राजपथ - जनपथ
डीएम का नया मतलब
हिन्दुस्तान की सरकारी व्यवस्था में अंग्रेजी का एम अक्षर हिन्दी के मनमानी शब्द के लिए बना दिखता है। देश में तीन ही कुर्सियां ताकतवर मानी जाती हैं, पीएम, सीएम, और डीएम। वैसे तो ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में पीएम और सीएम को उनके मंत्रिमंडलों में बराबरी के लोगों में अव्वल कहा गया है, लेकिन फस्र्ट अमंग इक्वल बात अमल में नहीं आती है। पीएम और सीएम अपार ताकत के धनी ओहदे हैं। लेकिन ये दो लोग तो फिर भी चुनाव जीतकर आते हैं, और सांसदों या विधायकों के बहुमत से इन कुर्सियों तक पहुंचते हैं। दूसरी तरफ महज एक मुकाबला-इम्तिहान से आईएएस बनकर आने वाले लोग डीएम, यानी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट उर्फ कलेक्टर बनते हैं, और उनकी ताकत भी अपने जिलों में बेमिसाल रहती है। छत्तीसगढ़ में इन दिनों जितने किस्म की जांच चल रही है, उनसे पता लगता है कि कलेक्टर की कुर्सी पर बैठकर कैसी मनमानी की जा सकती है, किसी को भी धमकाया जा सकता है कि जानते नहीं हो कि कलेक्टर अपने जिले के सबसे बड़े गुंडे होते हैं। ऐसी ही गुंडागर्दी का नतीजा आज इस राज्य के कुछ अफसर भुगत रहे हैं, और कुछ भुगतने जा रहे हैं। डीएम यानी डिस्ट्रिक्ट मनमानी!
अब चुनावी कथा
कथावाचक प्रदीप मिश्रा को सुनने के लिए जिस तरह लोगों का सैलाब उमड़ा, उससे राजनीतिक दलों के लोगों में काफी हलचल है। वैसे तो मिश्रा जी को दल विशेष से जोडक़र नहीं देखा जाता है, और उनके चाहने वाले हर दल में हैं। मगर चुनावी साल में उनकी लोकप्रियता का फायदा उठाने की भी कोशिश हो रही है। सुनते हैं कि जनवरी-फरवरी में राजनांदगांव में भी कथाकार प्रदीप मिश्रा के शिव महापुराण कथा के आयोजन की रणनीति बनाई जा रही है। रायपुर में भी एक पूर्व मंत्री की अगुवाई में इसी तरह के कार्यक्रम की योजना पर काम चल रहा है। हालांकि अभी इन आयोजनों के लिए कथाकार की सहमति बाकी है। मगर चुनावी साल में धर्म का इस्तेमाल खूब होने के संकेत मिल रहे हैं।
जो खर्चा करेगा उसे ही टिकट
भानुप्रतापपुर उपचुनाव में भाजपा बेहतर प्रत्याशी की खोजबीन में लगी है। बुधवार को राज्यसभा के पूर्व सदस्य रामविचार नेताम की अगुवाई में पर्यवेक्षकों ने दावेदारों के नाम पर चर्चा भी की। कहा जा रहा है कि पार्टी नेता दावेदारों की आर्थिक ताकत भी आंक रहे हैं।
सुनते हैं कि चुनाव लडऩे के लिए पार्टी कोई बड़ा बजट उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं है। प्रत्याशी को खुद खर्च वहन करना पड़ेगा। ऐसे में उस दावेदार के नाम पर मुहर लग सकती है, जो सबसे ज्यादा खर्च करने में सक्षम होगा। वैसे इस पर अंतिम फैसला 12 तारीख को चुनाव समिति की बैठक में लिया जाएगा।
तेली जी तो अपने बीच के हैं..

असम से आने वाले केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली साइंस कॉलेज मैदान बिलासपुर में स्वदेशी मेले का उद्घाटन करने पहुंचे थे। मंच पर उन्होंने जब अपना उद्बोधन ठेठ छत्तीसगढ़ी बोली में देना शुरू किया तो कई लोग हैरान रह गए। सुनने से ही लग रहा था कि यह कोशिश करके सीखी हुई छत्तीसगढ़ी नहीं बोल रहे हैं बल्कि वे अभ्यस्त हैं। मंत्री ने खुद ही राज खोला। बताया कि उनके पूर्वज छत्तीसगढ़ के ही थे। करीब 200 साल पहले वे काम के सिलसिले में असम जाकर चाय बागानों के आसपास बस गए। पीढिय़ों से वहां हैं, पर घर में सब छत्तीसगढ़ी में ही बात करते हैं। वहां छत्तीसगढ़ से गए लोगों का पूरा इलाका है। यहां के लोक कलाकार कार्यक्रम भी देने पहुंचते रहते हैं।
ऐसे तो नशा मत उतारो...

पिछले दिनों जांजगीर-चांपा जिले के सोनसरी की भ_ी से ली गई देसी शराब की बोतल में मरा हुआ सांप दिखा। कोरबा जिले के हरदी बाजार बोतल के भीतर मरा हुआ मेंढक भी हाल ही में मिला। अब इसी जिले के कुसमुंडा इलाके की देसी शराब दुकान से खरीदी गई बोतल में गुटखे का पाउच मिला है। ऐसी लापरवाही पहले भी सामने आती रही है, जब देसी बोतलों में कीड़े-मकोड़े मिले हैं। ज्यादातर इसे खरीदने वाले लोग गरीब और मजदूर तबके के होते हैं। वे कहीं शिकायत नहीं कर पाते हैं। शराब का मामला होने की वजह से भी झिझकते हैं। पर, अफसर-नेता भी ऐसी घटनाओं को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। सवाल तो यह भी है कि सांप-मेंढक नहीं भी मिले, तब भी क्या शराब की शुद्धता को लेकर पक्का कुछ कहा जा सकता है? पैकिंग जिन टैंकरों से हो रही है, उसकी क्या सफाई हो रही है? बोतलों की दुबारा इस्तेमाल करने से पहले धुलाई हो रही है? सरकार ने मजदूरों की सीमित कमाई का ध्यान रखते हुए देसी शराब की कीमत अंग्रेजी के मुकाबले कम ही बढ़ाई। पर अफसरों को उनकी सेहत का बिल्कुल भी ख्याल नहीं है।
आरक्षण मसले के बीच उप-चुनाव
आदिवासी आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट के फैसले के बाद गरमाई प्रदेश की सियासत के बीच सुरक्षित आदिवासी सीट भानूप्रतापपुर में उप-चुनाव का ऐलान हो गया है। भारतीय जनता पार्टी और आदिवासी समाज के एक धड़े ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेर रखा है। सरकार पहले सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर गई। उसके बाद तय किया कि अन्य राज्यों से, जहां आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक है, रिपोर्ट ली जाए। उसका अध्ययन करने के बाद अंतिम विकल्प के रूप में विधानसभा का सत्र रखें। 3 दिन पहले एक समिति इसके लिए बना भी दी गई। इधर भाजपा ने आदिवासी बाहुल्य सरगुजा और बस्तर के कई जिलों में चक्का जाम कर दिया। कल अंबिकापुर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव, धमतरी, सूरजपुर आदि में इसका असर देखा भी गया। अब विधानसभा का सत्र 1 और 2 दिसंबर को बुला लिया गया है। इसके तीन दिन बाद भानुप्रतापपुर में 5 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। घटनाक्रम महत्वपूर्ण है।
मुख्यधारा में आने मशक्कत
भूपेश सरकार के कार्यकाल को दस माह बाकी रह गए हैं। इन सबके बीच पुलिस और प्रशासन में फेरबदल की गुंजाइश बनी हुई है। ऐसे में लूप लाइन में तैनात कई अफसर मुख्य धारा में लौटना चाहते हैं, और इसके लिए कुछ प्रयास भी कर रहे हैं। सुनते हैं कि एक आईपीएस अफसर ने पिछले दिनों सरकार के ताकतवर मंत्री से मुलाकात की। आईपीएस अफसर को पिछली सरकार में अहम पदों पर रहे हैं। उन्हें कई विशेष प्रकरणों की जांच का भी जिम्मा दिया गया था, लेकिन सरकार बदलते ही बुरे दिन शुरू हो गए। रमन सरकार के कई करीबी अफसर, तो सरकार में एडजेस्ट हो गए, लेकिन इस आईपीएस के दिन अब तक नहीं फिर पाए। वो अभी भी नक्सल इलाकों में पदस्थ हैं। अब आईपीएस को मंत्रीजी से अपनी वापसी का भरोसा है। मंत्रीजी अफसर की कितनी मदद कर पाते हैं, यह देखना है।
चुनाव देखकर बढ़ाई सक्रियता
विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही भाजपा के लोग स्मार्ट सिटी में अनियमितताओं की सुध ले रहे हैं। एक के बाद एक खुलासे कर रहे हैं। इससे पहले तक अनियमितताओं को लेकर भाजपा के नेता गंभीर नहीं रहे। बताते हैं कि वृक्षारोपण में भी भारी गड़बड़ी हुई है। वृक्षारोपण के लिए स्मार्ट सिटी मद से 2 साल से करीब 7 करोड़ से अधिक फूंक दिए गए। बड़े भाजपा नेताओं के पास इस विषय को प्रमुखता से उठाने के लिए दबाव भी बनाया गया, लेकिन आगे बात नहीं बढ़ पाई। यह पता चला कि पौधों की सप्लाई का काम जिस व्यक्ति को दिया गया था वह भाजपा से जुड़ा था। बाद में वह गुजर गया। इसके बाद प्रकरण की जांच का विषय ही ठंडे बस्ते में चला गया।
अफवाहों का बाजार गर्म
छत्तीसगढ़ ईडी की जांच की आंच से तप रहा है। अब तक तो सरकारी अफसर और सरकार के साथ लगातार काम करने वाले कारोबारियों की गिरफ्तारी और जांच चल रही थी, लेकिन अब दूसरे बड़े उद्योगपतियों को बुलाकर पूछताछ की जा रही है, उनके बयान लिए जा रहे हैं। उद्योगपतियों के घेरे में आने से राज्य के उद्योग-व्यापार में एक खलबली मची हुई है, और कारोबार के लोगों का यह कहना है कि जैसी चर्चा है, अगर पचास से अधिक उद्योगपतियों से पूछताछ होती है, तो उस खलबली में काम-धंधा ठप्प हो सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि इन उद्योगपतियों का जांच के निशाने पर चल रहे मामलों में कैसा किरदार था, लेकिन ईडी की जांच, और उसके लिए गए बयान अदालत में दिए गए बयान सरीखे होते हैं, इसलिए भी उद्योगपतियों में हड़बड़ाहट अधिक है, वरना इतने बड़े तमाम उद्योग इंकम टैक्स के छापे तो झेले हुए रहते ही हैं, ईडी का कानून अधिक कड़ा है, उसके अधिकार बहुत बड़े हैं, और कारोबारी दहशत में हैं।
ऐसी दहशत के बीच अफवाहों का बाजार बहुत गर्म है, और बीती शाम रायपुर में यह हल्ला उड़ा कि एयरपोर्ट पर एक विशेष विमान आकर उतरा है। लोगों ने अपने-अपने पहचान के अफसरों से इस बारे में सवाल किए, और अफसरों की आपसी बातचीत में उन्हें यह पता लगा कि दर्जनों और लोग भी ऐसे ही किसी विमान के बारे में पूछ रहे हैं। बड़े पैमाने पर फैली यह अफवाह, अफवाह ही साबित हुई, और एयरपोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज हुए बिना कोई उड़ान न तो आ सकती है, न जा सकती है, इसलिए यह अफवाह तेजी से अफवाह साबित हो सकी। लेकिन आज सुबह से जिस तरह कुछ लोगों पर इंकम टैक्स के छापे पड़े हैं, और ईडी में जिस तरह कुछ दिनों से लगातार उद्योगपतियों की पूछताछ जारी है, उससे सनसनी फैली हुई है, जो कि कम होने का नाम नहीं ले रही।
भूपेश का बड़ा सवाल
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ईडी को जो चि_ी लिखी है, उससे पिछली भाजपा सरकार के लंबे कार्यकाल को कटघरे में खड़ा किया गया है। अब छत्तीसगढ़ के कुख्यात नान घोटाले के पत्तों और फूलों की जांच की जाए, डालों तक को खंगाला जाए, तने को टटोला जाए, या फिर जड़ों को भी खोदा जाए, यह सवाल खड़ा हो गया है। भ्रष्टाचार तो हुआ है, लेकिन उसकी जांच कबसे शुरू की जाए, यह मुद्दा भूपेश बघेल ने ईडी के सामने औपचारिक रूप से रख दिया है। अब भला इस बात से कौन इंकार कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार अगर बहुत लंबा है, तो उसकी जांच जड़ों तक जानी ही चाहिए, चाणक्य के बारे में भी कहा जाता था कि वे जिसे नष्ट करना चाहते थे, उसकी जड़ों मेें मठा डालते थे ताकि वह जड़़ से ही खत्म हो जाए। अब भूपेश बघेल ने जमीन में छेद करके कई बरस पुरानी जड़़ों तक मठा डाला है, यह देखने की बात होगी कि ईडी भ्रष्टाचार के इस विशाल वृक्ष की जांच में कितने नीचे तक पहुंचती है। कल शाम एक दिलचस्प बात यह रही कि भूपेश बघेल के आसपास के जिन लोगों की सलाह ऐसी चि_ी के पीछे मानी जा रही थी, वैसे कुछ अफसरों और दूसरे लोगों का कहना था कि उन्हें तो चि_ी तब देखने मिली जब भूपेश बघेल के ट्विटर पेज पर उसे पोस्ट किया गया। अब पता नहीं यह बात सच है, या लोग अपने आपको ऐसी चि_ी से जुड़ा हुआ साबित होने से बचने के लिए ऐसा कह रहे हैं। फिलहाल भूपेश बघेल ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, और आगे देखना है कि इस पर होता क्या है।
सती की समाधि पर मेला

सती प्रथा गुजरे जमाने की बात नहीं है। इस पर रोक लगाने के लिए 1987 से कड़ा कानून बन तो चुका है पर अब भी जगह-जगह सती स्मारक बने हुए हैं। कई स्थानों पर जब प्रशासन ने सख्ती बरती तो कई सती मंदिरों को शक्ति मंदिर नाम दे दिया गया। पर, पूजा अर्चना होती है। सालाना उत्सव होते और मेले लगते हैं। बम्हनीडीह ब्लॉक के सिलादेही ग्राम में हसदेव नदी के तट पर पिछले साल से एक मेला लगना शुरू हुआ है। यहां पर एक बाबा ने करीब 7 साल तक साधना की, फिर रायगढ़ चले गए। उनको वापस बुलाने के उद्देश्य से पिछले साल से मेले का आयोजन किया जाने लगा। यहां तक तो ठीक है, पर इसी जगह को लेकर यह भी कथा प्रचलित है कि वर्षों पहले एक महिला ने अपने पति के साथ चिता पर जलकर जान दे दी थी। यहां समाधि है और जाहिर है वहां भी पूजा हो रही है। इस साल भी यहां पूर्णिमा के दिन से सप्ताह भर का मेला शुरू हुआ है। मेले के आयोजन में प्रशासन से पूरी मदद मिली। विधायक केशव चंद्रा भी इसमें शामिल हुए, जबकि इन दोनों का काम है कि सती प्रथा का महिमामंडन रोकें।
रेल लाइन पर फिर रेड सिग्नल
रायपुर से जगदलपुर की सीधी रेल लाइन का पहला 70 साल पहले हो चुका था। लगातार मांग के बाद एक कंपनी बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड का गठन किया गया। इसमें एनएमडीसी, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, इरकॉन इंटरनेशनल और छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम को शामिल किया गया। इस कंपनी को 140 किलोमीटर लंबी रेल लाइन रावघाट से जगदलपुर तक तैयार करनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दंतेवाड़ा प्रवास के दौरान एमओयू हुआ था। अब मालूम हो रहा है कि बीआरपीएल ने केंद्र सरकार और रेलवे मंत्रालय को पत्र लिखा है कि कंपनी यह रेल लाइन पूरी नहीं कर पाएगी। इसे रेलवे से पूरा कराया जाए। कारण सामने नहीं आया है, पर बताया जाता है कि इसमें शामिल चारों उपक्रमों के बीच भारी खींचतान चल रही है। सेल ने पहले पूरी तरह हाथ खींचना चाहा, पर केंद्रीय इस्पात मंत्री को राज्य सरकार की ओर से लिखे गए पत्र के बाद उसने भागीदारी नहीं छोड़ी पर अपना शेयर कम कर दिया। बचे हुए शेयर एनएमडीसी को दिए गए, जिसके पास पहले से ही 43 प्रतिशत शेयर था, सेल के 9 प्रतिशत शेयर भी उसे ही दे दिए गए। यह भी मालूम हुआ है कि राज्य सरकार को बीआरपीएल ने कोई जानकारी नहीं दी है कि वह रेल निर्माण से पीछे हटना चाहता है। सीधे केंद्र को पत्र लिखा गया है। अब रेलवे के ऊपर है कि बीआरपीएल के इस प्रस्ताव को वह मानता है या नहीं। मान भी ले तो कब नए सिरे से काम शुरू होगा? फिलहाल तो 70 साल का इंतजार और पांच-दस साल बढऩे की स्थिति बन रही है।
कलेक्टर के लिए पर्यायवाची शब्द
शासन-प्रशासन में उन अफसरों की पूछ परख ज्यादा होती है, जो कि आम लोगों की नब्ज को बेहतर समझते हैं। ऐसे अफसर सफल रहे हैं, और वो जिस क्षेत्र में भी रहे लोगों का भरपूर साथ मिला। अजीत जोगी जैसे नेता बतौर कलेक्टर काफी सफल रहे, और जब वो राजनीति में आए, तो लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। मगर ये गुजरे जमाने की बात हो गई है। मौजूदा समय में हाल यह है कि लोगों का प्रशासन से भरोसा धीरे-धीरे उठता जा रहा है, और लोग प्रशासनिक अफसरों के मुंह पर कड़वी बातें कहने से नहीं चूकते हैं। ऐसा ही एक मामला पड़ोस के जिले में देखने को मिला है। कुछ ग्रामीण किसान आत्महत्या प्रकरण को लेकर सीएम के नाम ज्ञापन देने कलेक्टर से मिलने पहुंचे। कलेक्टर ने गरमा-गरमी में ज्ञापन लेने से मना कर दिया। इस पर ग्रामीणों ने कलेक्टर को उद्योगपति का दलाल तक कह दिया। इस पर कलेक्टर नाराज हुए, तो ग्रामीणों ने यह तक कह दिया गया कि दलाल को कोई और शब्द कहा जाता है, तो वह आपके लिए कह देते हैं...। तीखी तकरार के बाद ग्रामीण लौट आए। लेकिन प्रशासनिक अफसरों के आम लोगों से व्यवहार के तौर तरीकों की खूब आलोचना भी हो रही है।
हरियाली की कीमत पर सडक़...

मध्यप्रदेश के मंडला में केंद्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने 7 नवंबर को 1261 करोड़ रुपये की लागत से 5 सडक़ों का शिलान्यास किया। इनमें एक सडक़ डिंडोरी से सागरटोला होते हुए कबीर चबूतरा के लिए प्रस्तावित है। कबीर चबूतरा छत्तीसगढ़ का हिस्सा है। इससे पांच मिनट की दूरी पर अमरकंटक है। जीपीएम, कोरबा, बिलासपुर आदि जिले के लोगों का इस सडक़ से गहरा नाता है। जबलपुर, मंडला आदि के लिए वे इसी सडक़ का इस्तेमाल करते हैं। जो कोई इस सडक़ से गुजरता है, यहां की हरियाली और जंगल की मादकता से आनंदित हो उठता है। करंजिया की ओर सडक़ से सटे हुए करंज के सैकड़ों पेड़ों की घनी लंबी कतार तो अचंभित और मंत्रमुग्ध कर देती है। अब ये पेड़ कट जाएंगे। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि मैकल की शांत पहाडिय़ों से गुजर रही इस सडक़ की स्थिति तो अच्छी है और ट्रैफिक का दबाव भी नहीं है, फिर क्यों इसे चौड़ा किया जा रहा है।
रिश्वत की छोटी रकम...
गरियाबंद में एक डिप्टी कलेक्टर को 20 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो ने रंगे हाथों पकड़ लिया। एक समकक्ष अधिकारी ने सवाल किया कि इतनी छोटी रकम लेने में पकड़ा गया, सुनकर अच्छा नहीं लगा। पटवारी की डिमांड भी इससे ज्यादा होती है। दूसरे ने कहा- सब्र करो। अभी उनको दो साल ही तो नौकरी में हुए हैं, प्रोबेशन में चल रहे हैं। धीरे-धीरे समझ में आएगा किस काम का रेट क्या होना चाहिए।
एसबीआई से त्रस्त उपभोक्ता

ऑनलाइन ठग आए दिन मोबाइल फोन पर फर्जी मेसैज भेजकर झांसा देने की कोशिश करते हैं। कई जानकार जब इसका जवाब देते हैं तो उनकी अपनी मनोदशा क्या है, इसका पता भी चल जाता है। अब इसे ही देखिये, इनको ठग ने एसबीआई अकाउंट बंद हो जाने की चेतावनी देते हुए एक लिंक पर क्लिक करने कहा है। इस पर जवाब दिया जा रहा है- जल्दी बंद कर दे। वैसे भी परेशान हो गया था...। ठगों की बात तो छोडि़ए, वे ऐसे जवाब की अनदेखी कर अगले शिकार की ओर निकल जाते होंगे, पर एसबीआई को तो जरूर सोचना चाहिए कि उसकी साख क्यों ऐसी बन रही है।
तबादले से अधिक रद्द करने का खर्च
तबादले की अवधि खत्म होने के बाद भी संशोधन, और निरस्तीकरण का खेल चल रहा है। कई रोचक प्रसंग भी सुनने को मिल रहे हैं। हुआ यूं कि निर्माण विभाग के एक सब इंजीनियर ने मलाईदार प्रोजेक्ट में काम करने के लिए जुगाड़ बनाया है, और एक नेता के माध्यम से विभाग के प्रशासन पर दबाव भी बनाया। इससे अफसर नाखुश हो गए, और सब इंजीनियर का नाम तबादला सूची में डलवा दिया।
तबादले की सूची जारी हुई, तो सब इंजीनियर के होश उड़ गए। उसकी पोस्टिंग दूरस्थ आदिवासी इलाके में कर दी गई थी। इसके बाद सब इंजीनियर ने ट्रांसफर निरस्त कराने के लिए प्रभावशाली लोगों से संपर्क किया, तो उससे इतनी बड़ी डिमांड की गई कि इसकी प्रतिपूर्ति के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। मलाईदार प्रोजेक्ट की चाह में फंसा सब इंजीनियर फिलहाल तो मोलतोल में ही लगा है।
तौल मशीन का कमीशन, परेशान सप्लायर
प्रदेश के आंगनबाड़ी केन्द्रों में तौल मशीन की सप्लाई को लेकर काफी कुछ सुनने को मिल रहा है। हल्ला यह है कि सप्लायरों से 30 फीसदी कमीशन एडवांस में देने के लिए कह दिया गया है। कई सप्लायर असमंजस में है। वजह यह है कि प्रदेश में ईडी-आईटी की धमक बढ़ी है। छोटे मोटे कार्यों पर भी पैनी नजर है। केन्द्र की एजेंसियां पहले इतनी बारीक निगाह नहीं रखती थी। यदि किसी तरह शिकवा शिकायतें हुई, तो एडवांस डुबने का भी जोखिम है। ऐसे में सप्लायर फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रहे हैं।
मंजू ममता यूनिवर्सिटी
किसी को गलत सूचना देने क्या भरपाई होती है यह कोई मंजू ममता की चौपाल में बैठने वालों से पूछे। इस चौपाल के एक व्हाइट कॉलर लाइजनर से भला और कौन जान समझ सकता है। इन्होंने अपने कुछ साथियों को यह वाकया शेयर किया। गलत सूचना पर प्रशासन और पुलिस अफसरों से जमकर अपशब्द सुने। अब यह किस्सा मंजू ममता यूनिवर्सिटी से तेजी से वायरल हो रही है। इस ग्रुप के जानकारों का कहना है कि 2-3 दिन में सारा मामला खुल जाएगा।
भानुप्रतापपुर का भी भाग्य चमकेगा?
2018 के बाद प्रदेश में हुए चारों विधानसभा उप-चुनावों में से सिर्फ चित्रकोट सीट कांग्रेस के पास पहले थी, दंतेवाड़ा सीट उसने भाजपा से तथा मरवाही और खैरागढ़ सीट जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से छीनी। अब एक साल के बचे कार्यकाल के लिए भानुप्रतापपुर में उप-चुनाव हो रहा है। विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज मंडावी के आकस्मिक निधन से रिक्त हुई सीट पर प्रत्याशी ढूंढने प्रदेश कांग्रेस के नेता भानुप्रतापपुर दौरे पर जरूर हैं, पर सूचना यही है कि दिवंगत विधायक की लेक्चचर पत्नी सावित्री मंडावी को टिकट मिल रही है और अब तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया है।
2018 में मंडावी ने भाजपा उम्मीदवार देवलाल दुग्गा को 26 हजार 600 मतों के भारी अंतर से हराया था। इस बार सहानुभूति का मामला ताजा भी है। उप-चुनावों के नतीजे प्राय: सरकार के पक्ष में झुके हुए मिल जाते हैं। इसी साल हुए खैरागढ़ उप-चुनाव में तमाम मजबूत परिस्थितियों के बाद भी कांग्रेस ने इसे जिला बनाने का वादा कर दिया। इसे भाजपा और जकांछ ने सौदेबाजी जरूर करार दिया, पर उनकी जीत की संभावना खत्म हो गई। अब भानुप्रतापपुर उप-चुनाव जिसे एक बार फिर 2023 के आम चुनाव का रिहर्सल कहा जा रहा है, में उठती आई जिला बनाने की मांग का क्या होगा यह देखना होगा। स्व. मंडावी भानुप्रतापपुर को जिला बनाने के समर्थन में रहे। सीएम से उन्होंने प्रतिनिधिमंडलों की कई बार मुलाकात कराई। यह कहना गलत नहीं होगा कि कुछ नवगठित जिलों से ज्यादा लंबे समय से यहां जिले की मांग हो रही है। लोग बीते 12 सालों से आंदोलन पर हैं। कई बार चक्काजाम, रैली और धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। भानुप्रतापपुर के लोगों को अब उम्मीद हो चली है कि खैरागढ़ की तरह उनको भी जिला मिल जाएगा। इस मामले में यदि कांग्रेस खामोश रही तो भाजपा कह सकती है, इस बार हमें वोट दो। सरकार आने पर हम बनाएंगे। मतदाताओं ने भाजपा की बात पर भरोसा कर लिया तो? वैसे भी भानुप्रतापपुर किसी एक दल का गढ़ नहीं रहा है। मतदाता बीते चुनावों में कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को चुनते आए हैं।
धान फसल पंजाब पर भी भारी
छत्तीसगढ़ में भी पंजाब की तरह ही पराली का निष्पादन बड़ी समस्या बन रही है। हरियाणा-पंजाब से धान की कटाई और मिंसाई के लिए बीते कुछ साल से बड़े-बड़े हार्वेस्टर गाडिय़ां आने लगी हैं। कटाई के लिए मजदूर नहीं मिलने और जल्दी काम होने के चलते इसकी मांग बड़े-मध्यम ही नहीं. छोटे किसानों में भी बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ के किसान पहले पराली को हाथ में हंसिया लेकर जड़ के पास से काटते थे, तब यह समस्या नहीं थी। पर हार्वेस्टर करीब एक फीट ऊंचाई से बड़ी तेजी से फसल काटता है, मिसाई भी हो जाती है। भैंस-बैल की जगह ट्रैक्टर और दूसरी मशीनों से खेती हो रही है, इसलिये पराली वे भी खेतों में जला रहे हैं। एनजीटी ने पूरे देश के लिए खेतों में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया है, इस पर 15 हजार रुपये तक का जुर्माना भी है। बीते दो साल से छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को गौठानों के लिए पैरा दान करने की अपील कर रही है, पर कोई असर नहीं हो रहा है। पंजाब में जब तक आम आदमी पार्टी सरकार नहीं थी, दिल्ली सरकार उसे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराती थी। अब पंजाब के सीएम ने कहा है कि हम धान उत्पादन घटाकर दूसरी फसलों को लेने का अभियान चलाएंगे, क्योंकि इसी को जलाने से प्रदूषण ज्यादा फैलता है। धान-चावल का देश में संकट भी नहीं है कि इसे ज्यादा उगाया जाए।
अब देखना होगा कि पंजाब सरकार को इस कोशिश का क्या नतीजा निकलेगा, पर छत्तीसगढ़ में तो तमाम प्रयोगों के बाद हर बार धान बोने का रकबा बढ़ता जा रहा है और खरीदने का रिकार्ड भी। पिछले कई सालों से धान की जगह दूसरी फसल लेने के लिए दिए जा रहे तमाम नगद प्रोत्साहन और उन फसलों का समर्थन मूल्य तय करने के बावजूद। हार्वेस्टर के आने के बाद तो धान खेत से सीधे सोसाइटियों में भेजने की सुविधा हो गई है, घर लाने की जरूरत भी नहीं।
धंधे में बेईमानी नहीं....
ग्राहकों का ध्यान खींचने के लिए दुकान ठेलों के आकर्षक नाम रखने का चलन है। मुखशुद्धि केंद्र नाम से पान-गुटखा की दुकानें हर शहर में मिल जाएगी। रायपुर में एक पान दुकान का नाम है- प्रेमिका पान सेंटर। इंटरनेट पर एक फोटो काफी वायरल हुई थी, लिखा था- पागल पान भंडार। मोदी टी स्टॉल नाम भी जगह-जगह देख सकते हैं। अब इस टपरी वाले को ही देखिये, नीयत कितनी नेक है- गुटखा की अपनी दुकान का नाम रखा है- द कैंसर हब। दुकानदार को पूरा भरोसा है कि ग्राहक इतना बुरा नाम रखने के बाद भी नहीं टूटेंगे।
तबादले से अधिक रद्द करने का खर्च
तबादले की अवधि खत्म होने के बाद भी संशोधन, और निरस्तीकरण का खेल चल रहा है। कई रोचक प्रसंग भी सुनने को मिल रहे हैं। हुआ यूं कि निर्माण विभाग के एक सब इंजीनियर ने मलाईदार प्रोजेक्ट में काम करने के लिए जुगाड़ बनाया है, और एक नेता के माध्यम से विभाग के प्रशासन पर दबाव भी बनाया। इससे अफसर नाखुश हो गए, और सब इंजीनियर का नाम तबादला सूची में डलवा दिया।
तबादले की सूची जारी हुई, तो सब इंजीनियर के होश उड़ गए। उसकी पोस्टिंग दूरस्थ आदिवासी इलाके में कर दी गई थी। इसके बाद सब इंजीनियर ने ट्रांसफर निरस्त कराने के लिए प्रभावशाली लोगों से संपर्क किया, तो उससे इतनी बड़ी डिमांड की गई कि इसकी प्रतिपूर्ति के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। मलाईदार प्रोजेक्ट की चाह में फंसा सब इंजीनियर फिलहाल तो मोलतोल में ही लगा है।
तौल मशीन का कमीशन, परेशान सप्लायर
प्रदेश के आंगनबाड़ी केन्द्रों में तौल मशीन की सप्लाई को लेकर काफी कुछ सुनने को मिल रहा है। हल्ला यह है कि सप्लायरों से 30 फीसदी कमीशन एडवांस में देने के लिए कह दिया गया है। कई सप्लायर असमंजस में है। वजह यह है कि प्रदेश में ईडी-आईटी की धमक बढ़ी है। छोटे मोटे कार्यों पर भी पैनी नजर है। केन्द्र की एजेंसियां पहले इतनी बारीक निगाह नहीं रखती थी। यदि किसी तरह शिकवा शिकायतें हुई, तो एडवांस डुबने का भी जोखिम है। ऐसे में सप्लायर फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रहे हैं।
भानुप्रतापपुर का भी भाग्य चमकेगा?
2018 के बाद प्रदेश में हुए चारों विधानसभा उप-चुनावों में से सिर्फ चित्रकोट सीट कांग्रेस के पास पहले थी, दंतेवाड़ा सीट उसने भाजपा से तथा मरवाही और खैरागढ़ सीट जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से छीनी। अब एक साल के बचे कार्यकाल के लिए भानुप्रतापपुर में उप-चुनाव हो रहा है। विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज मंडावी के आकस्मिक निधन से रिक्त हुई सीट पर प्रत्याशी ढूंढने प्रदेश कांग्रेस के नेता भानुप्रतापपुर दौरे पर जरूर हैं, पर सूचना यही है कि दिवंगत विधायक की लेक्चचर पत्नी सावित्री मंडावी को टिकट मिल रही है और अब तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया है।
018 में मंडावी ने भाजपा उम्मीदवार देवलाल दुग्गा को 26 हजार 600 मतों के भारी अंतर से हराया था। इस बार सहानुभूति का मामला ताजा भी है। उप-चुनावों के नतीजे प्राय: सरकार के पक्ष में झुके हुए मिल जाते हैं। इसी साल हुए खैरागढ़ उप-चुनाव में तमाम मजबूत परिस्थितियों के बाद भी कांग्रेस ने इसे जिला बनाने का वादा कर दिया। इसे भाजपा और जकांछ ने सौदेबाजी जरूर करार दिया, पर उनकी जीत की संभावना खत्म हो गई। अब भानुप्रतापपुर उप-चुनाव जिसे एक बार फिर 2023 के आम चुनाव का रिहर्सल कहा जा रहा है, में उठती आई जिला बनाने की मांग का क्या होगा यह देखना होगा। स्व. मंडावी भानुप्रतापपुर को जिला बनाने के समर्थन में रहे। सीएम से उन्होंने प्रतिनिधिमंडलों की कई बार मुलाकात कराई। यह कहना गलत नहीं होगा कि कुछ नवगठित जिलों से ज्यादा लंबे समय से यहां जिले की मांग हो रही है। लोग बीते 12 सालों से आंदोलन पर हैं। कई बार चक्काजाम, रैली और धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। भानुप्रतापपुर के लोगों को अब उम्मीद हो चली है कि खैरागढ़ की तरह उनको भी जिला मिल जाएगा। इस मामले में यदि कांग्रेस खामोश रही तो भाजपा कह सकती है, इस बार हमें वोट दो। सरकार आने पर हम बनाएंगे। मतदाताओं ने भाजपा की बात पर भरोसा कर लिया तो? वैसे भी भानुप्रतापपुर किसी एक दल का गढ़ नहीं रहा है। मतदाता बीते चुनावों में कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को चुनते आए हैं।
धान फसल पंजाब पर भी भारी
छत्तीसगढ़ में भी पंजाब की तरह ही पराली का निष्पादन बड़ी समस्या बन रही है। हरियाणा-पंजाब से धान की कटाई और मिंसाई के लिए बीते कुछ साल से बड़े-बड़े हार्वेस्टर गाडिय़ां आने लगी हैं। कटाई के लिए मजदूर नहीं मिलने और जल्दी काम होने के चलते इसकी मांग बड़े-मध्यम ही नहीं. छोटे किसानों में भी बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ के किसान पहले पराली को हाथ में हंसिया लेकर जड़ के पास से काटते थे, तब यह समस्या नहीं थी। पर हार्वेस्टर करीब एक फीट ऊंचाई से बड़ी तेजी से फसल काटता है, मिसाई भी हो जाती है। भैंस-बैल की जगह ट्रैक्टर और दूसरी मशीनों से खेती हो रही है, इसलिये पराली वे भी खेतों में जला रहे हैं। एनजीटी ने पूरे देश के लिए खेतों में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया है, इस पर 15 हजार रुपये तक का जुर्माना भी है। बीते दो साल से छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को गौठानों के लिए पैरा दान करने की अपील कर रही है, पर कोई असर नहीं हो रहा है। पंजाब में जब तक आम आदमी पार्टी सरकार नहीं थी, दिल्ली सरकार उसे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराती थी। अब पंजाब के सीएम ने कहा है कि हम धान उत्पादन घटाकर दूसरी फसलों को लेने का अभियान चलाएंगे, क्योंकि इसी को जलाने से प्रदूषण ज्यादा फैलता है। धान-चावल का देश में संकट भी नहीं है कि इसे ज्यादा उगाया जाए।
अब देखना होगा कि पंजाब सरकार को इस कोशिश का क्या नतीजा निकलेगा, पर छत्तीसगढ़ में तो तमाम प्रयोगों के बाद हर बार धान बोने का रकबा बढ़ता जा रहा है और खरीदने का रिकार्ड भी। पिछले कई सालों से धान की जगह दूसरी फसल लेने के लिए दिए जा रहे तमाम नगद प्रोत्साहन और उन फसलों का समर्थन मूल्य तय करने के बावजूद। हार्वेस्टर के आने के बाद तो धान खेत से सीधे सोसाइटियों में भेजने की सुविधा हो गई है, घर लाने की जरूरत भी नहीं।
धंधे में बेईमानी नहीं....
ग्राहकों का ध्यान खींचने के लिए दुकान ठेलों के आकर्षक नाम रखने का चलन है। मुखशुद्धि केंद्र नाम से पान-गुटखा की दुकानें हर शहर में मिल जाएगी। रायपुर में एक पान दुकान का नाम है- प्रेमिका पान सेंटर। इंटरनेट पर एक फोटो काफी वायरल हुई थी, लिखा था- पागल पान भंडार। मोदी टी स्टॉल नाम भी जगह-जगह देख सकते हैं। अब इस टपरी वाले को ही देखिये, नीयत कितनी नेक है- गुटखा की अपनी दुकान का नाम रखा है- द कैंसर हब। दुकानदार को पूरा भरोसा है कि ग्राहक इतना बुरा नाम रखने के बाद भी नहीं टूटेंगे।
चुनाव सोशल मीडिया पर भी
विधानसभा चुनाव में दस महीने बाकी रह गए हैं। ऐसे में कांग्रेस, और भाजपा के दिग्गज नेता चुनाव तैयारी में जुट गए हैं। चुनाव तैयारियों की व्यस्तता के चलते दोनों ही दलों के आर्थिक रूप से सक्षम नेताओं ने सोशल मीडिया हैंडल करने के लिए निजी कंपनियों की सेवाएं ले रहे हैं। प्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता ने तो एक चर्चित कंपनी को काम भी दे दिया है। खास बात यह है कि दोनों ही दलों के दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता, जिन्हें टिकट मिलने के दूर-दूर तक आसार नहीं दिख रहे हैं वो भी सोशल मीडिया में सक्रिय रहने के लिए कंपनियों से मोल भाव कर रहे हैं। कुल मिलाकर विधानसभा का चुनाव सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर भी जोर शोर से लड़ा जाएगा।
जाँच के चलते आँच से बचे
ईडी के छापों की खूब चर्चा हो रही है। अफवाहों का बाजार गरम है। एक खबर यह भी उड़ी कि एक अफसर की 80 एकड़ जमीन अटैच कर ली गई है। इसकी सत्यता की पड़ताल करने में लोग जुटे रहे, लेकिन इसकी पुष्टि किसी भी स्तर पर नहीं हो पाई।
ईडी की जांच की वजह से कई अफसरों को अभयदान भी मिल गया है। तबादले से ठीक पहले डीएमएफ से 30 करोड़ के भुगतान को लेकर एक कलेक्टर के खिलाफ विधानसभा में मामला जोर शोर से उठा। सीएम भी इसको लेकर गंभीर नजर आए। मगर इसी बीच प्रदेश में ईडी, और आईटी अफसर धमक पड़े। जांच-पड़ताल की वजह से कोई बड़ा फेरबदल नहीं हो रहा है। यही वजह है कि चर्चित कलेक्टर को हटाने के बारे में कोई बात नहीं हो रही है।
नाहक परेशान थे रेलवे अफसर...
त्योहारों के समय ट्रेनों को रद्द करने के फैसले को लेकर रेलवे को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। इसके बाद करीब 1 माह तक ट्रेन रद्द करने का सिलसिला रोक रखा गया था। यह दूसरी बात है की बहुत सी ट्रेनों के घंटों देर से चलने के कारण यात्रियों में रोष था। रेलवे को लेकर नाराजगी लोगों की कुछ कम हो रही थी कि शुक्रवार को फिर एक के बाद एक तीन प्रेस रिलीज जारी हुए और करीब 4 दर्जन ट्रेनों को रेलवे ने रद्द कर दिया। कई ट्रेनें बीच में ही समाप्त हो जाएंगी और कई बदले हुए रास्ते से गंतव्य तक पहुंचेंगी। रेलवे ने मुंबई हावड़ा और कटनी रूट दोनों ही ओर ट्रेनों को एक साथ रद्द किया है। पहले प्राय: एक रूट चालू रखी जाती थी ताकि लोग घूम-फिरकर गंतव्य तक पहुंच जाएं। पर इस घोषणा की तारीख पर लोगों का ध्यान गया। दरअसल हुआ यह कि रद्द करने की सूचना जारी करने के ठीक एक दिन पहले जेडआरयूसीसी की बैठक थी। इसमें सात सांसद हैं, जो तीन राज्यों से संबद्ध हैं। रेलवे को आशंका थी कि यदि पहले रद्द कर दिया तो सांसदों को बैठक में जवाब देते नहीं बनेगा। बैठक में वे हर बार की तरह अपनी उपलब्धियां नहीं बता पाएंगे। पर यह आशंका निर्मूल रही। सातों में से एक भी सांसद बैठक में नहीं पहुंचे। अब रेलवे अधिकारियों को लग रहा है कि नाहक ही ट्रेनों को रद्द करने में देरी की।

मैदान को उजाडऩे का खेल
यह मुंगेली जिला मुख्यालय का बैडमिंटन कोर्ट है। जब इनडोर स्टेडियम में इसे बनाया गया तो खिलाडिय़ों में बड़ा उत्साह था, अब भी खिलाड़ी आते रहते हैं, जो आए दिन यहां हो रहे आयोजनों को लेकर दुखी हैं। पहले जो अधिकारी थे वे खुद भी बैडमिंटन खेलने आ जाते थे पर अभी जो हैं उन्होंने इसे सिर्फ सभा और बैठकों का अड्डा बना लिया है। इसे बर्बाद करने में वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। विशेषज्ञों की देखरेख में मापदंडों के अनुसार बनाया गया लकड़ी का फर्श जगह-जगह शामियानों के लिए कीलें घुसा देने से खराब हो रहा है। राज्योत्सव का जश्न भी यहीं मनाया गया। पर इस जश्न से खिलाडिय़ों का शोक और बढ़ गया। ([email protected])
यह चुनाव तक जोंक सरीखा...
कसडोल की विधायक शकुंतला साहू का नया वीडियो उन्हें खासा नुकसान देने वाला है। इसमें वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच पर माईक पर बड़ी नाराजगी में बोल रही हैं, और वहां मौजूद कुछ असंतुष्ट लोगों को झिडक़ते हुए अपनी पार्टी की फजीहत भी कर रही हैं। सोशल मीडिया पर इस वीडियो को पोस्ट करके भाजपा मजा ले रही है। वे सभा के लोगों को कड़वी जुबान में कह रही हैं- तमाशा बना के रखे हो, इतने सालों में कांग्रेस और बीजेपी ने यहां परदेसिया लोगों को लाकर बिठाकर रखा था तब कुछ नहीं कहा, तब परदेसिया लोगों के तुलए चाट रहे थे...। इसके आखिर में इस वीडियो रिकॉर्डिंग में हरामखोर शब्द कहा जाता सुनाई पड़ता है। अब चुनाव के एक बरस पहले अगर कोई वोटरों को हरामखोर कहे, तो इससे चुनावी नतीजों में एक ही चीज की गारंटी हो सकती है। और इसके अलावा अपनी ही पार्टी के वहां से विधायक रहे नेता को परदेसिया कहना, उस भूतपूर्व विधायक को भी गाली है, और पूरी पार्टी को भी जिसने कि रायपुर के उस नेता को कसडोल से टिकट दिया था। अब सवाल यह उठता है कि अगर इस पार्टी के रायपुर के नेता को कसडोल में परदेसिया कहा जाएगा, तो फिर इटली से शादी होकर हिन्दुस्तान आईं सोनिया गांधी को परदेसिया कहने वाले देश के कुछ नेताओं की आलोचना क्या कहकर हो सकेगी? शकुंतला साहू वैसे भी कुछ दूसरी बातों को लेकर लोगों की आलोचना के घेरे में चले आ रही हैं, और यह ताजा वीडियो चुनाव तक उनका पीछा नहीं छोड़ेगा। भला कौन से वोटर अपने को तलुआ चाटने वाले कहलाना चाहेंगे?
उपचुनाव और उम्मीदें

भानुप्रतापपुर में कांग्रेस दिवंगत विधायक मनोज मंडावी की पत्नी को चुनाव मैदान में उतार सकती है। कांग्रेस में ज्यादा समस्या नहीं है, लेकिन भाजपा में खींचतान चल रही है। भाजपा के एक बुजुुर्ग नेता ने तो बाल काले करवा लिए हैं, और वो फिर से चुनाव लडऩे के उत्सुक बताए जाते हैं।
सुनते हैं कि एक रिटायर्ड अफसर ने भाजपा की टिकट के लिए काफी कुछ निवेश किया था, और एक महिला नेत्री के मार्फत कोशिशें भी की थी। लेकिन टिकट नहीं मिल पाई। मगर इस बार रिटायर्ड अफसर उम्मीद से हैं। उन्हें भरोसा है कि निवेश व्यर्थ नहीं जाएगा, और पार्टी प्रत्याशी जरूर बनाएगी। लेकिन वाकई ऐसा होगा, यह तो प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा के बाद ही पता चलेगा।
राज्यपाल की चुनाव पूर्व चिट्ठी

भानुप्रतापपुर विधानसभा टिकट की घोषणा के एक दिन पहले राज्यपाल की चिट्ठी ने हलचल मचा दी है। राज्यपाल ने आदिवासी आरक्षण की बहाली के मसले पर सरकार को चिट्ठी भेजी थी। आदिवासी सीट पर चुनाव के ठीक पहले पत्र को लेकर राजनीतिक निहार्थ तलाशे जा रहे हैं।
आदिवासी आरक्षण के मसले पर प्रदेश की राजनीति गरम है। भाजपा चुनाव में इस मसले को जोरशोर से उठाने की रणनीति बना रही है। भानुप्रतापपुर बस्तर के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र बिन्दु रहा है। ऐसे में राज्यपाल की चिट्ठी से भाजपा को चुनावी फायदे की उम्मीद भी है। मगर वाकई फायदा मिलेगा, यह तो चुनाव नतीजे के बाद ही पता चलेगा।
राज्योत्सव और विवाद
रायपुर में आदिवासी नृत्य महोत्सव, और स्थापना दिवस समारोह की गुंज प्रदेश से बाहर भी सुनाई दी। मगर जिलों में राज्य स्थापना दिवस का कार्यक्रम इस बार प्रशासनिक अफसरों के लिए परेशानीकारक रहा है। दो-तीन जिलों को छोड़ दें, तो ज्यादातर जगहों पर जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन की नाक में दम कर रखा था। कहीं आमंत्रण कार्ड में फोटो नहीं छपने पर विधायकों ने विवाद खड़ा किया, तो कहीं आमंत्रण पत्र देर से पहुंचने पर स्थानीय विधायक, और जनप्रतिनिधियों ने हंगामा खड़ा किया।
कुर्सियों में आगे पीछे करने तक को लेकर भी जिलों में वाद विवाद हुआ है। एक-दो जगहों पर प्रशासन की लापरवाही भी सामने आई है। एक जगह तो विधायक ने मंच पर अपने करीबी जनपद सीईओ के सास-ससुर को ही बिठा दिया था। बाद में कुछ नेताओं की आपत्ति के बाद उन्हें मंच से नीचे बिठाया गया। इस बार प्रशासन पर विधायकों, और स्थानीय नेताओं का दबाव कुछ ज्यादा ही नजर आया।
हालांकि भूपेश सरकार के कार्यकाल का एक तरह से आखिरी राज्योत्सव था। क्योंकि अगले राज्योत्सव के समय तो विधानसभा चुनाव चल रहा होगा, और उस समय कार्यक्रम चुनाव आचार संहिता के दायरे में होगा। तब जनप्रतिनिधियों की दखल नहीं रहेगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि अलग-अलग वजहों से ज्यादातर जगहों पर राज्योत्सव कोई अमिट छाप छोडऩे में नाकाम रहा।
असर सरकारी कामकाज पर..
मनी लॉड्रिंग केस की ईडी पड़ताल कर रहा है। आईएएस समीर विश्नोई, और दो कारोबारियों के साथ जेल में हैं। रायगढ़ कलेक्टर रानू साहू, और उनके पति डायरेक्टर माइनिंग जयप्रकाश मौर्य से ईडी के अफसर पूछताछ कर चुके हैं। रानू साहू पूरे हौसले से जांच का सामना कर रही हंै। फिर भी उन्हें लेकर कई तरह की चर्चा चल रही हैं।
रानू साहू पिछले चार दिन से दफ्तर में नहीं बैठ पा रही हैं। इससे अफवाह कुछ ज्यादा ही तेजी से उड़ रही है। गुरूवार को अफवाह उड़ी कि रानू साहू को ईडी ने हिरासत में ले लिया है। बाद में पता चला कि गुरूवार को रानू से पूछताछ नहीं हुई थी। दिक्कत यह है कि इन अफवाहों पर लगाम कसने के लिए न तो ईडी, और न ही सरकार कोई पहल कर रही है। इसका सीधा असर सरकारी कामकाज पर भी देखने को मिल रहा है।
लक्ष्मी जी सदा सहाय
तबादलों के इस सीजन में मंत्री स्टाफ ने भव्य दीपावली मनाई। मां लक्ष्मी, इन्हीं के घरों में खूब आई। इस साल के अनुभव और आवक को देखते हुए ये कहने लगे हैं कि लक्ष्मी सदा सहाय। निज सचिव, निज विशेष सहायक, ओएसडी ने पहले तबादला कराया फिर लक्ष्मीजी की मदद से रद्द भी। रद्द करने के प्रस्ताव तो सीएम दफ्तर के दहलीज भी नहीं पहुंचे। पढ़ाई-खिलाफ विभाग के एक ओएसडी ने तो कैंसिलेशन ऑफ ट्रांसफर के लिए छ: अंकों का रेट ही तय कर दिया था। हैसियतदारों ने करवाया भी। इसी तरह के दूसरे विभाग के सचिव, संयुक्त सचिव के भी दिन बहुर गए। डाटा एंट्री ऑपरेटर ग्रेड के इन कर्मियों के हाव भाव ही बदल गए। कहते घूम रहे है दीपावली अच्छी मनी।
कब तक सुरक्षित रहेंगे गणेश जी

पांच साल पहले दंतेवाड़ा जिले के बचेली वन परिक्षेत्र में 2994 फीट की ऊंचाई पर ढोलकल में स्थापित 10वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा पहाड़ी से अचानक गायब हो गई थी। लोगों ने बड़ी मुश्किल से खोज निकाला। उसे पहाड़ी से नीचे घने जंगल में गिरा दिया गया था। पड़ताल से पता चला कि मूर्ति पर पहले हथौड़े से प्रहार किया गया, फिर भी नहीं टूटी तो रॉड से फंसाकर नीचे गिरा दिया गया। यह चोरी की नीयत से किया गया या बैलाडीला और बस्तर की पहचान को नुकसान पहुंचाने के लिए, अब तक पता नहीं चला। घटना के पीछे नक्सलियों का हाथ होने की बात भी सामने आई थी, हालांकि उन्होंने इससे इंकार किया था। पुरातत्वविद् अरुण शर्मा और इंजीनियर तथा कारीगरों की टीम ने न केवल 56 टुकड़ों में बंट चुकी प्रतिमा को फिर से पहले की तरह स्वरूप देकर वापस पहाड़ी में उसी जगह पर स्थापित कर दी। इस घटना के बाद प्रशासन और पुरातत्व विभाग को सतर्क रहना था। अब भी ढोलकल की प्रतिमा तक पहुंचना और नुकसान पहुंचाना मुमकिन है। कुछ दिन पहले मूर्ति में जगह-जगह खरोच और उसमें कुछ नाम उकेरे हुए दिखे। इससे पुरातत्व और बस्तर को चाहने वालों में बड़ी नाराजगी है। जाहिर है सूने जंगल में स्थापित इस प्रतिमा से छेड़छाड़ करने वालों का पता नहीं चल पाया है। पर लोग यह सहज सवाल कर रहे हैं कि जब एक बार इस प्रतिमा को नष्ट करने की कोशिश की जा चुकी है उसके बावजूद इसकी सुरक्षा में इतनी लापरवाही क्यों? 2017 की घटना के बाद स्थानीय ग्रामीण युवाओं की टीम को मानदेय पर रखकर प्रतिमा की सुरक्षा और दर्शन कराने का काम सौंपने की योजना बनाई गई थी। अभी कुछ युवा यहां पर्यटकों की मदद करने मौजूद हैं, पर अधिकारिक रूप से नहीं। लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि प्रतिमा को रेलिंग से घेर दिया जाए, ताकि लोग प्रतिमा को छू न सकें। गाइड के साथ ही ऊपर जाना जरूरी किया जाए। माना कि पुरातत्व उपेक्षित सा विभाग है, पर क्या इन छोटे-छोटे खर्चों के लिए भी बजट नहीं है?
अच्छी साड़ी की नहीं, सम्मान की चिंता

राज्योत्सव में जगह-जगह रूठने मनाने का संकट खड़ा होता रहा। नवगठित मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के समारोह में स्थानीय नगर पालिका अध्यक्ष प्रभा पटेल नाराज होकर मंच के सामने जमीन पर बैठ गईं। दरअसल मंच और प्रचार सामग्री में उनकी तस्वीर गायब थी। मंच पर जो दो शाही कुर्सियां रखी गई थीं, उनमें एक मुख्य अतिथि डॉ. विनय जायसवाल व दूसरी उनकी पत्नी चिरमिरी नगर निगम की अध्यक्ष कंचन जायसवाल की थी। एसडीएम अभिषेक कुमार ने जमीन पर बैठीं नगर पालिका अध्यक्ष से मनुहार किया- मैडम अब आ भी जाएं मंच पर। आपने अच्छी साड़ी पहनी हैं, खराब हो जाएगी। पटेल ने कहा कि साड़ी की चिंता नहीं, सम्मान की बात है। सही है, सार्वजनिक जीवन में संघर्ष करना हो तो कपड़ों की चिंता कौन करे, मगर दिक्कत यह है कि यह संघर्ष सत्ता में रहते हुए करना पड़ रहा है।
वैसे सरगुजा के तीनों जिलों में कुछ न कुछ बात हुईं। बैकुंठपुर के कार्यक्रम में समर्थकों ने अपनी स्थानीय विधायक अंबिका सिंहदेव की उपेक्षा को लेकर नाराजगी जताई, यहां मुख्य अतिथि संसदीय सचिव गुलाब कमरो बनाये गए थे। अंबिकापुर में पारस नाथ राजवाड़े मुख्य अतिथि थे। यहां मंत्री टीएस सिंहदेव की उपेक्षा पर उनके समर्थक नाराज थे। इधर बिलासपुर में भी महापौर रामशरण यादव मंच के नीचे दर्शक दीर्घा में बैठे रहे, उन्हें मंच पर बुलाया गया ही नहीं, जबकि उद्घोषक की मेहरबानी से कई बिना ओहदे वाले भी मंच पर बैठ चुके थे। नाराज यादव की ओर जब आयोजकों का ध्यान गया तो उन्होंने मंच में जाने से ही इंकार कर दिया। कुल मिलाकर आयोजन किस तरह किया जाना है, किसे कितना वजन देना है किसे नहीं प्रशासन ने इसकी पूरी तैयारी की थी।
नीले निशान के लिए इतना खर्च?
ट्विटर एकाउंट को विश्वसनीय और प्रमाणित बनाने के लिए यूजर के नाम के साथ लगने वाले ब्लू-टिक के अब पैसे लगेंगे। ट्विटर के नए मालिक एलन मस्क ने जबसे यह ऐलान किया है, भारत में ट्विटर उपयोग करने वालों की तरह-तरह प्रतिक्रिया आ रही है। एक कहना है कि हम तो केबल कनेक्शन वाला 50 रुपये महीना बढ़ाने के लिए कहता है तो कनेक्शन काट देने के लिए कहते हैं। आप उम्मीद करते हैं कि हम अपने नाम के आगे ब्लू टिक लगाने के लिए 660 रुपये महीना देंगे? एक और यूजर का कहना है, आप तो पैसे डॉलर में लेंगे न, हमारी वित्त मंत्री जी से कहिए रुपये का गिरना रोकें, हम दो डालर ज्यादा देकर ट्विटर ब्लू टिक लेने के लिए तैयार हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि सीनियर सिटिजन्स जो ज्यादा वक्त सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताते हैं उन्हें ब्लू टिक फ्री किया जाए। लोग डिस्काउंट ऑफर और वन टाइम पेमेंट की बात कर रहे हैं। एक और प्रतिक्रिया है- कितने ही भिखारियों की पोल खुलने वाली है, ब्लू टिक लेकर बैठे हैं। 8 डॉलर चुकाने की जगह ब्लू टिक वापस करना पड़ेगा। बहरहाल, 90 दिन की डेडलाइन खत्म होने के बाद मालूम होगा कि ब्लू टिक परजेब ढीली करने कितने लोग रह गए हैं।
माथे पर किराये का मोरपंख
ट्विटर पर नए मालिक एलन मस्क के आने का फर्क दिखने लगा। वे पहले भी अपनी कंपनियों में कर्मचारियों का तेल निकालने के लिए जाने जाते थे, और यहां पर भी उन्होंने आधे कर्मचारियों की छंटनी का माहौल बना दिया है, और दिन में बारह घंटे, हफ्ते में सात दिन काम करने के लिए कहा है। इसके साथ-साथ उन्होंने ट्विटर पर ब्लूटिक नाम के एक दर्जे को भी खत्म सरीखा करने की मुनादी की है जो कि लोगों को उनके ओहदे या किसी खास कामकाज की वजह से ट्विटर से मिलता था। इसे बहुत से लोग ऊंची जाति के एक प्रतिष्ठा-प्रतीक की तरह मानते थे, और नए मालिक ने अब इसे भुगतान देकर खरीदने की योजना घोषित की है। हिन्दुस्तानियों को शायद यह छह-सात सौ रूपये महीने में मिलेगा, और जो लोग अब तक ट्विटर पर अपने को ‘ऊंची जाति’ सरीखा मानकर चलते थे, अब वह ब्लूटिक भाड़े पर ली गई प्रतिष्ठा हो जाएगा, जिसे उदार और प्रगतिशील लोगों के बीच अपमान का सामान अधिक माना जाएगा। अब हिन्दुस्तानियों के बीच ट्विटर पर प्रतिष्ठा का यह एक नया पैमाना रहेगा कि कौन भाड़े पर ब्लूटिक लेते हैं, और कौन उसे गैरजरूरी मानते हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो कि ब्लूटिक को आज माथे पर मोरपंख की तरह सजाकर चलते हैं, अब आगे वे इस मोरपंख का किराया देंगे, या आम लोगों की तरह रहेंगे, यह देखने की बात रहेगी।
आधार, अकाउंट और अब ओटीपी
श्रीमान वाई तो बिजनेसमैन हैं, उन्हें फोन पर आया मेसैज पढऩे की फुर्सत नहीं। घर का फोन भी कई बार व्यस्त होने के चलते नहीं उठा पाते। इधर श्रीमान एक्स भी काम पर अक्सर सुबह-सुबह घर से निकल जाते हैं। कई बार दौरे पर होते हैं, मोबाइल आउट ऑफ कवरेज भी मिलता है, पर अब उनके घर चूल्हा जलाने में दिक्कत खड़ी हो सकती है। सिलेंडर लेकर घर पहुंचा एजेंसी का कर्मचारी तब तक डिलीवरी नहीं देगा, जब तक उसे श्रीमान एक्स या वाई मोबाइल फोन पर आया ओटीपी नहीं बता देंगे। यह व्यवस्था आज से छत्तीसगढ़ सहित देश के कई हिस्सों में शुरू की जा रही है। दो साल पहले हरियाणा के करनाल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत यह व्यवस्था लागू की गई थी। पिछले साल से भोपाल सहित मध्य प्रदेश के कई शहरों में इसे प्रयोग में लाया गया। ये परेशानी वहां के उपभोक्ता भुगत रहे हैं। डिलिवरी बॉय अलग से दुखी हैं क्योंकि इनमें से कई लोग एजेंसियों में नियमित कर्मचारी नहीं हैं। ओटीपी लेने के इंतजार में कम घरों तक सिलेंडर पहुंचा पाएंगे, कमीशन कम बनेगा। मुखिया घर पर नहीं है, उनसे संपर्क नहीं हो रहा है तो घर में महिलाओं, बच्चों को ओटीपी प्राप्त कर कर्मचारी को बताने में परेशानी होगी। घरेलू गैस सिलेंडर पहले से ही आधार कार्ड और बैंक एकाउंट से लिंक है। घरेलू गैस सिलेंडर पर सब्सिडी तो घटते हुए अब 25-30 रुपये तक आ चुकी है, इसलिए उपभोक्ता कालाबाजारी क्यों करेंगे? पेट्रोलियम कंपनियों और खाद्य विभाग के अधिकारियों को कालाबाजारी रोकने के लिए मोटी तनख्वाह पर रखा जाता है, उन्हें एजेंसी संचालकों पर नजर रखनी चाहिए पर यह जिम्मेदारी निर्दोष उपभोक्ताओं के सिर पर डाली जा रही है। अब उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की महंगाई रुलाएगी या डिलिवरी लेने में परेशानी ज्यादा होगी, यह सवाल सामने है। लगे हाथ बता दें कि ऐसी ही सुविधाओं, सेवाओं से नागरिकों का हैप्पीनेस इंडेक्स भी तय होता है। इस वर्ष मार्च में यूएन ने भारत को 136वें स्थान पर रखा जो बेहद नीचे है।
एक नवंबर पर औपचारिकता...
छत्तीसगढ़ का स्थापना दिवस प्रदेश के बाहर से चुने गए हमारे राज्यसभा सदस्यों के लिए कितना महत्व रखता है इसकी पड़ताल के लिए उनके सोशल मीडिया पेज को देखा जाना चाहिए। और कोई अपेक्षा हो न हो, जाना जाए कि उन्होंने बधाई देने की औपचारिकता निभाई गई या नहीं। इनमें से एक सांसद राजीव शुक्ला छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में जरूर हैं, पर उनकी अधिक सक्रियता और पहचान बीसीसीआई में वाइस प्रेसिडेंट की है। इस समय हो रहे हिमाचल प्रदेश के चुनाव में भी उनको कांग्रेस ने प्रभार दिया है। इस समय उनके ज्यादातर ट्वीट इस समय चल रहे वर्ल्ड कप क्रिकेट और हिमाचल प्रदेश चुनाव को लेकर ही है। छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस पर एक नवंबर को उनके दो ट्वीट हैं। एक उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के ट्वीट को रिट्विट किया है, दूसरे में दो तीन लाइनों में छत्तीसगढ़ को बधाई दी है। दूसरी सांसद रंजीत रंजन ने दो लाइन की एक ट्वीट एक नवंबर को किया है- छत्तीसढिय़ा सबसे बढिय़ा। राज्य के निवासियों को दिल से बधाई। पेज देखने से पता चलता है कि पिछले कुछ दिनों से वे भारत जोड़ो यात्रा में सक्रिय हैं। ज्यादातर ट्वीट राहुल की यात्रा की तस्वीरों का है। तीसरे सांसद वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी का अधिकारिक ट्वीटर हैंडल पिछले कुछ महीनों से सक्रिय ही नहीं है। उनका आखिरी ट्वीट अगस्त महीने का दिखाई देता है, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार की जन-धन योजना पर छपी एक खबर को शेयर किया है। हो सकता है उन्होंने किसी दूसरे इससे आसान तरीके से राज्य स्थापना दिवस की खुशी जाहिर की हो, जो लोगों को पता नहीं चला है। पिछले साल जब उनका एकाउंट काफी सक्रिय था और अक्टूबर, नवंबर में कई ट्वीट होते थे तब भी छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस पर उनका कोई ट्वीट नहीं था। बीते एक साल में छत्तीसगढ़ पर उनका एक ही ट्वीट है-बिलासपुर में हुए उनके खुद के एक कार्यक्रम का।
छत्तीसगढ़ से दो अन्य राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम (कांग्रेस) और सरोज पांडेय (भाजपा) हैं। उन पर कोई सवाल नहीं।
मधुमक्खियों के हमले से बचने के लिए...

कोरबा जिले के एक आदिवासी बाहुल्य ग्राम नकटीखार में ग्रामीण अजीब समस्या से जूझ रहे हैं। एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें सडक़ सूनी है। इक्का-दुक्का ग्रामीण निकल भी रहे हैं तो सिर कंबल से ढंककर। दरअसल गांव की मुख्य सडक़ के किनारे एक पेड़ पर मधुमक्खियों ने डेरा जमा लिया है। शहद की चाह में कौवे और चील इन पर हमला करते हैं और भाग जाते हैं। इसके बाद मधुमक्खियां आसपास से गुजरने वालों को डंक मार रही हैं। ग्रामीणों को उपाय नहीं सूझ रहा है। मधुमक्खी के छत्ते को भी वे नष्ट नहीं करना चाहते। शहद समाप्त होने के बाद मधुमक्खियां खुद ही चली जाती हैं, वे इसी का इंतजार कर रहे हैं। [email protected]
अब कुम्हार पर कारखाने का हमला!
दीवाली में मिट्टी के दीयों की पुरानी परंपरा है, जो अब धीरे-धीरे आगे बढक़र कुछ छोटी-मोटी घरेलू मशीनों से भी बनने वाले दीयों तक आ गई है। लेकिन अब मामला कुछ और आगे बढ़ गया है। कांच के बर्तन बनाने वाली एक बड़ी कंपनी ने कांच के बने दीये बाजार में उतारे हैं जो कि छोटे से हैं, लेकिन 62-62 रूपये के हैं। अब जिन लोगों की तसल्ली बाजार के सबसे महंगे सामान लिए बिना पूरी नहीं होती है, वे तो कुम्हार के एक-दो रूपये के दीये छोडक़र 62 रूपये वाले दीये लेने लगेंगे, लेकिन क्या इसमें कोई समझदारी भी है?
जंगल में हवा है कि...

अफसरों के बीच अगले कुछ महीनों में एक और फेरबदल की सुगबुगाहट राज्य में चल रही है। रेरा के चेयरमेन विवेक ढांड जनवरी में रिटायर हो रहे हैं। और वन विभाग के मुखिया संजय शुक्ला मई में। इसके पहले वन विभाग के मुखिया रहे और बड़े कामयाब और माहिर अफसर माने जाने वाले राकेश चतुर्वेदी भी रिटायर होने के बाद से अब तक खाली बैठे हैं जो कि उनकी अब तक की साख के खिलाफ जाने वाली बात है। ऐसी चर्चा है कि वे छत्तीसगढ़ प्रदूषण निवारण मंडल के अध्यक्ष होकर जाना चाहते थे जहां अभी सुब्रत साहू हैं। इस कुर्सी के साथ यह शर्त जुड़ी हुई है कि अध्यक्ष को इंजीनियर होना चाहिए, और पर्यावरण के क्षेत्र में उसका अनुभव भी होना चाहिए, राकेश चतुर्वेदी के पास ये दोनों ही हैं, लेकिन सुब्रत साहू के पास दोनों में से एक भी नहीं हैं। फिर भी मामला अभी मुख्यमंत्री के स्तर पर थमा हुआ है।
अब रेरा में एक सदस्य की कुर्सी भी खाली है, और एक चर्चा यह है कि राकेश चतुर्वेदी को अभी वहां सदस्य बना दिया जाए, और ढांड के रिटायर होने के बाद उन्हें अध्यक्ष बना दिया जाए। दूसरी चर्चा यह है कि विवेक ढांड अपने जाने के बाद अपने सबसे पसंदीदा अफसर संजय शुक्ला को रेरा चेयरमेन देखना चाहेंगे, ताकि इस दफ्तर की निरंतरता बनी रहे। संजय शुक्ला को भी रिटायरमेंट के कुछ महीने पहले वन विभाग छोडक़र कई बरस के लिए रेरा आने में कोई आपत्ति तो हो नहीं सकती।
लेकिन फिलहाल यह पहली बार हुआ है कि वन विभाग के मुखिया के पास मुख्यालय के अलावा लघु वनोपज संघ का जिम्मा भी है। और सच तो यह है कि संजय शुक्ला अभी तक लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष ही हैं, और अरण्य भवन के मुखिया का जिम्मा उनका अतिरिक्त प्रभार बनाया गया है, जो कि बड़ी अटपटी बात है, और इसे प्रशासनिक नजरिये से तो एक कमजोर आदेश बताया जा रहा है। इन दो प्रभारों की वजह से वन विभाग के भीतर नीचे के लोगों में कुछ हैरानी और हताशा भी है कि नीचे के किसी एक अफसर को लघु वनोपज संघ का प्रभार दिया जा सकता था जो कि नहीं दिया गया है। ऐसा बताया जाता है कि संजय शुक्ला के काम से मुख्यमंत्री बहुत संतुष्ट हैं, और वे यह चाहते हैं कि संघ के शुरू किए गए काम रफ्तार से आगे बढ़ें, इसलिए अरण्य भवन का जिम्मा देते हुए भी उन्हें संघ का जिम्मा भी दिया गया है।
जनवरी तक वन विभाग के इन दो अफसरों का कुछ न कुछ होगा, और हो सकता है कि सबसे ऊपर के अफसरों में कोई एक फेरबदल और हो।
भालुओं का भ्रमण शहर में..

जंगल से लगे गांवों में भालुओं की आमद देखी गई है, पर बीते कुछ समय से वे शहरी इलाकों में भी घूमते दिखाई दे रहे हैं। नेशनल हाईवे क्रास कर कांकेर शहर के भीतर कल 3 भालू एक साथ घुसे। वे सडक़ पार कर आमपारा बस्ती की ओर जाते दिख रहे हैं। वहां से गायब होने के बाद भालू दिखे नहीं। बस्ती में लोग डरे हुए हैं कि कहीं वे छिपे न हों और अचानक हमला न कर दें। एक राशन दुकान को तोडक़र यह दल गुड़ शक्कर चट कर चुका है। स्थानीय लोगों पर कई बार ये भालू हमला कर चुके हैं। मरवाही, कोरबा वन मंडल और सरगुजा में भालू प्राय: ग्रामीणों पर हमला करते हैं। पर शहर की भीड़ भाड़ में अपनी जान को खतरे में डालकर भालूआ रहे हैं। वन विभाग तत्कालिक रूप से इन्हें खदेडक़र शहर से बाहर भी कर दे तो वे फिर नहीं आएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं। उनके आवास और भोजन की सुविधा क्या जंगलों में घट रही है, इस पर सोचकर स्थायी समाधान निकालना जरूरी होगा। कल ही शहर के बाहर कांकेर मे एक तेंदुआ भी सडक़ पर एक कार के सामने आ गया था। इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है।
सन्नाटे में राज्योत्सव

राजधानी में छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस का जैसा ताम-झाम दिखा है वैसा जिलों में नहीं देखा गया। खासकर नए बने जिले मानपुर-मोहला-अंबागढ़ चौकी में तो स्थिति हास्यास्पद हो गई थी। मिनी स्टेडियम में हजारों कुर्सियां रखी गई थीं। उद्घाटन में गिनती के 20-25 दर्शक भी नहीं पहुंचे। पंडाल, माइक और साज-सज्जा पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं सो खाली कुर्सियों को विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी शासन की योजनाओं के बारे में बताते रहे। विभागों के स्टाल भी दर्शकों के लिए तरसते रहे। जानकारी आ रही है कि इस कार्यक्रम में विधायक इंद्रशाह मंडावी और छन्नी साहू को मुख्य अतिथि और अध्यक्ष के तौर पर बुलाया गया था। पर दोनों ही नहीं पहुंचे। विधायक साहू की तरफ से बताया गया कि उन्हें आयोजन के बारे में तो कुछ देर पहले ही बताया गया, नहीं पहुंच पाईं। पंचायत के पदाधिकारियों और सरपंचों तक भी सूचना नहीं पहुंची। कुल मिलाकर नए जिले का पहला राज्योत्सव काफी फीका रहा। राजधानी के अफसरों के ध्यान में बात जाएगी तो किसी अदने अधिकारी कर्मचारी पर इस विफलता का ठीकरा फोड़ा जा सकता है।
यह नफरत है या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी तमाम सरकारों को यह चेतावनी दी है कि अगर उनके इलाकों में नफरत फैलाई जाती है, और उन जगहों के अफसर खुद होकर जुर्म दर्ज नहीं करते हैं, कार्रवाई नहीं करते हैं, तो इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। लेकिन देश मेें नफरत फैलाने का काम इतना जोर पकड़ चुका है कि सुप्रीम कोर्ट की किसी को कोई परवाह नहीं रह गई है। अभी छत्तीसगढ़ में एक हिन्दूवादी वेबसाईट ने एक एप लांच किया है, और हिन्दुओं को उससे जुडऩे का न्यौता दिया है। इसने अभी यह आरोप पोस्ट किया है कि छत्तीसगढ़ के हर जिले, ब्लॉक, और जनपद में भूपेश सरकार जमीन अधिग्रहण करके रोहिंग्या मुसलमानों, और बांग्लादेश, पाकिस्तान के लोगों को आबंटित कर रही है। इस पोस्ट में हिन्दुओं को जगाते हुए लिखा गया है- हिन्दू तुम सोए रहो कांग्रेस तो देश बेच रही है मुस्लिमों के हाथों। अब यह राज्य सरकार को सोचना है कि उस पर लगा यह आरोप सच है, या ऐसी पोस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू होता है?
गलतियों का रिकॉर्ड
अभी आरएसएस से जुड़े दिखते एक संगठन, जम्मू-कश्मीर फोरम ने बिलासपुर में एक आयोजन किया तो कार्ड पर मुख्य अतिथि के रूप में बिलासपुर हाईकोर्ट के एक जज, कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का कुलपति बताते हुए डॉ. मानसिंह परमार, विशेष पुलिस महानिदेशक दुर्गेश महादेव अवस्थी सहित कुछ और नाम भी छपे। लेकिन हाईकोर्ट के वेबसाईट के मुताबिक जस्टिस चन्द्रभूषण बाजपेयी वहां जज नहीं हैं, वे 2017 में रिटायर हो चुके हैं। मानसिंह परमार कुशाभाऊ ठाकरे विवि के कुलपति नहीं हैं, यहां पर संघ परिवार से जुड़े हुए बलदेव भाई शर्मा कुलपति हैं। और राज्य के एक डीजीपी डी.एम.अवस्थी को स्पेशल डीजीपी भी गलत लिखा गया है, और उनका नाम दुर्गेश माधव अवस्थी है, जिसे दुर्गेश महादेव अवस्थी लिखा गया है। एक कार्ड में गलतियों का यह एक रिकॉर्ड दिख रहा है।
राज्य के लिए संघर्ष का साक्षी गुमनामी में

छत्तीसगढ़ राज्य का सपना स्व. पं. सुंदरलाल शर्मा और उनके समकालीन विभूतियों ने करीब 100 साल पहले देखा था। सन् 1965 में रायपुर में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रांतीय अधिवेशन में स्व. जीवनलाल साव की ओर रखा गया छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ। राज्य निर्माण की मांग को लेकर 28 जून 1969 को मध्यप्रदेश विधानसभा में पर्चा फेंककर सनसनी फैलाई गई थी। इस प्रदर्शन में रामाधार कश्यप, परसराम यदु के साथ मल्लू राम साहू को गिरफ्तार किया गया था। इनमें मल्लूराम साव अब भी हमारे बीच जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं। सहायक प्राध्यापक घनाराम साहू बताते हैं कि उन्होंने मोतीलाल साहू और कुछ अन्य मित्रों के साथ पिछले साल एक नवंबर को उनके घर लवन (बलौदाबाजार) जाकर उनका अभिनंदन किया था। इस बार भी साहू समाज ने उनका सम्मान उनके घर जाकर कल किया। एक नवंबर से फिर एक बार राज्य के निर्माण का उत्सव मनाया जा रहा है। अनेक पुरस्कार इस मौके पर दिए जाएंगे, कई लोगों को सम्मानित किया जाएगा, पर इनमें मल्लूराम साहू शामिल नहीं होंगे। प्रशासन ने अभिनंदन, सम्मान, पुरस्कार की सूची बनाते समय उन्हें याद ही कभी नहीं किया।
राज्योत्सव का बॉयकाट
सोशल मीडिया पर बॉयकाट आदिवासी नृत्य महोत्सव हैशटैग ट्रेंड कर रहा है। ट्विटर पर ट्रेंड हो रही पोस्ट में सन् 2012 के बाद लागू 32 प्रतिशत आरक्षण फिर से बहाल करने की मांग हो रही है। वैसे बीते वर्षों में भी बस्तर में हिंसा के सवाल पर आदिवासी नृत्य महोत्सव का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया था। पर आरक्षण का मसला ताजा होने और अगले साल होने जा रहे चुनाव के चलते इस बार विरोध कुछ अधिक दिखाई दे रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम और पूर्व सांसद सोहन पोटाई के नेतृत्व वाले छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज पहले ही प्रेस नोट जारी कर 1 से 3 नवंबर तक होने वाले इस समारोह के बहिष्कार की घोषणा कर चुका है। उन्होंने विधायक, सांसद और मंत्रियों के निवास पर नगाड़ा बजाने का ऐलान किया है। 15 नवंबर से बड़ा आंदोलन करने की तैयारी भी हो रही है, जिसमें रेल रोको, आर्थिक नाकाबंदी आदि की चेतावनी दी गई है। इसके बाद आरक्षण नहीं तो वोट नहीं का कैंपेन भी चलाया जाएगा। वैसे छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के अलावा समाज का एक अलग बड़ा संगठन भारत सिंह की अध्यक्षता में भी है।
पीएम की तस्वीर ठगी में...

दीपावली पर ठगों की तरफ से भी ऑफर निकला। अनेक वाट्सएप नंबर पर ये संदेश ऑडियो के साथ आया। केबीसी के महाप्रबंधक का बताते हुए एक फोन नंबर देकर वाट्सएप कॉल करने कहा गया। 25 लाख रुपये की लॉटरी लगने का झांसा दिया गया है। ज्यादातर लोग इस तरह के फ्रॉड को समझ जाते हैं, पर हजारों लोगों को चारा डालने में एक दो भी फंस गए तो जालसाज का काम तो बन ही जाएगा। बड़ी बात यह है कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का भी इस्तेमाल किया गया है।
भ्रष्ट, और मीडिया, दोनों की साख...
जिस वक्त कोई सरकारी जांच एजेंसी समय पर जानकारी जारी न करती हो, वहां पर अफवाहों को एक उपजाऊ खेत मिल जाता है। छत्तीसगढ़ में ईडी की कार्रवाई के इस मौजूदा दौर में अब तक ईडी ने कुल एक प्रेसनोट जारी किया है, इसके अलावा अदालत में एक या दो कागज लगाए हैं, लेकिन अफवाहों का बाजार इतना गर्म है कि लोगों को सनसनीखेज ‘खबरों’ की कमी नहीं रह गई है। और जिस तरह कोई कुटीर उद्योग चलते हैं, लोग घर पर बैठकर धागा बुनते हैं, पत्तल बनाते हैं, मसाला कूटते हैं, उसी तरह अब लोग खबरें गढ़ते हैं। और जिसकी खबर में झूठ का ताना-बाना जितना अधिक होता है, उतनी ही उस खबर की मांग बढ़ जाती है, क्योंकि सच कभी भी सनसनी में झूठ का मुकाबला नहीं कर सकता।
जिन लोगों से ईडी ने जितनी बार पूछताछ की है, उससे कई गुना अधिक बार की खबरें छपी हैं, पोस्ट होने वाली खबरों का कोई भरोसा करता होता तो अब तक दर्जनों गिरफ्तारियां हो जानी चाहिए थीं। लेकिन जितनी बड़ी-बड़ी रकम खबरों में आती है, उनकी वजह से चर्चा में आ रहे नामों से लोगों की हमदर्दी जाग ही नहीं पाती। जिनको मालूम भी है कि कई लोगों के बारे में खबरें झूठी चल रही हैं, वे भी यह मानकर चल रहे हैं कि वे कौन से दूध के धुले हुए लोग हैं जिनके बारे में सच लिखना जरूरी हो। कुल मिलाकर लोगों के पूर्वाग्रह, लोगों की बदनीयत, और लोगों की नफरत से झूठी खबरों को बढ़ावा मिल रहा है, और इनके खत्म होने का एक ही जरिया हो सकता था कि जांच एजेंसियां हर दिन कोई समाचार जारी करतीं, लेकिन उनके अपने काम में समाचार का कोई महत्व नहीं है। यह दौर है जिसमें मीडिया का कोई हिस्सा अपनी साख बचा भी सकता है, और कोई हिस्सा अपना कोई पुराना हिसाब चुकता करने के लिए अपनी साख को दांव पर लगा भी चुका है।
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना...।

जिन लोगों को यह लगता होगा कि देश की सबसे ताकतवर जांच एजेंसी ईडी के नाम पर हर किसी को दहशत होती होगी, उन्हें रायपुर जेल के बाहर का एक वीडियो देखना चाहिए जिसमें गिरफ्तार कोयला कारोबारी सुनील अग्रवाल को छोडऩे उनके पहचान के बहुत से लोग आए दिख रहे हैं। तमाम लोग हॅंस रहे हैं, अधिकतर लोग संपन्न और अतिवजनी कारोबारी दिख रहे हैं। ऐसी भीड़ के बीच से सुनील अग्रवाल आईएएस अफसर समीर विश्नोई के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें हॅंसाने की कोशिश करते हुए जेल के गेट की तरफ बढ़ रहे हैं। कैमरों के पीछे से मीडिया के लोगों की आवाजें आ रही हैं कि सुनील जी एक बार मुस्कुरा दीजिए, काफी खुश नजर आ रहे हैं। शायद ऐसी ही हालत के लिए किसी ने लिखा था, दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना...।
दफ्तरों में साफ-सफाई के मापदंड
स्वच्छता अभियान चलाना हो तो घर दफ्तर, गली में फैले कचरे की सफाई ही एक काम नहीं है। रुकी हुई फाइलों का निपटारा भी एक काम हो सकता है। सार्वजनिक उपक्रम एसईसीएल ने इस बार ऐसा ही किया है। प्रधानमंत्री ने 2 अक्टूबर को महीने, 15 दिन तक स्वच्छता अभियान चलाने की अपील लोगों से की थी। एसईसीएल ने अपने कॉलरीज के 45 स्थानों पर करीब 18 लाख 21 हजार वर्गफीट का कचरा हटाकर करीब 6 करोड़ रुपये का हजारों टन स्क्रैप बेच दिया। पर इससे भी अलग हटकर काम किया उसने आम लोगों की लंबित शिकायतों और फाइलों के निपटारे का। शिकायतें संख्या के हिसाब से कम, केवल 106 थीं, पर स्वच्छता अभियान के साथ इसे जोडऩा एक अलग बात हो गई। केंद्र व राज्य सरकार के दफ्तरों में वर्षों से शिकायतें लंबित रहती हैं। सफाई की बात आती है तो दराज़ और फाइलों को झाडक़र फिर उसी तरह फीते से लपेटकर रख दिया जाता है। कभी निपटारे के नाम पर यह भी होता है कि अर्जी एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रहती है। छत्तीसगढ़ सरकार के जन शिकायत विभाग के पोर्टल में दर्ज आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में अब तक 16 हजार 562 शिकायतें मिली हैं, पर एक दूसरे ग्राफ में बताया गया है कि लंबित शिकायतों की संख्या 33 हजार 976 है। यानि 17414 शिकायतें ऐसी हैं जो 10 माह से ज्यादा पुरानी हैं। [email protected]
पिता कांग्रेस और बेटा भाजपा में
चुनावी साल में जाने से पहले सूबे की कांग्रेस सरकार की कल जारी राजनीतिक पदों की नियुक्ति में राज्य अनुसूचित जाति आयोग में सदस्य बनाए गए बीएस जागृत के मनोनयन से बखेड़ा खड़ा हो गया है। कांग्रेस के भीतर उनकी नियुक्ति पर इस बात को लेकर रार छिड़ गया है कि उनका बेटा सौैरभ जागृत भाजपा में राष्ट्रीय और राज्य अनुसूचित जाति मोर्चा में ओहदेदार हैं। बताते हैं कि जागृत का सुपुत्र भाजपा के राष्ट्रीय अजा मोर्चा का कार्यकारिणी सदस्य है। साथ ही राज्य भाजपा के अजा मोर्चा में मीडिया सेल का प्रभारी है। जागृत कुछ साल पहले डीएसपी से रिटायर होकर बौद्ध समाज के बैनर तले अपनी सक्रियता बढ़ा रहे थे। वह कांग्रेस सरकार के नजदीकी नेताओं के जरिये पद पानेे जोर लगा रहे थे। सुनते हैं कि जागृत का पूर्ववर्ती भाजपा सरकार से भी करीबी संबंध रहा है। जागृत को अहम पद देने से पहले सरकार के रणनीतिकारों को उनके बेटे के भाजपा से जुड़े होने की जानकारी नहीं हो, इस बात को कांग्रेस के अंदर पचा पाना मुश्किल हो रहा है। पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में कानाफूसी हो रही हैै कि रसूख के दम पर पद-प्रतिष्ठा देने में सरकार आगे रही है। चर्चा है कि जागृत के बेटे के भाजपा में होनेे के कारण राष्ट्रीय और राज्य के नेताओं का उनके घर आना-जाना रहता है। मीडिया सेल प्रभारी रहते सौरभ का कांग्रेस सरकार की खिलाफत करना लाजमी है। वहीं पिता को कांग्रेस सरकार में संवैधानिक पद से नवाजे जाने को पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का हक छीनने से जोडक़र देखा जा रहा है। जागृत की कांग्रेस के भीतर बहुत ज्यादा सक्रियता नहीं रही है। उन्होंने सिर्फ पद पाने के लिए सामाजिक बैनर का बखूबी इस्तेमाल किया। पुत्र को भाजपा में जोड़े रखकर उन्होंने एक तीर से दो निशाने साध लिए।
बड़ा ताकतवर जिला है !
बलौदाबाजार-भाटापारा जैसे छोटे जिले के राजनीतिक महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां के आधा दर्जन से अधिक नेताओं को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला हुआ है। जिले में दो विधायक शकुंतला साहू, और चंद्रदेव राय हैं। दोनों ही संसदीय सचिव हैं। इससे परे बलौदाबाजार सीट से विधानसभा टिकट के दावेदार शैलेश नितिन त्रिवेदी, सुरेन्द्र शर्मा, और अब विद्याभूषण शुक्ला निगम के चेयरमैन बन गए हैं।
यही नहीं, कसडोल से टिकट के दावेदार रहे महंत रामसुंदर दास को गौ-सेवा आयोग का चेयरमैन बनाया गया है। बलौदाबाजार के ही लोकेश कन्नौजे को रजक कल्याण बोर्ड के चेयरमैन का दायित्व सौंपा गया है। चेयरमैन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल जाता है। ऐसे में कन्नौजे को भी कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलना तय है। जिले के कई और नेताओं को अलग-अलग निगम-मंडलों में जगह मिली है। इनमें नीलेश बंजारे अंत्यावसायी निगम, रोहित साहू को तेलघानी बोर्ड का सदस्य बनाया गया है। एक-दो और नेताओं को छोटे-बड़े निगम में जगह मिली है। कुल मिलाकर रायपुर, और दुर्ग के बाद बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में सबसे ज्यादा लालबत्ती धारी नेता हैं।
बागी तेवर हटाये गए
कई निगम-मंडल में बदलाव ही हुए हैं। मसलन, युवा आयोग के सदस्य अजय सिंह को हटाकर बीजापुर के ही प्रवीण डोंगरे को जगह दी गई है। अजय के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी। ऐसे में उन्हें हटाया जाना ही था। इसी तरह दिवंगत कांग्रेस दिग्गज महेन्द्र कर्मा के बेटे छबिन्द्र कर्मा की जगह गुरू खुशवंत गोसाई को औषधि पादप बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया। छबिन्द्र के तेवर बागी रहे हैं।
वो दंतेवाड़ा उपचुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनकी मां देवती कर्मा को प्रत्याशी बना दिया। इससे छबिन्द्र नाराज थे। बाद में पार्टी के बड़े नेताओं की समझाइश पर उन्होंने अपनी दावेदारी वापस ले ली थी। चर्चा है कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि कोई अहम दायित्व सौंपा जाएगा, और जब औषधि पादप बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया, तो उससे वो संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने पद छोड़ दिया। अब उनकी जगह नई नियुक्ति की गई।
भिलाई की महिला नेत्री तुलसी साहू को महिला आयोग के सदस्य पद से मुक्त कर बस्तर की बालो बघेल को उनकी जगह सदस्य बनाया गया है। तुलसी ने सदस्य पद पर अपनी नियुक्ति से खफा थीं, और वो आयोग के कामकाज से दूर रहीं। यही वजह है कि उन्हें पदमुक्त किया गया।
घर बुलाकर सम्मान
सिंधी समाज के एक दर्जन नेताओं को निगम-मंडल में जगह मिली, तो समाज के नेताओं का खुश होना स्वाभाविक था। खुशी मनाने वालों में भाजपा नेता श्रीचंद सुंदरानी भी थे। जिन्हें कुछ दिन पहले उनकी पार्टी के जिलाध्यक्ष पद से हटाया गया। सुंदरानी ने सिंधी अकादमी के नवनियुक्त चेयरमैन राम गिडलानी को अपने घर बुलाकर सम्मान किया।
गिडलानी को सिंधी पंचायत का उपाध्यक्ष बताया, जिसके अध्यक्ष खुद सुंदरानी हैं। ये अलग बात है कि गिडलानी सिंधी काउंसिल के महामंत्री हैं, और उन्होंने समाज सेवा का मौका देने के लिए काउंसिल का आभार माना। चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में सुंदरानी के कांग्रेस नेता का सम्मान करने को पार्टी पर दबाव बनाने की कोशिशों के रूप में भी देखा जा रहा है।
स्टीयरिंग कमेटी की सूची
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने पदभार संभालने के तुरंत बाद 47 सदस्यीय स्टीयरिंग कमेटी की सूची जारी की। इसमें छत्तीसगढ़ से किसी का नाम नहीं होना चर्चा का विषय बन गया। कहा जाने लगा कि कुछ नाम तो हैं, जो शामिल होने लायक थे। पर जानकार कह रहे हैं कि यह एक रणनीतिक फैसला था। प्रदेश में ढाई-ढाई साल के सीएम का विवाद खत्म न भी हुआ हो तो अभी कम से कम कुछ दब सा गया है। फिर अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी में बचे ही कितने दिन हैं? ऐसे में कोई भी नई नियुक्ति ताकत की एक नई धुरी बन जाएगी। इसलिए यहां से प्रतिनिधित्व टाल दिया गया। प्रदेश में भले ही छत्तीसगढ़ से प्रतिनिधित्व न होने की चिंता की जा रही हो पर राष्ट्रीय स्तर पर यह कोई मुद्दा नहीं है। स्टीयरिंग कमेटी में शशि थरूर, डीके शिवकुमार और मुकुल वासनिक जैसे नामों के गायब होने पर लोग ज्यादा बात कर रहे हैं।
भांजे एलन मस्क को बधाई..

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर को एलन मस्क ने खरीदना भारत में चर्चा का विषय बना हुआ है। उसके एक बयान की तारीफ हो रही है जिसमें उन्होंने कहा कि चिडिय़ा अब आजाद हुई। समझदार यूजर उनकी इस बात के अमल में आने का इंतजार कर रहे हैं। पर छत्तीसगढ़ में अति उत्साही लोगों की कमी नहीं है। सोशल मीडिया पर दीवार पर लिखा जा रहा एक स्लोगन वायरल हो रहा है जिसमें एलन मस्क को छत्तीसगढ़ का भांजा बताते हुए बधाई दी गई है। यह ठीक है कि दूरदराज के गांवों में यहां तक कि मिट्टी के घरों में रहने वालों तक भी ट्विटर पहुंच गया है पर किस लिहाज से वे भांजा हो गए? दरअसल, किसी दूसरे गांव से आए अपने से छोटी उम्र के लोगों को यहां प्रेम से भांजा कह दिया जाता है।
ऐसी रौनक, हौसले का सुबूत!
भारतीय जनता पार्टी का रायपुर का प्रदेश कार्यालय तो शहर सीमा के तकरीबन बाहर है इसलिए पार्टी की तमाम हलचल पुराने प्रदेश कार्यालय, और वर्तमान जिला कार्यालय में ही होते दिखती है। इस कार्यालय को जो रोजाना देखते हैं, उनका अनुभव है कि पिछले कुछ महीनों से यहां आने-जाने वाले लोग दर्जनों गुना हो चुके हैं, आसपास पार्किंग की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है, लगातार लोगों का आना-जाना चलते रहता है, और एक बड़े उत्साह का माहौल भाजपा में बना हुआ है। अब प्रदेश अध्यक्ष के बदले जाने से यह हुआ है या बहुत से दूसरे पदाधिकारियों के भी बदलने से ऐसा हुआ है, यह बात तो भाजपा के लोग बेहतर जानेंगे, लेकिन किसी पार्टी के दफ्तर में ऐसी रौनक पार्टी में उत्साह का एक पुख्ता सुबूत है। न तो भाजपा दफ्तर में रोज कोई बड़े नेता आ रहे हैं, न ही रोज कोई कार्यक्रम हो रहा है, फिर भी रेला लगा हुआ है। अब देखते हैं चुनाव तक इसमें से कितनी रौनक बरकरार रहती है। ऐसा भी नहीं कि अभी तुरंत कोई म्युनिसिपल चुनाव होने हैं, और वार्ड मेम्बर की टिकट पाने के हजारों उम्मीदवार यहां आ रहे हों, अभी पहले तो ठीक साल भर बाद विधानसभा के चुनाव होंगे, उसके कई महीने बाद संसद के चुनाव होंगे, और उसके बाद जाकर म्युनिसिपल चुनाव होंगे। इसलिए अभी से यह रौनक पार्टी के लिए हौसले की बात है।
भूपेश बघेल का बड़ा रिकॉर्ड!
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल साल भर बाद अपना कार्यकाल पूरा करते समय इस राज्य के सबसे अधिक दौरे करने वाले मुख्यमंत्री हो जाएंगे। हो सकता है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उनसे अधिक दौरे किए हों, लेकिन उस समय प्रदेश बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था, और भोपाल से मुख्यमंत्री अगर जशपुर तक पहुंचते थे, या जगदलपुर जाते थे, तो वह बड़ा लंबा दौरा वैसे भी हो जाता था। अब अविभाजित मध्यप्रदेश के मुकाबले एक चौथाई रह गए इस प्रदेश में भूपेश बघेल जितने किलोमीटर सडक़ और हवाई सफर कर रहे हैं, वह शायद एक रिकॉर्ड रहेगा। कितने दिन वे राजधानी से बाहर रहे, कितने दिन प्रदेश से बाहर रहे, यह गिनती लगाने की बात है। वे लगातार किसी एक या दूसरे प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार में लगे रहने वाले सबसे व्यस्त मुख्यमंत्री शायद बन ही चुके हैं। पिछला ऐसा कोई मुख्यमंत्री याद नहीं पड़ता जिसके कंधों पर दूसरे प्रदेशों का भी चुनाव प्रचार इस तरह टिका रहा हो। जिस तरह क्रिकेट में स्कोरबोर्ड देख-देखकर लोग रिकॉर्ड बनने और टूटने का हिसाब रखते हैं, राजनीति में भी कोई वैसा करे तो शायद भूपेश बघेल को खुश किया जा सकता है।
हाथी का साथी बनाना संभव है?
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बीते सप्ताह कोरबा में एक हाथी के शावक को मारकर दफना दिया गया। इसकी वजह यह थी यहां विचरण कर रहे 41 हाथियों के दल ने कई एकड़ में लगी फसलों को बर्बाद कर दिया। जिला पंचायत सदस्य जैसे जिम्मेदार लोग इस घटना में शामिल पाए गए हैं और एक दर्जन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। हाथियों की समस्या वर्षों से बनी हुई है लेकिन अब तक कोई ऐसा कारगर उपाय छत्तीसगढ़ में ढूंढा नहीं जा सका है कि हाथी और मनुष्यों का आपस में सामंजस्य बन सके। सरगुजा और कोरबा वन मंडल में मित्र दलों का गठन किया गया है जो बचाव के तरीके बताने और जागरूक करने के लिए सक्रिय हैं, पर नतीजे बहुत उत्साहजनक नहीं है। इधर सोशल मीडिया पर थाइलैंड का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसे दक्षिण भारत की एक आईएफएस सुशंता नंदा ने पोस्ट किया है। इसमें गन्ने के खेत में कीचड़ में फंसे हाथी के शावक को एक बच्ची बाहर निकलने में मदद कर रही है। बाहर निकलने के बाद हाथी बच्ची के सिर पर सूंड फेरकर आभार जता रहा है। यह दृश्य लोगों के दिल को छू गया। कमेंट लिखा गया है कि अपने देश में भी मान लेना चाहिए कि हमें हाथी के साथ ही रहना है। उनका भरोसा जीतना है। हाथी मनुष्यों के प्रति आक्रामक न हों, इसके उपाय सीखने चाहिए। अपने छत्तीसगढ़ में तो बहुत खूबसूरत गीत रेडियो पर बजता है- हमर हाथी, हमर दोस्त। पर वास्तव में जमीन पर हाथी को देखते ही लोग या तो बिदकते हैं, छेड़ते हैं या फिर कोरबा में हुई हाल की तरह मार डालते हैं।
चुनावी साल में भर्तियों पर रोक
आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद नई भर्तियों, नियुक्तियों और भर्ती परीक्षाओं को लेकर बनी अनिश्चितता ने लाखों बेरोजगारों को निराश कर दिया है। पीएससी के 171 पदों पर तो साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और बस चयनित उम्मीदवारों की सूची जारी करनी थी। 150 नए पदों के लिए फिर प्रारंभिक परीक्षा होने वाली थी, जिसकी अधिसूचना भी अभी नहीं निकलने वाली है। कृषि महाविद्यालयों की 700 सीटों पर काउंसलिंग की प्रक्रिया रोक दी गई है। बीएड और डीएलएड की 5000 सीटों पर प्रवेश की प्रक्रिया रुक गई है। उच्च शिक्षा विभाग ने सेट परीक्षा का प्रस्ताव रोक दिया है। कॉलेजों में 600 प्रोफेसरों की भर्ती प्रक्रिया भी रुक गई है। सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में चार साल पहले 75 हजार युवाओं ने भाग लिया था। कई कारणों से इसकी अंतिम सूची नहीं निकल पाई थी। अब तो उनके सब्र का बांध ही टूट गया है। इन युवाओं ने नवंबर के पहले सप्ताह में राजधानी में प्रदर्शन करने की भी तैयारी कर रखी है। विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं और सारी भर्तियां नियुक्तियां रुकी रहीं तो युवाओं की भारी नाराजगी सामने आ सकती है।
लंबी जांच के बाद पार्टी से बेदखल
खैरागढ़ उपचुनाव में भीतरघातियों को बाहर का रास्ता दिखाने से पहले भाजपा ने संगठन स्तर पर दो दौर की लंबी जांच की। उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी कोमल जंघेल की जीत को कठिनाई के रास्ते ले जाने की पार्टी के भीतर चली कतिपय भाजपा नेताओं की मुहिम पर पार्टी ने गंभीरता बरती। बताते हैं कि चुनाव प्रचार की कमान सम्हाले पार्टी के नेताओं ने निलंबित पदाधिकारियों की करतूतों को करीब से परखा। पार्टी के दिग्गज नेताओं की मौजूदगी की परवाह छोडक़र अंदरूनी तरीके से भीतरघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। पार्टी ने पिछले दिनों लुकेश्वरी जंघेल, रावलचंद कोचर जैसे आधा दर्जन नेताओं को काफी जांच-पड़ताल के बाद संगठन से बेदखल कर दिया। बताते हैं कि कांग्रेस नेताओं के साथ कथित सांठगांठ के दौरान भीतरघातियों की मेल-मुलाकात और उनके द्वारा दिए गए तोहफों पर प्रमाणिक तौर पर संगठन को सबूत मिले हैं। रावलचंद कोचर नांदगांव के भाजपा नेता खूबचंद पारख के सगे साले हैं। वह पहले भी दो बार पार्टी से निलंबित हुए हैं। पार्टी ने राजेश मूणत, केदार कश्यप, धरमलाल कौशिक, शिवरतन शर्मा जैसे दिग्गजों से मिली रिपोर्ट के आधार पर जांच का सिलसिले को आगे बढ़ाया। वहीं राज्य संगठन से आए देवजी पटेल, किरणदेव, नवीन मार्कण्डेय समेत चार सदस्यीय टीम ने पार्टी कार्यालय में छानबीन की। दोनों जांच में भीतरघातियों की भूमिका संदेहास्पद मानी गई। इसके लिए पार्टी ने छह माह का वक्त लेकर सभी की संगठन से छुट्टी कर दी। सुनते हैं कि भाजपा को हुए नुकसान से प्रदेश नेतृत्व अब तक उबर नहीं पाया है। लिहाजा संगठन ने सख्ती बरतते हुए बाहर का रास्ता दिखाकर कार्यकर्ताओं को एक तरह से नसीहत दी है।
कई बरस गुजर गए, सवाल जिंदा
विधानसभा चुनाव में दस महीने बाकी रह गए हैं। लेकिन भाजपा में अभी भी पिछले चुनाव के रिजल्ट पर ही बात हो रही है। क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल ने गुरुवार को रायपुर की चारों सीटों की संगठनात्मक गतिविधियों पर चर्चा के बीच फिर वही पुराना सवाल उछाल दिया कि हमें क्यों हार का सामना करना पड़ा? यह सवाल पार्टी के राष्ट्रीय नेता यदा-कदा पूछते ही रहे हैं।
इस बार कार्यकर्ताओं का जवाब भी अलग नहीं था। रायपुर उत्तर सीट में हार पर कहा गया कि रायपुर उत्तर की टिकट सबसे आखिरी में डिक्लेयर की गई। पराजित प्रत्याशी श्रीचंद सुंदरानी का नाम लिए बिना कहा गया कि उन्हीं को ही प्रत्याशी बना दिया गया, जिसके खिलाफ सबसे ज्यादा नाराजगी थी। रायपुर ग्रामीण में हार पर एक कार्यकर्ता ने कहा कि कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण शर्मा की हर घर में पहुुंच है। वो (सत्यनारायण) हमारे घर भी तीन बार आ चुके थे। उनकी सक्रियता के आगे भाजपा प्रत्याशी नहीं टिक पाए।
रायपुर पश्चिम में हार पर राजेश मूणत की मौजूदगी में कार्यकर्ता सीधा कुछ कहने से बच रहे थे तो अजय जामवाल ने भांप लिया, और कहा कि आप सभी खुद नेता हैं। संकेत साफ था कि किसी की टिकट पक्की नहीं है। इससे परे रायपुर दक्षिण के लिए जामवाल ने कहा कि जिन घरों में भाजपा का झंडा नहीं लगा हैं, वहां पहुुंच बनाना होगा। यानी पिछले चुनाव से ज्यादा मतों से जीत पर जोर दिया गया। खास बात यह रही कि करीब आठ घंटे चली बैठक में जामवाल ही बोले, बाकी जिले के बड़े नेताओं को अपना विचार रखने का मौका नहीं मिला।
खाली ट्रेन में तत्काल टिकट...

कई बार ऐसा होता है कि जब रिजर्वेशन कराते हुए तो सीट वेटिंग में दिखाई देती है पर सवार होते हैं तो कोच खाली मिलती हैं। ऐसा कैसे हो जाता है? एक यात्री को भोपाल से हैदराबाद होते हुए गुलबर्गा का सफर करना था। संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में जब उन्होंने लंबी प्रतीक्षा सूची देखी तो तत्काल श्रेणी की टिकट ले ली। उन्हें 500 रुपये अतिरिक्त किराया देना पड़ा। इधर, जब वे ट्रेन पर सवार हुए तो देखा कि पूरी कोच लगभग खाली है। यह स्थिति उनके सफर खत्म होने तक बनी रही। यानि ऐसा नहीं था कि आगे के स्टेशनों में बर्थ भरने वाली हो। थर्ड एसी ही नहीं, सेकेंड एसी में भी अधिकांश सीटें खाली थीं। यात्री को समझ नहीं आया कि रिजर्वेशन के दौरान वेटिंग किसलिए दिखाया जा रहा था। उन्होंने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया है कि क्या रेलवे की साइट में गड़बड़ी की जाती है और लोगों को तत्काल टिकट लेने के लिए मजबूर किया जाता है? कभी-कभी ट्रेनों में अतिरिक्त कोच की व्यवस्था जरूर की जाती है, पर तभी, जब वेटिंग लिस्ट लंबी हो जाए।
पड़ताल ऑफलाइन, खरीदी ऑनलाइन
दीपावली के दौरान इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिक और मोबाइल की दुकानों में दूसरी दुकानों की तरह भीड़ तो उमड़ी, पर उसके मुकाबले बिक्री कम हुई। ये ऐसे उत्पाद हैं जो ऑनलाइन ज्यादा पापुलर हैं। दुकान जाने से पहले दाम को ग्राहक ऑनलाइन चेक कर लेता था। जैसे ही दुकानदार भाव बताता वे मोबाइल फोन निकालकर ऑनलाइन कीमत सामने रख देता था। कई दुकानदारों ने उसी दाम या उसके कम दाम पर बेचे पर बहुत ने मना कर दिया। कई ग्राहक इससे भी ज्यादा चतुर निकले। कोई सामान उन्हें ऑनलाइन पसंद तो आता था, पर खरीदने से पहले सरल हिंदी में उसकी खूबियां-कमियां जान लेना चाहते थे। सामान की मजबूती भी हाथ से छूकर परखना चाहते थे। वे बाजार निकल गए, सामान देखा, उसकी खूबी जानी और हाथ झाड़ते हुए- बाद में आता हूं कहकर निकल जाता था। दुकान से निकलकर उसी सामान को वह ऑनलाइन मंगा लेता था। एक इलेक्ट्रिकल शॉप के मालिक का तो कहना है कि उसने दीपावली पर 80 फीसदी केवल झालर बेचे हैं। बाकी सामान सजे रह गए। झालर ही एक ऐसी चीज थी जो ऑनलाइन नहीं मिल रही थी। कहीं मिल भी रही थी तो चेक करके खरीदने का ऑप्शन नहीं था। बाकी सामानों के सर्विस सेंटर तो शहर में मिल जाते हैं पर झालर में तो गारंटी भी नहीं दी जाती।
बस्तर को लेकर कांग्रेस की चिंता
बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बस्तर की 12 में से 10 सीटें पहले ही जीत ली। बाद में भाजपा विधायक भीमा मंडावी के निधन और सांसद बनने के बाद खाली हुई दीपक बैज की सीट पर भी कांग्रेस ने जीत हासिल की। इस तरह से इस समय बस्तर की सभी 12 सीटें इस समय कांग्रेस के पास हैं। कांग्रेस का इन सीटों पर क्या वही प्रदर्शन रहेगा, जो पिछले चुनाव में था? 12 में से तीन सीट कोंटा, कोंडागांव और नारायणपुर ऐसी सीटें थीं, जिनमें हार जीत का फासला अधिक नहीं था। पर भानुप्रतापपुर, बस्तर और बीजापुर की सीटों में जीत 20-25 हजार से अधिक का अंतर था। पिछली बार बदलाव की लहर थी, जिसमें भाजपा साफ हो गई। इस बार वैसा दोहराव न हो- इसलिए वह पहले से ही सक्रिय हो चुकी है। पिछले 6 माह से भाजपा यहां सक्रिय हो चुकी है। प्रदेश स्तरीय बैठकें रखी जा चुकी हैं। अब 28 अक्टूबर से कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया और सप्तगिरी उल्का दौरे पर रहेंगे। प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम की सीट इसी संभाग से है तो वे तो रहेंगे। आदिवासी संगठन ग्रामीणों की हत्या और पेसा कानून में ग्राम सभाओं का अधिकार घटाने के विरोध में आंदोलन तो कर ही रहे थे, हाल के हाईकोर्ट के उस फैसले ने भी सत्तारूढ़ दल को चिंता में डाल दिया है जिसमें आदिवासियों का बढ़ा हुआ आरक्षण खत्म हो गया है। बस्तर का रुख 2018 वाला ही है या अब कुछ बदलने सा लगा है, इसका इशारा पुनिया और बाकी नेताओं को इस दौरे से मालूम हो जाएगा।
ग्राम पंचायत ने दिखाई है राह
छत्तीसगढ़ में शराबबंदी एक बड़ा मुद्दा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस शराबबंदी का वायदा करके सरकार में आई थी, और उसके बाद से अब तक इसके लिए बनाई गई सत्यनारायण शर्मा कमेटी साल-छह महीने में एकाध बैठक कर लेती है, और बात आई-गई हो जाती है। भाजपा भी कांग्रेस को शराबबंदी की उसकी घोषणा याद दिलाते हुए उसे बीच-बीच में कोंचती रहती है, लेकिन उसमें भी इतना राजनीतिक साहस नहीं है कि वह अगले चुनाव के बाद शराबबंदी करने की घोषणा अभी से कर सके। कांग्रेस के लिए तो अगला चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए चुनाव के कई महीने पहले से पूरी शराबबंदी कर देना जरूरी होगा क्योंकि पिछला वायदा उसने अभी तक पूरा नहीं किया है, लेकिन भाजपा तो आज से अगर सिर्फ घोषणा कर दे, तो उससे भी उसकी चुनावी संभावनाएं बढ़ जाएँगी। अब ऐसे माहौल में बेमेतरा जिले की एक ग्राम पंचायत ने अपने गांव में शराबबंदी कड़ाई से लागू की है। इसमें शराब बेचते हुए पाए जाने पर 51 हजार रूपये का जुर्माना रखा गया है, शराब खरीदते पाए जाने पर 21 हजार रूपये, बताने वाले को 10 हजार रूपये का ईनाम, और खुलेआम शराब पीते पकड़ाने पर 5 हजार का जुर्माना रखा गया है। ऐसे शराबियों की खबर देने वालों के लिए एक हजार रूपये का ईनाम भी रखा गया है। लोगों को याद होगा कि केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कुछ हफ्ते पहले यह घोषणा की थी कि केन्द्र सरकार ऐसा कानून बनाने जा रही है कि ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों की खबर देने पर चालान से जो जुर्माना मिलेगा, उसका एक हिस्सा ऐसे खबरची लोगों को भी मिलेगा। इस अखबार ने इस घोषणा के समर्थन में लिखा भी था कि सडक़ों पर नियम तोडऩे वालों की तस्वीरें और वीडियो बनाकर भेजने वालों को जुर्माने का एक हिस्सा मिलना चाहिए। बेमेतरा की इस ग्राम पंचायत ने यह शुरू भी कर दिया है, और जुर्माने का एक हिस्सा ईनाम की शक्ल में देने से लोगों में भी जागरूकता आ सकती है, और भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था के बजाय निर्वाचित पंचायत ऐसे पुरस्कृत होने वाले जनसहयोग पर अधिक निर्भर कर सकती है। अब देखना है कि आगे कितनी और ग्राम पंचायतें इस तरफ आगे बढ़ती हैं। (फोटो सोशल मीडिया से)
एमपी के मंत्री इसलिये नंगे पांव...

सरकार का हिस्सा बन जाने के बाद जनता की तकलीफें दिखाई तो देती है पर उसे स्वीकार करना मुश्किल होता है। सत्ता पक्ष के विधायक कभी-कभी सरकार की नाकामी को सामने ला भी दें पर मंत्री ऐसा नहीं करते। इधर पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के एक मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने ऐलान किया है कि जब तक ग्वालियर शहर की सडक़ें दुरुस्त नहीं हो जाती, वे जूते-चप्पल नहीं पहनेंगे। तोमर ने इस पर अमल भी कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार ने फंड जारी कर दिया है पर अफसर काम नहीं करा रहें। ग्वालियर शहर में सडक़ों की हालत बेहद खराब है। बार-बार कहने के बाद भी अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब वहां सडक़ों की मरम्मत का काम तेजी से हो रहा है।
दूसरी ओर छत्तीसगढ़ है,जहां सडक़ों के अलावा कानून व्यवस्था, अवैध रेत उत्खनन जैसे कई गंभीर मामले हैं, जिन पर सत्ता से जुड़े विधायकों को कोई मजबूरी बोलने से रोकती है। मध्यप्रदेश की इस खबर से दो बातें निकलकर आती हैं। एक तो चुनाव पास आने के कारण जनप्रतिनिधियों को नागरिकों की नाराजगी दूर करने की चिंता बढ़ रही है। दूसरी बात छत्तीसगढ़ की तरह ही मध्यप्रदेश में भी अफसरों की मनमानी से नेता परेशान हैं।
धान के किसान बढ़ते ही जा रहे
एक नवंबर से शुरू हो रही धान खरीदी के पहले जो आंकड़ा सामने आया है उससे यह बात निकलकर बाहर आ रही है कि हर साल लगभग 1 लाख किसानों की संख्या बढ़ रही है। इस बार 95 हजार नए किसानों ने धान बेचने पंजीयन कराया है। अब पिछले साल के 24 लाख 05 हजार की जगह 25 लाख किसान हो गए हैं। यह तब हो रहा है जब धान की जगह दूसरी फसलों को प्रोत्साहित करने की कई योजनाओं पर सरकार ने काम किया और लगातार धान की खेती का रकबा घटाया गया। बीते चार सालों में 9 लाख हेक्टेयर से अधिक धान का रकबा कम किया गया। पर इन्हीं चार सालों में हर साल किसानों की संख्या बढ़ रही है। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि परिवार में बंटवारा होने के बाद किसान अलग-अलग पंजीयन करा रहे हों लेकिन रकबा के साथ-साथ खरीदी का लक्ष्य भी बढ़ रहा है। इस बार 110 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी की जानी है, जो बीते साल के मुकाबले करीब 17 लाख मीट्रिक टन हेक्टेयर अधिक है। यह स्थिति तब है जब फसल चक्र परिवर्तन के लिए रबी-खरीफ की लगभग हर फसल पर प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। समर्थन मूल्य भी इन फसलों पर घोषित किया गया है, ताकि बाजार न मिलने पर सरकार ठीक दाम पर खरीदने की गारंटी दे सके। दरअसल, धान की खेती के साथ किसानों को पीढिय़ों से जमा हुआ भरोसा है। इसके लिए उन्हें किसी प्रशिक्षण की अलग से जरूरत नहीं होती। कब जोताई करनी है, बीज डालना है, खाद का छिडक़ाव करना है और कब कटाई करनी है। सरकारी खरीदी और उसके साथ बोनस के चलते किसी बाजार में उन्हें भटकना नहीं पड़ता। यह मानी हुई बात है कि दूसरी फसलों में धान से अधिक आमदनी है। दूसरी फसलों के लिए प्रोत्साहन राशि और समर्थन मूल्य की गारंटी होने के बाद भी किसान तैयार नहीं हो रहे हैं। इसकी एक वजह यह है कि उन्हें कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी फील्ड पर जाकर परामर्श नहीं दे रहे। बीते साल मुख्य सचिव अमिताभ जैन ने कलेक्टरों के लिए आदेश निकाला था कि धान की उपज लेकर भी कम आमदनी पाने वाले किसानों के साथ बैठकर वे चर्चा करें और संवाद कायम कर दूसरी फसलों के फायदे बताएं। पर अब तक सुनाई नहीं दिया कि किसी कलेक्टर ने ऐसी कोई पहल की हो।
अब खडग़े से उम्मीद...

संविदा, अनियमित और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी धरना प्रदर्शन और आंदोलन के बाद भी चुनावी वादा पूरा नहीं होने के कारण सरकार से नाराज चल रहे हैं। अब उनकी उम्मीद कांग्रेस के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े पर आ टिकी है। उनको सोशल मीडिया पर बधाई देने के साथ-साथ वे पोस्टर, कतरन डालकर मांग कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार को उनका चुनावी वायदा निभाने के लिए कहें। खडग़े उनकी मांग सुनें न सुनें लेकिन इस बहाने राज्य सरकार का ध्यान खींचने का एक और मौका कर्मचारियों को मिल गया है। मांगों को जिंदा रखना और दबाव बनाए रखना जरूरी है, खासकर तब जब विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हों।
यह भी कोई दीवाली थी!
दीवाली छत्तीसगढ़ में कुछ सूनी-सूनी रही। कुछ सरकारी अफसरों, कारोबारियों, और नेताओं पर चल रही ईडी की जांच के चलते बहुत से लोगों को सांप सूंघा हुआ है। आमतौर पर अफसरों की जिन बस्तियों में दीवाली के तोहफे लिए भीड़ लगती थी, वहां सन्नाटा था। तोहफे भेजने वाले लोगों ने भी सावधानी से कुछ मिठाई वगैरह भेज दी, कुछ महंगा सामान नहीं भेजा। ऐसे ही इलाके से एक अफसर दीवाली पर चाय पीने आए, तो उन्होंने कहा कि अभी उनकी कॉलोनी में बाहर से सामान आ कम रहा है, बाहर ज्यादा जा रहा है। बहुत से अफसर जिन्हें कुछ आशंकाएं हैं, वे घर का बहुत सा सामान इधर-उधर कर रहे हैं, और सामान ऐसा जाते हुए दिख रहा है। एक बड़े अफसर ने महंगी शराब की कुछ बोतलें एक परिचित को दीवाली पर तोहफे में भेज दीं, तो पाने वाले भी हक्का-बक्का रह गए। खतरा कम है, दहशत अधिक है। दहशत के साये में मनाई गई दीवाली भी भला कोई दीवाली हो सकती है? कई अफसरों की सांसें इसमें अटकी हुई हैं कि जिन तीन आईएएस अफसरों से पूछताछ हुई है, उन्होंने और किनके नाम बताए हैं? प्रदेश सरकार के जिस चिप्स नाम के संस्थान पर ईडी ने जांच शुरू की है, वह पिछली सरकार के समय से बदनाम चले आ रहा दफ्तर है जहां से सरकारी टेंडरों को लेकर तरह-तरह का खेल होता था, कभी सर्वर डाउन होता था, तो कभी जानकारी लीक होती थी। इस बार ईडी की जांच में आज की सरकार का काम ही सामने आएगा, या पिछली सरकार का भी, यह भी देखने की बात होगी।
बस नाम ही काफी है
केन्द्र सरकार की जांच एजेंसी ईडी के नाम की दहशत ऐसी है कि वह अब किस्सों में बदलने लगी है। एक किस्सा किसी ने सुनाया कि एक बड़े निजी अस्पताल में भर्ती एक मरीज का कई लाख का बिल बन गया। जब उसने सरकारी अधिकारी को विभाग से मिलने वाले खर्च के बारे में पूछताछ की तो उससे विभाग का नाम पूछा गया। उसने अपने को ईडी का अधिकारी बताया तो अस्पताल ने उसका पूरा बिल ही माफ कर दिया, और नमस्ते करते हुए बिदा किया। उसे कई दिन तक समझ नहीं आया कि एजुकेशन डिपार्टमेंट का नाम सुनते ही अस्पताल के हाथ-पांव क्यों फूल गए।
यह घटना कहानी अधिक लगती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति या संस्था इतना बड़ा कद पा जाते हैं, तो उनके बारे में कहानियां तो चलने ही लगती हैं।
बोर्ड है पर सडक़ गायब

यह सरगुजा संभाग के मैनपाट के मार्ग की तस्वीर है। सिंचाई विभाग ने पर्यटन स्थल सेदम जाने के लिए बड़ा सा बोर्ड तो लगा दिया है। बोर्ड देखकर ऐसा लगता है कि जल संसाधन विभाग बने जलाशय तक जाने के लिए सडक़ बनाई होगी, पर उसमें कुछ भी काम नहीं हुआ है। सेदम और उसके बगल की पंचायत सुआरपारा के पंचायत प्रतिनिधियों ने जब विभाग के लोगों से पूछा कि बोर्ड क्यों लगाया जा रहा है, तब बताया गया कि सडक़ बनाई जाएगी। पर बोर्ड लग जाने के बाद अधिकारी-कर्मचारी झांकने के लिए आए हैं। पर्यटक बांध तक उबड़-खाबड़ सडक़ नापकर पहुंचते हैं। पहले उन्हें पता नहीं था कि यह सडक़ किस विभाग की है पर अब यह बोर्ड बता रहा है।
सरगुजा में यह सब नया नहीं है। पिछले महीने ही रामानुजगंज के कार्यपालन यंत्री संजय ग्रायेकर को निलंबित किया गया था। यह बात सामने आई थी कि भू अर्जन के पौने नौ करोड़ रुपये एसडीएम के माध्यम से प्रभावितों के खाते में डालने थे पर ईई ने सेल्फ चेक जारी कर कई फर्मों और किसानों के खाते में पैसे डाल दिए।
राज्य से रॉ के मुखिया तक?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर रवि सिन्हा देश की सर्वोच्च खुफिया संस्थान रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के चीफ बन सकते हैं। रॉ के चीफ सामंत गोयल 30 जून को रिटायर हो रहे हैं। उनके उत्तराधिकारी के नामों पर मंथन चल रहा है। जिन नामों पर चर्चा हो रही है, उनमें रवि सिन्हा भी हैं।
रवि सिन्हा रॉ में स्पेशल डायरेक्टर के पद पर हैं। रवि सिन्हा दुर्ग, और रायपुर में एडिशनल एसपी रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कुछ दिन पीएचक्यू में भी पदस्थ रहे। इसके बाद वो केंद्र सरकार में चले गए, और फिर बाद में उनकी रॉ में पोस्टिंग हो गई। रवि सिन्हा केंद्र सरकार में डीजी पद के लिए भी इम्पैनल हो चुके हैं।
सिन्हा जब दुर्ग में एएसपी थे तब वहां अनिल धस्माना एसपी थे, जो कि बाद में रॉ में चले गए, और फिर रॉ के चीफ भी बने। यह भी संयोग है कि धस्माना के मातहत एएसपी के तौर पर काम कर चुके रवि सिन्हा का नाम रॉ के संभावित चीफ के रूप में लिया जा रहा है। हालांकि सिन्हा से ऊपर श्रीधर राव, और शशि भूषण सिंह भी है। नए चीफ को लेकर अगले कुछ महीनों में सारी तस्वीर साफ हो जाएगी। सिन्हा रॉ के चीफ बनते हैं, तो देश के सर्वोच्च खुफिया संस्थान में शीर्ष पद पर पहुंचने वाले छत्तीसगढ़ पुलिस कैडर के पहले अफसर होंगे। इसके पहले रायपुर से नौकरी शुरू करने वाले ऋषि कुमार शुक्ला एम पी के डीजीपी बनने के बाद सीबीआई के डायरेक्टर बन चुके हैं।
छापों के बीच वाह-वाही
ईडी के छापों की खबर सुर्खियां बटोर रही है। इन सबके बीच सीएम भूपेश बघेल ने दीवाली त्योहार को लेकर ऐसा कुछ किया, जिन्हें मीडिया में ज्यादा महत्व तो नहीं मिला, लेकिन लोगों की जुबान पर हंै। सीएम ने शहीदों के परिजनों तक दीवाली का उपहार और शुभकामना संदेश भिजवाया है।
दूर-दराज के इलाकों में सीएम का उपहार लेकर पुलिस के आला अफसर शहीदों के घर पहुंचे। पुलिस के आला अफसरों ने शहीद के परिजनों का कुशलक्षेम पूछा, और उन्हें सीएम का शुभकामना संदेश भी दिया। राज्य बनने से पहले, और बाद में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। यह शहीदों के परिजनों के लिए आश्चर्य, और शहादत पर गर्व का क्षण था। सीएम की इस पहल की खूब चर्चा हो रही है। लोग इस सरकारी पहल की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
बहुत कम लोगों को जानकारी है कि पूर्व आईएएस शेखर दत्त जब राज्यपाल थे, तब उन्हीं की पहल पर शहीदों की याद को अक्षुण रखने के लिए वीआईपी रोड पर शहीद वाटिका का निर्माण हुआ था। प्रशासनिक सेवा में आने से पहले सेना के अफसर रह चुके शेखर दत्त शहीद-परिवारों को लेकर काफी संवेदनशील रहे हैं। और तत्कालीन सीएस विवेक ढांड बीजापुर प्रवास के दौरान शहीदों के परिजनों का कुशलक्षेम पूछने उनके घर पहुंचे, तो इसकी जानकारी मिलने पर शेखर दत्त ने उन्हें फोन कर सराहा।
उन्हें नसीहत दी कि जब भी वो जिलों के दौरे पर जाए, तो शहीदों के परिजनों से मेल मुलाकात के लिए समय जरूर निकाले। ढांड ने काफी हद तक इसका पालन भी किया, लेकिन उनके बाद के अफसर तो दौरा करना ही भूल गए। कभी कभार विशेष मौकों पर ही अपने कक्ष से बाहर निकल पाते हैं। और अब जब सीएम के निर्देश पर शहीद-परिवारों की सुध ली जा रही है, तो तारीफ बनती ही है।
छोटे-छोटे बच्चे और सौ-सौ मोबाइल चोरी
राजधानी रायपुर के एसपी प्रशांत अग्रवाल और उनकी टीम ने अभी बहुत से लोगों को उनके गुमे हुए, या चोरी गए मोबाइल फोन लौटाए। पाने वाले लोगों की तस्वीरें बताती हैं कि बड़ी मामूली माली हालत के लोगों को भी उनके फोन वापिस मिले हैं जिन्हें पुलिस दूसरे प्रदेशों से भी ढूंढकर लेकर आई है। आज लोगों की जिंदगी में मोबाइल फोन कोई शान-शौकत नहीं रह गया है, बल्कि वह रोजाना की जरूरत है, और जो जितने गरीब हैं, उनके कामकाज के लिए वह उतना ही अधिक जरूरी है। इसलिए छोटे-छोटे कुछ हजार के मोबाइल भी अपने मालिकों के लिए बहुत मायने रखते हैं।
दो दिन पहले ही रायपुर के तेलीबांधा थाने मेें सुबह-सुबह आठ-दस बरस के एक बच्चे को लाया गया था जिसने दस-बारह मोबाइल चोरी किए थे। नाबालिग बच्चे को कोई सजा नहीं मिल सकती है, उसे अधिक से अधिक सुधारगृह में कुछ समय गुजारना पड़ता है, इसलिए कई लोग बच्चों को इस काम में झोंक देते हैं। थाने की एक महिला अफसर ने बताया कि कुछ वक्त पहले झारखंड के दस-बारह बरस उम्र के दो बच्चों को पकड़ा गया था, जिन्होंने रायपुर में सौ से अधिक मोबाइल चोरी किए थे, और उनके पास से वे सारे मोबाइल बरामद भी हो गए थे। दरअसल इस थाने के इलाके में बहुत सी होटलें हैं, और बहुत से विवाह मंदिर हैं, इसलिए वहां लोगों की भीड़ जुटती है, और वहां चोरी की गुंजाइश निकल आती है। झारखंड के उन बच्चों को भी सोच-समझकर इस काम में झोंका गया था।
लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान के कुछ शहरों में मोबाइल चोरी करते हुए बच्चे इसी तरह पकड़ाए थे, वे भी झारखंड के थे, और झारखंड के जामताड़ा नाम के गांव में साइबर-ठगी का काम गृहउद्योग की तरह चलता है, वहां पर घर-घर नौजवान बैठे हुए देश भर में फोन करके लोगों को ठगते हैं, उनके बैंक खाते साफ करते हैं, और इस काम के लिए उन्हें अलग-अलग मोबाइल फोन लगते हैं, इसलिए इस घरेलू जरूरत को पूरा करने के लिए झारखंड के बच्चों को देशभर में ले जाकर उनसे वहां चोरी करवाई जा रही है।
सौ कदम आगे चलते ठग

इन दिनों इंटरनेट और टेलीफोन की मेहरबानी से ठगी का कारोबार खूब चलता है। छत्तीसगढ़ में अभी लोगों को टेलीफोन आते हैं कि उनका बिजली बिल का भुगतान बचा हुआ है, और आधी रात उनकी बिजली बंद हो जाएगी, और इसके बाद उन्हें फोन पर भेजे गए किसी लिंक तक जाने को कहा जाता है, और उसके बाद उनके बैंक खाते से रकम ठगों के खाते में चली जाती है। लेकिन सरकारी नाम लेकर ठगने से परे अभी एक नया मामला सामने आया जिसमें लोग इंटरनेट पर ऑर्डर करके किताब खरीद रहे हैं, तो उन्हें वॉट्सऐप पर संदेश आ रहा है कि उनकी किताब पहुंच गई या नहीं? और यह पूछने वाले उन्हें लूटने वाले एक लिंक की तरफ ले जाते हैं। मतलब यह कि अमेजान जैसी निजी कंपनी, या उस पर किताब बेचने वाले लोगों से भी जानकारी निकलकर चोरों और ठगों तक पहुंच रही है। लगातार अपनी सावधानी बढ़ाने के अलावा लोगों के पास बचने का और कोई जरिया नहीं है।
अर्जी वाली दीदी सुधा भारद्वाज
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भीमा कोरेगांव मामले में तीन साल तक जेल में रहने के बाद अधिवक्ता व मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज पिछले जनवरी माह में ही जमानत पर बाहर आ चुकी थीं, पर अब जाकर वे पूरी तरह वकालत फिर से शुरू कर पाई हैं। रिहा होने के बाद उन्होंने बिलासपुर में अपनी बेटी से जो दो चीजें लाने के लिए कहीं, उनमें एक था काला कोट, दूसरा वकालत संबंधी दस्तावेज। महंगे मुंबई में ठिकाना मिलना बहुत कठिन था। कई बार बदलना पड़ा। आखिर अंधेरी में एक बेडरूम वाला फ्लैट उन्होंने किराये पर ले लिया है। यरवदा और बायकुला के जेलों में महिला कैदियों के साथ रहने के दौरान उन्होंने पाया कि विचाराधीन बंदियों की बड़ी संख्या है। इनकी कोई परवाह नहीं करता। इनके लिए वे जेल में ही अर्जियां लिखती थीं। महिला बंदी उन्हें अर्जी वाली दीदी के नाम से बुलाया करते हैं। पहला केस उन्होंने इसी जेल की एक महिला कैदी का लड़ा। सुधा भारद्वाज को इस शर्त पर कोर्ट ने जमानत दी है कि उन्हें मुकदमे की सुनवाई तक मुंबई में ही रहना होगा।
वाकई इसी तरह की चर्चा हुई होगी?
सरकार के मंत्री टीएस सिंहदेव, और रविन्द्र चौबे दो दिन पहले एक साथ बेमेतरा गए, तो कांग्रेसी हल्कों में खूब चर्चा हुई। सिंहदेव बेमेतरा के प्रभारी मंत्री हैं, और चौबे का विधानसभा क्षेत्र साजा इसी जिले में आता है। दोनों के साथ दौरे की खास बात यह थी कि सिंहदेव ने कार की स्टेयरिंग खुद संभाल रखी थी। बगल में चौबे जी बैठे हुए थे।
कार में दोनों ही थे। फालो-पायलेटिंग गाडिय़ां पीछे चल रही थी। ऐसे में दोनों के बीच गंभीर राजनीतिक चर्चा होने की खबर है। वैसे तो सिंहदेव, और चौबे विधानसभा में अगल-बगल ही बैठते हैं, लेकिन संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे। चौबे सीएम खेमे के अगुवा माने जाते हैं। और जब ढाई-ढाई साल के कार्यकाल को लेकर पार्टी के भीतर अंदरूनी खींचतान चल रही थी, तो चौबेजी ने सीएम के लिए विधायकों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई थी।
कई और मौकों पर चौबे के बयान से सिंहदेव असहज रहे हैं। अब विधानसभा चुनाव में साल भर से कम बाकी रह गया है, ऐसे में दोनों दिग्गजों की आपसी चर्चा को पार्टी के भीतर नकारात्मक राजनीति को खत्म करने की कोशिशों के रूप में भी देखा जा रहा है। क्या दोनों के बीच वाकई इसी तरह की चर्चा हुई होगी? इस पर फिलहाल तो कुछ कहना मुश्किल है।
सूची का इंतजार
निगम-मंडलों की सूची तो तैयार है, लेकिन यह जारी नहीं हो पा रही है। सरकार के एक मंत्री ने अनौपचारिक चर्चा में बताया कि सब कुछ फाइनल हो चुका है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के चार दिनी दौरे के बस्तर दौरे के बीच चर्चा कर जारी करने की तैयारी भी थी, लेकिन पुनियाजी का आना टल गया, और सूची भी रूक गई। अब दीवाली के बाद इसे हर हाल में जारी कर दिया जाएगा। दूसरी तरफ, संवैधानिक पद पर बैठे एक प्रमुख नेता ने पद पाने की लालसा में इधर-उधर भटक रहे एक नेता को कहा बताते हैं कि सूची अगले 3-4 महीने नहीं जारी होने वाली है। इसी बीच सहकारी समितियों में नियुक्तियों के लिए लेनदेन का ऑडियो भी वायरल हुआ है। ऐसे में सूची कब जारी होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन हो गया है।
दिल्ली से आकर जांच...
छत्तीसगढ़ में इन दिनों दुर्ग पुलिस ने ऑनलाईन सट्टेबाजी के एक मामले में महादेव ऐप को पकडक़र कुछ छोटे-मोटे लोगों पर छोटी-मोटी कार्रवाई की है, और कई बैंक खातों से कुल मिलाकर एक-दो करोड़ की जब्ती की है, कुछ बिल्कुल ही महत्वहीन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इस ऑनलाईन सट्टेबाजी के महत्व को समझना हो, और उस पर होने वाली कार्रवाई की संभावना को देखना हो, तो कल शाम ईडी की पोस्ट की गई एक कार्रवाई को देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ईडी ने कल एक ऑनलाईन गेमिंग ऐप पर छापा मारा है, और उसे चलाने वाले रोमेन अग्रवाल नाम के एक आदमी को गिरफ्तार किया है। मोबाइल ऐप चूंकि दुनिया भर में कहीं से भी डाउनलोड किया जा सकता है, और कहीं से भी सट्टे का दांव लगाया जा सकता है, इसलिए ईडी देश भर में कहीं भी उसकी जांच कर सकती है। और दुर्ग पुलिस की अब तक की कार्रवाई बड़ी हंडी से निकले चावल के एक दाने जितनी है, इसलिए अभी इस मामले में बड़ी संभावनाएं बाकी हैं। दिल्ली से आकर महादेव ऐप की शुरुआती जांच-पड़ताल की जा रही है, और आगे-आगे देखें होता है क्या।
जितना रेट, उतना तो बजट नहीं!
पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित एक वक्त छत्तीसगढ़ के पड़ोस के नागपुर के अखबार संपादक-प्रकाशक थे, फिर वे धीरे-धीरे राजनीति में उतरे, और पिछले कुछ बरस से वे राज्यपाल हैं। उनके पारिवारिक व्यवसाय का एक अखबार छत्तीसगढ़ से भी निकलता है। उन्होंने अभी कहा कि वे पंजाब के पहले चार बरस तक तमिलनाडु में राज्यपाल रहे, और वहां पर विश्वविद्यालय के कुलपति की कुर्सी 40-50 करोड़ में बिकती थी। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा कि गवर्नर रहते हुए उन्होंने 27 कुलपति नियुक्त किए। उन्होंने यह बात पंजाब के संदर्भ में कही, और कहा कि यहां की सरकार को उनके अनुभव से सीखना चाहिए।
अब ट्विटर पर तो किसी खबर को लिखने के लिए गिने-चुने शब्दों की ही लंबाई रहती है। इसलिए दो ट्वीट में बंटे हुए इस समाचार को पढक़र बड़ा धोखा होता है। राज्यपाल ने यह साफ नहीं किया कि तमिलनाडु में कुलपति की एक-एक कुर्सी के लिए 40-50 करोड़ किसे मिलते थे, और साथ-साथ उन्होंने यह जिक्र जरूर किया कि उन्होंने 27 कुलपति नियुक्त किए। अब इन दो बातों को मिलाकर बड़ा गलत किस्म का मतलब निकलता है, और आज सुबह छत्तीसगढ़ के एक कुलपति ने फोन पर कहा कि 40-50 करोड़ तो उनके विश्वविद्यालय का सालाना बजट ही नहीं है, तमिलनाडु में यूनिवर्सिटी का बजट ज्यादा रहता होगा।
छत्तीसगढ़ में फूलों की खेती

छत्तीसगढ़ में फूलों का आयात कोलकाता और पश्चिम बंगाल के कुछ अन्य शहरों से होता है। त्यौहारों में गेंदे की बड़ी डिमांड होती है, जिसकी आपूर्ति वहीं से होती है। इन दिनों इसकी कीमत भी बढक़र दो- ढाई सौ रुपये किलो हो जाती है। पर अब छत्तीसगढ़ में भी तस्वीर बदल रही है। रायपुर, दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव के बाजार में छत्तीसगढ़ के फूलों की भी अच्छी आवक है। ये फूल दुर्ग जिले के नगपुरा तथा बालोद के कुछ स्थानों से हैं। स्थानीय व्यापारी इसे 60-70 रुपये में खरीद रहे हैं और बाजार में 100-120 रुपये किलो तक बेच लेते हैं। फायदा धान से कई गुना ज्यादा है। किसान 10-12 करोड़ रुपये तक के फूल एक साल में बेच लेते हैं।
चुनाव के पहले घर वापसी
भाजपा ने चुनावी तैयारियों की अगली कड़ी में निलंबित और निष्कासित नेताओं को पार्टी में वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। भिलाई, मनेंद्रगढ़, महासमुंद और रायगढ़ के कुछ नेता वापस आ चुके हैं। हालांकि खैरागढ़ उप-चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करने वाली लोकेश्वरी जंघेल और कुछ अन्य नेता अभी वापस नहीं लिए गए हैं। खैरागढ़ उप-चुनाव अभी-अभी हुआ है। मुमकिन है विधानसभा चुनाव के पहले उनकी वापसी हो जाए। वैसे खबर तो तब बनेगी जब दूसरे दलों के लोग भाजपा ज्वाइन करें।
अपनी बला टालने के लिए

छत्तीसगढिय़ा ओलंपिक में खेल के दौरान दो खिलाडिय़ों की मौत हो गई। एक घटना घरघोड़ा की है, दूसरी कोंडागांव की। दोनों ही मामलों में यह बात सामने आई कि एंबुलेंस नहीं मिलने की वजह से उन्हें घायल होने के बाद अस्पताल पहुंचाने में देर हुई। घरघोड़ा के मामले में तो खराब सडक़ को भी कारण बताया गया है। अब खेल के दौरान सुरक्षा के इंतजाम दुरुस्त रखने के बजाय अधिकारी खिलाडिय़ों से एक फॉर्म भरवा रहे हैं, जिसमें उन्हें घोषणा करनी है कि वे किसी हादसे के लिए खुद जिम्मेदार होंगे।
स्कूल शिक्षा में ट्रांसफर उद्योग
स्कूल शिक्षा विभाग के तबादले में जमकर लूट मची। कई लोग मालामाल हुए। एक मामला ऐसा आया जिसमें ऑर्डर जारी होने के पहले ही शिक्षक को प्राचार्य ने ज्वाइनिंग दे दी। पद नहीं होने के बावजूद किसी को भेज दिया तो कई जगहों पर पहले से ही अतिरिक्त शिक्षक होने के बावजूद और नए शिक्षकों को स्थानांतरित कर दिया गया। कई ब्लॉक और जिला शिक्षा अधिकारी नियमित थे, उनकी जगह लेक्चरर को प्रभारी बनाकर भेज दिया गया। जशपुर में तो जिला शिक्षा अधिकारी अड़ गए हैं। यह कहते हुए वे नियमित डीईओ हैं, मुझे हटाकर किसी जूनियर को प्रभारी बनाकर यहां नहीं भेज सकते। शासन के नियम में ही नहीं है। इसी तरह सहायक शिक्षकों की पदोन्नति सूची में भी जमकर मनमानी की गई है। कांग्रेस सरकार के चार सालों में यह सबसे बड़ा ट्रांसफर अभियान था, जिसमें 5 हजार से अधिक लोगों की सूची निकली। सब तरफ चर्चा यही है कि जिसने जैसी बोली लगाई वैसा उनके साथ बर्ताव हुआ। इस बार ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए अब तक होते रहे लेन-देन के सारे रिकॉर्ड टूट गए। कहीं-कहीं तो नई नौकरी लगाने के लिए जितनी रकम खर्च करनी पड़ती थी, पसंदीदा जगह के लिए देनी पड़ी। अब हो यह रहा है कि जिन लोगों का प्रशासनिक आधार पर दूर-दराज फेंक दिया गया है, वे आर्डर कैंसिल कराने के लिए पूछ रहे हैं- कितना खर्च आएगा।
इस शिक्षक की व्यथा भी सुनें...

फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर एक शिक्षक सरकंडा बिलासपुर के शिक्षक राजेंद्रधर शर्मा का वीडियो वायरल हो रहा है। वे किडनी के मरीज हैं, सप्ताह में तीन दिन डायलिसिस पर जाना होता है। हैपेटाइटिस सी के भी मरीज हैं, इसलिए किसी-किसी डायलिसिस सेंटर में ही उन्हें सुविधा मिल पाती है। वे रोजाना ड्यूटी पर जाते हैं। यहां तक कि डायलिसिस लेना हो तब भी ड्यूटी पूरी करने के बाद सेंटर जाते हैं। इन्हें 150 किलोमीटर दूर एक गांव में भेज दिया गया है। टीचर हैरान हैं कि गंभीर बीमारी से पीडि़त होने के बावजूद वे पूरी ड्यूटी कर रहे हैं। शाला के प्राचार्य और छात्रों को भी उनसे कोई शिकायत नहीं है फिर भी उनके साथ यह बर्ताव क्यों किया गया। वे कह रहे हैं कि इस नई जगह पर ड्यूटी करने पर वे डायलिसिस नहीं कराने से वंचित हो जाएंगे और आखिरकार उनका जीवन खतरे में पड़ जाएगा। बताया जाता है कि सरकंडा में पदस्थ होने के लिए शर्मा की जगह विज्ञान के एक दूसरे शिक्षक ने काफी एप्रोच लगाया था।
कॉलेज गर्ल का टी स्टाल...
मौजूदा दौर में युवा अपनी सोच बदल रहे हैं। वे हवा का रुख अपनी ओर किस तरह मोडऩे का हौसला रखते हैं, इसके दो उदाहरण आए हैं। जेएमपी कॉलेज तखतपुर के गेट के सामने एक 18 साल की लडक़ी चाय बेचते हुए दिखाई देती हैं। ये रत्ना साहू हैं, जो इसी कॉलेज की छात्रा है। अमूमन, कॉलेज में दाखिला लेते ही युवाओं की डिमांड बढ़ जाती है और माता-पिता उनके ऊपर हो रहे खर्चों को लेकर परेशान हो जाते हैं। दूसरी ओर बहुत से पालक तो लड़कियों को केवल इसलिये कॉलेज भेजते हैं कि नौकरी मिले न मिले, दूल्हा ठीक मिल जाए। ऐसे में छात्रा रत्ना साहू ने तय किया कि उसे अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालना है। साथ ही, वह नौकरी लेने के लिए, देने के लिए पढ़ाई करेगी। एक छोटी सी टी-स्टाल से ही सही, इसकी शुरूआत हो गई है। शुरू में जब उसने पढ़ाई के साथ चाय की दुकान भी चलाने का निर्णय लिया तो दोस्तों, सहपाठियों ने खूब मजाक उड़ाया। माता-पिता भी खुश नहीं थे। पर जब उसने पीछे हटने से मना कर दिया तो सब धीरे-धीरे साथ हो गए। रत्ना का कहना है कि वह यह देखकर मायूस होती है कि लोग ग्रेज्युएट, पीजी जैसी डिग्रियां लेकर नौकरी की उम्मीद में बरसों बेरोजगार बैठे रहते हैं, जबकि हमें अपने आसपास मौजूद अवसर के अनुसार उद्यम शुरू करने के बारे में भी सोचना चाहिए।
दूसरे हैं लोरमी के हेराम ध्रुव, जो देश में सबसे कठिन प्रतियोगी स्पर्धाओं में से एक जीईई एडवांस में सफल हुए। उनका एडमिशन बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में हुआ है। आदिवासी वर्ग से आने वाले इस युवा के माता-पिता मजदूरी करते हैं। आठवीं तक की पढ़ाई जैसे-तैसे हो गई। फिर हेराम घर की आर्थिक स्थिति को समझते हुए भाटापारा चले आए। वहां एक प्राइवेट नौकरी की और इसी से पढ़ाई का खर्च निकाला। बगैर कोचिंग के उसने तैयारी की और वे आईआईटी में दाखिला पाने में सफल हो गए। अपने गांव लछनपुर के आसपास हेराम अकेला ऐसा आदिवासी युवा है, जो आईआईटी में प्रवेश पा सका है। हेराम का दाखिला तो हो गया पर उसकी चिंता पढ़ाई पर आगे होने वाले खर्च को लेकर है। उसे लग रहा है कि जिस तरह से उसने 12वीं तक खुद के लिए खर्च जुटा पाया, आगे नहीं हो पाएगा। उसने सीएम और शिक्षा मंत्री से मदद मांगी है।
ऑनलाइन फ्रॉॅड का जवाब
ऑनलाइन फ्रॉड के अनेक तरीकों में से एक है बिजली कनेक्शन काट देने के नाम पर डराना। एसएमएस या वाट्सएप पर मेसैज आएगा कि आज रात को आपके घर की बिजली, बिल भुगतान नहीं होने के कारण काट दी जाएगी। फिर एक फर्जी हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करने के लिए कहा गया है। ऐसे कई मामलों में एफआईआर प्रदेश के थानों में दर्ज की जा चुकी है और अब भी की जा रही है। इनमें कई पीडि़त ऐसे हैं जिनका बिजली बिल बकाया भी नहीं था। पर पुलिस और विद्युत वितरण कंपनी भी लोगों को अलर्ट कर रही है। इसका असर भी देखने को मिल रहा है। देखिए, एक फ्रॉड के एसएमएस का जवाब जागरूक उपभोक्ता ने किस तरह संक्षेप में गया है।
खडग़े का करीबी कौन?
पूर्व केन्द्रीय मंत्री मल्लिकार्जुन खडग़े के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश में राजनीतिक समीकरण में बदलने के कयास लगाए जा रहे हैं। खडग़े को ही छत्तीसगढ़ के सीएम के चयन के लिए पार्टी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया था, और उन्होंने सभी विधायकों से अलग से चर्चा की थी। खडग़े के करीबी कौन हैं, इस पर पार्टी के अंदरखाने में चर्चा भी हो रही है।
सुनते हैं कि गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू का मल्लिकार्जुन खडग़े से अच्छा तालमेल है। ताम्रध्वज को छत्तीसगढ़ में खडग़े का सबसे करीबी माना जाता है। खडग़े नेता प्रतिपक्ष थे, तब ताम्रध्वज प्रदेश से एकमात्र कांग्रेस सांसद थे। वो खडग़े की पहल पर पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। और तो और खडग़े ने दिवंगत मोतीलाल वोरा के सहयोग से सीएम पद के लिए ताम्रध्वज का नाम फाइनल करवा लिया था। ये अलग बात है कि विधायकों का समर्थन ताम्रध्वज के पक्ष में नहीं के बराबर था, और वो सीएम बनने से रह गए।
हालांकि कई नेता मानते हैं कि खडग़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से भी प्रदेश में कोई बहुत ज्यादा बदलाव होने की संभावना नहीं है। क्योंकि कोई भी अहम फैसला खडग़े, सोनिया और राहुल की सलाह से ही लेंगे। फिर भी कुछ लोगों का अंदाजा है कि ताम्रध्वज की थोड़ी बहुत पूछपरख बढ़ सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
दिल मिले, चुनाव करीब है

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस, और भाजपा के नेता सामाजिक मंच से अपने दल को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। सिंधी काउंसिल के बैनर तले गरीबों को निशुल्क दीया, और पूजन सामग्री वितरण का कार्यक्रम रखा गया था, उसमें श्रीचंद सुंदरानी, आनंद कुकरेजा, और राम गिडलानी प्रमुख रूप से मौजूद थे।
श्रीचंद को दो दिन पहले ही भाजपा जिला अध्यक्ष पद से हटाया गया है। उनका कांग्रेस नेता आनंद कुकरेजा से छत्तीस का आंकड़ा है। कुकरेजा जिस कार्यक्रम में रहते हैं, उसमें श्रीचंद नहीं आते। मगर इस बार न सिर्फ उन्होंने कुकरेजा, और गिडलानी के साथ मंच साझा किया बल्कि काउंसिल के प्रयासों की सराहना की। इस मौके पर सदाणी दरबार के प्रमुख युधिष्ठिरलाल ने भी कांग्रेस और भाजपा नेताओं की समाजहित में एकजुटता की तारीफ की।
दूसरी तरफ, निगम-मंडलों में नियुक्तियां होनी है। राम गिडलानी, आनंद कुकरेजा सहित कई सिंधी नेताओं के नाम तय होने की भी खबर है। ऐसे में आपसी मतभेद को भुलाकर एकजुटता दिखाने में ही सबको भलाई दिख रही है। श्रीचंद से जुड़े लोग भी मान रहे हैं कि पहले सामाजिक मंच से इस तरह की ताकत दिखाते, तो समस्या नहीं आती।
इधर डॉक्टर, उधर कंवर का बयान
प्रदेश में संगठन का प्रभार, प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष के बाद अब कई जिलो के अध्यक्ष भाजपा ने बदल दिए हैं। अब भी नहीं कहा जा सकता कि अब यह आखिरी फेरबदल है और विधानसभा चुनाव तक यही टीम काम करेगी। यह सब तो ठीक है पर टिकट देने का कौन सा फॉर्मूला होगा, ये भी तय नहीं है। इधर ननकीराम कंवर कह रहे हैं कि उन्हें टिकट तो पक्के तौर पर मिलेगी ही, लड़ूंगा, या नहीं- इस पर क्या बोलूं। उन्होंने यह भी बयान दिया है कि वे सीएम पद की इच्छा रखते हैं। राजनाथ सिंह से मांगा भी था। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बयान का लोग कुछ अलग ही मतलब निकाल रहे हैं। डॉ. सिंह ने कहा कि शीर्ष नेता तय करेंगे विधानसभा चुनाव लड़ाएंगे या फिर केंद्र में बुलाएंगे। डॉ. सिंह को यदि विधानसभा चुनाव लड़ाया गया तो जाहिर है कि उनको सीएम का चेहरा माना जाएगा। भाजपा के केंद्रीय नेता यहां बयान दे चुके हैं कि किसी एक चेहरे को सामने रखकर पार्टी मैदान में नहीं उतरेगी। मोहन मरकाम जैसे नेता कह रहे हैं कि भाजपा के सभी सीनियर लीडर्स की टिकट कटने वाली है। उलझन तो है। पिछले कुछ वर्षों से सीएम पद की चाह रखते आए कुछ वरिष्ठों की टिकट काट दी गई और कुछ को दे दी गई तो? फिलहाल कंवर की दावेदारी तो सामने आ ही गई है।
साख बचाने की चुनौती
छत्तीसगढ़ में ईडी की कार्रवाई से आखिर में जाकर बरसों बाद चाहे जिसे सजा मिले या न मिले, सच को सजा तो अभी से मिल रही है। हर घंटे कुछ न कुछ नई अफवाह सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर तैरने लगती है, जिसके दावे करने वाले लोग हिम्मती माने जाते हंै, और जिन पर शक करने वाले सरकार के या अफसरों के हिमायती मान लिए जाते हैं। हर कुछ घंटों में कहीं पर छापे, किसी की गिरफ्तारी, किसी के सरकारी गवाह बन जाने, और किन्हीं लोगों के बीच कोई समझौता हो जाने के दावे सामने आते हैं, और इनमें से अधिकतर फर्जी भी साबित होते हैं। ईडी हो, या इंकम टैक्स, ऐसी किसी भी एजेंसी को अपनी कार्रवाई चलते हुए हर दिन एक तय समय पर ताजा जानकारी लोगों के सामने रखना चाहिए ताकि अफवाहें जोर न पकड़ें। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि एजेंसियां ऐसी धुंध पसंद करती हैं, और वे सोच-समझकर अफवाहों पर चुप रहती हैं। बाजार में किसी एजेंसी के किसी सरकार को लिखी हुई चि_ी के चुनिंदा हिस्से फैलते हैं, दोनों ही पक्ष न इसे गलत बताते हैं, और न ही सही बताते हैं। नतीजा यह होता है कि पैदा हुई अफवाहोंं से सच को सजा मिलती रहती है। किसी भी तरह के जंग के मोर्चे पर पहली शहादत सच की ही होती है, आज केन्द्र सरकार की एजेंसियों, और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच जो खुली जंग चल रही है, उसमें भी यही हुआ है, दोनों ही तरफ से कुछ कहा नहीं जा रहा है, और यह चुप्पियां अफवाहों के लिए एक उपजाऊ जमीन साबित होती हैं।
आज भी सुबह से कुछ जाने-माने लोगों ने बस्तर के आधा दर्जन जिलों में सीआरपीएफ के साथ ईडी की छापामार टीमों के पहुंचने की बात पोस्ट की, लेकिन कई घंटों के बाद तक किसी को ऐसी टीमें नहीं दिखीं। बस्तर के पत्रकारों को भी तमाम चौकन्नेपन के बाद ही ऐसा कुछ नहीं दिखा, तो इसके बाद पत्रकारों के बीच ऐसी ‘खबरें’ जल्द ही मजाक का सामान बन गईं। यह मौका जिस तरह नेताओं और अफसरों के लिए अपनी साख बचाने का है, उसी तरह मीडिया, खासकर अखबारनवीसों के लिए भी अपनी साख बचाने का है। कौएं के पीछे दौडऩे के पहले रिपोर्टर अपने कान टटोल लें तो बाद में अपना लिखा हुआ मिटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
भाजपा में आते हैं, तो कैसा रहेगा?
सरकार के मंत्री टीएस सिंहदेव के राजनीतिक पैंतरेबाजी पर भाजपा की नजर है। सिंहदेव कई दफा कह चुके हैं कि वो कांग्रेस छोडकऱ कहीं नहीं जाएंगे, लेकिन पार्टी भाजपा के बड़े नेता बैठकों में उन्हें लेकर चर्चा जरूर करते हैं। पिछले दिनों प्रदेश भाजपा संगठन के कर्ताधर्ता अजय जामवाल सरगुजा गए, तो पार्टी के चुनिंदा पदाधिकारियों के संग बैठक में उन्होंने पूछ लिया कि टीएस सिंहदेव भाजपा में आते हैं, तो कैसा रहेगा?
बताते हैं कि थोड़ी देर तक तो बैठक में पार्टी के नेता एक-दूसरे का मुंह देखते रहे फिर पूर्व सांसद कमलभान सिंह बोल पड़े कि सिंहदेव अकेले नहीं आएंगे। उनके साथ लाल-लल्लूओं की टोली भी आ जाएगी। उनसे गांव वाले नाराज रहते हैं। ऐसे में सिंहदेव के भाजपा में आने से अच्छा मैसेज नहीं जाएगा। हालांकि कमलभान की बात से कई नेता असहमत थे। इससे पहले बात आगे बढ़ती, जामवाल ने विषय चेंज कर दिया।
विश्नोई की गुड गवर्नेंस !
छत्तीसगढ़ में ईडी की कार्रवाई को लेकर सियासी बयानबाजी से लेकर तमाम तरह के कयासों का दौर चल रहा है। आम लोगों की दिलचस्पी बरामदगी को लेकर है, तो सियासतदार का सरोकार आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है। ब्यूरोक्रेसी एकदम शांत है। कोई भी अफसर इस विषय पर चर्चा तक नहीं करना चाहते। उनका यह व्यवहार जायज भी है, क्योंकि सवाल तो उनकी ही बिरादरी के खिलाफ है। तीन-तीन आईएएस घेरे में है। इसमें से एक आईएएस समीर विश्नोई तो बुरे फंसे हैं। उनकी गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
समीर विश्नोई ऐसे बुरे फंसेंगे शायद उन्होंने खुद भी नहीं सोचा था। तभी तो इतनी बेफ्रिकी के साथ लाखों दबाए बैठे थे। समीर विश्नोई को तो गुड गवर्नेंस का चेहरा बनाया गया था। इस साल 11-12 जुलाई को केन्द्र सरकार ने बेंगलुरु में गुड गवर्नेंस पर कार्यशाला का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के बड़े और नामी आईएएस अधिकारियों ने शिरकत की थी। छत्तीसगढ़ से भी तीन आईएएस को वहां भेजा गया था। इसमें समीर विश्नोई भी शामिल थे। अब सवाल तो यही है कि समीर विश्नोई कौन सी गुड गवर्नेंस सीखने-सिखाने गए थे।
गुजरात का यह चराई मॉडल


इन दिनों छत्तीसगढ़ में हरियाली पसरी हुई है। इन्हीं दिनों गुजरात से निकले दर्जनों काफिले सैकड़ों ऊंट और हजारों भेड़ों के साथ राज्य के अलग-अलग जंगलों से गुजर रहे हैं। ज्यादातर भुज जिले से आते हैं। लोग इन बंजारों को सहानुभूति से देखा करते हैं। लोगों को लगता है कि जीवन-यापन के लिए इन्हें मीलों पैदल चलना पड़ रहा है। पर अब वन्य और वन्यजीव प्रेमी इनको मिली चराई की छूट पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। यह तस्वीर अचानकमार टाइगर रिजर्व जाने के रास्ते से ली गई है। जाहिर है ये जंगल में भी प्रवेश करेंगे। जंगल में चराई पर प्रतिबंध है पर जब सैकड़ों ऊंट, भेड़ बकरियों का डेरा वहां जमेगा तो यहां के सींग वाले जानवरों का चारा इनकी भेंट चढ़ जाएगा। गांवों के मवेशी भी आहार के लिए भटकेंगे। इनके परम्परागत पहनावे और रहन सहन को देखकर भ्रम होता है। पर आम धारणा के विपरीत इन ऊंट और भेड़ों के मालिक धनी होते हैं। ऐसा नहीं है कि गुजरात मॉडल का देश दुनिया में शोर मचाने वाली सरकारों को पता न हो कि उनके यहां अपने मवेशियों के लिए चारे का इंतजाम नहीं है। दिलचस्प यह है कि आम आदमी पार्टी ने जो अनेक चुनावी वादे इस चुनाव में किए हैं उनमें से एक यह भी है कि कच्छ की खाली जमीन पर मीलों तक चारागाह तैयार किए जाएंगे।
व्रत के बाद भोग का उत्सव...

मदिरा प्रेमियों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जो नवरात्रि पर्व पर संयम बरतते हैं। बार और शराब दुकानों की भी बिक्री घट जाती है। इसकी कसर निकालने का काम दशहरे के दिन से शुरू हो जाता है। दशहरा मिलन के नाम पर अलग-अलग नजारे दिखाई देते हैं। कोरबा जिले के कटघोरा में भोजपुरी द्विअर्थी गानों से सराबोर डांस प्रोग्राम रखा गया था। कटघोरा का पटवारी मंच पर नोटों का बंडल लेकर चढ़ गया। जो वीडियो वायरल हुआ है उसमें दिखाई दे रहा है कि वह नर्तकी पर नोट लुटा रहा है साथ में स्टेप्स मिलाकर डांस भी कर रहा है। इधर लोग देख रहे थे कि राजस्व मंत्री के जिले में कोई पटवारी अपने मनचलेपन का बेखौफ सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा है।
बिलासपुर में पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल के समर्थकों ने भी दशहरा मिलन कार्यक्रम रख। एक कांग्रेस नेता ने इसका एक वीडियो वायरल किया है- परदेशिया..., गाना मंच पर चल रहा है। पीछे की कुर्सी में बैठा एक दर्शक अपने थैले से बोतल निकालकर घूंट लेता जा रहा है। फिर अपनी जगह पर खड़े होकर नाचने भी लगता है। कांग्रेसियों ने तो इस पोस्ट को लेकर भाजपा की खूब खिंचाई की है, पर भाजपा के एक नेता ने इस पर सफाई दी कि उस कार्यक्रम में आने वालों की गेट पर कोई चेकिंग नहीं हो रही थी। कोई नजर बचाकर बोतल में शराब लेकर पहुंच गया और पीछे जाकर नाचने लगा तो हम क्या कर सकते हैं? [email protected]
कोयले से बड़ा महादेव?
एक-दो दिन की शांति के बाद आज फिर छत्तीसगढ़ में ईडी की हलचल दिखाई पड़ी है, और जिन अफसरों की जांच चल रही थी, उनके गांव-घर तक, गांव के बैंक तक, पटवारी तक ईडी का पहुंचना बाकी लोगों में भी हडक़म्प मचाने के लिए बहुत है। इसके साथ-साथ चूंकि ईडी की तरफ से अपनी कार्रवाई को लेकर कोई जानकारी दी नहीं जा रही है, इसलिए अफवाहों का बाजार गर्म है। लोग कई अफसरों के दिल्ली जाकर पूछताछ के लिए पेश होने की बात कह रहे हैं, तो कुछ दूसरे लोग यह शक जाहिर कर रहे हैं कि कौन-कौन से अफसर टूट सकते हैं, कौन से अफसर कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं। बीती रात एक खबर यह आई कि ईडी के सामने कोरबा कलेक्ट्रेट में पांच सौ करोड़ के डीएमएफ मामले में सवा सौ करोड़ का घोटाला सामने आया, लेकिन ईडी के अफसरों ने यह कहते हुए उसकी जांच से मना कर दिया कि वे हर तरह के भ्रष्टाचार की जांच के लिए नहीं आए हैं। कोरबा कलेक्ट्रेट की जांच में दिलचस्पी रखने वाले एक बड़े नेता ने इस पर कुछ लोगों को दिल्ली फोन करके नाराजगी भी जाहिर की है।
ऐसे छापों और जांच का दौर लोगों को एक मौका देता है कि किसके बारे में लिखकर उसके चमकाया जाए, किसे बदनाम करके कोई पुराना हिसाब चुकता किया जाए, और आज मीडिया और सोशल मीडिया में कई लोग इस काम में भी लग गए हैं। लेकिन ईडी की जांच के साथ-साथ एक और मामले में केन्द्र सरकार की एजेंसियों का दखल होते दिख रहा है, सट्टेबाजी के ऑनलाईन महादेव एप्लीकेशन पर। अभी तक इस महादेव की पूरी जानकारी लोगों के सामने नहीं आई है, और उस जानकारी के सामने कोयला और खनिज घोटाला छोटा लग सकता है।
बगल के आईजी का मैराथन रिकार्ड

मध्यप्रदेश के नक्सलग्रस्त बालाघाट रेंज के आईजी संजय सिंह देशभर के मैराथन में दौड़ लगाने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही दिल्ली में हुए एक मैराथन में उन्होंने एक घंटा 56 मिनट में 21 किमी की दौड़ बिना रूके तय की। उनके नाम कई और भी रिकार्ड हैं। आईजी से पूर्व डीआईजी रहते बीएसएफ में चार साल की प्रतिनियुक्ति में संजय सिंह ने एक लंबी मैराथन में भाग लेकर युवा नौकरशाहों के सामने मिसाल पेश की। बताते हैं कि बीएसएफ में पदस्थ रहते हुए आईटीबीपी द्वारा आयोजित तीन दिन में 200 किमी की दूरी को सिंह ने दो दिनों में पूरा कर दिया। 2004 बैच के आईपीएस संजय सिंह अच्छे मेलजोल के लिए महकमे में जाने जाते हैं। बालाघाट में सीएसपी, एसपी रहे सिंह को आईजी के तौर पर कुछ महीनों पूर्व पदस्थ किया गया। उनकी शारीरिक बनावट बेहद लचीली है। दौड़ लगाने के लिए वह हमेशा तत्पर रहते हैं। आईजी की मैराथन के प्रति गहरे लगाव को देखकर उनके मातहत उम्रदराज और युवा अफसर भी कसरत करने के लिए प्रोत्साहित हुए हैं।
एक और यादगार रिकार्ड उन्होंने ग्वालियर से शिवपुरी के बीच 120 किमी का सफर साइकिल से तय करके बनाया था। श्योपुर और शिवपुरी एसपी रहने के बाद सिंह ने 2010 में बालाघाट की बागडोर सम्हाली थी। छत्तीसगढ़ में उनके बैचमेट में बगल के दुर्ग रेंज के आईजी बीएन मीणा हैं। उनकी मीणा से गहरी छनती है। संजय सिंह के फेसबुक और वाट्सअप स्टेट्स में मैराथन की कई तस्वीरें मौजूद हैं। उनकी शारीरिक बनावट मौजूदा दौर के युवाओं से काफी मेल खाती है। बढ़ती उम्र के साथ सिंह ने अपने शारीरिक कसावट को बनाए रखा। मैराथन में दौड़ लगाने के लिए वह देश के अलग-अलग इलाकों में आए दिन पहुंचते हैं।
हिंदी में मेडिकल पाठ्यक्रम
छत्तीसगढ़ सहित उत्तर भारत के अनेक राज्य ऐसे हैं जहां अंग्रेजी लिखने, बोलने का वातावरण नहीं है। अंग्रेजी माध्यम में पढऩे वालों की अंग्रेजी भी अपने स्कूल-कॉलेजों तक सीमित होकर रह जाती है। अंग्रेजी पर व्यक्तिगत अभ्यास से ही लोग पकड़ बना पाते हैं, चाहे स्कूलिंग अंग्रेजी की हो या न हो। गैर-हिंदी भाषा-भाषी के राज्यों के युवाओं को शीर्ष प्रशासनिक पदों पर पहुंचने की एक वजह यह भी मान ली जाती है कि विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य, इंजीनियरिंग आदि पर ज्यादातर उत्कृष्ट किताबें अंग्रेजी में हैं। हिंदी के व्यापक प्रभाव को देखते हुए उसे राजभाषा का दर्जा तो दिया गया लेकिन सरकारी संस्थानों में खासकर केंद्र के विभागों, उपक्रम में हिंदी के जो शब्द गढ़े गए हैं वे आम बोलचाल के हैं ही नहीं। लोगों को लगता है कि इस हिंदी से तो बेहतर है, अंग्रेजी में ही बात समझ ली जाए। हिंदी पर बल देने के लिए हर साल पखवाड़ा मनाने के बावजूद इन दफ्तरों से ज्यादातर सर्कुलर अंग्रेजी में ही जारी होते हैं।
उत्तर प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश में हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई की शुरूआत हो गई है। कुछ हिंदी किताबों का केंद्रीय गृह मंत्री ने विमोचन किया। छत्तीसगढ़ में भी आने वाले दिनों में पढ़ाई शुरू हो सकती है। केंद्र सरकार इस बारे में घोषणा कर चुकी है। सिम्स बिलासपुर का इसके लिए चयन किया गया है। मेडिकल पाठ्यक्रम में अधिकतर तकनीकी शब्द रोमन (लैटिन) भाषा से लिए गए हैं। अंग्रेजी की किताबों में इन्हें बिना फेरबदल लिए गए हैं। यदि इनका हिंदी अनुवाद राजभाषा की तरह क्लिष्ट होगा तो हिंदी से भी छात्रों का मोहभंग होने लगेगा। वैसे सरकार ने अनुवादकों से तकनीकी शब्दों में ज्यादा फेरबदल नहीं करने के लिए कहा है। कुछ जानकार इस पर भी सवाल कर रहे हैं कि हिंदी माध्यम के छात्र क्या अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करने के योग्य शोध-पत्र तैयार कर पाएंगे? क्योंकि कोर्स से बाहर की जानकारी जुटाने के लिए तो अंग्रेजी किताबों का विस्तृत अध्ययन करना होगा। दक्षिण में इस बात का विरोध हो रहा है कि केंद्र सरकार हम पर हिंदी लादने की कोशिश कर रही है। यह केंद्र के उस बयान पर है जिसमें सरकारी कामकाज का माध्यम पूरे देश में हिंदी को बनाने की बात की जा रही है।
आम लोगों को दवाओं के अंग्रेजी नाम को लेकर चिंता है। इसका फायदा उठाकर कई डॉक्टर मामूली पेन किलर या डिहाइड्रेशन की दवा भी लिखते हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दे देते हैं। दवा की पर्ची तो मेडिकल स्टोर वालों के अलावा कोई समझ ही नहीं पाता। मध्यप्रदेश में हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई होने का असर कुछ डॉक्टरों पर तत्काल हुआ है। उन्होंने पर्ची के ऊपर आरएक्स की जगह श्री हरि लिखना शुरू कर दिया है। यह अलग बात है कि दवाओं के हिंदी नाम उन्हें अभी नहीं सूझ रहे हैं।
शॉपिंग मॉल के जूते
रायपुर के एक मीडिया कर्मी ने 9000 रुपये में रिबोक का ब्रांडेड जूता टिकाऊ समझकर खरीदा। उन्हें काफी दौड़-भाग करनी पड़ती है। मगर, कुछ ही दिन बाद जूते से रेशे निकलने लगे। मेगनेटो मॉल के शो रूम में वापस करने गए तो सेल्समैन ने बताया कि ऐसा शुरू में होता है, कुछ दिन में ठीक हो जाएगा। जूते पर तीन माह की गारंटी है, इंतजार तो करिये। अब जब जूते फटने लगे हैं तो सेल्समैन बात सुनने के लिए तैयार नहीं है। गारंटी तीन माह की ही है। उसके बाद खराब होने पर कंपनी किसी दावे को सुनेगी नहीं। सुनने में तो अभी भी वह टालमटोल कर रही है। सदरबाजार, मालवीय रोड की दुकानों में, जो कंपनियों की नहीं हों- शायद ऐसी परेशानी नहीं आती। अव्वल तो वह ब्रांडेड की जगह अपनी गारंटी पर कम कीमत में मजबूत जूता थमा देता। खराब निकल जाता तो दुकानदार जूते वापस लेकर कंपनी या डीलर को वापस भेज देता और ग्राहक बिगाड़ रहे हो- कहकर चार बातें सुना भी देता। फिलहाल, कंपनी को ग्राहक मीडियाकर्मी ने ट्वीट किया है। रुपये वापस करने या जूते बदलने की मांग की है। बात नहीं बनी तो कंज्यूमर फोरम भी जाना पड़ सकता है। इस तरह से उन्हें नुकसान की भरपाई तो हो सकती है पर इस चक्कर में जो परेशानी उठानी पड़ रही है उसका क्या?
महादेव ऐप के इर्द-गिर्द
छत्तीसगढ़ में महादेव ऐप नाम के ऑनलाईन सट्टेबाजी के एक एप्लीकेशन से जुड़े हुए कई लोग पकड़ाए, तो लोग हैरान भी हुए। यह मामला तो कई महीने पहले उजागर हुआ था, लोगों के नाम भी सामने आ गए थे, उनमें से कुछ लोग पकड़ा भी गए थे, लेकिन फिर वे रहस्यमय तरीके से छोड़ दिए गए थे। अब पकड़-धकड़ का यह दूसरा राउंड चल रहा है, और इस बीच कई महीने तक यह पकड़ कहां गायब हो गई थी, क्यों गायब हो गई थी, यह रहस्य ही बना हुआ है। राज्य के कम से कम एक जिले में तो कुछ अफसरों ने संगठित रूप से इस ऐप के मार्फत सट्टा लगाने को जमकर बढ़ावा दिया था, अब जिले के इन अफसरों के ऊपर भी कोई इसमें शामिल थे, या नहीं, यह साफ नहीं हुआ है। फिलहाल मुख्यमंत्री की फटकार के बाद उनके गृहजिले दुर्ग में महादेव ऐप से जुड़े सट्टेबाज पकड़ाए हैं, और उनमें से कुछ के बैंक खातों की जब्ती भी हुई है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि बात-बात में जिन हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती हैं, उनका कोई जुलूस इस बात को लेकर नहीं निकला कि उनके भगवान महादेव के नाम पर यह सट्टेबाजी चल रही है। जब किसी गलत धंधे में कमाई बहुत बड़ी हो, तो आसपास के संवेदनशील लोगों की सहनशीलता भी बहुत बढ़ जाती है, और धर्म की आंख भी अधर्म को अनदेखा करने लगती है, महादेव ऐप के साथ ठीक यही हुआ है। लेकिन दुर्ग से लेकर दुबई तक फैले सट्टे के इस कारोबार की जांच में अब केन्द्र सरकार की दिलचस्पी भी दिखाई दे रही है, और हो सकता है कि राज्य की पुलिस के हाथ से यह मामला निकल भी जाए। ऐसा अगर होता है तो इस धंधे को बढ़ावा देने वाले कुछ और लोग भी पकड़ में आ सकते हैं।
सनसनी तो दिख नहीं रही...
ईडी के छापों के बाद जिन अफसरों पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी थीं, वे रायगढ़ की कलेक्टर रानू साहू थीं। एक दूसरे आईएएस अफसर समीर विश्नोई तो गिरफ्तार ही हो गए, तो उनका दर्जा अब हिरासत के कैदी का रह गया है, और उनमें दिलचस्पी सीमित रह गई है। लेकिन रहस्यमय तरीके से कुछ दिन गायब रहने के बाद हैदराबाद में इलाज के सर्टिफिकेट सहित लौटीं रानू साहू ने जिस तरह चि_ी लिखकर ईडी को जांच का न्यौता दिया, वह भी एक हिम्मत का काम था। अब कल तक उनके सील किए गए घर की जांच हो जाने, और उनसे पूछताछ हो जाने की खबरें आ ही रही थीं कि अचानक रायगढ़ से तस्वीरों सहित यह समाचार आया कि कलेक्टर मेडिकल कॉलेज का दौरा करने पहुंचीं। मतलब यह कि हालात उनके काबू में हैं, और वे अपने आम कामकाज में लग गई हैं। कुछ लोग इसे आत्मविश्वास का प्रदर्शन कह रहे हैं, तो कुछ और लोग इसे उनके दुस्साहस की नुमाइश बता रहे हैं। जो भी हो, लौटने के बाद इतनी तेजी से हालात बदल देना आसान बात नहीं है। लोग उम्मीद कर रहे थे कि उनके घर की तलाशी में बहुत कुछ निकलेगा, उनसे पूछताछ के बाद पता नहीं ईडी उन पर और क्या कार्रवाई करेगा, लेकिन फिलहाल वैसा कुछ सनसनीखेज होते दिख नहीं रहा है।
पुरानी कतरन, नई सनसनी
ईडी की दी गई जानकारी के मुताबिक माइनिंग के डायरेक्टर रहते हुए आईएएस समीर विश्नोई ने खनिज-अनुमति को ऑनलाईन से हटाकर जिले के अफसरों के हाथ दे दिया था, और वहीं से भ्रष्टाचार का रास्ता बना। अब इस अफसर की दिक्कत यह है कि माइनिंग के बाद ये राज्य सरकार की कम्प्यूटरों से जुड़े कामकाज की संस्था चिप्स में तैनात हुए, तो चिप्स से एक कंपनी पर लगाई गई बहुत बड़ी पेनाल्टी माफ करने का एक और मामला अब कब्र फाडक़र सामने आ रहा है। यह कुछ महीनों पहले भी सतह पर आया था, लेकिन अब एक नई गंभीरता के साथ इस पर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए एक अखबार की कुछ महीने पहले की रिपोर्ट सोशल मीडिया पर तैर रही है कि चिप्स ने नाजायज तरीके से जुर्माना माफ किया, और कई करोड़ रूपये का बहुत बड़ा जुर्माना माफ किया। हो सकता है कि यह ईडी की मौजूदा जांच में न आता हो, लेकिन एक नई सनसनी तो इस महीनों पुरानी कतरन से खड़ी हो ही गई है।
हमसफर मोबाइल फोन...
ट्रेन में लंबे सफर के दौरान यात्री अपने साथ बैठे लोगों से पूछ लिया करता है, कहां उतरेंगे-कहां से आ रहे हैं। उस शहर के फलां को तो मैं जानता हूं..। दूसरा कहता- हां..हां..वे तो हमारे भी बहुत अच्छे मित्र हैं। देश, दुनिया, राजनीतिक, धार्मिक, पारिवारिक जाने कितनी बातें आपस में हो जाती है और रास्ता कट जाता है। कई बार तो सहयात्रियों के बीच जिंदगी भर के लिए रिश्ता बन जाता है। पर धीरे-धीरे यह कल्चर खत्म हो रहा है। लोग आपस में बात करने के बजाय फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाट्सएप में मशगूल रहते हैं। बात इतनी ही होती है- आपका मोबाइल चार्ज हो गया हो, चार्जिंग में मैं लगा दूं? हावड़ा से बिलासपुर निकली ट्रेन की यह तस्वीर कुछ ऐसी ही बात कह रही है।
दावेदारी रमन की ही रहेगी?
देश के दूसरे राज्यों में और राजधानी में यदि छत्तीसगढ़ से भाजपा के किसी नेता को जाना जाता है तो वे डॉ. रमन सिंह ही हैं। दूसरे क्रम में सरोज पांडेय और नंदकुमार साय और अन्य हो सकते हैं। नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सहित संगठन के स्तर पर अनेक फेरबदल के बाद पार्टी के भीतर डॉ. सिंह के समर्थक बिल्कुल भी कम नहीं हुए हैं। विधानसभा चुनाव के लिए चल रही तैयारियों के बीच कल उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया और लोग शामिल हुए उससे यही संदेश निकला कि यदि भाजपा फिर सत्ता में लौटी तो मुख्यमंत्री के अलावा उनकी दावेदारी अग्रिम पंक्ति में है। भले ही पिछले विधानसभा में नतीजे कितने भी खराब आए हों या संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारी कह रहे हों कि सीएम का कोई चेहरा सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा जाएगा।
केबीसी में पत्रकार...

मशहूर टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति में इस बार एक पत्रकार हॉट सीट पर अमिताभ बच्चन के सामने बैठेंगे। पत्रकार दीपेश जैन ने रायपुर में कई अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम किया है। वे एक कहानीकार के रूप में भी पहचान रखते हैं। इस समय वे भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं। सोमवार की शाम वे टीवी पर दिखाई देंगे। [email protected]
भय बिन होय न प्रीत
राज्य के एक नए नवेले जिले के कलेक्टर और नगर पालिका अध्यक्ष के बीच पिछले दिनों अंदरूनी स्तर पर चली खींचतान, इस्तीफे की नौबत तक पहुंच गई। सत्तारूढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष को इस बात का गुमान नहीं था कि कलेक्टर एकाएक उनके वित्तीय अधिकार छीनकर पालिका के कार्यों में बेवजह दखलंदाजी करेंगे। दरअसल घटनाक्रम ऐसा हुआ कि कलेक्टर ने नगर पालिका सीएमओ को तलब कर निर्माण कार्यों की एक सूची लेने के साथ अध्यक्ष के सभी वित्तीय अधिकार पर रोक लगा दी। इससे हड़बड़ाए अध्यक्ष ने राज्य के दो मंत्रियों तक गुहार लगाई। मंत्रियों के ढीले रवैये के कारण अध्यक्ष ने कांग्रेस के एक कद्दावर नेता से अपने साथ हो रहे बर्ताव का दर्द साझा किया। मंझे हुए धाकड़ नेता ने पालिका अध्यक्ष को पार्षदों के साथ इस्तीफा देने का सुझाव दिया।
यह जानकारी कलेक्टर के कानों तक पहुंच गई, फिर अपने रवैये के कारण सुर्खियों में रहने वाले कलेक्टर ने अध्यक्ष को मिलने के लिए बुलाया। अध्यक्ष इस्तीफा देने पर अड़ गए। इससे कलेक्टर के पसीने छूट गए। अध्यक्ष ने कलेक्टर से कहा कि मुख्यमंत्री के समक्ष अब मसले का सही हल निकाला जाएगा। आखिरकार कलेक्टर ने अपने कदम पीछे लेते हुए अध्यक्ष को तमाम अधिकार लौटा दिए। बताते हैं कि पूरा मामला कमीशनखोरी से जुड़ा हुआ है। वहीं अध्यक्ष अगले विधानसभा चुनाव के लिए मौजूदा विधायक के सामने मजबूत प्रतिद्वंदी बनकर उभरे हैं। ऐसे में विधायक और कलेक्टर के गठजोड़ ने अध्यक्ष के पर कतरने की कोशिश की थी। कलेक्टर को आखिरकार यह समझ में आया कि सियासी पैंतरेबाजी में फिलहाल वे कमजोर हैं। अब अध्यक्ष पूरे घटनाक्रम को ताकत बनाकर पूरे विधानसभा में जोरशोर से फैला रहे हैं।
चौराहे पर अठखेलियां

अंबिकापुर के अंबेडकर चौक पर 13 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे एक आदमी इस तरह सडक़ के पानी भरे गड्ढे पर विचरण कर रहा था तो पहली नजर में लोगों को लगा कि यह शराब और पानी भरे सडक़ का मिला-जुला असर है। पर काफी देर बाद बाहर निकलकर बताया कि उसने शराब नहीं पी रखी है। मोबाइल फोन इस गड्ढे में गिरकर गुम हो गया है। खोज डाला, मोबाइल तो मिला नहीं, अलबत्ता मछलियों की मौजूदगी का अनुमान जरूर लग रहा था।
राशन बिना गरीबों की दिवाली
कई योजनाएं लागू होने के दौरान काफी सुर्खियां बटोर लेती है, पर बाद में क्या हश्र हो रहा है, इस पर किसी को चिंता नहीं रहती। वन नेशन वन कार्ड इसी का उदाहरण है। पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में यह योजना इस साल जनवरी में शुरू हुई। इसमें एक पीएसओ मशीन होता है, जो इंटरनेट के जरिये आधार कार्ड से जुड़ा रहता है। पीडीएस दुकान में जो राशन लेने आता है, उसे आधार नंबर बताना होता है और अंगूठे का निशान लिया जाता है। इससे तय हो जाता है कि राशन लेने सही व्यक्ति आया है। यह मशीन तौल मशीन के ब्लू टूथ से जुड़ी है, जिसके चलते उसे उतना ही राशन मिलता है जितना ऑनलाइन दिखाई देता है। किसी को काम या ज्यादा राशन नहीं मिल सकता। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, देश के किसी भी कोने में हितग्राही रहे, किसी भी पीडीएस दुकान से राशन उठा सकता है। प्रवासी मजदूरों के लिए यह काफी फायदेमंद है। पीडीएस में भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह व्यवस्था अच्छी दिखाई देती है, मगर जब से यह नया सिस्टम लागू हुआ है, हितग्राही और राशन दुकानदार दोनों खासे परेशानी में हैं। रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, जांजगीर-चांपा और अन्य जिलों से लगातार खबरें आ रही है सर्वर ठप रहने के कारण पीएसओ मशीन काम ही नहीं कर रहे हैं। रायपुर में सबसे ज्यादा 5 लाख 37000 राशन कार्ड हैं और बिलासपुर में चार लाख 73 हजार। खबरें आ रही है कि दोनों जिलों में दर्जनों दुकानें ग्राहकों की नाराजगी के चलते खोली नहीं जा रही हैं। ग्राहक और दुकानदार दोनों मशीन के बार-बार अंगूठे का निशान मांगे जाने से झल्ला रहे हैं। उनके बीच वाद-विवाद हो रहा है। इन मशीनों को चलाने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के सर्वर का इस्तेमाल होता है। मशीनों में करोड़ों लोगों का डेटा लोड है। इसके चलते जनवरी माह में जब यह सुविधा शुरू की गई तभी से दिक्कत आने लगी।
शुरुआती दिनों में तय किया गया था कि हितग्राही पुरानी व्यवस्था से भी राशन उठा सकते हैं। पर नई योजना की सफलता की समीक्षा किए बिना वह समाप्त कर दी गई। वैसे अभी भी गड़बड़ी पूरी तरह खत्म ही हो गई है, नहीं कहा जा सकता। ऐसा होता तो कांग्रेस के निचले हिस्से के कार्यकर्ता, सरकार बदल जाने के बाद भी भाजपा समर्थकों के हाथ में राशन दुकान होने को लेकर नाराज नहीं चल रहे होते। सरगुजा में खाद्य मंत्री अमरजीत भगत को अपनों के ही रोष का सामना करना पड़ा था। अप्रैल महीने में छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए केंद्रीय खाद्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना में प्रति व्यक्ति 5 किलो चावल ना देकर प्रति कार्ड 5 किलो वितरित करने की शिकायत आने की बात कही थी और इसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री को ट्वीट भी किया था।
अभी स्थिति यह है ठीक दिवाली के मौके पर हजारों की संख्या में हितग्राही राशन दुकानों के चक्कर लगा रहे हैं और उनके कोटे का चावल उनमें ही मिल रहा है। लोगों की मांग है कि कम से कम व्यवस्था ठीक होते तक तो उन्हें पहले की तरह टेबलेट के माध्यम से राशन वितरित कर देना चाहिए। शिकायत होने पर यूपी सहित दूसरे राज्य में ऐसी वैकल्पिक सुविधा शुरू कर दी गई है।


