर्द और मर्दानी की हिम्मत जो उनका बाल बांका कर सके? ऐन चुनाव के दिनों में किस आरक्षी को फुर्सत है कि अपराधियों के गले पड़े? नागरिक जी, मतदाता जी, हत्या, बलात्कार, हेराफेरी, भृष्टाचार जैसे आरोपों से लिपे पुते महानुभावों को कानून बनाने वाले मंदिर प्रवेश कराने के लिए आप लालायित होते हैं।

कवि धूमिल की तमतमाती कलम ने लिखा था- वे सब के सब तिजोरियों के दुभाषिए हैं । वे वकील हैं, अध्यापक हैं, नेता हैं, कवि कलाकार हैं , यानि कि कानून की भाषा बोलता हुआ अपराधियों का परिवार है।

आप पर भावुकता सवार हो रही है? चलिए,  इस तरह दुनिया को अलविदा कहने वालों को श्रद्धांजलि देकर मन हल्का कर लें।

मेरा प्रणाम, उन कुछ लोगों को, संगठनों को, जिन्हें लगता है कि मानव के प्राण और इंसान की इज्जत का कोई मोल नहीं होता। ऐसे जागरूक लोग सत्ता को चुनौती देते रहते हैं। सत्ता कानून की हो, न्याय की या कोई और। वे साबित करते हैं कि इंसान में इंसनियत और संवेदना मरी नहीं है। 

  (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


अन्य पोस्ट