राजपथ - जनपथ
बेवजह क्यों बढ़ गये सीमेन्ट, स्टील के दाम?
कोरोना के भयावह दौर के गुजरने के बाद उद्योग धंधों में तेजी आई है। खेती और आटोमोबाइल्स सेक्टर को छोडक़र बाकी सब व्यवसायों में बीते साल गिरावट थी। खासकर पहले से रेरा, टैक्स और रजिस्ट्री के नियमों के चलते रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ी मंदी देखने को मिली। अब लोग थोड़ी राहत की सांस ले रहे हैं और इसमें निवेश की सोच रहे हैं। लोगों ने अपने रुके हुए घर, दफ्तर बनाने के काम को भी दुबारा शुरू किया है पर स्टील और सीमेन्ट के दाम बढऩे लगे हैं। लागत बढऩे की प्रमुख वजह यही है। बिल्डरों का कहना है कि न तो इस समय मजदूरी बढ़ी, न कच्चे माल का दाम बढ़ा न ही बिजली दर में कोई बढ़ोतरी हुई है फिर भी यह स्थिति बन गई है। ऐसा केवल छत्तीसगढ़ में नहीं बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी हो रहा है। एक रियल एस्टेट कारोबारी का कहना है कि जिस तरह सिंडिकेट पहले सीमेन्ट में था, अब स्टील में भी बन चुका है। बिजली की तरह एक नियामक प्राधिकरण इनकी कीमत पर नियंत्रण के लिये बनना चाहिये। भारत माला और दूसरी सडक़, ब्रिज परियोजनाओं की लागत बढऩे के कारण चिंतित केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात के संकेत भी दिये हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार पर बोलें, दिल्ली भूल जायें
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर चल रहा संकट किसी से छिपा नहीं रह गया है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे लेकर आंदोलन शुरू करने की बात कही है। पहले 13 जनवरी को सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में धरना-प्रदर्शन की तैयारी की गई है उसके बाद 22 जनवरी को सभी जिला मुख्यालयों में रैली और प्रदर्शन किया जाना है। भले ही भाजपा के पास छत्तीसगढ़ में सीटें बहुत कम है पर कैडर तो पहले जैसा ही है। इसलिये पूरी संभावना है कि इन धरना प्रदर्शनों में ठीक-ठाक भीड़ इक_ी हो जायेगी। दूसरी तरफ इस वक्त हर किसी के दिमाग में दिल्ली में चल रहे किसानों का आंदोलन भी घूम रहा है। भले ही वहां छत्तीसगढ़ के लोग ज्यादा नहीं पहुंचे पर यहां भी कई जगहों पर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। अम्बिकापुर में तो दिल्ली के किसानों की तरह एक छोटी ट्रैक्टर रैली भी निकाली गई। छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार को धान खरीदी पर घेरने के लिये भाजपा नेता सतर्क दिखाई दे रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि वे अपने मंच से दिल्ली के किसान आंदोलन पर संभल कर बात करें। किसान कानून के फायदे गिनाने की कोशिश भी न करें। लोगों का ध्यान भटकेगा।
पोल्ट्री बिजनेस का बुरा हाल
छत्तीसगढ़ में अब तक बर्ड फ्लू का कोई केस नहीं मिल पाया है लेकिन लोग दहशत में हैं। रतनपुर में दो दिन पहले तीन कौवे एक साथ मरे पाये गये। अलग-अलग स्थानों से भी एक से अधिक संख्या में पक्षियों, मुर्गियों की मौत की खबर आई है। इनका सैम्पल शासकीय पोल्ट्री फॉर्म भेजकर जांच कराई गई है। कहीं से भी पॉजिटिव रिपोर्ट नहीं आई है। इसके बावजूद लोग चिकन और अंडे खाने से परहेज कर रहे हैं। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा सभी जगहों से खबरें हैं कि चिकन के दाम 50 फीसदी तक घट गये हैं। नानवेज के शौकीन रविवार को अधिक खरीदारी करते हैं पर कल मांग कम रही। अंडों की बिक्री में भी गिरावट आई है। पोल्ट्री फॉर्म चलाने वालों को उम्मीद है कि अगर हफ्ते, दस दिन बाद भी कोई केस नहीं आयेगा तो लोगों का डर थोड़ा कम होगा और बाजार सुधर सकेगा।
बैलगाड़ी का इंतजाम
छत्तीसगढ़ में भाजपा के अंदरखाने में धान खरीद में अव्यवस्था के खिलाफ 22 तारीख को सभी जिलों में प्रस्तावित धरना-प्रदर्शन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी खुद रायपुर में धरने में शिरकत करेंगी। पुरंदेश्वरी ने श्रीचंद सुंदरानी को अपने लिए एक बैलगाड़ी का इंतजाम करने कहा है। वे बैलगाड़ी में बैठकर किसानों की समस्याओं को लेकर ज्ञापन देने राजभवन जाएंगी। हालांकि बैलगाड़ी लेकर राजभवन तक पहुंचना मुश्किल है, लेकिन पुरंदेश्वरी की सक्रियता सेे कार्यकर्ता चार्ज जरूर हो रहे हैं।
पीए को हटाया किसने?
सरकार के एक मंत्री के पीए को कुछ समय पहले हटा दिया गया। मंत्रीजी के निजी स्टॉफ में दूसरी बार बदलाव हुआ। मगर इस बार पीए को हटाए जाने की काफी चर्चा रही। पीए, मंत्रीजी के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। हाल यह था कि पीए के कथन को मंत्री का आदेश माना जाता था। मगर पीए को हटाए जाने का आदेश पहुंचा, तो हर कोई हैरान रह गया। मंत्रीजी ने तो ऊपर से आदेश होना बताया, तो खुद पीए का मानना था कि एक पूर्व आईएएस और कुछ अन्य प्रभावशाली लोगों ने उन्हें मंत्री बंगले से बेदखल करवाया है।
अंदर की खबर यह है कि मंत्रीजी खुद होकर अपने पीए से पीछा छुड़ाना चाहते थे। मंत्रीजी के पीए से काफी पुराने संबंध रहे हैं। वे उनकी बात नहीं काट पाते थे। शिकायतें ज्यादा आने लगी, तो उन्होंने खुद होकर पीए को हटवा दिया, और 'ऊपर' से आदेश होना बता दिया। लेकिन चूंकि पहले भी दूसरे कुछ मंत्रियों के यहां के स्टाफ को ऊपर के आदेश पर बदला गया था। इसलिए पीए, मंत्रीजी के कथन को सही मानकर चल रहे हैं।
भित्ति चित्र से हलबा जाति का गायब हो जाना
प्रदेश में हरेक जिला मुख्यालय की किसी प्रमुख सडक़ का चुनाव कर उसका सौंदर्यीकरण किया जाता है। सडक़ों के किनारे आकर्षक भित्तिचित्रों से उस क्षेत्र की कला, संस्कृति और जीवन शैली को प्रदर्शित किया जाता है। हाल ही में दुर्ग के नाना-नानी पार्क की सडक़ पर ऐसी ही श्रृंखला का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लोकार्पण किया था। इधर बस्तर जिले में भी जिला प्रशासन ने वन विभाग को यही काम सौंपा। आसना पार्क में छह जनजातियों मूरिया, माडिय़ा, दोरला, गोंड, धुरवा और भतरा की प्रस्तुति की गई है पर इसमें से हलबा या हलबी जनजाति गायब है। बस्तर के अलावा ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात में इनकी बसाहट है। बस्तर की जन-जातियों पर बात हो और उनमें हलबा का जिक्र नहीं हो, एक बड़ी चूक है। बस्तर जिला प्रशासन की अधिकारिक वेबसाइट में भी हलबा जनजाति का प्रमुखता से उल्लेख है। बस्तर पर लिखी गई अनेक किताबों में भी हलबा जनजाति पर विस्तार से जिक्र है।
बस्तर में 70 प्रतिशत आदिवासी हैं और उनके अपने रिवाज, प्रथा-परम्परा, पद्धति, देवी देवताओं पर मान्यता, वेशभूषा, बोली, सांस्कृतिक गतिविधियां विविध व्यापक हैं। जब अफसर अपनी तैनाती इलाके को समझने की कोशिश नहीं करते हैं तब ऐसी गलती होती है। बस्तर की तो बूझना आसान भी नहीं है।
अखिल भारतीय हलबा समाज प्रशासन की इस लापरवाही पर गुस्से में हैं। उसने कलेक्टर, डीएफओ और उच्चाधिकारियों को इस उपेक्षा को लेकर ज्ञापन दिया है और चेतावनी दी है कि यदि यह गलती नहीं सुधारी गई तो आंदोलन करेंगे।
केंवटीन नहीं केंवट कहो भाई..
किसी महिला का नाम लिखते समय उनकी जाति का तोड़-मरोडक़र जिक्र किया जाये तो कैसा लगेगा? शर्मा को शर्माईन तो नहीं कहा जा सकता। सरनेम तो अग्रवाल, शर्मा, गुप्ता, ठाकुर वगैरह ही होना चाहिये।
बीते दिनों गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के दौरे पर पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को केंवट समाज की ओर से एक पत्र सौंपा गया। उन्होंने कहा, चकरभाठा एयरपोर्ट को ‘बिलासा बाई केंवटीन’ नाम आपने दिया उससे समाज गदगद है, आभार! सीएम ने धन्यवाद देते हुए पूछ लिया केंवटीन क्यों कह रहे हो? लोगों ने एक दूसरे की ओर सवालिया निगाह से देखा और कहा अखबारों में यही तो छपा है साहब। सीएम ने समझाया बिलासा बाई केंवट थीं तो उपनाम भी केंवट ही रहेगा न। नाम बिलासा बाई केंवट ही हुआ । सबने हामी भरी और कहा कि अब ऐसे ही लिखा बोला करेंगे। इधर प्रशासन द्वारा नामकरण पर जो चि_ी चल रही है, पता चला उसमें भी केंवटीन लिखा गया है। सीएम की सुनने के बाद उसमें सुधार किया जा रहा है। हवाई सेवा शुरू करने के लिये संघर्ष कर रहे एक नेता कहना है कि केंवट या केंवटीन का जिक्र भी क्यों हो, केवल बिलासा बाई एयरपोर्ट कहा जाना अच्छा लगेगा।
हड़ताल भी चालू और काम भी
पंचायत सचिवों का काम ग्राम स्तर पर शासकीय योजनाओं का काम देखना होता है। रोजगार सहायकों का काम महात्मा गांधी नरेगा की निगरानी, मस्टररोल और मजदूरों का वेतन बनाना होता है। पिछले एक पखवाड़े से प्रदेश भर में इनकी हड़ताल चल रही है। मांग है, दो साल की नौकरी के बाद पंचायत सचिवों को शासकीय सेवक का दर्जा मिले। रोजगार सहायकों को नगरीय निकायों की सेवा में रखा जाये, नियमित करें और पंचायत सचिवों की नियुक्ति में अनुभव के आधार पर सीधी भर्ती की जाये।
इस हड़ताल की वजह से ग्राम पंचायतों और मनरेगा के कार्यों की व्यवस्था बिगड़ी हुई है पर, हर जगह नहीं। संगठन के पदाधिकारियों ने देखा कि हड़ताल के पंडाल तो भरे हुए हैं फिर भी पंचायतों में काम रुक नहीं रहा है। पता चला कि कुछ सचिव, रोजगार सहायक हड़ताल पर भी हैं और बाद में काम भी निपटा रहे हैं। संगठन के नेताओं ने इनसे कहा कि अपना-अपना डोंगल जमा करें। इंटरनेट ही नहीं रहेगा तो काम कैसे करोगे। दिक्कत ये है कि लोग डोंगल जमा नहीं कर रहे। डोंगल जमा हो भी गया तो नेट की वैकल्पिक सुविधा इतनी अधिक है उससे काम बंद जैसी स्थिति पैदा ही नहीं हो रही है।
112, गमले, और हरकत...
पुलिस का काम आमतौर पर रूखा-सूखा होता है। लेकिन राजधानी रायपुर के पुलिस कंट्रोल रूम में सजे हुए ये गमले तब बनाए गए थे जब पुलिस ने 112 नाम की एक नई आपात सेवा शुरू की थी। इन्हीं गाडिय़ों के हुलिये में ऐसी छोटी-छोटी खिलौना-गाडिय़ां सरीखी बनाकर उनके गमले बनाए गए थे।
पुलिस की यह सेवा सडक़ों पर दिखती है, और फोन करने पर तेजी से पहुंचती भी है। इसके जिम्मेदार अफसरों को यह भी तय करना चाहिए कि सडक़ किनारे जगह-जगह खड़ी 112 गाडिय़ों में बैठे पुलिस कर्मचारी या निजी ड्राइवर खिड़कियों से बाहर थूकने से रोके जाएं। जब सरकार की जानी-पहचानी गाड़ी में बैठकर लोग ऐसी हरकत करते हैं, तो वह गमले के फूल जैसी अच्छी तो नहीं लगती।

तब कुछ नहीं हुआ तो भला अब क्या होगा?
भाजपा और कांग्रेस में बहुत फर्क है, खासकर अनुशासन के नाम पर। बिलासपुर में कांग्रेस विधायक शैलेश पांडे और ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष तैयब हुसैन के बीच हुए विवाद की इन दिनों बड़ी चर्चा है। विधायक ने हुसैन पर कॉलर पकडक़र धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने अगले ही दिन रायपुर जाकर के प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सहित कई मंत्री नेताओं को इसकी शिकायत कर दी और जांच की मांग की। जांच के लिए टीम पहुंच भी गई और अपनी रिपोर्ट लेकर चली गई। जांच टीम छत्तीसगढ़ भवन के एक कमरे के भीतर बड़ी गंभीरता से दोनों नेताओं और उनके समर्थकों का बयान दर्ज कर रही थी और बाहर दोनों ही टीमों के लोग आपस में हंसते बतियाते रहे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि कांग्रेसी किसी दिक्कत में हैं।
एक का कहना था कि यह भी एक शक्ति प्रदर्शन का तरीका है। विधायक ने देख लिया कि उनका साथ देने के लिए कौन-कौन लोग पहुंचे, दूसरी तरफ ब्लॉक अध्यक्ष ने भी जान लिया कि उनके सिर पर अपने नेता का हाथ है या नहीं।
सवाल उठा कि जांच कमेटी क्या रिपोर्ट बनायेगी और क्या सचमुच कोई कार्रवाई किसी पर होगी? विधायक बड़ी भावुकता के साथ कह रहे हैं कि न्याय चाहिए। मतलब, कड़ी कार्रवाई। दूसरा पक्ष उनकी बात पर प्रतिक्रिया दे रहा था कि ऐसा हरगिज़ नहीं होने वाला।
याद दिलाया कि यह तो विधायक के साथ हुई बदसलूकी की बात है। सन 2018 की बिलासपुर की छठ पूजा में पहुंचे मुख्यमंत्री के बारे में तो हमारे ही ग्रुप के एक नेता ने अनर्गल बातें कह दी थी। उसका तो वीडियो भी वायरल जगह-जगह हो चुका है। उसे ना केवल बख्श दिया गया बल्कि मरवाही चुनाव में भी जिम्मेदारी दी गई। हमेशा से कांग्रेस ऐसे ही चलती आई है और चलती रहेगी।
निजी अस्पताल छुट्टी पाने के फिराक में
जब कोरोना संक्रमण का संकट गहरा गया था और सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की कमी पडऩे लगी थी तो प्रदेश भर में निजी अस्पतालों को भी कोरोना का इलाज करने की छूट दी गई। थोड़े ही दिनों बाद शिकायत आने लगी की इलाज के नाम पर भारी-भरकम फीस ली जा रही है। शिकायत हुई, जांच हुई पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई। वजह यह थी कि कोरोना के नाम पर तो निर्धारित फीस ही ली जा रही थी लेकिन उसके अलावा दूसरी बीमारियां भी बताकर बिल बढ़ाया जा रहा था। ऐसा सभी निजी अस्पतालों में भले ही ना हो रहा हो लेकिन कई के खिलाफ तो बड़ी गंभीर शिकायतें स्वास्थ्य विभाग को मिली। यही नहीं सरकारी सेटअप वाले कोविड अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में औसत मौतें कहीं ज्यादा हुई। कोविड के नाम पर दूसरे मरीज भर्ती होने से कतराते थे।
इधर अस्पतालों की अभी स्थिति यह हो गई है कि ना तो अब वहां कोरोना के मरीज रह गए हैं और ना ही दूसरे पहुंच रहे हैं। अब वे स्वास्थ्य विभाग से फरियाद कर रहे हैं कि हमारा कोरोना वार्ड हटा दिया जाए। कुछ निजी अस्पताल तो बकायदा विज्ञापन दे रहे हैं कि हमारे यहां कोरोना मरीज नहीं है और सामान्य मरीजों की भर्ती चालू हो गई है।
वंश खत्म होने का नाम वंश!

लोग आमतौर पर कारोबार का नाम बड़ा सोच-समझकर रखते हैं। लेकिन अभी भी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वंश चिकन एवं एग शॉप का बोर्ड दिखा। अब चिकन की तो जिंदगी ही कुछ दिनों की रहती है जब तक ग्राहक उसे ले न जाए, और खा न ले। वही हाल अंडे का रहता है। शायद ही कहीं एक-दो दिनों से ज्यादा अंडा दुकान पर रहता हो, वह भी छोटी सी जिंदगी वाला रहता है, और उसका भी वंश आगे नहीं बढ़ता। अब जो चिकन अपने वंश का आखिरी प्राणी रहता है, उसकी दुकान का नाम वंश रहना कुछ हैरान भी करता है।
पुलिस का सर्वर बैठ गया
चिप्स और एयरटेल के बीच बिल के भुगतान को लेकर पैदा हुए विवाद का प्रदेश भर के थानों में बड़ा बुरा असर पड़ा है। खास करके वे थाने जहां बड़ी संख्या में रोजाना एफ आई आर दर्ज की जाती है। बीते 10-12 दिनों से सर्विस बंद है और एफ आई आर ऑनलाइन अपलोड ही नहीं हो रही है। इसके अलावा पुलिस की ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली भी जाम हो गई है जो अपराध सुलझाने और अपराधियों की गतिविधियों को पकडऩे में मददगार होती है। कोई अगर ऑनलाइन एफ आई आर पुलिस की पोर्टल में जाकर देखना चाहे तो इस समय नहीं देख पाएंगे। पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग की इंटरनेट जैसी अत्यंत आवश्यक सेवा का लगातार इतने दिनों से बंद रहना हैरान करता है। स्मार्ट पुलिसिंग, साईबर एक्सपर्ट पुलिसिंग, हाइटेक पुलिसिंग, इन सब का क्या हो रहा है?
सबसे बात, सबको मौका...
भाजपा की नई प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने थोड़े समय में ही अपनी अलग कार्यशैली से कार्यकर्ताओं का दिल जीतने में सफल रही हैं। वे छोटे-बड़े नेताओं को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दे रही हैं। पिछले कुछ समय से पार्टी में नियुक्तियों को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही थी। चाहे नेता प्रतिपक्ष का चयन हो, या फिर प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति, पार्टी के कई बड़े नेताओं ने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी थी। असंतुष्ट नेता पार्टी की गतिविधियों में ज्यादा सक्रिय नहीं थे, लेकिन पुरंदेश्वरी के प्रभारी बनने के बाद वे भी सक्रिय हो गए हैं।
मोर्चा-प्रकोष्ठ के प्रभारियों की बैठक में तो उन्होंने कह भी दिया कि कार्यकर्ता नाराज क्यों हैं, यह पता लगाना होगा। कोई नेता उनसे अलग से चर्चा के लिए समय मांगता है, तो वे तुरंत तैयार हो जा रही हैं, और उनकी पूरी बातों को ध्यान दे रही हैं। वे ज्यादातर सांसदों के साथ अलग से चर्चा कर चुकी हैं। पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय की भी पुरंदेश्वरी से अकेले में चर्चा हो चुकी है। जिलों का दौरा पूरा करने के बाद वे दिल्ली रवाना हुई, तो उन्हें छोडऩे के लिए दुर्ग सांसद विजय बघेल सहित कई नेता एयरपोर्ट गए थे। कुल मिलाकर पुरंदेश्वरी के कामकाज के तौर तरीकों से असंतुष्ट नेताओं का भी उन पर भरोसा दिख रहा है।
एम्बुलेंस से भी लोग जलते हैं?

ट्रकों और दूसरी गाडिय़ों के पीछे कई किस्म के फलसफे लिखे दिखते हैं। एक एम्बुलेंस के पीछे कल लिखा दिखा- जलो मत, कर्ज में हैं।
अब सवाल यह है कि एम्बुलेंस देखकर इन दिनों तो लोग नजरें फेर लेते हैं कि उसके भीतर कोरोना का कोई मरीज न हो। सडक़ किनारे एम्बुलेंस खड़ी हो, तो भी लोग कतराकर दूर से निकल जाते हैं। कल उत्तर भारत में एक जगह एक एम्बुलेंस में ले जाया जा रहा मरीज रास्ते में मर गया। कोरोना के डर और दहशत में एम्बुलेंस के कर्मचारी लाश सहित गाड़ी रास्ते में ही छोडक़र भाग गए।
लेकिन कर्ज लेकर जो लोग कारोबार के लिए ऐसी गाडिय़ां लेते हैं, वे यह भी चाहते हैं कि किसी की नजर न लगें। शायद इसलिए भी कई किस्म की बातें गाडिय़ों के पीछे लिखी जाती हैं, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, या जलो मत, बराबरी करो वगैरह-वगैरह।
वैसे एक बात है कि अब कोरोना-वैक्सीन आने पर सबसे पहले अस्पताल के कर्मचारियों को और एम्बुलेंस कर्मचारियों को यह टीका लगेगा। हो सकता है ऐसे में टीका लगे एम्बुलेंस कर्मचारी को देखकर वे लोग जलें जो टीका लगवाना चाहते हैं लेकिन जिनकी बारी महीनों या बरसों बाद आएगी।
कोविन एप में पिनकोड की समस्या
कोरोना वैक्सीनेशन की तारीख जैसे-जैसे करीब आती जा रही है, इससे जुड़ी कई ऐसी कई शंकायें खड़ी हो रही हैं, जिनका समाधान केन्द्र के पास अब तक नहीं है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने डॉ. हर्षवर्धन से दूरस्थ क्षेत्रों में वैक्सीन पहुंचाने के लिये हवाई सुविधा की मांग कर डाली। देर-सबेर इस पर हो सकता है फैसला ले लिया जाये। पर दो ऐसे सवाल थे, जिन पर कोई जवाब फिलहाल नहीं है। जैसे पूछा गया कि कोई कोरोना संक्रमित, निगेटिव होने के कितने दिन बाद टीका लगवा सकता है? जवाब आया कि 14 दिन से 3 माह के भीतर। सिंहदेव का कहना ठीक ही था कि 14 दिन पर्याप्त है या 3 माह। साफ-साफ बतायें। केन्द्रीय मंत्री ने स्पष्ट अवधि बताने के लिये समय मांगा है। दूसरी समस्या भी देश के कई नये जिलों में आ रही होगी। कोविन एप में रजिस्ट्रेशन के दौरान जिले का पिनकोड नंबर भी दर्ज करना है। अपने प्रदेश में गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही बिल्कुल नया जिला है, जिसके लिये अभी अलग पिनकोड नंबर नहीं है। यदि पुराने जिले बिलासपुर का पिन कोड नंबर डाला जाये तो सॉफ्टवेयर उसे एप्रूव ही नहीं करेगा। अभी इसका जवाब आना बाकी है।
पुरुष आयोग के लिये भी पहल हो ही जाये
महिलाओं के अत्याचार से पीडि़त पतियों को प्राय: गंभीरता से लिया ही नहीं जाता। देश में ‘पत्नी प्रताडि़त संघ’ जैसे कई संगठन हैं। बीच-बीच में इनके धरना, प्रदर्शन जैसे आंदोलन की बातें देखने- सुनने में आती रहती हैं। पर ये संगठन ताकतवर नहीं बन पाये हैं। बहुत से लोग तो इस झिझक से इन से नहीं जुड़ते क्योंकि उनको मर्द के दर्द का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं भाता। पर ऐसे लोगों की हौसला आफजाई करते रहना चाहिये। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा है कि महिलाओं और पुरुषों दोनों को न्याय दिलाने में आयोग की भूमिका निष्पक्ष रहती है। इसके पहले भी उन्होंने कहा था कि कई बार महिलायें ही गलती करती हैं, बाद में पुरुषों पर दोष मढ़ती हैं।
यह ठीक है कि फैसला दोनों पक्षों के गुण-दोष को देखकर ही किया जाना चाहिये। पर समाजशास्त्री ज्यादा ठीक तरह से बता पायेंगे कि महिलाओं से गलती होती भी है तो उसके लिये पुरुषों की ओर से दिया जाने वाले झांसे, प्रलोभन तथा आर्थिक, मानसिक, सामाजिक सुरक्षा के आश्वासन की क्या भूमिका होती है।
अब पत्नी प्रताडि़त संगठनों से जुड़े लोगों को पुरुष आयोग गठित करने के पक्ष में आवाज चाहिये। क्योंकि महिला आयोग चाहे उनसे जितनी भी सहानुभूति रखे, सिर्फ महिलाओं की शिकायत सुन सकता है। ऐसा आयोग बनने पर कुछ और रिटायर्ड लोगों के पुनर्वास का इंतजायेगा. जाम हो
बिग-बी की आवाज का अजीर्ण होना
देश दुनिया के करोड़ों प्रशंसक अमिताभ बच्चन को बिग-बी, सुपर-स्टार, सदी का महानायक कहते हैं। अभिनय के अलावा उनकी जानदार आवाज ही है, जिन्होंने उन्हें इस ऊंचाई पर पहुंचाया । लोग उनके डॉयलाग की नकल बरसों से करते आ रहे हैं। आवाज की बहुत से रेडियो शो, विज्ञापनों, कॉमेडी के कार्यक्रमों में नकल होने लगी। करीब 10 साल पहले एक गुटखा कम्पनी ने भी ऐसा किया। इसके बाद बच्चन ने शायद अपनी आवाज का कॉपीराइट करा लिया। अब उनकी आवाज की नकल करना अपराध है।
इस बेशकीमती आवाज का सरकार भी जागरूकता अभियान में इस्तेमाल करती रही है। कोरोना संक्रमण जब फैलना शुरू हुआ तो मोबाइल फोन के कॉलर ट्यून पर एक महिला की आवाज में सतर्कता का संदेश दिया जाता रहा, पर उसके बाद भी कोरोना के केस बढ़े। शायद सरकार को लगा कि असर नहीं हो रहा है। शायद तब उन्होंने अमिताभ के साथ अनुबंध किया। संयोग देखिये, कोरोना के केस घटने लगे हैं। पर अब लोग ऊबने भी लगे हैं। किसी को इमरजेंसी कॉल करनी हो, मुसीबत में फंसा हो, जान पर बन आई हो, तब भी कोरोना संदेश। एक दिन में दस बार कॉल करें तो दस बार नसीहत। लोग मोबाइल कम्पनियों और सरकार से गुहार लगाने लगे कि ये बंद करो। पर शायद सरकार को लगता है कि कोरोना को जड़ से मिटाने में यही एक तरीका कारगर रहेगा। हलाकान लोगों को अब उम्मीद दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका से है। हालांकि याचिकाकर्ता ने कॉलर ट्यून में अमिताभ की जगह किसी असली वारियर्स को मौका देने की मांग की है। उनको अमिताभ से यह काम लेने पर शिकायत है।
अब इधर एक सलाह आई है कि कोरोना अलर्ट को सुनने से कैसे बचें। उनका कहना है कि दो-चार सेकेन्ड सलाह सुनने के बाद कॉल काट दें और उसी नंबर को डायल कर लें। दूसरी बार आप सीधे रिंग टोन में पहुंच जायेंगे। आजमाकर देखें। कई लोगों का कहना है, तरीका कारगर है।
2003 का भूत मंडरा रहा है
राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस अवॉर्ड के लिए डीपीसी को दो माह हो चुके हैं, लेकिन अभी तक अधिसूचना जारी नहीं हो पाई है। सात रिक्त पदों के लिए नवम्बर में डीपीसी हुई थी। आमतौर पर डीपीसी होने के एक-दो हफ्ते के भीतर अधिसूचना जारी हो जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया।
सुनते हैं कि डीपीसी से पूर्व जरूरी विवादों का निराकरण नहीं हो पाने के कारण ऐसी स्थिति बनी है। मसलन, एडिशनल कलेक्टर संतोष देवांगन के नाम पर विचार तक नहीं किया गया। जबकि कैट ने 23 अक्टूबर को आदेश पारित कर देवांगन के नाम पर भी विचार करने के लिए कहा था, और चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा था। संतोष देवांगन के खिलाफ फिलहाल कोई जांच लंबित नहीं है। खास बात यह है कि कैट के आदेश के बाद डीपीसी हुई थी, लेकिन वरिष्ठता क्रम में ऊपर होने के बाद भी संतोष देवांगन के नाम पर विचार क्यों नहीं किया गया, यह अभी साफ नहीं है। सभी संबंधित पक्षों की तरफ से अभी तक कैट में जवाब दाखिल भी नहीं किया गया है।
एक विवाद यह भी है कि राप्रसे के 98 बैच के अफसर अरविंद एक्का और हिना नेताम के खिलाफ जांच चल रही है। विभागीय जांच की वजह से पदोन्नति तो नहीं हो सकती थी, लेकिन पद रोके जाने चाहिए थे, मगर ऐसा नहीं हुआ, और नीचे के सभी अफसरों को पदोन्नति की अनुशंसा कर दी गई। जिन 2003 बैच के अफसरों को पदोन्नति देने की अनुशंसा की गई है, उनकी नियुक्ति ही सवालों के घेरे में हैं।
हाईकोर्ट ने पीएससी-2003 की भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी को माना था, और नए सिरे से चयन सूची तैयार करने के निर्देश दिए थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा रखी है, लेकिन भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ लड़ाई लडऩे वाली वर्षा डोंगरे ने यूपीएससी और डीओपीटी व राज्य सरकार से आग्रह किया था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक 2003 बैच के अफसरों को पदोन्नति नहीं दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका लंबित है। मगर मलाईदार पदों पर जमे अफसरों के दबाव के चलते विवादों का निपटारा किए बिना पदोन्नति बैठक तो हो गई, लेकिन अधिसूचना जारी नहीं हो पाई है। हालांकि कुछ लोग जल्द अधिसूचना जारी होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन विवाद का निपटारा जल्द होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
इतने बड़ों पर कौन हाथ डाले?
सरकारी जमीन कब्जा करने में अफसर भी पीछे नहीं रहे हैं। एक अफसर ने तो बोर्ड में पदस्थापना के दौरान मकान खरीदा, फिर मकान से सटी जमीन पर कब्जा कर लिया। बाद में सरकारी योजना का फायदा उठाकर अवैध कब्जे को वैध करा लिया। एक बड़े अफसर ने तो अपने बंगले के पास की सरकारी जमीन में घेरा लगाकर बकायदा साग-भाजी भी उगाना शुरू कर दिया है। अब किसी छोटे अफसर औकात, जो इतने बड़े लोगों के अवैध कब्जे पर निगाह डाले।
सीएम के मिजाज से नई चिंता
संभागवार जिला मुख्यालयों का प्रवास कर रहे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का अधिकारी-कर्मचारियों के साथ संवाद खूब चर्चा में है। विभिन्न संगठनों, कार्यकर्ताओं से मुलाकात के अलावा वे अफसरों से चर्चा के लिये अलग से समय निर्धारित कर रहे हैं। इसमें वे सरकारी कामकाज की चर्चा तो बिल्कुल नहीं कर रहे न फटकार लगा रहे, बस हाल-चाल पूछ रहे हैं। मुख्यमंत्री से मिलकर अधिकारी खुश भी हो रहे हैं और अपने मित्रों को बता रहे हैं कि उन्होंने क्या पूछा, किस तरह पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया। इन सबके बीच जिलों की कमान संभाल रहे कुछ आईएएस, आईपीएस की चिंता बढ़ गई। जिले में काम करके दिखाना है, तो अपने मातहतों से वे इस तरह तो पेश आ नहीं सकते। कुछ सख्ती भी करनी होगी, कुछ फटकार भी लगानी होगी, शो कॉज वगैरह भी देते रहना पड़ेगा।
दूसरे आईएएस ने समझाया कि हम पर कोई बंदिश नहीं है। इस संवाद से यह बात समझ में आई है कि परफार्मेंस कलेक्टर, एसपी का देखा जायेगा। मुगालते में रहने का नई, जवाबदारी हम पर बढ़ गई है कामकाज दुरुस्त रखने की। पूछताछ हमीं से की जायेगी। अब ज्यादा अलर्ट मोड में रहना है।
ट्रेन तो सब चलायेंगे पर स्पेशल
रेस्तरां में स्पेशल थाली, स्पेशल सब्जी, चाय का रेट ज्यादा तो होता है पर उसमें जमीन-आसमान का फर्क नहीं होता। कोरोना लॉकडाउन के दौरान घर पहुंचने के लिये बदहवास मजदूरों से किराया वसूली के चलते रेलवे के रवैये पर सवाल उठा था, पर अब तो साफ है कि रेलवे ने कोरोना काल में कमाई की कोई कसर बाकी नहीं रखी है। दूसरी तरफ जिम्मेदारी, सेवाओं से भी हाथ खींच रही है। लॉकडाउन के दौरान बंद की गई ट्रेनों को धीरे-धीरे शुरू किया गया। पहले त्यौहारों के नाम पर पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं, जिसका धीरे-धीरे विस्तार किया गया। अब तक वे ट्रेनें चल रही है। लोगों में कोरोना का खौफ कम हुआ तो और ट्रेनें शुरू की गई। अब छत्तीसगढ़ से रोजाना करीब 23 यात्री ट्रेनें गुजरने या छूटने लगी हैं। मगर सब स्पेशल के नाम पर। नियमित चलाई जाने के बावजूद स्पेशल दर्जे पर रखने की खास वजह है। इन ट्रेनों में किसी भी जगह के लिये आप बैठें न्यूनतम किराया 500 किलोमीटर का होगा। यानि रायगढ़ गये तो भी वही किराया जो नागपुर जाने पर है। उस पर हालत यह है कि पेन्ट्री कार शुरू नहीं की गईं, सफाई के कर्मचारी गिने चुने स्टेशनों में हैं। आम यात्रियों को मिलने वाला सस्ता भोजन जन आहार बंद है। छोटे स्टेशनों में स्टापेज बंद हैं। मजदूरों, छोटे व्यापारी, कामकाजी लोगों के लिये करीब 10 माह से ट्रेनों पर सफर करना मुहाल बना हुआ है।
और, लगे हाथ बता दें कि पेट्रोल का दाम आज ही 83.95 पैसे हो गया जो अब तक की सबसे ज्यादा कीमत है।
तबादले के बाद भी जमे रहना
आम तौर पर राज्य और अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को तबादला आदेश मिलने के दो-चार दिन के भीतर रिलीव कर दिया जाता है। पर मुंगेली जिले में एक राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी स्थानांतरण के डेढ़ माह बाद भी रिलीव नहीं किये गये हैं। बताया जाता है कि दुर्ग जिले में जहां उन्हें भेजा जा रहा है वह उन्हें बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। वहां खाली बैठने के अलावा कोई काम नहीं है। बताते हैं कि वे करीबियों से कह रहे हैं कि कहीं भी भेज दो पर कुछ काम करने के लिये तो छोड़ो। फिलहाल उनको डेढ़ माह से रिलीव नहीं किये जाने की शिकायत पुलिस मुखिया से भी हो गई है।
मोदी-शाह से चर्चा के बाद भरोसा
केन्द्र सरकार ने काफी विवाद के बाद 24 लाख टन चावल लेने पर सहमत हो गई है। एफसीआई को निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं। वैसे तो 60 लाख टन चावल लेने का भरोसा दिया गया था, लेकिन फिलहाल 24 लाख टन चावल लेने का सहमति पत्र आने से राज्य सरकार को कुछ राहत मिली है। अब धान खरीदी की व्यवस्था ठीक करने की कोशिश हो रही है।
एफसीआई द्वारा चावल नहीं लेने से मिलिंग नहीं हो रही थी, और खरीदी केन्द्रों में धान जाम हो गया था। खुद सीएम भूपेश बघेल को आगे आकर विवाद सुलझाने के लिए पहल करनी पड़ी। सीएम ने पहले पीएम नरेन्द्र मोदी से बात की, और फिर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से चर्चा की।
दोनों से चर्चा के बाद ही विवाद सुलझ पाया। राज्य सरकार के लोगों को भरोसा है कि एफसीआई देर सवेर पूरा 60 लाख टन चावल लेगी। इस भरोसे की वजह मोदी और शाह का रूख सकारात्मक होना बताया जा रहा है, जो कि केन्द्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल के विपरीत नजर आया है।
विधायक-सांसदों को पहले लगे वैक्सीन
कोरोना वैक्सीनेशन के लिए जल्द अभियान शुरू हो रहा है। छत्तीसगढ़ में पहले फेस में करीब ढाई लाख स्वास्थ्य कर्मचारियों, डॉक्टरों को वैक्सीन लगाया जाएगा। वैक्सीन को लेकर न सिर्फ आम लोग बल्कि स्वास्थ्य कर्मचारी भी सशंकित हैं। कई स्वास्थ्य कर्मचारी इससे दुष्प्रभाव की आशंका जता रहे हैं, और दबे स्वर में वैक्सीन लगाने से आनाकानी कर रहे हैं। स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के नेताओं को अलग-अलग जिलों से फोन आने शुरू हो गए हैं।
कई स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपने संघ के नेताओं को सुझाव दिया है कि वे सरकार को ज्ञापन दें, कि सबसे पहले विधायक और सांसदों को वैक्सीन लगाया जाए। इसके बाद ही कर्मचारियों और आम लोगों को वैक्सीन लगाया जाए। हालांकि संघ के लोग सरकार को ऐसा कोई ज्ञापन नहीं दे रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि कर्मचारियों में वैक्सीन के प्रति भरोसा जताने के लिए कुछ ठोस उपाय करना चाहिए।
चिकन, अंडों पर फिर शामत
नये साल की शुरुआत में ही बर्ड फ्लू की ख़बरों ने फिर एक बार लोगों को चिंता में डाल दिया है। मध्यप्रदेश, केरल, हिमाचल, राजस्थान, हरियाणा राज्यों में हजारों पक्षियों की मौतें हुई हैं और नये मामले भी सामने आ रहे हैं। बर्ड फ्लू की जो ख़बरें आ रही हैं वह बताती है कि यह कोरोना की तरह तेजी से तो नहीं फैलता पर जानलेवा उससे कई गुना ज्यादा है। 1997 से पता लगाये जा चुके इस वायरस में कहा जा रहा है मौतों का प्रतिशत करीब 60 है। यानि कोरोना से काफी ज्यादा। छत्तीसगढ़ में पक्षियों की मौतों के मामले इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं आये हैं, लेकिन वन विभाग ने एहतियात बरतना तो शुरू कर दिया है। बिलासपुर स्थित कानन पेंडारी में पक्षियों का वैक्सीनेशन शुरू किया जा चुका है। कोरोना और बर्ड फ्लू में फिर शामत चिकन और अंडे बेचने वालों पर आई है क्योंकि लोग सावधानीवश सबसे पहले उसे ही खाने से परहेज कर रहे हैं। कोरोना के चलते अप्रैल मई माह में तो चिकन, अंडे मुफ्त बांटने की स्थिति पैदा हो गई थी, देखें इस बार क्या होता है।
वैक्सीनेशन का टारगेट न मिले
कोरोना वैक्सीनेशन के लिये प्रदेश में किया गया पहले चरण का मॉक ड्रिल सफल रहा है। रायपुर सहित सात जिलों में इसका ड्राइ रन एक-दो शिकायतों के अलावा बाकी सभी ठीक बता रहे हैं। अब कल 7 जनवरी से मॉक ड्रिल का दूसरा चरण शुरू होने वाला है। मॉक ड्रिल के बाद असली परीक्षा टीकाकरण के दौरान ही होने वाली है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कह दिया है कि टीका लगवाना स्वैच्छिक रहेगा, किसी के साथ जबरदस्ती नहीं की जायेगी। अब एक टीवी चैनल का सर्वेक्षण कहता है कि साइड इफेक्ट को लेकर चिंतित 69 प्रतिशत आम लोग वैक्सीन लगवाने के इच्छुक नहीं है। इसके अलावा जिन स्वास्थ्य कर्मियों को पहले टीका लगाने के लिये चुना जा रहा है उनमें से भी 55 प्रतिशत लोग इच्छुक नहीं है। टीका लगाने के मुहिम से जुड़े एक डॉक्टर ने कहा कि बस हमें पोलियो टीके की तरह कोरोना टीका लगाने का कोई टारगेट नहीं दिया जाये, बाकी हम संभाल लेंगे।
घरों में सरकारी शिक्षकों की दस्तक
ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि जिन छात्रों ने 10वीं, 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के फॉर्म नहीं भरे हैं या पिछली बार की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गये हैं उनसे फॉर्म भरवाने के लिये सरकारी स्कूलों के शिक्षक न केवल फोन से बल्कि जिनसे सम्पर्क नहीं हो रहा है उनके घरों में जाकर सम्पर्क कर रहे हैं। वे उन्हें परीक्षा फॉर्म भरने के लिये कह रहे हैं। अनुत्तीर्ण छात्रों को बताया जा रहा है कि वे दुबारा सभी विषयों की परीक्षा भी दिला सकते हैं। ऐसे छात्रों के कारण परीक्षा फॉर्म भरने की अंतिम तारीख भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दी गई है जो पहले 30 दिसम्बर तक थी। मकसद है, कोरोना की वजह से छात्रों का सत्र खराब न हो। बहुत से शिक्षकों ने स्कूल से बाहर ऑनलाइन, ऑफलाइन ड्यूटी अच्छी तरह निभाई। अब ये छात्र परीक्षा भी दिला सकें और किसी तरह पास हो जायें यह कवायद की जा रही है।
साइबर क्राइम से कैसे निपटे पुलिस?
ऑनलाइन ट्रांजेक्शन का जिस तरह चलन बढ़ रहा है लोग जालसाजी के भी उसी गति से शिकार हो रहे हैं। साथ ही निजता पर भी संकट खड़ा हो रहा है। बेंगलूरु से डेटा चोरी की बड़ी ख़बर आई है। एक साइबर सेक्यूरिटी रिसर्चर राजशेखर ने दावा किया है कि देश के करीब 10 करोड़ क्रेडिट और डेबिट कार्ड धारकों का डेटा हासिल कर इसे विदेशी कम्पनियों को बेचा जा रहा है। यह एक पेमेन्ट गेट वे जस पे के जरिये लीक किये जाने की बात सामने आ रही है। बिक्री भी नगदी लेन-देन करके नहीं बल्कि क्रिप्टो करंसी बिटक्वाइन के जरिये की जा रही है।
इस खुलासे में यह भी बताया गया है कि कार्ड की डिटेल के साथ मोबाइल नंबर्स, इन्कम लेवल, ई मेल आईडी, पैन नंबर आदि भी लीक हुए हैं। पहले भी इस रिसर्चर ने 70 लाख से ज्यादा लोगों के डिटेल लीक होने का दावा किया था। छत्तीसगढ़ भी डेटा लीक और ऑनलाइन ठगी की समस्या से जूझ रहा है। मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने में चूक हुई, फोन कॉल के झांसे में आये और एक झटके में लोगों की जीवन भर की कमाई साफ हो रही है। पेमेन्ट गेट वे से आसानी से एक खाते से दूसरे खाते में राशि चली जाती है। परम्परागत तरीके से काम करने वाली पुलिस को साइबर क्राइम से लडऩे के लिये नये तरीके से प्रशिक्षित करने की जरूरत आ पड़ी है साथ ही बैंकों को अपना सुरक्षा तंत्र मजबूत कर ठगों की पहुंच से उपभोक्ताओं को बचाने का इंतजाम करना होगा। हालांकि बैंकों को अपनी एटीएम मशीनों को भी ठीक करने की जरूरत है। हाल ही में जगदलपुर और बिलासपुर से करीब डेढ़ करोड़ रुपये साफ कर लिये गये थे।
वैक्सीन को लेकर ऊहापोह...
कोरोना वैक्सीन अब बस लगने ही वाली है। मॉक ड्रिल हो चुकी है। जिन दो लोगों पर पहला ट्रायल किया गया उनमें से एक महिला की तबियत बिगड़ गई। इससे यह सवाल खड़ा होने लगा है कि वैक्सीन 100 फीसदी सुरक्षित है भी या नहीं। न्यूज चैनलों और अखबारों में इस पर बहस हो रही है। बहुत लोगों का मानना है कि किसी भी रोग प्रतिरोधक वैक्सीन के लिये सालों तक लम्बे रिसर्च की जरूरत पड़ती है। यह वैक्सीन तो छह-आठ माह में बना ली गई। हड़बड़ी से नुकसान हो सकता है। संभवत: इसीलिये एक जोन में एक बार में केवल 100 लोगों को डोज देने का निर्णय लिया गया है।
छत्तीसगढ़ में हर दिन करीब 2000 लोगों को वैक्सीन देने की तैयारी की गई है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन की यह घोषणा भी लोगों को उत्साहित नहीं कर सकी, जिसमें उन्होंने सभी को फ्री में वैक्सीन लगाने की बात कही थी। बिहार में तो भाजपा का यह एक चुनावी वायदा भी था। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे भाजपा का वैक्सीन बताते हुए लगवाने से मना कर दिया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि जनमानस में वैक्सीन के प्रति विश्वसनीयता बढ़ाने से ही टीकाकरण अभियान सफल हो सकता है। सरकारों के प्रतिनिधियों को सामने आना चाहिये। दूसरी ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कह दिया है कि वे वैक्सीन नहीं लगवायेंगे।
कोरोना वैक्सीन की विश्वसनीयता सौ फीसदी तय नहीं हुई है तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को ही क्यों इसके ट्रायल के लिये चुना जाये। सार्वजनिक स्थानों पर तो राजनेता ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। कोरोना का खतरा उन्हें भी तो है। क्यों नहीं उनसे ही वैक्सीन लगवाने की शुरूआत हो।
इस बार मेलों का क्या होगा?
माघ महीने में छत्तीसगढ़ में जगह-जगह मेले लगते हैं। आधुनिकता की चमक गांवों तक पहुंच चुकी है लेकिन मेलों का क्रेज खत्म नहीं हुआ। शिवरीनारायण जैसी जगहों पर तो मेला महीने भर का उत्सव होता है। पिछली बार मेले खत्म होने के कुछ दिन बाद कोरोना का प्रकोप फैलने लगा था। इसके बाद सभी धार्मिक स्थलों में ताले लग गये थे। नवरात्रि पर डोंगरगढ़, रतनपुर आदि में मेले लगा करते हैं, पर इस बरस नहीं लगे। माघ का मेला-झूला सिर्फ मनोरंजन और मेल-मिलाप का माध्यम नहीं बल्कि सैकड़ों लोगों के लिये रोजगार भी लेकर आता है। नये साल के आगमन पर कुछ शर्तों पर कार्यक्रम रखने की अनुमति दी गई थी, पर खुले में नहीं, जबकि मेले तो खुली जगह पर ही लगते हैं।
सीएम के सामने राहत की सांस
वैसे तो प्रशासनिक हल्कों में सीएम भूपेश बघेल की छवि कडक़ मिजाज नेता की है, लेकिन बिलासपुर में उनका मिजाज एकदम अलग रहा। जिला प्रशासन के अफसरों की सीएम से मुलाकात तो रविवार रात को ही होनी थी लेकिन सामाजिक संगठनों और कांग्रेसी नेताओं की भीड़ के चलते नहीं हो पाया। आज सुबह चर्चा के लिए बुलाया गया, तो अधिकारी कर्मचारी दहशत में थे कि पता नहीं किस बात पर उन्हें फटकार मिले। कुछ के तो भरी ठंड में पसीने छूट रहे थे। मगर सीएम ने हाल में घुसते ही सब से कहा कि आप अपनी अपनी डायरी बाहर छोड़ कर आ जाइए। मतलब कि हम कोई निर्देश नहीं देने वाले हैं।
अफसरों को लगा कि विकास कार्यों में देरी पर उनसे सवाल किया जाएगा। लेकिन मुख्यमंत्री तो उनसे घर परिवार और बाल बच्चों का हाल चाल पूछने लग गए। एक नए नवेले प्रशिक्षु आईएएस सहायक कलेक्टर से उन्होंने पूछा शादी कब करोगे। उस अधिकारी ने कहा करूंगा, समय तो हो गया है। सीएम ने कहा छत्तीसगढ़ में चांस लो।
एक डिप्टी कलेक्टर की जो बिलासपुर जिले के एक अनुभाग में एसडीम के तौर काम कर रहे हैं उसने अपनी बारी आते ही खड़े होकर सबसे पहले बता दिया कि सर मेरी शादी हो गई है मैं शादीशुदा हूं। मुख्यमंत्री, गृह मंत्री और नगरी प्रशासन मंत्री ने ठहाके लगाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि तुमने तो मुझे शादी के बारे में पूछने का मौका ही नहीं दिया। अब अपने बाल बच्चों के बारे में बताओ। एक महिला अधिकारी खामोश किनारे बैठी हुई थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि तुम अपने बारे में क्यों नहीं बता रही हो। उस महिला अधिकारी ने कहा कि मेरा नाम ही सूची में नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा तो क्या हुआ अपने बारे में बताओ। महिला अधिकारी ने बताया कि उसका मायका दुर्ग में है। उनके पिताजी एक नामी वकील थे। उस वकील को जानने के बारे में गृहमंत्री से बघेल ने चर्चा की। बिना डायरी कागज पेन के हुई इस बैठक में अधिकारी शामिल हुए और प्रफुल्लित मन से बाहर निकले। अब तक ऐसा होता रहा है कि उन्हें आदेश मिलता था और डायरी में दर्ज करना पड़ता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ अधिकारियों को मुख्यमंत्री का यह बर्ताव बहुत भाया।
पार्ट-2
सीएम से चर्चा के दौरान एक महिला लेबर अफसर ने बताया कि उनके पिता रतनपुर मंदिर में पुजारी हैं, लेकिन कोरोना की वजह से पिछले 8-9 महीने से काम बंद हो गया था। इस वजह से उन्हें (पिताजी) को काफी दिक्कत हुई। सीएम ने हंसते हुए कलेक्टर-एसपी की तरफ देखते हुए कहा कि ये सब इन्हीं लोगों की वजह से हुआ है। कोरोना ज्यादा कुछ नहीं था। फिर सीएम ने पूछा, अब ठीक हो गया है न। महिला अफसर ने कहा-हां सर। इसी बीच जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा किस सर मुझे आपसे दो मिनट का वक्त चाहिए अपनी बात रखने के लिए। मुख्यमंत्री ने कहा 2 मिनट तो दे दूंगा अपने क्लास के बच्चों की तरह 40 मिनट तो नहीं लेने वाले हो ना?
दुखड़ा सुनाने पर...
भाजपा के असंतुष्ट नेता मौका मिलते ही प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी को अपना दुखड़ा सुनाने से नहीं चूक रहे हैं। इसी कड़ी में पार्टी में हाशिए पर चल रहे सच्चिदानंद उपासने भी पुरंदेश्वरी से मिलने पहुंचे, और उन्हें अपना परिचय दिया। उपासने ने कहा कि वे जिला अध्यक्ष, प्रवक्ता और प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर रहे हैं, लेकिन फिलहाल लूप लाइन में हैं। इस पर पुरंदेश्वरी ने कहा कि भाजपा में कोई लूप लाइन में नहीं रहता। हर कोई फ्रंट लाइन में रहता है।
दर्द जाता रहा
आईएफएस के 85 बैच के अफसर पीसी मिश्रा को निमोरा स्थित ग्रामीण विकास प्रशिक्षण संस्थान के पद पर संविदा नियुक्ति दी गई है। मिश्रा लंबे समय तक पंचायत में काम कर चुके हैं, और उन्हें काफी अनुभव भी है। पीसी मिश्रा के बैच के अफसर राकेश चतुर्वेदी हेड ऑफ फारेस्ट फोर्स हैं। कौशलेन्द्र सिंह भी पीसीसीएफ के पद से रिटायर हुए, लेकिन मिश्रा पीसीसीएफ नहीं बन पाए। विभाग ने उदारता नहीं दिखाई, और वे बिना पीसीसीएफ बने रिटायर हो गए।
रिटायरमेंट की फेयरवेल पार्टी में पदोन्नति नहीं मिलने पर उनका दर्द छलक गया। अब जब निमोरा में ग्रामीण विकास संस्थान के पद के लिए अनुभवी और काबिल अफसर की तलाश की जा रही थी, तो सरकार की निगाह पीसी मिश्रा पर गई। मिश्रा ने फौरन ऑफर स्वीकार कर लिया। कई रिटायर्ड आईएएस-आईएफएस अफसर रिटायरमेंट के बाद सरकार में पद चाह रहे हैं, लेकिन उनकी हसरत पूरी नहीं हो पा रही है। ऐसे में मिश्रा को मनचाही मुराद मिल गई। उनका दर्द भी जाता रहा।
प्रदर्शन का क्या हुआ?
भाजपा संगठन में अंदरूनी खींचतान जारी है। नेताओं के आपसी झगड़े की वजह से कुछ तय कार्यक्रम भी नहीं हो पा रहे हैं। मसलन, पिछले दिनों सीएम के विधानसभा क्षेत्र पाटन में सांसद विजय बघेल अपने समर्थक कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में अनशन पर बैठे थे। पूर्व सीएम रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक समेत पार्टी के सांसद और विधायक वहां पहुंचे, और विजय बघेल का समर्थन किया।
चूंकि तीन दिन हो चुके थे, और शासन-प्रशासन की तरफ से कोई हलचल नहीं हो रही थी। इसलिए विजय बघेल के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए पार्टी नेताओं ने किसी तरह उन्हें मनाकर अनशन खत्म कराया। यह तय किया गया कि जल्द ही प्रदेश स्तर पर पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में एक बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा। हाल यह है कि बघेल के अनशन खत्म हुए महीनेभर हो चुके हैं, लेकिन पार्टी अब तक प्रदर्शन कार्यक्रम तय नहीं कर पाई है। विजय बघेल समर्थक कार्यकर्ता अभी भी जेल में हैं। वैसे भी दुर्ग-भिलाई में भाजपा संगठन के सभी बड़े नेताओं को एक मंच पर लाना बेहद कठिन माना जाता है।
लेकिन भाजपा की ही बात क्यों करें, दुर्ग जिला कांग्रेस के हिसाब से भी प्रदेश में सबसे भारी, सबसे जटिल जिला माना जाता है. हमेशा ही इसी एक जिले से कांग्रेस के सबसे अधिक मंत्री, पदाधिकारी रहते आये हैं. एक वक्त तो कांग्रेस की सबसे बड़ी गुटबाजी दुर्ग में ही चलती थी।
दिल्ली से आया मेरा दोस्त...
कांग्रेस के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी को उत्तरप्रदेश तैनात किया गया है। पार्टी की हालत यहां दीवालिया है, और सोनिया परिवार की प्रतिष्ठा इसी प्रदेश से जुड़ी हुई है। उन्होंने एक अनौपचारिक चर्चा के दौरान बताया कि यूपी के कांगे्रस नेताओं की समझ में यह बात आ ही नहीं पा रही है कि उन्हें दूसरे कांग्रेसियों से नहीं लडऩा है, उन्हें सपा, बसपा, और भाजपा से लडऩा है। कांग्रेस संगठन को लेकर उनका कहना था कि नेताओं की ताकत राहुल गांधी को मनाने में लग रही है कि वे पार्टी की लीडरशिप लेने तैयार हो जाएं। लेकिन अगर ऐसा नहीं भी होता है, तो भी पार्टी की प्रियंका गांधी से बड़ी उम्मीदें हैं।
अब इस महत्वपूर्ण पदाधिकारी की बातों का कोई वजन है, तो यह बात लगती है कि राहुल के अड़े रहने पर पार्टी के नेता प्रियंका के नाम को आगे बढ़ा सकते हैं।
दो चुनावों के बीच संगठन की बारी...
छत्तीसगढ़ अभी किसी भी किस्म के चुनाव से तीन बरस दूर है। तीन बरस बाद पहला चुनाव विधानसभा का होगा, और उसके बाद लोकसभा और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनाव। विधानसभा का छोटा सा सत्र निपट चुका है, और संसद ने लगने से इंकार कर दिया है। ऐसे में इस प्रदेश में दोनों प्रमुख दलों, कांग्रेस और भाजपा के लोग संगठन के काम में लगे हैं। कांग्रेस के पास तो सरकार के नाते भी कुछ काम है, लेकिन भाजपा के पास सिर्फ संगठन है। नतीजा यह है कि दोनों ही पार्टियों में संगठनों की बैठक चल रही हैं, संगठनों के जिला और ब्लॉक स्तर तक पदाधिकारी मनोनीत करने का सिलसिला चल रहा है। कुल मिलाकर दोनों पार्टियां अपना घर मजबूत कर रही हैं, यह दो चुनावों के बीच का इस काम का सही मौका भी है। फिर भाजपा में तो छत्तीसगढ़ के प्रदेश प्रभारी भी बदले गए हैं, और नए लोगों को पकड़ भी बनानी है। गैरचुनावी बरसों में संगठन की सांस चलती रहे, उसके लिए कुछ न कुछ किया जा रहा है। बीते बरसों में भाजपा ने देश भर में पार्टी ऑफिस बना लिए हैं, और अब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जिलों में कांग्रेस भवन बनाने में लगी है।
न्याय और अन्याय
जिस तरह से केंद्र सरकार ने धान उठाने पर पाबंदी लगाई है वह हैरान करने की बात है। छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले भी यह अनुरोध किया था कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के अलावा बाकी घोषणा के अनुरूप अतिरिक्त राशि केंद्र से मिल जाए। वह तो मिला नहीं, उल्टे अब यह कहा गया है कि समर्थन मूल्य से ज्यादा राशि देने के कारण धान नहीं उठाया जाएगा। किसी भी बहाने से किसानों के हाथ में कोई रकम दी जा रही है तो उस पर दिक्कत किसी को क्यों होनी चाहिए? धान नहीं उठाने के एफसीआई के फरमान के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस गंभीर समस्या का कैसे समाधान करने वाली है।
टीका लगवाए न लगवाएं
मॉक ड्रिल के दौरान रायपुर में जिन दो लोगों को टीका लगवाया गया उनमें से एक की तबीयत बिगड़ गई और उसको तत्काल एंबुलेंस से हॉस्पिटल में दाखिल करना पड़ा। कोरोना वैक्सीन को लेकर के जितना उत्साह जिला प्रशासन और सरकार में दिखाई दे रहा है वह आम लोगों के बीच नहीं है। एक टीवी चैनल ने अभी-अभी एक सर्वे में बताया था कि लोगों को कोरोना के इलाज के अलावा कोरोना के वैक्सीन के भी साइड इफेक्ट को लेकर बड़ी चिंता है। यह रिपोर्ट तो यह कहती है कि 70 फ़ीसदी लोग कोरोना वैक्सीन लगावाना ही नहीं चाहते। मॉक ड्रिल में ही तबीयत बिगडऩे की खबर आना लोगों को और दहशत में डाल रहा है।
छांछ फूंकती कांग्रेस
मध्यप्रदेश में सरकार गंवाने के बाद कांग्रेस हाईकमान सतर्क हो गई है, और बाकी कांग्रेस शासित राज्यों में मध्यप्रदेश जैसी स्थिति न बन पाए, इस कोशिश में जुटी है। छत्तीसगढ़ में तो टूट-फूट की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बावजूद इसके हरेक विधायक से फोन पर अलग-अलग सरकार और संगठन को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है। इससे पहले तक हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट को ही अंतिम मानकर चलता था, लेकिन अब हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट पर ही निर्भर नहीं रहना चाहता है। कहावत है दूध का जला छांछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।
पास्को-आरोपी जिलाध्यक्ष !
भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों की सूची जारी हो रही है। दुर्ग संभाग के एक जिले में पास्को एक्ट के आरोपी को ही अल्पसंख्यक मोर्चे का जिलाध्यक्ष बना दिया गया। अगले महीने अल्पसंख्यक नेता की पेशी भी है। दिलचस्प बात यह है कि बधाई देने वालों में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के सदस्य यशवंत जैन भी हैं। चर्चा तो यह भी है कि यशवंत की सिफारिश पर नाबालिग से यौन दुव्र्यवहार के आरोपी को पदाधिकारी बनाया गया है। सोशल मीडिया में आरोपी पदाधिकारी बड़े नेताओं के साथ तस्वीर भी वायरल हुई है। अब इसकी शिकायत भी प्रदेश कार्यालय को भेजने की तैयारी है। देखना है कि पार्टी इस मामले में क्या कदम उठाती है।
ऑनलाइन के भरोसे होगी बोर्ड परीक्षा?
सीबीएसई की परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने कर दिया है। इधर छत्तीसगढ़ में तारीखें अब तक तय नहीं की गई है। हालांकि यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सीबीएसई की तरह दो तीन माह आगे खिसकाकर छत्तीसगढ़ में भी परीक्षा ली जायेगी। पर इतना भी आगे नहीं किया जायेगा कि अगले सत्र की समय-सारिणी बिगड़ जाये। परीक्षाओं की संभावनाओं को देखते हुए छात्र-छात्राओं में तनाव बढऩे लगा है। ऑनलाइन पढ़ाई से शिक्षक और पालक क्या खुद छात्र भी संतुष्ट नहीं हैं। जो समर्थ हैं वे कोचिंग का सहारा ले रहे हैं। पर जिनकी क्षमता नहीं है वे पिछड़ गये हैं। वे सक्षम बच्चों से बराबरी नहीं कर पायेंगे।
पिछले कई वर्षों से देखा गया है ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे, सरकारी स्कूलों में पढक़र, कम संसाधनों के बावजूद अच्छे नतीजे दे रहे हैं। बीते सत्र में 10वीं और 12वीं दोनों ही कक्षाओं के टॉपर ग्रामीण स्कूलों के विद्यार्थी थे। केन्द्रीय मंत्री ने साफ कर दिया है कि बोर्ड परीक्षा ऑनलाइन आयोजित नहीं की जायेगी। यह मुमकिन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी परीक्षायें ऑफ लाइन ही होंगीं।
मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए कक्षायें शुरू कर दी गई हैं पर छत्तीसगढ़ में अब तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं दिखाई दे रही है। बोर्ड परीक्षाओं में यदि समर्थ और वंचित विद्यार्थियों के बीच बराबरी की प्रतियोगिता रखनी है तो कक्षाओं को कुछ दिनों के लिये शुरू किया जाना जरूरी है।
लो अब गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई
गोबर की सरकारी खरीदी ने इसे लेकर लोगों की सोच में बड़ा बदलाव लाया है। गांवों में गैस सिलेन्डर पहुंचने के बाद इसका कंडे के लिये इस्तेमाल करना भी बंद हो गया था। खाद भी बाजार से खरीद लिया जाता रहा है। इस बीच ख़बरें आई हैं कि गोबर से कुछ लोगों को इतनी कमाई कर ली कि वे कच्चे घरों की पक्की मरम्मत करा रहे हैं और बाइक जैसे साधन भी खरीद रहे हैं। खाद बनाने का काम तो गोठानों में चल ही रहा है, अब गोबर की लकडिय़ां बनाने की मशीन भी आ गई है। इन लकडिय़ों का दाह-संस्कार करने में इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ शहरों नें नगरीय निकायों ने ठंड से बचाव के लिये अलाव जलाने का काम भी गोबर की लकडिय़ों से किया है।
अम्बिकापुर से तो ख़बर है कि वहां गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई है। इसे ‘गोबर एम्पोरियम’ नाम दिया गया है। दावा है कि इससे पेड़ों का काटने की नौबत कम आयेगी। जब गोबर खरीदी की योजना छत्तीसगढ़ में लाई गई तो खूब मजाक उड़ा। विरोधी दलों ने कहा कि पढ़े लिखे बेरोजगारों को नौकरी देने की जगह सरकार गोबर बीनने के काम में लगा रही है। लेकिन अब, जैसा कि विभाग के मंत्री ने दावा किया है, दूसरे राज्यों से भी इस योजना के बारे में पूछताछ हो रही है।
धान खरीदी का बंद हो जाना
धान खरीदी के मामले में पैदा हुए अभूतपूर्व संकट का सबसे ज्यादा किसानों को नुकसान हो रहा है। प्राय: सभी जिलों से खबर आ रही है कि धान का उठाव नहीं होने के कारण खरीदी रुक रही है। सरकारी तौर पर इसे घोषित तो नहीं किया गया है पर सोसाइटी में धान पहले ही से इतना जाम है कि अघोषित रूप से खरीदी बंद कर दी गई है। अकेले बिलासपुर जिले में 10 लाख क्विंटल धान जाम होने की खबर है।
राज्य सरकार का कहना है कि हर साल एफसीआई नवंबर महीने में ही धान का उठाव करने का पत्र जारी कर देती है पर इस बार जनवरी महीना आ गया, उठाव न तो शुरू हुआ है न ही इस बारे में कोई आश्वासन दिया गया है। राज्य सरकार का यह भी कहना है कि केन्द्र सरकार ने आश्वासन के मुताबिक बारदाने नहीं दिये। राइस मिलर्स को पुराने बारदाने लौटाने कहा गया पर वे फटे हुए हैं, समिति प्रबंधकों को इनकी मरम्मत करने में पसीना बहाना पड़ रहा है। किसान अपने खर्च से बारदाने की व्यवस्था कर रहे हैं।
बताया जा रहा है, राजीव न्याय योजना के अंतर्गत धान पर समर्थन मूल्य के अतिरिक्त दी जाने वाली राशि को लेकर केन्द्र को आपत्ति है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे केन्द्र की योजना किसान सम्मान निधि की तरह बताया है। प्रदेश में 2500 रुपये क्विंटल से हो रही धान खरीदी ने बाकी फसलों के प्रति किसानों की रुचि कम कर दी है। जबकि बस्तर, सरगुजा और दूसरे इलाकों में गन्ना, आलू जैसी ज्यादा लाभकारी फसलें भी ली जा रही हैं। हो सकता है कि धान के उठाव का संकट दो चार दिनों में खत्म हो जाये पर वह स्थायी समाधान नहीं है। समस्या हर साल खड़ी होने वाली है।
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने फसल चक्र परिवर्तन का अभियान चलाया था। उनकी सरकार के जाने के बाद इस पर आगे काम नहीं हुआ। अब वक्त है कि धान के अलावा दूसरी फसलें लेने पर विचार किया जाये। और सरकार इन फसलों को धान की तरह ही अच्छी कीमत देकर प्रोत्साहित करे।
कोरोना के अलग हुई मौतें
जब कोई बड़ी चोट लगती है तो लोग पहले की तकलीफ भूल जाते हैं। साल 2020 में कोरोना ने इतना दर्द दिया कि लोग बाकी बीमारियों, मौतों को मामूली समझने लगे। पर दरअसल ऐसा हुआ नहीं। सरगुजा जिले से एक रपट है कि वहां बीते सालभर में हुए हादसों में 650 से ज्यादा लोगों की जान गई। ये वे मौतें हैं जिनमें पोस्टमार्टम कराने की नौबत आई। ज्यादातर सडक़ हादसे हैं। अम्बिकापुर में ही सामान्य मौतों की संख्या तो करीब 2300 है जो श्मशान गृह और नगर निकाय के दस्तावेजों में दर्ज हैं। और इन सबके बीच कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम केवल 90 है।
इससे मिलता-जुलता आंकड़ा दूसरे जिलों का भी हो सकता है। कोरोना से बचाव के लिये हर जिले में करोड़ों रुपये की नई स्वास्थ्य सुविधायें, संसाधन उपलब्ध कराये गये। अभियान चला अर्जेंट और इमरजेंसी मोड पर। शुक्र है, अब कोविड अस्पतालों के बिस्तर दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये काम आयेंगे क्योंकि हर जिले में प्राय: 75 प्रतिशत बेड खाली हो चुके हैं। बात ये है कि कोरोना से भी ज्यादा लील लेने वाले सडक़ हादसों को रोकने के लिये भी ऐसी ही कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई जाती? सडक़ों में सही संकेतक हों, लोग हेलमेट पहने, ओवरस्पीड न चलें, शराब पीकर न चलें, वैध ड्राइविंग लाइसेंस रखें, गड्ढ़ों को ठीक करें। शायद यह बंदोबस्त कोरोना पर किये गये खर्च से भी कम बजट में हो जायेगा।
भगवाधारी कुलपति
वैसे तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेवभाई शर्मा को आरएसएस के विचारक के रूप में जाना जाता है। वे आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक भी रहे, और जब राज्यपाल ने सरकार की सिफारिशों को नजरअंदाज कर बलदेवभाई शर्मा को कुलपति नियुक्त किया, तो काफी हल्ला मचा। इसके बाद से ही बलदेवभाई शर्मा अपने को निष्पक्ष बताने की कोशिश में जुटे रहे।
सुनते हैं कि सरकार के करीबी लोगों को अलग-अलग माध्यमों से वे लगातार यह बता रहे थे कि उनका कोई एजेंडा नहीं है, और न ही आरएसएस से भी सीधा कोई नाता है। मगर नए साल में लोग उस वक्त हक्का-बक्का रह गए, जब वे भगवा पोशाक पहनकर विवि पहुंचे। प्रदेश के दूसरे विवि विद्यालयों में आरएसएस अथवा भाजपा से जुड़े कुलपति हैं, मगर इस तरह का पहनावा कभी किसी का नहीं रहा। बलदेवभाई चाहे कुछ भी कहे, लेकिन कपड़े के रंग से उनकी सोच जाहिर हो ही गई।
भाजपा में सौदान की जगह शिव
आखिरकार अ_ारह बरस बाद सौदान सिंह की छत्तीसगढ़ से बिदाई हो गई। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर चंडीगढ़ भेजा गया, और उनकी जगह बंगाल में संगठन का काम देख रहे शिवप्रकाश को अन्य राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार दिया गया है। सौदान सिंह के छत्तीसगढ़ से हटने की खबर सोशल मीडिया में छाई रही। पार्टी के कुछ लोगों ने उन्हें फेसबुक पर जमकर कोसा, और छत्तीसगढ़ में भाजपा की दुर्दशा के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा दिया। अंदर की खबर यह है कि प्रदेश के ज्यादातर सांसद उनके खिलाफ मुखर थे, और राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से शिकायत भी की थी।
वैसे तो विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही उन्हें हटाने की मांग जोर पकडऩेे लगी थी। भाजपा विधायक दल के नेता के चयन के बाद से पार्टी के एक खेमे ने तो सौदान सिंह से राजनीतिक चर्चा करना भी बंद कर दिया था। सौदान सिंह पर गुट विशेष को संरक्षण देने का आरोप लगते रहा है। कुछ लोग याद करते हैं कि वर्ष-2002 में जब वे छत्तीसगढ़ आए, तब सबको साथ लेकर चलने पर जोर देते थे। उस समय सौदान सिंह के प्रदेश महामंत्री (संगठन) पद पर होने के बाद भी एकतरफा फैसले नहीं लेते थे। हालांकि उस समय प्रदेश भाजपा में लखीराम अग्रवाल, बलीराम कश्यप, दिलीप सिंह जूदेव, ताराचंद साहू और रमेश बैस जैसे बड़े नेता मौजूद थे। रमन सिंह के साथ सौदान सिंह की तालमेल बढिय़ा रहा। मगर वे रमन विरोधी नेताओं को साध नहीं सके।
लखीराम, बलीराम, दिलीप सिंह जूदेव के निधन और फिर ताराचंद साहू के पार्टी से बाहर चले जाने के बाद सौदान सिंह की पार्टी में पकड़ मजबूत होती चली गई। संघ की पृष्ठभूमि से आए सौदान सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी दी गई, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका मोह नहीं छूटा।
जिलाध्यक्ष तक की नियुक्तियों में सौदान सिंह का सीधा दखल रहता था। प्रदेश और जिला संगठन में नियुक्ति के बाद तो असंतुष्ट नेताओं ने उनके खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया था। नई प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी रायपुर आई, तो कुछ बड़े नेताओं ने मौका पाकर सौदान सिंह के खिलाफ शिकायतें की। वाट्सअप पर प्रदेश प्रभारी को लगातार जानकारी दी जाने लगी थी। पार्टी के भीतर आदिवासी नेता नंदकुमार साय की अगुवाई में लामबंद हो गए थे, और उन्होंने पिछलेेेे दिनों खुले तौर पर बैठक भी की थी। इससे भी पार्टी हाईकमान के कान खड़े हो गए। नंदकुमार साय समेत ज्यादातर पार्टी के बड़े आदिवासी नेता सौदान सिंह के धुर विरोधी माने जाते हैं।
चर्चा है कि पार्टी ने भविष्य में संभावित नुकसान से बचने के लिए सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजने का फैसला लिया। बताते हैं कि कुछ साल पहले भी सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के दायित्व से मुक्त करने की कोशिश की गई थी, उस वक्त सौदान सिंह मोबाइल पार्टी दफ्तर में जमा कर अपने गांव चले गए थे। बाद में उन्हें किसी तरह मनाया गया। मगर इस बार पार्टी ने प्रचारक के दायित्व से भी मुक्त कर बड़ा फैसला ले लिया। देखना है कि प्रदेश भाजपा में फैसले का क्या असर होता है।
छापे वाले सेल्फी लेने में लग गए
कोरोना संक्रमण के चलते वैसे तो न्यू ईयर पार्टी पर रोक लगी थी। लेकिन रायपुर के तकरीबन सभी बड़े होटलों में न सिर्फ पूरी रात पार्टी चली, बल्कि जाम भी छलके। एक होटल में तो बकायदा आबकारी अमला पहुंच भी गया था। पार्टी में शामिल लोग थोड़ी देर सहम गए, और जाम से भरी गिलास इधर-उधर छिपाने की कोशिश करने लगे। मगर थोड़ी देर में नजारा बदल गया, जो अमला छापा मारने के लिए आया था वह पार्टी में मशगुल हो गया। एक महिला अफसर तो सेल्फी लेते नजर आई। फिर क्या था, उत्साह दोगुना हो गया। वैसे भी खुशी मनाने का हक सबको होता है।
तथाकथित पैसेवाले, पढ़े-लिखे

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस वार्ड में लोगों ने सफाई की मुहिम छेडऩे वाले अमर बंसल को पार्षद बनाया, उस वार्ड में लोगों की नालायकी का हाल यह है कि थोक में दारू पीकर खाली बोतलें नाली में बहा देते हैं, और बोतल खाली होने की वजह से पानी पर तैरती हुई नाव की तरह जाकर कहीं फंस जाती है। चूंकि लोगों के घरों से कचरा उठाया जा रहा है, रोज दो बार उठाया जा रहा है, इसलिए यह मस्ती छाई हुई है। अगर विकसित और सभ्य देशों की तरह नाली और सडक़ किनारे फेंके गए कचरे की छानबीन करके किसी बिल या रसीद, या किसी कागज के सहारे ऐसे नालायक लोगों तक पहुंचा जा सकता, तो उनके पोस्टर सडक़ किनारे लगाने चाहिए।
दरअसल जब तक सफाई करने के लिए दलित समुदाय के गरीब लोग जिंदा हैं, तब तक ऐसी आपराधिक गैरजिम्मेदारी दिखाना लोग अपना हक समझते हैं। रात-दिन सफाई कर्मचारी नालियों में उतरकर अपनी जिंदगी घटाते हैं, और इस सहूलियत की वजह से लोग नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। किसी बारात में आए हुए मेहमानों की तरह वार्ड के लोगों की ऐसी खातिर भी जायज नहीं है जो दलितों की जिंदगी नाली में ही तय कर दे।
जो लोग सस्ती दारू की दुकानों पर गरीबों की भीड़ को हिकारत से देखते हैं, उन्हें नालियां जाम करने वाले ये महंगे ब्रांड देखने चाहिए जो कि तथाकथित पैसे वाले, और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग ही पी रहे हैं।
सुना है कि दारू पीने से सबके लीवर खराब नहीं होते, जो नालियों को इस तरह पाटते हैं, उन्हें सफाई कर्मचारियों की बद्दुआ लगती है, और उसी से लीवर खराब होता है, दारू नाहक ही बदनाम होती है।
कैदियों के लिये कोरोना खत्म
नये साल पर हर कोई खुशी की उम्मीद करता है। पर पैरोल पर छूटे कैदियों के नसीब में ये नहीं है। ओवर क्राउडेड जेलों में जब कोरोना फैलने का खतरा दिखा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट जज की अनुवाई में, प्रदेश में भी एक समिति बनी और ऐसे कैदियों, विचाराधीन बंदियों को पैरोल पर छोड़ा गया जिनकी कुल सजा 7 साल या उससे कम है। छत्तीसगढ़ में ऐसे मामले करीब 4 हजार थे। इनको बार-बार राहत दी गई। मार्च के आखिरी सप्ताह से लेकर जो छूटे तो रिहाई का वक्त बढ़ता गया। वे अब तक इसका फायदा उठा रहे थे। पर यह अवधि 31 दिसम्बर को खत्म हो गई है। यानि एक जनवरी 2021 की सुबह से इन्हें जेलों में हाजिरी देकर वापस बैरक में चले जाना है। आज दोपहर तक यह आंकड़ा नहीं मिला कि कितने कैदी ईमानदारी के साथ वापस जेलों में बंद होने के लिये खुद से पहुंच गये। हो सकता है कि कुछ लोग जेलों में लौटना मंजूर न करें और बाहर रहकर अपने खिलाफ एक और मुकदमा दर्ज होने के लिये तैयार रहें। एक सजायाफ्ता ने कोरोना खत्म नहीं होने और जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। उसे राहत मिली, पर सिर्फ 6 जनवरी तक के लिये।
पासवान की कमी खल रही है...
रामविलास पासवान के नहीं रहने से छत्तीसगढ़ को नुकसान उठाना पड़ रहा है। पासवान मोदी सरकार में खाद्य महकमा संभालते थे। वे विशेषकर छत्तीसगढ़ धान खरीदी से जुड़ी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए तत्पर रहते थे। मगर उनके गुजरने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार को धान खरीद में गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी विपरीत स्थिति छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से नहीं बनी।
दरअसल, केन्द्र ने सितंबर माह में ही 60 लाख मीट्रिक टन चावल लेने के लिए राज्य को सहमति की चि_ी जारी कर दी थी। मगर एफसीआई को लेने के आदेश जारी नहीं किए। अब हाल यह है कि चावल जमा नहीं होने से मिलिंग नहीं हो रही है, और खरीदी केन्द्रों में धान जाम है। 20 फीसदी केन्द्रों में धान खरीद बंद हो चुकी है। अगले एक हफ्ते में तो पूरे प्रदेश में धान खरीद व्यवस्था चरमराने के आसार दिख रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार पिछले दो-तीन महीनों से धान खरीदी व्यवस्था बेहतर हो, इसके लिए भरपूर कोशिश कर रही है। सरकार ने पासवान की जगह खाद्य महकमा संभालने वाले पीयूष गोयल को चावल लेने के लिए एफसीआई को निर्देश देने का आग्रह किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हल्ला यह है कि पीयूष गोयल की तरफ से जानबूझकर दिक्कतें पैदा की जा रही है। गोयल, राज्य भाजपा के बड़े नेताओं के संपर्क में भी रहते हैं।
चर्चा तो यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भूपेश सरकार की किसान हितैषी छवि बनने से भाजपा के लोग परेशान हैं, क्योंकि अकेले छत्तीसगढ़ में सरकार 25 सौ रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदती है। ऐसे में गोयल के मार्फत धान खरीद में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश हो रही है। मगर यह सच न भी हो, लेकिन सहमति के बाद भी औपचारिक रूप से एफसीआई को चि_ी जारी करने में चार माह की देरी होने से कुछ शंका जरूर पैदा होती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के लोग पासवान को याद कर रहे हैं, जो कि कांग्रेस के नहीं थे, लेकिन बिना भेदभाव के राज्यों को सहयोग करने के लिए तैयार रहते थे।
अफसर इधर-उधर
साल खत्म होने के पहले दर्जनभर से अधिक आईएएस अफसरों को इधर से उधर किया गया। इसमें कुछ को बेहतर पोस्टिंग मिली है। मसलन, मरवाही जीत के बाद जीपीएम कलेक्टर डोमन सिंह और जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को बेहतर पोस्टिंग मिलना अपेक्षित था। डोमन सिंह को महासमुंद कलेक्टर बनाया गया है। डोमन सिंह ने अमित जोगी-ऋचा जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर कड़ा और बड़ा फैसला दिया था। इसी तरह वहां के जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को राजनांदगांव जैसे बड़े जिले में पदस्थ किया गया।
नांदगांव जिला पंचायत सीईओ तनुजा सलाम के खिलाफ कई शिकायतें थीं। जिले के प्रभारी मंत्री भी उनके कामकाज से नाखुश थे। उनका हटना तय माना जा रहा था। इससे परे महासमुंद कलेक्टर कार्तिकेय गोयल को हटाकर एमडी मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन बनाया गया है। गोयल की छह माह पहले ही महासमुंद पोस्टिंग हुई थी। उनका कामकाज भी ठीकठाक ही रहा है। इतनी जल्दी उन्हें बदलने का कोई कारण समझ नहीं आया। अलबत्ता, लंबे समय से प्रतीक्षारत धर्मेश कुमार साहू को आखिरकार कलेक्टरी का मौका मिल गया। उन्हें नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया। फेरबदल में दुर्ग कमिश्नर के पद पर भी पोस्टिंग की उम्मीद जताई जा रही थी। दुर्ग कमिश्नर टीएस महावर आज रिटायर हो रहे हैं। चर्चा यह भी है कि आज-कल में एक छोटी सूची और निकल सकती है।
रिश्वतखोरी पर थोक में एक्शन
यह दूसरा मौका है जब एसीबी ने एक साथ तीन चार जगह छापेमारी कर रिश्वत रिश्वत लेने के मामलों में गिरफ्तारी की है। इसके पहले जुलाई माह में एक ही दिन एक साथ चार कर्मचारी, अधिकारी पकड़े गये थे। इनमें एक बेमेतरा की महिला पटवारी थी, जिसे एक जमीन के कागजात के नाम पर 7 हजार रुपये लेते पकड़ा गया था। बिलासपुर जिले के भरौदा में विकास कार्यों के लिये मिली राशि को जारी करने के लिये 35 हजार रुपये की रिश्वत लेते जिला पंचायत के समन्वयक को पकड़ा गया था। साथ ही इसी दिन सूरजपुर के बीईओ को 30 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया था। अब बुधवार को भी कार्रवाई हुई है। रामचंद्रपुर के जनपद सीईओ को 60 हजार रुपये की रिश्वत लेते, सिगमा में आरईएस के एक सब इंजीनियर को 12 हजार रुपये लेते हुए तथा नारायणपुर जिले में शिक्षा विभाग के एक बाबू को 10 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।
एक साथ रेड मारने का फायदा यह होता है कि रिश्वत लेने वालों को सतर्क होने का मौका नहीं मिलता। एसीबी को वाहवाही भी खूब मिल जाती है।
कुछ माह पहले सीएम ने समीक्षा बैठक की थी तब भी यह बात सामने आई थी कि दर्जनों अफसरों के खिलाफ विभागीय मंजूरी नहीं मिलने के कारण आर्थिक अपराध के चालान पेश नहीं हो पाये हैं। सजा तो और भी कम लोगों को मिल पाती है। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पकड़े गये हैं, पर चालान रुका हुआ है। कुछ प्रकरणों में ये पकड़े गये तो खूब सनसनीखेज घटना के तौर पर सामने आई, पर अधिकारी कुछ साल बाद बरी होकर वापस अपनी ड्यूटी पर वरिष्ठता के साथ वापस पहुंच गये। छापे और रिश्वतखोरों को धरे जाने की खबर तो खूब मिल जाती है पर कितनों का चालान पेश हुआ और ब्यूरो कितने लोगों को सजा दिलाई, ये जानकारी भी तो एसीबी को देते रहना चाहिये।
बस संचालकों से हमदर्दी...
रेलवे ने ट्रेन किराये में वृद्धि स्पेशल के नाम पर की है तो बसों में अघोषित रूप से किराया ज्यादा वसूल किया जा रहा है। खासकर लम्बी दूरी के यात्रियों से। बस्तर, रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा और जशपुर जिलों से चलने वाली अंतर्राज्यीय बसों का किराया अघोषित रूप से 25 से 50 प्रतिशत अधिक वसूल किया जा रहा है। बसों और बस स्टैंड में किराया सूची लगाने का फरमान है पर ज्यादातर जगहों पर इसका पालन नहीं हो रहा है। लगातार शिकायतों के बाद खानापूर्ति के लिये एक दो कार्रवाई कर दी जाती है। शायद कोरोना काल में बसों का संचालन बंद होने का असर सिर्फ बस ओनर्स पर ही नहीं, परिवहन विभाग पर भी पड़ा है। बस संचालक लगातार नुकसान होने की फरियाद करते रहे हैं, इसलिये उन्हें अभी ढील दी गई है। पर यात्री भी तो उसी कोरोना के कारण मंदी के शिकार हुए हैं। हमदर्दी उनके लिये क्यों नहीं?
खरीदी केन्द्र में एसडीएम का आपा खोना
धान खरीदी में आ रही दिक्कतों के चलते हर कोई परेशान है। किसान तो इसे भुगत ही रहा है, खरीदी केन्द्रों के कर्मचारी, फूड, मार्कफेड के अधिकारी और इन सब पर निगरानी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों पर भी अलग तरह का दबाव बना हुआ है। छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अधिकारी, धान खरीदी की प्रक्रिया में लगे हर किसी की भूमिका बड़ी है। पर लोरमी के एसडीएम ने यह बात नहीं समझी और अव्यवस्था देखकर आपा खो दिया।
आरोप है कि न केवल उन्होंने खुडिय़ा में धान खरीदी केन्द्र के प्रभारी के साथ मारपीट की बल्कि अपने गार्ड से भी उसे पिटवाया। मारपीट से व्यवस्था तो सुधरनी थी नहीं, तो ऐसा ही हुआ। पूरे मुंगेली जिले में कर्मचारी हड़ताल पर चले गये। वे एसडीएम को हटाने की मांग कर रहे हैं। कुछ कर्मचारी संगठन भी उनके समर्थन में आ गये हैं। इधर पूरे जिले में धान की खरीदी बंद कर दी गई है। दो दिन खरीदी बंद रहने से हड़बड़ाये जिला प्रशासन ने तहसीलदार और उनके मातहतों को खरीदी शुरू करने कहा है, पर उनसे व्यवस्था नहीं संभल रही है।
किसान वैसे भी टोकन, बोरी, अपनी बारी आने के इंतजार में पस्त हो गये हैं पर एक अधिकारी की नासमझी से व्यवस्था और बिगाड़ दी है। अब कलेक्टर पर है, वे क्या रास्ता निकालते हैं। उन्होंने जांच के बाद कार्रवाई की बात कही है। पर, जांच नायब तहसीलदार से कराई जा रही है, जो उनके अधीन काम करते हैं। क्या एसडीएम की कोई गलती नजर आयेगी?
2020 की एबीसीडी
हिन्दुस्तान के जो प्रमुख उद्योगपति ट्विटर पर लगातार सक्रिय रहते हैं उनमें हर्ष गोयनका भी शामिल हैं। उन्होंने आज दोपहर 2020 के सबसे चर्चित और प्रचलित शब्दों से एबीसीडी बनाकर पोस्ट की है।
Harsh Goenka
A rnab Goswami
B lack lives matter
C ovid
D istancing
E lections
F armer protest
G reen
H erd immunity
I PL
J oe Biden
K angana
L ockdown
M ask
N RC
O nline
P andemic
Q uarantine
R emote working
S ushant Rajput
T rump
U nemployment
V accine
W FH
X enophobia
Y awn
Z oom call

अग्रवाल-शर्मा तनातनी
खबर है कि भाजपा के दो बड़े नेताओं गौरीशंकर अग्रवाल और शिवरतन शर्मा के बीच तनातनी चल रही है। हफ्तेभर पहले जिले की कोर कमेटी की बैठक में दोनों के बीच कहासुनी भी हुई। चर्चा है कि जिला संगठन में गौरीशंकर की पसंद पर सारी नियुक्तियां हो गई, जिससे शिवरतन उखड़ गए। उन्होंने कमेटी की बैठक में गौरीशंकर का विरोध किया।
शिवरतन ने यहां तक कहा कि आप एक बार विधायक रहे हैं, लेकिन पूरे जिले में अपनी चलाते हैं। यह ठीक नहीं है। इससे संगठन कमजोर हो रहा है। सांसद सुनील सोनी ने भी बिना रायशुमारी के नियुक्तियों पर नाराजगी जताई। गौरीशंकर ने अपनी तरफ से सफाई देने की कोशिश की, लेकिन दोनों नेता शांत नहीं हुए।
शिवरतन ने तो रायपुर आकर पूर्व सीएम रमन सिंह से गौरीशंकर की शिकायत की है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी जनवरी के पहले हफ्ते में रायपुर आ रही हैं। शिवरतन और कुछ अन्य नेता बलौदाबाजार में नियुक्तियों की शिकायत प्रदेश प्रभारी से कर सकते हैं।
अब काम की लगी इंदिरा बैंक घोटाले की सीडी
इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाले के मामले में तत्कालीन मैनेजर उमेश सिन्हा के नार्को टेस्ट की सीडी पुलिस ने अब जाकर कोर्ट में पेश की थी। सिन्हा ने तब सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं का नाम उगला था और उनके बीच करोड़ों रुपये बांटने की बात कही थी। पुलिस ने तब चालान पेश तो किया पर इस सीडी को ही चालान से हटा दिया। पीडि़त ग्राहकों ने कई बार मांग रखी कि नार्को टेस्ट में कही गई बातों को जांच में शामिल करे लेकिन विवेचना अधिकारियों ने इसे नहीं सुना। सरकार बदलने के बाद परिस्थितियां बदलती हैं। अब पुलिस को समझ में आया है कि न्याय के लिये इस सीडी को भी साक्ष्य के रूप में रखा जा सकता है। गनीमत यह है कि 26 करोड़ के कथित घोटाले वाले 14 साल पुराने मामले में अब तक फैसला नहीं आया है और केस निचली अदालत में ही चल रहा है। यदि अदालत किसी नतीजे पर पहुंच गई होती तो शायद यह सीडी किसी काम की नहीं होती।
टोल टैक्स में यात्रियों को कौन सुनेगा?

नये साल से जो चीजें बदल रही है उनमें नेशनल हाईवे की टोल प्लाजा से गुजरने का नियम भी शामिल है। 1 जनवरी से वाहनों में फास्टैग लगाना अनिवार्य होगा। इससे टोल प्लाजा पर गाडिय़ों की कतार नहीं लगेगी। शीशे पर लगे फास्टैग स्टिकर से ही राशि कटकर एजेंसी के खाते में चली जायेगी।
छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र ओडिशा सीमा पर बस्तर में रायपुर, दुर्ग के बीच आधा दर्जन से ज्यादा टोल प्लाजा हैं, पर रायपुर-बिलासपुर-रायगढ़ नेशनल हाईवे की बात इनमें सबसे अलग है। इस सड़क पर सालभर से ज्यादा वक्त हो गये भोजपुरी में बने टोल नाके में राशि वसूल की जा रही है, सड़क अब तक अधूरी है। लोग सवाल करते रह गये कि जब सड़क अधूरी है तो टैक्स क्यों? यह सड़क तीन हिस्सों में बननी है। रायपुर की ओर सिमगा तक की सड़क भी अधूरी है पर कम से कम राहत है कि अभी टोल टैक्स लेना यहां शुरू नहीं किया गया है। नये नियम में कहा गया है कि फास्टैग नहीं होने पर दुगना टैक्स वसूल किया जायेगा। पर यह नहीं बताया गया है कि लिंक, सर्वर खराब होने का बहाना करके यदि नगद राशि देने के लिये बाध्य किया जायेगा तो एजेंसी पर क्या कार्रवाई होगी? देखा गया है कि देर रात से सुबह तक वाहन कम गुजरते हैं।
इस दौरान टोल नाकों पर कर्मचारी खड़े जाते हैं और फास्टैग सर्विस खराब होने की बात कहकर नगद राशि वसूल करते हैं। इसकी शिकायत करनी हो तो कोई नंबर डिस्प्ले होता नहीं दिखेगा। इस प्रक्रिया में समय तो लगता है ही, लोगों को फास्टैग में कटने वाली रकम से भी ज्यादा राशि का भुगतान भी करना पड़ता है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने नये नियम में ग्राहकों के हित की तो कोई बात की ही नहीं। होना यह चाहिये कि यदि टोल प्लाजा की गलती से फास्टैग से राशि नहीं कट पा रही है तो वाहन चालकों से कोई वसूली ही न हो।
चलो नये स्ट्रेन से भी दो-दो हाथ कर लें..

कोरोना के नये स्ट्रेन के खतरे पर शोधकर्ताओं ने जो निष्कर्ष निकाला है वह नये साल की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है। ब्रिटेन में सार्स सीवीओ-2 को कोरोना वायरस का नया स्वरूप बताते हुए वहां के वैज्ञानिकों ने शोध किया और कहा है कि यदि इसे लेकर लापरवाही बरती गई तो 2021 में 2020 के मुकाबले ज्यादा लोग महामारी के शिकार होंगे, अस्पतालों में भर्ती होंगे और मारे जायेंगे। ब्रिटेन के बाद कई देशों में इस स्ट्रेन के मरीज पाये जाने के बाद भारत में भी इसके लक्षण मिलने लगे हैं। आज ही ब्रिटेन के लिये हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध 7 जनवरी तक बढ़ाने की घोषणा नागरिक उड्डयन मंत्री ने कर दी । कई राज्यों ने नाइट कर्फ्यू लगा दिये जाने से नये साल का मजा भी किरकिरा हो चुका है। भारत सरकार यह भी कह रही है कि नये स्वरूप के वायरस पर भी वैक्सीन कारगर रहेगा। यह भी वैज्ञानिकों के रिसर्च पर ही आधारित निष्कर्ष है।
छत्तीसगढ़ में भी कम से कम छह पॉजिटिव केस नये लक्षण वाले मरीजों के आ चुके हैं। एम्स, सिम्स और दूसरे कोविड अस्पतालों में इनका इलाज बाकी मरीजों से अलग रखकर किया जा रहा है। एक सवाल सोशल मीडिया पर बहुत से लोग उठा रहे हैं कि दूसरी लहर की बात वैक्सीन की जरूरत को बनाये रखने के लिये फैलाई जा रही दहशत तो नहीं है, क्योंकि अरबों रुपये वैक्सीन की खोज और निर्माण पर खर्च हो चुके हैं। फिलहाल अपने प्रदेश में ऐसी कोई बदहवासी, दहशत नहीं है। पहले दौर में लोग इतने भयभीत हो चुके, भुगत चुके हैं कि वे इस नये स्ट्रेन से भी दो-दो हाथ करने के लिये मानसिक रूप से तैयार दिखाई दे रहे हैं।
दिग्विजय की कोशिशें
वैसे तो मप्र के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह, वोरा परिवार से मिलने आए थे, मगर यहां आने के बाद कांग्रेस में चल रही खींचतान को भी दूर करने की कोशिश की। सीएम भूपेश बघेल हो या फिर टीएस सिंहदेव, यहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं। दिग्विजय सिंह ने पीसीसी से पहले अपने आने की सूचना टीएस सिंहदेव के दफ्तर को भेज दी थी। दिग्विजय भोपाल से दुर्ग में उतरे, तो वहां सिंहदेव भी मिलने पहुंचे थे।
वोरा परिवार से मिलने के बाद दिग्विजय, सिंहदेव के साथ दुर्ग से रायपुर आए। रायपुर आए, तो कुछ देर रूकने के बाद कुलदीप जुनेजा के आग्रह पर उनके देवेन्द्र नगर कार्यालय के लिए निकले। ड्राइविंग सीट पर टीएस सिंहदेव थे, और बगल सीट पर दिग्विजय सिंह। दोनों निकल रहे थे कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी भी कार में बैठ गए। चूंकि संगठन पदाधिकारी दिग्विजय सिंह के भी बेहद करीब माने जाते हैं। ऐसे में दोनों ही उन्हें कार में बैठने से मना नहीं कर पाए।
चर्चा है कि संगठन नेता एक तरह से कबाब में हड्डी बन गए। लिहाजा, कार में ज्यादा कुछ बात नहीं हो पाई। बाद में दिग्विजय और सिंहदेव की अलग से चर्चा हुई। दिल्ली रवाना होने से पहले दिग्विजय सिंह सीएम हाउस भी गए, और वहां सीएम के साथ मंत्रणा हुई। चर्चा का ब्यौरा तो नहीं मिल पाया, लेकिन अंदाज लगाया जा रहा है कि भूपेश और सिंहदेव के बीच आपसी समझबूझ को कायम रखने की कोशिश की है।
बालको के बाद अब नगरनार
नगरनार संयंत्र के निजीकरण की प्रक्रिया निरस्त करने के शासकीय संकल्प पर चर्चा के दौरान कई बातेें विधानसभा में सुनने को मिलीं। पिछली सरकार भी नगरनार संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ थी, और केन्द्र को अवगत कराया था कि प्लांट के निजीकरण से नक्सल समस्या बढ़ेगी। मौजूदा सरकार का भी यही रूख है। निजीकरण पर चर्चा के दौरान विपक्षी सदस्यों ने गेंद सरकार के पाले में डालते हुए सलाह दे दी कि निजी हाथों में जाने से पहले सरकार उसे खरीद ले। सीएम ने तुरंत गेंद लपक ली, और ऐलान कर दिया कि सरकार संयंत्र खरीदने के लिए तैयार है।
निजीकरण की मुखालफत से भूपेश सरकार को पॉलिटिकल माइलेज मिल सकता है। मगर क्या सरकार नगरनार खरीद पाएगी? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है। नगरनार के लिए 20 हजार करोड़ की जरूरत होगी, जिसे जुटाना सरकार के लिए आसान नहीं है। जोगी सरकार ने भी बालको के निजीकरण का जमकर विरोध किया था, उस समय भी राज्य सरकार ने उसे खरीदने का प्रस्ताव दिया था। मगर बालको वेदांता के पास चला गया। अब नगरनार संयंत्र सज्जन जिंदल के पास चले जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी सरकार ने निजीकरण का विरोध कर और खरीदने का प्रस्ताव देकर अपना कर्त्तव्य तो पूरा कर लिया है।
साल की विदाई की गाइडलाइन
देर से ही सही न्यू ईयर सिलेब्रेशन के लिये प्रशासन ने गाइडलाइन जारी कर दी है। गाइडलाइन के ज्यादातर बिन्दु इसके पहले के उत्सवों और पार्टियों की तरह ही हैं। जैसे, क्षमता से केवल 50 प्रतिशत मेहमान होंगे, सोशल डिस्टेंस, मास्क तथा सैनेटाइजर का प्रयोग करना होगा, एक रजिस्टर रखना होगा जिसमें सबके नाम और मोबाइल फोन नंबर नोट करना होगा। पर गाइडलाइन के कुछ निर्देश डांस और मस्ती में बाधा डालने वाली है जैसे आयोजन स्थल पर सीसीटीवी कैमरा लगे होंगे और उत्सव की वीडियोग्रॉफी कराना जरूरी किया गया है।
बहुत से लोग होंगे जो नहीं चाहते उन्हें खाते, पीते, डांस करते वीडियोग्रॉफी की जाये। नाम और मोबाइल नंबर बताना भी जरूरी है जिसे भी लोग अपनी निजता का हवाला देते हुए नहीं बताना चाहेंगे। किसी तरह का मंच बनाने या पंडाल लगाने की मनाही भी की गई है। ऐसे में स्टेज प्रोग्राम कैसे होंगे और इसके बिना क्या रंग जमेगा? यह सवाल भी लोगों के दिमाग में है। बहुत से लोग परिवार के साथ इन कार्यक्रमों में पहुंचना चाहते हैं पर बच्चों और बुजुर्गों को प्रवेश नहीं देने का नियम बनाया गया है। ऐसे में बहुत से लोग बाहर निकलकर न्यू ईयर मनाने से परहेज कर सकते हैं।
हां, एक छूट जरूर दी गई है कि मदिरा प्रेमियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। पाबंदी सिर्फ पान, गुटखा तम्बाकू पर लगाई गई है। कई आयोजक इसी बात से खुश हैं कि आयोजन की अनुमति तो कम से कम मिल ही गई है। गाइडलाइन की परवाह कौन करे। पहले भी 50 की पार्टियों में 200-300 लोग पहुंचते रहे हैं कोई सख्ती तो हुई नहीं। फिर ये दिन तो मनहूस साल 2020 की विदाई का है। कुल जमा बात है कि कोरोना के खौफ से लोग बाहर आना चाहते हैं।
तो यू-ट्यूब से यह भी सीख सकते हैं...
2000 रुपये के जिस नोट को काले धन का तोड़ बताते हुए जारी किया गया था और चिप लगे होने की अफवाह तक जिम्मेदार टीवी चैनलों ने फैला रखी थी उसकी नकली छपाई करना कितना आसान है यह महासमुंद में पकड़े गये मामले से पता चलता है। छोटे-छोटे गांवों के लडक़े बिना कम्प्यूटर साधारण कलर प्रिंटर और बॉन्ड पेपर की मदद से वे जाली नोट बनाकर बाजारों में खपा रहे थे।
यू टूयब और गूगल अब अपराधियों का भी गुरु बन बैठा है। इंटरनेट, खासकर यू ट्यूब पर जाकर हत्या करने, आत्महत्या करने, एटीएम काटने, जाली एटीएम कार्ड बनाने, लूटपाट करने, चोरी करने के बाद बच निकलने जैसे अनेक जघन्य अपराध सीखे जा सकते हैं। तरीके ऐसे खतरनाक और बारीक होते हैं कि कई बार पुलिस और जांच एजेंसियों को भी भनक नहीं लगती।
ऐसे अपराधों में लिप्त लोग जब पकड़ में आते हैं तो पता चलता है उनमें ज्यादातर पढ़े-लिखे हैं। कोई आई टी इंजीनियर है, कोई तो नाबालिग भी। इन दिनों हर जिले से ऑनलाइन धोखाधड़ी, एकाउन्ट से पैसे पार होने की ख़बरें लगातार आ रही है। इनमें अंतरराज्य और अंतर्राष्ट्रीय गिरोह भी पकड़े गये हैं। सोशल मीडिया पर उपलब्ध अपराधों की शिक्षा देने वाले इन चैनलों पर लगाम लगाने का कोई कारगर तरीका अब तक नहीं निकाला जा सका है। स्थानीय जांच एजेंसियां अपराधियों को पकडऩे के बाद उन पर कार्रवाई तो कर सकती है पर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मौजूद कंटेन्ट को हटाने के लिये तो केन्द्र सरकार के सम्बन्धित मंत्रालय, विभागों को ही आगे आना होगा।
जमीन बचाने अबूझमाड़ का आंदोलन
दिल्ली में किसानों के आंदोलन से इसकी तुलना करें या न करें, लेकिन मांगों को सुना तो जाना चाहिये। अबूझमाड़ के हजारों ग्रामीण भी कडक़ड़ाती ठंड में सडक़ पर उतर गये हैं। करीब 25 दिन पहले उन्होंने आंदोलन शुरू किया। पांच दिन तक उन्होंने ओरछा मार्ग पर चक्काजाम कर रखा था। प्रशासन के इस आश्वासन के बाद 15 दिन में उनकी मांगों पर निर्णय लिया जायेगा, आंदोलन खत्म करा दिया गया।
20 दिन तक कोई फैसला नहीं आया और अब वे फिर आंदोलन पर हैं। वे नारायणपुर जिला मुख्यालय की तरफ भी बढ़ रहे हैं। मांगें हैं, आमदई खदान को उत्खनन के लिये दी गई लीज रद्द किया जाये, यहां पुलिस का कोई नया कैम्प बन रहा है उसके लिये मंजूरी नहीं दी जाये। इन दोनों योजना, परियोजना के चलते पेड़ों की कटाई होनी है जिसके लिये वे तैयार नहीं हैं। पिछली बार के आंदोलन में गिरफ्तार 6 ग्रामीणों को रिहा करने की मांग भी वे कर रहे हैं।
बस्तर में खनन कम्पनियों और पुलिस फोर्स का विरोध नई बात नहीं। हर सरकार इसे झेलती आ रही है। वहां विकास और सुरक्षा के सवालों से प्रशासन को हमेशा जूझते रहना पड़ा है। ताजा मामले में वह आदिवासियों का भरोसा और सहमति कैसे हासिल कर पायेगा, यह अहम है।
पोराबाई का बरी हो जाना
जांजगीर जिले के बिर्रा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर की छात्रा पोराबाई ने माध्यमिक शिक्षा मंडल की 2008 की परीक्षा में 99.1 प्रतिशत अंक लेकर प्रावीण्य सूची में पहला स्थान हासिल किया था। करीब 100 फीसदी अंक हासिल करना लोगों को हैरान कर गया। खासकर तब वह जब पिछली बार सन् 2007 में अच्छे नंबर नहीं आने के कारण श्रेणी सुधार के लिये दुबारा परीक्षा में बैठी थी। शिक्षा अधिकारियों ने जांच शुरू की तो तहलका मच गया। जांच से मालूम हुआ कि उत्तर पुस्तिकाओं को किसी और ने लिखा था। उसकी हैंडराइटिंग भी नहीं मिली। पोराबाई के स्कूल के शिक्षक गुलाब सिंह, बाल चंद्र भारती, समेलाल, महेत्तर लाल साहू और संपत लाल के खिलाफ अपराध दर्ज हुआ। पोराबाई सहित सब गिरफ्तार किये गये। पोराबाई को रिजल्ट के बाद शिक्षाकर्मी की नौकरी भी मिल गई थी, जिस पर फैसला आना बाकी है। पर अब 12 साल बाद पोराबाई सहित सभी शिक्षक जालसाजी के आरोप से बरी हो गये हैं। हालांकि यह निचली अदालत का आदेश है जिसे ऊपर की अदालत में चुनौती देने का मंशा शिक्षा अधिकारी जता रहे हैं, पर सवाल यह है कि गड़बड़ी सिर्फ पोराबाई और शिक्षकों ने की या फिर जांच अधिकारियों ने भी?
बाहर इंतज़ार, और भीतर...
कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दल में मोर्चा-प्रकोष्ठों के विशेषकर अध्यक्षों की काफी पूछ परख रहती है। विशेषकर छोटे जगहों में तो कार्यकर्ता उनकी खातिरदारी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। ऐसे ही भाजपा के एक मोर्चा के प्रमुख का पिछले दिनों बलरामपुर आगमन हुआ। चूंकि उनके दल ने कुछ समय पहले ही उन्हें मोर्चा अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है, इसलिए युवा अध्यक्ष कार्यकर्ताओं से मेल मुलाकात के लिए जिलों का भ्रमण कर रहे हैं। जिलों में उनके ठहरने का इंतजाम स्थानीय कार्यकर्ता करते हैं।
अध्यक्ष महोदय जब बलरामपुर पहुंचे, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अपने प्रभाव का उपयोग कर सर्किट हाउस में ठहरने का इंतजाम किया। युवा अध्यक्ष को बलरामपुर पहुंचते रात हो गई। सर्किट हाउस पहुंचने से पहले ही अध्यक्ष के पूर्व परिचित भरोसेमंद स्थानीय कार्यकर्ता से खाने-पीने का इंतजाम कर रखा था। अध्यक्ष पहुंचते ही अपने साथियों के साथ कमरे में बंद हो गए।
बाहर मुलाकात के लिए कई छोटे-बड़े नेता आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि अध्यक्ष मेल-मुलाकात के लिए बाहर निकलेंगे। काफी देर इंतजार करने के बाद वे बाहर नहीं निकले, तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया। युवा अध्यक्ष ने अपने एक साथी से बाहर इंतजार कर रहे कार्यकर्ता को कहलवा भेजा कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में व्यस्त हैं। इसलिए आज मुलाकात नहीं कर पाएंगे। इससे स्वागत के लिए फूल माला लेकर खड़े कार्यकर्ता नाराज हो गए। युवा अध्यक्ष, अपने साथियों के साथ अंदर क्या कर रहे हैं, इसकी भी जानकारी हो गई। उन्होंने तुरंत अपने सीनियर नेताओं को इसकी जानकारी दे दी, और भविष्य के लिए सचेत करने के लिए भी कह दिया है।
स्काई वाक और अंडरग्राउण्ड सीवरेज...
रायपुर का स्काई वाक और बिलासपुर की अंडरग्राउन्ड सीवरेज परियोजना दोनों की हालत एक जैसी है। दोनों पर करोड़ों रुपये खर्च हो गये। अधिकारियों, ठेकेदारों और जैसा कि विधानसभा में आरोप लगाया गया है नेताओं ने भी इसमें खूब चांदी काटी लेकिन पूरे पैसे बर्बाद हो गये। चुनाव के समय इन परियोजनाओं का अनुपयोगी होना, विफल होना एक बड़ा मुद्दा था पर दोनों का ही कोई समाधान दो साल बीतने के बाद नई सरकार नहीं कर सकी है। स्काई वाक का कुछ दूसरा उपयोग समझ नहीं आया। विशेषज्ञों की समिति ने आम लोगों की राय के आधार पर सिफारिश की है कि पूरा किया जाये, पर आगे काम अब तक शुरू नहीं हुआ। 270 किलोमीटर की बिलासपुर की अंडरग्राउण्ड सीवरेज परियोजना अब भी अधूरी है जबकि इसकी हाइड्रोलिक टेस्ट सिर्फ एक किलोमीटर हुई है। पम्पिंग स्टेशन के रख-रखाव पर ही सालाना करीब एक करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। दोनों ही निर्माण कार्य पूर्ववर्ती सरकार के स्मारक के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

कोरोना पॉजिटिव स्टेटस
कोरोना पीडि़तों के साथ एक स्टेटस सिम्बॉल भी जुड़ जाता है। पीडि़त व्यक्ति कह सकता है कि उसका पाला किसी छोटी-मोटी बीमारी से नहीं बल्कि महामारी से पड़ा था। ऐसे कई लोग जिन्हें कोरोना ने घेरा और स्वस्थ होकर बाहर आये ऐसा लगता है मानो उन्होंने कोई जंग जीत ली है। ऐसे ही एक शख्स ने अपनी बाइक पर शान से लिखवा रखा है-भूतपूर्व कोरोना पॉजिटिव..।
धान के बाद अब चावल उठने का संकट
धान खरीदी को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच टकराव रोज नई-नई समस्या लेकर सामने आ रही है। ज्यादातर केन्द्रों में धान के उठाव की समस्या आ रही है। जांजगीर जिले से खबरें आ रही हैं कि कई केन्द्रों में खरीदी ही रोकनी पड़ी है। ऐसा दूसरे जिलों में भी है। बारदाने का संकट तो पहले से ही बना हुआ है। किसान खुद खर्च कर बारदाने खरीद रहे हैं और समितियां उन्हें वापस भी नहीं कर रही है। पर अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है। धान उठने के बाद कस्टम मिलिंग में देरी की। खाद्य मंत्री का कहना है कि मिलर्स धान इसलिये नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि उनका चावल मिलों में जाम है। केन्द्र सरकार को 60 लाख टन धान उठाना है पर गति बहुत धीमी है। अब जगह-जगह मिलर्स हाथ खड़े कर रहे हैं और कह रहे हैं कि मिलिंग तो दूर हमारे पास धान रखने की भी जगह नहीं है। इसका नतीजा क्या होगा? पिछले साल भी यही हुआ, कई सालों से होता आ रहा है धान खुले में पड़ा होता है, और खऱाब हो जाता है। विधानसभा सत्र में भी इस मुद्दे पर हंगामा हो चुका है। सियासत जारी है। ([email protected])
सतयुग से चल रही सप्लाई...
विधानसभा में हास-परिहास के बीच कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने सप्लायरों के संगठित गिरोह पर बेबसी जताई। वे लगातार शिकायतों पर कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन गड़बड़ी है कि रूकने का नाम नहीं ले रही है। वे कह गए, कि कंपनी, सप्लाई और ट्रैक्टर पुण्यात्मा होते हैं। आपके समय में भी थे। हमारे समय में हैं, और मुझे लगता है कि सतयुग और द्वापर में भी इन्हीं के द्वारा ही सप्लाई किया गया होगा।
इससे पहले बीज सप्लाई में गड़बड़ी मामले पर सदन में चर्चा के दौरान धर्मजीत सिंह ने कहा कि दाल तडक़ा लगाने वाला बीज की सप्लाई कर रहा है। बीज निगम-हार्टीकल्चर मिशन में हर साल सैकड़ों करोड़ की बीज व अन्य सामग्री की सप्लाई होती है। पिछली सरकार में तो एक मिलर का बीज-हार्टीकल्चर के सप्लाई तंत्र में काफी दबदबा था। करोड़ों की गड़बड़ी भी हुई, लेकिन किसी का बाल बांका नहीं हुआ।
मौजूदा हाल यह है कि बीज-हार्टीकल्चर सप्लाई तंत्र में होटल कारोबारी का दबदबा है। हल्ला तो यह भी है कि प्रोफेसर को मिशन संचालक बनवाने में कारोबारी की भूमिका थी। करीब सालभर बाद अलग-अलग स्तरों पर हुई शिकायतों के बाद प्रोफेसर को हटाया गया। मगर अनियमितता जारी है। वैसे भी आदिकाल से चल रही व्यवस्था को बदल पाना आसान नहीं है।
बृजमोहन पॉजिटिव, कई संदिग्ध
पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं। उनके संपर्क में आने वाले आधा दर्जन विधायक संदिग्ध हो गए हैं। हुआ यूं कि अग्रवाल को गुरूवार को हल्का बुखार था। उन्होंने विधानसभा में अपना कोरोना टेस्ट कराया। इसके बाद सदन और फिर पार्टी के कार्यक्रमों में व्यस्त हो गए। शुक्रवार को उन्होंने किसान सत्याग्रह में हिस्सा लिया, जिसमें नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, पूर्व सीएम रमन सिंह, अजय चंद्राकर और अन्य पार्टी विधायकों के साथ धरने पर बैठे। कौशिक और अन्य विधायक कोरोना के खतरे को लेकर बेपरवाह थे, और उन्होंने मास्क ठीक से नहीं लगाया था।
कार्यक्रम निपटने के बाद कोरोना टेस्ट रिपोर्ट आई, जिसमें बृजमोहन पॉजिटिव पाए गए। बृजमोहन होम आइसोलेशन में हैं, और उनकी तबीयत भी बेहतर है। मगर कांग्रेस ने कोरोना टेस्ट कराने के बाद भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पर बृजमोहन के खिलाफ महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग कर दी है। वैसे तो टेस्ट रिपोर्ट आने तक होम आइसोलेशन में रहने का नियम है। हालांकि बृजमोहन अग्रवाल इससे पहले आधा दर्जन बार कोरोना जांच करा चुके हैं।
हर बार उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई। इस बार भी उनका एंटीजन टेस्ट निगेटिव था, लेकिन आरटीपीसीआर टेस्ट पॉजिटिव आ गया। अब वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। जबकि सत्र में तीन बैठकें और होनी है। बृजमोहन के संपर्क में आने वाले बाकी विधायक भी सदन की कार्रवाई में हिस्सा ले पाएंगे, इसमें संदेह है। ऐसे में 28 तारीख को ही शीतकालीन सत्र का अवसान हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी अनुपूरक बजट तो पास हो ही गया है।
बिजली तारों से पक्षियों को भगाने का आदेश

शहर के किसी भी छोर पर नजर डालें, अक्सर शाम के वक्त हजारों पक्षियां बिजली तारों पर एक कतार में लगी दिखाई देती हैं। ये पक्षियां सब स्टेशन और हाईटेंशन तारों पर ज्यादा मिलेंगीं, क्योंकि वह शहर के कोलाहल से दूर की जगह होती है। चूंकि वे जमीन के सम्पर्क में होते नहीं इसलिये उन्हें झटका नहीं लगता। उनकी जान को कोई खतरा नहीं, ऐसा हम मानकर चलते हैं, पर ऐसा नहीं है। जब पक्षियां दो तारों के चपेट में एक साथ आ जायें तो उनको करंट लगना तय है। कई बार दो अलग-अलग तारों पर बैठी चिडिय़ा एक दूसरे के सम्पर्क में आती हैं। ऐसे मौके पर करंट लगने के कारण कतार की सारी पक्षियां चपेट में आ जाती हैं। बस्तियों में जहां तार नजदीक होते हैं और उलझे हुए भी हों वहां ऐसी घटनायें ज्यादा होती हैं। विलुप्त हो रही चमगादड़ और सोन चिरैया, गोड़ावन जैसी पक्षियों की मौत तो अक्सर हो जाती हैं क्योंकि उनके बड़े पंख होते है। राजस्थान में जैसलमेर, बाड़मेर जगहों पर तो हर माह 19-20 हजार पक्षियां करंट से मारी जाती हैं। अब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, एनजीटी ने इसे गंभीर समस्या मानते हुए बड़ा ऑर्डर पारित किया है। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के बाद एनजीटी के अध्यक्ष ने सभी राज्य सरकारों और केन्द्र से कहा है कि बिजली तारों से पक्षियों को भगाने के लिये उपकरण लगायें। उन्होंने वर्तमान में चल रही और भविष्य में आने वाली परियोजनाओं में भूमिगत केबल लगाने का भी निर्देश दिया है। हालांकि अध्ययन राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में पक्षियों की मौत पर किया गया है पर आदेश को पूरे देश में लागू किया जाना है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पेड़ों के लगातार कटने की वजह से पक्षियों को बिजली तारों पर ठिकाना बनाना पड़ता है। यदि एनजीटी के आदेश का शत-प्रतिशत पालन किया गया तो फिर ये पक्षी कहां जायेंगे? पेड़ तो पहले से ही छिन चुके हैं।
विद्या बालन कैसी लगेंगीं तीजन बाई के रूप में?

पंडवानी गायकी के चलते देश और दुनिया के कई हिस्सों में छत्तीसगढ़ का नाम ऊंचा कर चुकीं पद्मविभूषण तीजन बाई की जीवन यात्रा पर एक फिल्म बॉलीवुड में बनने जा रही है। उनका किरदार प्रख्यात अभिनेत्री विद्या बालन निभायेंगी। जैसी की खबर है कुछ दिन बाद वह छत्तीसगढ़ी और पंडवानी सीखने के लिये भी रायपुर पहुंचने वाली हैं। अब लोगों ने तीजन बाई और विद्या बालन के चेहरे को एक साथ रखकर अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि वह मेकअप के बाद तीजन की तरह दिखेगी या नहीं? कुछ यह भी कह रहे हैं कि चेहरा तो मैच कर लेगा पर तीजन बाई के हाव-भाव, उनकी आवाज और शैली विशिष्ट है, जिसको अपनाने में उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ेगी। तीजन बाई को आदर्श मानकर छत्तीसगढ़ में पैदा हुए, रचे-बसे यहीं की माटी के कई कलाकारों ने उनकी नकल करने की कोशिश की पर उनका कोई विकल्प नहीं है। लोगों में उत्सुकता है कि विद्या बालन कितना निभा भाती है तीजन की असल जिंदगी को। तीजन के नाना के किरदार में अमिताभ बच्चन भी हैं पर उनके लिये यह थोड़ा आसान होगा क्योंकि नाना के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते, न ही उन्हें देखा। पर तीजन सबके सामने हैं। एक सवाल यह भी है कि इस तरह की पहल छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माताओं की ओर से क्यों नहीं होती, जबकि हर साल सौ से ज्यादा फिल्में आ रही हैं।
टैक्स वसूली का फायदा किसे मिले?
ऐसा नहीं है कि नगर-निगमों के पास अपनी टीम नहीं है पर पता नहीं किस दबाव में तीन साल पहले निजी कम्पनियों के हवाले टैक्स वसूल करने का जिम्मा दे दिया गया। लोगों के घर समय-बे समय पहुंचने, धमकाने की शिकायत मिलने पर नगर निगमों के प्रशासन ने उनके साथ अपने कर्मचारियों को भी लगा दिया। ये वही काम कर रहे हैं जो नगर निगम के राजस्व कर्मी करते आये हैं। हाल यह भी है कि जो नियमित टैक्स जमा कर रहे हैं उन्हें भी बार-बार फोन और एसएमएस कर वसूली के नाम पर तंग किया जाता है। चूंकि धमकाने, दबाव डालने से मना किया गया है, इसलिये ये प्राइवेट कम्पनी वहीं से टैक्स वसूल रही हैं, जहां से नगर निगम के लोग भी आसानी से वसूल कर लेते हैं। जहां दिक्कत हैं और बड़े करदाता हैं निजी कम्पनियां उन्हें छू नहीं रही है। नगर निगम के कर्मचारियों को अब पूरी तनख्वाह के साथ या तो खाली बिठा दिया गया है या फिर वहां लगाया जा रहा है जहां बड़ी रकम फंसी है और वसूली करना टेढ़ी खीर है। तीन माह पहले भुगतान करने पर करदाता को केवल दो प्रतिशत की छूट है जबकि निजी कंपनी ने एक शहर से 100 करोड़ की टैक्स वसूल की हो तो 7.5 करोड़ रुपये उसके खाते में डाले जा रहे हैं। इतना कमीशन तो साहूकारी के अलावा किसी धंधे में नहीं है। बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई में यह सिस्टम भाजपा के समय से चल रहा है। रायपुर नगर-निगम ने अब ठीक ही किया जो इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले गहराई से विचार कर रही है। दावा है कि यहां वसूली शत-प्रतिशत हो जाती है। पर जिन नगर निगमों में वसूली का यह तरीका अपनाया जा चुका है वहां भी विचार करना चाहिये कि यह जारी रहे या नहीं।
विपक्ष का लंच
विधानसभा में गुरूवार को सीएम की तरफ से लंच में विपक्ष के विधायक शामिल नहीं हुए। विपक्ष के विधायकों ने लंच का बहिष्कार नहीं किया था, बल्कि नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में सीएम का न्योता आने से पहले ही विपक्ष के विधायकों के लिए अपने लिए अलग लंच का इंतजाम कर रखा था। यह इंतजाम जोगी पार्टी के नेता धर्मजीत सिंह की पहल पर किया गया था, और इसका जिम्मा पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी को दिया गया था।
धर्मजीत की पसंद पर सुंदरानी घर से ढेंस की सब्जी और सिंधी पकवान बनवाकर लाए थे। हालांकि जोगी पार्टी के दो विधायक रेणु जोगी और देवव्रत सिंह, विपक्षी लंच में शामिल नहीं हुए, वे सीएम के लंच में शामिल हुए। सदन की कार्रवाई के बीच लंच का दौर चलता रहा। एक समय ऐसा आया, जब सदन में एक-दो विपक्षी विधायक ही मौजूद थे। तब खाद्यमंत्री अमरजीत भगत नेता प्रतिपक्ष के कमरे में आए, और बृजमोहन अग्रवाल से लंच जल्द खत्म कर सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने का अनुरोध किया, और कहा-भईया आप लोगों के बिना मजा नहीं आ रहा है।
बृजमोहन ने उन्हें बिठा लिया, और उन्हें भी ढेंस की सब्जी खिलाई। दरअसल, विपक्ष के विधायकों की संख्या इतनी कम है, कि अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, बृजमोहन अग्रवाल, धर्मजीत सिंह और नारायण चंदेल सदन में गैर हाजिर रहे, तो विपक्ष में शून्यता आ जाती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है।
आपसी मतभेद भुला रहे आदिवासी नेता
खबर है कि भाजपा के आदिवासी नेता आपसी मतभेद को भुलाकर एकजुट हो रहे हैं। पिछले दिनों नंदकुमार साय ने अपने निवास पर कुछ आदिवासी नेताओं के साथ बैठक की, तो पार्टी में हडक़ंप मच गया। अब इस तरह की बैठकें जिलेवार होंगी। साय की पहल का नतीजा यह रहा कि सरगुजा के एक-दूसरे के धुर विरोधी नेता रेणुका सिंह और रामविचार नेताम, भी अब एक-दूसरे की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
पिछले दिनों रामानुजगंज के कार्यकर्ता सम्मेलन में रेणुका सिंह ने रामविचार नेताम की जमकर तारीफ की, और कहा कि रामविचारजी के गृहमंत्री रहते प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर रही है। पार्टी के अंदरखाने में रेणुका सिंह के बदले रूख की जमकर चर्चा है। कहा जा रहा है कि रेणुका सिंह भी नंदकुमार साय की तरह प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में नहीं बुलाए जाने से खफा हैं। रेणुका सिंह रायपुर में थीं, और एकमात्र केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद उन्हें बैठक में नहीं बुलाया गया।
पार्टी के कुछ लोग मान भी रहे हैं, कि कार्यालय में होने के बावजूद साय को बैठक से दूर रखना एक बड़ी चूक थी। जिससे सारे आदिवासी नेता नाराज हो गए हैं। अब जल्द ही आदिवासी एक्सप्रेस को पटरी पर नहीं लाया गया, तो आगामी चुनावों में पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है।
गोबर के पैसों से पति को गिफ्ट में दी बाइक
ग्रामीण इलाकों में अतिरिक्त पैसे आने पर इन दिनों कौन सा शौक पूरा करने की ओर सबसे पहले सोचा जा रहा है? कर्ज माफी, 2500 रुपये क्विंटल में धान खरीदी और अब गोधन न्याय योजना में गोबर खरीदी। मनेन्द्रगढ़ के पिपरिया की सीता देवी ने बीते कुछ माह में 80 हजार रुपये का गोबर बेचा। इन रुपयों का क्या किया जाये, विचार किया तो उसने पाया कि उसका पति विष्णु, है तो बड़ी गाड़ी का ड्राइवर लेकिन बहुत दिनों से इच्छा है कि वह एक बाइक खरीदे। सीता देवी ने अपने पति को शानदार होंडा बाइक खरीदकर उपहार में दी है। छत्तीसगढ़ सरकार दो साल में ग्रामीणों की तरक्की का आधार बताते हुए कहती है कि आटोमोबाइल की बिक्री में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है। सीतादेवी का फैसला इसकी पुष्टि करता है।
नये साल के उत्सव में भी कलाकार खाली..
क्रिसमस और न्यू ईयर किस तरह मनाना है इसकी गाइडलाइन अंतिम समय में जारी की गई। पहले भी ऐसा हो चुका है। गणेशोत्सव, दुर्गोत्सव, ईद, दशहरा और दीपावली में लोगों को एक दो दिन पहले ही पता चला कि किस तरह की पाबंदी या छूट होगी। राजधानी समेत सभी बड़े शहरों में बीते कुछ सालों से न्यू ईयर सिलेब्रेशन के लिये होटलों, रेस्तरां में ग्रैंड गाला कार्यक्रम रखने का चलन बढ़ा है। इसके लिये कलाकारों, सितारों की बुकिंग बहुत पहले करनी होती है। सजावट भी कई दिन पहले शुरू करनी होती है, फिर प्रचार करना होता है ताकि लोग पहुंचें। इस बार होटल और इंवेट मैनेजर लगातार प्रशासन के सम्पर्क में गाइडलाइन के बारे में पूछते रहे, पर राज्य सरकार से दिशा-निर्देश नहीं मिलने का हवाला देकर उन्हें कुछ नहीं बताया जा रहा था। तब उन्होंने खुद से ही तैयारी शुरू कर दी। अब लगभग सभी बड़े होटलों में न्यू ईयर के कार्यक्रम रखे जा रहे हैं। हां, इतना जरूर है कि वे ग्राहकों की भीड़ को लेकर सशंकित हैं। ज्यादा भीड़ जुटने पर कार्रवाई का खतरा भी है। इसलिये इस बार बहुत कम कलाकारों, डांसरों को बुकिंग मिल पाई। इवेंट मैनेजरों को डर था कि पर्याप्त कलेक्शन नहीं होने पर उन्हें भुगतान करने में दिक्कत होगी। इससे पहले कोरोना के बाद से लगातार कलाकारों को घर ही बैठना पड़ा है। पूरे सालभर उन्हें तंगी से जूझना पड़ा। इन्हें अब सन् 2021 से ही कोई उम्मीद है।
हवाई व रेल यात्रा के अलग-अलग पैमाने
कोरोना काल से बंद यात्री ट्रेनों को रेलवे एक के बाद शुरू करने जा रही है लेकिन स्पेशल ट्रेनों के रूप में। यात्रियों की मांग बताकर शुरू की गई कई ट्रेनें खाली जा रही हैं। बिलासपुर से इंदौर चलने वाली नर्मदा एक्सप्रेस को 10 माह के बाद 26 दिसम्बर से शुरू किया जा रहा है, पर स्पेशल ट्रेन के रूप में। ऐसी कई ट्रेनों को स्पेशल नाम से चलाया जा रहा है। इसके बावजूद कि उन्हें लगातार चलाने की बात कही जा रही है। दरअसल, स्पेशल ट्रेनों के नाम पर ज्यादा भाड़ा लेने का रास्ता खुल जाता है। यात्रियों को ट्रेन यात्रा में पहले से कहीं ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं क्योंकि ये साधारण नहीं स्पेशल ट्रेनें हैं। पहले भी ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाकर रेलवे अनेक ट्रेनों को सुपर फास्ट दर्जा दे चुकी है, लोगों का ज्यादा समय तो इससे बचता नहीं पर किराया जरूर ज्यादा देना पड़ता है। इसके ठीक उलट हवाई यात्रा का हाल है। कोरोना काल के मुकाबले सभी प्रमुख शहरों के लिये टिकटों की दर घटी हुई है। न्यू ईयर में ज्यादा बुकिंग के चांस होने के बावजूद। रेलवे ने पहले ही कह दिया है कि कोरोना काल में वह लोगों को अनावश्यक यात्रा के प्रति हतोत्साहित करना चाहती है, इसीलिये सभी तरह की रियायतें बंद की गई है। दूसरी ओर विमानन कम्पनियां हैं जो रियायत देकर यात्रा को प्रोत्साहित कर रही हैं। आखिर क्या सही है, यात्रा करना या नहीं करना?
लंदन से लौटे पर ऐसी दहशत
ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये स्वरूप वीयूआई के व्यापक फैलाव को देखते हुए देशभर में गाइडलाइन जारी की गई है। छत्तीसगढ़ में भी निर्देश दिया गया है कि विदेश से लौटे प्रत्येक व्यक्ति का कोरोना टेस्ट और संक्रमित पाये जाने पर इलाज कराना है। बिलासपुर में ब्रिटेन से लौटे एक व्यक्ति का दो बार कोरोना टेस्ट कराया गया, दोनों बार रिपोर्ट निगेटिव आई। इसके बावजूद उसे स्वास्थ्य विभाग ने होम आइसोलेशन पर रख दिया है।
इस व्यक्ति को शिकायत यह है कि वह खुद ही अस्पताल में भर्ती अपनी बीमार मां को देखने के लिये हजारों किलोमीटर का सफर तय करके पहुंचा है। अब उसे कोरोना नहीं होने पर भी बीमार बताकर एक कमरे में बंद रहने के लिये क्यों मजबूर किया जा रहा है। डॉक्टरों ने समझाया कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी दूसरे राज्यों, देशों से लौटने वालों को 14 दिन क्वारांटीन पर रहना पड़ता था। रिपोर्ट निगेटिव है या पॉजिटिव इससे असर नहीं पड़ता है। बहरहाल, विदेश से आये बेटे की मजबूरी को समझते हुए अब डॉक्टरों ने उन्हें बहुत जरूरी होने पर घर से निकलने की इजाजत दे दी है, पर पीपीई किट पहनना जरूरी होगा।
अपने ही विधायक डाल रहे मुसीबत में..
विधानसभा के मौजूदा सत्र में विधायक दलेश्वर साहू ने यह बताकर सनसनी फैला दी कि कई राइस मिलें हैं जिन्हें कस्टम मिलिंग के लिये लाइसेंस देकर धान दिया गया लेकिन उनके मिल में बिजली कनेक्शन ही नहीं है। जब कनेक्शन ही नहीं तो मिलिंग हो ही नहीं सकती, लेकिन इन मिलों ने न केवल मिलिंग की बल्कि उसके बाद चावल जमा भी कर दिया।
इधर, विधायक शैलेष पांडेय ने विधानसभा में बिलासपुर की 300 करोड़ की सीवरेज परियोजना की विफलता को लेकर सवाल दागे। कांग्रेस ने चुनाव के समय इसे बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद न तो सीवरेज परियोजना पूर्णता की ओर बढ़ी न ही दोषी अधिकारी, ठेकेदार और विधायक की मांग के अनुसार तत्कालीन जन-प्रतिनिधियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
रायगढ़ के विधायक प्रकाश नायक ने भी एक स्टील प्लांट द्वारा सडक़ खराब करने और प्रदूषण फैलाने का मुद्दा उठाया और इसमें प्रशासन की मिलीभगत का आरोप लगाया। मंत्री विपक्षी दलों के सवालों से परेशान हों तो बात समझ में आती है लेकिन ऐसा लगता है कांग्रेस के विधायकों ने भी ऐसा करने की ठान ली है।
सीजी बोर्ड में शून्य पढ़ाई, सौ फीसदी परीक्षार्थी
बीते सत्र में कोरोना संक्रमण के कारण छत्तीसगढ़ में माध्यमिक शिक्षा मंडल के पैटर्न वाली स्कूलों में जनरल प्रमोशन दिया गया था। इसके चलते इस बार परीक्षार्थियों की संख्या डेढ़ से दो लाख बढऩे वाली है। पिछली बार 6.60 लाख के करीब छात्र-छात्राओं ने 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षा दी थी, इस बार सभी को पास कर दिये जाने के कारण संख्या बढक़र 8 लाख पहुंच रही है।
इस समय ऑनलाइन आवेदन भरने की प्रक्रिया चल रही है जो माह के आखिर तक चलती रहेगी। अंतिम तारीख के बाद ही वास्तविक संख्या कितनी है यह मालूम होगा। परीक्षा फॉर्म भरने की प्रक्रिया तो डेढ़-दो माह आगे खिसकी है पर बोर्ड परीक्षाओं की तारीख भी आगे बढ़ेगी या नहीं अभी तय नहीं है।
अमूमन मार्च में ये परीक्षायें शुरू हो जाती है। कोरोना महामारी का असर कम होता है तो तय वक्त पर परीक्षायें जरूर हो सकती हैं लेकिन 9वीं, 11वीं के सौ फीसदी विद्यार्थियों की परीक्षायें एक साथ लेने की बड़ी जिम्मेदारी माध्यमिक शिक्षा मंडल और प्रशासन पर आने वाली है। स्कूल नहीं खुलने के कारण पढ़ाई ठप हुई, प्रायोगिक परीक्षायें भी नहीं हुई हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षाओं में विद्यार्थियों का परफार्मेंस कैसा रहेगा, यह बड़ा सवाल है।
10वीं बोर्ड में पिछली बार 73 प्रतिशत से कुछ अधिक और 12वीं बोर्ड में 70 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी पास हुए थे। यह परिणाम तब था जब बीते सत्र के लगभग दो तिहाई पढ़ाई हुई थी। इस बार स्कूल बिल्कुल नहीं खुले । उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में यदि उदारता बरतते हुए ज्यादा संख्या में विद्यार्थियों को सफलता दिला दी जाती है तो आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें दिक्कत हो सकती है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में नेता-नेत्री
राजनांदगांव में दो बहनों से छेड़छाड़ और मारपीट के आरोप में एक पार्षद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। दो दिन पहले ही तुमगांव (महासमुंद) में एक सेक्स रैकेट को पुलिस ने पकड़ा तो एक आरोपी ने खुद को सांसद का प्रतिनिधि बताया। सचमुच उसके पास से नियुक्ति पत्र भी मिल गया। नवंबर के आखिरी हफ्ते में रायपुर, डोंगरगढ़ और कई कस्बों में फैले मानव तस्करी के मामले में पुलिस ने अन्य लोगों के साथ एक महिला नेत्री को गिरफ्तार किया।
तीनों मामलों की प्रकृति अलग-अलग है पर सभी में महिलाओं के खिलाफ अपराध हैं। यह भले ही संयोग है कि सभी मामले एक ही दल, भाजपा से जुड़े नेताओं, पदाधिकारियों के हैं। इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिये कि बाकी राजनैतिक दलों की स्थिति साफ-सुथरी है। दरअसल, कई बार इसीलिये पद हथियाये, खरीदे जाते हैं ताकि वे इसका कवच के तौर पर इस्तेमाल कर सकें। कई बार पद मिलने के बाद उसका दुरुपयोग शुरू होता है, जैसा राजनांदगांव में हुआ। भीड़ जुटाने, स्वागत सत्कार कराने के मोह में जानकारी होते हुए भी अवैध, अनैतिक गतिविधियों पर नेता खामोश रहते हैं और जैसे ही बदनामी की आहट होती है, उसे बाहर का रास्ता दिखाया करते हैं।
थानों का इतिहास लेखन...
एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की पुलिस के हर थाने को कहा जाता था कि वह अपने इलाके के सभी किस्म के इतिहास का एक छोटा ब्यौरा बनाकर रखे। अभी बिहार के एक पत्रकार पुष्य मित्र ने वहां अररिया जिले की एक तस्वीर पोस्ट की है जिससे याद आया कि हर थाने को अपने इलाके के इतिहास से थोड़ा तो वाकिफ रहना चाहिए।
बहुत पहले अविभाजित रायपुर जिले में एसपी सीपीजी उन्नी के वक्त थानों से इतिहास लिखवाया गया था। अभी के महासमुंद जिले में उस वक्त तुमगांव थाने के इतिहास में लिखा था कि थाने के मालखाने में एक डुगडुगी रखी हुई है जो कि वहां के राजा ने एक किसी की खाल खिंचवाकर बनवाई थी, और जो मुनादी के काम आती है। अब फणीश्वरनाथ रेणु की धरती से लेकर थाने की इस डुगडुगी तक बहुत सी दिलचस्प बातें थाने अपने इलाके के बारे में दर्ज कर सकते हैं। कोई कल्पनाशील पुलिसवाले रहें तो वे अपने इलाके का एक आम इतिहास लेखन करवा सकते हैं।
मंत्री से सीधे अध्यक्ष

आखिरकार काफी खींचतान के बाद भाजपा ने दुर्ग में डॉ. शिवकुमार तमेर और भिलाई में विरेन्द्र साहू को जिलाध्यक्ष बना दिया। चर्चा है कि दोनों नियुक्ति में सरोज पाण्डेय की चली है। यानी सांसद विजय बघेल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन के सारे प्रयास धरे के धरे रह गए।
डॉ. तमेर तो संघ के पसंदीदा हैं, और वे दुर्ग के मेयर रह चुके हैं। उनकी गिनती छत्तीसगढ़ के नामी न्यूरोलोजिस्ट में हैं। ऐसे में उनका नाम आया, तो किसी तरह का विरोध नहीं हुआ, लेकिन विरेन्द्र साहू के नाम का ऐलान हुआ, तो पार्टी के नेता ही उनका बैकग्राउंड खंगालते रहे। विरेन्द्र साहू जिले के मंत्री रहे हैं, और वे बीएसपी कर्मी थे। जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के अंदरखाने में तीखी प्रतिक्रिया भी हो रही है।
सुनते हैं कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में हास परिहास के बीच एक-दो विधायकों ने रमन सिंह से पूछ लिया, कि विरेन्द्र साहू कौन है? इस पर रमन सिंह ने अनभिज्ञता जताई। एक सीनियर विधायक ने हैरानी जताई, और कहा कि आप लोग नियुक्ति करते हैं, और आपको ही पता नहीं? एक अन्य ने कहा कि विरेन्द्र जिला संगठन मंत्री हैं। इस पर सीनियर विधायक ने कटाक्ष किया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रशिक्षण सत्र इस विषय पर भी होना चाहिए कि जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष कैसे बन सकते हैं। उनकी टिप्पणी पर वहां मौजूद विधायकों ने जमकर ठहाका लगाया।
भोपाल आ जाइए

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छत्तीसगढ़ के विशेषकर बृजमोहन अग्रवाल खेमे के नेताओं से काफी घुले मिले हैं। दोनों युवा मोर्चा में साथ काम कर चुके हैं। मंगलवार को दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा की अंतिम यात्रा में शामिल होने का उनका कार्यक्रम बना, तो एक दिन पहले ही उन्होंने बृजमोहन को फोन किया, और कहा कि उन्हें साथ दुर्ग चलना है। दोनों एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचे। वहां प्रेमप्रकाश पाण्डेय उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। फिर शिवराज सिंह चौहान, एक ही कार में बृजमोहन और प्रेमप्रकाश के साथ वोराजी के घर गए।
अंतिम संस्कार कार्यक्रम से लौटे, तो एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीतिक स्थिति पर सामान्य चर्चा की। चर्चा है कि इन नेताओं ने पार्टी की अंदरूनी दिक्कतों को भी गिनाया। उन्होंने अजय चंद्राकर के जुझारू तेवर की सराहना की, और कहा कि वे उन्हें टीवी चैनलों में देखते हैं। उन्होंने कहा कि जल्द ही वे बिना किसी कार्यक्रम के रायपुर आएंगे, और आप सबके साथ चर्चा करेंगे। या फिर आप लोग समय निकालकर भोपाल आ जाइए। वहां अच्छे से बात हो जाएगी। संकेत है कि शिवराज सिंह अब पार्टी संगठन में हाशिए पर चल रहे बृजमोहन खेमे को मुख्य धारा में लाने के लिए पहल कर सकते हैं।
बोर्ड परीक्षाओं पर चिंता भी, राहत भी
छत्तीसगढ़ के जिन स्कूलों में सीजी बोर्ड परीक्षायें नहीं होतीं उनमें केन्द्रीय परीक्षाओं के लिये सीबीएसई ही अधिक प्रचलित है। कोरोना महामारी के चलते हुए नुकसान के कारण ज्यादातर स्थानीय परीक्षाओं में जनरल प्रमोशन दिया जा रहा है पर बोर्ड परीक्षाओं में ऐसा करना मुश्किल है। विशेषकर केन्द्रीय बोर्ड की। एक-एक परीक्षार्थी की क्षमता का समग्र मूल्यांकन होना जरूरी है क्योंकि आगे इंटरमीडियेट और स्नातक स्तर की परीक्षाओं का रास्ता तय होना है।
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने कल साफ कर दिया है कि जनरल प्रमोशन या ऑनलाइन परीक्षाओं का विकल्प सीबीएसई एग्जाम के लिये तय नहीं किया जा सकता। परीक्षायें ऑफलाइन ही होंगी। हां, छात्रों को तैयारी का कम से कम दो माह का समय और मिल गया है। स्कूलों में ताला लगा है और ऑनलाइन कक्षाओं की तैयारी से अभिभावक, शिक्षक और स्वयं छात्र संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में ऑफलाइन परीक्षायें ली भी नहीं जा सकतीं। दो माह टलने के बाद परीक्षायें निरापद ढंग से हो जायें तब शायद छात्रों का साल खराब होने से बचाया जा सकता है।
10वीं-12वीं बोर्ड के बच्चों के लिये आने वाले दो महीने तनाव के हो सकते हैं क्योंकि इस बीच उन्हें साल भर की तैयारी करनी है। ऐसी परीक्षा के लिये जिसमें सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव होता है। अभी केन्द्रीय बोर्ड परीक्षाओं की तारीखें घोषित नहीं की गई हैं। शायद आने वाले दिनों में कोरोना के ट्रेंड का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि दो माह बाद भी परीक्षायें नहीं हुई तो विद्यार्थियों, अभिभावकों को यह ज्यादा मायूस करेगा, क्योंकि इससे तो उनका पूरा एक साल व्यर्थ चला जायेगा।
अंग्रेज चले गए, पुलिस छोड़ गए...
दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में जब मां-बाप अपने बच्चों को किसी मुसीबत की नौबत के बारे में सिखाते हैं तो पहली नसीहत यह रहती है कि कोई खतरा या परेशानी होने पर सबसे पहले पुलिस को फोन करें या आसपास दिख रही पुलिस तक जाएं। यही वजह है कि पश्चिम के विकसित देशों में छोटे-छोटे बच्चे भी असली खतरे के वक्त या नासमझी में भी पुलिस को फोन लगा लेते हैं।
लेकिन हिन्दुस्तान में खुद पुलिस के लोग यह मानते हैं कि यहां पुलिस के अमले में इतनी संवेदनशीलता नहीं है कि बच्चे उनसे जाकर संपर्क कर सकें। इस देश में अंग्रेजों के वक्त से पुलिस को देसी लोगों को कुचलने के हिसाब से तैयार किया गया था, और आजादी की पौन सदी बाद भी उसका मिजाज बदला नहीं है। मुसीबत में पुलिस को बुलाने का एक मतलब एक नई मुसीबत खड़ा करना भी होता है, और लोग यह तौलते रह जाते हैं कि पुलिस को न बुलाना बड़ी मुसीबत होगी, या बुलाना।
अब राजधानी रायपुर में आज जिस वक्त कांग्रेस भवन में मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक तमाम लोग मौजूद थे, तब बाहर ट्रैफिक पुलिस के लोग एक ऑटोरिक्शा पर इस तरह रवाना हो रहे थे। ड्राइवर की सीट पर ही एक पुलिसवाला सवार हो गया था जो कि ट्रैफिक के नियमों के भी खिलाफ है और कोरोना से सावधानी के भी खिलाफ।
जब तक पुलिस अपने मिजाज को नियम-कायदे मानने वाला नहीं बनाएगी, तब तक पुलिस पर लोगों का भरोसा बन नहीं पाएगा। किसी मारपीट की नौबत पर पुलिस को बुलाएं तो वह पहुंचते ही गंदी गालियों से शुरूआत करती है, और लाठियों पर बात खत्म होती है। बिना जरूरत पुलिस-गाडिय़ां सायरन बजाते चलती हैं, और सडक़ के बीच में डेरा डाल देती हैं। मुसीबत से बचने के लिए अब अगर ऐसी पुलिस तक जाने की सलाह मां-बाप अपने बच्चों को नहीं देते हैं, तो उसकी वजह यह है कि हिन्दुस्तानी पुलिस अब तक अंग्रेजी राज के मिजाज से बाहर नहीं आ पाई है।
भाजपा में आदिवासियों की पीड़ा
कांग्रेस हो, भाजपा या अग्रिम पंक्ति का कोई दूसरा राजनीतिक दल। अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय से ऐसे नेताओं को आगे रखने की कोशिश करते हैं जिनकी अपने समाज में पकड़ तो अच्छी तो हो पर नेतृत्व के लिये हाथ उठाने, हां में हां मिलाने के लिये तैयार रहें। इसके बाद भी हर पार्टी में एक दो ऐसे मुखर नेता भी होते हैं जिनसे नेतृत्व को खतरा तो रहता है पर उनका अपने क्षेत्र में, समुदाय के बीच प्रभाव इतना अधिक होता है कि हाशिये पर रखा नहीं जा सकता। उनका विकल्प तैयार करने की कोशिश भी कामयाब नहीं हो पाती।
भाजपा में नंदकुमार साय भी ऐसे ही नेता हैं। उन्होंने पार्टी का समर्थन नहीं मिलने बल्कि एक खेमे द्वारा रोड़े अटकाने के बावजूद स्व. अजीत जोगी की जाति को लेकर अदालती लड़ाई जारी रखी। वे अपनी पार्टी में आदिवासी नेतृत्व की मांग भी उठाते रहे। पिछले दिनों जब भाजपा प्रभारी डी. पुरन्देश्वरी यहां आई तो वरिष्ठ नेताओं की बैठक में जाने से उन्हें दरवाजे पर रोक लिया गया। बुरी तरह अपमानित हुए और नाराजगी जताई भी। अब उनका ताजा बयान आया है। कह रहे हैं पार्टी प्रदेश में कमजोर हो गई है। आदिवासी समाज से पकड़ खत्म हो गई है। इसके चलते बस्तर और सरगुजा में पार्टी का सफाया हो गया।
अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद साय को पार्टी ने कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है। केन्द्र में सरकार है पर वहां भी उनके लिये कुछ नहीं सोचा गया। वे तीन बार लोकसभा और तीन बार विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। दो बार राज्यसभा भी भेजे जा चुके हैं। अब कायदे से उनके अनुभव का इस्तेमाल तो पार्टी को करना ही चाहिये। ये क्या बात हुई कि उन्हें सीनियर लीडर्स की बैठक में भी न घुसने दिया जाये। उन्होंने खुद आदिवासी नेताओं की बैठक बुलाकर बता ही दिया कि जब जरूरत होगी वे समाज के सारे धड़ों को वे अपने साथ ले सकते हैं।

शाकाहारी अंडा छीन लेगा एक सियासी मुद्दा
स्कूल और आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को पौष्टिक आहार के रूप में जब अंडा वितरित करने की बात आई तो यह एक राजनैतिक मुद्दा बन गया। न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि मध्यप्रदेश में। भाजपा की आपत्ति के बाद छत्तीसगढ़ में सरकार को कहना पड़ा कि अंडे का वितरण सिर्फ उन्हीं बच्चों में किया जायेगा, जो इसे खाना चाहें। बाकी के लिये सोयाबीन से बनी सामग्री या वैकल्पिक प्रोटीन दी जायेगी। पर अब इसका हल निकलने वाला है। आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने शाकाहारी अंडों का अविष्कार किया है। ये अंडे मुर्गियां नहीं बल्कि फैक्ट्रियां पैदा करती हैं। खुश्बू, स्वाद और इनमें मौजूद प्रोटीन असली अंडे की तरह ही है। अविष्कारकों ने खुद इसे कुपोषण के खिलाफ स्वच्छ प्रोटीन की लड़ाई बताया है। हो सकता है आम लोगों तक इस अंडे को पहुंचने में वक्त लग जाये लेकिन जब आयेगा इसे बांटने और खाने पर राजनीति तो खत्म हो जायेगी।
कोरबा में खाद कारखाने का कबाड़
देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने छत्तीसगढ़ में जिन औद्योगिक इकाईयों को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी उनमें कोरबा का खाद कारखाना भी शामिल था। सन् 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने एफसीआई की फैक्ट्री के लिये यहां आधारशिला रखी। रूस, चेक गणराज्य से मशीनें मंगाई गईं और फैक्ट्री लगाने का काम शुरू हुआ। इसी बीच देश के अन्य हिस्सों में लगे एफसीआई की खाद फैक्ट्रियां भारी घाटे में चलने लगीं। तब कोरबा का काम बीच में रोक दिया। बाद में जितने भी सांसद और विधायक इस क्षेत्र से हुए उन्होंने इस कारखाने को शुरू कराने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं रहे।
सन् 2016 में तत्कालीन सांसद स्व. बंशीलाल महतो की कोशिश के बाद केन्द्र की पहल पर अमेरिका की निजी कम्पनियों ने यहां की मशीनों का मुआयना किया और गैस आधारित प्लांट लगाने में दिलचस्पी दिखाई। उस समय अनुमान लगाया गया था कि 9 हजार करोड़ रुपये के खर्च से संयंत्र मुनाफे के साथ चल निकलेगा। पर आगे काम नहीं बढ़ा।
अब हाल ही में फैक्ट्री के सारे साजो-सामान, विदेशी आयातीत मशीनें कबाड़ मानकर 13.84 करोड़ रुपये में बेच दी गई। यहां के मजदूर संगठनों की मांग थी कि गैस आधारित फैक्ट्री शुरू करने की प्रक्रिया को तेज की जाये। पर उनकी नहीं सुनी गई। यह हाल ही की बात है कि कोरबा में विद्युत मंडल ने भी अपनी कई इकाईयों को कबाड़ मानकर बेच दिया। वहां भी यूनियन्स की मांगें थी कि आधुनिकीकरण कर फिर से इनमें उत्पादन शुरू किया जाये।
खाद कारखाना पिछले कई चुनावों में राजनैतिक मुद्दा रहा। कोरबा जिले के लोग इसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गये थे। अभी एफसीआई को आबंटित 900 एकड़ जमीन बची हुई है, जिसे बेचने की कोशिश नहीं हुई तो मान सकते हैं, संयंत्र लगाने की संभावना भी बनी हुई है।
कैसा रहेगा बुरे साल का थर्टी फर्स्ट
सन् 2020 में कोरोना महामारी ने जिस तरह बर्बादी की उसके चलते लोग मना रहे हैं कि जल्दी से जल्दी यह बुरा साल खत्म हो जाये और नये साल का वेलकम करें। देश में अब कोरोना संक्रमण के नये मामले कम आ रहे हैं और कल ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान आ गया कि जनवरी माह के किसी भी दिन से कोरोना का टीकाकरण शुरू हो जायेगा। ऐसे में न्यू ईयर का ज्यादा गर्मजोशी से स्वागत किया जाना तो बनता है।
दूसरी तरफ, ब्रिटेन में तो कोरोना के अधिक घातक तरीके से लौटने की खबर आ रही हैं। वहां क्रिसमस और न्यू ईयर के लिये कड़े प्रतिबंध हैं। भारत से भी वहां की हवाई सेवा रोकने की मांग उठ रही है। अपने देश में भी अभी दहशत कम नहीं हुई। कर्नाटक जैसे राज्यों ने न्यू ईयर पर सार्वजनिक कार्यक्रम रखने पर रोक लगा रखी है। पर छत्तीसगढ़ में रोक नहीं है। प्रशासन से सम्पर्क कर हर साल न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले होटल, रेस्तरां मालिक जानकारी जुटा रहे हैं। बहुत कड़ी पाबंदियां नहीं है। जैसे 100 की क्षमता वाला हॉल है तो 50 को ही अनुमति मिलेगी। सोशल डिस्टेंस का पालन करना, तय समय पर ही पटाखे जलाना, संभवत: रात 11.30 से 12.30 तक तय किया जा रहा है। पटाखे जलाने और पार्टियों को निर्धारित समय पर खत्म नहीं करने पर 20 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की चेतावनी भी दी गई है।
जो लोग न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले हैं उन्हें किसी कार्रवाई की ज्यादा परवाह है, ऐसा नहीं लग रहा। ये सब प्रतिबंध तो शादी, ब्याह, बर्थ डे पार्टियों के लिये पहले से ही लागू है। कार्रवाई तो कहीं हो ही नहीं रही।
दूसरी तरफ, अमरकंटक से लेकर चिल्फी, अचानकमार, बारनवापारा, मैनपाट आदि के सरकारी, गैर सरकारी ज्यादातर रिसोर्ट, विश्राम गृह के अधिकांश कमरे भी बुक हो चुके हैं। वहां इत्मीनान से सोशल डिस्टेंस के साथ न्यू ईयर मनाया जा सकेगा।
भाजपा में भी पदों की प्रतीक्षा
कांग्रेस में जहां निगम-मंडलों में नियुक्ति की कार्यकर्ता लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कार्यकर्ताओं में संगठन के पदों पर नई नियुक्तियों का इंतजार हो रहा है। सत्ता से बाहर रहने पर संगठन के पदों का महत्व बढ़ जाता है और उसका लाभ सरकार बनने पर मिलता भी है। इसलिये बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं को नई नियुक्तियों का इंतजार है।
कुछ दिन पहले जब पार्टी की प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने छत्तीसगढ़ दौरा किया तो कई निर्देश संगठन के नेताओं को देकर गई थीं। उन्होंने सभी जिलों में कार्यकारिणी के पुनर्गठन, रिक्त जिलों में नये अध्यक्षों की नियुक्ति, मोर्चा प्रकोष्ठों में नियुक्ति का निर्देश दिया था। इन सब कामों के लिये 15 दिसम्बर की तारीख तय की गई थी पर कई जिलों में कार्यकारिणी नहीं बनी, कुछ के नये अध्यक्ष भी तय होने हैं। मोर्चा, प्रकोष्ठों में तो प्रदेश स्तर की कार्यकारिणी नहीं बन पाई, जिले के स्तर पर भी अब तक इसे हो जाना चाहिये था, जिसमें जाहिर है काफी वक्त लगेगा।
निर्देशों के मुताबिक अभी-अभी प्रशिक्षण शिविरों की शुरुआत हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ता के न होने पर कार्यकर्ताओं को ही नहीं नेताओं को भी रिचार्ज करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा तो तब और मुश्किल है जब कम से कम तीन साल का लम्बा इंतजार करना हो।
रामजन्मभूमि से बड़ा विवाद
माता कौशल्या की जन्मस्थली पर विवाद छिड़ा है। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर इतिहास का हवाला देकर यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि चंदखुरी, माता कौशल्या का जन्म स्थान है। उनका तर्क है कि चंदखुरी का कहीं जिक्र नहीं है बल्कि कोसला का उल्लेख है। हालांकि इस मसले पर उन्हें पार्टी के भीतर आलोचना झेलनी पड़ रही है। बीज निगम के पूर्व अध्यक्ष श्याम बैस ने तो चंद्राकर की मुख़ालफ़त की है। बावजूद इसके अजय चंद्राकर अपने बयान पर कायम हैं।
अजय चंद्राकर अध्ययनशील हैं, और वे तथ्यों के साथ अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं। दो दिन पहले केंद्रीय संस्कृति-पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल रायपुर आए, तो वे पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय के निवास पर भी गए। पांडेय निवास मेें बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, सुनील सोनी और एक-दो अन्य नेता भी थे। वहां भी माता कौशल्या के जन्म स्थान पर काफी चर्चा हुई। चंद्राकर ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री श्री पटेल को अलग-अलग पुस्तकों का हवाला देकर यह बताया कि माता कौशल्या की जन्मभूमि चंदखुरी नहीं, बल्कि कोसला है। जो कि रायगढ़ जिले में स्थित है।
अजय चंद्राकर के तथ्यों से केंद्रीय राज्यमंत्री और वहां मौजूद अन्य नेता सहमत भी नजर आए। दूसरी तरफ, रामवन गमन पथ को विकसित करने के लिए केंद्र सरकार ने करीब सवा सौ करोड़ रुपये मंजूर भी किए हैं। अब जन्मस्थली पर विवाद छिड़ गया है।
रमन सिंह अफसरों पर बरसे
पूर्व सीएम रमन सिंह अपने गृह जिले कवर्धा के मंच से अफसरशाही पर जमकर बरसे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अफसरों को तो गिने-चुने दिन रहना है। उन्हें ज्यादा तलवे चाटने की जरूरत नहीं है। आमतौर पर रमन सिंह शालीन नेता माने जाते हैं, लेकिन सरकार जाने के बाद आक्रामक दिख रहे हैं, और कई बार आपा भी खो बैठते हैं। कुछ लोग याद करते हैं कि कांग्रेस शासनकाल में जब रमन सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे तब भी वे उस समय कांग्रेस-सरकार में अफसरशाही का आरोप लगाते थे।
जगदलपुर के एक कार्यक्रम में सरकारी तंत्र के कथित हस्तक्षेप पर उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर एलएन सूर्यवंशी का नाम लिए बिना उन पर तीखा हमला बोला था, और भाजपा सरकार बनने पर ऐसे अफसरों को देख लेेने की बात तक कही थी। वर्ष-2003 में भाजपा की सरकार बन गई, और सीएम जोगी के करीबी रहे आरपी मंडल, मुकेश गुप्ता, एसआरपी कल्लुरी और एलएन सूर्यवंशी, रमन सिंह के सीएम बनने के बाद ठीक-ठाक पोस्टिंग पा गए। और तो और, रिटायर होने के बाद सूर्यवंशी को सूचना आयोग के सचिव के पद पर संविदा नियुक्ति भी मिल गई।
भाजपा नेताओं की शिकायत पर मंडल को चुनाव आयोग के आदेश के बाद विधानसभा चुनाव के पहले बिलासपुर कलेक्टर के पद से हटना पड़ा था। मगर रमन सिंह के सीएम बनते ही कुछ दिनों बाद वे रायपुर कलेक्टर बन गए, और रमन सरकार में हमेशा अच्छी पोस्टिंग पाते रहे। भाजपा के एक सबसे बड़े नेता नन्द कुमार साय का पाँव तोडऩे वाली पुलिस के कप्तान रहे मुकेश गुप्ता आगे जाकर रमन सरकार के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर बन गए थे. विधानसभा की कमेटी तक ने उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की थी, लेकिन रमन राज में वे प्रदेश के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर रहे। पुलिस और प्रशासनिक हल्कों में उनकी हैसियत डीजीपी से भी ऊंची मानी जाती थी।
कल्लुरी के खिलाफ कई शिकायतों के बाद भी उन्हें अहम पोस्टिंग मिलती रही। वे बस्तर आईजी रहे। उनकी तारीफों के पुल बांधते हुए पीएम नरेंद्र मोदी से भी मिलवाया गया था। अब जब रमन सिंह मंच से अफसरों को चेताया है, तो न सिर्फ सरकार बल्कि उनकी अपनी पार्टी के असंतुष्ट लोग पुरानी याद ताजा कर मजे भी ले रहे हैं।
धर्मजीत ने की जब सीएम की तारीफ
गुरु घासीदास जयंती सम्मेलन में लालपुर पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ लोरमी के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर को भी मंच साझा करने का मौका मिला। उन्होंने अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री की जमकर तारीफ कर लोगों को चौका दिया। धर्मजीत सिंह ने कहा कि सीएम ने दो साल में उनके लोरमी क्षेत्र को बहुत सी सौगातें दी हैं। खासकर एग्रीकल्चर कॉलेज खोलने की मंजूरी के लिये धर्मजीत सिंह ने आभार जताया। यह मान लें कि यह सौजन्यतावश सार्वजनिक मंच से की गई बात थी लेकिन इसके बाद जो हुआ वह ज्यादा चर्चा में है। मुख्यमंत्री से धर्मजीत सिंह ने काफी देर तक अलग से भी बंद कमरे में चर्चा की। लोग इसका मतलब निकालने में लगे हुए हैं, क्योंकि दो दिन पहले ही बिलासपुर में धर्मजीत सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात की थी। हाल ही में निपटे मरवाही उप-चुनाव में धर्मजीत सिंह की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने भाजपा को समर्थन भी दिया था। देखना है कि यह बातें-मुलाकातें किस थाह पर पहुंचेगी।
संसदीय सचिव की बेफिक्री
संसदीय सचिवों की एक जिम्मेदारी और समझ में आ रही है। वे अपने विभाग की कमियों, गड़बडिय़ों के लिये कवच बनकर खड़े रहेंगे। यदि यदि कोई नौकरशाही के रास्ते से राजनीति में आया हो तो ज्यादा भली-भांति इस जिम्मेदारी को निभा सकता है। ऐसा ही कुछ दिखा जब कांकेर के विधायक रिटायर्ड आईएएस शिशुपाल सौरी मिनी जू कानन पेंडारी के भ्रमण पर पहुंचे। वे वन विभाग के संसदीय सचिव भी हैं। जब पूछा गया कि जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई की घटनायें लगातार सामने आ रही है। जवाब था- पेड़ों की कटाई तो आम बात है, किसी को शिकायत है तो बतायें। मिनी जू में वन्य प्राणियों की लगातार हो रही मौत को लेकर पूछा गया तब भी उनका कहना था कि मौतें तो होती रहती है। ये तो स्वाभाविक घटनाएं हैं। कानन पेंडारी के विकास, विस्तार का काम ठप पड़ा है, पूछने पर कहा कि केन्द्र से राशि अटकी पड़ी है। आगे प्रदेश सरकार की योजना क्या है?, कहा – योजना बना रहे हैं। यानि सब कुछ बढिय़ा चल रहा है।
पहले संगठन, फिर किसान
केन्द्र सरकार और भाजपा ने किसान बिल पर जनसमर्थन जुटाने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला रखा है। जगह-जगह सभा सम्मेलनों, महापंचायतों के जरिये प्रदेश में भी भाजपा यही कर रही है। बाकी कसर प्रशिक्षण शिविरों से पूरी की जा रही है। अनुशासन में बंधी पार्टी के लिये ऊपर से आया आदेश ही महत्वपूर्ण है। वह यही कर रही है। दिसम्बर की ठंड में छत्तीसगढ़ के किसानों के धान बेचने में पसीने छूट रहे हैं। कहीं रकबा कम है, कहीं तौल में गड़बड़ी हो रही है, कहीं बारदानों की कमी है तो कहीं खरीदी ही रोक दी गई है। लोग कह रहे हैं, विपक्ष में होने के नाते किसानों की आवाज उठाना भाजपा की प्राथमिकता में होनी चाहिये। पर दिल्ली में रिपोर्ट कार्ड ठीक बनाये रखने के लिये किसान कानून पर उन्हें भाषण पिलाया जा रहा है। अब यहां जो किसान कानून का मामला है, ज्यादातर उपज खरीद ली जा रही है। नये कानून का क्या असर होने वाला है इसकी ज्यादा परवाह अभी किसान कर भी नहीं रहे हैं। उनकी असल चिंता है, धान समय पर बिना परेशानी बिक जाये और भुगतान मिल जाये। कांग्रेस सरकार और धान खरीदी में लगे तंत्र के लिये अच्छा है कि भाजपा किसान की नहीं, किसानों के केन्द्रीय कानून की ज्यादा परवाह करती रहे।
डराने से डर गये अफसर?
केन्द्र सरकार के किसान कानून के समर्थन में कवर्धा में बुलाई गई महापंचायत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तेवर गरम हो गये। अचानक सभा स्थल की जगह बदलने के आदेश ने उन्हें नाराज कर दिया। जो कुछ उन्होंने कहा उससे एक निष्कर्ष तो निकलता है कि वे तीन साल बाद लौटने को लेकर सौ फीसदी आशान्वित हैं। यह अलग बात है कि जीत-हार का फासला 2018 में इतना बड़ा रहा कि उसे पलट पाना इतना आसान भी दिखाई नहीं देता। 2018 के बाद हुए उप-चुनाव के नतीजे भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी बात यदि नौकरशाह दो साल के भीतर ही ‘तलुवे चाटने’ लगे हैं तो इस जमात ने 15 साल में क्या नहीं किया होगा? उन 15 सालों में किस-किस अधिकारी ने विपक्षी कांग्रेसियों को परेशान किया? प्रताडि़त लोगों में तो कुछ सीएम के बेहद करीबी हैं और कुछ मंत्रिमंडल में भी। डेढ़ दशक के जितने पन्ने पलटेंगे उतने ही केस याद आते जायेंगे। इन्होंने भी चेतावनी दी थी कि सरकार आने पर देख लेंगे। सब मन मसोसे बैठे हैं। कोई ‘देख’ पाया? एक दो को छोडक़र बाकी सब अफसर मजे में हैं। कुछ तो पहले भी ज्यादा। ऐसा कभी हुआ, जो तीन साल बाद हो जायेगा? नहीं लगता कि डॉक्टर साहब के बयान से कोई अफसर घबराया होगा।
कोरोना की मार स्कूली किताबों तक...
कोरोना का कुछ असर तो लोगों को बीमारी, मौत, और लॉकडाऊन के नुकसानों में देखने मिल गया। लेकिन कोरोना-लॉकडाऊन के बहुत से नुकसान धीरे-धीरे सामने आएंगे। महीनों तक सरकारी दफ्तरों में काम बंद रहा, और शुरू भी हुआ तो कहीं आधे लोगों को एक दिन में काम पर आने दिया गया, दूसरे दफ्तरों से कागजी कार्रवाई धीरे-धीरे चली, और हर दफ्तर का काम पिछड़ते गया।
सरकार के जिन विभागों में टेंडर होता है वहां पूरी टेंडर प्रक्रिया ही लेट होती चली गई। कई जगहों पर टेंडर भरने वाले लोगों ने आवेदन देकर तारीखें बढ़वाईं क्योंकि उनके पास पूरे कागजात नहीं जुट पा रहे थे। ऐसे जिन-जिन सरकारी विभागों, निगम-मंडलों में टेंडर लेट हुए, वहां पर आगे का काम भी लेट होते जा रहा है।
इस बरस स्कूलों की अधिकांश कक्षाओं में पढ़ाई नहीं हुई, और साल ऐसे ही खत्म होने का आसार है। लेकिन परीक्षा-सहित या परीक्षा-रहित, जब भी अगले साल की पढ़ाई शुरू होगी, बच्चों को वक्त पर नई किताबें लगेंगी। इस बरस की किताबें पढऩा चाहे न हुआ हो, या कम हुआ हो, अगले बरस की किताबें समय पर देना एक चुनौती का काम भी होगा क्योंकि छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम का काम ही पीछे चल रहा था, और अब उसे खींचतान कर पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। अभी एक खतरा मंडराते दिख रहा है कि किताबें छपने में देर हो सकती है, अगर छपाई शुरू होने में देर हुई। फिलहाल पाठ्य पुस्तक निगम जितने किस्म की एसीबी-ईओडब्ल्यू जांच से घिरा हुआ है, वहां के अफसर-कर्मचारी किसी किस्म की रियायत देकर आगे फंसना नहीं चाहते। फूंक-फूंककर कदम रख रहे लोगों की रफ्तार वैसे भी कम हो जाती है।
सरकार के टेंडर वाले बहुत से दूसरे विभागों में भी काम का यही हाल है, न वक्त पर टेंडर, न वक्त पर काम। लेकिन इसमें वित्त विभाग खुश है क्योंकि उसके पास हर काम का भुगतान करने के लिए आज पैसा भी नहीं है। लेकिन यह बात पाठ्य पुस्तकों पर लागू नहीं होती जिनका पैसा केन्द्र सरकार से आता है।
मोबाइल से थोड़ी बड़ी अल्ट्रासाऊंड मशीन!'

विज्ञान और तकनीक अपने आपमें बिना किसी सामाजिक सरोकार के होते हैं। परमाणु बम एक बड़ी कामयाब तकनीक है, लेकिन जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बम ने दुनिया की सबसे बड़ी तबाही पैदा की थी। सबसे बड़ी कामयाबी वाली तकनीक, और सबसे अधिक तबाही वाला इस्तेमाल।
अब हिन्दुस्तान में जहां कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ा मुद्दा है, वहां सरकार ने बहुत किस्म के नियम-कायदे अल्ट्रासाऊंड सेंटरों पर लगाए हुए हैं। वहां की मशीनें तो कोख में पल रहे बच्चे का सेक्स बता सकती हैं, लेकिन कानून इसके खिलाफ बड़ा कड़ा है। इसके बीच रास्ता निकालने के लिए हरियाणा जैसे कन्या भ्रूण हत्या में कुख्यात राज्य में ऐसे भी डॉक्टर पकड़ाए थे जो कि एक वैन में अल्ट्रासाऊंड मशीन लेकर चलते थे, और चलती वैन में ही जांच करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताकर मोटी कमाई करते थे।
अब दुनिया में टेक्नालॉजी ने और तरक्की की है, और मोबाइल फोन से कुछ बड़े आकार का ऐसा अल्ट्रासाऊंड आ गया है जो इस काम को कर सकता है, और इस मशीन से होने वाली जांच को तुरंत ही मोबाइल फोन पर दुनिया में कहीं भी देखा जा सकता है। अमरीका के जिस कैलिफोर्निया में ऐसी छोटी मशीन विकसित की गई है, वहां की तकनीकी-कंपनियों को हिन्दुस्तान जैसे देश की सामाजिक विकृति का शायद पता भी नहीं होगा कि 340 ग्राम की यह अल्ट्रासाऊंड मशीन यहां कितनी तबाही ला सकती है। इस खबर को छापने से भी कुछ लोगों को लग सकता है कि इसकी जानकारी से कन्या भ्रूण पर खतरा बढ़ेगा, लेकिन बाजार में आ चुकी तकनीक को अनदेखा करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे उपकरणों के हिन्दुस्तान में आने के खिलाफ कस्टम चौकन्ना रहे, और हिन्दुस्तान की साइबर एजेंसियां भी इस पर नजर रखें कि ऐसे उपकरण से जुड़े सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन कौन डाउनलोड कर रहे हैं, कौन इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसी बहाने कोसला भी संवार दो
पिछले साल जब कांग्रेस के कुछ विधायकों ने चंद्रखुरी में माता कौशिल्या मंदिर के नव-निर्माण के लिये मुख्यमंत्री को चेक सौंपा तो महंत राम सुंदर दास ने मां कौशिल्या का जन्म-स्थान बताने पर 11 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवमन पथ की योजना में चंद्रखुरी को माता कौशिल्या का जन्म-स्थान मानकर शामिल किया है। चंद्रखुरी के लोग तो इस फैसले से गद्गद् हैं। वे मान रहे हैं कि कुछ बरसों में इस जगह को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल जायेगी।
इधर, भाजपा विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने इस पर आपत्ति की है। उनका कहना है कि कोसला (बिलासपुर जिला) जन्मस्थली है, चंद्रखुरी नहीं। वैसे जन्मस्थल को लेकर तो नेपाल के प्रधानमंत्री ने भी विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि राम अयोध्या की जगह बीरगंज नेपाल के किसी गांव में पैदा हुए थे। कई इतिहासकार जन्मस्थली को लेकर अलग-अलग मत रख चुके हैं। बीते साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तब मुसीबत में फंस गये जब उन्होंने पाथरी को साईंबाबा का जन्मस्थान बताते हुए वहां के लिये करोड़ों रुपये की की घोषणा कर दी। शिरडी वाले के उबले उपासकों ने तो आंदोलन की चेतावनी दे दी। ठाकरे ने मामला यह कहकर सुलझाया कि पाथरी में साईंबाबा ने जन्म लिया या नहीं, इस पर वे नहीं जायेंगे लेकिन उनकी गतिविधियां वहां रही, इसलिये उसे पर्यटन के लिये विकसित किया जायेगा।
इधर अपने छत्तीसगढ़ में कोसला के सीधे-सादे लोगों ने चंद्रखुरी के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। मामला तथ्यों से ज्यादा भावनाओं का होता है। चंद्राकर के बयान के समर्थन में उनकी पार्टी के लोग भी अभी नहीं आये हैं। बेहतर तरीका तो यही होगा कि कोसला से भी माता कौशिल्या का रिश्ता होने की मान्यता को देखते हुए यहां भी विकास का पैकेज लाया जाये।
सोशल पेज पर दो साल की बातें...
कांग्रेस सरकार की दो साल की उपलब्धियों पर सोशल मीडिया पेज शानदार ग्रॉफिक्स के साथ बधाईयों, शुभकामनाओं से भरे पड़े हैं। मंत्रिमंडल के सदस्यों, कांग्रेस के पदाधिकारियों, समर्थकों ने सरकार के कामकाज की सराहना की है। यह एक ऐसा खुला मंच है जो इंटरनेट और मोबाइल रखने वाले हर किसी की पहुंच में है और वे प्रतिक्रिया दे सकते हैं। सो, यह अपनी पीड़ा बताने का भी माध्यम है।
दो साल के जवाब में एक मंत्री के फेसबुक पेज पर प्रतिक्रिया- सारे कांग्रेसी अपनी पीठ खुद थपथपा रहे। जरा उन विद्या मितान शिक्षकों से पूछो, जो बस्तर सरगुजा जैसे घोर नक्सल इलाकों में 4-5 सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। 10 दिन में नियमितीकरण का वादा था..., 10 माह से बिना वेतन जी रहे हैं। विद्या मितान शिक्षकों का पूरा परिवार रोड पर आ गया है क्यों?...दो माह से लगातार हड़ताल पर हैं...।
पोस्ट में और भी बहुत कुछ है। पर नेकनीयती यह है कि पब्लिक फिगर इन प्रतिक्रियाओं को डिलीट नहीं कर रहे। यह जानते हुए भी कि यह प्रतिक्रिया हजारों लोगों द्वारा पढ़ी जा रही है। पब्लिक फिगर उन्हें ‘रिप्लाई’ भी दें दें तो और अच्छा।
ईमानदारी महंगा शौक
कहावत है कि ईमानदारी एक महंगा शौक है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। अब जेल अफसर वर्षा डोंगरे को ही देखिए, इस जुझारू महिला ने पीएससी-2003 के घोटाले को उजागर किया था। राज्य सरकार की जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू-एसीबी से लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट तक ने भी वर्षा के कथन को सही माना। हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट से घोटाले की जद में आए अफसरों को राहत मिल गई है, और उन्हें आईएएस अवॉर्ड होने जा रहा है।
वर्षा का हाल देखिए, पीएससी घोटाले के बाद जेल में गड़बड़ी का सार्वजनिक खुलासा करने पर पहले निलंबित कर दिया गया, और ट्रांसफर के बाद उनकी करीब 15 महीने की सैलरी रूकी हुई है। जिसके लिए उन्हें विभाग के आला अफसरों से लेकर गृहमंत्री तक की चक्कर काटनी पड़ी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक वर्ष-2003 के राप्रसे के अफसरों को आईएएस अवॉर्ड न करने के लिए यूपीएससी और डीओपीटी तक गुहार लगाई। मगर इस पर कुछ नहीं हुआ।
आईएएस के छह रिक्त पदों के लिए डीपीसी हो चुकी है। तीन सीनियर अफसर हिना नेताम, संतोष देवांगन और एक अन्य के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, और नियमानुसार तीन पद रोके जाने थे। सिर्फ तीन को ही आईएएस अवॉर्ड होना था। इससे पहले भी ऐसा होता आया है। ओंकार सिंह और आनंद मसीह के लिए तो बरसों तक पद रोके गए थे, क्योंकि दोनों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही थी। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार सभी छह रिक्त पदों पर आईएएस अवॉर्ड हो गया। यानी वर्ष-2003 बैच के सीनियर सभी अफसरों को आईएएस अवॉर्ड हो चुका है। सिर्फ नोटिफिकेशन होना बाकी है। ये सब तब हुआ है, जब यूपीएससी के मौजूदा चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी, जो कि छत्तीसगढ़ पीएससी के चेयरमैन रहे हैं, और वे पीएससी-2003 के घोटाले के पूरी तरह वाकिफ रहे हैं। आईएएस अवॉर्ड के दावेदारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया था, और उन्हें सफलता भी मिल गई। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि ईमानदारी महंगा शौक है।
धर्मजीत सिंह की भाजपा से बढ़ती नजदीकी
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) को क्या एक बार फिर झटका लगने वाला है? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि जोगी परिवार के विश्वस्त विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर ने एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से उनके बिलासपुर प्रवास के दौरान मुलाकात की। मरवाही उप-चुनाव में भाजपा को समर्थन देने का निर्णय जकांछ ने लिया तो इसके पीछे धर्मजीत सिंह ही थे। जकांछ से दो विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा पहले से ही दूरी बनाकर चल रहे हैं और कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं। मरवाही सीट पर कांग्रेस की जीत के बाद एक सीट का नुकसान जकांछ को पहले ही हो चुका है। अब धर्मजीत सिंह भी पार्टी से दूरी बनाते हुए दिख रहे हैं।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर डॉ. रेणु जोगी को जिम्मेदारी दी गई तब भी कुछ लोग सवाल पूछ रहे थे कि उनसे अधिक पुराने नेता धर्मजीत सिंह को यह मौका क्यों नहीं दिया गया। इससे एक ही परिवार की पार्टी होने के आरोप से जकांछ को बचाया जा सकता था। इन दिनों उन्होंने वर्तमान विधानसभा क्षेत्र लोरमी की जगह पंडरिया में सक्रियता बढ़ा दी है। यह जकांछ को मजबूत करने के लिये है या खुद के लिये नये ठिकाने की तलाश, भविष्य बतायेगा। धर्मजीत सिंह का कहना है कि एक वरिष्ठ नेता होने के कारण वे सौजन्यतावश डॉ. रमन सिंह से मिलने गये थे। वैसे, धर्मजीत के लिये अभी रणनीति का खुलासा करना जरूरी भी नहीं है क्योंकि चुनाव तो तीन साल बाद है। मेल-जोल बनाये रखना काफी है।
वैक्सीन की तैयारी और लोगों की जिज्ञासा
कोरोना से बचाव के लिये कौन सी वैक्सीन आयेगी, कब तक आयेगी, कितनी मात्रा में आयेगी अभी कुछ पता नहीं है लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार की तरफ से रोजाना नये-नये निर्देश जिला मुख्यालयों में पहुंच रहे हैं। लगभग हर जिले में अधिकारी-कर्मचारियों की बैठकों का सिलसिला चल पड़ा है। वैक्सीन कैसे रखना है, कितनी जगह लगेगी, वितरण कैसे होगा, किनको टीके लगाये जायेंगे तय कर लिया गया है। सरकारी, निजी अस्पताल के डॉक्टरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मितानिनों तक को व्यस्त कर दिया गया है।वैक्सीन लगाने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। दूसरी तरफ आम लोगों में दो तरह की प्रतिक्रियायें दिख रही है। एक वर्ग बेसब्री से वैक्सीन की प्रतीक्षा कर रहा है और आते ही टीका लगवाना चाहता है ताकि कोरोना से चिंतामुक्त हों। दूसरा तबके को लगता है कि एक दिन में तो 100 वैक्सीन ही लगाने की बात हुई है। पहले स्वास्थ्य विभाग के वारियर्स को लगना है तो उनकी बारी आने में तो साल दो साल लग जायेंगे। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन मुफ्त लगेगी या पैसे देने होंगे। देने होंगे तो कितने? और क्या यह ब्लैक में भी मिल जायेगी?
कब चलेगी लोकल ट्रेन?
बिलासपुर रेलवे जोन के अधिकारियों को कोरोना को लेकर काफी चिंता दिखाई दे रही है। शायद इसी वजह से लोकल और मेमू ट्रेन अब तक शुरू नहीं की गयी हैं। रायपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़, राजनांदगांव, गोंदिया, पेन्ड्रारोड आदि के यात्रियों को परेशानी इससे बढऩे लगी है। कुछ कम दूरी की ट्रेनों को चलाया भी जा रहा है तो उसे फास्ट ट्रेन बनाकर। यानि छोटे स्टेशनों के यात्रियों को लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। दूसरे कई राज्यों में लोकल ट्रेन शुरू हो चुकी है। कोरोना की मार बुरी तरह से झेलने वाली दिल्ली भी मेट्रो ट्रेनों को शुरू कर चुकी है। लोकल ट्रेन में गांवों से शहर जाकर फैक्ट्रियों, प्राइवेट संस्थानों में काम करने वाले लोग, मजदूर और छोटे व्यापारी सफर करते हैं। इनका काम धंधा या तो बंद हो चुका है या फिर अपने कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये ज्यादा खर्च इन्हें करना पड़ रहा है। रेलवे का कहना है कि लोकल ट्रेनों में सीट रिजर्वेशन कठिन काम है जबकि अभी सिर्फ रिजर्वेशन के बगैर सफर की मंजूरी मिली हुई है। पर व्यवहार में ऐसा नहीं है। जिन ट्रेनों में रिजर्वेशन हो रहा है उनमें भी सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ रही है। कोरोना गाइडलाइन का पालन रायपुर, बिलासपुर जैसे बड़े स्टेशनों पर तो रेलवे कर रही है पर बाकी स्टापेज में सावधानी नहीं है। दरअसल, लोकल ट्रेनों का किराया काफी कम होता है और रेलवे के लिये इन्हें चलाना घाटे का सौदा होता है। इसलिये इन ट्रेनों को नहीं चलाने की एक वजह यह भी हो सकती है।


