राजपथ - जनपथ
लंदन से लौटे पर ऐसी दहशत
ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये स्वरूप वीयूआई के व्यापक फैलाव को देखते हुए देशभर में गाइडलाइन जारी की गई है। छत्तीसगढ़ में भी निर्देश दिया गया है कि विदेश से लौटे प्रत्येक व्यक्ति का कोरोना टेस्ट और संक्रमित पाये जाने पर इलाज कराना है। बिलासपुर में ब्रिटेन से लौटे एक व्यक्ति का दो बार कोरोना टेस्ट कराया गया, दोनों बार रिपोर्ट निगेटिव आई। इसके बावजूद उसे स्वास्थ्य विभाग ने होम आइसोलेशन पर रख दिया है।
इस व्यक्ति को शिकायत यह है कि वह खुद ही अस्पताल में भर्ती अपनी बीमार मां को देखने के लिये हजारों किलोमीटर का सफर तय करके पहुंचा है। अब उसे कोरोना नहीं होने पर भी बीमार बताकर एक कमरे में बंद रहने के लिये क्यों मजबूर किया जा रहा है। डॉक्टरों ने समझाया कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी दूसरे राज्यों, देशों से लौटने वालों को 14 दिन क्वारांटीन पर रहना पड़ता था। रिपोर्ट निगेटिव है या पॉजिटिव इससे असर नहीं पड़ता है। बहरहाल, विदेश से आये बेटे की मजबूरी को समझते हुए अब डॉक्टरों ने उन्हें बहुत जरूरी होने पर घर से निकलने की इजाजत दे दी है, पर पीपीई किट पहनना जरूरी होगा।
अपने ही विधायक डाल रहे मुसीबत में..
विधानसभा के मौजूदा सत्र में विधायक दलेश्वर साहू ने यह बताकर सनसनी फैला दी कि कई राइस मिलें हैं जिन्हें कस्टम मिलिंग के लिये लाइसेंस देकर धान दिया गया लेकिन उनके मिल में बिजली कनेक्शन ही नहीं है। जब कनेक्शन ही नहीं तो मिलिंग हो ही नहीं सकती, लेकिन इन मिलों ने न केवल मिलिंग की बल्कि उसके बाद चावल जमा भी कर दिया।
इधर, विधायक शैलेष पांडेय ने विधानसभा में बिलासपुर की 300 करोड़ की सीवरेज परियोजना की विफलता को लेकर सवाल दागे। कांग्रेस ने चुनाव के समय इसे बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद न तो सीवरेज परियोजना पूर्णता की ओर बढ़ी न ही दोषी अधिकारी, ठेकेदार और विधायक की मांग के अनुसार तत्कालीन जन-प्रतिनिधियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
रायगढ़ के विधायक प्रकाश नायक ने भी एक स्टील प्लांट द्वारा सडक़ खराब करने और प्रदूषण फैलाने का मुद्दा उठाया और इसमें प्रशासन की मिलीभगत का आरोप लगाया। मंत्री विपक्षी दलों के सवालों से परेशान हों तो बात समझ में आती है लेकिन ऐसा लगता है कांग्रेस के विधायकों ने भी ऐसा करने की ठान ली है।
सीजी बोर्ड में शून्य पढ़ाई, सौ फीसदी परीक्षार्थी
बीते सत्र में कोरोना संक्रमण के कारण छत्तीसगढ़ में माध्यमिक शिक्षा मंडल के पैटर्न वाली स्कूलों में जनरल प्रमोशन दिया गया था। इसके चलते इस बार परीक्षार्थियों की संख्या डेढ़ से दो लाख बढऩे वाली है। पिछली बार 6.60 लाख के करीब छात्र-छात्राओं ने 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षा दी थी, इस बार सभी को पास कर दिये जाने के कारण संख्या बढक़र 8 लाख पहुंच रही है।
इस समय ऑनलाइन आवेदन भरने की प्रक्रिया चल रही है जो माह के आखिर तक चलती रहेगी। अंतिम तारीख के बाद ही वास्तविक संख्या कितनी है यह मालूम होगा। परीक्षा फॉर्म भरने की प्रक्रिया तो डेढ़-दो माह आगे खिसकी है पर बोर्ड परीक्षाओं की तारीख भी आगे बढ़ेगी या नहीं अभी तय नहीं है।
अमूमन मार्च में ये परीक्षायें शुरू हो जाती है। कोरोना महामारी का असर कम होता है तो तय वक्त पर परीक्षायें जरूर हो सकती हैं लेकिन 9वीं, 11वीं के सौ फीसदी विद्यार्थियों की परीक्षायें एक साथ लेने की बड़ी जिम्मेदारी माध्यमिक शिक्षा मंडल और प्रशासन पर आने वाली है। स्कूल नहीं खुलने के कारण पढ़ाई ठप हुई, प्रायोगिक परीक्षायें भी नहीं हुई हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षाओं में विद्यार्थियों का परफार्मेंस कैसा रहेगा, यह बड़ा सवाल है।
10वीं बोर्ड में पिछली बार 73 प्रतिशत से कुछ अधिक और 12वीं बोर्ड में 70 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी पास हुए थे। यह परिणाम तब था जब बीते सत्र के लगभग दो तिहाई पढ़ाई हुई थी। इस बार स्कूल बिल्कुल नहीं खुले । उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में यदि उदारता बरतते हुए ज्यादा संख्या में विद्यार्थियों को सफलता दिला दी जाती है तो आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें दिक्कत हो सकती है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में नेता-नेत्री
राजनांदगांव में दो बहनों से छेड़छाड़ और मारपीट के आरोप में एक पार्षद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। दो दिन पहले ही तुमगांव (महासमुंद) में एक सेक्स रैकेट को पुलिस ने पकड़ा तो एक आरोपी ने खुद को सांसद का प्रतिनिधि बताया। सचमुच उसके पास से नियुक्ति पत्र भी मिल गया। नवंबर के आखिरी हफ्ते में रायपुर, डोंगरगढ़ और कई कस्बों में फैले मानव तस्करी के मामले में पुलिस ने अन्य लोगों के साथ एक महिला नेत्री को गिरफ्तार किया।
तीनों मामलों की प्रकृति अलग-अलग है पर सभी में महिलाओं के खिलाफ अपराध हैं। यह भले ही संयोग है कि सभी मामले एक ही दल, भाजपा से जुड़े नेताओं, पदाधिकारियों के हैं। इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिये कि बाकी राजनैतिक दलों की स्थिति साफ-सुथरी है। दरअसल, कई बार इसीलिये पद हथियाये, खरीदे जाते हैं ताकि वे इसका कवच के तौर पर इस्तेमाल कर सकें। कई बार पद मिलने के बाद उसका दुरुपयोग शुरू होता है, जैसा राजनांदगांव में हुआ। भीड़ जुटाने, स्वागत सत्कार कराने के मोह में जानकारी होते हुए भी अवैध, अनैतिक गतिविधियों पर नेता खामोश रहते हैं और जैसे ही बदनामी की आहट होती है, उसे बाहर का रास्ता दिखाया करते हैं।
थानों का इतिहास लेखन...
एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की पुलिस के हर थाने को कहा जाता था कि वह अपने इलाके के सभी किस्म के इतिहास का एक छोटा ब्यौरा बनाकर रखे। अभी बिहार के एक पत्रकार पुष्य मित्र ने वहां अररिया जिले की एक तस्वीर पोस्ट की है जिससे याद आया कि हर थाने को अपने इलाके के इतिहास से थोड़ा तो वाकिफ रहना चाहिए।
बहुत पहले अविभाजित रायपुर जिले में एसपी सीपीजी उन्नी के वक्त थानों से इतिहास लिखवाया गया था। अभी के महासमुंद जिले में उस वक्त तुमगांव थाने के इतिहास में लिखा था कि थाने के मालखाने में एक डुगडुगी रखी हुई है जो कि वहां के राजा ने एक किसी की खाल खिंचवाकर बनवाई थी, और जो मुनादी के काम आती है। अब फणीश्वरनाथ रेणु की धरती से लेकर थाने की इस डुगडुगी तक बहुत सी दिलचस्प बातें थाने अपने इलाके के बारे में दर्ज कर सकते हैं। कोई कल्पनाशील पुलिसवाले रहें तो वे अपने इलाके का एक आम इतिहास लेखन करवा सकते हैं।
मंत्री से सीधे अध्यक्ष

आखिरकार काफी खींचतान के बाद भाजपा ने दुर्ग में डॉ. शिवकुमार तमेर और भिलाई में विरेन्द्र साहू को जिलाध्यक्ष बना दिया। चर्चा है कि दोनों नियुक्ति में सरोज पाण्डेय की चली है। यानी सांसद विजय बघेल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन के सारे प्रयास धरे के धरे रह गए।
डॉ. तमेर तो संघ के पसंदीदा हैं, और वे दुर्ग के मेयर रह चुके हैं। उनकी गिनती छत्तीसगढ़ के नामी न्यूरोलोजिस्ट में हैं। ऐसे में उनका नाम आया, तो किसी तरह का विरोध नहीं हुआ, लेकिन विरेन्द्र साहू के नाम का ऐलान हुआ, तो पार्टी के नेता ही उनका बैकग्राउंड खंगालते रहे। विरेन्द्र साहू जिले के मंत्री रहे हैं, और वे बीएसपी कर्मी थे। जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के अंदरखाने में तीखी प्रतिक्रिया भी हो रही है।
सुनते हैं कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में हास परिहास के बीच एक-दो विधायकों ने रमन सिंह से पूछ लिया, कि विरेन्द्र साहू कौन है? इस पर रमन सिंह ने अनभिज्ञता जताई। एक सीनियर विधायक ने हैरानी जताई, और कहा कि आप लोग नियुक्ति करते हैं, और आपको ही पता नहीं? एक अन्य ने कहा कि विरेन्द्र जिला संगठन मंत्री हैं। इस पर सीनियर विधायक ने कटाक्ष किया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रशिक्षण सत्र इस विषय पर भी होना चाहिए कि जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष कैसे बन सकते हैं। उनकी टिप्पणी पर वहां मौजूद विधायकों ने जमकर ठहाका लगाया।
भोपाल आ जाइए

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छत्तीसगढ़ के विशेषकर बृजमोहन अग्रवाल खेमे के नेताओं से काफी घुले मिले हैं। दोनों युवा मोर्चा में साथ काम कर चुके हैं। मंगलवार को दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा की अंतिम यात्रा में शामिल होने का उनका कार्यक्रम बना, तो एक दिन पहले ही उन्होंने बृजमोहन को फोन किया, और कहा कि उन्हें साथ दुर्ग चलना है। दोनों एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचे। वहां प्रेमप्रकाश पाण्डेय उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। फिर शिवराज सिंह चौहान, एक ही कार में बृजमोहन और प्रेमप्रकाश के साथ वोराजी के घर गए।
अंतिम संस्कार कार्यक्रम से लौटे, तो एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीतिक स्थिति पर सामान्य चर्चा की। चर्चा है कि इन नेताओं ने पार्टी की अंदरूनी दिक्कतों को भी गिनाया। उन्होंने अजय चंद्राकर के जुझारू तेवर की सराहना की, और कहा कि वे उन्हें टीवी चैनलों में देखते हैं। उन्होंने कहा कि जल्द ही वे बिना किसी कार्यक्रम के रायपुर आएंगे, और आप सबके साथ चर्चा करेंगे। या फिर आप लोग समय निकालकर भोपाल आ जाइए। वहां अच्छे से बात हो जाएगी। संकेत है कि शिवराज सिंह अब पार्टी संगठन में हाशिए पर चल रहे बृजमोहन खेमे को मुख्य धारा में लाने के लिए पहल कर सकते हैं।
बोर्ड परीक्षाओं पर चिंता भी, राहत भी
छत्तीसगढ़ के जिन स्कूलों में सीजी बोर्ड परीक्षायें नहीं होतीं उनमें केन्द्रीय परीक्षाओं के लिये सीबीएसई ही अधिक प्रचलित है। कोरोना महामारी के चलते हुए नुकसान के कारण ज्यादातर स्थानीय परीक्षाओं में जनरल प्रमोशन दिया जा रहा है पर बोर्ड परीक्षाओं में ऐसा करना मुश्किल है। विशेषकर केन्द्रीय बोर्ड की। एक-एक परीक्षार्थी की क्षमता का समग्र मूल्यांकन होना जरूरी है क्योंकि आगे इंटरमीडियेट और स्नातक स्तर की परीक्षाओं का रास्ता तय होना है।
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने कल साफ कर दिया है कि जनरल प्रमोशन या ऑनलाइन परीक्षाओं का विकल्प सीबीएसई एग्जाम के लिये तय नहीं किया जा सकता। परीक्षायें ऑफलाइन ही होंगी। हां, छात्रों को तैयारी का कम से कम दो माह का समय और मिल गया है। स्कूलों में ताला लगा है और ऑनलाइन कक्षाओं की तैयारी से अभिभावक, शिक्षक और स्वयं छात्र संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में ऑफलाइन परीक्षायें ली भी नहीं जा सकतीं। दो माह टलने के बाद परीक्षायें निरापद ढंग से हो जायें तब शायद छात्रों का साल खराब होने से बचाया जा सकता है।
10वीं-12वीं बोर्ड के बच्चों के लिये आने वाले दो महीने तनाव के हो सकते हैं क्योंकि इस बीच उन्हें साल भर की तैयारी करनी है। ऐसी परीक्षा के लिये जिसमें सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव होता है। अभी केन्द्रीय बोर्ड परीक्षाओं की तारीखें घोषित नहीं की गई हैं। शायद आने वाले दिनों में कोरोना के ट्रेंड का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि दो माह बाद भी परीक्षायें नहीं हुई तो विद्यार्थियों, अभिभावकों को यह ज्यादा मायूस करेगा, क्योंकि इससे तो उनका पूरा एक साल व्यर्थ चला जायेगा।
अंग्रेज चले गए, पुलिस छोड़ गए...
दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में जब मां-बाप अपने बच्चों को किसी मुसीबत की नौबत के बारे में सिखाते हैं तो पहली नसीहत यह रहती है कि कोई खतरा या परेशानी होने पर सबसे पहले पुलिस को फोन करें या आसपास दिख रही पुलिस तक जाएं। यही वजह है कि पश्चिम के विकसित देशों में छोटे-छोटे बच्चे भी असली खतरे के वक्त या नासमझी में भी पुलिस को फोन लगा लेते हैं।
लेकिन हिन्दुस्तान में खुद पुलिस के लोग यह मानते हैं कि यहां पुलिस के अमले में इतनी संवेदनशीलता नहीं है कि बच्चे उनसे जाकर संपर्क कर सकें। इस देश में अंग्रेजों के वक्त से पुलिस को देसी लोगों को कुचलने के हिसाब से तैयार किया गया था, और आजादी की पौन सदी बाद भी उसका मिजाज बदला नहीं है। मुसीबत में पुलिस को बुलाने का एक मतलब एक नई मुसीबत खड़ा करना भी होता है, और लोग यह तौलते रह जाते हैं कि पुलिस को न बुलाना बड़ी मुसीबत होगी, या बुलाना।
अब राजधानी रायपुर में आज जिस वक्त कांग्रेस भवन में मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक तमाम लोग मौजूद थे, तब बाहर ट्रैफिक पुलिस के लोग एक ऑटोरिक्शा पर इस तरह रवाना हो रहे थे। ड्राइवर की सीट पर ही एक पुलिसवाला सवार हो गया था जो कि ट्रैफिक के नियमों के भी खिलाफ है और कोरोना से सावधानी के भी खिलाफ।
जब तक पुलिस अपने मिजाज को नियम-कायदे मानने वाला नहीं बनाएगी, तब तक पुलिस पर लोगों का भरोसा बन नहीं पाएगा। किसी मारपीट की नौबत पर पुलिस को बुलाएं तो वह पहुंचते ही गंदी गालियों से शुरूआत करती है, और लाठियों पर बात खत्म होती है। बिना जरूरत पुलिस-गाडिय़ां सायरन बजाते चलती हैं, और सडक़ के बीच में डेरा डाल देती हैं। मुसीबत से बचने के लिए अब अगर ऐसी पुलिस तक जाने की सलाह मां-बाप अपने बच्चों को नहीं देते हैं, तो उसकी वजह यह है कि हिन्दुस्तानी पुलिस अब तक अंग्रेजी राज के मिजाज से बाहर नहीं आ पाई है।
भाजपा में आदिवासियों की पीड़ा
कांग्रेस हो, भाजपा या अग्रिम पंक्ति का कोई दूसरा राजनीतिक दल। अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय से ऐसे नेताओं को आगे रखने की कोशिश करते हैं जिनकी अपने समाज में पकड़ तो अच्छी तो हो पर नेतृत्व के लिये हाथ उठाने, हां में हां मिलाने के लिये तैयार रहें। इसके बाद भी हर पार्टी में एक दो ऐसे मुखर नेता भी होते हैं जिनसे नेतृत्व को खतरा तो रहता है पर उनका अपने क्षेत्र में, समुदाय के बीच प्रभाव इतना अधिक होता है कि हाशिये पर रखा नहीं जा सकता। उनका विकल्प तैयार करने की कोशिश भी कामयाब नहीं हो पाती।
भाजपा में नंदकुमार साय भी ऐसे ही नेता हैं। उन्होंने पार्टी का समर्थन नहीं मिलने बल्कि एक खेमे द्वारा रोड़े अटकाने के बावजूद स्व. अजीत जोगी की जाति को लेकर अदालती लड़ाई जारी रखी। वे अपनी पार्टी में आदिवासी नेतृत्व की मांग भी उठाते रहे। पिछले दिनों जब भाजपा प्रभारी डी. पुरन्देश्वरी यहां आई तो वरिष्ठ नेताओं की बैठक में जाने से उन्हें दरवाजे पर रोक लिया गया। बुरी तरह अपमानित हुए और नाराजगी जताई भी। अब उनका ताजा बयान आया है। कह रहे हैं पार्टी प्रदेश में कमजोर हो गई है। आदिवासी समाज से पकड़ खत्म हो गई है। इसके चलते बस्तर और सरगुजा में पार्टी का सफाया हो गया।
अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद साय को पार्टी ने कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है। केन्द्र में सरकार है पर वहां भी उनके लिये कुछ नहीं सोचा गया। वे तीन बार लोकसभा और तीन बार विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। दो बार राज्यसभा भी भेजे जा चुके हैं। अब कायदे से उनके अनुभव का इस्तेमाल तो पार्टी को करना ही चाहिये। ये क्या बात हुई कि उन्हें सीनियर लीडर्स की बैठक में भी न घुसने दिया जाये। उन्होंने खुद आदिवासी नेताओं की बैठक बुलाकर बता ही दिया कि जब जरूरत होगी वे समाज के सारे धड़ों को वे अपने साथ ले सकते हैं।

शाकाहारी अंडा छीन लेगा एक सियासी मुद्दा
स्कूल और आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को पौष्टिक आहार के रूप में जब अंडा वितरित करने की बात आई तो यह एक राजनैतिक मुद्दा बन गया। न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि मध्यप्रदेश में। भाजपा की आपत्ति के बाद छत्तीसगढ़ में सरकार को कहना पड़ा कि अंडे का वितरण सिर्फ उन्हीं बच्चों में किया जायेगा, जो इसे खाना चाहें। बाकी के लिये सोयाबीन से बनी सामग्री या वैकल्पिक प्रोटीन दी जायेगी। पर अब इसका हल निकलने वाला है। आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने शाकाहारी अंडों का अविष्कार किया है। ये अंडे मुर्गियां नहीं बल्कि फैक्ट्रियां पैदा करती हैं। खुश्बू, स्वाद और इनमें मौजूद प्रोटीन असली अंडे की तरह ही है। अविष्कारकों ने खुद इसे कुपोषण के खिलाफ स्वच्छ प्रोटीन की लड़ाई बताया है। हो सकता है आम लोगों तक इस अंडे को पहुंचने में वक्त लग जाये लेकिन जब आयेगा इसे बांटने और खाने पर राजनीति तो खत्म हो जायेगी।
कोरबा में खाद कारखाने का कबाड़
देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने छत्तीसगढ़ में जिन औद्योगिक इकाईयों को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी उनमें कोरबा का खाद कारखाना भी शामिल था। सन् 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने एफसीआई की फैक्ट्री के लिये यहां आधारशिला रखी। रूस, चेक गणराज्य से मशीनें मंगाई गईं और फैक्ट्री लगाने का काम शुरू हुआ। इसी बीच देश के अन्य हिस्सों में लगे एफसीआई की खाद फैक्ट्रियां भारी घाटे में चलने लगीं। तब कोरबा का काम बीच में रोक दिया। बाद में जितने भी सांसद और विधायक इस क्षेत्र से हुए उन्होंने इस कारखाने को शुरू कराने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं रहे।
सन् 2016 में तत्कालीन सांसद स्व. बंशीलाल महतो की कोशिश के बाद केन्द्र की पहल पर अमेरिका की निजी कम्पनियों ने यहां की मशीनों का मुआयना किया और गैस आधारित प्लांट लगाने में दिलचस्पी दिखाई। उस समय अनुमान लगाया गया था कि 9 हजार करोड़ रुपये के खर्च से संयंत्र मुनाफे के साथ चल निकलेगा। पर आगे काम नहीं बढ़ा।
अब हाल ही में फैक्ट्री के सारे साजो-सामान, विदेशी आयातीत मशीनें कबाड़ मानकर 13.84 करोड़ रुपये में बेच दी गई। यहां के मजदूर संगठनों की मांग थी कि गैस आधारित फैक्ट्री शुरू करने की प्रक्रिया को तेज की जाये। पर उनकी नहीं सुनी गई। यह हाल ही की बात है कि कोरबा में विद्युत मंडल ने भी अपनी कई इकाईयों को कबाड़ मानकर बेच दिया। वहां भी यूनियन्स की मांगें थी कि आधुनिकीकरण कर फिर से इनमें उत्पादन शुरू किया जाये।
खाद कारखाना पिछले कई चुनावों में राजनैतिक मुद्दा रहा। कोरबा जिले के लोग इसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गये थे। अभी एफसीआई को आबंटित 900 एकड़ जमीन बची हुई है, जिसे बेचने की कोशिश नहीं हुई तो मान सकते हैं, संयंत्र लगाने की संभावना भी बनी हुई है।
कैसा रहेगा बुरे साल का थर्टी फर्स्ट
सन् 2020 में कोरोना महामारी ने जिस तरह बर्बादी की उसके चलते लोग मना रहे हैं कि जल्दी से जल्दी यह बुरा साल खत्म हो जाये और नये साल का वेलकम करें। देश में अब कोरोना संक्रमण के नये मामले कम आ रहे हैं और कल ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान आ गया कि जनवरी माह के किसी भी दिन से कोरोना का टीकाकरण शुरू हो जायेगा। ऐसे में न्यू ईयर का ज्यादा गर्मजोशी से स्वागत किया जाना तो बनता है।
दूसरी तरफ, ब्रिटेन में तो कोरोना के अधिक घातक तरीके से लौटने की खबर आ रही हैं। वहां क्रिसमस और न्यू ईयर के लिये कड़े प्रतिबंध हैं। भारत से भी वहां की हवाई सेवा रोकने की मांग उठ रही है। अपने देश में भी अभी दहशत कम नहीं हुई। कर्नाटक जैसे राज्यों ने न्यू ईयर पर सार्वजनिक कार्यक्रम रखने पर रोक लगा रखी है। पर छत्तीसगढ़ में रोक नहीं है। प्रशासन से सम्पर्क कर हर साल न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले होटल, रेस्तरां मालिक जानकारी जुटा रहे हैं। बहुत कड़ी पाबंदियां नहीं है। जैसे 100 की क्षमता वाला हॉल है तो 50 को ही अनुमति मिलेगी। सोशल डिस्टेंस का पालन करना, तय समय पर ही पटाखे जलाना, संभवत: रात 11.30 से 12.30 तक तय किया जा रहा है। पटाखे जलाने और पार्टियों को निर्धारित समय पर खत्म नहीं करने पर 20 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की चेतावनी भी दी गई है।
जो लोग न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले हैं उन्हें किसी कार्रवाई की ज्यादा परवाह है, ऐसा नहीं लग रहा। ये सब प्रतिबंध तो शादी, ब्याह, बर्थ डे पार्टियों के लिये पहले से ही लागू है। कार्रवाई तो कहीं हो ही नहीं रही।
दूसरी तरफ, अमरकंटक से लेकर चिल्फी, अचानकमार, बारनवापारा, मैनपाट आदि के सरकारी, गैर सरकारी ज्यादातर रिसोर्ट, विश्राम गृह के अधिकांश कमरे भी बुक हो चुके हैं। वहां इत्मीनान से सोशल डिस्टेंस के साथ न्यू ईयर मनाया जा सकेगा।
भाजपा में भी पदों की प्रतीक्षा
कांग्रेस में जहां निगम-मंडलों में नियुक्ति की कार्यकर्ता लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कार्यकर्ताओं में संगठन के पदों पर नई नियुक्तियों का इंतजार हो रहा है। सत्ता से बाहर रहने पर संगठन के पदों का महत्व बढ़ जाता है और उसका लाभ सरकार बनने पर मिलता भी है। इसलिये बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं को नई नियुक्तियों का इंतजार है।
कुछ दिन पहले जब पार्टी की प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने छत्तीसगढ़ दौरा किया तो कई निर्देश संगठन के नेताओं को देकर गई थीं। उन्होंने सभी जिलों में कार्यकारिणी के पुनर्गठन, रिक्त जिलों में नये अध्यक्षों की नियुक्ति, मोर्चा प्रकोष्ठों में नियुक्ति का निर्देश दिया था। इन सब कामों के लिये 15 दिसम्बर की तारीख तय की गई थी पर कई जिलों में कार्यकारिणी नहीं बनी, कुछ के नये अध्यक्ष भी तय होने हैं। मोर्चा, प्रकोष्ठों में तो प्रदेश स्तर की कार्यकारिणी नहीं बन पाई, जिले के स्तर पर भी अब तक इसे हो जाना चाहिये था, जिसमें जाहिर है काफी वक्त लगेगा।
निर्देशों के मुताबिक अभी-अभी प्रशिक्षण शिविरों की शुरुआत हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ता के न होने पर कार्यकर्ताओं को ही नहीं नेताओं को भी रिचार्ज करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा तो तब और मुश्किल है जब कम से कम तीन साल का लम्बा इंतजार करना हो।
रामजन्मभूमि से बड़ा विवाद
माता कौशल्या की जन्मस्थली पर विवाद छिड़ा है। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर इतिहास का हवाला देकर यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि चंदखुरी, माता कौशल्या का जन्म स्थान है। उनका तर्क है कि चंदखुरी का कहीं जिक्र नहीं है बल्कि कोसला का उल्लेख है। हालांकि इस मसले पर उन्हें पार्टी के भीतर आलोचना झेलनी पड़ रही है। बीज निगम के पूर्व अध्यक्ष श्याम बैस ने तो चंद्राकर की मुख़ालफ़त की है। बावजूद इसके अजय चंद्राकर अपने बयान पर कायम हैं।
अजय चंद्राकर अध्ययनशील हैं, और वे तथ्यों के साथ अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं। दो दिन पहले केंद्रीय संस्कृति-पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल रायपुर आए, तो वे पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय के निवास पर भी गए। पांडेय निवास मेें बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, सुनील सोनी और एक-दो अन्य नेता भी थे। वहां भी माता कौशल्या के जन्म स्थान पर काफी चर्चा हुई। चंद्राकर ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री श्री पटेल को अलग-अलग पुस्तकों का हवाला देकर यह बताया कि माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी नहीं, बल्कि कोसला है। जो कि रायगढ़ जिले में स्थित है।
अजय चंद्राकर के तथ्यों से केंद्रीय राज्यमंत्री और वहां मौजूद अन्य नेता सहमत भी नजर आए। दूसरी तरफ, रामवन गमन पथ को विकसित करने के लिए केंद्र सरकार ने करीब सवा सौ करोड़ रुपये मंजूर भी किए हैं। अब जन्मस्थली पर विवाद छिड़ गया है।
रमन सिंह अफसरों पर बरसे
पूर्व सीएम रमन सिंह अपने गृह जिले कवर्धा के मंच से अफसरशाही पर जमकर बरसे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अफसरों को तो गिने-चुने दिन रहना है। उन्हें ज्यादा तलवे चाटने की जरूरत नहीं है। आमतौर पर रमन सिंह शालीन नेता माने जाते हैं, लेकिन सरकार जाने के बाद आक्रामक दिख रहे हैं, और कई बार आपा भी खो बैठते हैं। कुछ लोग याद करते हैं कि कांग्रेस शासनकाल में जब रमन सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे तब भी वे उस समय कांग्रेस-सरकार में अफसरशाही का आरोप लगाते थे।
जगदलपुर के एक कार्यक्रम में सरकारी तंत्र के कथित हस्तक्षेप पर उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर एलएन सूर्यवंशी का नाम लिए बिना उन पर तीखा हमला बोला था, और भाजपा सरकार बनने पर ऐसे अफसरों को देख लेेने की बात तक कही थी। वर्ष-2003 में भाजपा की सरकार बन गई, और सीएम जोगी के करीबी रहे आरपी मंडल, मुकेश गुप्ता, एसआरपी कल्लुरी और एलएन सूर्यवंशी, रमन सिंह के सीएम बनने के बाद ठीक-ठाक पोस्टिंग पा गए। और तो और, रिटायर होने के बाद सूर्यवंशी को सूचना आयोग के सचिव के पद पर संविदा नियुक्ति भी मिल गई।
भाजपा नेताओं की शिकायत पर मंडल को चुनाव आयोग के आदेश के बाद विधानसभा चुनाव के पहले बिलासपुर कलेक्टर के पद से हटना पड़ा था। मगर रमन सिंह के सीएम बनते ही कुछ दिनों बाद वे रायपुर कलेक्टर बन गए, और रमन सरकार में हमेशा अच्छी पोस्टिंग पाते रहे। भाजपा के एक सबसे बड़े नेता नन्द कुमार साय का पाँव तोडऩे वाली पुलिस के कप्तान रहे मुकेश गुप्ता आगे जाकर रमन सरकार के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर बन गए थे. विधानसभा की कमेटी तक ने उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की थी, लेकिन रमन राज में वे प्रदेश के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर रहे। पुलिस और प्रशासनिक हल्कों में उनकी हैसियत डीजीपी से भी ऊंची मानी जाती थी।
कल्लुरी के खिलाफ कई शिकायतों के बाद भी उन्हें अहम पोस्टिंग मिलती रही। वे बस्तर आईजी रहे। उनकी तारीफों के पुल बांधते हुए पीएम नरेंद्र मोदी से भी मिलवाया गया था। अब जब रमन सिंह मंच से अफसरों को चेताया है, तो न सिर्फ सरकार बल्कि उनकी अपनी पार्टी के असंतुष्ट लोग पुरानी याद ताजा कर मजे भी ले रहे हैं।
धर्मजीत ने की जब सीएम की तारीफ
गुरु घासीदास जयंती सम्मेलन में लालपुर पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ लोरमी के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर को भी मंच साझा करने का मौका मिला। उन्होंने अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री की जमकर तारीफ कर लोगों को चौका दिया। धर्मजीत सिंह ने कहा कि सीएम ने दो साल में उनके लोरमी क्षेत्र को बहुत सी सौगातें दी हैं। खासकर एग्रीकल्चर कॉलेज खोलने की मंजूरी के लिये धर्मजीत सिंह ने आभार जताया। यह मान लें कि यह सौजन्यतावश सार्वजनिक मंच से की गई बात थी लेकिन इसके बाद जो हुआ वह ज्यादा चर्चा में है। मुख्यमंत्री से धर्मजीत सिंह ने काफी देर तक अलग से भी बंद कमरे में चर्चा की। लोग इसका मतलब निकालने में लगे हुए हैं, क्योंकि दो दिन पहले ही बिलासपुर में धर्मजीत सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात की थी। हाल ही में निपटे मरवाही उप-चुनाव में धर्मजीत सिंह की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने भाजपा को समर्थन भी दिया था। देखना है कि यह बातें-मुलाकातें किस थाह पर पहुंचेगी।
संसदीय सचिव की बेफिक्री
संसदीय सचिवों की एक जिम्मेदारी और समझ में आ रही है। वे अपने विभाग की कमियों, गड़बडिय़ों के लिये कवच बनकर खड़े रहेंगे। यदि यदि कोई नौकरशाही के रास्ते से राजनीति में आया हो तो ज्यादा भली-भांति इस जिम्मेदारी को निभा सकता है। ऐसा ही कुछ दिखा जब कांकेर के विधायक रिटायर्ड आईएएस शिशुपाल सौरी मिनी जू कानन पेंडारी के भ्रमण पर पहुंचे। वे वन विभाग के संसदीय सचिव भी हैं। जब पूछा गया कि जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई की घटनायें लगातार सामने आ रही है। जवाब था- पेड़ों की कटाई तो आम बात है, किसी को शिकायत है तो बतायें। मिनी जू में वन्य प्राणियों की लगातार हो रही मौत को लेकर पूछा गया तब भी उनका कहना था कि मौतें तो होती रहती है। ये तो स्वाभाविक घटनाएं हैं। कानन पेंडारी के विकास, विस्तार का काम ठप पड़ा है, पूछने पर कहा कि केन्द्र से राशि अटकी पड़ी है। आगे प्रदेश सरकार की योजना क्या है?, कहा – योजना बना रहे हैं। यानि सब कुछ बढिय़ा चल रहा है।
पहले संगठन, फिर किसान
केन्द्र सरकार और भाजपा ने किसान बिल पर जनसमर्थन जुटाने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला रखा है। जगह-जगह सभा सम्मेलनों, महापंचायतों के जरिये प्रदेश में भी भाजपा यही कर रही है। बाकी कसर प्रशिक्षण शिविरों से पूरी की जा रही है। अनुशासन में बंधी पार्टी के लिये ऊपर से आया आदेश ही महत्वपूर्ण है। वह यही कर रही है। दिसम्बर की ठंड में छत्तीसगढ़ के किसानों के धान बेचने में पसीने छूट रहे हैं। कहीं रकबा कम है, कहीं तौल में गड़बड़ी हो रही है, कहीं बारदानों की कमी है तो कहीं खरीदी ही रोक दी गई है। लोग कह रहे हैं, विपक्ष में होने के नाते किसानों की आवाज उठाना भाजपा की प्राथमिकता में होनी चाहिये। पर दिल्ली में रिपोर्ट कार्ड ठीक बनाये रखने के लिये किसान कानून पर उन्हें भाषण पिलाया जा रहा है। अब यहां जो किसान कानून का मामला है, ज्यादातर उपज खरीद ली जा रही है। नये कानून का क्या असर होने वाला है इसकी ज्यादा परवाह अभी किसान कर भी नहीं रहे हैं। उनकी असल चिंता है, धान समय पर बिना परेशानी बिक जाये और भुगतान मिल जाये। कांग्रेस सरकार और धान खरीदी में लगे तंत्र के लिये अच्छा है कि भाजपा किसान की नहीं, किसानों के केन्द्रीय कानून की ज्यादा परवाह करती रहे।
डराने से डर गये अफसर?
केन्द्र सरकार के किसान कानून के समर्थन में कवर्धा में बुलाई गई महापंचायत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तेवर गरम हो गये। अचानक सभा स्थल की जगह बदलने के आदेश ने उन्हें नाराज कर दिया। जो कुछ उन्होंने कहा उससे एक निष्कर्ष तो निकलता है कि वे तीन साल बाद लौटने को लेकर सौ फीसदी आशान्वित हैं। यह अलग बात है कि जीत-हार का फासला 2018 में इतना बड़ा रहा कि उसे पलट पाना इतना आसान भी दिखाई नहीं देता। 2018 के बाद हुए उप-चुनाव के नतीजे भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी बात यदि नौकरशाह दो साल के भीतर ही ‘तलुवे चाटने’ लगे हैं तो इस जमात ने 15 साल में क्या नहीं किया होगा? उन 15 सालों में किस-किस अधिकारी ने विपक्षी कांग्रेसियों को परेशान किया? प्रताडि़त लोगों में तो कुछ सीएम के बेहद करीबी हैं और कुछ मंत्रिमंडल में भी। डेढ़ दशक के जितने पन्ने पलटेंगे उतने ही केस याद आते जायेंगे। इन्होंने भी चेतावनी दी थी कि सरकार आने पर देख लेंगे। सब मन मसोसे बैठे हैं। कोई ‘देख’ पाया? एक दो को छोडक़र बाकी सब अफसर मजे में हैं। कुछ तो पहले भी ज्यादा। ऐसा कभी हुआ, जो तीन साल बाद हो जायेगा? नहीं लगता कि डॉक्टर साहब के बयान से कोई अफसर घबराया होगा।
कोरोना की मार स्कूली किताबों तक...
कोरोना का कुछ असर तो लोगों को बीमारी, मौत, और लॉकडाऊन के नुकसानों में देखने मिल गया। लेकिन कोरोना-लॉकडाऊन के बहुत से नुकसान धीरे-धीरे सामने आएंगे। महीनों तक सरकारी दफ्तरों में काम बंद रहा, और शुरू भी हुआ तो कहीं आधे लोगों को एक दिन में काम पर आने दिया गया, दूसरे दफ्तरों से कागजी कार्रवाई धीरे-धीरे चली, और हर दफ्तर का काम पिछड़ते गया।
सरकार के जिन विभागों में टेंडर होता है वहां पूरी टेंडर प्रक्रिया ही लेट होती चली गई। कई जगहों पर टेंडर भरने वाले लोगों ने आवेदन देकर तारीखें बढ़वाईं क्योंकि उनके पास पूरे कागजात नहीं जुट पा रहे थे। ऐसे जिन-जिन सरकारी विभागों, निगम-मंडलों में टेंडर लेट हुए, वहां पर आगे का काम भी लेट होते जा रहा है।
इस बरस स्कूलों की अधिकांश कक्षाओं में पढ़ाई नहीं हुई, और साल ऐसे ही खत्म होने का आसार है। लेकिन परीक्षा-सहित या परीक्षा-रहित, जब भी अगले साल की पढ़ाई शुरू होगी, बच्चों को वक्त पर नई किताबें लगेंगी। इस बरस की किताबें पढऩा चाहे न हुआ हो, या कम हुआ हो, अगले बरस की किताबें समय पर देना एक चुनौती का काम भी होगा क्योंकि छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम का काम ही पीछे चल रहा था, और अब उसे खींचतान कर पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। अभी एक खतरा मंडराते दिख रहा है कि किताबें छपने में देर हो सकती है, अगर छपाई शुरू होने में देर हुई। फिलहाल पाठ्य पुस्तक निगम जितने किस्म की एसीबी-ईओडब्ल्यू जांच से घिरा हुआ है, वहां के अफसर-कर्मचारी किसी किस्म की रियायत देकर आगे फंसना नहीं चाहते। फूंक-फूंककर कदम रख रहे लोगों की रफ्तार वैसे भी कम हो जाती है।
सरकार के टेंडर वाले बहुत से दूसरे विभागों में भी काम का यही हाल है, न वक्त पर टेंडर, न वक्त पर काम। लेकिन इसमें वित्त विभाग खुश है क्योंकि उसके पास हर काम का भुगतान करने के लिए आज पैसा भी नहीं है। लेकिन यह बात पाठ्य पुस्तकों पर लागू नहीं होती जिनका पैसा केन्द्र सरकार से आता है।
मोबाइल से थोड़ी बड़ी अल्ट्रासाऊंड मशीन!'

विज्ञान और तकनीक अपने आपमें बिना किसी सामाजिक सरोकार के होते हैं। परमाणु बम एक बड़ी कामयाब तकनीक है, लेकिन जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बम ने दुनिया की सबसे बड़ी तबाही पैदा की थी। सबसे बड़ी कामयाबी वाली तकनीक, और सबसे अधिक तबाही वाला इस्तेमाल।
अब हिन्दुस्तान में जहां कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ा मुद्दा है, वहां सरकार ने बहुत किस्म के नियम-कायदे अल्ट्रासाऊंड सेंटरों पर लगाए हुए हैं। वहां की मशीनें तो कोख में पल रहे बच्चे का सेक्स बता सकती हैं, लेकिन कानून इसके खिलाफ बड़ा कड़ा है। इसके बीच रास्ता निकालने के लिए हरियाणा जैसे कन्या भ्रूण हत्या में कुख्यात राज्य में ऐसे भी डॉक्टर पकड़ाए थे जो कि एक वैन में अल्ट्रासाऊंड मशीन लेकर चलते थे, और चलती वैन में ही जांच करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताकर मोटी कमाई करते थे।
अब दुनिया में टेक्नालॉजी ने और तरक्की की है, और मोबाइल फोन से कुछ बड़े आकार का ऐसा अल्ट्रासाऊंड आ गया है जो इस काम को कर सकता है, और इस मशीन से होने वाली जांच को तुरंत ही मोबाइल फोन पर दुनिया में कहीं भी देखा जा सकता है। अमरीका के जिस कैलिफोर्निया में ऐसी छोटी मशीन विकसित की गई है, वहां की तकनीकी-कंपनियों को हिन्दुस्तान जैसे देश की सामाजिक विकृति का शायद पता भी नहीं होगा कि 340 ग्राम की यह अल्ट्रासाऊंड मशीन यहां कितनी तबाही ला सकती है। इस खबर को छापने से भी कुछ लोगों को लग सकता है कि इसकी जानकारी से कन्या भ्रूण पर खतरा बढ़ेगा, लेकिन बाजार में आ चुकी तकनीक को अनदेखा करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे उपकरणों के हिन्दुस्तान में आने के खिलाफ कस्टम चौकन्ना रहे, और हिन्दुस्तान की साइबर एजेंसियां भी इस पर नजर रखें कि ऐसे उपकरण से जुड़े सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन कौन डाउनलोड कर रहे हैं, कौन इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसी बहाने कोसला भी संवार दो
पिछले साल जब कांग्रेस के कुछ विधायकों ने चंद्रखुरी में माता कौशिल्या मंदिर के नव-निर्माण के लिये मुख्यमंत्री को चेक सौंपा तो महंत राम सुंदर दास ने मां कौशिल्या का जन्म-स्थान बताने पर 11 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवमन पथ की योजना में चंद्रखुरी को माता कौशिल्या का जन्म-स्थान मानकर शामिल किया है। चंद्रखुरी के लोग तो इस फैसले से गद्गद् हैं। वे मान रहे हैं कि कुछ बरसों में इस जगह को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल जायेगी।
इधर, भाजपा विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने इस पर आपत्ति की है। उनका कहना है कि कोसला (बिलासपुर जिला) जन्मस्थली है, चंद्रखुरी नहीं। वैसे जन्मस्थल को लेकर तो नेपाल के प्रधानमंत्री ने भी विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि राम अयोध्या की जगह बीरगंज नेपाल के किसी गांव में पैदा हुए थे। कई इतिहासकार जन्मस्थली को लेकर अलग-अलग मत रख चुके हैं। बीते साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तब मुसीबत में फंस गये जब उन्होंने पाथरी को साईंबाबा का जन्मस्थान बताते हुए वहां के लिये करोड़ों रुपये की की घोषणा कर दी। शिरडी वाले के उबले उपासकों ने तो आंदोलन की चेतावनी दे दी। ठाकरे ने मामला यह कहकर सुलझाया कि पाथरी में साईंबाबा ने जन्म लिया या नहीं, इस पर वे नहीं जायेंगे लेकिन उनकी गतिविधियां वहां रही, इसलिये उसे पर्यटन के लिये विकसित किया जायेगा।
इधर अपने छत्तीसगढ़ में कोसला के सीधे-सादे लोगों ने चंद्रखुरी के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। मामला तथ्यों से ज्यादा भावनाओं का होता है। चंद्राकर के बयान के समर्थन में उनकी पार्टी के लोग भी अभी नहीं आये हैं। बेहतर तरीका तो यही होगा कि कोसला से भी माता कौशिल्या का रिश्ता होने की मान्यता को देखते हुए यहां भी विकास का पैकेज लाया जाये।
सोशल पेज पर दो साल की बातें...
कांग्रेस सरकार की दो साल की उपलब्धियों पर सोशल मीडिया पेज शानदार ग्रॉफिक्स के साथ बधाईयों, शुभकामनाओं से भरे पड़े हैं। मंत्रिमंडल के सदस्यों, कांग्रेस के पदाधिकारियों, समर्थकों ने सरकार के कामकाज की सराहना की है। यह एक ऐसा खुला मंच है जो इंटरनेट और मोबाइल रखने वाले हर किसी की पहुंच में है और वे प्रतिक्रिया दे सकते हैं। सो, यह अपनी पीड़ा बताने का भी माध्यम है।
दो साल के जवाब में एक मंत्री के फेसबुक पेज पर प्रतिक्रिया- सारे कांग्रेसी अपनी पीठ खुद थपथपा रहे। जरा उन विद्या मितान शिक्षकों से पूछो, जो बस्तर सरगुजा जैसे घोर नक्सल इलाकों में 4-5 सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। 10 दिन में नियमितीकरण का वादा था..., 10 माह से बिना वेतन जी रहे हैं। विद्या मितान शिक्षकों का पूरा परिवार रोड पर आ गया है क्यों?...दो माह से लगातार हड़ताल पर हैं...।
पोस्ट में और भी बहुत कुछ है। पर नेकनीयती यह है कि पब्लिक फिगर इन प्रतिक्रियाओं को डिलीट नहीं कर रहे। यह जानते हुए भी कि यह प्रतिक्रिया हजारों लोगों द्वारा पढ़ी जा रही है। पब्लिक फिगर उन्हें ‘रिप्लाई’ भी दें दें तो और अच्छा।
ईमानदारी महंगा शौक
कहावत है कि ईमानदारी एक महंगा शौक है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। अब जेल अफसर वर्षा डोंगरे को ही देखिए, इस जुझारू महिला ने पीएससी-2003 के घोटाले को उजागर किया था। राज्य सरकार की जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू-एसीबी से लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट तक ने भी वर्षा के कथन को सही माना। हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट से घोटाले की जद में आए अफसरों को राहत मिल गई है, और उन्हें आईएएस अवॉर्ड होने जा रहा है।
वर्षा का हाल देखिए, पीएससी घोटाले के बाद जेल में गड़बड़ी का सार्वजनिक खुलासा करने पर पहले निलंबित कर दिया गया, और ट्रांसफर के बाद उनकी करीब 15 महीने की सैलरी रूकी हुई है। जिसके लिए उन्हें विभाग के आला अफसरों से लेकर गृहमंत्री तक की चक्कर काटनी पड़ी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक वर्ष-2003 के राप्रसे के अफसरों को आईएएस अवॉर्ड न करने के लिए यूपीएससी और डीओपीटी तक गुहार लगाई। मगर इस पर कुछ नहीं हुआ।
आईएएस के छह रिक्त पदों के लिए डीपीसी हो चुकी है। तीन सीनियर अफसर हिना नेताम, संतोष देवांगन और एक अन्य के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, और नियमानुसार तीन पद रोके जाने थे। सिर्फ तीन को ही आईएएस अवॉर्ड होना था। इससे पहले भी ऐसा होता आया है। ओंकार सिंह और आनंद मसीह के लिए तो बरसों तक पद रोके गए थे, क्योंकि दोनों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही थी। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार सभी छह रिक्त पदों पर आईएएस अवॉर्ड हो गया। यानी वर्ष-2003 बैच के सीनियर सभी अफसरों को आईएएस अवॉर्ड हो चुका है। सिर्फ नोटिफिकेशन होना बाकी है। ये सब तब हुआ है, जब यूपीएससी के मौजूदा चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी, जो कि छत्तीसगढ़ पीएससी के चेयरमैन रहे हैं, और वे पीएससी-2003 के घोटाले के पूरी तरह वाकिफ रहे हैं। आईएएस अवॉर्ड के दावेदारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया था, और उन्हें सफलता भी मिल गई। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि ईमानदारी महंगा शौक है।
धर्मजीत सिंह की भाजपा से बढ़ती नजदीकी
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) को क्या एक बार फिर झटका लगने वाला है? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि जोगी परिवार के विश्वस्त विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर ने एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से उनके बिलासपुर प्रवास के दौरान मुलाकात की। मरवाही उप-चुनाव में भाजपा को समर्थन देने का निर्णय जकांछ ने लिया तो इसके पीछे धर्मजीत सिंह ही थे। जकांछ से दो विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा पहले से ही दूरी बनाकर चल रहे हैं और कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं। मरवाही सीट पर कांग्रेस की जीत के बाद एक सीट का नुकसान जकांछ को पहले ही हो चुका है। अब धर्मजीत सिंह भी पार्टी से दूरी बनाते हुए दिख रहे हैं।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर डॉ. रेणु जोगी को जिम्मेदारी दी गई तब भी कुछ लोग सवाल पूछ रहे थे कि उनसे अधिक पुराने नेता धर्मजीत सिंह को यह मौका क्यों नहीं दिया गया। इससे एक ही परिवार की पार्टी होने के आरोप से जकांछ को बचाया जा सकता था। इन दिनों उन्होंने वर्तमान विधानसभा क्षेत्र लोरमी की जगह पंडरिया में सक्रियता बढ़ा दी है। यह जकांछ को मजबूत करने के लिये है या खुद के लिये नये ठिकाने की तलाश, भविष्य बतायेगा। धर्मजीत सिंह का कहना है कि एक वरिष्ठ नेता होने के कारण वे सौजन्यतावश डॉ. रमन सिंह से मिलने गये थे। वैसे, धर्मजीत के लिये अभी रणनीति का खुलासा करना जरूरी भी नहीं है क्योंकि चुनाव तो तीन साल बाद है। मेल-जोल बनाये रखना काफी है।
वैक्सीन की तैयारी और लोगों की जिज्ञासा
कोरोना से बचाव के लिये कौन सी वैक्सीन आयेगी, कब तक आयेगी, कितनी मात्रा में आयेगी अभी कुछ पता नहीं है लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार की तरफ से रोजाना नये-नये निर्देश जिला मुख्यालयों में पहुंच रहे हैं। लगभग हर जिले में अधिकारी-कर्मचारियों की बैठकों का सिलसिला चल पड़ा है। वैक्सीन कैसे रखना है, कितनी जगह लगेगी, वितरण कैसे होगा, किनको टीके लगाये जायेंगे तय कर लिया गया है। सरकारी, निजी अस्पताल के डॉक्टरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मितानिनों तक को व्यस्त कर दिया गया है।वैक्सीन लगाने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। दूसरी तरफ आम लोगों में दो तरह की प्रतिक्रियायें दिख रही है। एक वर्ग बेसब्री से वैक्सीन की प्रतीक्षा कर रहा है और आते ही टीका लगवाना चाहता है ताकि कोरोना से चिंतामुक्त हों। दूसरा तबके को लगता है कि एक दिन में तो 100 वैक्सीन ही लगाने की बात हुई है। पहले स्वास्थ्य विभाग के वारियर्स को लगना है तो उनकी बारी आने में तो साल दो साल लग जायेंगे। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन मुफ्त लगेगी या पैसे देने होंगे। देने होंगे तो कितने? और क्या यह ब्लैक में भी मिल जायेगी?
कब चलेगी लोकल ट्रेन?
बिलासपुर रेलवे जोन के अधिकारियों को कोरोना को लेकर काफी चिंता दिखाई दे रही है। शायद इसी वजह से लोकल और मेमू ट्रेन अब तक शुरू नहीं की गयी हैं। रायपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़, राजनांदगांव, गोंदिया, पेन्ड्रारोड आदि के यात्रियों को परेशानी इससे बढऩे लगी है। कुछ कम दूरी की ट्रेनों को चलाया भी जा रहा है तो उसे फास्ट ट्रेन बनाकर। यानि छोटे स्टेशनों के यात्रियों को लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। दूसरे कई राज्यों में लोकल ट्रेन शुरू हो चुकी है। कोरोना की मार बुरी तरह से झेलने वाली दिल्ली भी मेट्रो ट्रेनों को शुरू कर चुकी है। लोकल ट्रेन में गांवों से शहर जाकर फैक्ट्रियों, प्राइवेट संस्थानों में काम करने वाले लोग, मजदूर और छोटे व्यापारी सफर करते हैं। इनका काम धंधा या तो बंद हो चुका है या फिर अपने कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये ज्यादा खर्च इन्हें करना पड़ रहा है। रेलवे का कहना है कि लोकल ट्रेनों में सीट रिजर्वेशन कठिन काम है जबकि अभी सिर्फ रिजर्वेशन के बगैर सफर की मंजूरी मिली हुई है। पर व्यवहार में ऐसा नहीं है। जिन ट्रेनों में रिजर्वेशन हो रहा है उनमें भी सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ रही है। कोरोना गाइडलाइन का पालन रायपुर, बिलासपुर जैसे बड़े स्टेशनों पर तो रेलवे कर रही है पर बाकी स्टापेज में सावधानी नहीं है। दरअसल, लोकल ट्रेनों का किराया काफी कम होता है और रेलवे के लिये इन्हें चलाना घाटे का सौदा होता है। इसलिये इन ट्रेनों को नहीं चलाने की एक वजह यह भी हो सकती है।
इस बार उपाध्यक्ष की बारी
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं। वे होम आइसोलेशन में हैं, और उनकी तबीयत भी ठीक है। इससे परे विधानसभा का शीतकालीन सत्र 21 तारीख से शुरू हो रहा है। और स्वाभाविक है कि डॉ. महंत सदन की कार्रवाई का संचालन नहीं कर पाएंगे। माना जा रहा है कि डॉ. महंत की जगह उपाध्यक्ष मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन करेंगे। किसान आंदोलन और अन्य विषयों को लेकर शीतकालीन सत्र के गरम रहने के आसार दिख रहे हैं। ऐसे में महंत की तुलना में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन किस तरह करते हैं, यह देखना है।
प्रवासी मजदूरों पर शाही खर्च
जिन्हें लगता है कि प्रवासी मजदूरों को अपने गांव वापस लौटने पर क्वारंटीन सेंटर्स में तकलीफ हुई उनको किरारी ग्राम पंचायत का उदाहरण देखना चाहिए। जांजगीर जिले के इस गांव में मजदूरों को आलीशान टेंट लगाकर ठहराया गया। उनको न केवल तरह-तरह के व्यंजन मिले बल्कि मिठाइयां भी खिलाई गई। उनके लिए ट्यूबवेल खोदे गए कूलर लगवाए गए। सरपंच और सचिव ने मिलकर 14वीं और 15वीं वित्त आयोग की राशि लगभग 4 करोड़ रुपये मजदूरों की सेवा में खर्च कर दी। इस बिल को पास करने के लिए जनपद पंचायत में भेजा गया तब पता चला कि सब कुछ फर्जीवाड़ा था। बौखलाए प्रवासी मजदूरों ने, जिन्हें सरकारी पंचायत भवन और स्कूलों में ठहराया गया था और ढंग से खाना नहीं मिला उन लोगों ने पंचायत सचिव की पिटाई कर दी। हैरानगी की बात है कि पंचायत सचिव के समर्थन में पूरा संघ उतर आया है। क्या इसका मतलब यह समझा जाए की दूसरी पंचायतों में भी इसी तरह के घोटाले हुए हैं?
फिलहाल तो अकलतरा विधायक सौरभ सिंह ने अधिकारियों को चि_ी लिखकर बिल को पास नहीं करने की हिदायत दी है।
कोरोना से बचने क्या करें ना करें?
जब कोरोना संक्रमण को लेकर दहशत फैली तब बाजार में मास्क और सेनेटाइजर मिल नहीं रहे थे। अनाप-शनाप दामों पर इसकी बिक्री हुई। लोग इसके लिए 200 रुपए भी खर्च कर रहे थे। अब बाजार से खबर आ रही है कि इनकी बिक्री में भारी गिरावट आ गई है। लोग 10 रुपया में भी मास्क बेच रहे हैं और कई शैंपू और साबुन से भी सस्ते सैनिटाइजर मिलने लगे हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है? एक तो लोगों ने देख लिया कितने चुनाव निपट गए मंत्री नेता रैलियाँ सभाएं करते रहे, ना तो मास्क लगाया न ही सेनिटाइजऱ का इस्तेमाल किया। स्वास्थ विभाग की ओर से भी पहले तो कहा गया था कि मास्क हमेशा लगाएं लेकिन डॉक्टरों का यह रिसर्च भी सामने आ गया कि लगातार मास्क लगाने से सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। काढ़ा पीने से और लगातार सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने से भी नुकसान हैं। क्या लोगों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता नहीं है और वह सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ चुके हैं?
फिर हुक्काबार खुल गये...
विधानसभा में हुक्काबारों के संचालन को लेकर सवाल उठा था तब मंत्रिपरिषद् ने इन्हें अवैध घोषित करते हुए संचालन पर रोक लगाई थी। नगर निकायों और पुलिस प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। पर, कुछ दिन की सख्ती के बाद राजधानी रायपुर सहित बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई आदि शहरों में ये बार फिर शुरू हो गये हैं। दरअसल, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर लगाये गये प्रतिबंध के बाद ये सुविधा भी दी गई जिन रेस्टारेंट्स या होटलों में 30 लोगों के बैठने की जगह हो वहां एक स्मोकिंग जोन बनाया जा सकता है। पर इनमें सिर्फ तम्बाकू उत्पादों की खपत हो सकती है। इसी की आड़ में दूसरी नशीली चीजें बेची जा रही हैं।
हुक्का बारों की तरफ स्कूल कॉलेज के बच्चों का ज्यादा आकर्षण दिखाई दे रहा है। उन्हें तम्बाकू के साथ जो सुगंधित केमिकल मिलाकर दिया जाता है जो काफी खतरनाक है। ऐसा करने पर दो साल की सजा का प्रावधान भी है पर पुलिस ज्यादातर मामलों में धारा 144 के अंतर्गत ही कार्रवाई कर रही है। सख्ती और प्रभावी कार्रवाई के लिये क्या पुलिस और नगर निगमों को किसी ने रोक रखा है? पता नहीं क्यों लोग इस सिलसिले में हफ्ता, और महीना जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं?
ऐन मौके पर पटवारी हड़ताल
लम्बे समय से कोरोना संक्रमण के चलते सरकारी दफ्तरों में छुट्टी रही। राजस्व विभाग भी इससे अछूता नहीं रहा। लोगों को वैसे भी तहसील और पटवारियों के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, कोरोना काल में दिक्कतें और बढ़ गई। रजिस्ट्री ऑफिस का कामकाज भी इसके चलते प्रभावित हुआ और आमदनी गिरी। इस समय चल रही धान खरीदी के दौरान रकबे में गड़बड़ी की सैकड़ों शिकायतें आ रही हैं, जिन्हें पटवारियों को ही सुधारना है। राजस्व नामांतरण, बंटवारा, फौती के सैकड़ों मामले लटके हैं, जिनके अब रफ्तार पकडऩे की उम्मीद थी। ठीक ऐसे ही वक्त पटवारी बेमियादी हड़ताल पर गये हैं। सिविल सेवा अधिनियम का हवाला देते हुए राज्य शासन ने इन हड़तालों को प्रतिबंधित किया है पर जैसा होता है इसका असर नहीं हुआ, आंदोलन जारी है। वह हड़ताल ही क्या जो ऑफ सीजन में की जाये, इससे तो सरकार को फर्क नहीं पडऩे वाला है न आम जनता को तकलीफ ही महसूस होगी।
हाथियों से नुकसान, समाधान कब?
यूं तो छत्तीसगढ़ के अनेक हिस्सों में हाथियों के दल घूम रहे हैं पर कटघोरा वन मंडल में बीते 10-12 दिनों से स्थिति ज्यादा गंभीर हो चुकी है। दो हफ्तों में हाथियों के हमले से तीन लोगों की मौत हो चुकी है। पश्चिम बंगाल से आई हुल्ला पार्टी भी ग्रामीणों को इनसे नहीं बचा पाई। जो दो हाथी उत्पात मचा रहे हैं वे अपने दल से बिछुड़ गये हैं। हुल्ला पार्टी ट्रैकिंग कर हाथियों के दल से उन्हें मिलाने की कोशिश कर रही है लेकिन उन्हें अभी सफलता नहीं मिल पाई है। राज्य में बीते कई साल से हाथियों के अनुकूल रहवास व प्रवास की योजनाओं पर काम हो रहा है पर समस्या का समाधान नहीं हुआ । कटघोरा रेंज के जिन गांवों में यह घटना हुई है वहां कई कच्चे मकान हैं, जिनमें हाथियों ने नुकसान पहुंचाया। ग्रामीणों को कच्चे मकान की जगह पक्के मकान बनाकर देने, उन्हें टार्च देने, मशाल जलाने, पटाखे फोडऩे कहा जाता है। पर ये साधन नहीं मिलते। वन ग्रामों में सुरक्षा समितियों का गठन भी किया गया है, लेकिन प्रशिक्षण और साधन उपलब्ध नहीं कराने के कारण वे अपना बचाव नहीं कर पाते। क्या सिर्फ जान-माल के नुकसान का आकलन और फिर उसके बाद मुआवजा वितरण का सिलसिला ही चलता रहेगा?
शुभ-अशुभ का चक्कर
खरमास शुरू हो गया, लेकिन निगम-मंडल के पदाधिकारियों की लिस्ट जारी नहीं हुई। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक खरमास में शुभ कार्य वर्जित है। ऐसे में दावेदारों को भरोसा था कि मंगलवार को खरमास शुरू होने से पहले सूची जारी की जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। दुर्ग जिले के एक साहित्यकार ने तो राजभाषा आयोग में अध्यक्ष के कमरे की साज-सज्जा के लिए कह दिया था। साहित्यकार ने संस्कृति विभाग के लोगों को निर्देश दिए थे कि वे ही आयोग का अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। ऐसे में सारी तैयारियां पहले से करके रखें। सूची जारी होते ही पदभार ग्रहण करेंगे। अब कमरा तो तैयार हो गया है, लेकिन अध्यक्ष का ही अता-पता नहीं है। चर्चा यह भी है कि शुभ मुहूर्त में मकर संक्रांति के बाद ही सूची जारी हो सकती है। कुल मिलाकर शुभ-अशुभ के चक्कर में सूची अटकने का अंदेशा जताया जा रहा है।
थाना टूटा, विवाद बरकरार
ब्रिटिश कालीन कोतवाली थाने को तोडक़र नया रूप दिया गया है। निगम के इस फैसले की आलोचना भी हुई। वजह यह है कि कोतवाली थाने से आजादी की लड़ाई की यादें जुड़ी हुई थीं। मगर तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया। थाना तोडऩे से यातायात की समस्या हल नहीं हुई है, और वहां अब भी जाम लगा रहता है।
एक जनप्रतिनिधि ने पिछले दिनों निगम के एक अफसर को बुलाकर डपटा, और कहा कि आप लोगों के बिना सोचे विचारे थाना तोडऩे से समस्याएं पैदा हो गई हैं। अफसर ने धीरे से कहा कि थाना तोडक़र नया रूप देने का प्लान बड़े साब का था। साब ने ही ड्राइंग डिजाईन तैयार किया था, और साब ही ठेकेदार थे। ऐसे में हमारी सलाह का कोई औचित्य नहीं था।
इसीलिए खफा हैं युद्धवीर...
दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के पुत्र युद्धवीर सिंह खफा हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि भाजपा व्यापारियों की पार्टी बनकर रह गई है। युद्धवीर काफी समय से नाराज चल रहे हैं, उनके पार्टी छोडक़र कांग्रेस में जाने की अटकलें भी हैं। हालांकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघ से जुड़ाव को देखकर लगता नहीं है कि वे भाजपा छोड़ देंगे।
युद्धवीर चंद्रपुर से दो बार विधायक रहे हैं। उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बखूबी संभाला, और जशपुर जिले की तीनों सीट जिताने में उनकी अहम भूमिका रही है। युद्धवीर को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री पद दिया जाएगा। मगर सिर्फ संसदीय सचिव का दायित्व सौंपा गया। जबकि रमन सरकार में कई पहली बार के विधायक मंत्री बने थे। दूसरी बार जीतकर आए, तो फिर उन्हें मंत्री बनाने के लिए लाबिंग हुई, लेकिन ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई। तीसरी बार वे खुद चुनाव मैदान में नहीं उतरे, और अपनी पत्नी को टिकट देने की सिफारिश की। युद्धवीर की पत्नी संयोगिता चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन वे हार गईं।
युद्धवीर, रमन सिंह और सौदान सिंह से काफी खफा हैं। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि युद्धवीर के जनाधार को हमेशा कम कर आंका गया। लेकिन दूसरे लोगों का कहना है कि जनाधार ही होता तो उनकी पत्नी चुनाव क्यों हारती? उनकी नाराजगी तब और जाहिर हो गई, जब जांजगीर-चांपा जिलाध्यक्ष पद पर केके चंद्रा की नियुक्ति की गई। चंद्रा, युद्धवीर के प्रबल विरोधी माने जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि पहली बार जब युद्धवीर चंद्रपुर से चुनाव मैदान में थे, तो चंद्रा की वजह से उन्हें पार्टी में अंतर विरोध का सामना करना पड़ा था। और अब जब उन्हें ही जिले की कमान सौंपी गई, तो युद्धवीर सहन नहीं कर पा रहे हैं।
राम के नाम पर उठा विवाद
कथाओं में जिसे राम वनगमन मार्ग माना गया है छत्तीसगढ़ सरकार ने उनको पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए संवारने का निर्णय लिया है। इसकी शुरूआत चंद्रखुरी से होगी जिसे राम की मां कौशिल्या की जन्मस्थली माना जाता है। इसके लिये सुकमा और कोरिया से रथ यात्रा कल शुरू हुई। सुकमा में आदिवासी समाज के एक वर्ग ने इसका विरोध किया। दूसरी खबर जशपुर जिले के दुलदुला ब्लॉक से आई जहां रामकथा के नाम पर दो पक्षों के बीच मारपीट हो गई। दोनों घटनायें छुटपुट हैं और बातें सुलझ भी गईं, पर इस बहाने कांग्रेस भाजपा के बीच राम पर किसका दावा पुख्ता है इस पर बहस शुरू हो सकती है। लोकसभा चुनाव की बात अलग है पर प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में अब तक राम तो रहे नहीं। क्या भविष्य में यही स्थिति बनी रहेगी?
जोगी पार्टी छोड़ कांग्रेस वापिसी
प्रदेशभर से जोगी पार्टी के नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं। बड़ी संख्या में आवेदन भी पीसीसी को मिले हैं। कई जगहों पर तो कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के विरोध की वजह से प्रवेश नहीं हो पा रहा है। अंबिकापुर में तो जोगी पार्टी के नेताओं की टीएस सिंहदेव से बहस भी हो गई। हुआ यूं कि जोगी पार्टी के नेता गोपाल केशरवानी और अतुल सिंह के नेतृत्व में सीएम भूपेश बघेल से मिलने पहुंचे।
जोगी पार्टी के नेताओं को देखकर टीएस ने तंज कसा, और कहा कि क्या जोगी पार्टी से मोह भंग हो गया है? गोपाल केशरवानी ने टीएस की बातों को नजरअंदाज करते हुए सीएम को बताया कि हम सब पुराने कांग्रेसी हैं, और खुद के बारे में बताया कि उनके पिता सरगुजा जिला कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। अतुल सिंह भी कुछ बोलना चाह रहे थे कि टीएस ने उन्हें टोक दिया, और कहा कि जोगी पार्टी के लोगों के कांग्रेस प्रवेश पर प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम फैसला लेंगे। इस पर अतुल सिंह ने टीएस सिंहदेव को झिडक़ दिया, और कहा कि हम आपसे बात नहीं कर रहे हैं। सीएम से बात करने आए हैं।
विवाद बढ़ता देख सीएम ने तुरंत हस्तक्षेप किया, और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके आवेदनों पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम विचार करेंगे, और वे खुद भी मरकाम से चर्चा करेंगे। कुछ ऐसी ही स्थिति राजनांदगांव में भी बनी। सीएम के करीबी गिरीश देवांगन वहां जोगी पार्टी से कांग्रेस में आने के इच्छुक नेताओं के बारे में पूछा, तो ज्यादातर कांग्रेस नेताओं ने जोगी पार्टी के नेताओं को कांग्रेस में शामिल करने का विरोध किया। भाजपा के एक पुराने नेता को लेकर भी राय मांगी, तो उनके लिए भी सहमति नहीं बनी। ये अलग बात है कि भाजपा छोड़ चुके इस नेता के पुत्र कांग्रेस के पदाधिकारी हैं। विनोद गोस्वामी ने खुद होकर भाजपा छोड़ी और अब वे कांग्रेस में घर वापिसी चाहते हैं. भूपेश बघेल के कुछ करीबी लोगों ने उन्हें विनोद गोस्वामी के लिए सिफारिश भी की है।
बड़े नेताओं से ग्रस्त दुर्ग भाजपा
भाजपा में दुर्ग और भिलाई अध्यक्ष की नियुक्ति स्थानीय बड़े नेताओं में खींचतान की वजह से अटक गई है। जबकि प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने 15 दिसंबर तक जिलाध्यक्षों की नियुक्ति करने के निर्देश दिए थे। आज डेड लाइन खत्म हो रही है, और नियुक्तियों के आसार नहीं दिख रहे हैं।
सुनते हैं कि सरोज पाण्डेय ने दिनेश देवांगन को दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष बनाने की वकालत की है, इस पर सांसद विजय बघेल सहमत नहीं हैं। विजय बघेल चाहते हैं कि भिलाई में प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन की सहमति से अध्यक्ष की नियुक्ति की जाए। यहां भी सरोज की अपनी पसंद है। चारों के बीच कटुता इतनी ज्यादा है कि वे एक साथ बैठने के लिए भी तैयार नहीं हैं।
प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी से विजय बघेल और विद्यारतन भसीन ने अलग से चर्चा की थी, और उन्हें दुर्ग जिले में संगठन चुनाव के दौरान विवाद की विस्तार से जानकारी दी थी। सरोज की पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग हैसियत है। ऐसे में नियुक्तियों को लेकर प्रदेश संगठन पशोपेश में हैं।
कहानी में लिखी बात पर घिरे कुलसचिव
छत्तीसगढ़ का कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय अपनी किसी कामयाबी के लिए कम, और किसी न किसी अवांछित और अप्रिय बात के लिए खबरों में बने रहता है। अब ताजा खबर कुलसचिव डॉ. आनंद बहादुर की एक कहानी संग्रह के एक वाक्य को लेकर बनी है जिसमें कहानी का एक पात्र आईएएस और दूसरी परीक्षाओं में कामयाब नहीं हो पाता। और उसके बारे में कहानीकार ने लिखा है- उसके बहुत सारे पढ़ाई में बोदे मित्र आरक्षण की बैसाखी के सहारे मंजिल पा गए थे।
अब इस एक वाक्य को लेकर आरक्षण समर्थकों ने डॉ. आनंद बहादुर की घेरेबंदी की है। अजाक्स के प्रांताध्यक्ष डॉ. लक्ष्मण भारती ने कहा है कि कुलसचिव को आरक्षण पर अध्ययन करने की जरूरत है। एक जिम्मेदारी वाले पद पर रहते हुए ऐसा लिखते समय अपने सामान्य वर्ग के आरक्षण की जानकारी भी उन्हें होना चाहिए। क्या उनके आरक्षण को भी बैसाखी की श्रेणी में रखेंगे?
लोगों में अब सामाजिक और राजनीतिक चेतना इतनी आ गई है कि किसी कहानीकार को भी अपने किरदार के बारे में लिखते हुए अपनी बातों को सावधानी से ही लिखना पड़ेगा। अब अगर पात्र ऐसा सोचता होता तो एक अलग बात होती, लेकिन अगर कहानीकार आनंद बहादुर के शब्द यह लिख रहे हैं तो लोग सवाल उठा सकते हैं।
अधिक शिष्टाचार भारी पड़ा
जाते-जाते एक कलेक्टर ने अपने मातहत तहसीलदार को ऐसा जख्म दिया है कि कलेक्टर के हटने के बाद भी तहसीलदार के जख्म नहीं भर पाए हैं। हुआ यूं कि कलेक्टर ने तहसीलदार को अपने गेस्ट को भेंट करने के लिए अच्छी-सी सात-आठ साड़ी भिजवाने कहा। तहसीलदार जब दुकान गए, तो दुकानदार ने सलाह दी कि आप 80 साड़ी ले जाइए, जो साब को पसंद आएगी वे रख लेंगे। बाकी लौटा दीजिएगा। तहसीलदार को दुकानदार की बात जंच गई, वे 80 साड़ी लेकर बंगले पहुंचे, तो सभी साडिय़ों को रखवाकर जाने के लिए कह दिया गया। साडिय़ों की कीमत के बारे में किसी ने पूछा ही नहीं। थोड़े दिन बाद कलेक्टर भी रिटायर होकर चले गए, अब हाल यह है कि बेचारे तहसीलदार को साडिय़ों की कीमत अदा करनी पड़ रही है।
बगावत करेंगे युद्धवीर?
जशपुर जिले में जूदेव परिवार भारतीय जनता पार्टी का पर्याय रहा है। जब तक स्व. दिलीप सिंह जूदेव जीवित थे, पार्टी का हर फैसला उनसे पूछकर लिया जाता था। इधर, इन दिनों चंद्रपुर से दो बार विधायक रह चुके युद्धवीर सिंह जूदेव की भाजपा पर की गई टिप्पणी इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। मीडिया में उन्होंने भाजपा को न केवल व्यापारियों की पार्टी बताया, बल्कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के संघर्ष की तारीफ भी की। उनके रिश्ते टीएस सिंहदेव से भी अच्छे हैं। सन् 2018 में सिंहदेव ने साफ कर दिया था कि वे युद्धवीर के खिलाफ चुनाव प्रचार करने नहीं जायेंगे।
चंद्रपुर से 10 साल विधायक रहने के बाद युद्धवीर सिंह का जशपुर से सम्पर्क कम हो गया था पर बाद में पंचायत चुनाव में जिम्मेदारी दी गई। रायगढ़ से गोमती साय का लोकसभा चुनाव के लिये नाम तय किया गया तो कहा जाता है, उनकी ही सिफारिश थी। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय युद्धवीर सिंह ने भाजपा से सम्बन्धित पहचान हटा ली है।
इन सबसे यह अटकल भी लगाई जा रही है कि वे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर कई पोस्ट उन्होंने हाल के दिनों में डाली है जो कांग्रेस सरकार की आलोचना में है। इनमें सहकारिता विभाग में कम्प्यूटर ऑपरेटरों की भर्ती में भ्रष्टाचार व बारदानों की कमी के कारण धान खरीदी व्यवस्था में आई दिक्कतों की चर्चा भी है।
सन् 2018 के उप-चुनाव में जशपुर की तीनों सीट कांग्रेस के पास आई थी और भाजपा साफ हो गई थी। यह करीब 35 साल बाद हुआ। यदि युद्धवीर कांग्रेस में आ जाते हैं तो जशपुर के फिसले जनाधार को दुबारा हासिल करना भाजपा के लिये और कठिन हो जायेगा।
पत्रवार्ता नहीं, केवल उद्बोधन
किसान कानून के समर्थन में कल भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेशभर में मीडिया से बात की। प्राय: सभी जिला मुख्यालयों में इन वार्ताओं का आयोजन किया गया था। दिल्ली से जो बातें केन्द्रीय मंत्रियों के हवाले से टीवी चैनलों में कही जा रही है लगभग वही बातें स्थानीय स्तर पर भी दोहराई गई। तीनों कानूनों को किसानों के लिये फायदेमंद बताया गया और आंदोलनकारियों को अराजक, अर्बन नक्सली, टुकड़े-टुकड़े गैंग भी कहा। बस यही नहीं बताया गया कि आंदोलनकारी किसानों की शंकायें जिन बिन्दुओं पर हैं उसका केन्द्र सरकार के पास समाधान क्या है। प्राय: हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक लम्बा वक्तव्य दिया गया और जब प्रश्न-प्रतिप्रश्न का मौका आया तो प्रवक्ता जवाब देने से बचते रहे और जैसे ही असहज हुए वार्ता समाप्त करने की घोषणा कर दी गई।
सफाई के ठेके में मलाई...
नगरीय निकायों में सफाई का ठेका लेना कमाई का बढिय़ा जरिया है। ठेके के लिये बड़ी मारामारी होती है, सिफारिशें चलती हैं। सत्ता पक्ष के करीबियों को काम सौंपा जाता है। प्रदेश के कई निकायों में पार्षदों ने दूसरे नामों से ठेके ले रखे हैं। ठेके लेने के लिये ऐसी होड़ रहती है कि हाल ही में एक ठेकेदार ने टेंडर में भाग लेने से रोकने पर हाईकोर्ट में केस कर दिया। ठेके में अनुबंध होता है कि वे कितने कर्मचारी लगायेंगे और कितनी बार सफाई होगी। पर एक बार ठेका मिल जाने के बाद शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं यह कोई नहीं देखता। अक्सर बीच-बीच में जब अधिकारी वार्डों का दौरा करते हैं तो गंदगी देखकर ठेकेदारों पर जुर्माना लगा देते हैं। ठेकेदार की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि कम संसाधनों से काम करते हुए वह काफी बचा चुका होता है।
इन दिनों राजधानी रायपुर में सेजबहार हाउसिंग बोर्ड के लोग गुस्से में हैं। टैक्स वसूलने के लिये न सिर्फ नोटिस भेजी गई है बल्कि कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। पानी का कनेक्शन काटने की चेतावनी भी दी गई है। पहले पंचायत के जिम्मे में सफाई थी तो व्यवस्था ठीक थी पर अब टैक्स भी भारी और सफाई की व्यवस्था भी खराब।
बाबा लायेंगे क्रांति?
वेब सीरिज ‘आश्रम’ में मुख्य किरदार निगेटिव करैक्टर का एक बाबा है। इस सीरिज में थीम सांग है-बाबा लायेंगे क्रांति...। इन दिनों सरगुजा में सोशल मीडिया पर मीम वायरल हो रहा है जिसमें पाश्र्व में यही गीत बज रहा है। बताया जाता है कि ये टीएस बाबा के ही किसी फालोअर ने बनाया है और उनके समर्थक इसे शेयर कर रहे हैं। सन् 2018 में सरगुजा से कांग्रेस को बम्पर वोट मिले तो इसकी एक वजह यह भी थी कि बहुत से लोग बाबा को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे थे। चुनाव के समय उन्होंने अपनी इस इच्छा को साफ-साफ जाहिर भी किया था। दूसरी तरफ, हाल ही में प्रदेश में ढाई साल वाले फॉर्मूले पर मुख्यमंत्री से सवाल भी पूछ लिया गया था और जिस पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। बहुत से लोग समझ रहे हैं कि उनका इशारा किस ओर था। इन दिनों सीएम सरगुजा संभाग के 5 दिनों के लम्बे प्रवास पर हैं। उनकी सभाओं के पहले दो दिन टीएस बाबा नहीं थे। वे चार्टर प्लेन से दिल्ली चले गये थे, पर रविवार को लौटकर शामिल हुए। सीएम के इस दौरे में लोगों ने देखा कि इन सभाओं में कभी बाबा के अलावा किसी को महत्व देने की जरूरत नहीं समझने वाले भी सीएम के आगे-पीछे हो रहे हैं। जो सीएम तक नहीं पहुंच पाये वे उनके मंत्रियों तक पहुंचने की कोशिश में लगे हैं। शायद इनका धैर्य जवाब दे चुका है और बदलाव की उम्मीद छोड़ चुके हैं। एक समर्थक का कहना है कि मंत्रीजी के करीब कुछ लोग हैं जिनकी वजह से वह छिटक रहे हैं। ऐसे में क्रांति आयेगी?
एबीवीपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी
कवर्धा में एबीवीपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का मुद्दा गरमाया हुआ है। उन्होंने प्रतिबंधित कलेक्टोरेट क्षेत्र में प्रदर्शन किया था। वे एक आदिवासी नाबालिग से गैंगरेप के मामले में पुलिस से कार्रवाई की मांग करने के लिये पहुंचे थे। उन पर गंभीर धारायें लगाई गई हैं जिन्हें छोडऩे की मांग को लेकर भाजपा ने भी प्रदर्शन किया। कवर्धा के अलावा राजनांदगांव में भी विरोध दर्ज कराया गया है। प्रशासन की कार्रवाई पहली नजर में कुछ सख्त लगती है। आम तौर धरना प्रदर्शनों में गिरफ्तारियां होती है और कुछ घंटे बाद छोड़ भी दिये जाते हैं। बेरिकेड्स तोडऩे और प्रतिबंधित परिसर तक पहुंचने की घटनायें भी होती रही हैं। फिर क्या जवानों के साथ धक्का मुक्की और कांग्रेस भवन में चूडिय़ां फेंकना एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर भारी पड़ा?
अगली पीढ़ी की जगह बनाना है
खबर है कि भाजयुमो अध्यक्ष अमित साहू को अपनी कार्यकारिणी बनाने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। पहले तो पार्टी ने 35 वर्ष से कम आयु वालों को ही कार्यकारिणी में लेने की हिदायत दे रखी है। और अब पार्टी के कई बड़े नेता अपने बेटे-बेटियों को युवा मोर्चा के जरिए लॉन्च करना चाहते हैं, जिन्हें एडजस्ट करने में दिक्कत हो रही है।
प्रेमप्रकाश पाण्डेय के बेटे मनीष युवा मोर्चा पदाधिकारी बनने की होड़ में हैं। मनीष पिछले कई साल से सक्रिय हैं, और अमित का सबसे ज्यादा स्वागत भिलाई में हुआ था। इसी तरह नारायण चंदेल के बेटे, और रामविचार नेताम की बेटी का नाम भी युवा मोर्चा के पदाधिकारी के लिए चर्चा में हैं। इससे परिवारवाद का आरोप लगने का खतरा भी है, मगर रास्ता निकालने की कोशिश भी हो रही है।
साया भी साथ छोड़ जाता है...
भाजपा के एक पूर्व विधायक को साए की तरह साथ रहने वाले पीए ने गच्चा दे दिया है। प्रदेश में सरकार थी, तो विधायक महोदय काफी प्रभावशाली थे। सरकार ने उनकी वरिष्ठता को ध्यान में रखकर निगम का दायित्व भी दे रखा था। विधायक ने अपने पीए को खुली छूट दे रखी थी। हाल यह था कि पीए का कथन विधायक का कथन माना जाता था। पीए ने भी विधायक की छूट का खूब लाभ उठाया, और जमकर माल बनाया। सरकार बदली, तो सबकुछ बदल गया।
विधायकी अब नहीं रह गई, निगम-मंडल में अनियमितता की जांच शुरू हो गई। पूर्व हो चुके विधायक ने भी हमसाए की तरह साथ रहने वाले पीए का साथ निभाया, और जांच-पड़ताल से बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। वे उसे मौलश्री विहार ले गए, और दिग्गज नेता से मिलवाया। अब जांच से घिरे पीए, कुछ दिन में ही दिग्गज नेता के करीबी हो गए।
बड़े नेता के संपर्क का पीए को पूरा लाभ मिल रहा है, और उन्हें जांच से कुछ हद तक राहत भी मिली हुई है। दिग्गज के करीबी रहे अफसरों से पीए का मेल जोल बढ़ा है। एक निलंबित पुलिस अफसर से तो पीए की अच्छी छन रही है। अब पूर्व विधायक का हाल यह है कि जब भी वे अपने पीए रहे अफसर को फोन लगाते हैं, तो कोई जवाब ही नहीं मिलता। कहावत है कि बुरे समय में साया भी साथ छोड़ जाता है, यह तो फिर भी...।
वैक्सीन और शराब वाला छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में कोरोना वैक्सीन लगाने की मुहिम पता नहीं सफल होगी या नहीं। जिस तरह से कोरोना रोग किस-किस तरह से फैल सकता है इस पर एक के बाद एक नई जानकारी और उसके हिसाब से गाइड लाइन आ रही थी, उसी तरह वैक्सीन को लेकर दिशा-निर्देश आ रहे हैं। हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज जब वैक्सीन की पहली खुराक लेने के बाद भी कोरोना संक्रमित हो गये तो डॉक्टरों ने सफाई दी कि वैक्सीन का असर दूसरा डोज लेने के बाद होता है। अब एक नई खबर आई है। भारत बायोटेक की दवा को-वैक्सीन लगवाने के बाद 14 दिन तक शराब से दूर रहना होगा। रूस में तैयार स्पूतनिक-वी का टीका लगवाने के बाद दो महीने शराब पीने की मनाही होगी। इसी तरह दूसरे टीकों के बारे में भी निर्देश है। अपने राज्य की बात करें तो यहां शराब की खपत बहुत ज्यादा है। जब कोरोना संक्रमण के चलते शराब दुकानों को मार्च-अप्रैल महीने में बंद रखा गया तो हाहाकार मच गया था। दो सफाई कर्मचारी सैनेटाइजर पीकर मर गये और इसी को आधार बनाकर दुकानें खोल दी गईं। यही नहीं होम डिलवरी भी शुरू कर दी गई। उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी इस दुनिया में थे उन्होंने कहा कि यही मौका है जब सरकार शराबबंदी के अपने वादे पर अमल कर सकती है।
सामाजिक अधिकारिता एवं न्याय मंत्रालय ने बीते साल एम्स की मदद से एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें बताया गया था कि देश में 15 फीसदी लोग शराब पीते हैं पर छत्तीसगढ़ में यह संख्या 35 फीसदी है। राज्य में सबसे ज्यादा बिक्री राजधानी रायपुर में होती है। 10 प्रतिशत कोरोना टैक्स लगने के बाद भी खपत कम नहीं हुई। यह पूरे देश में सबसे ज्यादा है। महाराष्ट्र और पंजाब भी इससे पीछे हैं। छत्तीसगढ़ में शराब से पिछले साल कमाई 4700 करोड़ रुपये दर्ज की गई थी। अब ऐसे राज्य में कोरोना की चेन तोडऩा चुनौती नहीं तो और क्या हो सकती है।
अहमियत लोक अदालतों की
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और राज्यभर की निचली अदालतों में शनिवार को लोक अदालतें लगीं। इनमें 5303 मामले निपटे। एक ही दिन में करीब 50 करोड़ रुपये के अवार्ड पारित किये गये। गंभीर किस्म के फौजदारी मामलों में जरूर सुलह की छूट नहीं है पर साधारण दीवानी, फौजदारी दोनों तरह के मामले इन अदालतों में सुलह के लिये लाये जा सकते हैं।
कोरोना काल के बाद रखी गई पहली नेशनल लोक अदालत में एक ही दिन पांच हजार से ज्यादा मामलों में सुलह होना बताता है कि लोग लम्बी कानूनी प्रक्रियाओं से बचना चाहते हैं। कोरोना महामारी के चलते वैसे भी महीनों तक अदालतों में कामकाज ठप पड़े हुए थे। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बात करें तो यहां कुल 74 हजार 600 से ज्यादा लम्बित मामले हैं। 15 हजार से ज्यादा केस ऐसे हैं जो 5 साल से ज्यादा पुराने हैं। निचली अदालतों में संख्या इससे कई गुना अधिक हो सकती है। अभी तक केवल जजों और विधिक सहायता प्राधिकरणों की कोशिशों से ये लोक अदालतें लगाई जाती रही हैं। यदि सामाजिक कार्यकर्ता, पुलिस और प्रशासन के स्तर पर भी कोशिश हो तो परिणाम और अच्छे मिल सकते हैं
किसान बिल पर ठंडा पानी
‘तेल की धार’ देख लेने के बाद अब यह तय है कि केन्द्र सरकार तीनों में से कोई भी बिल वापस नहीं लेने जा रही है। किसानों के थकने की प्रतीक्षा हो रही है, शाहीन बाग की तरह। भाजपा में एक बात बड़ी खास है कि वह अपने फैसलों को सही बताने के लिये सारी ताकत झोंक देती है। जीएसटी और नोटबंदी के मामले में ताबड़तोड़ सभाओं के बाद अब दूसरे राज्यों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में भी महापंचायतों का सिलसिला शुरू होने जा रहा है।
14 दिसम्बर को हर जिले में प्रेस कांफ्रेंस होगी, 15 को किसान महापंचायत और 16 दिसम्बर से सोशल मीडिया पर कैम्पेन शुरू होगा। किसान आंदोलन किसी एक के नेतृत्व में नहीं चल रहा है। केन्द्र सरकार यह बता रही है कि यह पंजाब, हरियाणा के किसानों का मुद्दा है। टीवी चैनल खालिस्तान समर्थक और देशद्रोह के आरोपियों की आंदोलन में घुसपैठ होने की बात कर ही रहे हैं। छत्तीसगढ़ के किसान संगठन कानून के खिलाफ तो हैं पर यहां प्रतिरोध का स्वर धीमा ही है। कांग्रेस ने साथ न दिया होता तो शायद भारत बंद भी यहां सफल नहीं होता। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि किसान धान बेचने में व्यस्त है। आम तौर पर किसानों की निर्भरता धान पर है, सोसाइटियां सशक्त हैं और सरकारी खरीद के प्रति आश्वस्त, संतुष्ट भी हैं।
इस बात आकलन करने की जरूरत उन्होंने महसूस नहीं की है कि कानून का असर छत्तीसगढ़ में कैसा होने वाला है। राज्य सरकार ने कृषि कानूनों को निष्प्रभावी बनाने के लिये विधानसभा का विशेष सत्र बनाकर नया बिल पारित किया है पर वह राज्यपाल के पास रुका है। छत्तीसगढ़ सरकार भी इस बिल के रुके रहने पर बेचैनी महसूस नहीं कर रही है। कार्पोरेट ने अभी केन्द्र के बिल को लेकर छत्तीसगढ़ में धावा नहीं बोला है, इसलिये सब निश्चिन्त दिखाई दे रहे हैं।
गौरव-मनिंदर का बदलाव जारी
आईएएस द्विवेदी दंपत्ति के इस सरकार में भी तीसरी-चौथी बार उनके प्रभार बदले गए हैं। कुछ दिन पहले हुए इस प्रशासनिक फेरबदल में दोनों के प्रभार बदले गए, तो फिर कानाफुसी शुरू हो गई। प्रमुख सचिव गौरव द्विवेदी सीएम सचिवालय से हटे, तो भी उन्हें पंचायत जैसे वजनदार महकमे का प्रभार दिया गया। दूसरी बात यह थी कि उन्हें मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रतिद्वंद्वी टी एस सिंहदेव के मंत्रालय भेजा गया। सीएम सचिवालय की नाजुक पोस्ट के बाद सीधे दुसरे खेमे में ! कुछ लोगों ने उस वक्त इस बात के लिए मुख्यमंत्री को आगाह भी किया था। और अब कुछ महीने के भीतर उन्हें बदला गया, तो चर्चा होना स्वाभाविक है।
पंचायत में गौरव के कामकाज को संतोषजनक आंका जा रहा था। फिर प्रभार क्यों बदला गया? अंदर की खबर यह है कि सीएम की फ्लैगशिप वाली नरवा योजना में अपेक्षाकृत प्रगति नहीं हो रही थी। विशेषकर वन विभाग के समन्वय के साथ जो काम होना चाहिए था, वह नहीं हो पा रहा था। चर्चा है कि सीएम ने कुछ दिन पहले प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन में देरी पर नाराजगी जताई थी। और बाद में उन्होंने फिर इसकी समीक्षा की, लेकिन स्थिति जस की तस रही। फिर क्या था, गौरव द्विवेदी पर ठीकरा फूट गया।
दूसरी तरफ, प्रमुख सचिव मनिंदर कौर द्विवेदी को पहले मंडी की जमीन ट्रांसफर में देरी पर पहले एपीसी से हटाया गया, और फिर अब जीएसटी के दायित्व से मुक्त कर दिया गया। इस बार मनिंदर के हटने के पीछे कमिश्नर रानू साहू से तालमेल न होना पाया गया। दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि जीएसटी का पूरा अमला परेशान था। एक एडिशनल कमिश्नर ने तो नौकरी से त्यागपत्र भी दे दिया है।
मनिंदर कौर द्विवेदी भी सिंहदेव के ही मातहत थीं। जीएसटी मंत्री टीएस सिंहदेव ने भी दोनों महिला अफसरों के बीच बेहतर समन्वय के लिए पहल भी की थी, लेकिन स्थिति नहीं बदली। ऊपर यह फीडबैक गया कि मनिंदर ज्यादा जिम्मेदार हैं । सीएम ने फैसले में देरी नहीं लगाई, और फिर उन्हें बदल दिया गया। ये अलग बात है कि जीएसटी का प्रभार मनिंदर से हटाकर गौरव को दे दिया गया, और रानू साहू को पर्यटन एमडी का अतिरिक्त दायित्व देकर उनका महत्व बढ़ाया गया।
मरकाम नाराज हैं या नहीं?
निगम-मंडलों में नियुक्ति को लेकर दूसरे दौर की चर्चा के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम बैठक अधूरी छोडक़र निकले, तो बाहर चर्चा शुरू हो गई। फिर कांग्रेस मीडिया विभाग के लोगों ने सफाई दी, कि मरकाम को अपने विधानसभा क्षेत्र कोंडागांव में जरूरी काम से जाना था, इसलिए अपनी बात पूरी कर निकल गए। मरकाम ने भी चुप्पी साध ली।
चर्चा यह है कि सीएम हाउस में दूसरे दिन की चर्चा में मरकाम अपनी तरफ से दो-तीन नाम जुड़वाना चाह रहे थे। उन्होंने अपनी बात मजबूती से रखी भी, लेकिन उनकी बात को महत्व नहीं मिला। लिहाजा, वे बैठक छोडक़र निकल गए। प्रभारी सचिव चंदन यादव ने रायपुर आते ही नाराजगी पर मरकाम से घर जाकर बात की है। दावा तो यह भी है कि सबकुछ ठीक-ठाक हो गया है। मगर वाकई ऐसा है, यह देखना है।
कांग्रेस, भाजपा का अनुशासन
2018 में छत्तीसगढ़ का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस से कम से कम मुख्यमंत्री पद के चार दावेदार थे। चुनाव अभियान के पहले भाजपा इस बात पर तंज कसती थी कि जिनकी पार्टी में सीएम पद के 6-6 दावेदार हों, वे सरकार कैसे चलायेंगे। बीता चुनाव भाजपा ने डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में लड़ा था और यदि परिणाम पक्ष में गये होते तो उन्हें बिना किसी असहमति के विधायक दल का नेता चुन लिया जाता। पूर्ववर्ती सरकार के दौरान आदिवासी नेतृत्व की जरूरत होने की बात भाजपा नेता नंदकुमार साय और ननकीराम कंवर ने कई बार रखी। इनके अलावा भी बीच-बीच में खबर उड़ती रहती थी कि डॉ. सिंह के खिलाफ असंतुष्ट विधायकों के बीच लॉबिंग हो रही है। लेकिन हुआ कुछ नहीं. रमन सिंह के दूसरे कार्यकाल में ही बृजमोहन अग्रवाल ने हथियार डाल दिए थे।
इधर कांग्रेस सरकार के दो साल पूरे होने वाले हैं और सवाल उछल गया कि क्या यहां ढाई-ढाई साल वाला फॉर्मूला अपनाया जायेगा? मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस सवाल पर पहले हाईकमान को सर्वोपरि बताया, फिर सरगुजा में साफ किया कि उनको 5 साल के लिये ही चुना गया है। भाजपा को तुरंत मौका मिला और सवाल दागे और संदेह जताया। पर कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही दौर में एक बात समान है, वह है अनुशासन की। सामने आकर अनुशासन तोड़ा नहीं जाता, हां मीडिया तक इस उम्मीद से बात पहुंचा दी जाती है कि वह पूछकर देखे और टटोलें क्या प्रतिक्रिया आती है। भूपेश के मुकाबले तेवर दिखाते टी एस सिंहदेव मीडिया के हर सवाल के जवाब में सुरसुरी छोडऩे से नहीं कतराते।
निगरानी दल पर निगरानी हो
धान खरीदी को लेकर किसानों की समस्या दूर होने का नाम नहीं ले रही है। पूरे प्रदेश से कई तरह की गड़बडिय़ों की खबरें आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या रकबे में कटौती की है। जिलों में निर्देश दिया गया कि गिरदावरी रिपोर्ट में गड़बड़ी की गई हो तो उसे दुरुस्त किया जाये। अब किसान धान बेचने के लिये टोकन लेने की कतार में खड़े हों, या तहसील, पटवारी दफ्तर के चक्कर लगायें। दावा किया गया था कि धान की तौल सही की जायेगी, ज्यादा नहीं लिया जायेगा लेकिन कई खरीदी केन्द्रों से 40 किलो की एक बोरी के पीछे दो-दो किलो अतिरिक्त लिये जा रहे हैं। खरीदी केन्द्रों से धान का परिवहन तीन दिन के भीतर होने की बात कही गई लेकिन कई केन्द्रों में उठाव नहीं करने के कारण खरीदी की गति धीमी कर दी गई है। जब से डॉयल 112 की सुविधा दी गई है सैकड़ों किसान शिकायत दर्ज करा चुके हैं।
राजनांदगांव की घटना के बाद कमिश्नर, कलेक्टर्स ने धान खरीदी केन्द्रों का भ्रमण बढ़ाया है और कुछ कर्मचारियों को हटाने, शो कॉज नोटिस जारी करने का काम भी किया है। पर, दूसरी तरफ कांग्रेस, भाजपा ने भी बड़ी तत्परता दिखाई है। कोई ब्लॉक नहीं छूट रहा जहां वे निगरानी समितियां नहीं बना रहे हों। जब इतनी निगरानी हो रही है तो गड़बडिय़ां रुक क्यों नहीं रही, इस पर भी निगरानी के लिये कोई टीम बनाने की जरूरत है।
पांच दशक पुराने संयंत्रों का ढहना
ऊर्जा नगरी कोरबा में निजी कम्पनियों सहित एनटीपीसी के पावर प्लांट हैं। पर 50 साल से भी ज्यादा पुराने छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कम्पनी के प्लांट की अलग ही पहचान रही है। लम्बे समय तक बिजली उत्पादन के कारण उपकरण जवाब दे गये थे। रूस से आयातित तकनीक से अब काम नहीं लिया जाता। यहां की 50-50 मेगावाट की दो इकाईयों को बंद किया जा चुका है, जिसका कबाड़ खुली नीलामी में 75 करोड़ में बिक गया। कम्पनी के करीब 450 कर्मचारियों को दूसरे संयंत्रों में शिफ्ट करने का दावा किया गया है लेकिन इनसे ज्यादा संख्या ठेका कर्मचारियों की है। 120-120 मेगावाट के दो प्लांट और हैं जिन्हें जल्दी बंद कर उनके स्क्रैप की भी नीलामी होगी। इनमें भी बड़ी संख्या में ठेका कर्मचारी काम करते हैं। इनका भी भविष्य अंधेरे में है। इन प्लांटों का आधुनिकीकरण करने की मांग कर्मचारी संगठनों ने की थी, जो पूरी होती तो शायद ठेके पर काम करने वालों का रोजगार नहीं छिनता। कोरोना संक्रमण के दौर में इन्हें कोई नया काम मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है।
अदानी-अम्बानी के बहिष्कार पर असमंजस
आंदोलनरत किसानों की तरफ से अपील की गई है कि अडानी-अम्बानी के सामानों का बहिष्कार करें। लोग पेशोपेश में हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या में जियो सिम हैं। इनमें से बहुत से तो पिछली सरकार के दौरान मुफ्त में बांटे गये थे। इन फोन्स की खासियत यह है कि इनमें कोई दूसरा सिम कार्ड काम नहीं करता। जिन्होंने सिर्फ सिम कार्ड लिये हैं उनके लिये भी अचानक पोर्टेबिलिटी कराना कम सिरदर्द काम नहीं है। अब वे लोग जिनके पास जियो का कोई भी सिम कार्ड नहीं है, कह सकते हैं- हम किसानों के हितैषी हैं। जियो केबल टीवी है पर जियो फाइबर अभी ठीक तरह से अपने प्रदेश में लांच नहीं हो पाया है।
रिलायंस के कुछ थोक और फलों के बाजार भी छत्तीसगढ़ में हैं, कुछ पेट्रोल पम्प भी हैं। लोगों को शुद्धता और मात्रा को लेकर सरकारी उपक्रमों से कहीं ज्यादा उन पर भरोसा रहा है। ज्यादातर खरीदी रोजमर्रा की खरीदी में नहीं है। तो बहिष्कार करने लायक अम्बानी के मामले में तो कुछ ज्यादा दिखाई नहीं देता। ऐसा ही कुछ अडाणी को लेकर भी है। सरगुजा व दूसरे जिलों में कुछ कोयला खदानों में उत्खनन का काम अडाणी के पास है उनके कोयले की खपत किस बिजलीघर में हो गई कुछ पता चलना है नहीं, इसलिये बिजली का बॉयकाट नहीं हो पायेगा।
कुछ प्रमुख राजमार्गों का निर्माण कार्य अडाणी की कम्पनी को मिला है। इन सडक़ों पर अडाणी का मालिकाना हक तो है नहीं। और इन दोनों कुबेरों के यहां काम करने वाले कर्मचारियों पर इस बहिष्कार का क्या असर पड़ेगा, यह भी सवाल है। किसानों के समर्थक होते हुए भी वे रोजगार के मौजूदा विपरीत हालात में उनकी नौकरी छोडऩे की हिम्मत नहीं जुटा पायेंगे। बहरहाल, किसान आंदोलन से सहानुभूति रखने वालों को बहिष्कार की बात में दम तो लगता है पर कोई रोडमैप नहीं होने के कारण भारी असमंजस की स्थिति है।
कर्ज की मंजूरी तो बरस रही है!

कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन हर बार यह घोषणा करते हैं कि टेलीफोन पर बैंक-ठगी से बचकर रहें। लेकिन ठग इतनी नई तरकीबें निकालते हैं कि लोग झांसे में आ ही जाते हैं। कुछ दिन पहले ही इसी जगह जालसाजों के आने वाले संदेश का एक नमूना दिया गया था, आज उनके दो और नमूने पेश हैं।

फोन पर मैसेज आते हैं कि आपका कर्ज मंजूर हो गया है, और उसमें लाख-दो लाख रूपए की रकम भी लिखी रहती है। अब जिन लोगों ने किसी कर्ज के लिए अर्जी दे रखी है, वे तो हड़बड़ी में उसे खोल ही लेंगे, और वहां से जालसाजी शुरू हो जाएगी, ठग आपको आगे फंसाते जाएंगे। यह बात याद रखें कि कर्ज आसानी से मंजूर नहीं होता है, और छोटे लोगों का कर्ज तो आसानी से और भी मंजूर नहीं होता है। इसलिए गुमनाम-बेनाम संदेशों में आए हुए लिंक खोलकर न देखें। झारखंड का एक गांव ऐसी ही साइबर-ठगी के लिए दुनिया भर में बदनाम है और लोगों को इस पर अभी नेटक्लिक्स पर आई टीवी सीरिज देखनी चाहिए जिसका नाम है जामताड़ा:सबका नंबर आएगा। भारत के किसी आईआईएम को इस गांव पर रिसर्च भी करना चाहिए कि कैसे एक छोटे से गांव में हर अनपढ़ इंसान भी जालसाज बनने की इतनी संभावना रखते हैं।
जमीन के गोरखधंधे में कितने हाथ रंगे?
कोरोना काल के बाद मरवाही चुनाव का बोझ, अब राजस्व मंत्री को कुछ फुर्सत मिली और तुरंत एक तहसीलदार पर गाज गिरी। बिल्हा के तहसीलदार ने अरबों की 26 एकड़ जमीन 6 लोगों के हवाले कर दी। आधार बनाया, हाईकोर्ट के दुर्ग जिले के मामले में आये फैसले को। इस फैसले में मोटे तौर यह था मालगुजारी के दौरान खरीदी गई जमीन को सरकारी दस्तावेजों से दुरुस्त कर उनके वारिसों के नाम पर चढ़ाया जाये। कोर्ट का फैसला एक प्रकरण विशेष पर था, प्रदेशभर के लिये कोई सामान्य निर्देश नहीं था। तहसीलदार सफाई देने में नहीं चूका पर एक्शन तुरंत हो गया। अब स्थिति यह है कि जिनके नाम पर जमीन चढ़ाई गई, उन्होंने और कई लोगों को वह जमीन बेच दी। मतलब सरकारी रिकॉर्ड में चढ़ाने की प्रक्रिया अब भी लम्बी है।
कोरोना काल के बाद लम्बित राजस्व मामलों की समीक्षा भी नहीं हो पाई है। सैकड़ों शिकायतें पड़ी हुई हैं। क्या रायपुर, क्या बिलासपुर, क्या बड़े मामले और क्या छोटे । पूर्ववर्ती सरकार में भदौरा सहित कई मामले चर्चा में थे। क्या गौचर और क्या तालाब। सरकारी जमीन की बंदरबांट जारी है। तहसीलदार तो एक मामूली प्यादा है। अचरज की बात नहीं कि एन्टी करप्शन ब्यूरो ने हाल ही में जो वाट्सअप और ई मेल पर भ्रष्टाचार की शिकायतें लेनी शुरू की है उनमें सर्वाधिक केस राजस्व के ही हैं।
शिक्षा सत्र भेंट चढऩे के कगार पर
राज्य सरकार ने अब तक संकेत नहीं दिया है कि स्कूलों को कब खोला जायेगा। हालांकि केन्द्र की ओर से कोई पाबंदी नहीं है। सरकारी स्कूल के शिक्षक मना रहे हैं कि कोरोना के नाम दिन जैसे-तैसे निकल जाये और अगले सत्र में पढ़ाई शुरू हो। सत्र का समापन की ओर बढऩा देखकर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को जितना रास आ रहा है निजी स्कूल प्रबंधकों की उतनी ही चिंता बढ़ती जा रही है। स्कूल फीस मारी जा रही है। इनकी तरफ से हाईकोर्ट में केस दायर किया गया और कुछ नियमों के बंदिश में बांधते हुए स्कूल फीस लेने की इजाजत भी मिल गई पर पालकों की तरफ से कई आपत्तियां हैं। उनका कहना है कि ट्यूशन फीस के नाम पर कई तरह की फीस जोड़ दी गई जो ऑनलाइन क्लासेस में नहीं लेनी चाहिये।
अब मामला डबल बेंच में सुना जा रहा है। पर इस पर निर्णय अभी आया नहीं है। फीस वसूली ढीली ही चल रही है।
मध्यप्रदेश में निजी स्कूलों के संचालक कुछ हिम्मती हैं। उन्होंने वहां सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि स्कूल बंद होने से 30 लाख परिवारों के रोजगार पर संकट आया है। पांच दिन के भीतर स्कूल खोलने का निर्णय नहीं लिया गया, तो मुख्यमंत्री का बंगला घेरेंगे। मगर, सौ टके की बात ये है कि छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश स्कूल खुलने के बाद भी पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिये राजी होंगे क्या?
ज्यादातर पालक तो अब भी बस, आटो रिक्शा में सफर और स्कूलों में पढ़ाई, खेल के दौरान सोशल डिस्टेंस को लेकर चिंतित है। अभी तो लोग कॉलेज भी खोलने को तैयार नहीं हैं। शायद यह सत्र ऑनलाइन पढ़ाई में ही गुजरे और कुछ जरूरी परीक्षाओं को छोडक़र शेष में जनरल प्रमोशन देने की स्थिति बने।
ड्रग्स में नाम कमाती राजधानी
मुम्बई में बॉलीवुड कलाकारों के ड्रग रैकेट से रिश्ते की तो देशभर में चर्चा हो रही है पर लगता है कि अपने प्रदेश की राजधानी के भी मशहूर होने में देर नहीं है। जो ताजा मामला सामने आया है वह चौंकाने वाला है क्योंकि अभियुक्त ऐसे परिवार से जुड़ा है जिसे नशे के खिलाफ मुहिम चलाने के नाम पर जाना जाता है। रायपुर की देश के महानगरों से सीधी हवाई सेवा है, जिसके चलते तस्करी आसान हो गई है। युवाओं का एक वर्ग है जिनके पास उल्टे-सीधे खर्च के लिये ढेर सारे पैसे हैं।
सोचनीय स्थिति यह है कि ड्रग सेवन स्टेटस सिम्बॉल बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर ड्रग्स की तस्वीरें डालना इस बात का उदाहरण है। गांजा जैसा सस्ता नशा ही नहीं, कोकीन जैसी महंगी नशीली वस्तुओं का कारोबार हो रहा है। रायपुर पुलिस ने अब तक जिन 18 लोगों को गिरफ्तार किया है उनमें लड़कियां भी हैं। सामाजिक और राजनैतिक पकड़ रखने वाले भी। समझ में यह बात आती है कि केवल पुलिस की कार्रवाई से इस पर लगाम नहीं लगने वाली है, पर युवाओं में जागरूकता लाने के लिये कुछ मनोवैज्ञानिक तरीके भी अपनाने पड़ेंगे।
यात्री रेल कब अपनी रफ्तार पकड़ेगी?
अब जबकि सभी तरह की परिवहन सेवायें शुरू की जा चुकी हैं, रेलवे ने अब तक यात्री ट्रेनों के नियमित संचालन का कोई निर्णय नहीं लिया है। ट्रेनें चल रही हैं और केवल कन्फर्म टिकटों पर ही यात्रा की इजाजत है। टिकटों की कालाबाजारी इस हद तक हो रही है कि रायपुर में कल चीफ रिजर्वेशन सुपरवाइजर सहित सात लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा है। कोरोना के नाम पर दी जाने वाली सभी तरह की रियायतें रेलवे ने बंद कर दी है। इधर, प्रीमियम राशि भी अधिकांश ट्रेनों में स्पेशल के नाम पर वसूल की जा रही है।
रेलवे अपनी टिकटों में लिखा करता है कि यात्री भाड़ा उसके लिये बोझ है, नुकसान उठाना पड़ता है। बकायदा टिकटों में यह प्रिंट होता है। दूसरी तरफ हर पखवाडे एक प्रेस रिलीज रेलवे की जारी हो रही है जिसमें यह बताया जा रहा है कि माल भाड़े में उसे पिछले साल के मुकाबले ज्यादा मुनाफा हो रहा है। बीते एक दिसम्बर को ही बताया गया कि एक अप्रैल 2020 से 30 नवंबर 2020 के बीच 22 हजार 610 टन पार्सल लोडिंग की गई जो एक रिकॉर्ड है। यात्री ट्रेनों के बंद होने केवल पैसेंजर ही नहीं, कुली, खोचमा, जूते चमकाने वाले, रिक्शा चलाने वाले, सबके पेट पर चोट पहुंची है। जो ट्रेनें रेलवे चला रही है उनमें दो गज दूरी का कोई नियम लागू नहीं है। सभी सीटें बुक हो रही हैं। लोग सटकर बैठ रहे हैं। इसका साफ मतलब है कि यात्री ट्रेनों को बंद रखना कोरोना की वजह से तो नहीं है। कहीं रेलवे धीरे-धीरे यात्री ट्रेनों के संचालन से हाथ तो नहीं खींच रहा?
बीजेपी का 1000 दिन का टारगेट
छत्तीसगढ़ न राजस्थान है और न ही मध्यप्रदेश। सत्ता परिवर्तन की कोई गुंजाइश यहां दिखाई नहीं दे रही है। न तो यहां सत्ता पक्ष की तरफ से किसी विधायक का असंतोष सुलग रहा है न ही वादाखिलाफी जैसे कारण सामने आ रहे हैं। भाजपा भी मानकर चल रही है कि हार-जीत का फासला बीते चुनाव में इतना बड़ा रहा कि कांग्रेस की सरकार पांच साल चलेगी। सन् 2023 में जब आम चुनाव होंगे, तभी सत्ता परिवर्तन की उम्मीद है।
इसके लिये अभी से भाजपा ने मेहनत शुरू कर दी है। हाल के उप-चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रह सका। इधर भूपेश बघेल सरकार के दो साल पूरे होने जा रहे हैं। एक विपक्षी दल होने के नाते अब सरकार के खिलाफ मुद्दों को उठाना भाजपा के लिये जरूरी है। मगर नतीजा आ गया विपरीत। प्रदेश भाजपा की नव नियुक्त प्रभारी डी. पुरन्देश्वरी ने भी कहा है कि तीन साल बाद सरकार बनने से कम कुछ नहीं चाहिये। प्रभारी ने कह दिया है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करें और यह कई जिलों में शुरू हो भी गया है। उनका दो दिन का रायपुर, बिलासपुर प्रवास कितना कामयाब रहा, यह आगे मालूम होगा।
भाजपा के हारे प्रत्याशी अब भी नाराज
भाजपा की नवनियुक्त प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने विधानसभा के पराजित प्रत्याशियों की बैठक बुलाई, तो उनमें खुशी की लहर दौड़ पड़ी। राजनांदगांव जिले के कुछ पराजित प्रत्याशियों ने तो बकायदा भितरघातियों की सूची भी तैयार कर ली थी, जो कि अभी भी पार्टी में प्रभावशाली हैं। लेकिन बाद में उन्हें यह बताया गया कि पराजित प्रत्याशियों के साथ ही विजयी प्रत्याशी अर्थात मौजूदा विधायक भी रहेंगे, तो वे थोड़े मायूस हो गए। थोड़ी देर बाद पार्टी दफ्तर से पराजित प्रत्याशियों के पास फोन आया कि भाई साब आए हुए हैं, आप लोग बैठक के बाद उनसे मिल सकते हैं। इसके बाद तो ज्यादातर हारे हुए प्रत्याशियों ने शिकवा-शिकायत का इरादा ही बदल दिया।
प्रत्याशियों की बैठक का नजारा एकदम अलग था। सुनते हैं कि हारे प्रत्याशियों को उम्मीद थी कि उनसे हार के कारणों की पूछताछ होगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। उन्हें बैठक शुरू होते ही प्रोफार्मा दे दिया गया। जिसमें अपना नाम, विधानसभा क्षेत्र और जिले का नाम भरना था। और उन्हें प्रदेश सरकार के खिलाफ उनके इलाके में मुद्दों का भी ब्यौरा देना था। बैठक में मंच में अतिथियों ने अपनी बातें कही, और फिर बैठक खत्म होने से पहले प्रत्याशियों से प्रोफार्मा भरवाकर वापस ले लिए। चर्चा है कि पुरंदेश्वरी ने ताड़ लिया कि पराजित प्रत्याशियों में काफी नाराजगी है, लेकिन वे अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं। उन्होंने यह कहकर उन्हें आश्वस्त किया कि जल्द ही वे जिले और मंडल तक का दौरा करेंगी, और उनकी बात सुनेंगी। पुरंदेश्वरी की बात सुनकर पराजित प्रत्याशी संतुष्ट होकर रवाना हुए।
कंवर का लेटर बम
भाजपा प्रभारी और सह प्रभारी के दौरे के बीच असंतुष्टों ने ननकीराम कंवर का लेटर बम फोड़ दिया। चर्चा है कि अगर असंतुष्ट नेताओं को खुलकर बोलने का दिया जाता, तो शायद अमित शाह को लिखा यह पत्र लीक नहीं होता। तीन साल पुराने इस पत्र में दिग्गज आदिवासी नेता ने रमन सरकार में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आतंकवाद का खुलकर जिक्र किया था। उन्होंने यह भी लिखा था कि समय रहते इसको नियंत्रित नहीं किया गया, तो विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मीडिया के माध्यम से यह पत्र पुरंदेश्वरी और सह प्रभारी नितिन नवीन तक पहुंचाकर असंतुष्ट नेताओं ने एक तरह से अपनी बातें रख दी है। अब जहां तक पत्र लिखने वाले ननकीराम कंवर का सवाल है, तो वे यह मान रहे हैं कि अमित शाह को पत्र लिखकर सारी जानकारी पहले ही दे दी थी। देखना है कि पत्र लीक होने के मामले में कंवर से पार्टी पूछताछ करती है अथवा नहीं।
जंगल में प्रमोशन का पेंच
वन विभाग में पीसीसीएफ के खाली पद पर पदोन्नति के पेंच को सुलझाने की कोशिश चल रही है। वर्तमान में पीसीसीएफ के 4 पद हैं। पिछली सरकार के प्रस्ताव पर केन्द्र ने दो अतिरिक्त पदों को सीमित अवधि के लिए मंजूरी दी थी। अतिरिक्त पदों पर पदोन्नति भी हो गई। और अब जब पीसीसीएफ के रिक्त पद पर पदोन्नति की फाइल चली, तो सीएम ने तो कह दिया कि सिर्फ प्रमोशन के लिए अतिरिक्त पद बढ़ाने की जरूरत नहीं है।
पीसीसीएफ के स्वीकृत 4 पदों में मुदित कुमार सिंह, राकेश चतुर्वेदी, अतुल शुक्ला, संजय शुक्ला पदस्थ थे। मुदित सिंह डीजी सीजी कास्ट बने, तो रिक्त पद पर नरसिम्हराव पीसीसीएफ हो गए। अतिरिक्त पद पर पीसी पाण्डेय और देवाशीष दास पदोन्नति पा गए। अब देवाशीष दास रिटायर हुए, तो सीनियर एपीसीएफ जेईसी राव की पदोन्नति पर चर्चा हुई, लेकिन सीएम का रूख देखकर फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही थी।
सुनते हैं कि वन विभाग ने अब पदोन्नति से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए नया प्रस्ताव दिया है कि जिसमें कहा गया कि केन्द्र सरकार ने पीसीसीएफ के दो अतिरिक्त पदों को अक्टूबर-2021 तक के लिए मंजूरी दी थी। इसलिए देवाशीष दास की जगह जेईसी राव को पदोन्नत किया जा सकता है। वैसे भी राव जुलाई में रिटायर होने वाले हैं। अक्टूबर के बाद अतिरिक्त पदों पर पदोन्नति नहीं होगी, और ये पद स्वमेव खत्म हो जाएंगे। उम्मीद है कि वन विभाग के नए प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाएगी।
साय की अनदेखी?
दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय भाजपा की मुख्य धारा में लौटना चाहते हैं। मगर उनके विरोधी ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं। कम से कम साय के करीबी समर्थक तो ऐसा ही मानते हैं। साय को जब प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली, तो इन चर्चाओं को बल मिला।
हालांकि संगठन के नेताओं का तर्क है कि सायजी प्रदेश के पदाधिकारी नहीं हैं, इसलिए उन्हें बैठक में नहीं बुलाया गया। मगर इसका कोई जवाब नहीं है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी नंदकुमार साय की तरह कार्यसमिति के सदस्य हैं, लेकिन वे मंच पर बैठे थे। जबकि पार्टी के सबसे सीनियर नेता होने के नाते साय हर बैठक के लिए पात्रता रखते हैं। खुद साय नई प्रभारी की मौजूदगी में पार्टी की बैठकों को लेकर काफी उत्साहित थे।
वे सुबह से तैयार होकर नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पहुंच गए थे। वहां पुरंदेश्वरी को अपना परिचय दिया। पुरंदेश्वरी ने भी उनकी वरिष्ठता जानकर साय का पूरे सम्मान के साथ अभिवादन किया। नंदकुमार साय अविभाजित मप्र भाजपा के दो बार अध्यक्ष रहे।
राज्य बनने के बाद नेता प्रतिपक्ष बने। वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ भाजपा की कोर ग्रुप के सदस्य भी रहे, लेकिन अजजा आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कोर ग्रुप से बाहर हो गए। अध्यक्ष पद से हटने के बाद उन्हें दोबारा कोर ग्रुप में नहीं लिया गया। बैठक में नहीं बुलाने से साय नाखुश बताए जा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि दिग्गज आदिवासी नेता की उपेक्षा पार्टी को भारी पड़ सकती है। मगर एक बात साफ है कि सत्ता जाने के बाद भी पार्टी में गुटबाजी पर लगाम नहीं लग पाया है।
मैंने काफी बरसों पहले पढ़ा था
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय
अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है-
ढाई अक्षर के ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि
ढाई अक्षर के विष्णु और ढाई अक्षर के लक्ष्मी
ढाई अक्षर के कृष्ण और ढाई अक्षर की कान्ता।
(राधा रानी का दूसरा नाम)
ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति
ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति
ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान
ढाई अक्षर की तुष्टि और ढाई अक्षर की इच्छा
ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म
ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा
ढाई अक्षर का ग्रन्थ और ढाई अक्षर का सन्त
ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ
ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर की मिथ्या
ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि
ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड
ढाई अक्षर का मंत्र और ढाई अक्षर का यंत्र
ढाई अक्षर की श्वांस और ढाई अक्षर के प्राण
ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु
ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी
ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर का युद्ध
ढाई अक्षर का मित्र और ढाई अक्षर का शत्रु
ढाई अक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर की घृणा
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।
हैं ढाई अक्षर ही वक्त में और ढाई अक्षर ही अंत में।
समझ न पाया कोई भी है रहस्य क्या ढाई अक्षर में।
चंदा या सहयोग राशि
कोई भी रसीद लेकर निकलता है तो उसमें चंदे की रकम है, नहीं लिखा जाता, सहयोग राशि ही लिखा होता है। इसलिये पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ठीक कहते हैं कि राम मंदिर के लिये चंदा नहीं लिया जा रहा है, सहयोग राशि ली जा रही है। उन्होंने इसे सीधे सीधे राम पर आस्था से भी जोड़ दिया है। जिनको राम में आस्था है वह चंदा देगा। जिन्होंने चंदा नहीं दिया क्या उनके बारे में क्या समझा जायेगा कि वह राम में आस्था नहीं है?
डॉ. सिंह की यह प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उस बयान पर आई है जिसमें उन्होंने कहा कि भाजपा चंदा लेने वाली पार्टी है। इसी मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. टीएस सिंहदेव का बयान भी गौर करने के लायक है। उन्होंने कहा कि अगर चंदा लेते हैं तो उसका हिसाब भी दिया जाये।
अब कौन सी समिति चंदा देने वालों को हिसाब देती है? राम मंदिर आंदोलन की शुरू हुआ तब भी लोगों से चंदा (सहयोग राशि) लिया गया था। कई बार लोगों ने आवाज उठाई कि उसका हिसाब तो दें। पर अब वह पुरानी बात हो गई। बहुत से लोग भूल चुके होंगे। डॉ. सिंह का कहना है कि सिंहदेव अपनी जेब संभालकर रखें, यह नहीं कहा कि पाई-पाई का हिसाब देंगे। आस्था का सवाल है, इसमें हिसाब मांगना क्या जायज है?
समर्थन मूल्य से कम पर बेचने की मजबूरी
धान की फसल के अलावा भी कई अन्य उपज हैं जिनका समर्थन मूल्य निर्धारित है, जैसे मक्का। इसकी सरकारी खरीद दर 1850 रुपये है। पर लोग इसे लोग सरकारी खरीदी केन्द्र में बेचने की जगह व्यापारियों के हाथों बेच रहे हैं। वजह बताई जा रही है पंजीयन में आने वाली दिक्कतें।
मक्के या दूसरी किसी फसल के लिये पंजीयन कराने के लिये भी धान की ही तरह कई दस्तावेज लगते हैं। जैसे ऋण पुस्तिका, आधार कार्ड, रकबे के सत्यापन के लिये भूमि के कागजों की प्रतिलिपि। बस्तर के कोंडागांव जिले में कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार करीब 31 हजार हेक्टेयर में मक्का बोया गया है पर इसके लिये सोसाइटियों में करीब 4 हजार हेक्टेयर का ही पंजीयन कराया गया।
व्यापारी समर्थन मूल्य से 5-6 सौ रुपये कम दाम दे रहे हैं पर तुरंत नगद भुगतान कर रहे हैं और वे कोई दस्तावेज भी किसानों से नहीं मांग रहे। इस परिस्थिति को किसान आंदोलन के संदर्भ में समझना जरूरी है। एमएसपी और सरकारी खरीद रहे, साथ ही सरकारी खरीदी आसान भी हो, भुगतान भी जल्दी हो। अभी तो किसानों के खाते में धान का पैसा आ रहा है पर एकमुश्त बड़ी रकम निकालने की छूट नहीं है।
कोरोना लैब में जब केक कटा
कोरोना महामारी से नियंत्रण में जुटे डॉक्टर, नर्सों और टेक्नीशियन की टीम पर काम का बड़ा दबाव है। सरकार की तरफ से उन्हें टेस्ट की संख्या बढ़ाने का निर्देश है जिसके लिये दिन-रात काम करना पड़ता है। बहुत से ऐसे डॉक्टर्स और स्टाफ की खबरें आई हैं कि उन्होंने कई महीनों से कोई छुट्टी नहीं ली। उनके परिवार के दूसरे सदस्यों को कोरोना हुआ तब भी ड्यूटी करते रहे। यहां तक कि करीबियों की मौत के बाद भी।
ऐसे में ऊर्जा बनाकर, माहौल खुशनुमा बनाये रखने के लिये कुछ-कुछ करना पड़ता है। यही वजह है कि सिम्स बिलासपुर में जब आरटीपीसीआर टेस्ट ने 50 हजार की संख्या को छुआ तो उसे स्टाफ ने जश्न की तरह मनाया। केक काटा और डांस कर एक दूसरे को बधाई दी। अब उन्होंने एक लाख टेस्ट का आंकड़ा छूने का इरादा बनाया है। कोरोना का सबसे बुरा दौर शायद बीत चुका है पर इसे पूरी तरह खत्म करने के लिये चिकित्सा कर्मियों में जोश बनाये रखना जरूरी है।
मंडल का काम क्या?
एनआरडीए में भरा पूरा स्टॉफ है। मगर ज्यादातर के पास कोई काम नहीं है। बजट नहीं होने के कारण तकरीबन सभी काम बंद पड़े हैं। सीएम-मंत्रियों के बंगलों का निर्माण कार्य जरूर चल रहा है, लेकिन ये काम भी पीडब्ल्यूडी के मार्फत हो रहे हैं। एनआरडीए में चार डिप्टी कलेक्टर, दो नायब तहसीलदार, एक तहसीलदार सहित कई अफसर पदस्थ हैं। और अब आरपी मंडल की चेयरमैन और आईएएस कुलदीप शर्मा की एडिशनल सीईओ के पद पर पोस्टिंग हो गई है। मंडल ने चेयरमैन का काम संभाला, तो अफसरों से वन-टू-वन चर्चा की। उनसे कामकाज को लेकर पूछताछ की, तो पाया कि ज्यादातर लोग खाली बैठे रहते हैं।
मंडल ने सभी से कामकाज को लेकर प्लान मांगा है। सुनते हैं कि ज्यादातर अफसरों ने निजी कारणों से रायपुर में रहने की चाह में एनआरडीए में पोस्टिंग करा ली है। अब उन्हें अपने लायक काम ढूंढने के लिए माथापच्ची करनी पड़ रही है।
कुछ इसी तरह का हाल मानवाधिकार आयोग का भी रहा है। कोई अफसर फील्ड में जाना नहीं चाहते हैं, तो वे आयोग में पोस्टिंग करा लेते थे। मगर एनआरडीए की बात अलग है। मंडल अपने निर्माण कार्यों को अमलीजामा जाने जाते हैं। देखना है कि वे वहां कार्य संस्कृति में बदलाव ला पाते हैं, अथवा नहीं। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि सरकार एक मुर्दा शहर को जिंदा करने के लिए वेंटीलेटर पर कितना खर्च करेगी? कहाँ से करेगी?
कुल मिलाकर नया रायपुर एक सफेद हाथी हो गया है, सरकार के पास न उसे खिलाने को पैसा है, न उसकी लीद उठाने को, और न उसे नहलाने को। हाँ, मंडल के जिम्मे नया रायपुर की जमीनें रियायती रेट पर बेचने का जिम्मा जरूर है।
युवा नेता का बड़बोलापन !
भाजपा के एक मोर्चा के मुखिया बनाए गए युवा नेता के बड़बोलेपन से पार्टी के बड़े नेता परेशान हो गए हैं। इस युवा नेता ने पदभार संभालने के बाद से पार्टी नेताओं के बीच अनौपचारिक चर्चा में बोलना शुरू कर दिया कि पार्टी को सत्ता में लाने की जिम्मेदारी मेरी है। युवा नेता ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि वे रायपुर ग्रामीण से चुनाव लड़ेंगे, और सरकार में मंत्री भी बनेंगे।
दरअसल, नया दायित्व संभालने के बाद युवा नेता का जगह-जगह स्वागत हो रहा है। भिलाई में तो इतना स्वागत हुआ कि शायद ही किसी जनप्रतिनिधि का वहां हुआ हो। इतना स्वागत देखकर किसी का भी बौराना स्वाभाविक है। वैसे तो यह युवा नेता कुछ समय पहले तक वार्ड स्तर का कार्यकर्ता रहा है, लेकिन जाति समीकरण को ध्यान में रखकर पार्टी ने एकाएक ऊंचे पद पर बिठा दिया। अब पद पाने के बाद युवा नेता अपनी हसरत जाहिर कर रहे हैं, तो पार्टी के लोग ही बेचैन हो रहे हैं।
पेयजल की बर्बादी रोकने संजीदा कौन
पिछले साल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए नेशलन ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) को यह सुनिश्चित करने कहा कि वह पेयजल की बर्बादी रोकने के लिये जरूरी कदम उठाये। इसमें पांच साल की सजा और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा भी तय की गई। इस दायरे में औद्योगिक, व्यापारिक, शासकीय निजी संस्थान ही नहीं, आम नागरिक भी शामिल हैं। प्राधिकरण ने इस साल 15 अक्टूबर को राज्यों को पत्र भेजा और अब हाल ही में राज्य सरकार की ओर से नगर निगमों, नगरपालिकाओं को पत्र भेजा गया है। कई उद्योगों को नोटिस जारी की गई है और उनसे जवाब मांगा गया है। नगरीय निकायों के अलावा जल संसाधन विभाग को भी इसकी जिम्मेदारी दी गई है।
पीने के पानी के दुरुपयोग में उद्योग और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के अलावा आम लोग भी गंभीर नहीं हैं। छोटी-बड़ी गाडिय़ों की धुलाई, गेट के सामने छिडक़ाव कई लोगों का नियमित काम है। कड़ाई बरती जायेगी तो जगह-जगह खुली कार-वॉश की दुकानें भी इस कानून के दायरे में आ जायेंगी। कुछ महानगरों में तो इस बर्बादी पर जुर्माने और सजा का प्रावधान पहले से ही किया जा चुका है।
अपने यहां पाइप लाइन में लीकेज के मामले अक्सर आते हैं। कई बार हफ्तों, महीनों सुधार नहीं होता। हर साल गर्मी में रायपुर सहित शहरों के अनेक मोहल्लों में पानी जबरदस्त किल्लत हो जाती है और टैंकरों से सप्लाई की जाती है। जैसे ही संकट दूर होता है लोग तकलीफ भूल जाते हैं और अपने ढर्रे पर वापस आ जाते हैं। जिन नगरीय निकायों को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी दी गई है, उनके स्तर पर देखा गया है सार्वजनिक नलों की टोटियां टूटी पड़ी रहती हैं और टैंक के खाली होने तक पानी बहता रहता है। आदेश को दो महीने होने के आये अब तक तो कोई बड़ी कार्रवाई हुई नहीं, लगता नहीं कि नगरीय निकाय कड़ाई बरत पायेंगे। हां, लोगों में समझदारी बढ़े और अपनी आदत खुद बदलें तो ही बात बन सकती है।
सीएम की घोषणा से किसानों ने ली ठंडी सांस
मुख्यमंत्री ने कल दो घोषणायें की वे किसानों को बड़ी राहत पहुंचाने वाली हैं । जशपुर में उन्होंने धान खरीदी केन्द्रों का निरीक्षण करने के बाद घोषणा की कि इस साल के धान का भी 2500 रुपये क्विंटल की दर से भुगतान किया जायेगा। अभी केन्द्र द्वारा तय समर्थन मूल्य मिल रहा है पर बाद में शेष राशि राजीव किसान न्याय योजना के तहत दी जायेगी। उन्होंने यह भी बताया कि इसकी पहली किश्त मई 2021 में मिलेगी।
विपक्ष की ओर से इस बारे में बार-बार सवाल उठ रहे थे, किसानों के मन में भी संशय था। इसके अतिरिक्त उन्होंने कल ही कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि जहां भी गिरदावरी रिपोर्ट गलत बनी है, यानि किसान का वास्तविक रकबा कम्प्यूटर में नहीं दिख रहा है उनमें सुधार किया जाये ताकि किसान अपनी पूरा उपज बेच सकें। साफ है कि कोंडागांव में धान नहीं बेच पाने के चलते एक किसान ने आत्महत्या की थी जिसके चलते इस समस्या की ओर सरकार का ध्यान गया। भले ही पहले से ही प्रदेशभर से शिकायतें आ रही थीं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को निगरानी का काम तो सौंपा गया है ही, उम्मीद कर सकते हैं कि जमीनी स्तर पर इस आदेश का अमल ठीक तरह हो, वे यह देखेंगे।
पुलिस का बचाव और लगाव
गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू का अपने विभाग के अफसरों का बचाव करने के मामले में कोई जवाब नहीं, भले ही इसके लिये उन्हें अपने ही दल के विधायक की खिंचाई करनी पड़ जाये। मीडिया ने उनके बिलासपुर प्रवास के दौरान सवाल किया कि विधायक शैलेष पांडे ने पुलिस में भ्रष्टाचार होने का सार्वजनिक मंच से आरोप लगाया था और थानों में रेट लिस्ट टांगने का सुझाव दिया था। उस पर क्या हुआ? मंत्री जी ने कहा उन्होंने मुझसे लिखित शिकायत ही नहीं की, मौखिक भी कुछ नहीं कहा। आगे यह भी कह गये कि ऐसा (गंभीर) आरोप तो प्रदेश के भाजपा सहित प्रदेश के 90 विधायकों में से किसी ने नहीं लगाया। बाद में पांडे ने इसके जवाब में कहा कि मैं शहर का विधायक हूं। क्या मौखिक और क्या लिखित, मंच से सार्वजनिक रूप से आरोप लगा दिया है, क्या जांच के लिये यह काफी नहीं?
मंत्री से दूसरा सवाल लाठी चार्ज मामले की जांच अब तक पूरी नहीं होने पर था। कांग्रेस का आरोप था कि यह कार्रवाई डीएसपी (अब एडिशनल) के इशारे पर हुई। उन्हें बहाल भी किया गया और अच्छी पोस्टिंग भी मिल गई। क्यों इतना लगाव है उनसे? मंत्री जी ने कहा- लगाव तो प्रत्येक स्टाफ से है। जांच क्यों पूरी नहीं हुई, समीक्षा करेंगे। कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता मंत्री के इस रुख से हैरान हैं, खासकर लाठी खाने वाले।
अब मरवाही के कांग्रेसी भिड़े अफसरों से
सत्ता से जुड़े जिला और ब्लॉक स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की आये दिन नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। ऩई घटना छत्तीसगढ़ की हॉट सीट मरवाही से जुड़ी है। पेन्ड्रा नगर पंचायत में तीन एल्डरमेन नियुक्त किये गये हैं। इनको शुक्रवार को एसडीएम शपथ दिलाने वाले थे। वे वहां पहुंचे तो पता चला तीनों एल्डरमेन समारोह का बहिष्कार कर बाहर निकल गये हैं।
पता चला, एल्डरमेन इस बात से नाराज थे कि मरवाही विधायक डॉ. के. के. ध्रुव और जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मनोज गुप्ता को समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया। सीएमओ का तर्क था कि यह नगर पंचायत का कार्यक्रम है, सभी पार्षदों को तो बुलाया गया है। एल्डरमेन नहीं माने। उन्होंने शपथ लेने से मना कर दिया। उन्हें यह भी लगा कि एक खास गुट की बातों में आकर सीएमओ ने ऐसा किया।
अब तय हुआ है कि एल्डरमेन एक बड़े समारोह में शपथ लेंगे जिसमें विधायक, जिला कांग्रेस के अध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारी भी शामिल होंगे। याद होगा कि दो दिन पहले ही बिल्हा में कांग्रेस के नेता एक कार्यक्रम के दौरान कृषि विभाग के अधिकारियों पर बरस पड़े थे। यहां मुख्य अतिथि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक थे। तीन घंटे तक कार्यक्रम रुका रहा। दुबारा तब शुरू हो सका जब सीएम का फोटो लगा नया पोस्टर बनकर आया।
प्रदेशभर में बड़ी भीड़ है, सत्ता से जुड़े कार्यकर्ताओं की। अधिकारी पेशोपेश में चल रहे हैं। किसे सुनें, किसकी न सुनें। इसलिये अपने मन की करते हैं और वहां भी फंस जाते हैं।
धान खरीदी निगरानी वाले कहां थे?
राजनीति करनी है तो धान खरीदी एक उत्सव की तरह है। कोई भी दल पीछे नहीं है खरीदी केन्द्रों में पहुंचकर अपनी तस्वीरें खिंचाने में। निगरानी समितियां बनाई गई है। जिलों के अधिकारी भी इस बड़े काम में व्यस्त होने का हवाला देते हुए दफ्तरों में कम दिखाई दे रहे हैं। लगभग छोटी-बड़ी सभी पार्टियों ने निगरानी समितियां बना डाली हैं जिनका दावा है कि वे बिक्री के दौरान किसानों को आने वाली दिक्कतों को दूर करेंगे।
चौतरफा सब के सब किसानों की मदद करने के लिये तैयार बैठे हैं, फिर कोंडागांव में किसान धनीराम ने आत्महत्या क्यों कर ली? वह कोई छोटा किसान नहीं था, 6.7 एकड़ जमीन पर उसने धान लिया। 100 क्विंटल बेचने की तैयारी की थी, पर सॉफ्टवेयर में ऐसी गड़बड़ी हुई कि उसे सिर्फ 11 क्विंटल धान बेचने की इजाजत मिली। प्रशासन ने खुदकुशी के तुरंत बाद तेजी से जांच कर निष्कर्ष निकाल लिया कि दो साल पहले किसान के बेटे ने आत्महत्या की थी, इसलिये वह परेशानी में नशा करने लगा था, पेड़ पर चढक़र फांसी लगा ली।
जब ऐसा ही सच है तो पटवारी को कल सस्पेंड क्यों कर दिया गया, जिस पर आरोप लगाया गया है कि उसने गलत गिरदावरी रिपोर्ट बनाई। जिस तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी की गई है उसने कम से कम यह तो बताया कि रिपोर्ट गलत बन गई थी। पर किसान ने शिकायत किसी से नहीं की, इसलिये उसे मदद नहीं दी जा सकी।
खेती के रकबे की गलत इंट्री होने की दर्जनों शिकायतें आ रही हैं। पीडि़त किसान और सरकार के बीच इतनी दूरी कि वह शिकायत करने की जगह मौत का रास्ता चुने? इस घटना के बाद तो पूरे कोंडागांव जिले के किसानों की शिकायत दूर करने के लिये तीन दिन का अभियान शुरू किया गया है, पर बाकी जिलों का क्या? हर जगह से शिकायतें हैं। इस बार भी रिकॉर्ड धान खरीदी होने जा रही है। वास्तविक किसान यदि इस तरह परेशान हैं तो आखिर यह रिकॉर्ड किनके बूते बनाया जा रहा है?
नेटवर्क में पीछे पर ऑनलाइन पढ़ाई में आगे
सरकारी स्कूलों के बंद होने के चलते गरियाबंद जिले में भी पढ़ाई तुम्हर द्वार योजना बाकी जिलों की तरह चल रही है। यदि विभाग के आंकड़ों पर भरोसा किया जाये तो ऑनलाइन पढ़ाई के लिये यहां से करीब 4100 शिक्षक और 72 हजार विद्यार्थियों ने पंजीयन कराया। जहां नेटवर्क की समस्या है वहां करीब एक हजार नियमित शिक्षक जाकर खुले में क्लास ले रहे हैं। 1400 जगहों पर मोहल्ला क्लासेस चल रही हैं। लाउडस्पीकर से करीब 90 जगह पढ़ाई हो रही है और ब्लू ट्रूथ से लोड होने वाली पाठ्यसामग्री की संख्या 70 हजार से ऊपर है। यह जिला कोरोनो काल में वैकल्पिक पढ़ाई के लिये की गई व्यवस्था में अव्वल है।
वैसे ऑनलाइन पढ़ाई में उन शहरों, जिलों को सफलता ज्यादा मिलनी चाहिये जहां नेटवर्क और रोड कनेक्टिविटी दोनों अच्छी है। पाठ्यक्रम अपलोड करने, ऑनलाइन क्लास लेने में की वहां ज्यादा सुविधा है। पर रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर जैसी जगहों से ज्यादा अच्छा काम वनों से आच्छादित गरियाबंद जिले का सामने आया है। मैदानी इलाके के अधिकारी कुछ सीख लेंगे?
संतोष तक पहुंचा असंतोष...
भाजपा संगठन मरवाही में हार की समीक्षा नहीं कर पा रहा है। मगर पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं ने हाईकमान से इस पर गौर करने का आग्रह किया है। चर्चा है कि एक तेजतर्रार सांसद ने पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से मिलकर संगठन की कमजोरियों और खामियों की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया है। सांसद ने कह दिया है कि वक्त रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया, तो अगले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का कोई बेहतर प्रदर्शन नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा कि संगठन के बड़े नेताओं की वजह से पार्टी में गुटबाजी हावी है, और गुट विशेष के लोगों को ही संगठन में पद बांटे जा रहे हैं। पार्टी में नए लोगों को जगह नहीं मिल पा रही है, और लगातार सत्ता सुख पाने वाले नेताओं को ही महत्व मिलने से कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं रह गया है। कुछ और सांसदों ने भी यही बातें घुमा फिराकर बीएल संतोष से कही है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी और सह प्रभारी नितिन नवीन जल्द ही प्रदेश दौरे पर आ रहे हैं, इसके बाद अगले पखवाड़े में राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का आगमन होगा। देखना है कि सांसदों की शिकायतों का असर होता है या नहीं।
थानों में सीसीटीवी लगने के बाद क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए देश के सभी पुलिस स्टेशनों और केन्द्रीय जांच एजेंसियों कार्यालयों, हवालातों, प्रवेश और निकास के रास्तों में, लगभग चारों तरफ सीसीटीवी कैमरा लगाने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता से कोर्ट सहमत थी कि इससे हिरासत में प्रताडऩा पर रोक लगेगी।
इंडियन एनुअल रिपोर्ट ऑन टार्चर के मुताबिक साल 2019 में हिरासत में कुल 1731 मौतें हुई हैं, जिनमें से 125 मौतें पुलिस की हिरासत में हुई। आंकड़ों में यह भी है कि ज्यादातर मौतें दलितों और अल्पसंख्यकों की हुई। दरअसल, प्रताडऩा केवल थानों के कैम्पस में ही नहीं होती। जांच और पूछताछ थानों, हवालातों और दफ्तर के बाहर भी की जाती है। अम्बिकापुर में पंकज बेक की मौत, जिस पर परिवार के लोग प्रताडऩा से हुई मौत का आरोप लगा रहे हैं कथित तौर पर एक हॉस्पिटल के बाहर रस्सी से लटकी मिली। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर में चोरी के एक आरोपी छोटू यादव की मां की याचिका पर विशेषज्ञों की रिपोर्ट मांगी है। उसकी मौत कथित तौर पर तब हो गई जब उसे पुलिस जीप से थाना लाया जा रहा था। मां का कहना है कि उसके बेटे की पुलिस ने पिटाई की। पुलिस का किस्सा है कि मौत कुएं में गिरने से हुई।
बीते जून का तमिलनाडु का एक मामला देशभर में चर्चा का विषय रहा जिसमें बाप-बेटे की पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान इतनी बेरहमी से मारा कि दोनों की मौत हो गई। मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या का जुर्म दर्ज करने का निर्देश दिया। छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर में एनकाउन्टर में मारे गये लोगों के परिजनों ने भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में केस लगा रखे हैं।
नये आदेश से प्रताडऩा रुके न रुके, पुलिस और जांच एजेंसियां ‘सच’ उगलवाने की जगह जरूर बदल लेंगी। कई बार रसूखदारों को भी पकडक़र लाना पड़ता है। उनका खूब ख्याल रखा जाता है। कुर्सियां दी जाती हैं, जल-पान कराया जाता है। हिरासत के बावजूद रात में हवालात की जगह घर भी भेज दिया जाता है। ये सब भी अब सीसीटीवी कैमरे में कैद होंगे। कस्टडी में एक नागरिक के क्या अधिकार हैं यह नोटिस बोर्ड में बड़े-बड़े अक्षरों मे लिखा होता है। थानों के बरामदों में ही ये बोर्ड लगे हुए दिखते हैं, पर क्या लोग इस अधिकार का इस्तेमाल कर पाते हैं?
अनजान से थाने का नाम गूंजना
सूरजपुर जिले का झिलमिली थाना अचानक चर्चा में आ गया है। देशभर के 16 हजार से अधिक थानों के कामकाज का सर्वे कराने के बाद गृह मंत्रालय ने 10 सर्वश्रेष्ठ थानों का चयन किया है जिसमें इसे चौथे नंबर पर रखा गया है। दिलचस्प यह है कि मंत्रालय की टीम ने रैंकिंग तय करने के लिये अपने मापदंडों पर तो परखा ही, जनता की राय भी ली। पुलिस स्टेशनों में गरीबों और कमजोर वर्गों की सुनवाई कैसी होती है, महिलाओं के प्रति अपराध में कितनी गंभीरता दिखाई जाती है। शिकायतों का निवारण, लापता व्यक्तियों को ढूंढना, भटकते पाये गये लोगों को सही जगह पहुंचाना जैसे कई मापदंड तय किये गये थे। पहले चरण में हर राज्य से तीन थाने चुने गये, फिर शार्ट लिस्टिंग की गई। मणिपुर का थाउबल थाना सबसे ऊपर है।
ऐसी किसी भी उपलब्धि पर पुलिस की पीठ थपथपाई जा सकती है पर ऐसा नहीं लगता थानों के बीच प्रदेश में इस तरह की कोई प्रतिस्पर्धा रखी जाती है। पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी थानों का वार्षिक, अर्ध-वार्षिक निरीक्षण करते हैं। स्वच्छता, सजावट, पेंडिंग के निपटारे जैसे मापदंडों पर थाना और उनके प्रभारियों को पुरस्कृत किया जाता है पर थानों के बीच प्रतिस्पर्धा के लिये कोई योजना नहीं। अलग-अलग जिलों में पुलिस अफसर अपनी रूचि के अनुसार पेंडिंग मामलों को खत्म करने, वारंटियों को पकडऩे, साइबर क्राइम के मामले पकडऩे, लापता बच्चियों को ढूंढने, यातायात दुरुस्त करने का अभियान हाथ में लेते हैं। पुलिस अधिकारी कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से पुरस्कृत किया जाता है। राष्ट्रीय पर्वों पर सम्मानित भी किया जाता है, फिर थानों के बीच स्पर्धा क्यों नहीं? कभी राजनीतिक कारणों से, कभी अफसरों की नाखुशी से तो कई बार जनता के दबाव में भी थानेदार एक झटके में लाइन हाजिर कर दिये जाते हैं। थानों को दुरुस्त करने का मोह तो तब जागेगा, जब एक निश्चित समय तक उन्हें टिके रहने की उम्मीद हो।
नाचें मगर, नचाना भी सीखें
भरतपुर-सोनहत के विधायक गुलाब कमरो की छत्तीसगढ़ी कार्यक्रम में नाचते गाते हुए तस्वीर वायरल हुई है। कमरो कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में नाचते रहे हैं। वे ऐसे पहले विधायक नहीं है। एक से अधिक बार गुंडरदेही के विधायक कुंवर सिंह निषाद को सार्वजनिक मंचों पर नृत्य करते पाया गया है। मरवाही में चुनाव प्रचार के दौरान उनका ही नहीं मंत्री कवासी लखमा का मांदर की थाप पर नृत्य लोगों ने देखा। कांग्रेस की सरकार बनी तो विधायक लालजीत राठिया ने विधायक निवास पर लुंगी में डांस किया था। मरवाही में हाल ही में जब जीत मिली को क्या मंत्री, क्या विधायक जितने खुश थे सब एक साथ नाचे।
यहां की लोक संस्कृति में नृत्य शामिल है। लोक कलाकारों के साथ शांत भाव से नाचते हैं। यूपी बिहार की तरह तमंचा लेकर तो स्टेज पर नहीं चढ़ते, न ही फायरिंग करते हैं। बस दिक्कत यह है कि भारी बहुमत के बाद भी विधायकों, जनप्रतिनिधियों को अपनी बात मनवाने के लिये अधिकारियों के सामने पसीना बहाना पड़ता है, वे सुनते ही नहीं। 15 साल बाद आई सरकार की खुशी को इस तरह जताना कोई बुरी बात नहीं पर जनता की उम्मीदें हैं कि आप न केवल नाचें बल्कि जहां जरूरी हो वहां लोगों को नाचना भी सिखायें।
क्या चार हजार एटीएम बूथ बंद होंगे?
डिजिटल ट्रांजेक्शन धीरे-धीरे लोगों के व्यवहार में शामिल हो चुका है। छत्तीसगढ़ में हर माह 40 से 50 ठगी के बड़े मामले होते हैं जिनमें ठग अपरिचित होता है और आपके खाते से रुपये साफ हो जाते हैं। इधर जिस तरह जगदलपुर में लगभग सवा करोड़ रुपये का चूना स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को लगाया गया है वह हैरान करने वाला है।
जिन एटीएम मशीनों का बैंक इस्तेमाल करती है उनमें ज्यादातर एनसीआर कंपनी की है। पढ़े लिखे, फ्लाइट से यात्रा करने वाले शातिर जालसाजों को जौनपुर यूपी से पकडक़र लाना सचमुच पुलिस की बड़ी कामयाबी है और इसका श्रेय भी उसे लेना चाहिये। दूसरी तरफ मीडिया में ठगी के तरीके का राज अति उत्साह में जिस तरह से पुलिस ने विस्तार से उगल दिया है उससे खतरा है कि आगे कोई दूसरा जालसाज इसे आजमाना शुरू न कर दे।
बताया गया कि एसबीआई की चार हजार से ज्यादा मशीनें एनसीआर कम्पनी की हैं। मशीनों में ही कुछ खामियां हैं। इन खामियों को जब तक दूर नहीं किया जायेगा, ठगी की गुंजाइश बनी रहेगी। इन एटीएम मशीनों से आहरण तो हो जायेगा पर ट्रांजेक्शन असफल बतायेगा। यानि जालसाज खाताधारक के खाते में राशि बनी रहेगी और मशीन पैसा भी उगल देगी। एसबीआई ने इन मशीनों को बदलने या फिर गड़बड़ी दूर करने का फैसला लिया है।
अब एसबीआई इन चार हजार मशीनों को रातों-रात बदलने वाली तो है नहीं। जब तक ये मशीनें हैं कोई दूसरा भी मौके का लाभ ले सकता है। एक रास्ता यही बचता है कि जहां एनसीआर के एटीएम इस्तेमाल किये जा रहे हैं, वे बूथ बंद कर दिये जायें। चार हजार मशीनों को बंद करने का मतलब, भारी अव्यवस्था फैलना। एसबीआई नंबर वन।
क्लास रूम बंद, मैदान में पढ़ाई

कोरोना महामारी ने बच्चों की पढ़ाई पर खासा बुरा असर पड़ा है। आदिवासी इलाकों के बच्चे जिनके पास मोबाइल फोन, इंटरनेट वगैरह कुछ नहीं है उनके लिये तो पढ़ई तुहर दुआर, बुलटू जैसी वैकल्पिक व्यवस्था भी काम नहीं आ रही है। बच्चों का मध्यान्ह भोजन चलता रहे इसके लिये उन्हें घर पहुंचाकर सूखा राशन दिया जा रहा है। मगर, पढ़ाई की भूख कैसे मिटे?
यह तस्वीर नवगठित गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के धूमानार गांव की है। शासन ने निर्देश दे रखा है कि स्कूलों को नहीं खोला जाना है। ऐसे में स्कूल के बाहर मैदान में दरी बिछाकर पढ़ाई कराई जा रही है। आम तौर पर प्रायमरी स्कूल के ग्रामीण शिक्षकों के बारे में शिकायत रहती है कि वे स्कूल नहीं पहुंचते, लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। जिले के कई स्कूलों के बाहर साफ-सुथरी जगह बनाकर दरियां, टाट-पट्टी बिछाई जा रही है और सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए पढ़ाई शुरू कर दी गई है। कई बच्चों ने तो मास्क भी पहने हुए हैं। हालांकि इसे सभी को पहनना चाहिये।
गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही प्रदेश के उन जिलों में शामिल है जहां कोरोना का संक्रमण अधिक नहीं फैला। यहां के शिक्षा अधिकारी का कहते हैं कि हाल ही में किताबें और स्कूल ड्रेस बांटी गई है। वे इनका इस्तेमाल करने के लिये उतावले हैं। बच्चों में पढऩे को लेकर भारी ललक है और शिक्षक भी उनको गांवों में इधर-उधर घूमते देख रहे हैं तो अच्छा नहीं लग रहा है। इसलिये कहीं-कहीं कोरोना गाइडलाइन को अपनाते हुए सीमित संख्या में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। इनमें बच्चों को आने की बाध्यता नहीं है, जिनके अभिभावक चाहते हैं और क्लास की व्यवस्था को देखकर संतुष्ट हैं वे ही पहुंच रहे हैं।
कोरोना खत्म हो न हो, कल्याण तो हो गया
केन्द्र सरकार ने इस साल 26 मार्च को गरीब कल्याण अन्न योजना की घोषणा की थी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को 5 किलो हर माह के हिसाब से चावल देने का निर्णय लिया गया था। यह स्कीम तीन माह के लिये थी। इसके लिये राशन कार्ड की भी जरूरत नहीं थी केवल आधार कार्ड जैसा पहचान पत्र पर्याप्त था। सितम्बर में ही ये योजना बंद होने वाली थी, पर कई राज्यों की मांग थी कि स्थिति अभी नहीं संभली, मुफ्त अनाज देना जारी रखा जाये।
छत्तीसगढ़ से भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह मांग केन्द्र के सामने रखी थी। यह स्कीम खिंच गई। नवंबर तक कोटा आया। अब दिसम्बर से यह योजना बंद हो गई है। केन्द्र की ओर से आबंटन की कोई सूचना नहीं है। तीन माह के लिये ही 5-5 सौ रुपये दिये गये थे यह स्कीम कम से कम आठ महीने चली।
छत्तीसगढ़ में 51.50 लाख यूनिवर्सल पीडीएस के तहत लाभान्वित होते हैं इसके अलावा 14.1 लाख लोगों को राज्य सरकार की ओर से भी सहायता पहुंचाई जाती है। इन्हें कोरोना के चलते मिलने वाली अतिरिक्त सहायता अब बंद कर दी गई है। हालांकि पीडीएस की राज्य की स्कीम के तहत एपीएल, बीपीएल परिवारों को अनाज मिलता रहेगा।
केन्द्र का शायद यह मानना है कि काम धंधे ने रफ्तार पकड़ लिया है और अब मजदूरों, गरीबों को ज्यादा मदद की जरूरत नहीं रह गई है। क्या सचमुच गरीब संभल गये हैं। सबका रोजगार धंधा कोरोना आने के पहले की तरह चल निकला है?
तीनों मुखिया साथ के !
आईएएस के 89 बैच के अफसर अमिताभ जैन राज्य के प्रशासनिक मुखिया बनाए गए हैं। यह भी संयोग है कि अमिताभ के साथ-साथ हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स राकेश चतुर्वेदी और डीजीपी डीएम अवस्थी रायपुर में पदस्थ रहे हैं। अमिताभ रायपुर कलेक्टर थे, तब राकेश चतुर्वेदी डीएफओ रायपुर थे। दोनों एक साथ काम कर चुके हैं। बाद में डीएम अवस्थी भी रायपुर एसएसपी रहे। खास बात यह है कि तीनों ही इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के हैं।
अजीत जोगी जब सीएम थे तब उन्होंने वीआईपी रोड में उद्यान बनाने के लिए कहा था। अमिताभ जैन और राकेश चतुर्वेदी ने 14 एकड़ बंजर जमीन पर कुछ महीनों के भीतर बेहतरीन उद्यान विकसित कर दिया, जिसे राजीव स्मृति वन के रूप में जाना जाता है। शहर के बाहरी इलाके में पर्यटन का अच्छा केन्द्र बन चुका है। लो-प्रोफाइल में रहने वाले शांत स्वभाव के अमिताभ जैन पर कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों सरकारों का भरोसा रहा है। यही वजह है कि वे हमेशा अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण विभागों में पदस्थ रहे।
अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के सीएम रहते उनके गृह जिले राजगढ़ के भी कलेक्टर रहे। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा सरकार के कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे उस वक्त राजगढ़ के प्रभारी मंत्री थे। जोगी सरकार में एक मौका आया, जब भाजपा नेताओं पर लाठी चार्ज के लिए विधानसभा की कमेटी ने तत्कालीन कलेक्टर अमिताभ जैन और एसपी मुकेश गुप्ता को दोषी माना था, और कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी थी, लेकिन विधानसभा ने कमेटी का फैसला पलट दिया।
अमिताभ की काबिलियत ऐसी रही कि भाजपा सरकार सत्ता में आने के बाद उन्हें एक के बाद एक अहम दायित्व सौंपती रही। अमिताभ के पूर्ववर्ती आरपी मंडल को प्रशासनिक-निर्माण कार्यों के लिए जाना जाता है, लेकिन कई मौकों पर वे पेपरवर्क में कमजोर दिखे। मगर अमिताभ उन चुनिंदा अफसरों में हैं, जिनकी हर क्षेत्र में पकड़ रही है। लेकिन उनके साथ एक दिक्कत यह है कि उन्हें खुद पहल करके काम करने वाला नहीं माना जाता, लोग कहते हैं कि वे दखल देने से बचते हैं. मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में अनुभवी अफसरों की बेहद कमी है। ऐसे में अमिताभ की जिम्मेदारी काफी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।
मुख्य सचिवों की कहानी...
अमिताभ जैन के मुख्य सचिव बनने के साथ ही चित्तरंजन खेतान के मुख्य सचिव बनने की संभावनाएं खत्म हो गईं। पहले आर.पी. मंडल ने खेतान का मौका पा लिया, और अब अमिताभ ने। खेतान के बारे में साख यह है कि वे एक सीमा से अधिक लचीले होकर सत्ता की मर्जी पूरी नहीं कर पाते। दूसरी तरफ मंडल की साख बेहद लचीलेपन की थी, इसलिए वे मौका पा गए। अब जब नौकरी के आखिरी आठ महीनों के लिए खेतान का मुख्य सचिव बनना हो सकता था, तो सत्ता को अमिताभ अधिक लचीले लगे। यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि वे कितने लचीले साबित होते हैं, या किसी बात पर अड़ भी जाते हैं। वे चुप रहकर काम करने के आदी हैं, लेकिन उनका कार्यकाल इतना लंबा बाकी है कि वे मौजूदा सरकार के कार्यकाल पूरे होने के बाद भी नौकरी में रहेंगे, और शायद इसलिए वे सत्ता की मर्जी के साथ-साथ अपनी बकाया नौकरी की फिक्र भी करेंगे।
वे लगातार दूसरे ऐसे मुख्य सचिव हैं जिनके पिता ने दुर्ग जिले में काम किया हुआ है, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता भी दुर्ग जिले से ही राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनकारी रहे हैं, और खुद भूपेश दुर्ग जिले से ही विधायक हैं। अमिताभ जैन के पिता ने बीएसपी में काम किया था, मंडल के पिता ने रेलवे में, और भूपेश का घर भी इन दोनों जगहों से कुछ किलोमीटर ही दूर रहा।
विवेक ढांड के बाद से छत्तीसगढ़ के सीएस बनने का सिलसिला चल रहा है। उनके बाद अजय सिंह सीएस बने जिनके पिता, तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के पिता के वकालत के दौर में ही वकालत करते थे। इसके बाद मंडल, और अब अमिताभ, ये सभी स्थानीय लोग ही रहे।
पीडीएस को पारदर्शी बनाने में रोड़ा
राशन दुकानों में उपभोक्ताओं से ज्यादा कीमत वसूलने, स्टाक की मात्रा पर गड़बड़ी रोकने के लिये खाद्य विभाग ने सीसीटीवी कैमरा लगाने और जीपीएस से जोडऩे की घोषणा की थी। उपभोक्ता अपने मोबाइल पर घर बैठे देख सकते हैं कि किस राशन दुकान में कितनी मात्रा में चावल, शक्कर उपलब्ध है और सरकार ने उसकी कीमत क्या तय की है।
पर खाद्य विभाग इस योजना को लागू करने के लिये गंभीर नहीं दिखती। अब पारदर्शिता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। राज्य में 12 हजार 306 राशन दुकानें चल रही हैं पर आपको ढूंढना मुश्किल होगा कि आखिर ये व्यवस्था किस दुकान में मौजूद है। एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ के पीडीएस सिस्टम को सराहा गया और दूसरे राज्यों के प्रतिनिधियों ने भी इसका अध्ययन करने के लिये दौरा किया। ढिलाई क्यों बरती जा रही है? शायद खाद्य विभाग के अधिकारियों को चिंता सता रही है कि इतनी खुली पारदर्शी व्यवस्था कहीं उनकी ही पोल न खोल दें।
धान खरीदी की खुशी के बीच चिंता
धान खरीदी शुरू होने के बाद किसानों की लम्बी प्रतीक्षा खत्म हुई। पहले ही दिन करीब 10 लाख क्विंटल धान खरीदी की गई। मंत्रियों, विधायकों सहित कांग्रेस पदाधिकारियों ने खरीदी केन्द्रों में जाकर तराजू, बांट की पूजा की और किसानों को तिलक लगाया।
खरीदी शुरू होने के बाद भी अब तक सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है कि उन्हें किस दर से भुगतान किया जायेगा। चुनावी वायदे पर अमल किया जाये तो हर साल 2500 रुपये क्विंटल की दर से भुगतान किया जाना है। पहले समर्थन मूल्य का भुगतान उसके बाद राजीव किसान न्याय योजना के तहत बाकी किश्तें। हालांकि पिछले साल की एक किश्त अभी भी बाकी है। इसका भुगतान इसी वित्तीय वर्ष में करने का आश्वासन कृषि मंत्री ने दिया है पर यह इंतजार लम्बा हो रहा है।
खरीदी शुरू होते ही कई खरीदी केन्द्रों में ताला लगे होने की खबर आई। कई नये खरीदी केन्द्रों को खोलने और पुराने केन्द्रों को बंद करने का विरोध भी होने लगा। कम से दो जगह चक्काजाम तो किसानों ने पहले ही दिन कर दिया। 72 घंटे के भीतर धान के परिवहन का समय तय किया गया है पर बीते सालों का अनुभव कहता है कि समय पर उठाव नहीं होने के कारण खरीदी रोकनी पड़ी।
छोटे किसानों को पहले टोकन देने की बात की गई है लेकिन इसका पालन सोसाइटियों में कई जगह नहीं हो रहा। धान पकने के बाद हुई बारिश ने किसानों चिंता में डाला, पर नमी को लेकर कोई रियायत नहीं दी गई है। हालांकि यह कहा गया है कि सूखत के नाम पर अतिरिक्त धान नहीं लिया जायेगा पर व्यवहार में अधिक धान ले ही लिया जाता है। बारदाने के संकट को एक हद तक दूर कर लेने का दावा किया गया है। उम्मीद करनी चाहिये कि जिस उत्साह से मंडियों, सोसाइटियों में पहले दिन राजनैतिक कार्यकर्ता पहुंचे हैं वह आने वाले दिनों में वहां दिखाई देंगे।
कलाकारों पर कोरोना का कहर
रायगढ़ की एक छत्तीसगढ़ी कलाकार ने आग लगाकर खुद की जान लेने की कोशिश की। नजदीकी बताते हैं कि कोरोना के बाद पैदा हुई आर्थिक तंगी के चलते उसने यह कदम उठाया।
इन दिनों आत्महत्या की कई घटनायें सामने आ रही हैं। कुछ आंकड़े आये हैं जिनमें बताया गया है कि खुदकुशी और खुदकुशी की कोशिश करने की घटनायें इस साल बढ़ी है। राज्य मानसिक चिकित्सालय में रिकॉर्ड 500 से ज्यादा लोगों ने काउन्सलिंग के जरिये अपने मानसिक तनाव से उबरने की कोशिश की है। अनलॉक के बाद भी जो क्षेत्र अब तक संभल नहीं पाये हैं उनमें कला जगत भी है। अनेक लोगों की आजीविका का यह एकमात्र जरिया रहा है।
शादी-ब्याह में दी गई थोड़ी छूट से कुछ राहत तो मिली लेकिन इनमें सांस्कृतिक कार्यक्रम करने पर रोक लगी हुई है। प्रदेशभर की अदालतें जब बंद थीं तो वकीलों ने आर्थिक सहायता की मांग की थी। थोड़ी बहुत सहायता उन्हें मिली भी लेकिन उनके एसोसियेशन और कौंसिल की ओर से।
न केवल कलाकार या प्रोफेशनल बल्कि मजदूर वर्ग के लोगों में भी यह प्रवृति बढ़ी है। कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिये सरकार ने कई कदम उठाये। मजदूरों और किसानों की मामूली ही सही, आर्थिक मदद भी की गई लेकिन कलाकारों की आजीविका कैसे चले इस पर गंभीर कदम नहीं उठाये गये। यह वर्ग स्वाभिमानी भी होता है, मदद के लिये गुहार लगाने से भी हिचकता है। ऐसे में कोई रास्ता निकाला जाना जरूरी है।
श्रीचंद और दिग्विजय
दो चुनाव अधिकारियों के कोरोना से मौत की वजह से चेम्बर चुनाव स्थगित हो गया है, लेकिन एक दिन पहले तक जोर शोर से प्रचार चल रहा था। खुद श्रीचंद सुंदरानी एकता पैनल के प्रचार की कमान संभाले हुए थे। सुंदरानी प्रदेशभर का दौरा कर रहे थे। दुर्ग में उन्होंने एक बार फिर दिग्विजय सिंह की तारीफ की, और कहा-व्यापारियों के लिए सबसे अच्छे सीएम थे। वैसे तो पहले भी यह बात कह चुके हैं। हालांकि उन्होंने रमन सिंह की भी तारीफ की, और कहा कि जब भी उनके ( रमन सिंह) पास चेम्बर की तरफ से कोई मांग आई, उसे फौरन मंजूर किया।
दिग्विजय की तारीफ करने के पीछे ठोस वजह भी है। सुनते हैं कि मध्यप्रदेश सरकार में सेल्स टैक्स खत्म कर वैट लागू करने की योजना बनाई गई थी, तो दिग्विजय सिंह ने चेम्बर और अन्य व्यापारी संगठनों से सुझाव लेकर इसका क्रियान्वयन किया गया। जब भी वे रायपुर आते थे, तो उस समय के चेम्बर अध्यक्ष पूरनलाल अग्रवाल और महामंत्री श्रीचंद सुंदरानी को पूरा महत्व देते थे। यही वजह है कि श्रीचंद, दिग्विजय की तारीफ करते नहीं थकते हैं।
गौरीशंकर के खिलाफ मोर्चा
बलौदाबाजार में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। गौरीशंकर के खिलाफ रोज शिकायतें लेकर बलौदाबाजार के कार्यकर्ता रायपुर आते हैं, और रमन सिंह, पवन साय व अन्य प्रमुख नेताओं से मिलकर गौरीशंकर को जिले की राजनीति से दूर रखने का आग्रह करते हैं। सुनते हैं कि गौरीशंकर से नाराज कार्यकर्ताओं को शिवरतन शर्मा और अन्य विरोधी नेताओं का साथ मिल रहा है।
गौरीशंकर के खिलाफ नाराजगी की वजह यह है कि बलौदाबाजार जिले के एक मंडल अध्यक्ष की पिछले दिनों मृत्यु हो गई। मंडल अध्यक्ष के खाली पद के लिए यह तय हुआ कि जिले की कोर कमेटी की बैठक में नाम फाइनल किया जाएगा। मगर कोर कमेटी की बैठक से पहले ही जिला अध्यक्ष डॉ. सनम जांगड़े ने गौरीशंकर अग्रवाल की सिफारिश पर नियुक्ति कर दी, जिसे जिले के दूसरे बड़े नेता पचा नहीं पा रहे हैं। रोज नाराज कार्यकर्ताओं का जत्था रायपुर पहुंचता है, और शिकायतें कर लौट जाता है। पिछले कुछ दिनों से यह सिलसिला चल रहा है। अब बड़े नेता नाखुश रहेंगे, तो कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत होने का सवाल ही नहीं है।
एक व्यक्ति ही अपने संस्थान की पहचान
सीएस आरपी मंडल रिटायर हो गए। मंडल के साथ-साथ मंत्रालय से दूर संस्कृति संचानालय में पदस्थ संयुक्त संचालक राहुल सिंह भी आज रिटायर हो गए। मंडल के रिटायरमेंट की चर्चा मीडिया में सुर्खियां बनी हैं, और कुछ निर्माण कार्यों का जिक्र कर उनके योगदान को गिनाया जा रहा है। मगर राहुल सिंह के योगदान का जिक्र सिर्फ आपसी चर्चा तक ही सीमित है। जबकि राज्य की संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनका अहम योगदान रहा है। उनके साथ काम कर चुके मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव तारण प्रकाश सिन्हा ने फेसबुक पर राहुल सिंह के काम को लेकर अपने विचार साझा किए हैं।
उन्होंने लिखा है-राहुल सिंहजी आज सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई व्यक्ति अपने अनुभव, ज्ञान, कार्यकुशलता और मिलनसारिता के बूते अपने संस्थान की ही पहचान बन जाए, और यदि ऐसा हो जाए तो ऐसे व्यक्ति की सेवानिवृत्ति भी संस्थागत रिक्तता-सी प्रतीत हुआ करती है। और फिर संस्कृति विभाग के संयुक्त-संचालक राहुलजी की सेवानिवृत्ति से होने वाली रिक्तता तो इससे भी कहीं ज्यादा है।
राहुलजी मूल रूप से अकलतरा के हैं, अकलतरा पूर्व में अविभाजित बिलासपुर जिले का भाग था, राहुलजी से पारिवारिक संबंधों के साथ शासकीय संबंध भी रहे। मुझे संस्कृति विभाग के संचालक के रूप में साथ काम करने का अवसर मिला, और इस तरह उन्हें करीब से जानने-समझने का भी। प्रदेश की संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व को लेकर न केवल उनकी गहरी समझ है, बल्कि मौलिक दृष्टि भी है। अपनी माटी को लेकर उनका दृष्टिकोण एक ठेठ-छत्तीसगढिय़ा का दृष्टिकोण है, जिसमें अपने सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने की छटपटाहट है।
ददरिया से लेकर बांस-गीत तक, प्रतिमाओं से लेकर मुद्राओं तक, भाषा से लेकर भंगिमाओं तक, मालगुजारों से लेकर राजे-महाराजाओं तक, चिडिय़ों से लेकर तितलियों तक, ऐसे ढेरों विषय हैं, जिनमें आप उनसे घंटों बात कर सकते हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर विषय उनके काम से ही जुड़े हुए हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा उनकी जीवनचर्या से भी। राज्य की संस्कृति और पुरातत्व के संरक्षण-संवर्धन के लिए उन्होंने अपने दायित्वों से कहीं आगे जाकर काम किया। उन्होंने न केवल राज्य के कलाकारों को, संस्कृतिकर्मियों को, पूरा-प्रेमियों को अपने साथ जोड़े रखा, बल्कि युवाओं को भी हमेशा साथ लेकर चलते रहे।
राहुलजी एक बढिय़ा लेखक भी हैं। उनकी एक पुस्तक ‘एक थे फूफा’ पठनीय है, उनका एक लोकप्रिय ब्लॉग है-सिंहावलोकन। इस ब्लॉग का मैं भी नियमित पाठक हूं। वे एक लेखक और शोधार्थी के रूप में भी इस ब्लाग के जरिये प्रदेश के सांस्कृतिक वैभव को समृद्ध करते रहे हैं। संतोष की बात यह है कि उनका यह ब्लाग अब मार्गदर्शी किताब के रूप में भी हमारे लिए उपलब्ध है।
शायद यह राहुल सिंहजी की उपस्थिति के कारण ही था कि संस्कृति विभाग के बाद अब जनसंपर्क विभाग में काम करते हुए मुझे विभागीय दूरी कभी महसूस ही नहीं हुई। जब भी आवश्यकता हुई, राहुलजी ने उतनी ही तत्परता से मेरी मदद की। राहुलजी की सेवानिवृत्ति हालांकि एक विभागीय प्रक्रिया है, लेकिन इस अनिवार्य घटना का सुखद पहलु यह है कि एक विशेषज्ञ, शोधार्थी और लेखक के रूप में हम सबके बीच अपनी कहीं ज्यादा व्यापकता के साथ उपस्थित रहेंगे। उनकी रचनात्मकता के जरिये उनके अनुभवों का लाभ हमें मिलता रहेगा।
ठग-जालसाज ओवरटाईम कर रहे...
भारत सरकार तरह-तरह से लोगों को चौकन्ना कर रही है कि वे टेलीफोन और इंटरनेट पर ठगी का शिकार न हों। कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन आरबीआई की तरफ से बार-बार यह घोषणा करते हैं कि टेलीफोन पर बैंक धोखाधड़ी के शिकार न हों। लेकिन सरकारी नियंत्रण वाली देश की टेलीफोन और इंटरनेट सेवाओं के तहत रात-दिन धोखाधड़ी के संदेश जाते हैं। जिन्होंने किसी कंपनी की कोई बीमा पॉलिसी नहीं ली है उन्हें बार-बार संदेश आता है कि उनका बीमे का वक्त पूरा हो रहा है, और पॉलिसी आगे बढ़ाने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें। जिन्होंने बैंक से कर्ज नहीं मांगा है, उन्हें संदेश जा रहे हैं कि उनका लोन मंजूर हो गया है, और वे आज ही वह लोन उठा सकते हैं, इसके लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें। लोगों को लगातार ऐसे संदेश मिल रहे हैं, और एक बार क्लिक करते ही उनका फोन हैक हो जाने, उसके पासवर्ड चोरी हो जाने, उससे भुगतान हो जाने का खतरा खड़ा हो जाता है। यह एक रहस्य है कि जो सरकार अपने विरोधियों के फोन और संदेश पर तो निगरानी रख सकती है, लेकिन ऐसे जालसाजों और धोखेबाजों के संदेश क्यों नहीं पकड़ सकती?
देश में रोजाना हजारों लोग साइबर ठगी के शिकार हो रहे हैं, और सरकार है कि वह आधार कार्ड अनिवार्य करने से लेकर डिजिटल भुगतान तक को बढ़ावा देने, उसे अनिवार्य करने पर आमादा है। हिफाजत का ठिकाना नहीं, लेकिन इस्तेमाल करवाने की जिद।
यह मामला कुछ छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की सरकारी गौशाला जैसा हो गया जहां कुत्तों के झुंड ने भीतर घुसकर बीमार गाय को मार डाला। गायों को सरकारी गौशाला या गोठान में रखने की भी जिद, और हिफाजत का भी इंतजाम नहीं।
मानव तस्करी की महामारी
धान पकने के बाद रोजगार के लिये दूसरे राज्यों में जाना और बोनी के दिनों में वापस लौट जाना छत्तीसगढ़ के हर इलाके में होता रहा है। श्रम विभाग ने अनुमान लगाया था कि 7 लाख श्रमिक कोरोना काल में छत्तीसगढ़ वापस लौटेंगे। इनकी स्किल मैपिंग की बात हुई थी ताकि उनके हुनर का राज्य के उद्योग धंधों में इस्तेमाल हो सके, उद्योगपतियों ने भी आश्वस्त किया था। पर, जैसे ही समय बीता इसे जवाबदार लोग श्मशान वैराग्य की तरह भूल गये।
पिछली सरकार ने दावा किया था कि हम रोजगार के ऐसे मौके देंगे कि पलायन पूरी तरह खत्म हो जायेगा। मगर प्रवास बसों, रेलों, प्राइवेट गाडिय़ों या तक कि बाइक के जरिये प्रवास जारी है। लॉकडाउन लगने के बाद जो भारी तकलीफ मजदूरों ने उठाई थी, इसकी परवाह किये बगैर।
अब जो मामले पकड़े जा रहे हैं, वे ज्यादा चिंताजनक है। बच्चों और महिलाओं की सरेआम तस्करी हो रही है। रायपुर, कोरबा, बिलासपुर, रायगढ़ आदि जिलों में लगातार मामले पकड़े जा रहे हैं। बस्तर का आदिवासी जमीन छोडऩा पसंद नहीं करता लेकिन ख़बरें वहां से भी हैं।
चिंताजनक है कि तस्करी में लिप्त लोगों को राजनैतिक संरक्षण भी है। रायपुर में भाजपा नेत्री का पकड़ा जाना बताता है कि सप्लाई का नेटवर्क तगड़ा है और छत्तीसगढ़ में यह एक फलता-फूलता कारोबार हो चुका है। महिलाओं के अलावा नाबालिग बच्चियों को भी बहला-फुसलाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जा रहा है।
पुलिस जांच में ही पता चला है कि अकेले डोंगरगढ़ से 35 महिलायें गायब हैं। कुछ साल पहले राज्य महिला आयोग ने बताया था कि प्रदेश की 19 हजार महिलायें और बच्चियां गायब हैं जिनमें ज्यादातर जशपुर इलाके की हैं। उसके बाद का कोई आंकड़ा प्रकाश में नहीं है। इनको बेहतर सुविधा और सम्मानजनक कार्य के नाम पर ले जाया गया पर उन्हें यौन शोषण के दलदल में धकेला गया, कई लोग वेश्यालयों में मिले, अनेक की लाशें मिलीं। कोरोना महामारी के बाद पैदा आर्थिक संकट की एक काली तस्वीर यह भी है जिसकी तरफ सरकार अभी गंभीर नहीं दिखती।
कार्यकर्ता अब क्या नेताओं की हाय-हाय करें?
आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिये कांग्रेस समन्वय समिति की बैठक उत्साहजनक नहीं रही। निगम-मंडलों में नियुक्ति का मसला एक बार फिर टाल दिया गया है। तय यह हुआ है कि पहले संगठन में खाली पड़े पदों को भरा जाये उसके बाद जो बचेंगे उनके नाम निगम, मंडल, आयोग, परिषद् आदि में तय होंगे।
सत्ता से जुडऩे की लालसा लिये कार्यकर्ताओं के लिये इस बैठक में दोहरी मार हुई, एक तो नियुक्तियों का कोई समय-सीमा तय नहीं की गई दूसरी उन पर जवाबदारी दे दी गई वे सरकार की नरवा-गरुवा, किसान न्याय आदि योजनाओं के फायदे लोगों को बतायें। यानि जब विपक्ष में थे तो सडक़ों पर लाठी खायें और अब जब सरकार बन गई तो बचे हुए चुनाव जितायें, सरकार की उपलब्धियों को बताने घिसें। हर हाल में सडक़ पर।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस भवन के सामने अपने ही नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन करना, उनका विरोध जताना पहले भी हो चुका है, नियुक्तियों को टालने वाले नेताओं को यह पता होगा ही।
ठगी अमर से नहीं हो सकती
सोशल मीडिया के जरिये तरह-तरह की ठगी के तरीकों में फेसबुक पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर पैसे मांगना भी शामिल है। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल दिल्ली में हैं और उनके समर्थकों ने थाने में शिकायत दर्ज करा दी है। किसी ने फेसबुक पर उनकी फर्जी प्रोफाइल बना ली और लोगों से 10-10 हजार रुपये की मांग की जा रही है। इसके पहले एक आईएएस अफसर और एक पुलिस अधिकारी के मामले भी आ चुके हैं।
जिसने भी ठगी की उसने गलत जगह दांव लगाया। फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर अमर अग्रवाल का अपना आईटी सेल है। बहुत से महापुरुषों की जयंती के बारे में तो उनकी टीम ही वाट्सअप, ट्विटर और फेसबुक पर याद दिलाती है। जन्मदिन की रिकॉर्डेड बधाई, पर्व-त्यौहारों की शुभकामनायें देती हैं। कोविड-19 का प्रकोप शुरू हुआ तो कलेक्ट्रेट में अमर के समर्थकों ने एक कम्प्यूटराइज्ड सिस्टम दे दिया, टोल फ्री नंबर पर लोग मिस कॉल कर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अमर समर्थकों ने पुलिस से की गई शिकायत में एक मोबाइल नंबर दिया है जिसके एकाउन्ट में पैसे मांगे गये हैं। यह तय है कि यदि पुलिस पता नहीं लगा पाई तो अमर की टीम पता लगा लेगी कि कौन इस फोन नंबर का इस्तेमाल कर रहा है।


