विचार / लेख
इकबाल अहमद
हाल ही में अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण कांग्रेस से निकाले जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष संजय निरुपम ने कहा कि फि़लहाल कांग्रेस में सत्ता के पांच केंद्र हैं।
संजय निरुपम के मुताबिक़- पार्टी के पांच केंद्र सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल हैं।
निरुपम मुंबई उत्तर लोकसभा सीट से अपनी दावेदारी कर रहे थे लेकिन टिकट नहीं मिलने के कारण उन्होंने बग़ावती सुर अपना लिए थे जिसके बाद पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में संजय निरुपम शिवसेना (शिंदे गुट) में शामिल हो गए।
संजय निरुपम ने पार्टी आलाकमान और पार्टी अध्यक्ष की क़तार में केसी वेणुगोपाल की गिनती कर पार्टी के क़द्दावर महासचिव के सियासी क़द को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया है या फिर केसी वेणुगोपाल वाक़ई कांग्रेस में सत्ता के पांचवें केंद्र बन गए हैं?
केसी वेणुगोपल पिछले सात सालों से कांग्रेस महासचिव हैं, लेकिन ऐसे महासचिव हैं जिनके बारे में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नपे-तुले शब्दों में कहा 'पार्टी के तमाम फ़ैसलों में उनकी अहम भूमिका है।'
पार्टी के तमाम बड़े फ़ैसलों और दूसरी पार्टी के साथ साझेदारी की बातों में अंतिम फ़ैसला वेणुगोपाल के ज़रिए ही सार्वजनिक होता है।
2023 में बने इंडिया गठबंधन के संयोजन समिति के वे प्रभावी सदस्य हैं, हालांकि ये बात और है कि केसी वेणुगोपाल ख़ुद को बेहद लो प्रोफ़ाइल रखते आए हैं।
दक्षिण भारत से छपने वाले सबसे बड़े अंग्रेज़ी अख़बार में काम करने वाली एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, राहुल गांधी उन पर पूरी तरह विश्वास करते हैं और पिछले पांच-छह सालों में निश्चित रूप से केसी वेणुगोपाल कांग्रेस पार्टी के एक बहुत ही ताक़तवर नेता बनकर उभरे हैं।
कांग्रेस पार्टी को दशकों से कवर कर रहे रशीद कि़दवई कहते हैं, कांग्रेस पार्टी के संविधान में ही ऐसा कुछ है कि महासचिव (संगठन) गांधी परिवार और अगर अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का है तो उसके बाद सबसे शक्तिशाली पोस्ट है।
लेकिन क्या बात सिफऱ् यही है कि उस पद के कारण ही वेणुगोपाल इतने ताक़तवर बन गए हैं?
‘तीन मियां और एक मीरा’
इसका जवाब देते हुए रशीद कि़दवई कहते हैं, कांग्रेस में नेहरू (भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू) के बाद इंदिरा गांधी के ज़माने से ही कुछ लोग सर्वोच्च नेता के बहुत कऱीबी बनते रहे हैं जो कि पार्टी और (कांग्रेस या कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए) सरकार दोनों में दख़ल रखते थे।
रशीद कि़दवई आगे कहते हैं, इंदिरा गांधी के समय आरके धवन, एमएल फ़ोतेदार, यशपाल कपूर थे। राजीव गांधी के समय अरुण नेहरू, अरुण सिंह, नरसिम्हा राव के समय जितेंद्र प्रसाद, सीताराम केसरी के समय तारिक़ अनवर, सोनिया गांधी के समय अहमद पटेल और मौजूदा दौर में केसी वेणुगोपाल राहुल गांधी के उतने ही कऱीब और उतने ही शक्तिशाली बन गए हैं।
राजीव गांधी ने 1985 में अरुण सिंह, ऑस्कर फर्ऩांडीस और अहमद पटेल को अपना संसदीय सचिव बनाया था। यह एक शक्तिशाली गुट था और अनौपचारिक बातचीत में इन्हें ‘अमर-अकबर-एंथनी’ कहा जाता था।
जब सीताराम केसरी अध्यक्ष थे तो उनके कऱीबियों के लिए उस समय कांग्रेस के क़द्दावर नेता शरद पवार कहा करते थे, तीन मियां, एक मीरा (अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आज़ाद, तारिक़ अनवर और मीरा कुमार)।
यह अलग बात है कि कुछ ही दिनों बाद जब शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल को मुद्दा बनाकर कांग्रेस से इस्तीफ़ा दिया और अपनी नई पार्टी एनसीपी बनाई तो तारिक़ अनवर उसके एक संस्थापक सदस्य बने और अहमद पटेल, केसरी के बाद अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी के सबसे कऱीबी और गांधी परिवार के बाद पार्टी के सबसे ताक़तवर नेता बने।
अगर केसी वेणुगोपाल पर वापस लौटें तो सबसे पहले तो यही जानते हैं कि दक्षिण के एक छोटे से राज्य केरल से दिल्ली पहुंच कर उन्होंने कैसे यहां गांधी परिवार और ख़ासकर राहुल गांधी के कऱीबी लोगों में अपनी जगह बना ली।
लेकिन उससे भी पहले यह जानते हैं कि केसी वेणुगोपाल के राजनीतिक सफऱ की शुरुआत कैसे हुई।
वेणुगोपाल का सफऱ
दक्षिण भारत के वरिष्ठ पत्रकार केए शाजी कहते हैं कि सीपीएम के गढ़ माने जाने वाले उत्तरी केरल के कन्नूर से किसी कांग्रेसी नेता के लिए उभरकर आना बड़ी बात है।
सीपीआई (बाद में सीपीएम) के क़द्दावर नेता एके गोपालन कन्नूर जि़ला के ही थे। 1963 में कन्नूर जि़ले के पय्यानूर में जन्मे केसी वेणुगोपाल ने छात्र आंदोलन के रास्ते अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की।
केसी का परिवार पुराना कांग्रेसी और गांधीवादी था। उन्होंने अपनी जि़ंदगी का पहला चुनाव उस वक़्त लड़ा जब वो केवल 13 साल के थे और हाईस्कूल में पढ़ते थे। स्कूल के इस चुनाव में उनको चुनौती दी थी सीपीएम के छात्र संगठन एसएफ़आई के उम्मीदवार ने।
केसी केरल स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने और फिर बाद में वो केरल यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए। 1987 में सीपीएम की सरकार के ख़िलाफ़ उन्होंने 10 लाख नौकरी देने के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया।
केरल की राजनीति में के करुणाकरण और एके एंटनी कांग्रेस के दो बड़े गुट रहे हैं। केसी वेणुगोपाल करुणाकरण गुट के वफ़ादार रहे। करुणाकरण ने 1991 में उन्हें कासरगोड से लोकसभा का टिकट दिलवाया था। उस वक्त उनकी उम्र महज़ 28 साल थी। उन्होंने अच्छा चुनाव लड़ा लेकिन मामूली अंतर से चुनाव हार गए।
1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पीवी नरसिम्हा राव ने जब अर्जुन सिंह को पार्टी से निकाला तो करुणाकरण राव के साथ थे। इस समय केसी ने पहली बार करुणाकरण का सार्वजनिक रूप से विरोध किया था।
1995 के मार्च में एके एंटनी मुख्यमंत्री बने। एंटनी के सीएम बनने के बाद रमेश चेन्नीथला, जी कार्थीकेयन और एमआई शनावास जैसे नेताओं ने केरल कांग्रेस में एक तीसरा गुट बनाने की कोशिश की।
केसी इस तीसरे गुट में शामिल हो गए। यह लोग ख़ुद को सुधारवादी गुट कहते थे और उनके अनुसार वे लोग केरल कांग्रेस को करुणाकरण और एंटनी दोनों के प्रभावों से मुक्त कराना चाहते थे।
रशीद कि़दवई के मुताबिक़, एक राज्य ईकाई में भी तीसरे पायदान के नेता के लिए राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आना और एक शक्तिशाली महासचिव के अलावा पार्टी के सर्वोच्च नेता राहुल गांधी का आंख और कान बन जाना केसी की बहुत बड़ी कामयाबी है।
1996 में वो पहली बार एमएलए बने। 2001 और 2006 में भी विधानसभा का चुनाव जीता। 2004 में ओमन चांडी की सरकार में पहली बार मंत्री बने। फिर 2009 में अलाप्पुझा से सांसद बने। 2011 में मनमोहन सिंह की सरकार में राज्यमंत्री बनाए गए।
राजनीतिक शिखर की ओर
2014 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी लहर के सामने कांग्रेस महज़ 50 सीटों के आस-पास सिमट गई तो वो केरल के अलाप्पुझा से दोबारा जीतकर लोकसभा पहुंचे और उन्हें पार्टी का व्हिप बनाया गया।
लेकिन उनके राजनीतिक करियर में अब तक का सबसे अहम मोड़ तब आया जब 2017 में अशोक गहलोत को राजस्थान वापस भेजा गया और राहुल गांधी ने उनकी जगह केसी को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनाया।
2019 में उन्होंने लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का फ़ैसला किया। साल 2020 में वो राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुने गए। लेकिन 2024 में वे एक बार फिर अलाप्पुझा से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
2019 में कांग्रेस के गठबंधन वाली यूडीएफ़ ने केरल की 20 में से 19 सीटें जीती थीं। अलाप्पुझा अकेली ऐसी सीट थी जिसे सीपीएम ने जीती थी। इस सीट को दोबारा जीतने के लिए केरल कांग्रेस के सभी नेताओं ने केसी वेणुगोपाल से अपील की थी कि वो यहां से चुनाव लड़ें।
केसी को टिकट देने के लिए पार्टी को आखिऱी समय में केरल की लिस्ट में कुछ बदलाव भी करने पड़े ताकि सभी जाति और धर्म के लोगों का प्रतिनिधित्व हो सके।
इन सबके बावजूद उनके इस फ़ैसले की कुछ हलक़ों में आलोचना भी हो रही है। अगर वो लोकसभा चुनाव जीत जाते हैं और अपनी राज्यसभा सीट छोडऩे का फ़ैसला करते हैं तो उनकी राज्यसभा की सीट बीजेपी के पास चली जाएगी क्योंकि राजस्थान में इस वक़्त बीजेपी की सरकार है और आंकड़े उनके पक्ष में हैं।
केसी ने मीडिया में इसका जवाब देते हुए कहा है, पार्टी की प्राथमिकता ज़्यादा से ज़्यादा लोकसभा की सीटें जीतना है।
राहुल से निकटता
वरिष्ठ पत्रकार केए शाजी के अनुसार केरल में केसी की छवि साफ़ सुथरी रही है और जब ओमन चांडी सरकार में पर्यटन मंत्री थे तब उन्होंने कई अच्छे काम किए थे। एक सांसद के रूप में भी सदन में उनका रोल बहुत अच्छा रहा है। लेकिन केरल से दिल्ली पहुंचकर गांधी परिवार और ख़ासकर राहुल गांधी के कऱीब जगह बनाने में वो कैसे कामयाब हुए, यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है।
लंबे समय से कांग्रेस को कवर करने वाले और केरल के रहने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, यह एक रहस्य ही है कि दोनों कैसे कऱीब आए और इसका सही-सही जवाब शायद सिफऱ् दो ही लोगों के पास है राहुल गांधी और ख़ुद केसी वेणुगोपाल। और जब तक वो दोनों या उनमें से कोई एक ख़ुद नहीं बताता उस वक्त तक सिफऱ् अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।
वहीं वरिष्ठ पत्रकार रशीद कि़दवई का आकलन है कि 2009 में लोकसभा पहुंचने के बाद केसी को जो घर मिला वो राहुल गांधी के घर के पास था। वो दोनों पड़ोसी बन गए। दोनों नेता फि़टनेस को लेकर काफ़ी अलर्ट रहते हैं।
2004 में सांसद बनने के बाद राहुल गांधी ने सदन में पीछे बैठने का फ़ैसला किया। केसी भी जब 2009 में चुनाव जीतकर आए तो उन्होंने भी सदन में पीछे बैठना शुरू कर दिया। इस वजह से दोनों में ज़्यादा मुलाक़ात होने लगी।
कि़दवई के अनुसार राहुल और केसी के कऱीब आने में इन सब ने भी अहम भूमिका निभाई है। दक्षिण भारत से छपने वाले सबसे बड़े अंग्रेज़ी अख़बार में काम करने वाली एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने भी माना कि दिल्ली में राहुल गांधी और केसी के घर आस-पास होने की वजह से भी उन्हें एक दूसरे के कऱीब आने का मौक़ा मिला।
केसी का एक्स फ़ैक्टर
राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल चाहे जिन कारणों से भी कऱीब आए हों लेकिन फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि केसी में ऐसा क्या है कि राहुल गांधी उन्हें इतना पसंद करते हैं और उन पर इतना भरोसा करते हैं।
केए शाजी कहते हैं, गांधी परिवार से उनकी वफ़ादारी उनकी सबसे बड़ी ताक़त है। गांधी परिवार को उनकी वफ़ादारी पर पूरा भरोसा है। उनके अनुसार केसी अपने नेता राहुल गांधी को पूरी तरह फ़ॉलो करते हैं, उसमें किसी तरह के शक-शुब्हे की कोई गुंजाइश नहीं है।
केसी को यह बात पता है कि एक परिवार के दबदबे वाली कांग्रेस पार्टी में वफ़ादारी की क्या अहमियत है। इस वफ़ादारी के कारण कई बार आपको अपने सर्वोच्च नेता के लिए कवच का काम करना होता है और अपने नेता को निशाना बनाते हुए चलाए गए विरोधियों के तीर ख़ुद अपने शरीर पर लेने होते हैं। कांग्रेस पार्टी को कवर करने वालों के अनुसार केसी ने कई बार ऐसा किया है।
दक्षिण भारत की वरिष्ठ महिला पत्रकार कहती हैं, राहुल गांधी को लगता है कि अगर केसी नहीं होते तो वो संसद में नहीं पहुंच पाते। ज़्यादातर पत्रकारों की तरह उनका भी मानना है कि केसी ने ही राहुल गांधी को 2019 में केरल के वायनाड से चुनाव लडऩे के लिए तैयार करवाया क्योंकि उन्हें अंदाज़ा लग गया था कि यूपी में अमेठी से वो चुनाव हार सकते हैं।
नतीजे आने के बाद हुआ भी वही, राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए और वायनाड से जीतकर लोकसभा पहुंचे।
उनके अनुसार राहुल को लगा कि केसी नए आइडियाज़ वाले व्यक्ति हैं और वो अकबर रोड (कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय) की कोटरी(बेहद कऱीब लोगों) में शामिल नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि केसी की नियुक्ति के ज़रिए राहुल गांधी अहमद पटेल को भी एक संदेश देना चाहते थे।
क्या ये राहुल के अहमद पटेल हैं?
केसी की एक और ख़ूबी का जि़क्र करते हुए वो कहती हैं कि कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसके बारे में आधिकारिक ख़बरें आने से पहले ही सबको पता चल जाती हैं लेकिन जबसे केसी संगठन महासचिव बने हैं पत्रकारों को तो दूर ख़ुद पार्टी के एमपी और एमएलए को भी कोई ख़बर नहीं मिल पाती है जब तक कि उसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हो जाती है।
राहुल से उनकी निकटता की एक मिसाल देते हुए वो कहती हैं कि लोकसभा का सत्र चल रहा था और राहुल गांधी केरल में एक आयुर्वेदिक सेंटर में किसी उपचार के लिए गए थे तो वहां भी केसी उनके साथ थे।
केरल के रहने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक़, आरएसएस, बीजेपी और कांग्रेस के भविष्य और वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर राहुल गांधी की जो सोच है, केसी उससे पूरी तरह सहमत दिखते हैं। केसी एक पक्के कांग्रेसी और गांधीवादी हैं। पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी के कऱीबी लोगों ने जिस तरह से पार्टी छोडक़र बीजेपी का दामन थामा है उस हालत में केसी की कट्टर कांग्रेसी विचारधारा उन्हें राहुल के और कऱीब लाती है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केसी वेणुगोपाल राहुल गांधी के लिए वही हैसियत रखते हैं जो कभी अहमद पटेल सोनिया गांधी के लिए रखते थे। पीवी नरसिम्हा जब प्रधानमंत्री थे तब 10 जनपथ (सोनिया गांधी का निवास) से किसी भी तरह की बातचीत के लिए अहमद पटेल का सहारा लेते थे।
यह भी माना जाता है कि केसी के संबंध मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से बहुत अच्छे हैं और इस कारण वो राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने में मददगार साबित होते हैं।
कांग्रेस कवर करने वाले केरल के वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार अहमद पटेल और केसी के काम करने के तौर-तरीक़े में भी फक़ऱ् है। उनके अनुसार अहमद पटेल को जब कोई काम करवाना होता था तो वो कई बार सोनिया गांधी का नाम लेते थे, लेकिन केसी को किसी से भी कोई काम करवाना होता है तो वो कभी भी राहुल गांधी का नाम नहीं लेते हैं कि राहुल ऐसा चाहते हैं।
रशीद कि़दवई के अनुसार दोनों की तुलना सही नहीं है। सबसे बड़ा फक़ऱ् तो यह है कि अहमद पटेल के बारे में जितनी भी बातें होती हैं वो उस दौरान की हैं जब केंद्र (2004-2014) में कांग्रेस की सरकार थी, जबकि केसी राहुल गांधी के साथ उस समय से हैं जब कांग्रेस ना केवल विपक्ष में है बल्कि पार्टी पिछले दो चुनावों (2014, 2019) में पचास सीटों तक सिमट कर रह गई है।
केसी और विवाद
रशीद कि़दवई के अनुसार राजनीतिक सूझ-बूझ, फ़ंड जमा करने और दूसरी पार्टियों से तालमेल के मामले में अहमद पटेल की तुलना किसी से नहीं की जा सकती है।
रशीद कि़दवई कहते हैं, अहमद पटेल सबकी बात सुनते थे और अपनी तरफ़ से उसमें कुछ भी जोड़े बग़ैर सोनिया गांधी तक वो बात पहुंचा देते थे जबकि केसी पर यह आरोप लगते हैं कि वो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का सही फ़ीडबैक राहुल गांधी तक नहीं पहुंचाते हैं।
अहमद पटेल कांग्रेस के जि़ला कार्यकर्ता को भी उनके पहले नाम से जानते थे, जबकि केसी को हिंदी हार्टलैंड की राजनीति की जानकारी थोड़ी कम है।
रशीद कि़दवई कहते हैं कि केसी का क़द इतना बड़ा नहीं है कि वो दिल्ली के गलियारों में ख़ुद कोई फ़ैसला कर सकें इसीलिए वो रणदीप सुरजेवाला की गुना-भाग करने वाली क्षमता और जयराम रमेश की बौद्धिक क्षमता पर बहुत हद तक निर्भर करते हैं।
ऐसा नहीं है कि केसी का नाम कभी विवादों में नहीं रहा। केरल सोलर स्कैम में भी उनका नाम आया और 2018 में यौन उत्पीडऩ के एक मामले में क्राइम ब्रांच ने उन पर केस भी दर्ज किया। लेकिन इन आरोपों के बावजूद केसी की पार्टी के अंदर बढ़ते क़द में कोई रुकावट नहीं आई।
बाद में सीबीआई ने उनको क्लिन चिट दे दी और अदालत ने भी उस पर अपनी मुहर लगा दी थी।
कुछ महीने पहले मीडिया में इस तरह की ख़बरें भी आईं थीं कि कांग्रेस का एक गुट केसी को उनके पद से हटाने की कोशिश कर रहा है।
दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाले अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और सांसद ने उनसे कहा था कि हमलोग कऱीब 20 साल तक अहमद पटेल की शिकायत करते रहे लेकिन कुछ नहीं हुआ क्योंकि उन्हें सोनिया गांधी का पूर्ण समर्थन हासिल था, केसी के मामले में भी यही है उन्हें राहुल गांधी का पूर्ण समर्थन हासिल है। (bbc.com/hindi)


