राजपथ - जनपथ
नेक काम की शुरुआत पुलिस खुद से करे..
इन दिनों पुलिस महकमा ही नहीं विभिन्न जिलों के कलेक्टर, विधि विभाग, सब मिलकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं। यौन प्रताडऩा, शारीरिक हिंसा, एसिड अटैक आदि की शिकार महिलाओं को मुआवजा देने की दो साल से रुकी फाइलें आगे बढ़ रही हैं। अब हर जिले में सूची बन रही है, कुछ जिलों में तैयार भी हो गई है और जल्द मुआवजा बांटने का सिलसिला भी शुरू हो जायेगा। चीफ सेक्रेटरी ने बीते दिनों कलेक्टरों की बैठक लेकर ऐसे मामलों में फुर्ती लाने कहा था, अब डीजीपी ने भी जिले के कप्तानों को सचेत किया है।
शुक्रवार को हुई इस बैठक में पहली बार दंड और ईनाम के नियम बनाये गये हैं। अब गूगल स्प्रेड शीट पर हर दिन जानकारी अपडेट करनी होगी। पुलिस मुख्यालय में मॉनिटरिंग के लिये महिला सेल का गठन होगा। एफआईआर दर्ज होने के 15 दिन में गिरफ्तारी नहीं हुई तो जिले को यलो अलर्ट में, गिरफ्तारी के 15 दिन में चालान पेश नहीं होगा तो रेड अलर्ट में, गिरफ्तारी के 60 दिन में चालान पेश नहीं होने पर उस जिले की पुलिस को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जायेगा।
जाहिर है, ब्लैक लिस्ट में आने पर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। दूसरी तरफ तेजी से परिणाम देने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत भी किया जायेगा।
छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के बहुत मामले आते हैं, पेंडिंग की सूची बड़ी लम्बी है। एक पर राज्य ने, दूसरे पर केन्द्र ने कानून बना रखा है, जो प्रदेश में लागू है। एक महिला हेल्प डेस्क हर थाने में बनाने और वहां महिलाओं को प्रभार देने की बात निर्भया कांड के बाद हुई थी। अधिकांश डेस्क काम नहीं कर रहे। हेल्पलाइन नंबर वैसे तो 1091 और 1090 पूरे देश के लिये है, 181 में भी फोन किया जा सकता है पर ज्यादातर महिलाओं, विशेषकर घरेलू महिलाओं को इसके बारे में पता नहीं होता।
प्रदेश के कई जिलों में पुलिस विभाग के ही कई अधिकारी, कर्मचारियों पर ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध के अनेक मामलों की जांच और कार्रवाई रुकी हुई है। क्या ही अच्छा हो कि पुलिस विभाग लगे हाथों ऐसे मामलों की भी समीक्षा कर ले। किसी भी नेक काम की शुरूआत खुद से करना ठीक रहेगा, पुलिस पर भरोसा बढ़ेगा।
बोधघाट के विरोध पर नक्सल दृष्टि
राज्य सरकार के बड़े फैसलों में 40 साल से रुकी बोधघाट परियोजना को मंजूरी देना भी एक है। अरविन्द नेताम सहित बस्तर के अनेक नेता इस परियोजना के विरोध में हैं। परियोजना का विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे बस्तर को लाभ नहीं, परिवार जरूर उजड़ जायेंगे। जब परियोजना की कल्पना की गई तो बिजली उत्पादन ही उद्देश्य था, जिसकी अब जरूरत नहीं रह गई हैं। अभी भी चित्रकोट, बीजापुर, बारसूर में अनेक स्थानीय नेता इस परियोजना के विरोध में एकजुट हो रहे हैं। बताया जाता है कि इसमें कांग्रेस-भाजपा दोनों ही दलों के लोग शामिल हैं।
पिछले दिनों मारडूम थाना में भाजपा नेता व पूर्व विधायक लच्छूराम कश्यप और राजाराम तोड़ेम के खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इन पर आरोप है कि उन्होंने कोविड-19 महामारी पर लगाई गई पाबंदी के खिलाफ जाते हुए बैठक रखी। यहां तक तो ठीक है पर कुछ ऐसी रिपोर्ट्स भी आ रही हैं कि ग्रामीणों में इस परियोजना के लेकर मौजूद शक को भुनाने के लिये नक्सली भी उनके करीब आ रहे हैं और ग्रामीणों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मौका उन्हें क्यों मिल रहा है? किसी योजना का गुण-दोष के आधार पर समर्थन या विरोध तो किया जा सकता है।
अभी दो ही दिन हुए हैं जब मुख्यमंत्री ने बस्तर के पंचायत प्रतिनिधियों की मांग पर नई औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देने की घोषणा की है। हर परियोजना के साथ समर्थन और विरोध की आवाजें लाजिमी है, उठेंगीं। ऐसी स्थिति में यह जरूरी प्रतीत होता है कि बस्तर के सरकारी नुमाइंदे, स्थानीय प्रशासन, जल संसाधन विभाग और सम्बन्धित विभागों के अधिकारी इन योजनाओं से जुड़ी शंकाओं का वे ग्रामीणों के बीच खुद जाकर निराकरण करें। सरकारी मशीनरी के कामकाम में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। विरोध को नजरअंदाज करना, प्रशासन की दांडिक शक्ति पर भरोसा रखना गलत नजरिया हो सकता है। इससे बस्तर में शांति स्थापित करने की कोशिशों को धक्का लगता रहेगा।
कोरोना की दहशत का दोहन
कोरोना महामारी के प्रकोप से जो बचे हुए हैं उनके मन में दहशत बनी हुई है कि कभी उन पर भी वायरस का हमला हो गया तो क्या होगा? कोरोना आने के साथ-साथ बाजार में इस डर को भुनाने का खेल शुरू हो गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि नियमित व्यायाम के साथ शरीर का इम्यून सिस्टम दुरुस्त होना चाहिये, कुछ ही दिनों के भीतर इम्युनिटी बढ़ाने का दावा करने वाली दर्जनों दवाईयां बाजार में आ गई। अख़बारों, टीवी चैनलों पर इनके विज्ञापन पटे रहते हैं। जब बाबा रामदेव के इस दावे को आईसीएमआर से खारिज किया कि कोरोनिल दवा कोरोना को ठीक करती है तब बाकी कम्पनियां सावधान हो गईं और वे कोरोना ठीक करने का दावा सीधे-सीधे नहीं करते पर लेना जरूरी बताती हैं। कोरोनिल का कोरोना की दवा के रूप में बेचना मना है, मालूम है लोगों को कि यह कोरोना की दवा नहीं है पर डर ऐसा कि बाजार में इसकी जबरदस्त मांग है। ये सब मार्केटिंग रणनीति है जिसे अब चुनाव में भी अपनाया जा रहा है। वैसे भी पिछले कुछ चुनावों में मार्केटिंग गुरुओं की भूमिका बढ़ी है। बिहार में कोरोना की वैक्सीन मुफ्त देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र में हुआ। उसके बाद मध्यप्रदेश में भी हुआ। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने भी मुफ्त वैक्सीन की घोषणा कर दी। अब तक होता यही रहा है कि महामारी व संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण के लिये दवायें या तो मुफ्त मिलती रही हैं या मामूली शुल्क पर। ऐसे में कोरोना वैक्सीन का मुफ्त देना किसी भी सरकार के लिये बोझ नहीं हो सकता। इसे चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर एक डर से बचाने का सौदा किया जा रहा है। अब आयें मरवाही पर, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की दशा बेहद दयनीय है। गंभीर मरीजों को बिलासपुर रेफर करना पड़ता है। कई बिलासपुर नहीं ला पाते। जो रवाना होते हैं वे सब के सब जिंदा नहीं पहुंचते। पर इस बार वहां दो सफल डॉक्टरों के बीच मुकाबला है। कोरोना वैक्सीन न सही, क्षेत्र के मतदाताओं को दोनों डॉक्टरों से इतना आश्वासन जरूर ले लेना चाहिये कि उन्हें मरवाही और अपने जिले में एक बेहतरीन अस्पताल, विशेषज्ञों की टीम के साथ मिलेगा। जीते कोई भी, इस आदिवासी बाहुल्य इलाके का भला हो।
ट्रंप के भक्त
राष्ट्रपति का चुनाव अमरीका में हो रहा है, लेकिन बहुत से हिन्दुस्तानी ट्रंप समर्थक दिखाई पड़ रहे हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले बरसों में कई हिन्दूवादी संगठनों ने ट्रंप की फोटो लगाकर हवन और यज्ञ किए थे। ट्रंप के कल्याण के लिए पूजा की थी। अभी पिछले पखवाड़े ही एक खबर आई कि ट्रंप के एक प्रशंसक ने भारत में उनका एक मंदिर बना रखा था, जहां वह रोज पूजा करता था। उसकी तस्वीर भी आई थी जिसमें वह ट्रंप की प्रतिमा का गाल चूम रहा है। ट्रंप को जब कोरोना की वजह से अस्पताल में भर्ती किया गया तो इस आदमी ने ट्रंप के ठीक होने की मनौती मानकर उपवास शुरू कर दिया। और उपवास में वह मर गया।
ट्रंप के कुछ समर्थक तो इस किस्म के हैं, और कुछ दूसरे समर्थक वे हैं जो मास्क से ट्रंप के परहेज को धार्मिक भावना के मानते हैं। चूंकि ट्रंप भगवान मास्क नहीं लगाते, इसलिए हिन्दुस्तान में भी करोड़ों लोग बिना मास्क घूमते हैं। लोगों ने कोरोना से डरना छोड़ दिया है। हिन्दुस्तान में मरीजों की गिनती थोड़ी सी घटी है, तो लोग बेफिक्र हो गए हैं। यह बेफिक्री उन्हें ट्रंप का मंदिर बनवाने वाले के पास ले जा सकती है। फिलहाल उनकी जिंदगी में इस खतरे के अलावा एक नुकसान यह भी है कि ट्रंप का भक्त होने के बावजूद उनके पास ट्रंप को वोट देने का अधिकार नहीं है।
चुनाव और प्याज के भाव
लोगों ने एक लोकसभा चुनाव वह भी देखा है जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ‘शाइनिंग इंडिया’ के नाम पर अनेक उपलब्धियां गिनाती रह गई और प्याज की कीमतों ने उनकी सरकार दुबारा नहीं बनने दी। इस समय चुनाव भी हो रहे हैं और प्याज की कीमतें भी हर दिन बढ़ती जा रही हैं। पर है ये विधानसभा का चुनाव जबकि कीमतों का बढऩा, रोकना केन्द्र सरकार के बूते की बात है। नये कृषि कानून ने स्टॉक लिमिट पर रोक हटा दी है। अब व्यापारी जितना चाहे माल रोककर रख लें। माल जितना जाम रख पायेंगे कीमत उतनी ही वसूल सकेंगे। छत्तीसगढ़ में इस समय प्याज 70 रुपये किलो बिक रहा है। बाजार के जानकार कहते हैं कि महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश के कारण प्याज की फसल बर्बाद हुई है जिसके चलते इसके दाम 100 रुपये तक पहुंच सकते हैं। आलू भी कमजोर नहीं, 50 रुपये किलो बिक रहा है। बताया जा रहा है त्यौहारों के कारण आलू की खपत ज्यादा है, आवक कम है। वैसे हर बार महंगाई बढऩे पर इसी तरह की ख़बरें आती हैं कि फसल कमजोर है, सप्लाई कम हो रही है। छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों को निर्देश तो है कि मांग और खपत पर निगरानी रखें। व्यापारियों को अपना स्टाक प्रदर्शित करने के लिये भी कहा गया है लेकिन अब नये कानून के कारण वह जब्ती-सख्ती नहीं रह गई। महंगे आलू और प्याज को आने वाले कई-कई दिनों तक बर्दाश्त करने के लिये तैयार रहिये। कोई लोकसभा चुनाव निकट भविष्य में नहीं है।
भाजयुमो से आगे बढऩे का रास्ता
भाजयुमो के अध्यक्ष अमित साहू ने खूब तामझाम के साथ पदभार ग्रहण किया। वे पगड़ी पहनकर आए थे। एकात्म परिसर में पदभार ग्रहण कार्यक्रम के दौरान बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यकर्ताओं को संघर्ष करने की सीख दी। उन्हें बताया कि वे युवा मोर्चा के दिनों में किस तरह संघर्ष करते हुए आगे बढ़े हैं।
पुरानी घटनाओं को याद करते हुए बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि अर्जुन सिंह के सीएम रहते जनहित के मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हुए उन पर काला झंडा फेंक दिया था। इस पर पुलिस और कांग्रेस के नेताओं ने उनकी जमकर पिटाई की थी। फिर भी वे पीछे नहीं हटे। इसका प्रतिफल यह रहा कि वे विधायक और मंत्री बने।
बृजमोहन की तरह मोहम्मद अकबर को वीपी सिंह की रैली का विरोध करने पर जनता दल के कार्यकर्ताओं की मार झेलनी पड़ी थी। उस समय कांग्रेस के खिलाफ माहौल था। अकबर को अविभाजित मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के महासचिव का पद दिया गया। वे फिर विधायक बने और वर्तमान में मंत्री हैं। ये तो पुराने छात्र नेताओं की बात है। नए नवेले नेता तो पद पाते ही साधन-संसाधन के जुगाड़ में लग जाते हैं, और जल्द बदनाम भी होते हैं।
पिछली सरकार में भाजयुमो के एक नेता तो पद मिलने के बाद ट्रांसफर पोस्टिंग के जुगाड़ में लग गए थे। एक सिंचाई अफसर की पदस्थापना के एवज में काफी कुछ बटोर भी लिया था। इसकी काफी दिनों तक चर्चा होती रही। अब सरकार तो है नहीं, अमित साहू कैसा काम करते हैं यह देखना है।
पर्यावरण बचाने ऐसे पटाखे जिन्हें फोडऩा नहीं, बोना है!

पटाखों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए उसी शक्ल में एक नया अभियान शुरू किया गया है। पर्यावरण के अनुकूल सामानों की एक दुकान में बीज-पटाखों की बिक्री शुरू की है जो अलग-अलग परंपरागत पटाखों के रूप-रंग में तो हैं, लेकिन जिन्हें जलाना नहीं है, बल्कि बोना है। ऐसे कुछ पटाखों का एक पैकेज नारियल के रेशों से बने हुए दो गमलों के साथ एक पैकेज में करीब 7 सौ रूपए में बेचा जा रहा है। इसमें अनार से लेकर बम तक हर किस्म के पटाखों के भीतर अलग-अलग बीज हैं, और उन्हें स्थानीय लोगों से छिंदवाड़ा जिले की सौंसर तहसील के पारडसिंगा में एक संस्था ने बनवाया है, और इसकी ऑनलाईन बिक्री की जा रही है।
सीजन में भी चूक कर रहे फूड वाले...।
अमूमन लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि होटलों में साफ-सफाई बरती जा रही है या नहीं। कभी गंदगी या लापरवाही दिखी भी तो नाक भौं सिकोडक़र आगे बढ़ लेते हैं। यह है, बड़ा मुद्दा। होटलों का खान-पान कैसा है इसका हमारी सेहत पर खासा असर पड़ता है और यदि वहां स्वच्छता नहीं हो, तो कार्रवाई के लिये कानून बने हैं। बस नागरिक को जागरूक होना चाहिये। दुर्ग कलेक्टर को एक नागरिक ने फोन कर खबर की कि अमुक होटल में जिस पानी का इस्तेमाल हो उसकी है कि उसकी टंकी सफाई अरसे से नहीं की गई है। इससे बीमारी फैलने का खतरा है। होटल ने पार्किंग के लिये तय जगह पर ताला लगा रखा है, यातायाता में बाधा पहुंचती है। कलेक्टर ने एक्शन लिया। उनके निर्देश पर मातहत गये और जांच के बाद पांच हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया गया। आम तौर पर ग्राहक सजग नहीं होते और इस तरह के लफड़े में नहीं पड़ते। अधिकारियों की तरफ से रिस्पांस मिलेगा या नहीं इसे लेकर भी सशंकित रहते हैं। वैसे यह सीजन तो है ही होटलों में छापा मारने का। दशहरा-दीपावली पर फूड और नगर निगम वालों की कमाई का मौसम। पता नहीं दुर्ग में चूक कैसे हो रही है।
सख्ती हो तो ग्वालियर हाईकोर्ट जैसी...
चुनावी रैली करने से पहले, सभा में पहुंचने वाले अनुमानित लोगों के लिये मास्क और सैनेटाइजर खरीदने पर जितनी राशि खर्च होगी उससे दुगना कलेक्टर के पास नेताओं को जमा करना होगा। मास्क और सैनेटाइजर देना भी प्रत्याशी की जिम्मेदारी होगी। उनको बताना होगा कि यहां वे वर्चुअल सभा क्यों नहीं कर सकते? चुनाव आयोग इस व्यवस्था से संतुष्ट होंगे, इसी के बाद कलेक्टर की अनुमति प्रभावी मानी जायेगी। यह आदेश मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ का है। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्रत्याशी को प्रचार करने का हक है उसी तरह लोगों को जीने का। दतिया और ग्वालियर के मामलों में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ कोर्ट ने एफआईआर का निर्देश दिया है। इन नेताओं की 5 अक्टूबर को रैलियां हुई थीं, जिसमें लोगों ने न मास्क पहने, न सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा था। छत्तीसगढ़ के मरवाही विधानसभा चुनाव की तस्वीर इससे कुछ अलग नहीं है पर यहां सभा, रैलियों की अनुमति आसानी से मिल रही है और सभी दलों के नेता मुक्त प्रचार में लगे हैं। वे कोरोना से बचाव के दिशा-निर्देशों को मानने की बजाय एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मरवाही गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के अंतर्गत आता है जहां बीते कुछ दिनों से कोरोना संक्रमण के केस बढ़ रहे हैं। ग्वालियर पीठ ने जो आदेश कलेक्टरों को दिया है, वह यहां लागू क्यों नहीं होना चाहिये?
मरवाही में ठिकाना ढूंढते वीआईपी..
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बीते दिनों गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही के दौरे पर नामांकन के दौरान रखी गई सभा में कह गये कि यह इलाका जिला नहीं बनने के कारण 20 साल पीछे चला गया। उनकी बात कितनी खरी थी, यह कांग्रेस ही नहीं भाजपा के नेता भी इन दिनों महसूस कर रहे हैं। वे यहां ठहरने और भोजन का ठिकाना ढूंढकर परेशान हुए जा रहे हैं। पूरे जिले में गौरेला स्टेशन के आसपास का हिस्सा ही कस्बाई है बाकी सब गांव देहात। यहां कुछ जमा पांच होटल लॉज हैं और इतने ही ठीक-ठाक भोजनालय। सब जगह भीड़। मरवाही में तो यह सुविधा भी नहीं है। चुनाव आचार संहिता के कारण सरकारी रेस्ट हाउस नेताओं को मिलने से रहे। अब वे स्थानीय लोगों से मनुहार कर रहे हैं। कुछ को तो जगह मिल गई है पर ज्यादातर लोगों को, जिनमें महिला नेत्रियां भी शामिल हैं, खासी परेशानी है। कुछ नेता तो अगले एक पखवाड़े के लिये मकानों का मुंहमांगा किराया देने के लिये भी तैयार हैं पर ग्रामीण इसके लिये भी हां नहीं कह रहे हैं। उन्हें बाहर से आये लोगों से कोरोना फैलने का डर है। कांग्रेस से तो कम से 50 वीआईपी हैं, पर भाजपा से भी कम नहीं। करीब इतने ही भूतपूर्व वीआईपी उनकी तरफ भी हैं। कई नेता अमरकंटक, बिलासपुर के रास्ते में इक्के-दुक्के बने रिसॉर्ट में ठहर रहे हैं। कुछ ने कहीं-कहीं से रिश्तेदारी, परिचय निकालकर ठिकाना ढूंढा है बाकी भटक रहे हैं। मना रहे हैं टास्क पूरा हो और यहां से निकल भागें।
समर्थक बेचैन हैं...
पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कट्टर समर्थक बेचैन हैं। उन्हें संगठन में पद नहीं मिल रहा है। जबकि राजेश मूणत अपने कई करीबियों को प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दिला चुके हैं। पार्टी के कई नेता मानने लगे हैं कि संगठन में पद पाने के लिए रमन सिंह का आशीर्वाद जरूरी है। हाल यह है कि रमन सिंह के धुर विरोधी माने जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक अब रमन सिंह के दरवाजे जाने से परहेज नहीं कर रहे हैं।
बृजमोहन के एक करीबी युवा नेता ने तो उज्जैन महाकाल मंदिर के सामने से बकायदा वीडियो जारी कर रमन सिंह को जन्मदिन की बधाई दी। वे यह बताने से नहीं चूके कि रमन सिंह के दीर्घायु होने के लिए भगवान महाकाल से प्रार्थना की है। इतना सबकुछ करने के बावजूद प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति में उनका नाम नहीं जुड़ पाया।
ऐसे ही बृजमोहन के एक करीबी पूर्व विधायक पिछले कुछ महीनों से रमन सिंह के निवास मौलश्री विहार के चक्कर काट रहे हैं। पूर्व विधायक की इच्छा जिला अध्यक्ष बनने की है, और वे इसके लिए रमन सिंह का समर्थन पाने की उम्मीद से हैं। सुनते हैं कि पूर्व विधायक के पद के लिए जोगी पार्टी के एक नेता ने भी पैरवी की है। जोगी पार्टी के इस नेता के रमन सिंह से काफी अच्छे संबंध हैं। मगर पूर्व विधायक की इच्छा पूरी हो पाती है या नहीं, देखना है।
उम्मीद से हैं..
जोगी की जाति प्रकरण पर संतकुमार नेताम ने लंबी लड़ाई लड़ी है। पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर संतकुमार नेताम भाजपा के आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री रहे हैं, और वे नंदकुमार साय के करीबी माने जाते हैं। नेताम को प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो उन्हें पद मिलने की उम्मीद थी। मगर उन्हें कुछ नहीं मिला। थक हारकर विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले कांग्रेस में शामिल हो गए।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद नेताम जोगी परिवार के खिलाफ जाति प्रमाण पत्र प्रकरण को लेकर और भी ज्यादा मुखर हो गए। अमित जोगी और ऋचा जोगी का नामांकन निरस्त होने के बाद वे सुर्खियों में हैं। नेताम ने मरवाही सीट से टिकट भी मांगी थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, मगर वे निराश नहीं हैं। वजह यह है कि सरकार के निगम-आयोग में उन्हें जगह मिल सकती है। पिछले दिनों आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने उन्हें साफ तौर पर बता दिया कि चुनाव के बाद सरकार उन्हें आयोग में पद देगी। ऐसे में नेताम का खुश होना लाजमी है।
कृषि कानून, अब बढ़ेगी धान की तस्करी?
नये कृषि बिल के रुझान आने लगे हैं। किसी भी जगह से कोई ऐसी ख़बर नहीं है कि किसानों को समर्थन मूल्य से ज्यादा देकर उपज खरीदने के लिये कोई व्यापारी तैयार हो, अलबत्ता पंजाब में यूपी और बिहार के धान की तस्करी होने लगी है। राइस मिलर्स 900 रुपये से 1100 रुपये क्विंटल पर धान खरीदकर ला रहे हैं। पंजाब में एमएसपी 1880 रुपये है। क्विंटल पीछे भाड़ा भी 100-150 रुपये जोड़ देने पर वे 500 रुपये प्रति क्विंटल मुनाफे में हैं। पंजाब पुलिस और मंडी के अधिकारी इस तस्करी को रोकने के लिये सीमाओं पर तैनात हैं। हाल ही में करीब 1.5 करोड़ रुपये का धान पकड़ा भी गया। छत्तीसगढ़ भी धान के बड़े उत्पादक राज्यों में है। यहां तो धान का समर्थन मूल्य पंजाब से भी 620 रुपये ज्यादा है। सीमाओं पर वैसे भी निगरानी बढ़ानी पड़ती है क्योंकि एमपी और दूसरे लगे हुए राज्यों का धान स्थानीय किसानों की ऋ ण पुस्तिका का इस्तेमाल कर बेच दिया जाता है। पंजाब की तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केन्द्र का कानून लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। विधानसभा के विशेष सत्र में जो राज्यपाल द्वारा फाइल लौटाने की वजह से चर्चा में आ गया है, इसी पर चर्चा होगी। यानि अब राज्य के उडऩ दस्तों को एम पी की शराब के साथ चावल की गाडिय़ों पर भी नजर रखना जरूरी हो जायेगा।
जब जिंदा होने का सबूत देना पड़े...
कहते हैं गांवों में कलेक्टर से ज्यादा ताकतवर पटवारी होता है। पर यह मुहावरा सरपंचों पर भी सही बैठता है। मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक के चेचानडीह गांव की चार वृद्ध महिलायें दूर गांव से चलकर लाठियां टेकते वहां कलेक्टोरेट पहुंचीं। उन्होंने बताया कि वे यहां अपने जिंदा माने जाने की फरियाद लेकर आई हैं। सरपंच ने आवास मंजूरी के लिये ग्राम सभा बुलाई और हमारा नाम मृत लोगों की सूची में डाल दिया। आवास तो चलो मिले न मिले, लेकिन पेंशन और राशन भी इसकी वजह से बंद हो गई है। एक बार नाम कटने के बाद दुबारा जुडऩा मुश्किल है। इनके पास कोई सिफारिश भी नहीं है। सरपंच बताते हैं कि पूर्व सरपंच ने किसी बात का बदला लेने के लिये यह किया है। शायद आवास योजना का कोटा अपने लोगों के लिये तय करना होगा। इन वृद्धाओं को उम्मीद है कि अब उन्हें जीते जी, जिंदा होने का कागज मिल जायेगा और राशन पेंशन भी।
दो नंबर की दारू, मालिक का क्या?
हरियाणा पुलिस ने दिल्ली जाकर वहां एक शराब कारखाना के मालिक को गिरफ्तार किया है कि उसके कारखाने में बनी शराब हरियाणा में स्मगलिंग से पहुंच रही थी। इस डिस्टिलरी में बनी शराब हरियाणा में पकड़ाई थी, और वहां पुलिस की जांच में इसका मालिक अशोक जैन पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहा था। अब एक अदालत के आदेश से पुलिस उसे गिरफ्तार कर ले गई।
इधर छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरे प्रदेशों के लिए बनी हुई शराब स्मगलिंग से आकर गांव-गांव में बिक रही है। मध्यप्रदेश में बनी गोवा का बड़ा स्टॉक अभी यहां जब्त हुआ, तो आबकारी विभाग के जानकार लोगों ने बताया छत्तीसगढ़ में केडिया डिस्टिलरी यह ब्रांड बनाती है, और केडिया का ही दूसरा बेटा मध्यप्रदेश में यह ब्रांड बनाता है। नियमों के हिसाब से कोई ब्रांड एक ही प्रदेश में बनाया जा सकता है, और उस नाम से दूसरे प्रदेश में दारू नहीं बनाई जा सकती।
लेकिन इस नियम से परे बड़ी बात यह है कि दो नंबर की दारू का बड़ा-बड़ा स्टॉक पकड़ाने के बाद भी, महंगी गाडिय़ों में जब्ती होने के बाद भी जहां से दारू बनकर आई है उस कंपनी या कारखाने के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? अगर चार बड़े कारखानेदार जेल चले जाएं, तो सारी तस्करी थम जाएगी। लेकिन शराब कारखानेदार सत्तारूढ़ राजनीति में इतना वजन रखते हैं कि उनकी गिरफ्तारी आसान नहीं रहती है। अभी हरियाणा में जिस जैन की गिरफ्तारी हुई है उसके बारे में भी लोगों का यही कहना है कि हरियाणा सरकार से पटी नहीं होगी, इसलिए उसे पटरी से उतार दिया। क्योंकि लोगों ने यह देखा कि जिस वक्त की शराब तस्करी के लिए इस डिस्टिलरी मालिक को गिरफ्तार किया गया उसी दौर में आधा दर्जन दूसरे डिस्टिलरी की भी टैक्स चोरी की शराब जब्त हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। दो नंबर की दारू जनता के हक में आने वाले टैक्स की बहुत बड़ी चोरी होती है, और जिस देश में जनता एक-एक पैसे के लिए तरस रही है, वहां पर अरबों की टैक्स चोरी छोटी बात तो है नहीं।
मरवाही में नोटा पर भी नजर...
मरवाही में जोगी दम्पत्ति का नामांकन रद्द होने के बाद भी यहां के एक-एक घटनाक्रम पर लोगों की जबरदस्त दिलचस्पी बनी हुई है। अमित जोगी किसी का समर्थन या विरोध नहीं करेंगे यह अपने बयान में कह चुके हैं लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि वे गांव-गांव जायेंगे और न्याय मांगेंगे। अब, मरवाही के मतदाताओं ने उनके साथ कोई अन्याय तो किया नहीं। उन्होंने तो हर चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जिताया। जो संकट सामने है उसका फैसला तो आखिरकार कोर्ट में होना है। अमित जोगी के इस रुख का किसे कितना फायदा होगा, या नुकसान आने वाले कुछ दिनों में साफ होगा। वे पक्ष-विपक्ष किसी का साथ नहीं देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में उनके दौरे चुनाव आयोग के घेरे में भी नहीं होंगे। बस, एक बात ध्यान में रखनी होगी कि इस बार कांग्रेस या भाजपा किसी के लिये भी यह चुनाव एकतरफा नहीं है, जैसा जोगी के मैदान में रहते होता था। अब नोटा भी उलटफेर कर सकती है। दंतेवाड़ा का सन् 2018 का चुनाव याद होगा जब भीमा मंडावी जीते थे। उनके और कांग्रेस उम्मीदवार के बीच हार-जीत का फासला करीब दो हजार मतों का था और नोटा में चले गये थे जागरूक तथा नेताओं से खिन्न मतदाताओं के 9929 वोट। कांग्रेस भाजपा के बाद नोटा से अधिक वोट पाने वाले एक ही उम्मीदवार थे सीपीआई के नंदराम सोरी। मरवाही में 2018 के चुनाव में अगर कड़ी टक्कर होती तो नोटा पर ध्यान जाता। यहां भी नोटा को 4500 से ज्यादा वोट मिले। कुल दस प्रत्याशियों में पांच ऐसे थे जिन्हें नोटा से कम मत मिले। मरवाही में फैसला दो डॉक्टरों पर होना है। देखें नोटा की यहां क्या भूमिका होगी? नोट और नोटा ?!
धान का एथेनॉल और हंगर इन्डेक्स
धान खरीदी पर प्रोत्साहन दिये जाने के कारण इसका उत्पादन प्रदेश में लगातार बढ़ता ही जा रहा है लेकिन उगाये धान को खपाये कहां? पिछले सीजन में करीब 83 लाख टन मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई, जिससे 56.50 लाख टन चावल मिला। विभिन्न योजनाओं में खपाने के बावजूद करीब 10.50 लाख टन मीट्रिक धान या कहें 7.10 लाख चावल बच गया। केन्द्र सरकार अतिरिक्त चावल खरीदने को तैयार नहीं होता। इसे लेकर पिछले सत्र में विवाद था आगे भी इसकी संभावना बनी हुई है। इसे देखते हुए बचे हुए धान का एथेनॉल बनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने केन्द्र को दिया था और इसके लिये मंजूरी तथा मदद मांगी थी। केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस प्रस्ताव को मान लिया है। भाजपा की बैठक में उन्होंने इस निर्णय की घोषणा की। धान खरीदी के कारण राजस्व पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार इससे कुछ कम होगा। दूसरी ओर दो दिन पहले ही आई एक और रिपोर्ट सामने है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 107 देशों में भारत का स्थान 94वां है। एक तरफ लोगों की जरूरत से ज्यादा अनाज है दूसरी तरफ भुखमरी भी। एक ही देश में। कल्याणकारी योजनाओं और वितरण व्यवस्था की विफलता, नीति बनाने वालों की गड़बड़ी, आखिर ये है क्या?
कल तक नकली, आज हमदर्दी !
पूर्व सीएम रमन सिंह ने अमित और ऋचा जोगी के जाति प्रमाण पत्र और नामांकन निरस्त करने के फैसले की आलोचना कर पार्टी के आदिवासी नेताओं की नाराजगी मोल ले ली है। रमन सिंह का जोगी परिवार के समर्थन में खड़े होना विशेषकर दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर और रामविचार नेताम को बिल्कुल नहीं भा रहा है। तीनों ने जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने के छानबीन समिति के फैसले का स्वागत किया है।
सुनते हैं कि पार्टी के भीतर आदिवासी एक्सप्रेस चलने की सुगबुगाहट है। रमन सिंह के पहले कार्यकाल में भी आदिवासी एक्सप्रेस दिल्ली रूट पर चली थी। तब आदिवासी-गैर आदिवासी, करीब डेढ़ दर्जन विधायकों ने रमन सिंह के खिलाफ मोर्चाबंदी की थी। तब हाईकमान और रमन सिंह की शालीनता-सज्जनता के आगे ये विधायक नतमस्तक होकर रह गए थे और फिर कभी खुले तौर पर नाराजगी सामने नहीं आई। इसके बाद तो पार्टी के भीतर रमन का कद बढ़ता गया और 15 साल सीएम रहने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। वे प्रदेश से अकेले राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।
अब जब रमन सिंह, जाति प्रमाण मसले पर जोगी परिवार के साथ खड़े दिख रहे हैं, तो ये आदिवासी नेता बुरी तरह उखड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि भाजपा पहली बार जोगी को नकली आदिवासी प्रचारित कर सत्ता में आई थी। तब जोगी के खिलाफ मुहिम के अगुवा नंदकुमार साय थे। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें अजीत जोगी के हाथों बुरी हार का सामना करना पड़ा और वे सीएम पद की दौड़ से बाहर हो गए। साय इस बात को नहीं भूल पाए हैं।
चर्चा है कि साय और बाकी आदिवासी नेता पार्टी के भीतर रमन सिंह के दबदबे को खत्म करने के लिए मुहिम चला सकते हैं। इन नेताओं के बीच आपस में चर्चा चल भी रही है, और कुछ लोगों का अंदाजा है कि रमन सिंह विरोधी गैरआदिवासी नेताओं का भी उन्हें साथ मिल सकता है। पार्टी के असंतुष्ट नेता आने वाले दिनों में कैसा रूख अपनाते हैं, यह देखना है।
12 साल बाद वही, पर हालात अलग
नवंबर 2006 की घटना है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के निधन के बाद कोटा विधानसभा चुनाव के प्रबल दावेदार उनके परिवार के ही किसी सदस्य को माना जा रहा था। सब मानते थे कि स्व। शुक्ल की कोटा क्षेत्र में इतनी पकड़ थी कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य चुनाव लड़े जीत पक्की थी। स्व। शुक्ला के परिवार के प्राय: सभी लोग अच्छे शासकीय सेवा में थे और हैं। सिर्फ एक बेटे जिनकी राजनीति में दिलचस्पी थी, वे सुनील शुक्ला हैं। कांग्रेस ने उनके लिये टिकट पक्की कर दी। इधर कोटा के कार्यकर्ताओं का एक धड़ा शुक्ल विरोधी भी था जो स्व। अजीत जोगी के करीबी थे। उन्होंने सुनील शुक्ला को टिकट देने के खिलाफ आवाज उठाई। नामांकन दाखिले के अंतिम दिन तक ऊहापोह की स्थिति थी। सुनील शुक्ला पर भारी दबाव था, उन्हें अपनी मिली हुई ऐसी टिकट जिसमें जीत पक्की थी, वापस करनी पड़ी। डॉ। रेणु जोगी को इस चुनाव में टिकट मिली, तब से वे लगातार जीतते आ रही हैं। पिछली बार उन्होंने कोटा से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की टिकट पर चुनाव जीता तो पहली बार कांग्रेस यहां से बुरी तरह हारी। लोगों ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के डमी प्रत्याशी थे। पहली बार हुआ कि हमेशा जीतने वाली कांग्रेस इस सीट में तीसरे स्थान पर रही। सन् 2018 के चुनाव में जब हवा चलने लगी कि डॉ। जोगी को कांग्रेस की टिकट नहीं मिलेगी, तब फिर सुनील शुक्ला ने बयान दिया कि अब वे अपने पिता की विरासत को संभालना चाहते हैं। पर इन 12 सालों में बहुत कुछ घट गया था। टिकट लौटाने के बाद वे कांग्रेस के कार्यक्रमों में भी नहीं दिखते थे। एकाएक टिकट की मांग की तो पार्टी में उनके नाम पर किसी ने गंभीरता से विचार ही नहीं किया। इस क्षेत्र में कोटा के बाद मरवाही दूसरी सीट है जहां किसी कद्दावर नेता की मौत के बाद उनके परिवार को उनकी विरासत संभालने का मौका नहीं मिल पाया। इतिहास की पुनरावृत्ति हुई है पर परिस्थितियां भिन्न हैं। टिकट तो अमित जोगी के हाथ में था पर नामांकन वैध कराना नहीं।
तब तक ढील नहीं...
कोरोना संक्रमण के मामले में देश के अलग-अलग राज्यों से मिले-जुले आंकड़े आ रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने शायद अति उत्साह में कह दिया हो कि कोरोना का पीक दौर चला गया है। पीडि़तों की संख्या में कभी उछाल तो कभी गिरावट आती ही रही है। वैसे अपने ही बयान में उन्होंने यह भी कह दिया है कि ठंड के दिनों में एक आंधी और आ सकती है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। पूरे प्रदेश में कल काफी दिनों के बाद ऐसा हुआ कि संक्रमितों की संख्या दो हजार से कम मिली लेकिन मौतों की संख्या कम नहीं हो रही है। बीते 24 घंटे में 10 लोगों की मौत दर्ज की गई। इनमें से 7 केस ऐसे बताये गये हैं जो किसी अन्य गंभीर बीमारी से भी पीडि़त थे। जब मंत्री कहें कि कोरोना से मुक्त हो रहे हैं तो उनका बयान एमपी, बिहार, मरवाही के कार्यकर्ताओं का हौसला या कहें, लापरवाही बढ़ाने के लिये काफी है। बीते सात-आठ महीने का बहुत खराब दौर गुजर जरूर चुका है पर मौजूदा हालात को नजरअंदाज करना घातक होगा। कोरोना से बचकर बाहर आये अमिताभ बच्चन कह रहे हों तब तो मान ही लेना चाहिये- जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।
कल ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान भी देखें कि केरल में त्यौहार के बाद जिस तरह कोरोना बढ़ा उसे याद रखना चाहिए। अभी तो अगला एक महीना छत्तीसगढ़ में त्यौहार ही त्यौहार हैं।
मौत एक और आदिवासी लडक़ी की...
छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर संभाग की कई गंभीर ख़बरें राजधानी तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है। सुर्खियों में महिला सुरक्षा, दलित अत्याचार पर सेमिनार, सरकारी बैठकें और सख्त निर्देश होती हैं। कहा जा रहा है कि फरसगांव में एक आदिवासी बालिका का एक पुलिस कर्मी शारीरिक शोषण करता रहा। गर्भवती हुई तो उसे दुत्कार दिया। सामाजिक उलाहना के डर से बालिका घर छोडक़र शिशु के साथ निकल गई और संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की बात सामने आई। मौत के बाद उस कथित पुलिस वाले के खिलाफ शिकायत हुई। कार्रवाई क्या हुई? उसे बस निलम्बित कर दिया गया है। दुष्कर्म के आरोप में न एफआईआर न कोई गिरफ्तारी। सरगुजा संभाग और बस्तर की कुछ घटनायें सामने आने पर राज्यपाल ने भी पुलिस के रवैये पर तेवर तीखे किये थे। पर दिखता यही है कि जब तक प्रशासन का दबाव न हो, पुलिस अपने विभाग के लोगों को बचाने की कोशिश करती है। केसकाल के पूर्व विधायक कृष्ण कुमार ध्रुव ने इस सवाल को बाल संरक्षण आयोग और उच्चाधिकारियों के सामने रखा है, देखें उनकी शिकायत को गंभीरता से लिया जाता है या नहीं।
मुख्यमंत्री ने पुलिस को महिला प्रताडऩा पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश तो दे दिए हैं, लेकिन वे पहले पुलिस विभाग के भीतर सेक्स शोषण के मामलों को तो देख लें जो बरसों से पड़े हैं !
मां तो बस मां होती है....
मरवाही विधानसभा उप-चुनाव के लिये नामांकन दाखिले के दिन जिला मुख्यालय के सामने भारी गहमागहमी थी। काफी उलझन और तनाव भरे माहौल में जोगी परिवार भी इसी परिसर में मौजूद था। अमित जोगी और ऋ चा जोगी साथ खड़े थे, एक खबरनवीस ने ऋ चा जोगी से कहा, पिछला चुनाव (अकलतरा) बस दो हजार से हार गईं लेकिन इस बार तो आपको विधानसभा में पहुंचने का पूरा मौका है। खबरनवीस को लगा कि अपनी तारीफ सुनकर ऋ चा जोगी खुश होंगी, लेकिन उन्होंने कहा- नहीं, मैं तो सोच रही हूं कि अगर किसी कारण से मुझे चुनाव में निकलना पड़ेगा तो सब कैसे मैनेज होगा। अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है, मैं तो चाहती हूं पूरे समय उसे अपनी आंखों के सामने रखूं। मुझे तो परिस्थितियों के चलते सामने आना पड़ा है, अभी तो ऐसी कोई इच्छा थी नहीं।
कोरोना का रोल मॉडल अस्पताल
एम्स, मेडिकल और सरकारी कोविड अस्पतालों में कोई शक नहीं डॉक्टर और स्टाफ अपनी पूरी क्षमता से कोरोना संक्रमितों का बेहतर इलाज की कोशिश कर रहे हैं। इन सबके बीच अलग तरह का काम कर रहा रहा है केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भरनी के अस्पताल में तैनात युवा डॉक्टर। तीन डॉक्टरों डॉ. रमेश यादव, डॉ. एस के जैन और डॉ. सुरेन्द्र सानगोड़े की टीम ने अब तक 150 कोरोना मरीजों का इलाज किया। यहां किसी की मौत नहीं हुई। मरीजों में न केवल सुरक्षा बल व पुलिस के जवान हैं बल्कि आम लोगों के बीच से हैं। ये मरीज सिर्फ सीआरपीएफ कैंप के नहीं बल्कि बस्तर, रायपुर से भी आये हैं। जब बिस्तर खाली हो तो बाहरी मरीजों को भी भर्ती किया जाता है। इन डॉक्टरों का दावा है कि कोरोना संक्रमण का असर चेस्ट पर कैसा है इसी से बीमारी की गंभीरता को वे भांप लेते हैं। मरीज के छाती का प्रतिदिन तय समय पर एक्स रे लिया जाता है फिर उसकी स्टडी कर उनके लिये उपचार तय किया जाता है। इन डॉक्टरों का यह भी कहना है कि कोरोना का इलाज महंगा नहीं है बस सावधानी और ऑब्जर्वेशन जरूरी है। यह संयोग ही है कि इसी भरनी से थोड़ा आगे जाने पर गनियारी गांव मिलता है जहां स्थापित जन सहयोग केन्द्र के डॉक्टरों का किफायती इलाज पूरे देश में चर्चित है।
अर्चना पोर्ते के जाने का राज
मरवाही की भाजपा नेत्री अर्चना पोर्ते कांग्रेस में शामिल हुई, तो भाजपा में खलबली मच गई। अर्चना को पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मरवाही से उम्मीदवार बनाया था और वे दूसरे स्थान पर रहीं। उपचुनाव में उन्हें टिकट मिलने का पूरा भरोसा था। मगर पार्टी ने उनकी जगह चिकित्सक गंभीर सिंह को उम्मीदवार बनाया, तो अर्चना की नाराजगी स्वाभाविक थी। मगर वे भाजपा छोड़ देंगी, इसका अंदेशा पार्टी नेताओं को नहीं था।
सुनते हैं कि अर्चना पोर्ते को कांग्रेस में लाने में जोगी पार्टी के विधायक देवव्रत सिंह की अहम भूमिका रही है। देवव्रत और अर्चना पोर्ते की कॉलेज के दिनों से जान-पहचान है और दोनों बैंग्लोर में एक साथ पढ़ाई करते थे। अर्चना को टिकट नहीं मिली, तो कांग्रेस के रणनीतिकारों ने देवव्रत से संपर्क किया। फिर क्या था, देवव्रत की पहल पर अर्चना कांग्रेस में आने के लिए तैयार हो गईं। चर्चा है कि दाऊजी ने खुद फोन कर अर्चना को कांग्रेस में लाने के लिए देवव्रत को धन्यवाद दिया।
कार्यकर्ताओं का गुस्सा
मरवाही विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपनी ताकत झोंक रही है। 50 विधायकों की तो ड्यूटी लगाई गई है, लेकिन प्रदेशभर से छोटे-बड़े कार्यकर्ता प्रचार के लिए वहां जाना चाहते हैं। रोजाना राजीव भवन में पदाधिकारियों को फोन लगाकर इसके लिए अनुमति भी मांग रहे हैं। मगर प्रदेश संगठन इसकी अनुमति नहीं दे रहा है।
दूसरी तरफ, भाजपा का हाल बेहाल है। स्थानीय कार्यकर्ता तो ठीक से जुट नहीं रहे हैं, दूसरे इलाकों से भी कार्यकर्ता प्रचार में जाने से कन्नी काट रहे हैं। सुनते हैं कि बिलासपुर भाजपा के कुछ नेताओं ने महामंत्री (संगठन) पवन साय को फोन कर चुनाव संचालक अमर अग्रवाल और भूपेन्द्र सवन्नी को ही बदलने की मांग कर दी है। अमर का चुनाव प्रबंधन काफी बेहतर रहता है। बावजूद इसके उन्हें बदलने की मांग करना पार्टी नेताओं को चौंका भी रहा है।
चर्चा है कि पिछले दिनों अमर ने मंडल स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाने के निर्देश दिए थे। खर्चा-पानी के लिए 25 हजार रूपए देने की बात हुई थी, एक जगह सम्मेलन तो हुआ, लेकिन भीड़ कम आई। सवन्नी ने 25 हजार के बजाए 5 हजार रूपए ही देने के निर्देश दिए। इससे वहां के कार्यकर्ता काफी खफा हैं। एक तरफ पेंड्रा के आसपास के ढाबों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मनचाहे खाने-पीने की छूट है, तो भाजपा के लोग चाय-नाश्ते का इंतजाम भी ठीक से नहीं कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा भडक़ना तो स्वाभाविक है।
70 साल की आजादी के बाद बिजली
बस्तर की नक्सल समस्या का हल कैसे हो इस पर अनेक विशेषज्ञों ने शोध किये और सुझाव देते रहे हैं, पर एक तरीका तो हमेशा कारगर होगा कि वहां के निवासी प्रशासन पर भरोसा करें। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर चिकपाल धुर नक्सल इलाकों में शामिल है। यहां सीआरपीएफ ने अपना कैंप लगा रखा है। हैरानी की बात नहीं कि यह बस्तर के उन दर्जनों गांवों में एक है जहां लोगों ने आजादी के 70 साल बाद हाल ही में बिजली देखी। हाल ही में बिजली विभाग ने ट्रांसफार्मर लगाया और जहां लाइन नहीं खींची जा सकती थी वहां क्रेडा ने सोलर पैनल लगा दिया। ज्यादातर ग्रामीणों ने आधार कार्ड नहीं बनवाये थे, वहां कार्ड बनवाने के लिये कैम्प लगा दिया गया। खेती, पशुपालन, उद्यानिकी, स्व-सहायता समूह के तहत वनोपज तथा हल्दी अदरक की खेती जैसे कई काम चार पांच महीने के भीतर ही शुरू हुए हैं और गांव में बदलाव दिखाई दे रहा है। वहां देवगुड़ी को इस तरह संवार दिया गया है कि यहां पर्यटन करने वाले भी पहुंचे। यह सब वहां के कलेक्टर की रुचि पर हो रहा है। सरकारी सूचना के मुताबिक उन्होंने इसे आने के बाद आदर्श गांव के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। कलेक्टर की रूचि के चलते जिले व ब्लॉक स्तर के बाकी अधिकारी भी वहां लगातार दौरे कर रहे हैं। बस, होना यह चाहिये कि कलेक्टर बदलें तो भी चिकपाल जैसे गांवों को संवारा जाता रहे। अक्सर ऐसा होता नहीं।
वाट्सएप प्रेमी हजार से ज्यादा युवा बने शिक्षक
पढ़े लिखे बेरोजगार युवक गांवों में रहकर कैसे वक्त बिताते हैं? जाहिर है वाट्सएप चैटिंग और दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म पर। कोरोना काल में जब स्कूलों के ताले नहीं खुल पा रहे हैं, उनके इस समय काटने वाली गतिविधि को कोरबा जिले के शिक्षक उत्पादकता से जोडऩे में लगे हुए हैं। जिले में करीब एक हजार प्रायमरी और मिडिल स्कूल हैं। इन कक्षाओं का कोर्स इतना कठिन भी नहीं कि 10-12वीं और ग्रेजुएट हो चुके युवा समझ और समझा न सकें। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने मिलकर अभियान चलाया और अब तक 1300 ऐसे युवाओं को तैयार कर लिया है जो अपने मोहल्ले के, आसपास के बच्चों को कुछ घंटे देंगे और उनकी रुकी हुई पढ़ाई को रफ्तार देंगे। क्या पढ़ाना है यह वाट्सअप पर, शिक्षा विभाग के अधिकारी और शिक्षक उन्हें वाट्सअप भेजकर बतायेंगे। कोई कठिनाई आ रही हो तो उसे दूर करने के लिये भी वाट्सएप पर चैटिंग कर ली जायेगी। अब तो सुदूर क्षेत्रों में भी नेटवर्क पहुंच रहा है। कोई युवा चार बच्चों को तो कोई 6 को पढ़ा रहा है। अपने ही घर में बुलाकर या उनके पास जाकर पढ़ा रहे हैं। जो युवा बैठे हैं उनमें से सभी फालतू मैसेज फारवर्ड करने वाले नहीं मिले, बहुत से लोग है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कोई ऑनलाइन बिजनेस मैनेजमेंट सीख रहा है तो कोई और कुछ। इनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाने से उनको भीतर से खुशी मिल रही है साथ ही जिन परीक्षाओं की वे खुद तैयारी कर रहे हैं उसमें भी लाभ मिल रहा है। कोरोना काल में शिक्षा को बचाये रखने जारी रखने के लिये अलग-अलग तरह से प्रयोग किये जा रहे हैं। इनमें एक नया ईजाद यह भी है।
अपने बच्चों को चुनौती देकर देखें
जिन लोगों को लगता है कि आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, वीडियो गेम्स खेलने वाले उनके बच्चे पुरानी पीढिय़ों के मुकाबले अधिक होशियार हैं, तो उन्हें इम्तिहान का यह पर्चा देना चाहिए जो कि कक्षा पांचवीं का है। यह अलग बात है कि यह पौन सदी पहले 1943-44 की छमाही परीक्षा का है। इसे एक पत्रकार समरेन्द्र शर्मा ने पोस्ट करते हुए राहत की सांस ली है-गनीमत है कि हमारे समय में ऐसा पर्चा नहीं होता था!
नख, शिख, दंत विहीन आयोग..

आम लोग प्रताडि़त होते हैं पर कई बार सरकारी मशीनरी दबाव में, प्रभाव में आकर पीडि़तों के साथ न्याय नहीं करती। ऐसे में पीडि़तों को संवेदना के साथ शीघ्रता से न्याय मिले, पुलिस और अदालत की जटिल प्रक्रिया में न उलझना पड़े, इसके लिये बहुत से आयोग बनाये गये हैं। जैसे लोक आयोग, बाल आयोग, महिला आयोग। पर सरकारें कोई भी हों इन आयोगों की ताकत को जान-बूझकर सीमित रखना चाहती हैं। मंत्रालयों के अफसर इनकी भूमिका को बर्दाश्त नहीं करते।
लोक आयोग के एक पूर्व अध्यक्ष जस्टिस एल सी भादू ने एक बार अपनी रिपोर्ट में कहा था कि आयोग की शक्तियां कुछ नहीं हैं। वह नख, शिख, दंत विहीन है। आयोगों में जिनकी शिकायत होती है उनमें से अनेक लोगों को यह पता होता है और वे आयोग की नोटिस, फैसलों, सिफारिशों की वे परवाह नहीं करते। आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। अब यही बात खुलेआम एक प्रशासनिक अधिकारी ने कह दी है।
बैकुंठपुर कोरिया के एडीएम को उनकी पत्नी की शिकायत पर नोटिस देकर बुलाया गया, तो उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्ष को ही धमका दिया। सुनवाई के दौरान कह दिया कि वे आयोग को नहीं मानते, जो करना है कर ले। आयोग के पास अधिकारी की पत्नी तब पहुंची थी जब पुलिस और विभागीय स्तर पर की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अधिकारी पर घरेलू हिंसा, मारपीट का आरोप है। हाल ही में महिला आयोग अध्यक्ष ने पुलिस मुख्यालय के एक शीर्ष अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने वाली महिला आरक्षक को भी न्याय दिलाने की बात कही थी पर उस पर कोर्ट ने फिलहाल अधिकारी को राहत दे दी है।
भाजपा शासनकाल में सन् 2014 के आसपास आयोगों को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिये मंत्रियों की एक समिति भी बनाई गई थी, पर उस समिति ने क्या रिपोर्ट दी अब तक पता नहीं है। धमकाने वाले एडीएम पर कार्रवाई के लिये किसी आयोग को सीएम या सीएस से शिकायत करने की जरूरत क्यों पडऩी चाहिये। लोक आयोग, महिला आयोग की सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं करनी है, उन्हें शक्तियां नहीं देनी है तो फिर भारी-भरकम सेटअप देकर अपव्यय क्यों किया जा रहा है और पीडि़तों को जबरन पेशियों में बुलाकर भटकाया क्यों जाता है?
बंगाली समाज की अनुशासित दुर्गा पूजा
राज्य के कई जिलों में नवरात्रि, दशहरा और दीवाली को देखते हुए बाजार को खोलने की समय सीमा में छूट दे दी गई है। कोरोना के कारण दुकानों, रेस्टारेंट को बंद करने की सीमा घटाई गई थी। अब पूरे त्यौहार निपटने तक छूट रहेगी। रेलवे ने भी स्पेशल ट्रेनों की घोषणायें की हैं। यह ट्रेन नवंबर माह के आखिरी तक चलेंगी।
त्यौहारों की माहभर से ज्यादा लम्बी कड़ी में सबसे ज्यादा भीड़ इक_ी होती है नवरात्रि पर। हजारों ज्योति कलशों का जगमगाना, देवी मंदिरों में लम्बी कतारों का लगना। मां के दरबार के लिये पदयात्रायें करना। विशाल दुर्गा प्रतिमायें, पंडाल की भारी सज्जा के साथ स्थापित करना। इस बार महामाया रतनपुर, मां बमलेश्वरी डोंगरगढ़ जैसे मंदिरों में दर्शन पर रोक लगी हुई है।
यूं तो हर त्यौहार सामाजिक उत्सव है लेकिन छत्तीसगढ़ में रह रहे बंगाली समाज के लिये नवरात्रि का अलग ही मतलब है। उनके दूर-दराज के रिश्तेदार घर लौटते हैं। काली बाड़ी में देवी की प्रतिमा स्थापित होती है। ढाकी बजते हैं। परिवार का हर सदस्य इसमें शामिल होता है। पंडित पारम्परिक तरीके से पूजा अर्पित कर प्रसाद वितरित करता है। यह प्रसाद ही उनका नौ दिनों का भोजन होता है। अधिकांश घरों में खाना ही नहीं बनता। हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। कोरोना महामारी के दौरान पूजा उत्सव के आयोजन पर लगाये गये प्रतिबंध के घेरे में उनका उत्सव आ गया है।
हावड़ा ट्रेन रूट के सभी बड़े शहरों में बंगाली समुदाय के लोग बसे हुए हैं। आयोजकों का कहना था कि पहले भी हम बहुत अनुशासित ढंग से पूजा करते थे और अब कोरोना के दौर में करना है तो निर्देशों को मानेंगे, कुछ और कड़ाई बरतेंगे। लेकिन कोलकाता शहर की तस्वीरें बंगालियों ने ही पोस्ट की हैं जिनमें दुकानों ने लोगों का रेला लगा हुआ है, मास्क लगाए हुए धक्का-मुक्की हो रही है. आखिर हर बंगाली के साल भर के कपडे पूजा के वक़्त ही बनते हैं, खरीददारी कैसे ना हो?
वही चखना, वही डिस्पोजल, वही आंदोलन...
दुर्ग जिले में मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र पतन के जामगांव ‘एम’ की शराब दुकान खोलने का विवाद दो माह से ज्यादा पुराना है। भाजपा के प्रदर्शन के दौरान वहां शराब की गाड़ी पहुंची और लूट ली गई। अमलेश्वर थाने में सात पेटी शराब लूट लिये जाने की एफआईआर दर्ज है। लूट के आरोप में गिरफ्तार हुए वे भाजपा के पदाधिकारी हैं। लॉकडाउन के दौरान प्रदेश में कई जगहों पर शराब दुकानें खुली रखी गईं। शहरी इलाकों में लॉकडाउन था तो बगल की देहात में खुली रहीं। भाजपा का कहना है कि हमें प्रदर्शन के लिये मजबूर होना पड़ा, लूटपाट हुई हो तो वह भीड़ में घुस आये असामाजिक तत्वों ने की। उनका आरोप है कि इसके पीछे कांग्रेसी थे। लूट के पहले ही आंदोलनकारियों ने मोर्चा संभाल लिया था। पर एफआईआर और गिरफ्तारी के बाद तो अब जो होना है, अदालत से होगा। दुर्ग सांसद के नेतृत्व में अब भाजपा कार्यकर्ता फिर आंदोलन पर हैं। अलग-अलग गुटों में एकता भी दिख रही है। क्या ऐसा नहीं लगता कि ऐसा ही माहौल पिछली सरकार में भी दिखाई देता रहा है? वैसी ही अशांति, वैसा ही चखना, डिस्पोजल, आबकारी, कानून- व्यवस्था और अपराध। बस आंदोलन के किरदार बदल गये हैं।
किसान फंसे ऑनलाइन पंजीयन में
समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिये बीते कई सालों से धान के रकबे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता रहा। बेजा कब्जा, पड़त भूमि, भर्री-बंजर भूमि को भी किसान अपने नाम पर बता देते थे, जिसके चलते उन्हें ज्यादा धान बेचने का मौका मिल जाता था। यह धान बिचौलियों और बड़े किसानों के होते थे। तीन चार साल से यह निर्देश है कि किसान की ऋण पुस्तिका काफी नहीं उनको अपना पंजीयन सहकारी समिति में कराना होगा। तब भी गड़बड़ी रोकी नहीं जा सकी। पिछली बार धान का रकबा अचानक बहुत ज्यादा दिखने लगा तो किसान के धान लेने के वास्तविक रकबे की रिपोर्ट (गिरदावरी) बनाने का काम पटवारियों को दिया। इस बार यह काम ऑनलाइन कर दिया गया है। यह सुनिश्चित किया गया है कि पटवारी रिकॉर्ड में दर्ज रकबा और समिति में पंजीकृत रकबे में कोई अंतर नहीं रहे। पर इसमें वे ईमानदार किसान भी पिस रहे हैं जिन्होंने कोई गड़बड़ी ही नहीं की। पटवारियों ने अधिकारियों के दबाव में आकर किसानों का रकबा कम दर्ज किया और भुईयां एप में लोड कर दिया। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीन से कम खेती का रकबा दिख रहा है, कहीं ज्यादा भी दिख रहा है। जब तक दोनों माप एक नहीं होंगे उनका पंजीयन यानि धान बेचने का मौका नहीं मिलेगा। जांजगीर चाम्पा, बिलासपुर, दुर्ग आदि जिलों से खबर आ रही है कि अब तक आधे किसानों के ही रिकॉर्ड अपडेट नहीं हो पाये हैं। कोरोना की परवाह किये बगैर किसानों की भीड़ पटवारी तथा समितियों में दिखाई दे रही है।
रेप के मामलों पर केवल राजनीति
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव और बलरामपुर और उसके बाद सरगुजा संभाग के ही राजपुर और वाड्रफनगर में हुई की दुष्कर्म की वारदातों पर जिस तरह कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने हाथरस से जोडक़र सियासत शुरू की है जरा भी हैरान करने वाली नहीं है। दोनों खुद को एक दूसरे से साफ सुथरा, महिला और बालिका सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बताने पर तुले हुए हैं। कांग्रेस के नेता समझते हैं कि हाथरस की घटना बड़ी है, भाजपा कहती है कि हाथरस मामले में तो सब तरह की जांच बैठा दी गई, हाईकोर्ट ने भी मामले में संज्ञान ले लिया है कार्रवाई तो बस्तर और सरगुजा की घटनाओं में होनी चाहिये। प्रदेश के एक मंत्री कहते हैं कि हाथरस की घटना बड़ी, बलरामपुर की छोटी। तब, भाजपा से नेता प्रतिपक्ष और दूसरे नेताओं के बयान आने लग गये। कोंडागांव की घटना को वहां के सांसद ने ज्यादा गंभीर बताया। हाथरस की घटना को बनावटी कहा और राहुल गांधी की इसमें रुचि लेने के औचित्य पर सवाल उठाया तो कोंडागांव के कांग्रेस कार्यकर्ता प्रदर्शन पर सडक़ पर ही उतर आये। दरअसल, ऐसा करके दोनों ही दल अपनी संवेदनहीनता ही प्रगट कर रहे हैं। हैरानी यही है कि तमाम राजनैतिक दल कहते हैं कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिये और हकीकत यह है कि राजनीति के अलावा कुछ नहीं हो रहा है।
तो सरकार में रहकर अनशन करेंगे सिंहदेव ?
हाथियों को सुरक्षित रहवास देने और वनवासियों की सुरक्षा के लिये सरकार की लेमरू परियोजना में ज्यादातर इलाका तो कोरबा जिले का है पर इसमें सरगुजा जिले के भी करीब 52 गांव आने वाले हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव ने कल खम्हरिया में एक जनसभा में साफ कहा कि यह मत समझना कि मैं सरकार में हूं इसलिये आपका साथ नहीं दूंगा। जरूरत पड़ी तो आप लोगों के साथ आमरण अनशन करूंगा। उनका कहना है कि जब लेमरू एलिफेंट प्रोजेक्ट लाया गया तो इसका दायरा 450 वर्ग किलोमीटर रखने की बात हुई थी, पर अब यह 4000 वर्ग किलोमीटर तक विस्तारित करने की बात हो रही है। गांवों को विस्थापित किया जाना है पर यह ग्रामीणों की सहमति के बिना नहीं हो सकता। सिंहदेव के सामने जब इन ग्रामीणों ने नहीं हटाने की मांग की तब सिंहदेव ने यह बात रखी। सिंहदेव ने उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताया और कहा कि ग्राम सभा की सहमति बगैर कुछ नहीं हो सकता। कई बार सिंहदेव की साफगोई संकेत देने लगती है कि वे अपनी ही सरकार से नाखुश तो नहीं चल रहे?
पुनिया और सुनील सोनी..!
आखिरकार प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया की दोबारा कोरोना जांच रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई है। पुनिया के संपर्क में रहे कई नेता क्वॉरंटीन हो गए हैं। रायपुर सांसद सुनील सोनी भी पुनिया के साथ दिल्ली से आए थे। सुनते हैं कि विमान में दोनों साथ बैठे थे। यद्यपि उन्होंने मास्क तो लगाया ही था। विमान में बैठने के बाद यात्रियों को उपलब्ध कराए गए फेस कवर भी पहने हुए थे। मगर पुनिया की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है, तो सुनील सोनी का टेंशन में आना स्वाभाविक है। कुछ इसी तरह सरकार के मंत्री भी परेशान हैं। ये सभी पुनिया के संपर्क में थे। मरवाही चुनाव में इन मंत्रियों की प्रचार में ड्यूटी लगी है। मगर जयसिंह अग्रवाल को छोड़ दे, तो बाकी मंत्री बाहर निकलने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं। बीती देर रात पुनिया ने ट्वीट करके अपने और पत्नी के पॉजिटिव होने की खबर की. लेकिन मिलने वाले लोगों के लिए कोई सलाह पोस्ट नहीं की।
सीमेंट के दाम क्यों बढ़े?
बीते एक माह के भीतर सीमेंट के दाम ब्रांड के हिसाब से 30 से 50 रुपये तक बढ़ गये हैं। ठीक-ठाक क्वालिटी का सीमेन्ट जो 240 रुपये था इस समय 280, 290 तक मिल पा रहा है। लॉकडाउन और बारिश के कारण कंस्ट्रक्शन के कार्य लगभग रुके हुए थे। अब जब मौसम साफ हुआ है और कोरोना के बावजूद निर्माण कार्य शुरू किये जा चुके हैं, ठीक ऐसे समय में यह बढ़ोतरी भी हुई है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तीन साल तक सीमेन्ट का दाम स्थिर था। लगभग 100 रुपये में मिल रहा था। भाजपा की जब पहली सरकार बनी तो यह 120 रुपये हो गया। उसके बाद 155 रुपये तो सन् 2006 के आसपास 200 रुपये तक बिका। 2008 में एकाएक यह 250 से 300 रुपये तक में बिकने लगा। यह वह समय था राजधानी समेत राज्य के बड़े शहरों दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, बिलासपुर में बड़े पैमाने पर कॉलोनियां और फ्लैट्स तैयार होने लगे थे। सन् 2018 में इसके दाम वैश्विक मंदी के कारण कुछ गिरे और 240, 250 रुपये में आ गया। यह दाम दो तीन साल से स्थिर था। हर बार बढ़ोतरी के बाद विरोधी दल दाम बढऩे के पीछे सरकार से सीमेन्ट विक्रेताओं के सिंडिकेट के साथ साठगांठ का आरोप लगाते रहे हैं। हो-हल्ला होने पर बढ़ी कीमत में से कुछ दाम घटा भी दिये जाते हैं। सीमेन्ट डीलर्स बता रहे हैं कि असल कारण तो यही है कि फिर कार्टल बना हुआ है और निर्माताओं ने एक राय होकर दाम बढ़ाये हैं। निर्माण कार्य में तेजी आने और बारिश के गुजरने का लाभ उठाया जा रहा है। हालांकि यह भी जाहिर बात रही है कि चुनाव के समय सीमेन्ट के दाम अचानक बढ़ते हैं। इस बार ऐसा कुछ है इसकी संभावना इसलिये नहीं है क्योंकि छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक सीट पर चुनाव है। मध्यप्रदेश में सीमेन्ट के दाम कम हैं जहां 28 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। जिन लोगों का अपना घर तैयार हो रहा है उनका बजट सीमेन्ट की बढ़ी कीमत से बिगड़ रहा है। बिल्डर्स और सरकारी प्रोजेक्ट्स की लागत भी बढ़ेगी। फिलहाल इस मुद्दे पर कोई सियासी हलचल नहीं है।
स्कूल फीस का मसला अब हल होने की उम्मीद
लॉकडाउन के बाद से ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान बच्चे अपनी स्कूलों में कितनी फीस दें यह विवाद चल रहा है। हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों की याचिका पर तय किया कि ट्यूशन फीस तो लें पर उसके अलावा कोई फीस न लें। एक अन्य याचिका अब भी लम्बित है। पालक तब भी फीस का विरोध करते रहे कि उन्होंने अपनी फीस का अनुमोदन नियमानुसार शिक्षा विभाग से नहीं कराया है। ट्यूशन फीस के नाम पर ही वे कुल फीस का 80 प्रतिशत वसूलने लगे हैं। अब पूरे प्रदेश में फीस पर निगरानी के लिये समितियों के गठन का रास्ता साफ कर दिया गया है। राजपत्र में छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय फीस अधिनियम 2020 का प्रकाशन किया है। सरकारी स्कूलों की तरह निजी स्कूलों में भी एक समिति बनेगी जिसके अध्यक्ष तो कलेक्टर होंगे पर उनके द्वारा नियुक्त नोडल अधिकारी भी बैठकें ले सकेंगे। इस समिति में स्कूल प्रबंधक, पालक के प्रतिनिधि के अलावा समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति मौजूदा फीस की समीक्षा तो करेगी ही, हर वर्ष फीस का पुनर्निर्धारण और वृद्धि के मामले में भी फैसला लेगी। फीस बढ़ोतरी के लिये तर्कसंगत कारण बताना होगा। पहले भी फीस निर्धारण पर निगरानी की व्यवस्था थी। पर देखा गया कि कई स्कूलों ने तो बीते चार-पांच सालों से अपनी फीस का अनुमोदन नहीं कराया है। नई समिति भी दबावमुक्त होकर काम करे, समाज से लिये जाने वाले प्रतिनिधि पक्षपात न करें तो प्राइवेट स्कूलों पर कुछ तो नियंत्रण हो सकेगा। वैसे अच्छी बात तो यह होगी कि दिल्ली की तरह सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों से बेहतर बनाने का काम किया जाये। हर ब्लॉक में प्रदेश में करीब 90 आदर्श आवासीय स्कूल भाजपा शासनकाल में खोले गये थे, पर उसका संचालन नहीं किया जा सका। उसे प्राइवेट स्कूल प्रबंधकों के हाथ ही सौंपना पड़ा है। अभी नया प्रयोग 40 नये अंग्रेजी स्कूलों को खोला जाना है। इनमें प्रवेश को लेकर बड़ा आकर्षण छात्रों में है। यह ठीक से चल निकलें तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की आशा बंधे।
मरवाही से कौन?
जाति विवाद के चलते मरवाही में अमित जोगी या उनकी पत्नी डॉ. ऋचा जोगी चुनाव मैदान में नहीं उतर पाए तो क्या होगा, इस पर राजनीतिक गलियारों में बहस चल रही है। हल्ला यह है कि जोगी दंपत्ति के चुनाव मैदान में नहीं उतर पाने की स्थिति में गुंडरदेही के पूर्व विधायक आरके राय जनता कांग्रेस के उम्मीदवार हो सकते हैं। सुनते हैं कि पार्टी के अंदरखाने में इस पर मंत्रणा भी हुई है। आरके राय जोगी परिवार के भरोसेमंद माने जाते हैं।
पुलिस की नौकरी छोडक़र राजनीति में कदम रखने वाले आरके राय मरवाही की भौगोलिक स्थिति से वाकिफ हैं, और वे दर्जनों बार अजीत जोगी, अमित के साथ क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। मरवाही जोगी परिवार का गढ़ है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर राय को जिताने की जिम्मेदारी स्वाभाविक तौर पर रेणु जोगी और अमित जोगी की रहेगी। कुछ लोगों का मानना है कि वे कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। एक विकल्प और है कि कांग्रेस से असंतुष्ट और भाजपा के बागी संयुक्त प्रत्याशी उतारने की रणनीति बना रहे हैं। जोगी परिवार इस मोर्चा को समर्थन दे सकता है। खैर जितनी मुंह उतनी बातें। अगले दो-तीन दिनों में मरवाही की तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।
धंधा तो ठीक है पर महर्षि वाल्मीकि का नाम...

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोगों को तरह-तरह का झांसा देने का काम चलते ही रहता है। इसमें एक लोकप्रिय झांसा कमाई का है। लोगों का ऐसी अंधाधुंध कमाई का भरोसा दिलाया जाता है कि उनकी जिंदगी ही बदल जाएगी। अभी एक किसी मोबाइल नंबर से इस अखबारनवीस को वॉट्सऐप पर मैसेज मिला कि एक मोबाइल फोन और सौ रूपए से हर दिन 10 हजार से 30 हजार रूपए रोज कमाए जा सकते हैं, और कोई समय सीमा भी नहीं है। जो लोग ऐसी कमाई चाहते हैं वे नीचे दिए गए वॉट्सऐप नंबर को अपने फोन पर जोड़ लें।
अब जिस नंबर से यह संदेश आया है उसकी प्रोफाईल खोलकर देखने पर महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर डली हुई है। महर्षि वाल्मीकि के बारे में कहा जाता है कि एक समय वे डकैत थे, और बाद में वे एक महान धार्मिक लेखक हो गए थे। उन्होंने रामायण की रचना की थी।
अब उनकी तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए यह संदेश बढ़ाया जा रहा है कि हिन्दुस्तान में 30 करोड़ लोग इस मनीमेकिंग मॉडल से जुड़ चुके हैं। अब अगर 30 करोड़ लोग हर दिन 10 हजार रूपए से लेकर 30 हजार रूपए तक कमा रहे हैं, तो हिन्दुस्तान में गरीबी बचना क्यों चाहिए। केन्द्र सरकार को चाहिए कि हर किसी को एक मोबाइल और सौ रूपए दे दे, तो सरकार पर से गरीबी हटाने का बोझ भी हट जाएगा। महर्षि वाल्मीकि के मानने वालों को देखना चाहिए कि उनकी तस्वीर का इस्तेमाल यह किस धंधे में हो रहा है।
क्रिमिनल दामाद?

फैशन में कई जगह गैरकानूनी कामकाज से जुड़े नामों का इस्तेमाल होता है। कई महंगे इत्र पॉइजन, ओपियम (अफीम), आऊटलॉ, जैसे ब्रांड या सामान बाजार में रहते हैं। अभी दो दिन पहले राजनांदगांव के एक ढाबा मालिक का जो लडक़ा किडनैप किया गया, आज जब उसकी तस्वीरें सामने आई हैं तो उसने जेल में बंद कैदियों की तरह छापे वाले टी-शर्ट पहनी हुई है, और उस पर क्रिमिनल दामाद छपा हुआ दिख रहा है। फिलहाल तो वह पुलिस या फिरौती की मेहरबानी से पुलिस के दामाद की तरह उनके बीच बैठकर लौट रहा है, और ऐसी चर्चा है कि क्रिकेट-सट्टे के लेन-देन के चक्कर में उसका अपहरण हुआ था। बाकी मां-बाप अपने बच्चों के बारे में सोच लें कि वो सीने पर मुजरिम दामाद जैसा कुछ टांगकर अगर चल रहे हैं, तो उन्हें अगली पटरी पर ले आएं।
एसटी-एससी युवाओं को कर्ज की कड़ी शर्तें
आर्थिक मंदी और कोरोना के दौर में लोग नया कारोबार शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। लोन लेकर रोजगार शुरू करना तो और भी मुश्किल दिखाई दे रहा है। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बेरोजगारों को उनके लिये बनाये गये वित्त निगम से कुछ आसान शर्तों पर वर्षों से ऋण दिया जाता रहा है। दस्तावेज और कागजी प्रक्रिया में भी कुछ ढील दी जाती रही। ब्याज में छूट तथा अनुदान भी मिलता है। पर अब शर्तें इतनी कड़ी कर दी गई है कि बेरोजगार युवकों के होश उड़े हुए हैं। उनसे जमीन के पट्टे के कागज जमा करने कहा जा रहा है साथ ही जमानतदार के तौर किसी सरकारी कर्मचारी को पेश करने कहा जा रहा है। प्रदेश के ज्यादातर जिलों में इसके चलते लोन देने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। कोरबा के कांग्रेस पदाधिकारियों ने बकायदा मुख्यमंत्री को चि_ी लिखकर प्रावधानों में संशोधन की मांग की है। किसी बेरोजगार के पास अपनी कोई जमीन नहीं है तो परिवार का पट्टा जमा करना होगा। परिवार लोन के लिये अपनी इकलौते जमीन के टुकड़े को बंधक बनाने राजी हो जायेंगे यह कैसे संभव है? और किसी शासकीय सेवक को क्या पड़ी है कि कि वह जमानतदार बनने की उदारता दिखाये। दूसरा पहलू, इन योजनाओं में रिकव्हरी की स्थिति भी अच्छी नहीं है। हो सकता है कि कुछ ऋणी व्यवसाय में नुकसान के कारण कर्ज नहीं चुका पाते हों पर अधिकारियों को कमीशन देने में भी काफी पैसा लोन लेने के दौरान ही खर्च हो जाता है। हितग्राहियों के दिमाग में बिठाया जाता है कि ऐश करो, लोन वापस करना जरूरी नहीं है। अक्सर ऐसे विभागों के कामकाज की समीक्षा मंत्री, सचिव स्तर पर नहीं हो पाती है, प्राथमिकता में नहीं है। अफसर ही नियम बनाते हैं और योजना संचालित करते हैं। अब जब रोजगार की जरूरत हर तबके को है, ऐसी योजनायें बेहतर और व्यवहारिक तरीके से लागू करना जरूरी है।
धान की खरीद कब से शुरू होगी?
केन्द्र सरकार ने बीते साल समर्थन मूल्य से अधिक दर पर धान खरीदे जाने की स्थिति में राज्य से चावल का कोटा उठाने से मना कर दिया था। बाद में मूल्य वही रखा गया। किसानों को राजीव न्याय योजना के तहत अतिरिक्त राशि दी जा रही है। केन्द्र और राज्य सरकार के बीच उपजे विवाद के चलते पिछली बार खरीदी शुरू करने की तारीख बहुत आगे 1 दिसम्बर तक चली गई। धान पर बोनस नहीं देने पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोला था वहीं भाजपा ने धान खरीदी की तारीख आगे बढ़ाये जाने को लेकर सवाल उठाये थे। लगता है इस बार भी ऐसा कुछ होने जा रहा है। केन्द्र का कृषि बिल राष्ट्रपति की दस्तखत के बाद अब कानून बन चुका है। राज्य सरकार ने यह जरूर कहा है कि वह अपने यहां यह कानून लागू नहीं करेगी लेकिन नया कानून बनायेगी। नये कानून पर अभी विचार-विमर्श की स्थिति नहीं बनी है। खरीदी की तारीख अब तक घोषित नहीं हुई है। दूसरी तरफ अब किसानों की फसल पकने लगी है। अर्ली वेरायटी धान की कटाई कुछ दिन में शुरू हो जायेगी। किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जबसे समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू हुई है उन्होंने संग्रह करने की जगह कोठी बनाना बंद कर दिया है। वे धान के पैसे का इंतजार करते रहते हैं क्योंकि उन्हें कई रुके काम पूरे करने होते हैं। बीते साल खुली बिक्री पर पाबंदी के बावजूद मिलर्स और आढ़तियों ने जबरदस्त खरीदी की थी। इस बार यदि नये कानून के चलते रोक नहीं लगी तो यह काम चोरी-छिपे करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अच्छा होता यदि धान खरीदी की तारीख को पिछली बार की तरह एक दिसम्बर तक नहीं खींचा जाये। इसे पहले की तरह 1 नवंबर ही रखा जाये ताकि सरकारी कीमत पर ही लोग धान बेच सकें।
मीडिया के दूसरे धंधों से नुकसान
एक वक्त था जब यह माना जाता था कि अखबार निकालने वाले लोगों का कोई और कारोबार नहीं रहना चाहिए क्योंकि दूसरी कारोबारी दिलचस्पी अखबार को ईमानदार नहीं रहने देती। लेकिन वह पुराने फैशन की बात हो गई। अब तो अखबार ही अकेले नहीं रह गए, मीडिया के नाम से टीवी चैनल भी आ गए, और समाचार-पोर्टल भी। अब अखबार शब्द के साथ जुड़ी हुई गंभीरता और ईमानदारी दोनों शब्द चल बसे हैं। अब यह समझना नामुमकिन सा हो गया है कि मीडिया कहे जाने वाले कारोबार का घाटा पूरा होता कहां से है, कैसे पूरा होता है, और उसके लिए क्या-क्या समझौते करने पड़ते हैं, कैसे-कैसे सौदे करने पड़ते हैं।
लेकिन पाठक भी जैसे पहले फुटपाथ पर हरेक माल बारह आना वाले से सामान खरीदना बेहतर समझते थे, आज भी वे उसी तरह सबसे सस्ता मिलने वाला अखबार, मुफ्त में सनसनी देने वाला टीवी चैनल बेहतर समझते हैं। जब लोग ही मनोहर कहानियां चाहते हैं, और उसे भी मुफ्त में चाहते हैं, तो दिनमान और रविवार जैसी पत्रिकाओं को तो बंद होना ही था।
मीडिया के जब दूसरे कारोबार भी रहते हैं, तब उसका क्या नुकसान होता है, यह छत्तीसगढ़ इन दिनों अच्छी तरह देख रहा है, और भुगत भी रहा है।
छुट्टी के लिये कोरोना की खरीदी
एक अफसर बीते एक माह से दफ्तर नहीं आ रहे हैं। पहले उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई, होम आइसोलेशन में रहे फिर जब ठीक होकर काम पर निकलने का दिन आया तो उसके परिवार के एक दूसरे सदस्य की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। इस अफसर के बारे में बताया जा रहा है कि रिपोर्ट पॉजिटिव बताने के लिये उन्होंने कोरोना के एक प्राइवेट जांच सेंटर से बात की थी। शिकायत मिल रही है कि कई सरकारी विभागों के अधिकारी-कर्मचारी कोरोना पॉजिटव रिपोर्ट खरीद रहे हैं ताकि उन्हें लम्बी छुट्टी मिल जाये। इसके लिये हजार, दो हजार रुपये खर्च करने के लिये वे तैयार हो जाते हैं। सरकारी जांच में नहीं, निजी जांच सेंटर्स में यह सौदा किया जा रहा है। कोरोना महामारी है। इसके बहाने दफ्तरों में वैसे भी कामकाज बंद जैसा है। सरकार ने खुद भी बड़ी रियायतें दे रखी हैं। रोटेशन में दफ्तर आने के लिये कहा गया है ताकि भीड़ न बढ़े। पर सिर्फ छुट्टी के लिये ऐसी हेराफेरी किया जाना कहीं से भी सही नहीं है।
कोरोना के चलते आंखों पर असर
अम्बेडकर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक दिलचस्प और जरूरी अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि कोरोना के चलते घरों में कैद रहने के कारण मोबाइल फोन, डेस्कटॉप, लैपटॉप बिताये जाने वाले समय में काफी बढ़ोतरी हो गई है। इसका औसत एक से दो घंटे होता था अब 8 घंटे तक जा पहुंचा है। आंखों के सूखापन और लाल हो जाने की शिकायत लेकर अब डॉक्टरों के पास ज्यादा लोग पहुंच रहे हैं। स्कूल, कॉलेज अब तक खुले नहीं हैं और ज्यादातर पढ़ाई ऑनलाइन ही चल रही है। आंखों को ऐसी हालत में दुरुस्त रखने के लिये उनके कुछ सुझाव भी हैं जैसे 20 मिनट के अंतराल पर कम से कम 20 सेकेन्ड के लिये स्क्रीन से नजऱ हटा दी जाये। स्क्रीन को देखने के लिये दूरी 20 इंच कम से कम होनी चाहिये। गेंद खेलकर, हरियाली को देखकर आंखों को राहत पहुंचाने का काम किया जाना चाहिये।
कोरोना महामारी के बाद भी कई चीजें स्थायी हो जायेंगी, हमारी आदत में शामिल हो जायेंगी। इसमें डिजिटल गैजेट्स का इस्तेमाल भी एक होगा। ऐसी हालत में आंखों पर पडऩे वाले असर की तरफ चिंता करना जरूरी है।
कोरोना को पीछे धकेलने का सही मौका
देश और छत्तीसगढ़ दोनों से ख़बरें आ रही हैं कि कोरोना की रफ्तार धीमी पड़ रही है। महामारी से उबरकर ठीक होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े बताते हैं कि 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर के बीच देश में 6 लाख 14 हजार 265 नये केस मिले जबकि इस बीच 55 लाख से ज्यादा मरीज स्वस्थ हो गये। छत्तीसगढ़ में भी डिस्चार्ज होने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है रिकव्हरी रेट बढक़र करीब 80 फीसदी पहुंच चुकी है। कई जिलों में डोर-टू-डोर सर्वे भी चल रहा है जिसमें आशंकाओं के विपरीत बहुत कम नये केस सामने आ रहे हैं। यह सही है कि स्वास्थ्य विभाग के मैदानी कर्मचारी, कार्यकर्ता, नर्स, डॉक्टर और सोशल डिस्टेंसिंग तथा मास्क पहनने का पालन कराने वाली पुलिस तथा दूसरी एजेंसियां लगातार 8 माह तक इस काम में लगे होने के कारण ऊब रही हैं। शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी सब थका महसूस कर रहे हैं, पर जरूरी यही है कि कुछ दिनों, हफ्तों तक हौसला, हिम्मत को बनाये रखा जाना चाहिये। हो सकता है लापरवाही बढऩे पर कोरोना के केस फिर बढऩे लग जायें। अब केस कम होने के आसार दिखाई दे रहे हैं तो इसे और पीछे धकलने की कोशिश जारी रहनी चाहिये।
मरवाही में रोज बदलते समीकरण
मरवाही विधानसभा के उप-चुनाव में रोज कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जो चौंका देता है। गौरेला-पेन्ड्रा मरवाही में चुनाव प्रचार और रणनीति का काम संभालने वाले छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के अनेक नेता पहले ही पार्टी छोडक़र कांग्रेस में आ चुके हैं। पर गौरेला में पार्टी का सब कुछ संभालने वाले शिवनारायण तिवारी ने भी पार्टी छोड़ दी। बिलासपुर में समीर अहमद बबला का जोगी कांग्रेस से अलग होना भी कम आश्चर्यजनक घटना नहीं है। बबला पार्टी के लिये कम जोगी परिवार के लिये सबसे भरोसेमंद लोगों में एक थे। वे लगभग 24 घंटे उनके बंगले में नजर आते थे। अमित जोगी या डॉ. रेणु जोगी का लोकेशन जानने के लिये लोग बबला की मदद लेते थे। मरवाही से यदि अमित जोगी चुनाव लड़ पाते हैं तो उनके चुनाव अभियान की कमान कौन संभालेगा, क्या वे खुद? यह सवाल अब खड़ा हो गया है। डॉ. रेणु जोगी का यह कहना कि मरवाही सीट कांग्रेस को जोगी की याद में छोड़ देना चाहिये। क्या ऐसा कहना कांग्रेस में लौटने की संभावना तलाशना है? देखते रहिये, तस्वीर कुछ दिनों में साफ होती जायेगी।
किस्सा नेता प्रतिपक्ष का
चर्चा है कि पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने रायपुर नगर निगम में भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन प्रक्रिया को रोक लगवाकर दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल को पटखनी दे दी है। बृजमोहन, सीनियर पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम तो तय करा चुके थे, लेकिन बाद में राजेश मूणत की दबाव में घोषणा रूक गई। भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन के लिए पार्टी के अंदरखाने में चली खींचतान की कहानी काफी दिलचस्प है।
पार्टी ने निगम चुनाव के लिए बृजमोहन अग्रवाल को संयोजक बनाया था। तमाम कोशिशों के बाद भी निगम में भाजपा को बहुमत नहीं मिला। इसके बाद से भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन के लिए चर्चा चल रही थी। सभापति ने जब भाजपा पार्षद दल से नेता के नाम मांगे, तो पार्टी संगठन ने नाम तय करने के लिए कवायद शुरू कर दी। सुनते हैं कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय ने हाउसिंग बोर्ड के पूर्व चेयरमैन भूपेन्द्र सिंह सवन्नी को पार्षद दल का नेता चुनने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया।
जैसे ही सवन्नी का नाम पर्यवेक्षक के लिए तय किया गया, बृजमोहन खेमे ने इस पर आपत्ति जताई। चर्चा है कि खुद बृजमोहन अग्रवाल ने पवन साय से चर्चा कर सवन्नी को पर्यवेक्षक बनाए जाने पर ऐतराज किया। बृजमोहन की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि चुनाव के लिए उन्हें संयोजक बनाया गया, तो पार्षद दल का नेता चुनने के लिए अलग से पर्यवेक्षक क्यों बनाया जा रहा है। बृजमोहन की आपत्ति के बाद पवन साय ने सवन्नी को पार्षद दल की बैठक में आने से मना कर दिया।
फिर बृजमोहन अग्रवाल ने शहर जिलाध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी को पार्षद दल की बैठक बुलाने कहा। श्रीचंद ने बिना देर किए पार्षदों की बैठक बुलाई। पार्षद दल के नेता के लिए तीन प्रमुख दावेदार मीनल चौबे, सूर्यकांत राठौर और मृत्युंजय दुबे थे। राजेश मूणत मीनल, और बृजमोहन सूर्यकांत को पार्षद दल का नेता बनाने के पक्ष में थे। मूणत खेमे ने बैठक के पहले ही पार्षदों के बीच मीनल को नेता बनाने के लिए माहौल बना दिया था। उन्हें श्रीचंद समर्थकों का भी साथ मिला।
बृजमोहन और तीनों विधानसभा के पूर्व प्रत्याशियों की मौजूदगी में पार्षदों से राय ली गई। सुनते हैं कि सबसे ज्यादा पार्षद मीनल के पक्ष में थे। मीनल को नेता बनाने के पक्ष में करीब 15 पार्षदों ने राय दी थी। सात पार्षद सूर्यकांत और बाकी पार्षद मृत्युंजय को नेता बनाने के पक्ष में नजर आए। चर्चा है कि बृजमोहन ने सूर्यकांत का नाम तय कर पार्टी संगठन को इसकी सूचना भेज दी। फिर क्या था, राजेश मूणत ने बिहार फोन लगाकर सौदान सिंह को वस्तु स्थिति की जानकारी दी।
सौदान सिंह ने तुरंत पवन साय को फोन कर नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा करने से रोक दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। नाम की घोषणा अटकी, तो सूर्यकांत राठौर भागे-भागे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के घर पहुंचे और उनसे सौदान सिंह से बात कर नाम की घोषणा करवाने का आग्रह किया। मगर गौरीशंकर ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। कहा जा रहा है कि अब नए प्रदेश प्रभारी ही अब इस विवाद को सुलझाएंगे।
कभी सौ फीसदी सही पीएससी हो पायेगी?
सरकार बदलने के बाद बहुत सी चीजें बदली बहुत सी नहीं बदली। जो नहीं बदली उनमें एक है छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के काम करने का तौर-तरीका। इन 20 सालों में पता नहीं कितने अध्यक्ष और सदस्य बदल गये, अफसर इधर-उधर हो गये पर हर परीक्षा विवाद से घिर जाती जाती है। ताजा मामला पीएससी मेन्स के एग्ज़ाम पर हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक का है। हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी कि पीएससी ने जो मॉडल आंसर जारी किये वे गलत थे।
जिन छात्रों को लगा कि मॉडल आंसर सही होते तो उन्हें मेन्स में बैठने का मौका मिल जाता, वे कोर्ट चले गये। कोर्ट जाने के अलावा छात्रों के पास कोई चारा नहीं है, क्योंकि आयोग ने शिकायतों की त्वरित सुनवाई के लिये कोई आंतरिक प्रक्रिया अपनाई ही नहीं है, जो जल्दी फैसला करे और समय पर परीक्षाओं को सम्पन्न कराना सुनिश्चित करे।
हाईकोर्ट से फैसला पता नहीं कब आये, रोक कब हटे पर इस बीच गंभीरता से तैयारी कर परीक्षा देने को तैयार बैठे विद्यार्थी किस मानसिक संत्रास से गुजर रहे होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब तक सीजीपीएससी की एक भी परीक्षा ऐसी नहीं हुई है जो विवादों से न घिरी हो। प्राय: हाईकोर्ट में उन्हें चुनौतियां दी जा रही हैं। सन् 2008 की पीएससी परीक्षा में सरकार ने अपनी गलती मानी और आखिरी फैसला अब तक नहीं आया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। कई बार तो ऐसा लगता है कि पीएससी के अधिकारी खुद ही ऐसी गलतियों की अनदेखी करते हैं और अदालतों में मामला ले जाने का रास्ता छोड़ देते हैं।
कोरोना हुआ नहीं इलाज हो गया
कोरोना संक्रमण के फैलाव के तौर-तरीके पर नजर रखने वाले जानकार बता रहे हैं कि पहले वायरस का आक्रमण महानगरों में हुआ, फिर नगरों में उसके बाद कस्बों और अब इसका रुख गांवों की ओर है। जांजगीर-चाम्पा जिले में एक ही दिन में कल आये 300 से ज्यादा केस इस दावे की पुष्टि करते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता शहरी क्षेत्रों में चरमराई हुई तो है ही गांवों में और बुरी स्थिति है। शहर के लोग लक्षण महसूस होने पर कोविड टेस्टिंग के लिये पहुंच भी जाते हैं पर गांव के मरीज, सेंटर तक पहुंचने और इलाज कराने की जरूरत को नजरअंदाज कर सकते हैं। वे सामान्य सर्दी, खांसी, बुखार की दवा लेकर कोरोना से निपटने का उपाय कर सकते हैं।
इन सब के बीच जांजगीर-चाम्पा में एक अजीब किस्सा हुआ है। उपभोक्ता संरक्षण समिति के एक सदस्य और वहीं पर काम करने वाले स्टाफ को स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने फोन करके बताया कि उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। वे दोनों आइसोलेशन पर चले गये। तबियत ठीक लग रही थी फिर भी पूरे अनुशासन से रहे और दवाईयां खाते रहे। इस दौरान इन दोनों में से एक जो एक स्टेनो हैं, उन्होंने अपनी रिपोर्ट ऑनलाइन देखी तो पता चला कि रिपोर्ट तो निगेटिव थी। फिर फोरम के सदस्य ने अपनी रिपोर्ट देखी वह भी निगेटिव थी। अब ये क्या करते। बिना मर्ज के ही दवा ले चुके थे।
बिलासपुर में तो एक मरीज को कोरोना पॉजिटिव बता कर इलाज किया जाता रहा और उसकी मौत भी हो गई। एक और केस में कोरोना मरीज के पॉजिटिव होने का लक्षण था पर उसे सामान्य मरीज बताकर भर्ती कर लिया गया। उसकी भी मौत हो गई। इन लापरवाहियों पर रोक कैसे लगे, स्वास्थ्य विभाग को विचार करना चाहिये।
दर्ज छलका अमित जोगी के पोस्ट पर...
मरवाही उप-चुनाव में सारा खेल जोगी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। कांग्रेस की एक-एक गतिविधि पर निगाह रखना और उस पर पैनी प्रतिक्रिया इसकी एक वजह है, दूसरी वजह उनकी जाति का मामला है। कांग्रेसी मरवाही में उद्घाटन, शिलान्यास में लगे रहे, उस पर अमित जोगी सवाल करके घेरते रहे। इधर खामोशी के साथ उनकी पत्नी के नाम पर नया जाति प्रमाण पत्र बन गया। इसकी भनक भी कांग्रेसियों को पहले नहीं लगी। बीते 20 साल से अजीत जोगी को गैर आदिवासी सिद्ध करने की कोशिश कर रहे संतकुमार नेताम को इसका सबसे पहले पता चला। उन्होंने सितम्बर महीने के आखऱिी सप्ताह में ही इसकी शिकायत कलेक्टर मुंगेली से कर दी थी। नेताम ने इसकी ख़बर खुद से उजागर भी नहीं की। लोगों को पता चला तो उन्होंने शिकायत की पुष्टि पूछे जाने पर की। इधर अमित जोगी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका हर एक बयान पहले सोशल मीडिया पर ही आता है। नये जाति प्रमाण पत्र को लेकर उन्होंने एक पोस्ट डाली है जिसे फेसबुक पर ही तकरीबन साढ़े 6 हजार लाइक्स मिल चुके हैं। ज्यादातर प्रतिक्रिया उनके समर्थन में है, उनके प्रति लोगों का कितना प्रेम है दर्शाता है। पर एक यूजऱ की प्रतिक्रिया गौर करने के लायक है। इस पोस्ट में जोगी ने लिखा है कि जब ऋचा जोगी का पैतृक परिवार कम से कम पांच दशकों से अऩुसूचित जनजाति वर्ग से सरकारी नौकरियां करते आ रहा है, तब तो किसी को उनकी जाति की याद नहीं आई। इसी पर एक युवा की प्रतिक्रिया है। इनका प्रोफाइल, स्काउट गाइड होना बता रहा है- वे कहते हैं- यही तो दर्द है साहब, किसी की पीढ़ी-दर-पीढ़ी, दशकों से नौकरी कर रही है और कोई दो वक्त की रोटी के लिये भी मारे-मारे फिरता है...।
कीटनाशक दवा माफिया....
सडक़ पर पुलिस वसूली करती है हमें भ्रष्टाचार दिखाई दे जाता है, सडक़ें खराब मिलती है तो अफसरों को कोसते हैं। पर कई सरकारी विभाग हैं जिनमें बैठे अफसरों की करतूतें परदे के पीछे चलती हैं और आम लोगों को उसकी भनक नहीं लगती। ऐसा ही एक कृषि विभाग है। किसानों ने बीज बोये नहीं कि नकली और अमानक कीटनाशक दवाओं का कारोबार फलने फूलने लगता है। खंभों, ठेलों, दीवालों में इन दवाओं के इश्तेहार पटे रहते हैं। कृषि विभाग के अफसरों की छत्र-छाया में सब होता रहता है। फसल बर्बाद होने से बचाने के लिये हड़बड़ाया किसान अनाप-शनाप कीमत पर दवाईयां खरीदता है। कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं। यह बर्दाश्त कर भी लिया जाये तो दवा डालने के बाद फसल से कीड़े खत्म नहीं होते। दुर्ग के एक किसान ने आत्महत्या कर ली। ऐसी ही नकली कीटनाशक दवा डालकर वह लुट गया। अब प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी उन दुकानों में छापा मारकर, सील कर रहे हैं। इसके पहले उन्हीं की शह पर यह सब खुलेआम बिक रहा था। कृषि विभाग का भारी भरकम विभाग कर क्या रहा था? छत्तीसगढ़ के कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ क्या कर रहे हैं? लोगों के उपभोग की दवाओं को बेचने की जिस तरह सख्त निगरानी होती है, लोगों का पेट पालने वाले खेतों में डाले जाने वाली दवाओं पर कोई निगरानी करने वाली टीम क्यों नहीं है। इस घटना में दो चार अफसरों को भी सस्पेंड क्यों नहीं किया जाना चाहिये?
रायबरेली सबपे भारी
रायबरेली के संस्कृत शोध संस्थान के प्रमुख रहे डॉ. शिव वरण शुक्ल को छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग को अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया है। डॉ. शुक्ल पिछले पांच साल से आयोग के सदस्य के रूप में काम कर रहे थे, उन्हें पिछली सरकार में तत्कालीन राज्यपाल बलरामजी दास टंडन यहां लेकर आए थे। डॉ. शुक्ल को आरएसएस का करीबी समझा जाता है।
हालांकि अध्यक्ष पद पर डॉ. शुक्ल सिर्फ डेढ़ साल ही रह पाएंगे, क्योंकि अध्यक्ष पद पर अधिकतम तीन साल या 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक रह सकते हैं। डॉ. शुक्ल के 70 वर्ष पूरे होने में डेढ़ साल बाकी हैं। मगर उन्हें मौजूदा सरकार में अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, तो कानाफूसी शुरू हो गई।
सुनते हैं कि अध्यक्ष पद की दौड़ में पांच-छह शिक्षाविद थे। चूंकि डॉ. शुक्ल सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र के रहवासी हैं, इसलिए सब पर भारी पड़ गए। चर्चा है कि डॉ. शुक्ल के नाम की सिफारिश कांग्रेस के एक राष्ट्रीय नेता ने की थी। वैसे भी सरकार सोनिया के क्षेत्र के आरएसएस समर्थक को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती थी। ऐसे में स्वाभाविक है कि शुक्लजी के नाम पर मुहर लगनी ही थी। संघ के नाम पर राज्यपाल, और रायबरेली के नाम पर मुख्यमंत्री, दोनों सहमत !
बस्तर और बिहार
बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह दो दिन पहले लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल हो गए। आप सोच रहे होंगे कि राजेन्द्र सिंह का यहां जिक्र क्यों किया जा रहा है। दरअसल, राजेन्द्र सिंह छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बस्तर भाजपा के प्रभारी थे। वे सौदान सिंह के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। बस्तर में राजेन्द्र सिंह की काफी धमक रही है। वे बिहार से पूरी टीम लेकर आए थे। और प्रचार खत्म होने तक डटे रहे। प्रत्याशियों को चुनावी फंड भी राजेन्द्र सिंह की निगरानी में बंटता था।
पार्टी के एक नेता याद करते हैं कि आमतौर पर पार्टी दफ्तर में आगन्तुकों के लिए शाकाहारी भोजन का इंतजाम किया जाता है, लेकिन बिहार से राजेन्द्र सिंह संग आए नेताओं ने कांकेर में चिकन की मांग कर दी। इस पर स्थानीय नेताओं के साथ काफी वाद विवाद भी हुआ था। चुनावी नतीजे का हाल यह रहा कि बस्तर में भाजपा का सफाया हो गया। सिर्फ किसी तरह दंतेवाड़ा सीट जीत पाई थी। अब सौदान सिंह, बिहार में पार्टी का चुनाव अभियान संभाल रहे हैं, तो उनके करीबी राजेन्द्र सिंह साथ छोड़ गए हैं। सौदान सिंह अपने करीबी को पार्टी छोडऩे से नहीं रोक पाए, इसकी पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।
चाय-पानी में भी आना-कानी !
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक काफी समय बाद बस्तर के दौरे पर निकले। बस्तर में नक्सल घटना में बढ़ोत्तरी और पीडीएस में गड़बड़ी पर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराना उनका मुख्य ध्येय था। वे स्थानीय कार्यकर्ताओं से रूबरू हुए, लेकिन ज्यादातर नेता प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी से खुश नहीं थे। इसलिए उन्होंने नेता प्रतिपक्ष के दौरे को महत्व नहीं दिया। कांकेर में तो हाल और बुरा था।
पार्टी संगठन को सूचना देने के बाद कौशिक कांकेर पहुंचे, तो कुछ पदाधिकारी मिलने पहुंच गए। मगर जिलाध्यक्ष ने तो मेल मुलाकात करने में रूचि तक नहीं दिखाई। थके हारे कौशिक ने स्थानीय नेताओं से कॉफी पीने की इच्छा जताई। दो-तीन बार कहने के बाद उनके लिए कॉफी तो नहीं आई, किसी तरह काली चाय का इंतजाम किया गया। प्रदेश में सरकार थी, तो सारा इंतजाम पहले से ही हो जाता था। अब हाल यह है कि कार्यकर्ता चाय-पानी का इंतजाम करने में भी आना-कानी करने लगे हैं।
अब तक हुई 1769 निर्दोष आदिवासियों की हत्या!
उत्तर पूर्व और कश्मीर में जब उग्रवाद और आतंक की घटनायें होती हैं तो बड़ी सुर्खियां बनती है पर बस्तर में होने वाली हिंसक घटनाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। बस्तर आईजी ने एक बयान में बताया है कि राज्य बनने के बाद से अब तक बस्तर में माओवादियों ने 1796 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर दी है। इनमें बस्तर में तैनात सुरक्षा बलों का आंकड़ा शामिल नहीं है। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह ने एक बार सही कहा था कि आतंकवाद से ज्यादा बड़ी समस्या बस्तर की हिंसा की है। जिन आदिवासियों के हित और अधिकारों की लड़ाई लडऩे की बात माओवादी करते हैं, उन्हीं के बीच से इतनी हत्यायें हैरान करने वाली हैं। कारण कुछ भी बताया जा सकता है, जैसे पुलिस की मुखबिरी करना, गोपनीय सैनिक होना। बीते कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली किसी बड़ी घटना को अंजाम नहीं दिया है पर हत्यायें आये दिन हो रही हैं। दो तीन दिन पहले ही दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। ताजा खबर है कि बीजापुर में नक्सलियों ने अपने ही पांच साथियों की हत्या कर दी जिन्होंने अपने लीडर की बात मानने से मना कर दिया था। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, यहां तक कि मध्यप्रदेश में भी नक्सल हिंसा पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा चुका है। छत्तीसगढ़ में लम्बे समय तक बड़ी हिंसक घटना नहीं होती तो लगता है उनका खात्मा हो रहा है पर एकाएक बड़ी वारदात हो जाती है जो भ्रम तोड़ देती है।
कैसा होगा छत्तीसगढ़ का अपना कृषि कानून
केन्द्र सरकार के कृषि बिल का कांग्रेस पूरे प्रदेश में विरोध कर रही है। हाथरस के मामले में भी धरना प्रदर्शन हो रहा है। माहौल अच्छा है। कांग्रेसियों को आंदोलन करने का बीते 15-20 सालों का अनुभव रहा है, वह काम आ रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने केन्द्र के कृषि बिल को प्रदेश में लागू नहीं करने का फैसला लिया है। यह कहा है कि वह अपना नया कानून बनायेगी। संविधान को समझने वाले बताते हैं कि खेती राज्य का विषय है। केन्द्र को इस पर कानून नहीं बनाना चाहिये। विरोध का एक बड़ा कारण यह भी है। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान भी खरीदा जायेगा, सहकारी समितियों और मंडियों की व्यवस्था भी बनी रहेगी। पर नया कानून कैसा हो इस पर कांग्रेस के धरना आंदोलनों में बात नहीं हो रही है। जब नया कानून बन ही रहा है तो कई परेशानियों को हल किया जाना चाहिये, जो खासकर सीमांत और मंझोले किसान दशकों से झेल रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीते एक दशक में 12 फीसदी किसान घट गये। इनमें 90 फीसदी किसान वे हैं जिनके पास खेत का छोटा सा ही टुकड़ा था। शादी, ब्याह, बीमारी, छत, उधारी का बड़ा कोई खर्च आया, बंटवारा हुआ तो खेत बिक गया। अब वे या तो खेतिहर मजदूर बन गये, शहर आकर इमारतें बनाने लगे या फिर दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने चले गये। प्रदेश में 37 लाख 46 हजार किसान हैं जिनमें से 30 लाख सीमांत किसानों की संख्या है यानि उनके पास 2 एकड़ से कम जमीन है। छत्तीसगढ़ कृषि भूमि के व्यापक व विविधतापूर्वक व्यावसायिक उपयोग की जागरूकता नहीं है। 90 फीसदी किसान दो बार फसल नहीं ले पाते। इन 20 सालों में सिंचाई का रकबा 32 प्रतिशत तक जा पहुंचा है जो पहले 19 था, सिंचाई क्षमता में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ पर बारिश अच्छी होती है, लगभग 1200 मिमी हर साल। धान की कीमत पर सरकारी बोनस ने उन्हें बाकी लाभदायी फसलों को लेने के लिये उत्सुक नहीं हैं। ऐसे बहुत से सवाल है। जिस तरह सरकार ने प्रदेश की औद्योगिक नीति उद्योगजगत के लोगों से मशविरा लेकर तैयार किया था, कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेनी होगी, जिसमें सबसे निचले स्तर के किसान की राय को भी सुना जाये।
ऋचा जोगी को उतारने की रणनीति
दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी के चुनाव लडऩे पर कयास लगाए जा रहे हैं। चूंकि अमित जोगी के जाति प्रमाण पत्र की पड़ताल चल रही है, और यह भी संभावना जताई जा रही है कि उनके अनुसूचित जनजाति होने का प्रमाण पत्र निरस्त किया जा सकता है। छानबीन समिति ने पहले ही पूर्व सीएम अजीत जोगी के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया था, और उन्हें आदिवासी नहीं माना था। मरवाही चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है, और सारा दारोमदार जिला निर्वाचन अधिकारी पर है। अमित जोगी खुले तौर पर कह रहे हैं कि सरकार उन्हें चुनाव लडऩे से रोकना चाहती है। विकल्प के तौर पर वे अपनी पत्नी ऋचा जोगी को चुनाव मैदान में उतारने की रणनीति पर भी काम कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के रणनीतिकारों की सोच है कि अमित जोगी चुनाव मैदान में उतरें। ताकि उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत का अंदाजा हो जाए। अजीत जोगी थे, तब बात कुछ और थी। उनके निधन के बाद मरवाही में भी उनके ज्यादातर सहयोगी साथ छोडक़र कांग्रेस में चले गए हैं। ऐसे में कांग्रेस अमित को वजनदार नहीं मानती है। खुद सरकार के मंत्री रविन्द्र चौबे ने मीडिया से चर्चा में साफ तौर पर कहा कि लोकतंत्र में कौन किसी को चुनाव लडऩे से रोक सकता है। ऐसे में संकेत है कि छानबीन समिति का फैसला चुनाव के पहले शायद ही आए। इससे परे भाजपा भी अमित की उम्मीदवारी को ध्यान में रखकर ही प्रत्याशी तय करेगी।
भाजपा और जोगी पार्टी के बीच अघोषित तालमेल देखने को मिला है। जोगी पार्टी के विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह की पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से निकटता जगजाहिर है। ऐसे में हल्ला है कि भाजपा यहां दमदारी से चुनाव लड़ेगी, इसमें संदेह है। वैसे भी चुनाव के कुछ दिन पहले ही भाजपा ने यहां जिला संगठन खड़ा किया और अध्यक्ष की नियुक्ति की। ज्यादातर नेता मरवाही से दूरी बनाए हुए थे। चुनाव की घोषणा के बाद प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय और एक-दो अन्य नेता वहां बैठक की औपचारिकता पूरी कर आए हैं। कुल मिलाकर नाम वापसी के बाद सारी रणनीति का खुलासा हो सकता है।
मंतूराम की भविष्यवाणी

मरवाही चुनाव को लेकर चर्चित पूर्व विधायक मंतूराम पवार की भविष्यवाणी सोशल मीडिया में तैर रहा है। पूर्व सीएम अजीत जोगी के करीबी रहे मंतूराम पवार का मानना है कि अमित या ऋ चा जोगी के चुनाव लडऩे पर कांग्रेस पिछडक़र दूसरे नंबर पर चली जाएगी। जाति मामले में जोगी परिवार के चुनाव लडऩे से वंचित होने पर कांग्रेस की जीत पक्की है। मंतूराम पवार ने भाजपा को लेकर टिप्पणी की है कि भाजपा में दंतेवाड़ा उपचुनाव और चित्रकोट से भी परिस्थिति ज्यादा नाजुक है। संगठन चुनाव में रमन सिंह के लोगों को ही 99 फीसदी जगह मिलने से सीनियर भाजपा कार्यकर्ता नाराज हैं। अंतागढ़ उपचुनाव के दाग आज भी रमन सिंह की छवि में रच बस गये हैं, जिसके चलते भाजपा प्रत्याशी को नुकसान हो सकता है।
शराब वही, बोतल नई...
राज्य पॉवर कंपनी ने मोर बिजली एप लांच किया है। इसमें बिजली से संबंधित 16 तरह की समस्याओं को बिजली उपभोक्ता घर बैठे ही एप के माध्यम से निपटा सकते हैं। वैसे तो सालभर पहले ही यह एप लांच हो चुका था। तब 12 तरह की समस्याओं को हल करने की सुविधा थी।
उस समय के पॉवर कंपनी के चेयरमैन शैलेन्द्र शुक्ला ने दावा किया था कि एक महीने के भीतर ही 50 हजार से अधिक एप डाउनलोड होने तक कीर्तिमान स्थापित हुआ है। गूगल प्ले स्टोर में यह एप कई बार दूसरे-तीसरे नंबर पर था।
अब पॉवर कंपनी के अफसरों ने सीएम भूपेश बघेल से दोबारा एप लांच कराने जा रहे हैं। जो काम पहले से ही चल रहा है, उसे एक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसे कहते हैं शराब वही, बोतल नई...।
प्रधानमंत्री को दो फीसदी ज्यादा छूट!

जब कोई नई तकनीक एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करती है, तो बड़े मजेदार मामले सामने आते हैं। अब जैसे भारत के लिए अमेजान ने अपनी एक नई वेबसाईट शुरू की, तो उस पर तमाम जानकारी हिन्दी में भी देना शुरू किया। एक पत्रकार आशुतोष भारद्वाज ने जब अमेजान प्राईम एप्लीकेशन इस्तेमाल किया तो उसमें प्राईम मेम्बर्स के लिए प्रधानमंत्री के सदस्यों लिखा हुआ आया, और नान प्राईम मेम्बर्स के लिए गैरप्रधानमंत्री सदस्य लिखा हुआ। जो प्रधानमंत्री सदस्य हैं, उन्हें दो फीसदी का ज्यादा फायदा है। अब यह अमेजान का मामला है, या देश में प्रधानमंत्री के लिए ऐसी रियायत रखी जाती है, इसे लोग खुद सोचते रहें।
दुबारा टेस्ट कराने की मनाही
कोरोना की जांच के लिये उपलब्ध कोई भी तकनीक सौ फीसदी कारगर नहीं है। स्वास्थ्य संगठनों ने माना है कि जांच में चूक भी हो सकती है और रिपोर्ट गलत भी हो सकती है। बहुत से लोगों की शिकायत है कि उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई पर उनकी सेहत दुरुस्त है। कोई तकलीफ नहीं हो रही है। चूंकि गाइडलाइन है इसलिये आइसोलेशन पर हैं। लेकिन यदि इसके ठीक उल्टा हुआ तो? यानि रिपोर्ट तो निगेटिव मिले लेकिन मरीज को कोरोना जैसे लक्षण और तकलीफ हों? ऐसी स्थिति में भी वह दुबारा जांच कम से कम सरकारी साधनों से कराने की पात्रता नहीं रखता। किसी की एंटिजन टेस्ट में रिपोर्ट पॉजिटिव मिली तो जांच की बात छिपाकर उसने ट्रू नॉट टेस्ट करा लिया। रिपोर्ट निगेटिव आ गई। हाल में रायगढ़ में इस तरह के कुछ मामले आये। बकौल स्वास्थ्य विभाग, अब एक बार किसी की रिपोर्ट पॉजिटिव या निगेटिव जैसी भी आई, उसे यह बात छिपाकर दुबारा टेस्ट नहीं कराना है। यदि ऐसा करता है तो कार्रवाई की जायेगी। हां, बाद में लक्षण प्रगट हों तो बात अलग है। कहा जा रहा है कि केन्द्र सरकार से भी ऐसी गाइडलाइन आ चुकी है। कोरोना सेंटर्स में टेस्ट का इतना दबाव है कि अब कांट्रेक्ट ट्रैसिंग लगभग बंद कर दी गई है। यानि कोई संक्रमित पाया जाता है तो उसके परिवार के सदस्यों और करीबियों को खुद ही क्वारांटीन हो जाना चाहिये। यह निर्णय इस हिसाब से तो ठीक है कि जांच का दायरा अलग-अलग परिवारों में बढ़ाया जा सकेगा, पर यदि कोई कोरोना के इलाज से बचने के लिये बार-बार टेस्ट करा रहा हो तो वह केवल खुद को बल्कि करीबियों को भी संकट में डालता है।
कोरोना ने कद घटा दिया ‘असत्य’ का
नवरात्रि के बाद अब दशहरे के लिये भी गाइडलाइन जारी कर दी गई है। हर बार इस पर्व के आने पर कुछ बौद्धिक विचार दोहराये जाते रहे हैं। जैसे किसी-किसी अतिथि के बारे में कह दिया जाता था कि एक रावण दूसरे को कैसे मारेगा? दूसरा, इतने बरस हो गये हम असत्य के प्रतीक रावण को खत्म क्यों नहीं कर पाये, उसका कद यानि पुतले की ऊंचाई बढ़ती क्यों जा रही है। इस बार यह सोचकर दुखी होने वाले संतोष कर सकते हैं। रावण दहन में सिर्फ पूजा करने वाले और आयोजन समिति के सदस्यों को शामिल रखने की अनुमति मिली है। भीड़ इक_ी न हो, इसका ध्यान रखा जायेगा। दहन कार्यक्रम की वीडियोग्राफ्री कराई जायेगी, ताकि कोई संक्रमित हो तो उनके सम्पर्क में आने वालों को पहचाना जा सके। भंडारा, प्रसाद वितरण, पंडाल, मंच, गाने-बजाने की अनुमति नहीं है। स्वागत की रस्म रखने की भी इजाजत नहीं है। बड़ी बात ये भी है कि आयोजन स्थल पर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम पता रजिस्टर में दर्ज किया जाना है और इनमें से कोई भी संक्रमित पाया गया तो नियम दुर्गा पंडाल की ही तरह है। यानि इलाज का पूरा खर्च आयोजन समिति को वहन करना पड़ेगा। यदि इन सब नियमों का ठीक-ठीक पालन किया गया तो आयोजकों पर बड़ा बोझ पडऩे वाला है। अर्थात्, कोरोना ने रावण को भी अपनी लपेट में ले लिया है।
गणेश कौन हैं?
राजनीतिक दलों में बहुत सी बातें जो निजी तौर पर कही जानी है, उन्हें सार्वजनिक दीवारों पर लिखकर कहा जाता है। इससे कभी सनसनी फैलती है, और कभी सुगबुगाहट। लोग हैरान होते रहते हैं कि यह लिखने का राज क्या है। सोशल मीडिया के आ जाने से एक सहूलियत ही हो गई है।
अब रायपुर शहर के पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष राजीव कुमार अग्रवाल ने फेसबुक पर आज लिखा- काश हम भी कर्म करने की जगह स्वाभिमान गिरवी रख गणेश परिक्रमा करना सीखे होते।
अब उनकी बात का मतलब निकालना आसान भी है और मुश्किल भी है। अभी महीने भर पहले ही शहर जिला भाजपा अध्यक्ष पद पर श्रीचंद सुंदरानी को पार्टी ने मनोनीत किया है। भाजपा के भीतर के गणित बताते हैं कि श्रीचंद से राजीव अग्रवाल की अधिक बनती नहीं है। लेकिन राजीव ने कौन से गणेश की चर्चा की है, यह अंदाज लगाना पार्टी के भीतर के कुछ लोगों के लिए आसान होगा, पार्टी के बाहर बाकी लोगों के लिए कुछ मुश्किल हो सकता है। यह एक अलग बात है कि श्रीचंद को बनवाने वालों में रमन सिंह और राजेश मूणत के नाम लिए जा रहे हैं, और ये दोनों ही राजीव अग्रवाल के भी खासे करीबी रहते आए हैं। तो यह गणेश रमन सिंह के लिए है, या मूणत के लिए है, या किसी और के लिए कोई बताएंगे?
सूर्य ऊगा, और तुरंत ही...
रायपुर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष के लिए चार बार के पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम पहले तय कर लिया गया था। उन्हें सूचना भी भेज दी गई थी। फेसबुक और वाट्सएप पर राठौर को बधाईयों का तांता लग गया था। फिर देर शाम तक जिला भाजपा संगठन ने कार्यकर्ताओं को सूचना दी कि अभी प्रदेश संगठन ने नियुक्ति रोक दी है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रायपुर जिले के बड़े नेताओं की आपसी खींचतान की वजह से पिछले 9 महीने से भाजपा नगर निगम के पार्षद दल का नेता नहीं चुन पा रही है।
पिछले दिनों नगर निगम के सभापति प्रमोद दुबे ने भाजपा पार्षदों से आग्रह किया था कि सामान्य सभा होनी है, इसलिए नेता प्रतिपक्ष का नाम तय कर सूचित करें। इसके बाद से भाजपा में पार्षद दल का नेता चुनने की कवायद चल रही थी। सुनते हैं कि प्रदेश संगठन ने पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सबसे चर्चा कर नाम तय करने की जिम्मेदारी दी थी। बृजमोहन ने सूर्यकांत राठौर का नाम तय कर भेजा, तो विरोध शुरू हो गया। चर्चा है कि जिला अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी और राजेश मूणत, सूर्यकांत के पक्ष में नहीं हैं। इनकी पहली पसंद मीनल चौबे रहीं। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि सूर्यकांत पिछली बार भी नेता प्रतिपक्ष का दायित्व संभाल चुके हैं ऐसे में किसी नए को मौका मिलना चाहिए।
कुछ नेताओं को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी में विधानसभा चुनाव का गणित भी दिख रहा है। सूर्यकांत स्वाभाविक तौर पर रायपुर उत्तर से टिकट के दावेदार रहेंगे। वे चार बार अलग-अलग वार्डों से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में रायपुर उत्तर के बाकी दावेदार उन्हें पसंद नहीं कर पा रहे हैं। हाल यह है कि निकाय चुनाव निपटने के बाद सभी जगहों पर पार्षद दल के मुखिया तय हो चुके हैं, लेकिन अकेले रायपुर में यह काम अब तक नहीं हो पाया है।
जोगी का चुनाव कौन सम्हालेंगे?

जोगी पार्टी ने अमित जोगी को मरवाही प्रत्याशी घोषित कर दिया है। मगर उनकी राह कठिन हो चली है। पहले जाति का झंझट तो चल ही रहा है, अब उनके प्रचार की कमान कौन थामेगा, यह भी समस्या आ गई है। पहले जोगी पार्टी विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह, अमित का चुनावी रथ हांकने वाले थे। मगर अब धर्मजीत कोरोना पीडि़त हैं, और वे एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में अब धर्मजीत सिंह ठीक होने के बाद भी प्रचार में जुट पाएंगे, इसमें संदेह है। दो और विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा को लेकर यह चर्चा है कि दोनों मरवाही जाएंगे, इसकी संभावना कम है। देवव्रत तो कांग्रेस के साथ दिखते हैं। अब अमित जोगी के पास सिर्फ मां रेणु जोगी ही सहारा है।
डाकघरों से कोरोना की डिलिवरी
कोरोना से बचने के लिये कॉलेजों की परीक्षा इस बार नहीं ली गई और घरों से ही प्रश्नों को हल कर उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये छात्र-छात्राओं से जमा करने के लिये कहा गया। रायपुर व बिलासपुर के विश्वविद्यालयों में उत्तर पुस्तिकाओं को डाकघरों के माध्यम से जमा करने के लिये कहा गया है। इसके चलते डाकघरों में छात्र-छात्राओं की भीड़ उमड़ रही है। विद्यार्थियों को घंटों कतार में लगना पड़ रहा है। परीक्षायें परीक्षा केन्द्रों में नहीं लेने के पीछे जो उद्देश्य था वह तो पूरा ही नहीं होता दिख रहा है। दरअसल उत्तरपुस्तिकाओं को जमा करने के लिये समय भी लाखों परीक्षार्थियों को पांच दिन का ही दिया गया। जमा करने के लिये आपा-धापी मची हुई है। अब जब घर से ही सवाल हल करने हैं तो क्या पांच दिन और क्या दस दिन। समय बढ़ाया जा सकता था जिससे भीड़ की नौबत न आती। दूसरी बात डाकघरों में एक छात्र को कम से कम 10 से 15 मिनट लग रहे हैं। यही काम यदि कॉलेजों में काउन्टर खोलकर किया जाता तो शायद पांच मिनट में ही एक विद्यार्थी का काम हो जाता और लम्बी कतारें भी नहीं लग पाती। ऐसी ही भीड़ कॉलेजों में तब जमा होने लगी थी जब उत्तरपुस्तिकाओं को कॉलेज से लेने के लिये कहा गया था। हंगामा खड़ा होने पर व्यवस्था की गई कि छात्र उत्तर पुस्तिका खुद ही कहीं से भी ले सकते हैं। हो सकता है कि कोरोना से बचने के लिये जो फैसले लिये जाते हों वे फैसले लेते समय वही सबसे अच्छा तरीका लगता हो, लेकिन अमल में लाये जाने के बाद खतरा बढ़ रहा हो तो फैसले बदले भी जाने चाहिये। छात्रों की मांग है कि हमें उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये ज्यादा समय दिया जाये। कॉलेजों में भी काउन्टर खोले जायें। लेकिन अभी ऐसा नहीं किया गया है। प्रशासन ने फिलहाल कुछ डाकघरों में काउन्टर की संख्या ही बढ़ाई है।
यदि सब संदेही टेस्ट कराने लगें तो?
कोरोना की कल आई रिपोर्ट पर नजर डालें तो पूरे प्रदेश में 2610 कोरोना पॉजिटिव मिले और टेस्ट हुए 18591 हुए। यानि हर सातवां व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाया गया। लगभग यही औसत हर दिन है। बहुत से चिकित्सकों का मानना है कि यदि सब लक्षण वाले बिना डरे टेस्ट के लिये पहुंच जायें तो कोविड टेस्ट सेंटर में बहुत लम्बी कतार लग जायेगी। सबके टेस्ट हुए तो वास्तविक मरीजों की संख्या कई गुना और बढ़ भी जायेगी। महाससमुंद में टेस्ट कराने वाले हर 12 वें व्यक्ति में कोरोना के लक्षण मिले, बिलासपुर में हर आठवें व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। रायपुर, दुर्ग में इससे भी ज्यादा गंभीर स्थिति बनी हुई है। बहुत से लोग तो कोरोना टेस्ट से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। कई लोगों का मन बदल जाता है जब कोविड टेस्ट सेंटर्स में लगने वाली कतार और परेशानियों के बारे में सुनते हैं। यदि ऐसे सब लोगों की टेस्ट की व्यवस्था हो जाये, तो पता नहीं और कितने पॉजिटिव केस निकल जायें। इन सबको इलाज की सुविधा कैसे पहुंचायी जायेगी। होम आइसोलेशन में रहेंगे तब भी दवाओं और निगरानी के लिये कितनी बड़ी टीम की जरूरत पड़ेगी? क्या पता ऐसे लोग दफ्तरों, दुकान और बाजारों में भी घूम रहे हों। जैसे-जैसे जनजीवन सामान्य होता जाता है लोगों में सोशल डिस्टेंस, मास्क पहनने, सैनेटाइजर का इस्तेमाल करने के प्रति बेफिक्री होती जाती है। अब तो लॉकडाउन को भी लोग गंभीरता से नहीं ले रहे।
निराश ओपी फोन से बाहर
चर्चा है कि पूर्व कलेेक्टर ओपी चौधरी कोप भवन में चले गए हैं। उन्होंने पार्टी के प्रमुख नेताओं का फोन उठाना बंद कर दिया है। वैसे तो उनकी नाराजगी जायज है, क्योंकि वे युवा मोर्चा का अध्यक्ष अथवा प्रदेश भाजपा का महामंत्री बनना चाहते थे। मगर उन्हें मात्र प्रदेश मंत्री का पद दिया गया।
चौधरी के पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में अजीत जोगी इंदौर कलेक्टर रहते नौकरी छोडक़र कांग्रेस में आए थे। तब उन्हें हाथों-हाथ लिया था। कांग्रेस ने जोगी को तुरंत राज्यसभा में भेजा था। राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी। मगर चौधरी कलेक्टरी छोडक़र आए, तो भाजपा ने उन्हें खरसिया जैसी बेहद कठिन सीट पर झोंक दिया। जहां भाजपा कभी जीत नहीं पाई थी। यद्यपि भाजपा के कुछ लोग मानते हैं कि खरसिया में चौधरी को जिताने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी गई थी। कसडोल से ज्यादा खर्च खरसिया में हुआ था। सारे संसाधन झोंकने के बाद भी ओपी चौधरी बुरी तरह हार गए।
नौकरशाह से नेता बने चौधरी ने कांग्रेस नेताओं को खूब भला-बुरा कहा था, तो उनका भी काला-पीला निकलना था। दंतेवाड़ा कलेक्टर रहते जमीन घोटाले की फाइल खुल गई, जिसमें सीधे-सीधे चौधरी पर आक्षेप लगे हैं। यद्यपि चौधरी को हाईकोर्ट से जांच के खिलाफ स्थगन मिला हुआ है, लेकिन तकलीफ तो है ही। रायपुर में इन्होने डीएमएफ से लायब्रेरी बनवाई, जिसे लेकर कांग्रेस ने सवाल खड़े किये. अब पार्टी में भी उन्हें अपेक्षाकृत सम्मान नहीं मिल रहा है, तो बुरा लगना स्वाभाविक है।
सुनते हैं कि प्रदेश भाजपा के एक संगठन के बड़े नेता ने उन्हें फोन लगाया, तो उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जबकि कार्यकारिणी की घोषणा से पहले प्रमुख नेताओं से उनकी बात होते रहती थी। सरगुजा और अन्य जगहों से पार्टी के लोग उन्हें मोबाइल लगा रहे हैं, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिल रहा है। यह भी संभव है कि चौधरी किसी और कारण से फोन नहीं उठा पा रहे हैं। फिर भी पार्टी के भीतर चौधरी के बदले रूख पर चर्चा हो रही है।
मरवाही बाहरी नेताओं के भरोसे...
मरवाही उप-चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही स्थानीय नेताओं के भरोसे नहीं हैं। दोनों ही दलों ने बिलासपुर, कोरबा और रायपुर के नेताओं को जिम्मेदारी दे रखी है। स्थानीय सिर्फ जोगी कांग्रेस के नेताओं को कहा जा सकता है क्योंकि जो मरवाही का नेता है वही उनका राज्य स्तर का भी नेता है। जोगी के रहते दोनों ही दलों ने यहां से चुनाव लडऩे में इतनी गंभीरता नहीं दिखाई जितनी उनके जाने के बाद दिखाई जा रही है। कांग्रेस के पास विधानसभा में बहुत बड़ा बहुमत है पर सवाल जोगी की सीट और कांग्रेस सरकार की लोकप्रियता का है, इसलिये लगातार दौरे पार्टी नेता कर रहे हैं और अपनी 70वीं सीट हासिल करने के लिये मेहनत कर रहे हैं। भाजपा जरूर कई चुनावों में दूसरे स्थान पर रही लेकिन जीत-हार का फासला बहुत कम रहा। उसे लगता है कि जोगी के नहीं रहने पर उनके लिये भी संभावना बन सकती है। प्रतिष्ठा दोनों ही दलों की दांव में लगी है। चुनाव के पहले कांग्रेस के मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और कई विधायक तो आते ही रहे अभी भी बिलासपुर और रायपुर के नेताओं को चुनाव प्रचार और संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। यही हाल भाजपा का है। पूर्व मंत्री, सांसद, नेता प्रतिपक्ष सब वहां दौरे कर रहे हैं। जोगी के रहते दोनों ही दलों में कोई स्थानीय नेता अपनी बड़ी पहचान नहीं बना पाये। इस चुनाव के नतीजों से तय होगा कि मरवाही से कोई स्थानीय नेता उभरकर सामने आ पायेगा या नहीं। फिलहाल तो सब जिले के बाहर के नेताओं ने मोर्चा संभाल रखा है।
वैसे भी यह नया जिला बना है, जीपीएम, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही. नाम शायद देश में सबसे बड़ा, इसीलिए बोलचाल में छोटा, जीपीएम, कर लिया गया है. राज्य सरकार ने पिछले महीनों में लगातार यहां अफसर-कर्मचारियों की पोस्टिंग करके सरकारी काम पटरी पर लाने की कोशिश में कोई कसर भी नहीं रखी है. नए जिले का पहला चुनाव, अफसरों के जिम्मे सरकार को खुश रखना भी है।
छत्तीसगढ़ में सिर्फ 1 प्रतिशत मौत !
कोरोना को लेकर दो ख़बरें आज सुबह-सुबह मिल गईं। देश में कोरोना से मौतों की संख्या एक लाख पहुंच गई तो छत्तीसगढ़ में भी यह संख्या एक हजार को पार कर गई। वैसे तो राष्ट्रीय औसत के आधार पर कहा जा सकता है कि मौतें सिर्फ एक प्रतिशत हैं। पर एक भी मौत क्यों होनी चाहिये। अप्रैल-मई में जब छत्तीसगढ़ में बहुत कम कोरोना केस थे तब हम अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि हमने कोरोना से लडऩा सीख लिया है पर धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई और अब भी बढ़ ही रही है। बहुत से रिसर्चर तो बल्कि यह कह रहे हैं कि ठंड के दिनों में संक्रमण तेजी से फैलेगा। अब तक कोरोना का कोई वैक्सीन नहीं आया है, शर्त लगाकर कोई नहीं कह सकता कि आने वाले दिनों में प्रकोप घटेगा ही। हाल के लॉकडाउन से हमने देख लिया कि व्यापार, काम-धंधे बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं। हो सकता है हमारी ही लापरवाही से फिर केस बढ़ें और हमें फिर लॉकडाउन की तरफ लौटने के अलावा कोई चारा दिखाई न दे। इसलिये सिर्फ एक प्रतिशत मौतें होने पर चैन की सांस लेने के बजाय नये केस घटाने और रिकवरी दर बढ़ाते रहने पर काम होना चाहिये।
अनुचित परीक्षा से थके हुए...
आखिरकार पॉवर कंपनी के सीनियर अफसर अजय दुबे ने रिटायरमेंट के चार साल पहले ही नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कंपनी के चेयरमैन को विधिवत आवेदन दे दिया, जिसकी मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है। दुबे पॉवर होल्डिंग कंपनी में डायरेक्टर रहे, और कुछ महीने पहले उन्हें पदावनत कर ईडी बना दिया गया था। जिस पर वे पहले तकरीबन 11 साल से अधिक समय तक थे। वे सभी कंपनियों में काम कर चुके हैं।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दुबे के साथ काम कर चुके पॉवर कंपनी के तकरीबन सभी पुराने चेयरमैन उन्हें ईमानदार और मेहनती अफसर मानते रहे हैं, मगर वे पिछले वर्षों में एमडी पद पर अजय दुबे की स्वाभाविक दावेदारी पर कुछ न कर सके। दुबे करीब ढाई साल तक होल्डिंग कंपनी के डायरेक्टर रहे।
अपने से जूनियर अफसरों को संविदा नियुक्ति देकर एमडी बनाने के फैसले से आहत होकर सरकार को वीआरएस का आवेदन दे दिया। उन्होंने फेसबुक पर अपना दर्द जाहिर किया, और लिखा कि एक लंबे अर्से से अनुचित परीक्षा देते-देते थक सा गया था...। वरिष्ठ होकर सर्वोत्तम कार्य-मूल्यांकन उपार्जित कर भी मुझे अपने से कनिष्ठ, वरिष्ठ पदों में मुझसे कम अनुभवी संविदा युक्त एमडी के अधीन कार्य करने बाध्य किया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है। ऐसा जैसे अन्याय से अकेले ही लड़ता हूं...मैं लड़ा भी, लेकिन कब तक...उम्र, स्वास्थ्य और शांति पाने नमस्ते करना उचित समझा।
ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस अफसर को एमडी का दायित्व सौंपने पर विचार नहीं किया। जब भी एमडी के चयन के लिए समिति बैठती थी, अजय दुबे के नाम पर विचार होता था। पिछली सरकार में ट्रेडिंग कंपनी का एमडी का पद एक सीनियर आईएएस अफसर ने बरसों तक अपने पास सिर्फ इसलिए रखा कि वे कंपनी से मिलने वाली सुविधाओं को भोग सके। अफसर के लिए 16 लाख की गाड़ी किराए पर ली गई थी। जबकि सुविधाभोगी अफसर के पास मंत्रालय में एक से अधिक विभागों का प्रभार था। स्वाभाविक था कि दमदार आईएएस के रहते अजय दुबे जैसों को एमडी नहीं बनाया जा सकता था। कुछ इसी तरह होल्डिंग कंपनी में भी एके गर्ग को रिटायरमेंट के बाद दो बार संविदा नियुक्ति दे दी गई, जिस पर अजय दुबे की नियुक्ति होते-होते रह गई।
पिछली सरकार में तो एक बार एमडी पद के लिए अजय दुबे की दावेदारी को सिर्फ इसलिए खारिज की गई, कि पॉवर कंपनी की एक निजी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर कंपनी का एमडी बनाए जाने के बाद भी छुट्टी पर चले गए। हकीकत यह थी कि सरकार ने खुद उन्हें एमबीए करने के लिए विशेष अध्ययन अवकाश मंजूर किया था। मौजूदा सरकार का हाल यह रहा कि ट्रेडिंग कंपनी के जिस राजेश वर्मा को एमडी बनाया गया, वे चीफ इंजीनियर पद से रिटायर होने के बाद जनरेशन कंपनी के एमडी बनाए गए थे। बाद में उन्हें हटाया गया और फिर ट्रेडिंग कंपनी की जिम्मेदारी दे दी गई। यह भी संयोग है कि अजय दुबे, आईएफएस अफसर एसएस बजाज के इंजीनियरिंग कॉलेज के सहपाठी हैं। कुछ इसी तरह की परिस्थितियों से बजाज भी गुजर चुके हैं। सरकारें चाहे कोई भी हो, व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लडऩा आसान नहीं होता। अधिकारी संगठन भी अपना दायित्व नहीं निभा पाते हैं। दूसरे अफसर अपनी जगह बना लेते हैं, अजय दुबे जैसे लोग थक हारकर हाथ जोड़ लेते हैं।
निजी ख्वाहिशों को पूरा किया
राज्य सरकार ने दो आईपीएस केएल ध्रुव और शलभ सिन्हा को उनके मौजूदा जिले से एक-दूसरे की जगह पदस्थ कर निजी ख्वाहिशों को पूरा किया है। दोनों अफसर को हटाने की वजहों को लेकर पुलिस महकमे में फुसफुसाहट चल रही है। दरअसल कवर्धा पोस्टिंग से पहले केएल ध्रुव को सुकमा भेजने की सरकार की तैयारी थी। मार्च में डीआरजी के 17 जवानों की शहादत की घटना के चलते शलभ सिन्हा को वहां बनाए रखना सरकार की मजबूरी हो गई थी। वारदात के बीच एसपी को हटाए जाने से सरकार को अपनी छवि खराब होने का डर था। वैसे केएल ध्रुव भी व्यक्तिगत रूप से सुकमा में ही काम करने की इच्छा सरकार के करीबियों के समक्ष जाहिर कर चुके थे। प्रदेश सरकार के मंत्री कवासी लखमा भी अपने जिले में एक प्रमोटी आईपीएस की तैनाती की कोशिश में थे। लखमा का सीधी भर्ती के आईपीएस से कभी अच्छा रिश्ता नहीं रहा। सरकार भी अपने मंत्री की पंसद के खिलाफ जाना नहीं चाहती थी।
सुनते है कि नक्सल मामलों में केएल ध्रुव की समझ बेहतर मानी जाती है। बीजापुर जिले में वह सर्वाधिक तीन साल तक पदस्थ रहने वाले इकलौते एसपी हैं । बीजापुर और सुकमा में लगातार हो रही हिंसक वारदातों पर काबू पाने के लिए सरकार अनुभवी अफसर की तलाश में थी। सुकमा से सीधे कवर्धा पहुंचे शलभ सिन्हा को बाहर निकालने के लिए सरकार लंबे समय से विकल्प ढूंढ रही थी। एक दूसरी बात यह भी है कि बीजापुर के मौजूदा एसपी कमलोचन कश्यप को भी सरकार ने नक्सल अनुभव के चलते ही बस्तर वापस भेजा। ध्रुव भी थोड़े महीने मैदानी जिले में तैनाती के बाद वापस बस्तर भेजे गए।
दूसरे नशे के धंधे भी मिले...
मुंबई की तरह छत्तीसगढ़ में भी ड्रग्स के कारोबार का खुलासा हुआ है। दो युवक को पुलिस ने गिरफ्तार किया, तो कुछ जानकारी निकलकर आ भी गई। एक आरोपी युवक तो कांग्रेस के एक भूतपूर्व पदाधिकारी का बेटा है। मगर ड्रग्स रैकेट से जुड़े लोगों के पूरे नाम सामने आ पाएंगे, इसकी उम्मीद बेहद कम है।
सुनते हैं कि नव धनाढ्य युवक भी ड्रग्स रैकेट से जुड़ गए हैं। बकायदा इन लोगों का ग्रुप है, जिनमें से सिर्फ दो को ही पकड़ा गया है। ये न सिर्फ ड्रग्स बल्कि ऑनलाइन जुआ भी खिलाते रहे हैं। ड्रग्स रैकेट में एक पूर्व मंत्री के बेटे का नाम भी चर्चा में है। देखना है कि पुलिस पूरे ड्रग्स रैकेट का खुलासा कर पाती है, या नहीं। आम चर्चा यह रहती है कि पुलिस की आम तौर पर इन धंधों के चलते रहने में दिलचस्पी रहती है, वह तो भला हो दारू के कारोबारियों का जो अपने नशे के मुकाबले सर उठाने वाले किसी भी दूसरे नशे पर नजऱ रखते हैं ताकि अपनी बिक्री काम न हो. उन्हीं की खबर से दूसरे नशे पकड़ाते हैं।
और ये बलरामपुर, बेलगहना की बेटियां?
उत्तरप्रदेश के हाथरस में जुल्म की शिकार हुई बेटी की बलात्कार और हत्या और उसके बाद संदिग्ध तरीके से पुलिस द्वारा आधी रात को शव जलाने के मामले ने पूरे देश को झकझोरा। इसी हफ्ते छत्तीसगढ़ में इसी तरह की दो घटनायें हुईं। एक घटना छत्तीसगढ़ के उत्तरी छोर के बलरामपुर जिले में जहां लड़की से मारपीट कर, नशा देकर, उसके साथ सामूहिक -बलात्कार किया गया। पीडि़ता और उसके मां-बाप लोक लाज के डर से मेडिकल परीक्षण कराने के लिये भी राजी नहीं थे। पुलिस ने बार-बार समझाया तब एमएलसी रिपोर्ट बनी और बलात्कार की पुष्टि हुई। बलरामपुर पुलिस की बात मानें तो आरोपी गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इसी तरह की एक वारदात बेलगहना में हुई जहां रिश्ते का भाई एक मूक नाबालिग से रेप करता रहा। जब वह गर्भवती हुई तो आरोपी के मां-बाप ने गांव के प्रमुख, व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जानकारी में, उसका अवैध गर्भपात कराया। बेलगहना के मामले में पुलिस का रवैया आरोपियों के प्रति झुकाव का रहा। उसने आरोपी, उसके मां-बाप और दादा को तो जेल भिजवाया पर गांव के प्रमुख लोग जो इस घटना को दबा रहे थे उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। बलरामपुर और बेलगहना दोनों ही जगहों पर पीडि़ता की माताओं ने घटना को पुलिस तक ले जाने की हिम्मत जुटाई। उन्हें भी धमकाया गया पर उनकी हिम्मत नहीं टूटी। जहां सामाजिक संस्थायें नहीं पहुंची, कानूनी साक्षरता के कैम्प नहीं लग पाते, कानून और न्याय व्यवस्था क्या है इसे बताने वाले नहीं पहुंचते, वहां पीडि़त के माता-पिता हिम्मत दिखा पाये तो ठीक, वरना दबाव तो बहुत पड़ता है,क्योंकि ज्यादातर मामलों में प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं। ऐसे में सरकार, मीडिया, जागरूकता, कानूनी सहायता वाली संस्थाओं का इन तक पहुंचना ज्यादा जरूरी है, जो ऐसी वारदातों को होने से पहले ही रोकें और हो जायें तो पीडि़त को हरसंभव न्याय मिले। महिला अत्याचार, रेप के मामलों में अपने प्रदेश का ग्राफ वैसे भी बहुत अच्छा नहीं है।
कोरोना की चुनावी गाइडलाइन
कोरोना काल में छत्तीसगढ़ में पहला चुनाव मरवाही में होने जा रहा है। बिहार विधानससभा चुनाव, मध्यप्रदेश का मिनी चुनाव भी साथ-साथ होने जा रहा है। कोविड के संक्रमण से बचाने के लिये कई दिलचस्प उपाय किये गये हैं। मसलन, 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को डाक मतदान की सुविधा दी गई है। दिव्यांग और कोरोना संक्रमित और आइसोलेशन में रह रहे मतदाता भी मतदान के लिये डाक का इस्तेमाल कर सकेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने के लिये मतदाता को हैंड ग्लब्स दिया जायेगा। मतदाता पंजी में दस्तखत के लिये भी हैंड ग्लब्स का इस्तेमाल करना होगा। मगर नजर इस पर रखनी होगी कि प्रचार के लिये जो गाइडलाइन राजनैतिक दलों को दिया गया है, उसका कितना पालन हो पायेगा। मसलन, काफिले में पांच से ज्यादा गाडिय़ाँ नहीं होंगी, रोड शो भी निकालने की अनुमति होगी लेकिन उसमें भी सोशल डिस्टेंस का पालन करना होगा। घर-घर सम्पर्क में भी पांच से अधिक लोग एक साथ नहीं जा सकेंगे। मरवाही में चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी भले ही हुआ हो पर चुनाव का माहौल दो माह से बन चुका है। यहां सभी दलों के राजनैतिक कार्यक्रम हो रहे हैं। ऊपर बताये गये किसी भी नियम का इसमें पालन नहीं हो रहा है। क्या चुनाव अभियान के दौरान इन बंदिशों को नेता कार्यकर्ता लागू कर पायेंगे? और हां, कोरोना संक्रमितों को भी वोट डालने का अधिकार दिया गया है। उन्हें आखिरी एक घंटे में मौका मिलेगा।
साय के करीबी उम्मीद से...
भाजपा के अंदरखाने में दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय को राज्यपाल बनाने की चर्चा चल रही है। साय कई बार सांसद और विधायक रह चुके हैं। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष रहे हैं। मोदी सरकार ने उन्हें केन्द्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष का दायित्व सौंपा था। कुछ महीने पहले उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद से साय प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं।
उन्हें प्रदेश कार्यसमिति में भी रखा गया है। मगर अब इस बार की चर्चा जोरों पर है कि झारखंड की राज्यपाल सुश्री द्रोपदी मुर्मू का कार्यकाल खत्म होने के बाद नंदकुमार साय उनकी जगह ले सकते हैं। सुश्री द्रोपदी मुर्मू का कार्यकाल जल्द ही खत्म होने वाला है। सुश्री द्रोपदी मुर्मू ओडिशा की रहवासी हैं, और उन्हीं की तरह ओडिशा या छत्तीसगढ़ के ही किसी आदिवासी नेता को झारखण्ड का राज्यपाल बनाया जा सकता है। पार्टी के लोगों का मानना है कि साय इस मामले में फिट बैठते हैं। साय के करीबी लोग फिलहाल उम्मीद से हैं।
जिले के चक्कर में
राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम से प्रदेश भाजपा के बड़े नेता नाराज बताए जा रहे हैं। नेताम ने जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष की सहमति के बिना अपने गृह जिले बलरामपुर की कार्यकारिणी घोषित करवा दी थी, उसकी शिकायत पार्टी हाईकमान को भेजी गई है। चर्चा है कि नेताम को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है।
नेताम अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा नहीं रह गए हैं। वे अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। अब प्रदेश कार्यकारिणी में भी उनके धुर विरोधी पूर्व संसदीय सचिव सिद्धनाथ पैकरा की पत्नी उद्देश्वरी पैकरा को उपाध्यक्ष बनाया गया है। कार्यकारिणी को लेकर सिद्धनाथ ने रामविचार के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल रखा है, और वे उन पर कार्रवाई तक की मांग कर रहे हैं। अब हाल यह है कि जिले में दबदबा कायम रखने के चक्कर में नेताम की राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर पार्टी के भीतर हैसियत कम हो रही है।
फर्जी संस्थाओं का मुखौटा...
देश में सरकारी या संवैधानिक संस्थाओं से मिलते-जुलते नाम वाले फर्जी संगठन बनाकर उसके लेटरहैड और आईडी कार्ड बेचने का कारोबार खूब चलता है। इसमें मानवाधिकार आयोग, प्रेस कौंसिल, एंटीकरप्शन ब्यूरो के नाम पर तरह-तरह की कागजी संस्थाएं गढ़ी जाती हैं, और देश भर में उसके पदाधिकारी होने के आई कार्ड बेचे जाते हैं। अभी रायपुर के क्वींस क्लब में भिलाई के जिस हितेश पटेल नाम के आदमी ने गोली चलाई, उसके बारे में भी ऐसी शिकायत राज्य के सीएम को भेजी गई है।
भिलाई के एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने सीएम को भेजी शिकायत में कहा है कि हितेश पटेल अपने आपको इंडियन प्रेस कौंसिल नाम की एक कथित संस्था का उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार बताता है। अब भारत में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया नाम के एक संवैधानिक संस्था है जिसके अध्यक्ष अनिवार्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं। केन्द्र सरकार इसके सदस्य मनोनीत करती है, लेकिन हमेशा से ही इससे मिलते-जुलते नाम की कागजी दुकानें बनाकर देश भर में पहचानपत्र बिकते रहे हैं। लोग कारों पर भी ऐसी संस्थाओं की तख्तियां लगा लेते हैं। केन्द्र सरकार कई बरस पहले से यह आदेश निकालते आ रही है कि संवैधानिक संस्थाओं के नाम से मिलती-जुलती, या अपने नाम में इंडियन या नैशनल शब्द इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की जांच की जानी चाहिए, लेकिन जब ऐसी संस्था, उसका कार्ड बंदूक की नोंक पर दिखाया जाए, तो गोलियों के बीच कौन जांच कर सकता है?
वैसे तो जिस क्वींस क्लब में गोली चलने के बाद यह बवाल खड़ा हुआ है, उसका नाम देखें तो वह भी अंग्रेजों के समय का सरकारी क्लब लगता है-क्वींस क्लब ऑफ इंडिया!
लुभावने चेहरों का झांसा...

फेसबुक पर बहुत से, या अधिकतर, लोगों को पहली नजर में फर्जी दिखने वाले लोगों की तरफ से फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट मिलती रहती है। किसी को कम, और किसी को ज्यादा। अगर ध्यान से देखें तो यह सारा फर्जी सिलसिला आसानी से पकड़ में आ जाता है, लेकिन हैरानी यह होती है कि बड़े काबिल और समझदार लोग भी चमचमाते चेहरों का न्यौता टाल नहीं पाते। आमतौर पर फेसबुक के आदमियों को जो न्यौते मिलते हैं, वे महिलाओं की तरफ से रहते हैं, उनमें बस दो-तीन तस्वीरें पोस्ट की हुई रहती हैं, और कोई भी जानकारी नहीं रहती, यह जरूर रहता है कि कभी-कभी आपके कुछ परिचित इसके दोस्तों की लिस्ट में निकल आएं। कुल मिलाकर धोखे से बचना चाहने वाले लोग आसानी से ऐसे फर्जी अकाऊंट पकड़ सकते हैं, लेकिन लुभावने चेहरों से धोखा खाना जिनकी नीयत में रहता है, उन्हें भला कौन बचा सकते हैं?
दुर्गा पंडाल में जाकर कोई संक्रमित हुआ तो?
दुर्गा पूजा पर्व के लिये आखिरकार गाइडलाइन आ ही गई। बहुत कड़े नियम-कायदे हैं। गणेश चतुर्थी से भी ज्यादा सख्ती होगी। प्रतिमा की ऊंचाई कम और पंडाल के आकार को बड़ा कर दिया गया है। एक पंडाल से दूसरे पंडाल की दूरी 250 मीटर से कम न हो। दर्शन के लिये आने वाले सभी व्यक्तियों का नाम, पता और मोबाइल फोन नंबर आयोजकों को एक रजिस्टर में दर्ज करना होगा। पंडाल में कम से कम 4 सीसीटीवी कैमरे लगाने होंगे ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है या नहीं इस पर निगरानी रखी जा सके। पंडाल के प्रवेश द्वार पर सैनेटाइजर रखना होगा और मास्क पहने बिना कोई भी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकेगा। ऑक्सीमीटर और थर्मल स्क्रीनिंग का प्रबंध भी आयोजक को ही करना होगा। इन सब की व्यवस्था आयोजक कर भी लें तो एक और शर्त है जो उनके लिये बड़ी मुसीबत बन सकती है। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति पंडाल जाने के कारण कोरोना से संक्रमित हो गया तो उसके इलाज का सारा खर्च मूर्ति की स्थापना करने वालों को उठाना पड़ेगा। अब सवाल यह है कि यह कैसे तय हो कि कोई पंडाल में ही जाकर ही संक्रमित हुआ। वहां से लौटने के बाद भी तो हो सकता है। अब तक तो लोग सिर्फ अनुमान लगाते हैं कि किसी कार्यक्रम में गये थे, कुछ लोगों से मिले थे, शायद इसलिये संक्रमित हो गये। अब यदि दो चार लोग दर्शन करने के बाद पूजा समिति पर खर्च का दावा कर दें तब तो आयोजन करने वालों को लेने के देने पड़ जायेंगे। इसलिए दुर्गापूजा के लिए अगले बरस का इंतजार बेहतर है..
फेल भले हो गये, पढऩे से नाता नहीं टूटा
रायपुर के सोनू गुप्ता ने केबीसी मं 12.50 लाख रुपये जीत लिये। इसके आगे के पायदान में सही जवाब देते तो 25 लाख रुपये जीत सकते थे, लेकिन समझदारी दिखाई। उत्तर मालूम नहीं था। अटकल लगाते वापस सीधे तीन लाख रुपये में रह जाते, जो जीती गई रकम की सिर्फ एक चौथाई होती। सोनू की दो बातें सीखने के लायक है। एक तो वह 12वीं फेल हो चुका है। इसके बावजूद उसने यह नहीं सोचा कि सामान्य ज्ञान, किताबों और अख़बारों से उसे नाता तोड़ लेना चाहिये। केबीसी में मौका मिले इसके लिये वह तमाम तरह की पत्र-पत्रिकायें पढ़ता रहा। दूसरी बात, इतनी कम पढ़ाई के बावजूद वह अपने पैरों पर खुद खड़ा है। 12वीं फेल को ठीक-ठाक नौकरी मिलने से तो रही। इसलिये उसने वाटर प्यूरीफायर सुधारने का तकनीकी काम सीख लिया। अब जीती गई रकम से वह अपने लिये घर खरीदेगा, क्योंकि अभी वह किराये के मकान में रहते हैं। सोनू की इस कामयाबी पर एक शाबाशी तो बनती है..।
भाजपा कार्यकारिणी इस तरह समझें..
प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी में नए-पुराने चेहरों का समावेश है। ज्यादातर नाम पहले से ही तय थे। हाईकमान के कुछ निर्देशों के बाद कई नाम बदले भी गए। मसलन, यह कहा गया कि युवा मोर्चा में 35 साल से अधिक उम्र के लोग नहीं रहेंगे। इस वजह से पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी युवा मोर्चा अध्यक्ष बनने से रह गए। इससे पहले 50 बरस के नेता भी युवा मोर्चा अध्यक्ष रहते आए हैं। निवर्तमान अध्यक्ष विजय शर्मा तो 50 पार कर चुके हैं। हमने इसी कालम में 27 सितंबर को अमित साहू के भाजयुमो अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना जताई थी। तब भाजपा के ज्यादातर लोगों के लिए अमित अपरिचित चेहरा थे।
अमित को अध्यक्ष बनवाने में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की भूमिका रही है, यद्यपि वे बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक रहे हैं। विधानसभा चुनाव के समय बृजमोहन के एक-दो वार्ड में उन्हें जिम्मेदारी दी जाती रही है। अब वे एकाएक प्रदेश के नेता हो गए। चौधरी को महामंत्री बनाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन उन्हें सिर्फ मंत्री बनाकर संतोष किया गया। एक बार फिर नलिनेश ठोकने को मीडिया विभाग की कमान सौंपी गई है। नलिनेश, सौदान सिंह के बेहद करीबी माने जाते हैं।
सच्चिदानंद उपासने तो खुले तौर पर नलिनेश की आलोचना करते रहे हैं। उनकी शिकायत रही कि प्रवक्ता होने के बावजूद नलिनेश उनकी विज्ञप्ति नहीं जारी करते हैं। श्रीचंद सुंदरानी के खिलाफ भी उपासने ने काफी कुछ कहा था। अब हाल यह है कि उपासने को ही उपाध्यक्ष और प्रवक्ता पद से बेदखल कर दिया गया। वे मात्र विशेष आमंत्रित सदस्य रह गए हैं। नलिनेश की धमक ऐसी है कि दुग्ध महासंघ के पूर्व चेयरमैन और मीडिया विभाग के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे रसिक परमार का नाम सूची में नहीं है। पूरी सूची में सौदान सिंह और रमन सिंह की छाया देखी जा रही है।
समधियों के बीच..
यह भी संयोग है कि भाजपा और कांग्रेस का कोष संभालने वाले आपस में नजदीकी रिश्तेदार हैं। भाजपा ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल को कोषाध्यक्ष बनाया है। वैसे गौरीशंकर इस पद पर नहीं थे तब भी वे कोष का हिसाब किताब अप्रत्यक्ष रूप से उनके पास ही था। पार्टी में कोष नंदन जैन संभालते हैं। वे गौरीशंकर के अत्यंत भरोसेमंद हैं, पहली बार उन्हें सहकोषाध्यक्ष का पद दिया गया है। गौरीशंकर के समधी रामगोपाल अग्रवाल कांग्रेस का कोष संभालते हैं। रामगोपाल पिछले कई साल से यह काम देख रहे हैं। रामगोपाल की उपयोगिता का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें नागरिक आपूर्ति निगम का चेयरमैन बनाए जाने के बाद भी कोषाध्यक्ष पद से नहीं हटाया गया। दोनों ही समधी अपने विशिष्ट गुणों के कारण अपनी पार्टी में उपयोगी बने हुए हैं।
गजब का तालमेल
सुभाष राव को एक बार फिर प्रदेश कार्यालय प्रभारी बनाया गया है। सुभाष राव पिछले तीन दशक से कार्यालय का प्रभार देख रहे हैं। राज्य नहीं बना था, तब जिले का प्रभार देखते थे। कुछ दिनों के लिए उन्हें कार्यालय प्रभारी पद से हटाया गया था। तेज तर्रार नेता वीरेन्द्र पाण्डेय जब प्रदेश भाजपा के महामंत्री थे, तब उन्होंने सुभाष राव की जगह प्रदीप सराफ को कार्यालय प्रभारी बनाया था। थोड़े दिन बाद प्रदीप सराफ को हटा दिया गया। दिवंगत संगठन मंत्री गोविंद सारंग के करीबी रहे बालमुकुंद शर्मा याद करते हैं कि सारंगजी ने सुभाष राव की कार्यक्षमता को देखते हुए जगदलपुर से रायपुर बुलाया था और कार्यालय की जिम्मेदारी दी थी। उस समय जेब खर्च के लिए चार-पांच हजार रूपए ही मिलते थे। सुभाष राव मेहनती और ईमानदार व संगठन के प्रति निष्ठावान रहे। यही वजह है कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद लगातार 10 साल हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे।
सुभाष राव के साथ छगन मूंदड़ा को सहप्रभारी बनाया गया है। दोनों के बीच अच्छी ट्यूनिंग है। पार्टी के भीतर गौरीशंकर अग्रवाल, राजेश मूणत, लता उसेंडी, सुभाष राव और छगनलाल मूंदड़ा व राजीव अग्रवाल के बीच गजब का तालमेल है। इन सभी को एक ही परिवार का सदस्य माना जाता है। साल-दो साल में ये सभी नेता एक साथ सैर सपाटे के लिए प्रदेश से बाहर भी जाते हैं। खास बात यह है कि ये सभी सौदान सिंह और रमन सिंह के अत्यंत भरोसेमंद हैं।
रोजमर्रा के कामों में आसानी
खबर है कि प्रवक्ता बनने से वंचित नेता अब मीडिया पैनलिस्ट बनने की कोशिश में जुट गए हैं। मीडिया पैनलिस्ट को टीवी डिबेट में पार्टी का पक्ष रखने के लिए भेजा जाता है। टीवी पर चेहरा दिखने से आम लोगों के बीच चर्चा होते रहती है। इतना ही राजनीतिक दुकानदारी चलाने के लिए काफी है। चर्चा तो यह भी है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को मीडिया पैनलिस्ट बनाने के लिए एक धर्मगुरू भी सिफारिश करने वाले हैं। पहले भी धर्मगुरू की सिफारिश पर उन्हें मीडिया पैनलिस्ट बनाया गया था। एक अन्य के खिलाफ तो ढेरों मामले हैं। कोरोना का इलाज करा रहे इस नेता से एम्स प्रबंधन इतना तंग आ गया था कि एम्स प्रबंधन ने थाने में रिपोर्ट कराने की धमकी दी थी। तब सांसद सुनील सोनी ने हस्तक्षेप कर मामले को सुलझाया था। ये नेता भी मीडिया पैनलिस्ट बनने की कोशिश में हैं। राजनीतिक दलों के मीडिया पैनलिस्ट होने से अफसरों के बीच नाम और चेहरे की पहचान हो जाती है, रोजमर्रा के कामों में आसानी हो जाती है।
कांग्रेस अपनों पर तय नहीं कर पा रही...
कांकेर में पत्रकारों को पीटने के वीडियो सामने आने के बाद भी प्रदेश के कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इससे कैसे निपटा जाए। कांग्रेस प्रवक्ता ने पहले दिन कहा कि हमलावर कांग्रेस से पहले ही निष्कासित है, और यह पत्रकारों की आपसी लड़ाई है। इसके बाद हमलावरों में से एक गफ्फार मेमन ने अपने आपको कांग्रेस पार्टी का और विधायक प्रतिनिधि बताने वाले लेटरहैड पर संसदीय सचिव और विधायक शिशुपाल सोरी को एक दिलचस्प इस्तीफा लिखकर भेजा। उसने लिखा- 26 सितंबर को आपसी विवाद से हुई घटना में कुछ लोगों के द्वारा सोशल मीडिया में अनावश्यक रूप से आपके और कांग्रेस पार्टी के साथ जोड़कर दुष्प्रचार किया जा रहा है। मैं नहीं चाहता कि उक्त घटना से आपकी प्रतिष्ठा पर आंच आए। मैं कांग्रेस का सच्चा सिपाही हूं, और हमेशा रहूंगा, और पार्टी का काम निष्ठापूर्वक करते रहूंगा। मेरे ऊपर लगे आरोप की जांच होने तक मैं विधायक प्रतिनिधि के पद से त्याग पत्र आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं।
अब इस इस्तीफे से जाहिर है कि जिसे कांग्रेस से निष्कासित कहा जा रहा था, वह तो कांग्रेस का सच्चा सिपाही था, है, और रहेगा, और वह विधायक प्रतिनिधि भी है। जो विधायक संसदीय सचिव भी है वह पार्टी से किसी निष्कासित को तो अपना प्रतिनिधि बनाएगा नहीं।
इसके बाद कल कांकेर जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुभद्रा सलाम ने इस घटना के बाद जिला कांग्रेस महामंत्री अब्दुल गफ्फार मेमन को पार्टी संगठन के पद और सदस्यता से निलंबित करते हुए जो बयान जारी किया है, उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस ने हमले की इस घटना को मान लिया है।
सुभद्रा सलाम ने लिखा है कि कांग्रेस को प्राप्त वीडियो व अन्य जानकारी के आधार पर यह निलंबन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उक्त घटना में इस व्यक्ति द्वारा बेहद आपत्तिजनक एवं अश्लील गालियां देते हुए पत्रकार के साथ मारपीट करना दिख रहा है जो कि अत्यंत आपत्तिजनक है तथा उक्त हरकत से पार्टी की छवि धूमिल हुई है। इसलिए अब्दुल गफ्फार मेमन, महामंत्री जिला कांग्रेस कमेटी को पार्टी से निलंबित करके प्रदेश स्तरीय जांच समिति बनाई गई है। इस कमेटी में केशकाल के विधायक संतराम नेताम, जगदलपुर विधायक रेखचंद जैन, गुंडरदेही विधायक कुंवर सिंह निषाद, रवि घोष महामंत्री प्रदेश कांग्रेस को रखा गया है, और यह दो दिन में प्रदेश कांग्रेस को रिपोर्ट देगी।
कांकेर जिला कांग्रेस कमेटी ने निर्विवाद रूप से इस हमलावर को अपना माना, निलंबित किया, (जिसके लिए अपना होना जरूरी होता है), और हमले को भी हकीकत माना, यह भी माना कि इससे पार्टी की बेइज्जती हुई है।
अब कल ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी से एक चि_ी जारी हुई जिसमें एक और जांच कमेटी बनाई गई जिसे संशोधित लिखा गया। इस कमेटी में जगदलपुर विधायक रेखचंद जैन रायपुर उत्तर विधायक विकास उपाध्याय, गुंडरदेही विधायक कुंवर सिंह निषाद, और प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री रवि घोष को रखा गया। जिला कांग्रेस द्वारा घोषित कमेटी में से केशकाल विधायक संतराम नेताम को हटाया गया, और रायपुर के एक विधायक विकास उपाध्याय को जोड़ा गया। जिस कमेटी को दो दिन में अपनी रिपोर्ट देनी थी, उसके काम शुरू करने के पहले ही उसमें फेरबदल हो गया। दिलचस्प बात यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस ने जिला कांग्रेस के बताए गए पार्टी पदाधिकारियों को फिर से कथित कांग्रेस कार्यकर्ता लिखा, यानी प्रदेश कांग्रेस ने हमलावरों को कांग्रेसी न मानने की शुरूआत जांच के पहले ही कर दी। दो दिनों में सामने आई इन तीन चि_ियों से कांग्रेस की और फजीहत हो रही है। इस बीच सोशल मीडिया ऐसे विज्ञापनों की तस्वीरों से पटा हुआ है जिनमें हमलावर अपने को कांग्रेस नेता बता रहे हैं।


