राजपथ - जनपथ
ख़ुद को आबंटन !
सीएम पद से हटने के बाद भूपेश बघेल अब शंकर नगर स्थित जयसिंह अग्रवाल के सरकारी बंगले में रहेंगे। राज्य बनने के बाद यह बंगला मुख्य सचिव के लिए ईयर मार्क था। मगर 2018 में भूपेश सरकार ने इस बंगले को राजस्व मंत्री अग्रवाल को आवंटित कर दिया।
भूपेश बघेल ने चुनाव नतीजे आने के बाद राजस्व मंत्री का बंगला खुद के लिए आवंटित कर लिया है। राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल चुनाव हार चुके हैं, और उन्हें वैसे ही बंगला खाली करना था। भूपेश बघेल से पहले दो पूर्व सीएम अजीत जोगी, और डॉ. रमन सिंह को बंगला आबंटन पर काफी विवाद हुआ था।
अजीत जोगी तो सीएम पद से हटने के बाद शंकर नगर स्थित एक बंगला अपने लिए चाहते थे। मगर यह बंगला अमर अग्रवाल को आबंटित कर दिया गया, जो उस समय वित्त मंत्री थे। बाद में जोगी को पूर्व सीएम होने के नाते कटोरा तालाब स्थित सागौन बंगला आबंटित किया गया।
रमन सिंह को सीएम हाउस के पीछे ई-वन बंगला आबंटित किया गया था, जो उन्हें पसंद नहीं आया। फिर वो मौलश्री विहार स्थित निजी बंगले में रहने चले गए। मगर भूपेश बघेल विवादों से बचने के लिए खुद होकर नए सीएम के शपथ से पहले ही अपनी पसंद से बंगला और स्टॉफ आवंटित कर लिया है। यह भले ही नियमानुसार न हो, लेकिन उनसे जुड़े लोगों को लगता है कि बंगला आबंटन पर कोई विवाद नहीं होगा। देखना है आगे क्या होता है।
सीएम सचिवालय
चर्चा है कि आईएएस के वर्ष-2009 बैच के अफसर सुनील जैन सीएम सचिवालय में आ सकते हैं। सुनील जशपुर जिले के ही रहवासी हैं, और नए सीएम विष्णुदेव साय से अच्छी जान-पहचान भी है।
जैन डीपीआई में हैं, और स्कूल शिक्षा विभाग के विशेष सचिव भी हैं। वो बलौदाबाजार, और महासमुंद कलेक्टर रहे हैं। विशेष सचिव स्तर के अफसर सुनील जैन नागरिक आपूर्ति निगम के एमडी भी रहे हैं। सीएम सचिवालय में प्रमुख सचिव स्तर के अफसरों के नामों की भी चर्चा है।
कुछ अफसरों के नामों पर विचार हो रहा है। चर्चा तो यह भी है कि केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ सुबोध सिंह अथवा रजत कुमार की वापसी भी हो सकती है। अगले एक हफ्ते के भीतर इन सब पर फैसला हो सकता है।
आदिवासी सीएम की मांग उठाने वाले
भारतीय जनता पार्टी में रहते हुए नंदकुमार साय लगातार प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग करते रहे। लगभग चार दशक तक पार्टी में रहने के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाकर केबिनेट मंत्री दर्जा दिया गया। रायगढ़-जशपुर जिलों की तीन सीटों में से किसी भी के लिए उन्होंने टिकट मांगी थी, पर नहीं मिली। अब सरकार चली गई तो उनको क्या जिम्मेदारी मिलेगी, अभी मालूम नहीं। इसी तरह पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर भी आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग करते रहे। इस बार उन्हें अपनी परंपरागत सीट रामपुर से हार का सामना करना पड़ा है और वे विधानसभा में नहीं होंगे। नंदकुमार साय ने अपनी महत्वाकांक्षा छिपाई भी नहीं। उनका आरोप था कि राजनाथ सिंह के साथ मिलकर डॉ. रमन सिंह ने उनको मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया।
राज्य बनने के 23 साल बाद पहली बार अविवादित आदिवासी नेतृत्व प्रदेश को मिला है। इस समय नंदकुमार साय और ननकीराम कंवर को इस बात के लिए याद किया जा सकता है कि अनुशासित पार्टी के कही जाने वाली भाजपा में रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक बयान देकर कई बार आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठाई और मुद्दे को जिंदा रखा। यह जरूर है कि यह अवसर खुद उनको नहीं मिल सका।
जूदेव के भरोसेमंद साथी

नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को लेकर माना जाता है कि वे स्व. दिलीप सिंह जूदेव के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक थे। 1990 में जूदेव से उनकी पहली मुलाकात हुई, जब वे बगिया के सरपंच थे। जूदेव की सिफारिश पर उन्हें तपकरा सीट से विधानसभा की टिकट दी गई और वे करीब 25 हजार वोटों से जीतकर अविभाजित मध्यप्रदेश की विधानसभा में पहुंचे। सन् 1998 तक विधायक रहे। 1999 से 2014 तक चार बार सांसद बने, केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह मिली, प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी तीन बार रहे। जूदेव के निधन के बाद भी उनके परिवार से साय का रिश्ता मजबूत बना हुआ है। हालांकि साय को राजनीति विरासत में मिली है। उनके दादा बुधनाथ साय 1947 से 1952 तक मनोनित विधायक रहे। उनके पिता के बड़े भाई नरहरि प्रसाद साय दो बार, 1962 और 1977 में विधायक तथा इसके बाद 1977 से 1979 तक सांसद रहे।
सरगुजा में कांग्रेस की कलह...
चुनाव के बाद बृहस्पत सिंह ने फिर ऐसा कुछ कह दिया है कि सरगुजा में सिंहदेव समर्थक कांग्रेसियों का पारा चढ़ गया। बृहस्पत सिंह ने कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा और पूर्व उप-मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव को लेकर बयानबाजी की थी। कहा कि वह हिरोइन की तरह फोटो खिंचवाती रही, सिंहदेव ड्राइवर बने रहे। सैलजा प्रभावशाली नेताओं के हाथ बिक गई थीं।
सरगुजा में सिंहदेव सहित सभी कांग्रेस प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा है। बृहस्पत इस तोहमत से बच गए क्योंकि उनकी तो टिकट ही काट दी गई थी। नतीजा आने के बाद गुस्सा जायज था और यह सिंहदेव पर भी निकलना था। पर जैसी भाषा का इस्तेमाल उन्होंने किया है उसे सरगुजा के कांग्रेसियों ने महिला सम्मान के साथ जोड़ा। अभी भी जिला पंचायत, नगर-निगम में कांग्रेस है। इसके अलावा कई पूर्व विधायक हैं। सबकी एक बैठक हुई और एकमत से उन्होंने बृहस्पत सिंह को पार्टी से बाहर करने की मांग कर दी है।
मुख्यधारा में लौटने अफसर बेताब
कांग्रेस सरकार में लूप लाईन में रहे पुलिस के कई अफसर सूबे में भाजपा सरकार के सत्तारूढ़ होने पर मुख्यधारा में लौटने के लिए बेताब हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में पुलिस महकमे के अफसरों को मुख्यधारा में काम करने का सरकार ने मौका नहीं दिया। सरकार बदलते ही इन अफसरों ने फील्ड में तैनाती की उम्मीद पाल रखी है। कांग्रेस सरकार ने एक खास विचारधारा के प्रति झुकाव रखने के कारण पीएचक्यू और बटालियन में ऐसे अफसरों को चुन-चुनकर तैनात कर दिया था।
चर्चा है कि सरकार के गठन होते ही डॉ. संजीव शुक्ला, मयंक श्रीवास्तव, शशिमोहन सिंह, अजातशत्रु बहादुर, सूरज सिंह परिहार जैसे कुछ काबिल अफसरों को फील्ड में काम करने का मौका मिल सकता है। इनमें मयंक श्रीवास्तव हाल ही में कोर्ट में लंबी लड़ाई जीतकर डीआईजी पद पर प्रमोट हुए। उन पर झीरम घाटी नक्सल हमले में कोताही बरतने का आरोप था। शशिमोहन सिंह के नाम पर भी कांग्रेस सरकार को सख्त ऐतराज था। उनके सहित अजातशत्रु बहादुर सिंह को बटालियन में पदस्थ कर दिया गया था। एकमात्र जिला जीपीएम में चुनिंदा महीनों के लिए पदस्थ रहे सूरज सिंह परिहार भी पुरानी सरकार से तालमेल नहीं बिठा पाए। बताते हैं कि उनके परिवार का आरएसएस से गहरा नाता है। इस वजह से कांग्रेस सरकार ने उन्हें लूप लाईन में पदस्थ कर दिया था। कांग्रेस सरकार की विदाई के साथ ही इनकी वापसी का रास्ता भी खुल गया है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में इन अफसरों का खासा दबदबा था।
चर्चा है कि ये अफसर अपने संपर्कों का उपयोग कर पोस्टिंग के लिए जोर लगा रहे हैं। कांग्रेस सरकार में इन अफसरों की तुलना में उनके जूनियर अफसरों को तरजीह मिली थी। यह बात इन अफसरों को आज तक चुभती है। सत्ता परिवर्तन के बाद अब इन अफसरों को फील्ड में काम करते देखा जा सकता है।
जनता सब देखती है...
ओडिशा में शराब कारोबारी के यहां छापेमारी में 290 करोड़ तो कैश ही मिले हैं, बेनामी जायदाद बेहिसाब पाई गई है। वहां बीजू जनता दल की सरकार है जिसने हर आड़े मौके पर केंद्र की भाजपा सरकार का साथ दिया है। इस छापे की उनके नेताओं ने शिकायत नहीं की, स्वागत किया है। अपने यहां भाजपा प्रवक्ता विधायक केदार कश्यप ने खुला आरोप लगाया है कि इसमें छत्तीसगढ़ का भी पैसा है। छत्तीसगढ़ में भी शराब कारोबारियों के यहां ईडी के छापे पड़े थे। कई अफसर कोयला लेवी मामले में जेल में हैं। पीएससी में अफसरों और कांग्रेस नेताओं के परिजन चुने गए। भूपेश बघेल ने सामने आकर इन सब का बचाव किया। मगर अदालतों से इनके आरोपियों को जमानत नहीं मिल रही है। जरूर कुछ मजबूत सबूत होंगे। अभी पीएससी में जॉइनिंग नहीं कर पाए 15 सलेक्टेड टॉप लोगों की पोस्टिंग भी हाईकोर्ट ने रोक दी है। चलिये महादेव सटोरियों को छोड़ दें, मगर कोयला, शराब और पीएससी में गड़बड़ी हुई या नहीं लोग तो देख-समझ रहे हैं। डॉ रमन सिंह के शब्दों में- बच्चा-बच्चा जानता है कि कोयले पर प्रति टन 25 रुपये की वसूली हो रही थी। लोग भी देख रहे थे, समझ भी रहे थे। मगर, उनको जानबूझकर अनदेखा करने का मतलब क्या था? मौका था, नीयत साफ रखने और जांच के लिए रजामंद होने का, मगर आज हाथ खाली है। जो जेल में हैं उनको वीआईपी सुविधा भी नहीं मिलेगी, बाहर भी बड़ी मुश्किल से निकल पाएंगे।
इतना भी मत सताओ रेलवे...
विधानसभा चुनाव के ठीक बाद ट्रेनों के कैंसिलेशन का आंकड़ा 60 तक पहुंच गया है। पूरे दिसंबर तकलीफ है। रायपुर से हावड़ा रूट, मुंबई रूट, विशाखापट्टनम रूट, बिलासपुर से कटनी और दिल्ली रूट, ज्यादातर रद्द, रद्द, रद्द। पहले सुधार कार्य भी होते थे और यात्री ट्रेनें भी चलती थीं। रेलवे के प्रेस नोट में बताया जाता है कि इन सुधार कार्यों के चलते भविष्य में यातायात और सुगम होगा। पर यह सुगम यातायात कोरोना महामारी के बाद देखने को ही नहीं मिल रहा है। इन्ही दिनों में रेलवे कोयले के रिकॉर्ड परिवहन का आंकड़ा देती है, आशय यह है कि ट्रैक हैं पर सिर्फ मालगाडिय़ों को चलाने के लिए, पैसेंजर्स के लिए नहीं। रेलवे को जरा भी दर्द नहीं है कि दो-दो महीने पहले बुक कराई गई टिकटों को वह अचानक कैंसिल कर मेसैज में माफी मांग छुटकारा पा लेता है।
ढह गई भ्रष्टाचार की इमारत..

यह जांजगीर के जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की तस्वीर है। एक महिला कर्मचारी छज्जा गिरने से घायल भी हो गई। बाकी लोगों ने भाग कर जान बचाई। भवन कुछ साल पहले ही बना था। पीडब्ल्यूडी ने बनाया था। मान सकते हैं कि इंजीनियर और ठेकेदार ने भ्रष्टाचार किया होगा, पर उन बेचारों ने भी पता नहीं कहां-कहां पैसा पहुंचाने के लिए ऐसा किया हो।
दीपक बने रहेंगे, और प्रतिपक्ष?
विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज पद पर बने रहेंगे। वजह यह है कि लोकसभा चुनाव नजदीक है, और पार्टी कोई नया प्रयोग नहीं करना चाहती है। एक बात और, बैज को अध्यक्ष बने कुछ ही महीने हुए हैं। अलबत्ता, नेता प्रतिपक्ष के नाम को लेकर पार्टी के अंदरखाने में चर्चा जरूर चल रही है।
अनुभव और वरिष्ठता के लिहाज से डॉ.चरणदास महंत को नेता प्रतिपक्ष के लिए सबसे उपयुक्त माना जा रहा है। इन सबके बीच कार्यवाहक सीएम भूपेश बघेल खेमे की तरफ से पूर्व मंत्री उमेश पटेल का नाम उभरा है।
उमेश तीसरी बार चुनाव जीतकर आए हैं। हालांकि उमेश को लेकर यह कहा जा रहा है कि वो मंत्री के रूप में भी कोई खास काम नहीं कर पाए। उम्र भी कम है। इन सबके बीच महंत के नाम पर मुहर लग जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। महंत ने अपने चाँपा -जाँजगीर, और सक्ती जि़लों की तमाम सीटों पर कांग्रेस की जीत दर्ज कराई है।
नौकरशाही में हलचल
सीएम कौन होगा, यह तो रविवार को भाजपा विधायक दल की बैठक में तय होगा। मगर नौकरशाही में इसको लेकर काफी हलचल है। सरकार के अफसर उन सभी नेताओं से मिल रहे हैं, जिनका नाम सीएम पद के लिए चर्चा में हैं।
पूर्व सीएम रमन सिंह के अलावा पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय, रामविचार नेताम, अजय चंद्राकर के यहां भी बधाई देने के लिए अफसरों का तांता लगा हुआ है। अरूण साव और रेणुका सिंह दिल्ली में हैं। उनसे भी कई आईएएस अफसर मिल चुके हैं।
पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के यहां सबसे ज्यादा भीड़ देखी जा रही है। अफसरों का एक बड़ा खेमा यह मानता है कि बृजमोहन सीएम भले ही न बन पाए लेकिन सरकार में सीनियर होने के नाते प्रभावशाली जरूर रहेंगे। पूर्व मंत्री राजेश मूणत से भी कई अफसरों ने मुलाकात कर अपनी शुभकामनाएं दी है।
मुसाफिर की बेफिक्री देखिए..
कुछ लोग सकारात्मक विचार वाले और ऊर्जा से भरपूर होते हैं।अपनी तकलीफ को भी खुशी-खुशी मंजूर कर लेते हैं, उसका आनंद लेते हैं। आज ही एक रेल सवारी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की है। लिखा है कि रात 11.55 इतवारी (नागपुर) से छूटने वाली शिवनाथ एक्सप्रेस रात 2 बजे छूटी। सुबह 7.30 तक आराम से सफर कर गोंदिया पहुंच गए। वैसे अब तक रायपुर पहुंच जाना था। रायपुर 11 बजे पहुंच गए। कोई बात नहीं, आज छुट्टी मनाएंगे।
यात्री लिखता है कि 5 घंटे का सफर 9 घंटे में। शुक्र है, ट्रेन कैंसिल नहीं थी, जैसा इन दिनों सुन रहा हूं। भारतीय रेल और उसका किफायती, आरामदेह सफर। जिंदाबाद...।
जाड़े में ही क्यों आते हैं परिंदे?

हर साल भारत में लाखों की संख्या में रूस और यूरोप के देशों से छत्तीसगढ़ के झील और तालाबों में पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके भारत आ जाते हैं। छत्तीसगढ़ इनका मशहूर ठिकाना है। इनमें कोपरा जलाशय भी शामिल है, जहां की यह तस्वीर है। दरअसल इनको उन देशों की भयंकर ठंड से बचना जरूरी होता है। कोरबा, बेमेतरा और बिलासपुर में इनका ठिकाना मिलता है। इन पक्षियों को ये इलाके ठंड में भी गर्म लगते होंगे। फॉरेस्ट डिपार्मेंट ने इनमें से बेमेतरा के गिधवा को पक्षी विहार घोषित कर रखा है। कोरबा जिले के कनकेश्वर धाम में पक्षी रुके हैं। वन मंडल अधिकारियों ने यहां भी बंदरों से बचाने की कोशिश की है। सभी फरवरी तक यहां रहेंगे। उसके बाद अपने देश लौट जाएंगे, क्योंकि वहां ठंड कम हो जाएगी। ([email protected])
उगता सूरज छाप को सलाम
नई सरकार के गठन से पहले नौकरशाही भाजपा के दिग्गज नेताओं के घर दस्तक दे रहे हैं। इन सबके बीच भूपेश बघेल के करीबी अफसर भी चुपचाप भाजपा नेताओं से मिल रहे हैं। ऐसे ही दो-तीन अफसरों की तस्वीर भी वायरल हुई है। ये अफसर, एक ताकतवर नेता के घर गुलदस्ता लेकर पहुंचे थे, और उनके साथ बैठक भी की।
नेताजी सरल स्वभाव के हैं। उन्होंने खुशनुमा माहौल में अफसरों से बातचीत की। नेताजी से मेल मुलाकात के बाद अफसर भी निश्चित होते दिख रहे हैं कि किसी तरह के बदले की भावना से कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि भाजपा के भीतर कई ऐसे नेता हैं, जो चाहते हैं कि भूपेश के करीबी अफसरों को साइड लाइन किया जाए। देखना है कि सरकार गठन के बाद भूपेश के करीबी अफसरों का क्या कुछ होता है।
मेयर हटाने की हड़बड़ी
रायपुर नगर निगम के मेयर एजाज ढेबर को हटाने की काफी हड़बड़ी दिख रही है। ढेबर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए भाजपा पार्षद दल की बैठक भी हुई थी। भाजपा के पास अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं है। बावजूद इसके निर्दलीय और कांग्रेस पार्षद दल में तोडफ़ोड़ कर अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने पर चर्चा हुई।
भाजपा पार्षद चाहे कुछ भी सोच रहे हैं, लेकिन शहर जिला भाजपा के विधायक, मेयर को हटाने के पक्ष में नहीं है। भाजपा के एक प्रमुख नेता ने संकेत दिए, कि एजाज ढेबर के बने रहने से पार्टी को काफी फायदा हुआ है। नगर निगम की चारों सीट भाजपा के खाते में चली गई, और लोकसभा चुनाव में भी इसका फायदा मिल सकता है। ऐसे में उन्हें हटाने का कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, स्मार्ट सिटी और अन्य कार्यों में गड़बड़ी घोटाले की जांच करा ढेबर, और उनके करीबियों पर कार्रवाई की जा सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
शादियों में नेताओं का टोटा
राजधानी में इन दिनों मांगलिक कार्यक्रम काफी हो रहे हैं। शादियों में इंतजाम भी फिल्मी स्टाइल में हो रहे हैं। वर वधू से लेकर परिवार वाले रीति रिवाज ऐसे कर रहे हैं जैसे फिल्मों की शूटिंग हो रही है। बहरहाल शादियों की शहनाई में कुछ कमी सी दिखती है, वह है नेताओं की। वर्ना कई नेता तो रात तीन बजे भी रिसेप्शन में पहुंचते रहे हैं।
सत्ता जाने के बाद कांग्रेस के कद्दावर नेता सार्वजनिक आयोजन में अभी जाने से हिचक रहे हैं क्योंकि वहां एक ही चर्चा होती है कि सत्ता कैसे बदल गई, ऐसी हवा तो नहीं थी। शादियों में आमंत्रितों की सूची में कांग्रेसी ही अधिक हैं, क्योंकि सरकार के लौटने का अनुमान था, सो व्यवहार संबंध की सूची भी उसी हिसाब से बनी थी। भाजपा के नेताओं को अभी कमान नहीं मिली है, इसलिये वे भी कम ही जा रहे हैं।
मीसाबंदियों को फिर मिलेगी पेंशन?
सन् 2008 में छत्तीसगढ़ की तत्कालीन भाजपा सरकार ने जयप्रकाश नारायण सम्मान निधि शुरू की थी। यह आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले मीसा बंदियों के लिए थी। सम्मान निधि में हर माह 25 हजार रुपये मिलते थे। कांग्रेस सरकार बनने के बाद फरवरी 2019 में यह पेंशन रोक दी गई। पहले कारण यह बताया गया कि जिन्हें पेंशन दी जा रही है, उनका सत्यापन कराया जाएगा। पर जब पेंशन रुकी रही तो भूपेश बघेल ने कहा कि एक खास विचारधारा के लोगों को पेंशन देने का कोई नियम नहीं होता है। भाजपा सरकार ने जनता की गाढ़ी कमाई के 100 करोड़ रुपये इसके पीछे लुटा दिए। प्रभावित लोगों ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के बाद अदालत ने पेंशन जारी रखने का आदेश दिया। इस आदेश पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर स्थगन ले लिया। तब से यह पेंशन बंद है। अब जब राज्य में फिर से भाजपा लौट गई है, मीसा बंदियों को आशा बंध गई है कि सुप्रीम कोर्ट में लगा मुकदमा सरकार वापस ले लेगी और फिर से उन्हें पेंशन मिलेगी। यदि बीते पांच साल का पेंशन भी देने का फैसला लिया गया तो एक-एक मीसाबंदी के हाथ में 10-12 लाख रुपये एक साथ आ जाएंगे।
बस्तर तक बुलडोजर...

चुनाव परिणाम आने के बाद प्रशासन ने नई सरकार के साथ खड़े होने में कोई देरी नहीं की। चखना सेंटर और सडक़ों के किनारे के अतिक्रमण पर पूरी रफ्तार से उखाड़े जा रहे हैं। ज्यादातर एक्सीवेटर का इस्तेमाल हो रहा है, पर इसे इन दिनों का प्रिय नाम बुलडोजर दिया गया है। बस्तर में भी यही बुलडोजरी कार्रवाई हुई। नक्सलियों का एक ऊंचा शहीद स्मारक फोर्स ने एक्सीवेटर ले जाकर ध्वस्त कर दिया।
विधायकी तो पक्की हुई, सांसदी का पता नहीं...
विधानसभा जीतने के बाद इस्तीफा देने वाले तीन सांसदों में से दो अरुण साव और रेणुका सिंह को मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल बताया जा रहा है। कोई और नाम आया भी तो उम्मीद कर सकते हैं कि मंत्रिमंडल में तो शामिल हो ही जाएंगे। तीसरी सांसद गोमती साय को यदि नहीं भी लिया गया तो सन् 2028 तक उनका भी विधायक बने रहना तो तय है, वह भी सत्तारूढ़ दल का। यदि सांसदी नहीं छोड़ते तो उनके पास यह पद अगले साल के मई महीने तक ही बना रहता। जबकि विधायकी पांच साल के लिए मिल चुकी है।
सन् 2014 के जब लोकसभा चुनाव हुआ तो भाजपा के पास 11 में से 10 सीटें थीं। चौंकाते हुए फैसला लेते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने अपने सभी सांसदों की टिकट काट दी थी। इनमें रमेश बैस, डॉ. रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह, स्व. बलिराम कश्यप के पुत्र दिनेश कश्यप जैसे नाम भी थे। विष्णु देव साय को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था फिर हटा दिया गया। अब उन्होंने भी विधानसभा चुनाव लडक़र जीत हासिल कर ली है। ऐसा ही बस्तर से सांसद रहे विक्रम उसेंडी को अभी मौका मिला और वे भी विधानसभा पहुंच गए हैं। बैस तो कुछ समय बाद ही राज्यपाल बना दी गए। वहीं कोरबा में बंशीलाल महतो की टिकट काट दी गई थी। उनके पुत्र विकास महतो को 2018 में चुनाव लड़ाया गया था, पर वे जयसिंह अग्रवाल से हार गए थे। इस बार उन्होंने कोरबा जिले का चुनाव संचालन किया, नतीजे अच्छे आए।
लखन लाल साहू, कमलभान सिंह, चंदूलाल साहू, कमला देवी पाटले, अभिषेक सिंह आदि सांसदों ने अपनी सीट बड़ी मार्जिन से 2014 में निकाली पर 2019 में सबकी टिकट कट गई। उस समय टिकट काटने की वजह यह बताई कि चुनाव सिर्फ मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा। इन सांसदों के पांच साल के काम की कोई नकारात्मक छवि बनी हो तो मोदी के चेहरे को उससे नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। यह कामयाब प्रयोग था। 11 में से 9 सीटों पर भाजपा की जीत हुई।
इस बार भी यह साफ दिखाई दे रहा है कि लोकसभा चुनाव मोदी के ही नाम पर लड़ा जाना है। ऐसे में कोई नहीं जानता कि मौजूदा सांसदों में से किसकी टिकट बरकरार रहेगी और किसकी काटी जाएगी। फिर 2019 जैसा फैसला लिया गया तो? ऐसे में ये तीन सांसद विधायक बनने के बाद तो कम से कम इस चिंता से मुक्त हुए।
घी जैसा महुआ तेल...

देखने से लग सकता है कि इन हाथों में गाय का घी है। पर नहीं, यह महुआ के बीज से तैयार किया गया तेल है। सर्दी के चलते यह जम गया है और ऐसा दिख रहा है। आदिवासियों के बीच उन्नत खेती और फूड प्रोसेसिंग पर काम कर रहीं सुभद्रा खापर्डे बताती हैं कि महुआ के बीज का तेल बहुत पौष्टिक और असंतृप्त वसा से भरपूर होता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में खाना पकाने के लिए इसका प्रचलन है। ([email protected])
वापिसी की तैयारी
सीएम कौन बनेगा, ये अभी स्पष्ट नहीं है। दिल्ली में भाजपा के रणनीतिकार इस पर मंथन कर रहे हैं। मगर सीएम, और मंत्री स्टाफ में जगह पाने के लिए अफसरों-कर्मचारियों में होड़ मच गई है। रमन मंत्रिमंडल के स्टाफ में रहे अफसर-कर्मचारी ज्यादा सक्रिय हैं। पार्टी के भीतर आम धारणा रही है कि अपने स्टाफ की वजह से मंत्री ज्यादा बदनाम हुए थे। लोगों के बीच छवि भी खराब हुई। अब चर्चा है कि एक-दो रिटायर्ड अफसरों ने मंत्रिमंडल के गठन के पहले ही अपनी जगह पक्की कर ली है।
सुनते हैं कि स्कूल शिक्षा विभाग के एक कुख्यात पूर्व अफसर की मंत्री स्टाफ में वापसी हो सकती है। अफसर रिटायर होने के बाद अपना स्कूल चला रहे हैं, लेकिन मंत्री स्टाफ का मोह नहीं छूट रहा है। वो रमन सरकार में तीन मंत्रियों के स्टाफ में रहे हैं। ये पूर्व मंत्री अब चुनाव जीतकर आ गए हैं। सभी का मंत्री बनना भी तय माना जा रहा है। अफसर ने भी मंत्री बनने से पहले तीनों से मुलाकात कर ली है। हालांकि संघ के पदाधिकारी रमन सरकार में बदनाम रहे अधिकारी कर्मचारियों की वापसी न हो, यह सुनिश्चित करने में लगे हैं। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
अब क्या होगा?
कोल स्कैम केस में जेल में बंद सीएम की पूर्व ओएसडी सौम्या चौरसिया की जमानत अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है। कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा है। सौम्या पिछले एक साल से जेल में बंद है। उनकी जमानत अर्जी हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी थी।
भूपेश सरकार में ताकतवर रहीं सौम्या को लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा जा रहा है। भाजपा नेता उज्जवल दीपक ने एक्स पर सौम्या का नाम लिखे बिना पोस्ट किया कि सुनने में आ रहा है कि जेल के स्पेशल कमरे से साधारण वाले बैरक में शिफ्टिंग की तैयारी हो गई है? होटल का खाना, बाहर विचरण, बार-बार अस्पताल जाना सब बंद होने जा रहा है। उन्होंने आगे लिखा कि सरकार के जाने की किसी को आशंका नहीं थी। इतना ओवर कॉन्फिडेंस था। ये बड़ा सबक है। उनके लिए जो कम समय के पॉवर के नशे में चूर होकर मदमस्त हो जाते हैं।
अतिउत्साह
शासन-प्रशासन में सीएम, और मंत्रियों के नामों को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है। राजभवन के एक उत्साही अफसर ने तो एक पूर्व मंत्री से फोन कर पूछ लिया कि शपथ ग्रहण समारोह कहां होगा? पुलिस परेड ग्राउंड में अथवा साइंस कॉलेज मैदान में।
पूर्व मंत्री ने जिस अंदाज से अफसर को जवाब दिया, उसकी खूब चर्चा हो रही है। पूर्व मंत्री ने अफसर से ही पूछ लिया कि शपथ कौन ले रहा है? इससे हड़बड़ाए अफसर ने इधर-उधर की बातें बनाकर पिंड छुड़ाया।
दरअसल, राज्यपाल का काम शपथ दिलाना होता है। शपथ ग्रहण समारोह कहां होगा, यह काम सामान्य प्रशासन विभाग, नवनिर्वाचित विधायकों के नेता से चर्चा कर तय करते हैं। मगर जिस अंदाज में राजभवन के अफसर उत्सुकता दिखा रहे थे, वह पूर्व मंत्री को नहीं भाया।
नए माथे पर परेशानी

शपथ से पहले ही नई सरकार के समक्ष किसानों की चिंता ने आ घेरा है। मिचौंग तूफान से सरकार के सिर पर ओले पड़ते नजर आ रहा है । बीते तीन दिन से अगले तीन दिन तक बादल बारिश बनी रहेगी। सरकार बनते ही 3100 रुपए में 21 क्विंटल और दो साल का बोनस झोंकने का इंतजार कर रहे किसानों के माथे पर बल पड़ गए हैं। धान मिसाई कर बेचने की तैयारी कर चुके किसानों की फसल के सडऩे की आशंका खड़ी हो गई हैं। खरीदी केंद्रों में तालपत्री की व्यवस्था न कर पाने वाला प्रशासन भला खेतों पड़ी फसल को बचाने क्या कर पाएगा ? 25 तारीख से बोनस बांटने से पहले राजस्व पुस्तिका की धारा - 4 के तहत नुकसान की भरपाई का इंतजाम करना होगा।
नगरीय निकायों में किनकी जाएगी कुर्सी?
नई सरकार के गठन के बीच शहरी सरकार में भारी उठापटक देखने को मिल रही है। कांग्रेस ने महापौर, नगर पालिका व नगर पंचायतों के अध्यक्षों के प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान बदल दिया था। इन्हें पार्षदों के बहुमत से चुना गया था। प्रावधान भी यही है कि पार्षदों के बहुमत से इन्हें हटाया जा सकता है, रि कॉल की व्यवस्था खत्म कर दी गई थी।
प्रदेश के रायपुर, दुर्ग, धमतरी, जगदलपुर, राजनांदगांव, चिरमिरी, रायगढ़, बिलासपुर, अम्बिकापुर और कोरबा नगर निगमों में जनवरी 2021 में तथा बिरगांव, रिसाली, भिलाई, भिलाई-चरौदा और रिसाली में जनवरी 2022 में महापौर चुने गए थे। कांग्रेस के पास अधिकांश नगर-निगमों में पार्षदों का बहुमत था, पर जहां नहीं था, निर्दलियों को साथ लिया गया। जैसे बीरगांव में। यहां भाजपा को जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के पांच पार्षदों का समर्थन मिला लेकिन निर्दलीय पार्षद कांग्रेस के साथ चले गए थे। अभी प्रदेश के इन सभी नगर निगमों में कांग्रेस महापौर हैं। भाजपा ने महापौर का प्रत्यक्ष निर्वाचन खत्म करने का विरोध किया था। उसे लगता था कि सीधे चुनाव से कुछ सीटें उसके पास आ सकती है। नई सरकार अब नियमों में फिर संशोधन करेगी या नहीं, यह तो बाद में मालूम होगा लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं ने अभी से महापौरों को हटाने की मुहिम शुरू कर दी है। रायपुर में एजाज ढेबर ने निश्चिंत होने का दावा किया है, पर भाजपा के सूत्र कहते हैं कि 10 कांग्रेस पार्षदों का उन्हें साथ मिलने वाला है। कोरबा में अगस्त महीने में भाजपा पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव का आवेदन दिया था, पर कुछ तकनीकी कारणों से वह मंजूर नहीं हुआ। अब वहां फिर से आवेदन लगाने की तैयारी हो रही है। धमतरी जैसे नगर-निगम भी हैं, जहां भाजपा के 19 और कांग्रेस के 21 पार्षद चुने गए थे। कांग्रेस ने एक को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। भाजपा कुछ और कांग्रेस पार्षदों के टूटने का दावा कर रही है। राजनांदगांव में भी अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए आवेदन दिया गया था। भाजपा का आरोप है कि उस आवेदन पर सत्ता पक्ष के दबाव में कार्रवाई नहीं की गई। कुछ ऐसा ही माहौल दूसरे नगर-निगमों में भी है, जहां महापौर का ढाई साल पूरा हो चुका है। नगर पालिकाओं पर भी नजर है। मुंगेली में 13 लाख रुपये के नाली निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप में भाजपा के नगरपालिका अध्यक्ष संतूलाल सोनकर को बर्खास्त कर दिया गया था। फिर नया चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस ने भाजपा पार्षदों के वोट भी हासिल किए थे। अब वहां भी भाजपा चाहती है कि कांग्रेस को बेदखल किया जाए।
बाकी चीजें प्रक्रियाओं में उलझ जाए पर जमीनी शहरी कार्यकर्ताओं को जल्दी से जल्दी पद बांटने का सिलसिला शायद एल्डरमेन की नियुक्तियों से हों। नगर निगम से लेकर नगर पंचायत तक इनकी नियुक्ति स्थानीय विधायकों और कांग्रेस संगठन की सिफारिशों पर हुई थी। यदि ये इस्तीफा नहीं देते हैं तो बिना कोई वजह बताए सरकार इनकी नियुक्ति रद्द कर सकती है और भाजपा कार्यकर्ताओं को बिठा सकती है।
नई सरकार रोकेगी चाकूबाजी...?

ग्रामीण इलाकों में स्कूल कॉलेज जाने वाली लड़कियों को आते-जाते कैसा महसूस होता होगा, यह एक साथ सामने आई दो घटनाओं से समझ सकते हैं। बिलासपुर जिले के कोटा में एमए पढ़ रही एक छात्रा पर सिरफिरे आशिक ने चापड़ से हमला किया। वह छात्रा से शादी की जिद कर रहा था, छात्रा नहीं मान रही थी। कॉलेज से घर जाते पहाड़ी रास्ते पर उस पर चापड़ से वार कर दिया। छात्रा गंभीर रूप से घायल है, अस्पताल में है। जशपुर में एक 17 साल की स्कूली छात्रा पर चाकुओं से एक युवक ने हमला कर घायल कर दिया। वह भी छात्रा से एकतरफा प्रेम करता था। लडक़ी के न कहने से उसने इस वारदात को अंजाम दिया। दोनों घटनाओं में यह बात सामने आई है कि आरोपी लडक़े लगातार उसे तंग करते थे लेकिन उनके परिवार के लोगों को तथा टीचर्स को इस बारे में मालूम नहीं था। स्कूल कॉलेजों में मुश्किल से सिर्फ ही पढ़ाई होती है। निजी संवाद खत्म सा है।
कोटा की घटना में जिस चापड़ से हमला किया गया, पता चल रहा है कि इसे ऑनलाइन मंगाया गया। राजधानी रायपुर में चाकू और दूसरे हथियार मंगाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यह पूरे प्रदेश में हो रहा है। एक मोबाइल फोन रखकर आसानी से इसका ऑर्डर किया जा सकता है। रायपुर पुलिस ने ऑनलाइन शॉपिंग ऐप को कई बार लिखा है कि इसकी आपूर्ति नहीं करें, पर यह रुका नहीं है। शायद पुलिस के पास इसे रोकने के पर्याप्त कानून अधिकार न हों। भाजपा ने चाकूबाजी की घटनाओं को सरकार की नाकामी बताकर चुनावी मुद्दा बनाया था। अब उसके सामने चुनौती है कि ऐसी घटनाओं को कैसे रोकें। यह तो तय है कि सिर्फ पुलिस को अलर्ट करने से बात नहीं बनेगी।
भाजपा में भी डिप्टी सीएम की मांग
नई सरकार बस बनने वाली है, सीएम तय होने वाले हैं, मंत्रिमंडल का गठन होने वाला है। ऐसे में उप-मुख्यमंत्री पद की मांग उठ चुकी है। मुंगेली विधायक पुन्नूलाल मोहले ने सातवीं बार विधानसभा चुनाव जीता, चार बार लोकसभा से जीत चुके हैं। 80 के दशक के पहले चुनाव के बाद मोहले ने कभी हार का मुंह नहीं देखा। अब गुरु घासीदास जयंती मनाने के लिए हुई सामाजिक बैठक में उनको उप-मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठ गई है। प्रस्ताव पारित कर लिया गया है। मांग भाजपा के शीर्ष नेताओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा रही है। यह मांग स्थानीय संगठन या पदाधिकारियों की ओर से नहीं की गई है, पर समाज की बैठक में जो लोग मौजूद थे, उनमें अधिकतर भाजपा से जुड़े लोग थे। पूर्व विधायक चोवाराम खांडेकर भी थे, जो उनके साले लगते हैं।
भाजपा की पिछली सरकार में मोहले खाद्य मंत्री थे। वरिष्ठता के आधार पर उन्हें उप-मुख्यमंत्री बनाने की मांग जायज लग सकती है। पर गौर करने की बात यह है कि मुंगेली जिले में कुल दो ही सीटें हैं। दूसरी सीट लोरमी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण साव ने जीती है। उनका नाम तो सीएम पद के लिए चल रहा है। बात नहीं बनी तो डिप्टी सीएम पर विचार हो सकता है। ऐसे में मोहले के लिए डिप्टी सीएम की मांग के कई अर्थ लगाए जा सकते हैं। कई लोग कह रहे हैं कि भाजपा में इस तरह से मांग नहीं की जाती। संगठन नाराज हो जाता है। ऐसी बातों को हवा देने से अरुण साव की दावेदारी कमजोर पड़ जाएगी। वैसे मोहले, डॉ. रमन सिंह के पसंदीदा सहयोगियों में से एक हैं।
बागी भारी थे या भितरघाती?
कांग्रेस की हार का हर कोई अपने-अपने तरीके से विश्लेषण कर रहा है और कारण बता रहा है। इसमें एक है, बागी होकर चुनाव लडऩे वालों को रोक नहीं पाना और भितरघात से नहीं निपट पाना। बागी प्रत्याशी वाली सीटों पर नजर डालने से मालूम होता है कि एक दो को छोडक़र बाकी में अधिकृत उम्मीदवार यदि बागी खड़े नहीं होते तब भी नहीं जीत पाते। यह बात अलग है कि बगावत के चलते अधिकृत के खिलाफ माहौल बना हो और मतदाताओं ने किसी तीसरे को वोट दे दिया हो।
उत्तर रायपुर की सीट जरूर ऐसी थी जिसमें कांग्रेस के बागी अजीत कुकरेजा को 22 हजार 939 वोट मिले, जबकि अधिकृत प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा की हार करीब इतने ही 23 हजार 54 वोटों से हुई। कुकरेजा यदि मैदान में नहीं होते तो शायद जुनेजा अपनी सीट बरकरार रखने में सफल हो जाते।
मगर हर जगह ऐसा नहीं था। अंतागढ़ सीट से अनूप नाग निर्दलीय लडक़र ज्यादा कमाल नहीं दिखा सके। उन्होंने 9415 वोट हासिल किए। कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी में रहे मंतूराम पवार ने भी यहां निर्दलीय लडक़र 15063 वोट झटके। नाग और पवार के कुल वोट 24 हजार से ऊपर हैं, जबकि विक्रम उसेंडी की 23 हजार 710 वोटों से जीत हुई है।
जशपुर में बगावत कर निर्दलीय उतरने पर प्रदीप खेस को कांग्रेस ने 6 बागी नेताओं के साथ ही निष्कासित कर दिया था। खेस को 7571 वोट मिले। यहां से विधायक विनय भगत भाजपा की रायमुनि भगत से 17 हजार 645 वोटों से हार गए। यानि भगत तब भी जीत जातीं, जब खेस मैदान में नहीं होते।
मुंगेली जिला कांग्रेस के अध्यक्ष सागर सिंह बैस ने टिकट नहीं मिलने पर जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का दामन थाम कर लोरमी से चुनाव लड़ा। उन्होंने 15 हजार 910 वोट हासिल किए। यहां से कांग्रेस उम्मीदवार थानेश्वर साहू सिर्फ 29 हजार 179 वोट पा सके। कांग्रेस का वोट काटने में एक निर्दलीय उम्मीदवार संजीत बर्मन का भी हाथ था। उसे 25 हजार 126 वोट मिले, अनुसूचित जाति के वोट इनके पक्ष में आए। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव ने 45 हजार 891 के अंतर से यहां चुनाव जीता।
कसडोल से कांग्रेस टिकट नहीं मिलने पर गोरेलाल साहू ने चुनाव लड़ा। मगर इससे फर्क नहीं पड़ा और प्रत्याशी संदीप साहू 33 हजार 765 मतों से जीत गए। गोरेलाल को केवल 5395 वोट मिले। दंतेवाड़ा से अमूलकर नाग ने कांग्रेस की टिकट नहीं मिलने पर पार्टी छोडक़र निर्दलीय चुनाव लड़ा और 3248 मत जुटा पाए। यहां पर भाजपा प्रत्याशी चेतराम अटामी ने कांग्रेस प्रत्याशी छविंद्र कर्मा को 16 हजार 803 वोटों से हराया। इसी तरह की स्थिति लैलूंगा धमतरी, भाटापारा सीटों पर बनी थी। कुल मिलाकर बगावत कांग्रेस को हराने के लिए अधिक जिम्मेदार नहीं है। लोरमी और अंतागढ़ में निर्दलियों के हिस्से में बहुत अधिक वोट गए, जिसका फायदा भाजपा की भारी अंतर से जीत रही।
मगर, असली संकट भितरघातियों का रहा। इनमें से कुछ का पता चलने पर संगठन ने कार्रवाई की चाबुक भी चलाई लेकिन यह कार्रवाई देर से हुई। समय रहते नहीं रोका, समझाया गया या कोशिश सफल नहीं हुई। महासमुंद से हारने वाली कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. रश्मि चंद्राकर ने अपने सोशल मीडिया पेज पर इस बात का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति विरोधी से लडक़र तो जीत सकता है, पर परिवार की लड़ाई में हार जाता है। लड़ाई भाजपा से नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के अपने पदाधिकारियों से रही।
उत्कृष्ट पढ़ाई का क्या होगा?
सरकार बदलने के बाद कई चीजें बदलने वाली है। भूपेश सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाओं पर नई सरकार का क्या रुख होगा, लोगों में जिज्ञासा के साथ चिंता भी है। स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम उत्कृष्ट स्कूलों के बाद इसी पैटर्न में कॉलेज भी कई जिलों में शुरू किए गए। लेकिन उनमें भर्तियां नहीं हो पाई और चुनाव आ गए। स्थिति यह है कि माध्यम अंग्रेजी है, पर अंग्रेजी के टीचर ही नहीं है। रायगढ़ में खोले गए कॉलेज में आधा सत्र बीत जाते के बाद भी पढ़ाई ठप है। कई छात्रों ने अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी निकलवा लिया। वैसे भी जितनी सीटें थी, उतने एडमिशन नहीं हुए। ऐसी दिक्कत कई स्कूलों में भी आ रही है। अधिकांश जिलों में इसका संचालन डीएमएफ फंड से किया जा रहा है। राज्य सरकार ने इसके लिए अलग बजट का प्रावधान नहीं किया था। यहां कई शिक्षक, शिक्षा विभाग से डेपुटेशन पर हैं, मगर अधिकांश की नियुक्ति अनुबंध पर की गई है। इन्हें वेतन भी रुक-रुक कर मिल रहा है। अब यह नई सरकार के ऊपर है कि वह स्वामी आत्मानंद कॉलेज, स्कूलों के कंसेप्ट को ही खत्म करती है या फिर इन्हें सुचारू रूप से चलाने के लिए सेटअप के अनुसार शिक्षकों की पूरी भर्ती करती है। हो सकता है निर्णय तत्काल न हो। ऐसा न होने पर स्कूल, कॉलेज में उत्कृष्ट पढ़ाई की उम्मीद में एडमिशन लेने वाले विद्यार्थियों के इस सत्र का नुकसान होने वाला है।
लंबी पारी की उम्मीद में...
बस्तर संभाग की जिन 12 सीटों में से 4 पर भाजपा की हार हुई है, उनमें एक बस्तर विधानसभा सीट भी है। यहां लखेश्वर बघेल फिर जीते। भाजपा प्रत्याशी मनीराम कश्यप हारने के बाद मतदाताओं से मिलने पहुंचे और कुछ इस तरह उनका आभार जताया। उन्हें शायद लग रहा हो कि 6 हजार वोट से ही तो हारे हैं, पांच साल तो देखते-देखते बीत जाएंगे।
मुख्य सचिव, डीजीपी और इंटेलिजेंस चीफ
जब भी सरकार बदलती है तो सबसे पहले निशाने पर मुख्य सचिव, डीजीपी और इंटेलिजेंस चीफ होते हैं। ब्यूरोक्रेसी में इस बात की चर्चा छिड़ गई है कि वर्तमान में जो अफसर हैं, उनका क्या होगा। कुछ नाम भी विकल्प के तौर पर गिना जा रहे हैं। हालांकि यह भी तर्क है कि मुख्य सचिव अमिताभ जैन सौम्य छवि के हैं। वे राजनीतिक उठापटक में नहीं रहे। डीजीपी अशोक जुनेजा रमन सरकार ने इंटेलिजेंस चीफ थे, इसलिए संभव है कि उन्हें कार्यकाल पूरा होने तक न छेड़ा जाए। रही बात इंटेलिजेंस चीफ आनंद छाबड़ा की तो वे कुछ महीनों के फ़ासले से दो बार ख़ुफिय़ा मुखिया बने। देखना है कि नई सरकार का इन अफसरों को लेकर क्या रुख रहता है।
सीएम सचिवालय
सरकार बदलने के साथ ही सीएम ऑफिस में भी बदलाव होगा। हालांकि अभी सीएम कौन होगा, इस पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व विचार मंथन कर रहा है। सीएम अपनी पसंद से अपने सचिवालय में अफसरों की पोस्टिंग करते हैं। सीएम के सचिव का पद काफी पॉवरफुल माना जाता है। ऐसे में प्रशासनिक हलकों में नए सीएम के सचिव के नाम को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं।
कहा जा रहा है कि केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ एक-दो अफसरों को सीएम सचिवालय में भेजा जा सकता है। जिन तीन अफसरों के नाम की चर्चा है उनमें रमन सिंह के सचिव रहे सुबोध सिंह, रजत कुमार, और डॉ. रोहित यादव प्रमुख हैं। सुबोध केन्द्र सरकार में अतिरिक्त सचिव स्तर के पद पर हैं। जबकि रजत कुमार डीओपीटी में संयुक्त सचिव हैं। इससे परे डॉ. रोहित यादव पीएमओ में संयुक्त सचिव हैं। सीएम सचिव कौन होगा, यह उनकी पसंद पर निर्भर है। फिलहाल तो मंत्रालय में अफसर अपना-अपना अंदाजा लगा रहे हैं।
शिकायत वाले अफ़सरों का क्या होगा?
पुलिस महकमे में शीर्ष स्तर पर बदलाव का हल्ला है। बीएसएफ में आईजी रहे 90 बैच के आईपीएस अफसर राजेश मिश्रा का कद बढ़ सकता है। मिश्रा स्पेशल डीजी हैं, लेकिन भूपेश सरकार में वो अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण पद पर हैं। अंदाजा लगाया जा रहा है कि राजेश मिश्रा को पुलिस प्रशासन में अहम जिम्मा दिया जा सकता है। इससे परे तीन आईपीएस अफसरों को किनारे लगाया जा सकता है, जो वर्तमान में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। खास बात यह है कि तीनों अफसरों के खिलाफ मुख्य चुनाव आयुक्त को शिकायत भेजी गई थी, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब नई सरकार इन अफसरों के खिलाफ सीधे कोई कदम उठा सकती है।
दांव पर कुछ अधिक ही

कांग्रेस की हार से ज्यादा अब प्रदेश देश में पराजित मंत्री अमरजीत भगत की मूंछ दांव पर है। उनके दावा तो पूरा नहीं हुआ लेकिन जो उन्होने दांव लगाया था लेग अब उनके पीछे लग गए हैं। भाजपा के नेता तो हर रोज ट्वीट कर तंज कस रहे हैं। आज पार्टी ने तो मूछों को दांव पर लगाने वाले स्व.दिलीप सिंह जूदेव की फोटो के साथ बिना मूंछ के भगत की फोटो पेस्ट कर ट्वीट किया है । वैसे भगत बिना मूंछ के भी अच्छे ही दिख रहे हैं। उनके पड़ोसी भाजपा के महामंत्री केदार कश्यप ने तो एक बयान दिया है कि मूंछ मुंडवाने में मैं मदद कर सकता हूं। इन सबमें वह मीडिया रिपोर्टर परेशान हैं जिसे भगत ने आन कैमरा बयान दिया था। वह भी कहने लगा है कि मुझे ही कैंची, शेविंग किट लेकर जाना पड़ेगा लगता है ।
ओवर कॉन्फिडेंस
इस चुनाव में ओवर कॉन्फिडेंस के दो उदाहरण देखने को मिला। चुनाव के पहले कांग्रेस ओवर कॉन्फिडेंस में थी इसलिए हार गई और भाजपा चुनाव से पहले संभल कर चल रही थी, लेकिन वोटिंग और एग्जिट पोल के बाद इतना कॉन्फिडेंस आ गया कि रिजल्ट के एक दिन पहले ही भाजपाइयों ने अपने सोशल मीडिया पर कमल खिला दिया था। एक नेता ने तो बाकायदा रेत के एक ढेर का लाइव वीडियो कर ऐलान कर दिया कि कल से यह नहीं चलने वाला है।
कमजोर कड़ी की तलाश
कांग्रेस की सरकार में अपनी चलाने वाले अफसर अब उस कमजोर कड़ी की तलाश में जुट गए हैं, जो बीजेपी में भी सब ठीक ठाक कर दे। खबर है कि कुछ ब्यूरोक्रेट्स की एक उभरते हुए नेता के साथ मीटिंग हुई है। अफसरों ने भाजपा को नीचा दिखाने का कोई मौका पीछे नहीं छोड़ा था, इसलिए उन्हें डर है कि कहीं पिछली सरकार जैसा हुआ तो उनकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी, इसलिए मैनेज करने में जुट गए हैं। अपने सर्वे में कांग्रेस की सरकार बनाने वाले एक आईएएस ने भी आरएसएस से जुड़े कुछ लोगों को संपर्क किया है।
परदे के पीछे आरएसएस..

छत्तीसगढ़ सहित तीन राज्यों में भाजपा की जीत के बाद यह तस्वीर पार्टी के कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। अलग-अलग स्लोगन के साथ। एक में लिखा है- कौन है जो खामोशी के साथ आता है, चुपचाप अपना काम करता है और लौट जाता है। एक दूसरी पोस्ट में कहा गया है-सभी मौन साधकों को प्रणाम...।
जाहिर है यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए कहा जा रहा है। अब जब चुनाव परिणाम आ गए हैं, खबर आ रही है कि 6 माह पहले से आरएसएस कार्यकर्ताओं ने सरगुजा, बस्तर में डेरा डाल रखा था। वे चुनाव आते तक वहीं रुके। बिना सभा किये, पोस्टर बैनर के बिना घर-घर संपर्क कर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते रहे। यह ध्यान जरूर आता है कि भाजपा संगठन की बैठक के दौरान बार-बार यह कहा जाता था कि उनके कार्यकर्ता घर-घर पहुंचेंगे। पर इसका शोर कम हुआ। महतारी वंदन योजना जिसमें एक महिला को साल में 12 हजार रुपये देने की बात है, के लाखों फॉर्म भी बिना प्रचार किए भरवाये गए। कांग्रेस के नेता न इसे भांप पाए, न ही उनके पास ऐसा कैडर था जो जवाब दे पाता।
मंत्री का बेटा बना चपरासी...

एक बार सांसद विधायक बन जाने के बाद वह कम से कम अपने बाल-बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होने का इंतजाम तो कर ही देता है। कोई व्यापार करने लगता है, कोई ठेकेदारी। नौकरी भी लगती है तो ठीक-ठाक, वरना पिता की तरह राजनीति में कूद जाता है। मगर, झारखंड में अलग हटकर एक घटना हुई है। यहां के श्रम एवं रोजगार मंत्री सत्यानंद भोक्ता के बेटे मुकेश भोक्ता ने चपरासी बनना तय किया है। उसने यहां के व्यवहार न्यायालय में भर्ती निकलने पर आवेदन किया और चुन लिया गया। उसके चचेरे भाई का नाम भी प्रतीक्षा सूची में है। मुकेश का कहना है कि पिता का अपना पेशा है, उसका अपना। पिता के भरोसे कैसे रहूं। मुझे अपनी आजीविका भी तो देखनी है। हद यह है कि इसमें भी विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि मंत्री की सिफारिश से भर्ती हुई है।
बिना सिफारिश ही नियुक्ति मिल गई होगी, लेकिन क्या ऐसा लगता है कि मंत्री पिता के रहते बेटा ड्यूटी पर जाएगा? उस तक घर बैठे वेतन तो नहीं पहुंचने वाला है? उसने किसी जरूरतमंद बेरोजगार का हक तो नहीं मार दिया?
अविश्वसनीय
अंबिकापुर सीट के मतों की गिनती रोमांचक रही है। न तो कांग्रेस, और न ही भाजपा के कई स्थानीय नेताओं को भरोसा था कि भाजपा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल की जीत होगी। राजेश, सरगुजा राजघराने के मुखिया डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव को कड़े संघर्ष के बाद 94 मतों से हराने में कामयाब रहे।
बताते हैं कि जीत की घोषणा में विलंब हो रहा था। तभी केन्द्रीय राज्य मंत्री रेणुका सिंह का फोन एक कार्यकर्ता के पास पहुंचा, और फिर उन्होंने रेणुका सिंह की कलेक्टर से बात कराई। चर्चा है कि रेणुका सिंह का लहजा इतना सख्त था कि कलेक्टर भी हड़बड़ा गए, और फिर उन्होंने तुरंत राजेश अग्रवाल को विजयी प्रमाण पत्र जारी किया।
बाबा की हार की वजह
अंबिकापुर में टीएस सिंहदेव की हार में हकीम अब्दुल मजीद की भी अहम भूमिका रही है। जोगी पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल हकीम ने करीब 12 सौ वोट हासिल किए। हकीम को अपने मुस्लिम समाज के वोट मिले, जो कि कांग्रेस के परम्परागत वोटर रहे हैं। यद्यपि सिंहदेव समर्थकों ने नामांकन से पहले उन्हें अपने पक्ष में करने की भरपूर कोशिश की थी, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए।
मतगणना के दौरान अब्दुल मजीद, भाजपा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल के साथ खड़े थे, और उन्हें दिलासा दे रहे थे। राजेश लगातार लीड घटने से घबराए हुए थे। अब्दुल हकीम उनसे मजाकिया लहजे में कह रहे थे कि घबराने की जरूरत नहीं है। उनके पास दवाई है। और जब टीएस सिंहदेव हार गए, तो उनके समर्थकों का गुस्सा अब्दुल हकीम पर फूट पड़ा, और उन्होंने हकीम के साथ झूमाझटकी की। बाद में पुलिस हस्तक्षेप के बाद हकीम किसी तरह बच पाए।
पार्टी का खर्च बचा
कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेताओं को सरकार के रिपीट होने का भरोसा था। तमाम एग्जिट पोल का भी नतीजा कुछ इसी तरह का था। मगर कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा।
बताते हैं कि सरकार के एक ताकतवर मंत्री के अति उत्साही करीबियों ने मतगणना की एक दिन पहले बंगले में विजयी पार्टी का भी आयोजन कर रखा था। इसमें एक हजार कार्यकर्ताओं, और कई नेताओं को बुलाने की तैयारी थी।
इसी बीच किसी ने मंत्री जी के कान में फूंक दिया कि पार्टी का खर्चा, चुनाव खर्च में जुड़ जाएगा। क्योंकि चुनाव आचार संहिता प्रभावशील है। फिर मंत्री जी ने पार्टी को कैंसल कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि अगले दिन मंत्रीजी खुद बुरी तरह चुनाव हार गए। इस हार से मंत्री जी, और उनके समर्थक हतप्रभ हैं।
बूढ़ादेव प्रसन्न
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 23 साल बाद पाली-तानाखार में वापसी की है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरासिंग मरकाम अविभाजित मध्यप्रदेश में विधायक चुने गए थे। इसके बाद छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे उतने सफल नहीं हो सके। पिछले साल उनका निधन हो गया और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी अनाथ जैसी हो गई। उनके बेटे तुलेश्वर ने कमान संभाली और पार्टी के फिर से खड़ा करने में जी जान लगा दी। इसमें उन्होंने गोंडवाना समाज के हर रीति-रिवाज का भी पालन किया। चुनाव के पहले वे गोंडवाना समाज के देव बूढ़ादेव के मंदिर पहुंचे। धमधा के त्रिमूर्ति महामाया मंदिर में पूजा-पाठ, अनुष्ठान भी किया। उन्होंने अपने इष्टदेव को प्रसन्न करने सारा जतन किया। इसके बाद समाज का साथ मिला। बूढ़ादेव भी प्रसन्न हो गए और भाजपा की आंधी और कांग्रेस से टक्कर लेते हुए उन्होंने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को एक सीट दिलाने में सफलता हासिल कर ही ली।
महंत साबित हुए असली लीडर
विधानसभा चुनाव के नतीजे भले ही कांग्रेस के अनुकूल नहीं रहे हैं। मगर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत को अविभाजित जांजगीर-चांपा जिले में कांग्रेस की जीत का असली नायक कहा जा रहा है। डॉ. महंत न सिर्फ खुद सक्ती सीट से चुनाव जीते, बल्कि जिले की तमाम सीट जांजगीर-चांपा, अकलतरा, चंद्रपुर, पामगढ़, और जैजैपुर से कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने में अहम भूमिका निभाई। सोशल मीडिया पर उन्हें असली लीडर कहा जा रहा है। जांजगीर-चांपा की तरह बालोद जिले में भी कांग्रेस के पक्ष में माहौल रहा, और यहां की तीनों सीटें पार्टी जीतने में कामयाब रही है।
सीटों और वोटों के बीच का फासला
किसी पार्टी को मिले वोट और उसकी जीतने वाली सीटों में अक्सर बड़ा फर्क होता है। मध्य प्रदेश में सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41 और कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत मत मिले थे। पर वहां कांग्रेस को सीटें 114 मिल गई और भाजपा को 109 ही। कुल वोट कम मिलने के बावजूद कांग्रेस की वहां सरकार बन गई थी।
इस बार तीन राज्यों में कांग्रेस की बुरी तरह हार हो गई। पर उसे मिले वोटों का फासला सीटों की तुलना में देखना दिलचस्प होगा। जैसे राजस्थान में भाजपा को करीब 1 करोड़ 65 लाख वोट मिले, कांग्रेस को 1 करोड़ 56 लाख। दोनों के बीच वोटों का अंतर 9 लाख के आसपास है। मगर यहां भाजपा को 115 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 69 सीटों पर रुक गई। मध्यप्रदेश में भाजपा को करीब 2 करोड़ 11 लाख मिले वहां कांग्रेस को 1 करोड़ 75 लाख। पर सीटों का अंतर बहुत अधिक आ गया। कांग्रेस 66 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 163 सीटों पर जीत हासिल की। भाजपा ने कांग्रेस के दोगुने से भी अधिक सीटें हासिल कर ली। छत्तीसगढ़ में भाजपा को लगभग 72 लाख वोट मिले, कांग्रेस को 66 लाख। दोनों के बीच वोटों का अंतर करीब 6 लाख का ही है। पर भाजपा ने अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल करते हुए यहां 54 सीटों पर काबिज हुई और कांग्रेस 35 पर रह गई। राज्य बनने के बाद से लगातार सत्ता में रही भारत राष्ट्र पार्टी का भी तेलंगाना में यही हाल रहा। उसे करीब 87 लाख वोट मिले, पर कांग्रेस ने 5 लाख अधिक 92 लाख वोट लेकर उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। बीआरएस ने 2018 के मुकाबले में 49 सीटें गंवा दी। यहां भाजपा ने भी 32 लाख वोट हासिल किए हैं। पर उसे सिर्फ 8 सीटें मिली। लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही होता है। भाजपा ने सन् 2019 में 37.36 प्रतिशत वोट हासिल किए लेकिन उसे 303 सीटें मिलीं। सन् 2014 के चुनाव में तो 31 प्रतिशत वोट ही मिले थे।
सीटों और वोटों के बीच का फासला
किसी पार्टी को मिले वोट और उसकी जीतने वाली सीटों में अक्सर बड़ा फर्क होता है। मध्य प्रदेश में सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41 और कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत मत मिले थे। पर वहां कांग्रेस को सीटें 114 मिल गई और भाजपा को 109 ही। कुल वोट कम मिलने के बावजूद कांग्रेस की वहां सरकार बन गई थी।
इस बार तीन राज्यों में कांग्रेस की बुरी तरह हार हो गई। पर उसे मिले वोटों का फासला सीटों की तुलना में देखना दिलचस्प होगा। जैसे राजस्थान में भाजपा को करीब 1 करोड़ 65 लाख वोट मिले, कांग्रेस को 1 करोड़ 56 लाख। दोनों के बीच वोटों का अंतर 9 लाख के आसपास है। मगर यहां भाजपा को 115 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 69 सीटों पर रुक गई। मध्यप्रदेश में भाजपा को करीब 2 करोड़ 11 लाख मिले वहां कांग्रेस को 1 करोड़ 75 लाख। पर सीटों का अंतर बहुत अधिक आ गया। कांग्रेस 66 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 163 सीटों पर जीत हासिल की। भाजपा ने कांग्रेस के दोगुने से भी अधिक सीटें हासिल कर ली। छत्तीसगढ़ में भाजपा को लगभग 72 लाख वोट मिले, कांग्रेस को 66 लाख। दोनों के बीच वोटों का अंतर करीब 6 लाख का ही है। पर भाजपा ने अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल करते हुए यहां 54 सीटों पर काबिज हुई और कांग्रेस 35 पर रह गई। राज्य बनने के बाद से लगातार सत्ता में रही भारत राष्ट्र पार्टी का भी तेलंगाना में यही हाल रहा। उसे करीब 87 लाख वोट मिले, पर कांग्रेस ने 5 लाख अधिक 92 लाख वोट लेकर उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। बीआरएस ने 2018 के मुकाबले में 49 सीटें गंवा दी। यहां भाजपा ने भी 32 लाख वोट हासिल किए हैं। पर उसे सिर्फ 8 सीटें मिली। लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही होता है। भाजपा ने सन् 2019 में 37.36 प्रतिशत वोट हासिल किए लेकिन उसे 303 सीटें मिलीं। सन् 2014 के चुनाव में तो 31 प्रतिशत वोट ही मिले थे।
परिणाम के पहले का माहौल..

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के नेता ही नहीं, कार्यकर्ता भी ओवरकांफिडेंट थे। जैसे छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, राजस्थान में अशोक गहलोत का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा था वैसे ही मध्यप्रदेश में कमलनाथ को सीएम मान लिया था। मध्यप्रदेश में ऐसे ही एक अति उत्साही कार्यकर्ता ने नतीजा आने से पहले ही सडक़ पर स्वागत द्वार लगा रखा था। ([email protected])
छत्तीसगढ़ की गरीबी का सबूत...
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान प्रलोभनों और कदाचार को रोकने के लिए इस बार चुनाव आयोग के आदेश पर की गई छापेमारी और तलाशी का आंकड़ा बताता है कि धन का चुनावों में असर कितनी तेजी से बढ़ रहा है। सन् 2018 में इन्हीं पांच राज्यों से चुनाव के दौरान 239.15 करोड़ रुपये की नगदी और अवैध सामान जब्त किए गए थे। इस बार 20 नवंबर को जारी आंकड़े के मुताबिक यह रकम 7.35 गुना अधिक 1760 करोड़ पहुंच गई। इस आंकड़े के जारी होने के बाद राजस्थान और तेलंगाना में वोट डाले गए थे। रकम बढ़ गई होगी। जब्ती के बावजूद प्रत्याशियों ने रास्ता निकाला और निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च किए। वास्तविक खर्च का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है जिसका एक आकलन 20 नवंबर के आंकड़ों से भी किया जा सकता है। जैसे, 119 सीटों वाले तेलंगाना से 659.2 करोड़ रुपये जब्त हुए। इसे प्रत्येक विधानसभा में बांट दें तो रकम 5.539 करोड़ रुपये होती है। राजस्थान से तेलंगाना के मुकाबले कुछ कम 650.7 करोड़ रुपये जब्त हुए यहां 199 सीटें हैं। एक सीट पर औसत जब्ती 3.269 करोड़ की बैठती है। मध्यप्रदेश से 323.7 करोड़ रुपये जब्त हुए। यहां 230 सीटों पर वोट पड़े। यानि एक विधानसभा से 1.407 करोड़ रुपये जब्त। मिजोरम में 40 सीटों पर चुनाव हुए। यहां से 49.6 करोड़ रुपये की जब्ती हुई। यानि एक सीट पर करीब 1.24 करोड़ रुपये की। छत्तीसगढ़ से 76.9 करोड़ की जब्ती हुई। 90 सीटों के हिसाब से एक विधानसभा क्षेत्र में यह 85.4 लाख रुपये के आंकड़े को छूता है।
इन सभी आंकड़ों में नगद राशि के अलावा जब्त सामान की कीमत भी शामिल है। ये भारी भरकम रकम वास्तविक खर्च का एक मामूली हिस्सा ही हो सकता है। वैसे एक प्रत्याशी को सिर्फ 40 लाख रुपये खर्च करने की अनुमति है, जिसका पालन नहीं होता। यदि किसी दिन चुनाव के दौरान होने वाली जब्ती को उस राज्य की संपन्नता का पैमाना माना जाएगा तो छत्तीसगढ़ की जगह बहुत नीचे होगी। यहां तो औसत एक करोड़ भी नहीं हुआ। तेलंगाना सबसे अमीर राज्य है, जहां एक के पीछे 5 करोड़ से अधिक की जब्ती है। मिजोरम जैसे छोटे राज्य का आंकड़ा भी हैरान कर सकता है, जहां प्रलोभन पर निगरानी के लिए चुनाव आयोग के समानांतर एक मजबूत सिविल सोसायटी काम करती है।
पति पत्नी के बीच प्रोफेशनल तालमेल..

राजनांदगांव का एक व्यवसायी प्रकाश गोलछा के खिलाफ अपने पार्टनर के नौकर की हत्या का आरोप है। घटना के बाद से वह फरार चल रहा था। देश के अलग-अलग हिस्सों में उसका लोकेशन मिला, लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले वह चकमा देकर भाग जाता था। कोतवाली टीआई एमन साहू के पास सूचना आई कि आरोपी सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर बैठा है और किसी ट्रेन का इंतजार कर रहा है। साहू को लगा कि उसकी पत्नी तरुणा साहू उसकी मदद कर सकती हैं, जो आरपीएफ में सब इंस्पेक्टर है और मंदिर हसौद में पदस्थ हैं। तरुणा को उन्होंने फोन पर पूरी जानकारी देकर आरोपी की तस्वीर भेजी। पत्नी तुरंत सक्रिय हो गईं। सिकंदराबाद में आरपीएफ से उन्होंने संपर्क किया। आरोपी पर वहीं से निगरानी रखी जाने लगी। आरोपी पटना स्पेशल ट्रेन में सवार हो चुका था। आरपीएफ जवानों के अलावा ट्रेन में चाय नाश्ता लेकर चलने वाले वेंडर देख रहे थे कि वे कहीं रास्ते में तो नहीं उतर रहा। जैसे ही ट्रेन छत्तीसगढ़ की सीमा पर पहुंची मौके पर तैनात आरपीएफ निरीक्षक प्रशांत अडल्क की टीम ने उसे हिरासत में ले लिया। मतलब यह है कि पति-पत्नी जब एक ही प्रोफेशन में हों तो एक दूसरे की समस्या को ठीक तरह से समझ सकते हैं और उसका समाधान अच्छा ही निकल आता है।
गिनती सिर्फ चार राज्यों में....
पांच राज्यों के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने विधानसभा चुनावों की एक साथ घोषणा की थी और 3 दिसंबर को एक साथ सभी में वोटों की गिनती भी तय थी। पर मिजोरम में तारीख एक दिन आगे बढ़ाई गई है और अब वहां के रिजल्ट सोमवार को आएंगे। यहां की 87 प्रतिशत आबादी ईसाई है और यहां के सात प्रमुख चर्चों का एक संयुक्त संगठन मिजो नेशनल फोरम है। इसी की मांग पर चुनाव आयोग को तारीख बदलनी पड़ी। यह फैसला तब लिया गया जब फोरम ने कहा कि 3 दिसंबर को रविवार है और वे सुबह चर्च जाते हैं। रविवार को मतगणना के दौरान न तो कर्मचारी उपलब्ध हो सकेंगे न ही प्रत्याशियों के एजेंट। चुनाव आयोग ने बात मान ली और गिनती एक दिन आगे बढ़ा दी। हालांकि कुछ दलों ने इसका विरोध भी किया। पर यह बदलाव करते समय धार्मिक आस्था की जगह संभवत: आयोग ने यह ध्यान रखा होगा कि इस दिन मानव संसाधन उपलब्ध होंगे या नहीं। राजस्थान में इसी वजह से एकादशी के दिन तय मतदान की तारीख को आगे बढ़ाकर 25 नवंबर किया गया, लेकिन छत्तीसगढ़ में छठ पूजा के दिन मतदान टालने की मांग नहीं मानी गई। जबकि सभी दलों की ओर से यह मांग उठाई गई थी।
जंगल में चौसिंगा मरे, किसी ने नहीं देखा
पिछले दो महीने से प्रदेश का सारा प्रशासनिक अमला चुनावी मोड में हैं। दो चार विभागों को उनके कामकाज की प्रकृति के चलते चुनाव ड्यूटी से पूरी तरह अलग रखा जाता है, या उनमें से कम कर्मचारियों को संलग्न किया जाता है। इनमें वन विभाग भी एक है। पर इस दौरान सभी अधिकारी, कर्मचारियों को छुट्टी लेने पर रोक होती है और वे तब तक आयोग के नियंत्रण में रहते हैं, जब तक आचार संहिता खत्म नहीं हो जाती। ऐसे में जंगल सफारी, नया रायपुर के डॉक्टर राकेश वर्मा गोवा की सैर पर निकल गए। इनको अपने संचालक से छुट्टी नहीं मिली तो सबसे बड़े बॉस पीसीसीएफ, वाइल्ड लाइफ से ले ली। चुनाव आचार संहिता की तो एक बात थी, सफारी के संचालक, डीएफओ ने उनको छुट्टी से मना करते हुए दो गंभीर कारण बताये थे। एक तो खुद संचालक को विभागीय पेशी के चलते दिल्ली जाना था, दूसरा उन्होंने बताया कि जंगल सफारी में चौसिंगा बीमार पड़ रहे हैं, कुछ की मौत भी हो गई है। ऐसे में डॉक्टर का सफारी में ड्यूटी देना जरूरी है। पीसीसीएफ की उदारता और डॉक्टर की हठधर्मिता से नुकसान यह हुआ कि अब तक 17 जंगल सफारी में चौसिंगा मारे जा चुके हैं। चर्चा तो यह भी है कि इस बीच कुछ काले हिरण, नील गायों की मौत भी हो गई, कुल मिलाकर इनकी संख्या 40 है। इनके बीच की एक अफसर सीसीएफ एम. मर्सिबिला का तो कहना है कि इन मौतों का तो उन्हें पता ही नहीं। पर, पूरा मामला संचालक की ओर से पीसीसीएफ को भेजे गए एक शिकायती पत्र के वायरल होने से सामने आ गया, जिसमें डॉक्टर की छुट्टी पर ऐतराज किया गया है। जंगल सफारी में सुविधा यह है कि यह जंगल भी है और राजधानी के पास भी। इसके बावजूद यहां जिम्मेदारी संभाल रहे अफसरों में वन्यजीवों के लिए कितनी संवेदनशीलता है, यह दिखाई दे रहा है। इन्हीं के हाथ में जंगल सफारी के 700 जानवरों की देखभाल का जिम्मा है।
राज-काज से विश्राम मिलने पर..

विधानसभा चुनाव से नतीजे से पहले कई प्रत्याशियों की धुकधुकी बढ़ गई है, जाहिर नहीं कर रहे पर कई दिनों से चिंता में डूबे हैं। न जाने मतदाता उनके साथ कैसा सलूक करेंगे। दूसरी तरफ कई उम्मीदवार हैं, जिनका दिल धक-धक तो कर रहा है, मगर घबराहट में नहीं। इस मतदान और मतगणना के बीच के समय का इत्मीनान से आनंद उठा रहे हैं। जशपुर के विधायक और कांग्रेस प्रत्याशी विनय भगत इसी मूड में हैं। उनका एक 59 सेकेंड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें वे अपनी जीवनसंगिनी के साथ फुरसत के मूड में एक बॉलीवुड गाने पर अभिनय कर रहे हैं। वैसे भगत की प्रोफाइल पर बहुत से ऐसे वीडियो भी हैं, जिनमें वे डांस कर रहे हैं।
नक्सल क्षेत्र के विद्यार्थियों में चिंता
बीते दो-तीन सालों के भीतर बस्तर के अंदरूनी इलाकों तक मोबाइल टावर लगाने में अच्छी कामयाबी मिली। अब यहां टावरों की संख्या 500 के आसपास पहुंच चुकी है, जो सात-आठ साल पहले तक करीब 70 ही थी। इस सुविधा का लाभ केवल यही नहीं हुआ है कि उन्हें 112, 108, महतारी एक्सप्रेस जैसी आपात स्थिति में स्वास्थ्य सुविधा मिल जाती है, बल्कि ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम से कई तरह के भुगतान भी हो जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए तो यह वरदान सरीखा है। दूरदराज के अनेक अब विद्यार्थी देश के बड़े शिक्षण संस्थानों से ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे और कोचिंग संस्थानों से कोचिंग ले रहे हैं। पर, नक्सलियों को लगता है कि इन टावरों से सुरक्षा बलों का सूचना तंत्र मजबूत हो रहा है। इसके चलते वे मोबाइल टावरों को जलाकर नष्ट कर रहे हैं। अभी पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी, पीएलजीए 2 से 8 सितंबर तक शहीदी सप्ताह मनाने जा रहा है। इसके पहले ही उन्होंने कांकेर और पखांजूर में दो मोबाइल टावरों को फूंक दिया। कुछ समय पहले नारायणपुर और दंतेवाड़ा में भी उन्होंने टावरों को आग लगाई। पर इस उपद्रव से वे बच्चे भी तनाव से गुजर रहे हैं, जिनकी नेटवर्क में व्यवधान के चलते पढ़ाई बीच में ठहर रही है।
अफ़सरों का असमंजस

चुनाव नतीजे आने से पहले ही अफसरशाही में हलचल बढ़ गई है। चर्चा है कि संविदा पर पोस्टेड कुछ आईएएस अफसरों ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। एक अफसर ने तो अभी से सरकारी गाड़ी लौटा भी दी है। संकेत साफ हैं कि सरकार रिपीट नहीं हुई, तो ये अफसर अपना इस्तीफा सीएस को भेज सकते हैं।
ये संविदा अफसर मौजूदा सरकार के करीबी माने जाते हैं। उनकी सोच है कि नई सरकार उन्हें हटा सकती है। इससे पहले ही इस्तीफा भेज दिया जाए। इन अफसरों की नजरें चुनाव नतीजे पर टिकी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि भूपेश सरकार ने सत्ता सम्हालते ही रमन सरकार के कुछ करीबी अफसरों की छुट्टी कर दी थी। उस समय संविदा पर पदस्थ एक सचिव स्तर के अफसर तो भूपेश सरकार के ताकतवर मंत्री के साथ गुप्तगू कर रहे थे तभी फोन पर उन्हें सूचना मिली कि उनकी संविदा नियुक्ति खत्म कर दी गई है। जबकि रमन सरकार में इस अफसर की काफी तूती बोलती थी। अब वैसी स्थिति न हो, इससे पहले ही भूपेश सरकार के करीबी अफसर अपना इस्तीफा भेज सकते हैं।
हालांकि संविदा अफसरों का अंदाजा है कि भूपेश सरकार रिपीट हो सकती है। ऐसे में इस्तीफा भेजने की नौबत नहीं आएगी। फिलहाल तो नतीजे का बेसब्री से इंतजार चल रहा है।
और मालामाल होगा छत्तीसगढ़!
केंद्र सरकार के खान मंत्रालय ने विशिष्ट प्रकार के खनिज ब्लॉकों की नीलामी का विज्ञापन जारी कर दिया है। इनमें छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर के दो लिथियम ब्लॉक भी शामिल हैं। जुलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इस साल फरवरी में बताया था कि कटघोरा के चकचकवा पहाड़ और करीब के 18 गांवों में दुर्लभ लिथियम का भंडार मिला है। राज्य सरकार ने इसकी नीलामी के लिए केंद्र से औपचारिक अनुरोध किया था। सांसद दीपक बैज ने भी संसद में इसकी नीलामी की मांग उठाई थी। लिथियम का सबसे बड़ा भंडार चिली में है, उसके बाद आस्ट्रेलिया में। विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत उत्पादन के बाद तीसरे स्थान पर आ सकता है। लिथियम की दुनियाभर में मांग बढ़ रही है, क्योंकि वाहनों में ईंधन के लिए सभी देश पेट्रोल-डीजल की जगह इलेक्ट्रिक व्हीकल की तरफ बढ़ रहे हैं। इनकी बैटरी में प्रमुख रूप से लिथियम की ही जरूरत होती है। छत्तीसगढ़ पहले से ही खनिज संसाधनों से भरा-पूरा राज्य है। लिथियम इसे और धनी बनाएगा। मगर इस धनी राज्य के गरीब लोगों का जीवन स्तर इससे कितना ऊपर उठेगा, यह भविष्य ही बताएगा।
सरपंच पतियों पर यूपी हाईकोर्ट...
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह मामला छत्तीसगढ़ की किसी कोर्ट में सुना जाता तब भी अजीब नहीं लगता।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरपंच पति एसपी नाम से नवाजा जाता है इस तरह यूपी में महिला प्रधान के पति को पीपी कहा जाता है। वहां बिजनौर जिले की एक महिला प्रधान की ओर से एक रिट याचिका उसके पति ने लगाई। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा एतराज किया और कहा कि पंचायतों में महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से आरक्षण दिया गया है लेकिन वह पुरुष रिश्तेदारों की वजह से रबर स्टैंप की तरह काम कर रही हैं और खुद मूक दर्शक बनी रहती हैं। निर्वाचन आयोग को हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वह महिला प्रत्याशियों के नामांकन के समय हलफनामा लें कि वे खुद काम करेंगी, उनके काम में प्रधान पति या किसी और संबंधी का हस्तक्षेप नहीं होगा। याचिका को खारिज कर पति पर कोर्ट ने 10 हजार रुपये जुर्माना भी लगा दिया।
अपने यहां छत्तीसगढ़ में सरपंच पति किस तरह काम करते हैं इसके दर्जनों उदाहरण हैं। पर एक का जिक्र यहां करते हैं। बीते फरवरी महीने में कोरबा जिले के गिधौरी ग्राम पंचायत के सरपंच पति ने फरमान जारी किया कि यदि नवरात्रि का चंदा नहीं दिया तो उसे इस महीने का राशन नहीं दिया जाएगा। कई ग्रामीणों ने चंदा देकर राशन लिया। ऊपर के अधिकारियों तक बात पहुंची तो इस पर रोक लगी।
ऐसी दखल को रोकने के लिए छत्तीसगढ़ के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को 22 जून 2010 को एक परिपत्र जारी करके आगाह करना पड़ा था कि पंचायती राज संस्थाओं के कामकाज के संचालन के दौरान कार्यालय परिसर के भीतर महिला पदाधिकारी का कोई भी सगे संबंधी रिश्तेदार हस्तक्षेप नहीं करेगा। वह किसी भी कर्मचारी को निर्देश या सुझाव नहीं देगा अन्यथा महिला पंचायत पदाधिकारी के विरुद्ध पंचायत राज अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन ज्यादातर मामलों में महिला सरपंच या उसके पति पर कार्रवाई करने में प्रशासन ने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सरपंच पति पर कार्रवाई की तलवार लटकती है तो वह अपने क्षेत्र के विधायक, सांसदों को समझाता है कि भले ही पत्नी है, मगर वोट तो उनके कहने से मिलते हैं।
बस दो दिन की ही तो बात है...
एग्जिट पोल में दावे सामने आ गये हैं। ज्यादातर सर्वे एजेंसियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दोबारा सरकार बनने का दावा किया है। पर, कांग्रेस भाजपा दोनों को इस सर्वे पर पूरा भरोसा नहीं है। उनके नेता अब भी 70 से ज्यादा सीटों का दावा कर रहे हैं, भाजपा भी कह रही है कि उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी। सन् 2018 में भी ज्यादातर सर्वे रिपोर्ट्स में कांग्रेस की ही सरकार बनने का दावा किया गया था। मगर वास्तविक नतीजे के आसपास किसी का अनुमान नहीं था। तब कुछ सर्वे एजेंसियों का अनुमान कैसा था, देखिए- टुडेज-चाणक्य ने भाजपा को 36 और कांग्रेस को 50 सीटें दी। सी वोटर-रिपब्लिक टीवी ने कांग्रेस की 45 सीटों के साथ जीत की भविष्यवाणी की पर भाजपा को 39 सीट दिए। एक्सेस माय इंडिया- इंडिया टुडे ने कांग्रेस को 60 और बीजेपी को 26 सीटें दी।
इसके अलावा दो सर्वे एजेंसियों ने भाजपा की सरकार रिपीट होने की बात कही। सीसीडीएस-एबीपी न्यूज़ ने उसे 52 सीट दिए। कांग्रेस को सिर्फ 35 सीटें दी यानि पिछले सभी प्रदर्शनों से कम। न्यूज़ एक्स- नेता ने भाजपा को 42 और कांग्रेस को 41 सीटें दी। बहुमत किसी को नहीं । बाकी सीट अन्य दलों या निर्दलियों के खाते में डाली गई।
तब नतीजों के सबसे करीब इंडिया टुडे का सर्वे रहा जिसमें कांग्रेस को 60 सीट मिलने की बात बताई गई थी।
घूस लाओ, या फिर अपनी जान दे दो...
आबकारी, वन, खाद्य, खनिज, शिक्षा, परिवहन, महिला बाल विकास आदि अनेक ऐसे विभाग हैं जिनमें करोड़ों की अफरा-तफरी होती है, मगर आम लोगों का राजस्व, गृह यानी पुलिस, और रजिस्ट्री जैसे विभागों से सीधे पाला पड़ता है। इन विभागों में होने वाली घूसखोरी से आम आदमी त्रस्त है लेकिन कभी यह चुनावी मुद्दा नहीं बना। छत्तीसगढ़ में दो ही दलों की बीते 23 सालों से सरकार है। दोनों ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कभी यह वायदा नहीं किया कि आम आदमी को रोजाना वास्ता पडऩे वाले विभागों में व्याप्त घूसखोरी से छुटकारा दिलाएंगे।
महासमुंद जिले के फिंगेश्वर के लाफिन कला में एक किसान राजाराम निषाद ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। अब तक जो खबर है, उसके मुताबिक चोरी के एक मामले में उसे थाने में बुलाकर पहले मारपीट की गई, फिर 20 हजार रुपए में समझौता कराने की बात तय हुई। जब-तब पुलिस उसे उठाकर थाने ला रही थी। डिमांड बढक़र एक लाख तक पहुंच गई। राजाराम टूट गया, घबरा गया और उसने अपनी मौत का रास्ता चुन लिया।
यह अकेला मामला नहीं है। बीते 5 सालों में ऐसे कई ऑडियो वीडियो वायरल हो चुके हैं जिनमें डिप्टी कलेक्टर से लेकर पटवारी तक और थानेदार से लेकर सिपाही तक रिश्वत मांगते या लेते दिखे हैं। जांजगीर जिले में 3 साल पहले करीब 8 मिनट का एक वीडियो देखा गया। एक्सीडेंट में जब्त ट्रक को छोडऩे के लिए रिश्वत मांगने वाला एएसआई कह रहा था कि 60 तो एसपी, एएसपी को चला जाता है, बाकी 40 परसेंट में ही हम लोग हैं। एएसआई को सस्पेंड कर दिया गया। ऊपर रकम पहुंचाने के उसके दावे की कोई पड़ताल नहीं हुई। फिगेश्वर मामले में भी केवल एक प्रधान आरक्षक सस्पेंड हुआ है। पर क्या वह एक लाख की मांग ऊपर से मिली शह के बगैर कर रहा था? थाने में बुलाकर पीटा जाता था और थानेदार को पता नहीं था?
पिछले साल जुलाई महीने में कुम्हारी की एक फैक्ट्री में पंजाब के एक कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी। एएसआई प्रकाश शुक्ला ने शव को सुपुर्दनामे में देने के लिए 45 हजार रुपए मांगे। उसका वीडियो वायरल हुआ तो एएसआई शिकायतकर्ता के पैरों में गिर पड़ा। दुर्ग एसपी अभिषेक पल्लव ने उसे सस्पेंड कर दिया। बिलासपुर के बिल्हा थाने का एक आरक्षक नरेश बिरतिया पिछले साल अप्रैल महीने में 15000 रुपए लेते हुए मोबाइल कैमरे में कैद हुआ था। इसके बाद उसे लाइन अटैच कर दिया गया था। ऐसी घटनाएं गिनने लगें तो सूची बहुत लंबी हो जाएगी।
बिलासपुर में कोरोना काल के बाद स्थानीय विधायक शैलेश पांडेय ने एक थाने के उद्घाटन के दौरान मंच से कहा था कि किस काम का कितना रेट है, पुलिस उसकी लिस्ट थाने में टांग दे। इस कार्यक्रम में गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू वर्चुअल मोड में मौजूद थे। रामानुजगंज विधायक बृहस्पत सिंह एक वीडियो में कहते हुए पाए गए कि थानेदार दो चार हजार मांगे तो समझ में आता है, पर एक आदिवासी महिला से 50 हजार रुपए झटक लेना तो अन्याय है।
यही हाल राजस्व विभाग का भी है। बीते साल केबीसी में 12 लाख रुपए जीतने वाली डिप्टी कलेक्टर अनुराधा अग्रवाल मुंगेली जिले में पदस्थ रहने के दौरान कांग्रेस नेत्री खुशबू वैष्णव से राशन कार्ड के लिए रिश्वत की मांग करते हुए वीडियो कैमरे में कैद हो गई थी। अग्रवाल कह रही थी कि बहुत खर्च होते हैं, ऊपर भी देना पड़ता है। उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि लेन-देन हुआ नहीं, सिर्फ बात हुई थी। इसी साल मुंगेली जिले के पटवारी नागेंद्र मरावी का रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल हुआ था। इसके कुछ दिन पहले रिटायर्ड आर्मी जवान से घूस मांगते हुए कांकेर जिले की एक महिला पटवारी का वीडियो सामने आया था। मुंगेली में पटवारी सस्पेंड हो गया और कांकेर की महिला पटवारी को लाइन अटैच किया गया। जांजगीर-चांपा के डभरा में एक पटवारी ने अपने ही विभाग में काम करने वाले कोटवार से रिश्वत ली, जिसका वीडियो वायरल हुआ था। इस साल, 2023 में कोरिया कलेक्टर ने पटवारी को, तो सरगुजा कमिश्नर ने तहसीलदार को बैकुंठपुर की एक जमीन की रिश्वत लेकर नाप-जोख करने के लिए निलंबित किया था। मगर बीते 5 सालों में सबसे बड़ा हंगामा रायगढ़ में हुआ है। तहसील ऑफिस में भ्रष्टाचार के खिलाफ रायगढ़ के वकीलों ने आंदोलन किया। पहले सरगुजा जिले के वकील भी इसमें शामिल हुए फिर बाद में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने भी बिलासपुर में प्रदर्शन कर उनका साथ दिया था। एक वकील को तहसीलदार ने जेल में भिजवा दिया था जिसके चलते कई राजस्व न्यायालय करीब दो महीने तक ठप रहे।
अधिकांश मामलों में बहुत हुआ तो तहसीलदार स्तर के अधिकारी सस्पेंड या लाइन अटैच किए गए। पुलिस विभाग में भी थानेदार से ऊपर किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। यह मंजूर करना मुश्किल है कि वे अपने अफसरों की जानकारी के बगैर घूस लेते होंगे। फिंगेश्वर के ताजा मामले में भी यह बात उठ रही है कि जिस हवलदार को सस्पेंड किया गया है वह अकेले किसान की खुदकुशी के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि इसमें थानेदार की शह थी।
घूस के ज्यादातर मामलों में तब अनिच्छा के साथ कार्रवाई की गई जब वीडियो, ऑडियो सोशल मीडिया या न्यूज पोर्टल पर वायरल हो गए। कार्रवाई भी क्या, केवल निलंबन या फिर अटैचमेंट। यह सीमित समय की सजा है। कर्मचारियों को वक्त गुजरने के बाद प्राय: दूसरी जगह भेजकर बहाल कर दिया जाता है। अधिकतर मामले एसीबी को सौंपे ही नहीं जाते, विभागीय जांच कर निपटाए जाते हैं। एसीबी में भी बरसों जांच नही होती, कोर्ट में चालान पेश नहीं होते। तब आरोपी कर्मचारी बहाल हो जाता है और मजे से नौकरी करता है। सन् 2012 में भाजपा सरकार ने एसीबी को आरटीआई से बाहर कर दिया गया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कांग्रेस की सरकार ने हाल ही में चुनावी माहौल के बीच उस आदेश में संशोधन किया। पर इसे आरटीआई के दायरे में नहीं लाया गया। इतना ही किया कि सन् 2012 के आदेश में पेंच था, उसे दूर कर पुराने आदेश को विधि-सम्मत बना दिया गया ताकि 2012 का आदेश और मजबूत हो जाए। अब यह जानकारी बाहर आना और मुश्किल है कि एसीबी किनको बचा रहा है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को प्रदेशभर में भेंट-मुलाकात के दौरान राजस्व कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की दर्जनों शिकायतें मिली। कुछ को उन्होंने तत्काल निलंबित भी कर दिया। गृह मंत्री ने भी देखा होगा कि पुलिस में भ्रष्टाचार को खुद उनकी पार्टी के विधायक कैसे उजागर कर रहे हैं। पर शिकायत जहां से आई, सिर्फ वहीं कार्रवाई की गई। लक्षण काफी थे, यह बताने के लिए कि पूरे महकमे में रोग फैला है, पर असरदार इलाज करने की मंशा दिखी क्या?
भाजपा की गिनती की रिपोर्ट
प्रदेश भाजपा के नेताओं ने सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर अपनी रिपोर्ट हाईकमान को दी है। इसमें उन्होंने भाजपा को स्पष्ट बहुमत की बात कही है। उनका आकलन है कि केवल कर्जमाफी का मुद्दा भाजपा की कमजोर कड़ी रही लेकिन दो वर्ष के बोनस ने फौरी फायदा पहुंचाया है।
पवन साय ने यह दौरा 18 नवंबर से शुरू किया था। वो सरगुजा, बिलासपुर संभाग के दौरे पर गए। जबकि संतोष पाण्डेय को बस्तर संभाग की सीटों, और प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव को दुर्ग संभाग की सीटों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की थी। इस दौरान उन्होंने, प्रत्याशी, चुनाव संचालक, विस प्रभारी, प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ मतदान कर्मियों किसानों, महिलाओं से मुलाकात की ।
कुछ जगह तो कांग्रेस के प्रत्याशियों से भी मिले। अपनी रिपोर्ट में पवन साय का कहना है कि 20-25 सीटों पर हेयर लाइन क्रेक की तरह हार-जीत का मामूली अंतर रहेगा। इसे ध्यान में रखकर पवन साय ने 42 प्रत्याशियों की जीत का दावा किया है। कांग्रेस के दो प्रत्याशियों ने उनसे कहा कि 3100 रूपए में खरीदी और दो वर्ष के बोनस का मुद्दा भारी पड़ता नजर आ रहा है। साय कल ही राजधानी लौटे हैं।
जन्मदिन की ऐसी बधाई पहले नहीं
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव का जन्मदिन इस बार कई मामलों में खास रहा। साव को जन्मदिन की बधाई देने के लिए न सिर्फ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता जुटे, बल्कि अफसर भी जुटे, वह भी रायपुर के. कई आईएएस आईपीएस चोरी छिपे बिलासपुर पहुंचे थे। प्राइवेट गाडिय़ों को किनारे रखकर साव के सरकारी बंगले पहुंच रहे थे। एलआईबी वाले भी सक्रिय थे। अब वे आंकलन लगा रहे हैं कि मौसम विज्ञानी अफसरों का पूर्वानुमान सही है या ये दोनों तरफ बधाई देने वाले हैं. वैसे बीजेपी के एक नेता 100 प्रतिशत आश्वस्त हैं कि सरकार बन रही है और आईएएस-आईपीएस उन्हें लगातार बधाइयां देने के लिए कॉल कर रहे हैं।
लूपलाइन की तमन्ना है कि
चुनाव परिणाम क्या होगा यह तो 3 दिसंबर को ही साफ होगा पर अफसरों के खेमों में अजीब सी उलझन तैर रही है। बीजेपी सरकार में लम्बे समय तक लूप लाइन में रहे अफसरों को कांग्रेस ने मौका दिया तो वे किसी हाल में बीजेपी की सरकार बनने नहीं देना चाह रहे, भले बहस में ही क्यों न हो, ढेरों तर्क हैं। पटवारी, आरआई तक बात कर डिटेल ले रहे। इस सरकार में लूप लाइन में रहे अफसर बेचारे चाह रहे कि बीजेपी आ जाए लेकिन कांग्रेस समर्थित अफसरों की हां में हां मिलाने के अलावा उनके पास अभी कोई चारा नहीं है।
उम्मीद और धान
धान खरीदी के लिये राज्य सरकार ने 125 लाख टन का लक्ष्य रखा है। खरीदी 1 नवंबर से 31 जनवरी तक होनी है। एक महीना बीतने के बाद 12 लाख टन धान ही खरीदी हो सकी है। यह कुल खरीदी का मात्र 10 प्रतिशत है। अब बचे दो महीने में 90 प्रतिशत किसान धान बेचेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना कि किसान चुनाव नतीजे का इंतजार कर रहे हैं। 2018 के चुनाव में भी इसी तरह की स्थिति बनी थी। कांग्रेस ने कर्जमाफी और 2500 रुपए क्विंटल की दर से धान खरीदने की घोषणा की थी, इसलिए किसानों ने नई सरकार बनने का इंतजार किया, ताकि उन्हें कर्जमाफी और अधिक कीमत का लाभ मिल सके।
किसानों ने कर्जमाफी होने की उम्मीद में धान नहीं बेचा है। बीजेपी की उम्मीद भी बढ़ गई है, उन्हें लग रहा है कि किसान 3100 रुपए क्विंटल की दर से धान बेचने के लिये इंतजार कर रहे हैं। बीजेपी सरकार बनी तो उन्हें एकमुश्त राशि मिलेगी, जबकि कांग्रेस चार किस्तों में बोनस राशि देती है। खैर चुनाव नतीजे जो भी हो किसान को इंतजार का फल मिलने ही वाला है।
अब टोकन की गलती नहीं
भाजपा के रणनीतिकार अन्य दलों के मजबूत उम्मीदवारों पर नजर रखे हुए हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि बहुमत नहीं मिलने पर अन्य दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। भाजपा के कुछ प्रमुख नेता निजी चर्चा में 40 से 42 सीट मिलने की उम्मीद जता रहे हैं।
हालांकि पार्टी के कई नेता ऐसे भी हैं, जो कि पूर्ण बहुमत मिलने की उम्मीद पाले हुए हैं। इससे परे अन्य दलों में बसपा के दो, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के दो और एक निर्दलीय व जोगी कांग्रेस के एक प्रत्याशी की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। भाजपा के नेता अन्य दलों के संपर्क में तो हैं, लेकिन चुनाव नतीजे देखकर ही आगे कोई कदम उठाने की सोच रहे हैं।
पार्टी के कुछ लोग बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में रणनीतिकारों को धोखा हुआ था, और काफी कुछ चपत लग गई थी। हुआ यूं कि रणनीतिकारों को भरोसा था कि पार्टी थोड़ी दूर रहेगी। ऐसे में मतगणना से पहले ही अन्य दलों के कुछ मजबूत उम्मीदवारों को टोकन दे दिया था। मगर भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद टोकन वापसी के लिए पहल की गई, लेकिन उम्मीदवारों ने हाथ खड़े कर दिए। पिछले अनुभव को देखते हुए इस बार रणनीति बदली गई है, और चुनाव नतीजे आने के बाद ही कोई फैसला लेने की बात कही जा रही है।
पड़ोस प्रेम
छत्तीसगढ में जिनके नाम से राजकाज चलता है उनकी हाईकमान से शिकायत की खबर है । दरअसल ये संवैधानिक नेता जी पड़ोसी राज्य में अघोषित गठबंधन वाली पार्टी की सरकार के कामकाज को लेकर लगातार घेरे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने गृह प्रदेश के दौरे भी बढ़ा लिए हैं। लगातार आमदरफ्त हो रही है। जब जाते हैं सरकार को घेर आते हैं। वर्ष 2000 से 09 तक गठबंधन सरकार में मंत्री रहे हैं इसलिए सरकारी कामकाज के लूपहोल जानते हैं। इसे लेकर भाजपा हाईकमान के संदेश भी भेजा गया है। इसका असर आने वाले दिनों में देखना होगा। लेकिन इससे परेशान दल के दो नेताओं सश्मित पात्रा, प्रियव्रत मोहंती ने मीडिया से कहा है कि नेताजी, पुत्र को प्रदेश भाजपा में स्थापित करना चाहते हैं,इसलिए यह बयानबाजी करते रहते हैं। वैसे बेटा अभी प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर है।
जश्न के हफ्ते का बिजनेस
आम हिंदू परिवार मुहूर्त और पंचांग से बाहर जाकर विवाह की तिथि तय नहीं करता। ज्योतिषियों ने बताया है कि दिसंबर में 4 से लेकर 9 तारीख तक उसके बाद 11 और 15 दिसंबर को ही शादियां हो सकती हैं। दिसंबर के बाद अगले साल फरवरी में मुहूर्त हैं। दिसंबर के पहले सप्ताह में ही खूब शादियां होने जा रही हैं। इधर विधानसभा चुनाव की मतगणना भी 3 दिसंबर को हो रही है। इसमें भी जीत का जश्न मनाया जाएगा। रैलियां निकलेगी, जिनमें फूल माला, बैंड बाजे, पटाखे और गाडिय़ों की जरूरत वैसी ही पड़ेगी, जैसी शादियों में होती है। कुछ फूल माला और बैंड बाजे वाले बता रहे हैं कि पहले हफ्ते के लिए उन्हें एडवांस आर्डर खूब मिल रहे हैं। जैसे-जैसे दिसंबर नजदीक आ रहा है, वे एडवांस की रकम बढ़ा रहे हैं। खासकर जो जुलूस वाली बुकिंग हैं उनमें। कहीं-कहीं 100 फीसदी एडवांस भी लिया जा रहा है, क्योंकि नतीजा अनुमान के अनुसार नहीं आया तो बुकिंग कैंसिल हो सकती है। वैवाहिक समारोह तय कर चुके उन लोगों को दिक्कत नहीं है, जो काफी पहले बुकिंग करा चुके हैं। पर जो देर से आ रहे हैं उन्हें अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
महतारी जतन की यहां भी जरूरत..

मिनी माता छत्तीसगढ से पांच बार सांसद रहीं लेकिन उनकी पहचान समाज सुधारक के रूप में अधिक थी। उनके नाम पर छत्तीसगढ़ सरकार महतारी जतन योजना चलाती है, जिसमें गर्भवती श्रमिक महिला को 20 हजार रुपये की सहायता मिलती है। आम तौर पर विभूतियों के नाम पर चौक-चौराहों का नामकरण कर तो दिया जाता है पर बाद में उसकी बदहाली की ओर से किसी का ध्यान नहीं जाता। रायगढ़ के मिनी माता चौराहे में उनके चबूतरे का हाल यही बता रहा है।
देर से हुई डाक मतों की फिक्र
इस बार सेवा मतदाता, मतदान की ड्यूटी पर लगाए गए अधिकारी कर्मचारियों के अलावा 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांग और 80 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों ने भी डाक से या घर से मतदान किया है, जो ईवीएम में पड़े वोटों से अलग रखे गए हैं। डाक मतदान तथा बुजुर्ग और दिव्यांगों का घर से मतदान के लिए हजारों आवेदन आए थे। इस बार बगैर ईवीएम डाले गए मतों की संख्या पिछले चुनावों से काफी अधिक हैं। ईवीएम तो मतदान होने के बाद स्ट्रांग रूम में जमा कर दिए गए, जिनके ताले 3 दिसंबर को खुलेंगे। उनकी सुरक्षा में जवान तैनात भी हैं। पर शेष मतों को कोषालयों में रखा गया है। भाजपा ने कल कई जिलों में एक साथ निर्वाचन अधिकारियों को ज्ञापन देकर मांग की, कि डाक मतों की पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। दुर्ग कलेक्टोरेट परिसर में तो भाजपा के डौंडीलोहारा प्रत्याशी देवलाल ठाकुर के साथ उनके समर्थकों ने नारेबाजी भी की। भाजपा का कहना है कि डाक मत जहां रखे गए हैं, वहां बाहरी लोगों का आना-जाना लगा रहता है, गड़बड़ी हो सकती है। इसलिये इन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच स्ट्रांग रूम में ईवीएम की तरह सुरक्षित रखा जाए।
अब दोनों चरणों में मतदान के पहले ही डाक मत डाल दिए गए थे। पर उन्हें सुरक्षित रखने की मांग पखवाड़े भर देर से की गई। चुनाव के पहले जिला निर्वाचन अधिकारी बैठक लेकर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से सुझाव लेते हैं, प्रक्रिया बताते हैं। पर उनमें यह बात किसी ने नहीं उठाई। धारणा यह रही होगी कि लाखों ईवीएम वोटिंग के बीच इन मतों से किसी क्या बिगड़ेगा? पर इस बार चिंता वाजिब है। इस चुनाव में बहुत सी सीटों पर हार-जीत का फासला कम वोटों से होने के आसार जो दिखाई दे रहे हैं।
नक्सल मुक्त इलाके में उपद्रव
बस्तर के किसी इलाके में यदि लंबे समय से माओवादी वारदात नहीं हुई हो तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह उनके प्रभाव से मुक्त हो चुका है। सरकार ने तीन साल पहले दंतेवाड़ा के भांसी को नक्सल मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया था। मगर, जैसा उपद्रव 26 नवंबर की देर रात यहां हुआ है, दावे की पोल खुल गई। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि देर रात एक बजे 10-20 नहीं बल्कि लगभग 100 हथियारबंद नक्सलियों ने सडक़ निर्माण कंपनी के कैंप और डामर प्लांट में धावा बोला था। यहां उन्होंने उनकी 14 गाडिय़ों को ही आग के हवाले नहीं किया बल्कि रेलवे लाइन बनाने के काम में लगी एक पोकलेन को भी फूंक दिया। नक्सली यहां कई घंटे रहे लेकिन कोई फोर्स नहीं पहुंची, जबकि घटनास्थल के दो किलोमीटर के भीतर ही फोर्स के तीन अलग-अलग कैंप हैं। मतदान हो जाने के बाद जवान और उनके अफसर कुछ निश्चिंत मुद्रा में रहे होंगे। जब तक पुलिस और कैंपों से जवान घटनास्थल तक पहुंचे, नक्सली वहां से फरार हो चुके थे।
विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद एक भाजपा नेता की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। मगर वे बड़ी संख्या में एकत्र होकर सामूहिक हमला नहीं मतदान दल के वापस आते तक नहीं कर पाए। इस समय जब मौजूदा सरकार कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकती हो और प्रशासन चुनाव आयोग के नियंत्रण में हो, नक्सलियों ने इस वारदात को शायद यह बताने के लिए अंजाम दिया कि सरकार कोई भी आए, कैसा भी दावा करे, बस्तर में उनकी मौजूदगी बनी रहेगी।
फेक पोल ऑफ पोल

इन दिनों हर कोई जानना चाहता है कि विधानसभा चुनावों का क्या नतीजा आने वाला है। एग्जिट पोल पर तो अभी पाबंदी है, पर रोजाना एक न एक सर्वे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। जिनके नाम पर ये वायरल हो रहे हैं, उन्हें सफाई देनी पड़ रही है। ऐसा ही एक सर्वे एनडीटीवी के नाम पर चल रहा है। इसमें कई सर्वे एजेंसियों और न्यूज चैनल का ही नहीं बल्कि इंटेलिजेंस ब्यूरो का भी सर्वे डाल दिया गया है। इसमें दावा किया गया है कि कांग्रेस तेलंगाना में भारी बहुमत से जीत रही है। एनडीटीवी ने साफ किया है कि यह फर्जी खबर है। उसने ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार नहीं की है। आज तक न्यूज चैनल तो स्क्रीन पर दो तीन माह से एक पट्टी नीचे चला रहा है। इसमें भी कहा जा रहा है कि हमारे नाम से फर्जी सर्वे रिपोर्ट फैलाई जा रही है।
हवा के रुख पर अफसर परेशान
इस चुनाव में जनता के तो दोनों हाथ में लड्डू है। चाहे बीजेपी जीते या कांग्रेस पर सबसे ज्यादा कंफ्यूजन में अधिकारी हैं। यह वर्ग ऐसा है, जो हवा का रुख भांप लेता है और रिजल्ट आने से पहले ही कलेक्टरी या किसी मालदार विंग के एमडी या सचिव की कुर्सी पर एडवांस बुकिंग करा लेता है। इस बार अफसर चिंता में हैं कि क्या करें, क्योंकि दो ढाई दर्जन सीटें बुरी तरह फंसी हुई हैं। परिणाम किसी ओर भी जा सकता है।
ऐसे में जीत हार किसकी होगी, यह तो केंद्र और राज्य के खुफिया विभाग के लोग भी स्पष्ट नहीं लिख पा रहे हैं।लेकिन अफसर तो अफसर हैं, उन्हें तो समस्याएं गिनाने नहीं, बल्कि हल निकालने के लिए अपॉइंट किया जाता है तो इसका भी हल उन्होंने निकाल लिया। लोगों के बीच सरकार के रिपीट होने के दावे कर रहे हैं और बीजेपी के नेताओं को बधाइयां भी देते जा रहे हैं, ताकि सरकार जिसकी भी बने, उनका कुछ न बिगड़े।
शर्त ऐसी भी

चुनावी नतीजों को लेकर हर जगह तरह तरह के, टोटके ,दावे, बहस और सट्टेबाजी तक हो रही है। लेकिन सब कुछ हवा हवाई कही जा सकती है। इसलिए इन शर्तों का कोई औचित्य नहीं है। इसी बीच मप्र में नाथ और राज के बीच सत्ता तय करने बकायदा कानूनी लिखा पढ़ी के साथ शर्त को नोटराइज्ड भी कराया गया है। शर्त लगाने वाले दो लोगों ने एक, एक लाख दांव पर लगाया है। एक ने तो चैक भी काट दिया है। दूसरे ने पांच गवाहों की मौजूदगी में एक लाख रूपए देने का वादा किया है।

स्कूल शिक्षा विभाग के प्रोफेसरों के वाट्एप ग्रुप में यह तस्वीर इस टिप्पणी के साथ वायरल है-शिक्षा विभाग के प्रमुख अधिकारी (डॉ. आलोक शुक्ला) द्वारा ऐसे ही बताया जाता है कि वे प्राचार्य पदोन्नति के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं हर बार, बार-बार एसीआर (गोपनीय चरित्रावली) मंगा मंगाकर इसी तरह प्रयास जारी है।
चुनाव निपटने के बाद सक्रिय
टिकट कटने के बाद कांग्रेस के दर्जनभर विधायक पार्टी के भीतर अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। कुछ तो वर्तमान में निगम-मंडल में हैं, और वो चाहते हैं कि सरकार रिपीट होने की दशा में उन्हें यथावत पद पर बने रहने दिया जाए। इनमें बृहस्पति सिंह भी हैं, जो सरगुजा विकास प्राधिकरण के प्रमुख हैं। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला हुआ है।
टिकट से वंचित बृहस्पति सिंह समेत अन्य विधायक इन दिनों रायपुर में हैं, और वो सीएम से मेल मुलाकात भी कर रहे हैं। पिछले दिनों इंडोर स्टेडियम में बड़ी स्क्रीन पर भारत-ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट मैच देखने की व्यवस्था की गई थी। बिलाईगढ़ के विधायक चंद्रदेव राय पार्टी के प्रमुख नेताओं को स्टेडियम में मैच देखने का न्योता देते नजर आए। टिकट कटने के बाद ये विधायक अपने क्षेत्र में भले ही सक्रिय नहीं थे, लेकिन चुनाव निपटने के बाद सक्रिय दिख रहे हैं।
पार्टी से बाहर का रास्ता
भाजपा में भीतरघातियों की सूची लंबी हो गई है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक भीतरघातियों की सूची तैयार की गई है। इनमें तो कई प्रभावशाली पदाधिकारी हैं। खुद प्रत्याशियों ने पार्टी संगठन को ये नाम सौंपे हैं।
पार्टी के रणनीतिकार फिलहाल शिकायतों की पड़ताल कर रहे हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद तमाम शिकायतें पार्टी की अनुशासन समिति को भेजी जाएगी, और फिर नोटिस जारी किया जाएगा। चर्चा है कि एक दर्जन से अधिक नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
ज्ञानियों की बात
नेता, प्रत्याशी और पत्रकार तीन दिसंबर को आने वाले नतीजों को लेकर एग्जिट पोल के संभावित रिजल्ट का इंतजार कर रहे है ताकि कुछ संकेत मिल सके। तो प्रदेश के ज्योतिषी ग्रह, नक्षत्र, राशि और चौघडिय़ा में उलझे हैं। इनकी चाल जो भी हो, ये ज्योतिष न भाजपा को नाराज करना चाहते हैं न कांग्रेस को। तो बस ग्रह चाल के विपरीत दोनों दलों को 50-50 देकर खुश करने लगे। एक चैनल ऐसे ही पांच ज्ञानी बैठे थे। एंकर हरेक से उनकी गणना पूछते गए और जवाब उपरोक्त ही मिलता रहा। अंत में एंकर ने यह कहकर चर्चा खत्म कि चुनाव कश्मकश भरा है।
इनमें से एक ज्ञानी के बारे में बता दें कि कुछ वर्ष पूर्व धोनी की सेना ने विश्व कप जीता था। उस फाइनल मैच से पहले किसी ने इंडिया की प्लेइंग इलेवन के प्रदर्शन पर पूछा । पंडित जी ने कहा कि मैं कप्तान होता तो युवराज सिंह को बाहर कर देता। सहवाग पर कहा कि वे 20-20 में सेंचुरी बनाएगा। शाम को जब मैच खत्म हुआ तो स्कोर बोर्ड पर सहवाग के सिर्फ 9 रन थे और युवराज ने 70 रन बनाकर मैच जीता दिया।
आखिर बीएसएनएल ही काम आया
एक वक्त था जब बीएसएनएल की लैंडलाइन सुविधा लेने के लिए जनप्रतिनिधियों की सिफारिशी चि_ियां लगती थी। पर अब घरों दफ्तरों से बीएसएनएल फोन लगभग गायब हैं। उसकी जगह एयरटेल ने ले ली है। निजी कंपनियों के आक्रामक प्रचार और उन्हें मिले सरकारी प्रोत्साहन के बाद तो बीएसएनएल किसी प्रतिस्पर्धा में ही नहीं रह गया है। रिमोट इलाकों में कवरेज के लिए पहले लोग बीएसएनएल के सिम कार्ड को भरोसेमंद मानते थे, पर उसकी जगह भी अब जियो सिम ने ले ली है। लैंडलाइन में एयरटेल मीलों आगे निकल चुकी है तो मोबाइल सेवा में जियो और एयरटेल उसे बहुत पीछे छोड़ चुकी है।
मगर, आपदा के मौके पर बीएसएनएल ही फिर काम आया है। उत्तरकाशी की उस दुर्गम पहाड़ी सिलक्यारा पर बीएसएनएल ने लैंड लाइन सुविधा पहुंचा दी है, जहां सुरंग धंसने से 41 मजदूर फंसे हैं। अब वे अपने शुभचिंतकों और परिवार के लोगों से सीधे बात कर रहे हैं। राहत कार्य में लगी टीम को भी इससे मदद मिल रही है, क्योंकि सुरंग के भीतर कोई भी मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। तीन साल पहले हुए इसी तरह का एक हादसा ऋषिगंगा-तपोवन बांध में हुआ था, तब वहां फंसे हुए मजदूरों के बीच भी बीएसएनएल ने लैंडलाइन फोन चालू किया । इसके कई मजदूरों को डूबने से बचाने में मदद मिली। सार्वजनिक और निजी उपक्रमों में सबसे बड़ा फर्क यही तो है कि एक अपने सामाजिक दायित्व को निभाने के दौरान नफा-नुकसान के बारे में नहीं सोचता, दूसरे की प्राथमिकता सिर्फ मुनाफे की होती है। अब ऐसे में क्या ‘भीतर से नहीं लगता’ कहकर बीएसएनएल की हंसी उड़ाई जानी चाहिए?
मोबाइल रिचार्ज कब तक वैध?

किसी भी ऑनलाइन सेवा में समय की गणना रेलवे टाइमिंग की तरह 24 घंटे में होती है। सभी तरह के ऑनलाइन भुगतान में भी यही होता है। यदि किसी भुगतान के लिए 10 तारीख आखिरी दिन है तो उस रात 11.59 बजे तक ऑनलाइन पेमेंट किया जा सकता है। पर जियो के एक सिम धारक के पास मेसैज आया है कि उसका प्लान सुबह 10.46 मिनट पर समाप्त हो गया है। या तो यह सेवा 19 नवंबर की रात 11.59 बजे तक मिलनी चाहिए और यदि 20 तारीख तक वैध है तो फिर सुबह से खत्म कैसे किया जा सकता है? रात 11.59 तक सिम चालू रहना चाहिए। एक ग्राहक ने यह शिकायत सोशल मीडिया पर की है।
सदस्य नहीं फिर निष्कासित कैसे?
मतदान से मतगणना के बीच कांग्रेस, भाजपा दोनों में ही भितरघात और बगावत से निपटने-निपटाने का दौर चल रहा है। कांग्रेस ने कई पदाधिकारियों को नोटिस दी है, कुछ को निलंबित तो कुछ को निष्कासित कर दिया है। समीक्षा अब भी हो रही है। यह सिलसिला चुनाव परिणाम आने के बाद भी जारी रहने के आसार हैं। मगर, जगदलपुर में एक अजीब मामला हुआ है। उम्मीदवार के खिलाफ काम करने के आरोप में जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुशील मौर्य ने दो पूर्व पार्टी पदाधिकारियों विक्रम शर्मा और महिला नेत्री कमल छज्ज को 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। निष्कासन की प्रेस नोट जारी कर दी गई। अब इन दोनों पूर्व पदाधिकारियों का कहना है कि वे तो कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य भी नहीं, फिर निष्कासन किस आधार पर किया गया, यह हमारा अपमान है। दोनों ने अध्यक्ष को पत्र लिखकर जवाब मांगा है। महिला नेत्री ने तो वकील के जरिये भी नोटिस भेजकर माफी मांगने अथवा कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहने कहा है। ([email protected])
पुलिस भर्ती के नतीजे आयोग के हाथ
चुनाव आयोग के हाथ में आचार संहिता के दौरान कितनी ताकत आ जाती है यह एहसास करना हो तो छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस निर्देश पर गौर किया जा सकता है जिसमें उसने राज्य सरकार को कहा था कि पुलिस विभाग में भर्ती के नतीजों को वह चुनाव आयोग से अनुमति लेकर जारी करे। राज्य सरकार ने राज्य के निर्वाचन विभाग को पत्र लिखा। निर्वाचन विभाग ने जवाब दिया कि अनुमति देने के लिए भारत निर्वाचन आयोग से मार्गदर्शन मांगा गया है। अब हाईकोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग को लिखा है कि इस पर जल्दी निर्णय लेकर सरकार को बताए। आयोग अलग संवैधानिक संस्था है, निर्णय लेने की शक्ति उसी के पास है।
सब इंस्पेक्टर, सूबेदार, प्लाटून कमांडर जैसे पदों पर भर्ती की यह लंबी प्रक्रिया 2021 से चल रही है। अनेक कारणों से इसमें विलंब होता गया। चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार हो चुका है। पुलिस विभाग ने इसमें शारीरिक परीक्षण किया था, शेष प्रक्रिया व्यावसायिक परीक्षा मंडल ने पूरी की है। अब साक्षात्कार के बाद रिजल्ट निकाला जाना ही था कि 9 अक्टूबर को आचार संहिता लग गई और सूची रोक दी गई। इसी को लेकर अभ्यर्थी हाईकोर्ट गए। मतगणना 3 दिसंबर को होने वाली है, पर आचार संहिता 5 दिसंबर तक लागू रहेगी। अभ्यर्थी तीन साल से इंतजार कर रहे थे, अब आचार संहिता उठने में गिनती के दिन बचे हैं। फिर भी वे चिंतित क्यों हैं? चिंता नई सरकार से ही है। क्या पता जो सरकार बनेगी उसे चयन प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी दिखाई देने लगे और सूची जारी होने से पहले ही रोक दी जाए और उनकी मेहनत पर पानी फिर जाए?
कॉलेजों को अध्यादेश का इंतजार
चुनाव आचार संहिता के बीच जो बड़ा काम हो गया है उनमें एक है सरकारी कर्मचारी अधिकारियों का डीए बढ़ाने का आदेश। यह एक ऐसा विषय है जिसका लाभ सबको मिलेगा। निर्वाचन के काम में लगे अधिकारियों कर्मचारियों को भी। मगर लगता है कुछ ऐसे विषय भी हैं, जो सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। जैसे –शिक्षा। चुनाव के पहले राज्य के 8 कॉलेजों में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई शुरू की गई। इन कॉलेजों में प्रथम सेमेस्टर की परीक्षाएं तो हो गई हैं, कॉपियों की जांच हो गई, रिजल्ट तैयार हो चुका है। पर यह डीजी लॉकर में अपलोड नहीं हो रहा है। वजह यह बताई जा रही है कि सरकार को इस संबंध में अध्यादेश जारी करना था। उसके बाद ही लॉक खुलेगा और रिजल्ट अपलोड होगा। खबर यह भी है कि अध्यादेश राज्यपाल को भेजा जा चुका है, पर वहां से लौटा नहीं है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई केंद्र की मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है। अध्यादेश पर हस्ताक्षर से संबंधित कोई बाधा हो, इसकी गुंजाइश कम ही है। अध्यादेश पर राज्यपाल के हस्ताक्षर होंगे, फिर चुनाव आयोग से मंजूरी लेनी होगी। पर इस दिशा में पहल नहीं हो रही है।
बात दावेदारी और टिकट वितरण की
अब सबको नतीजे का इंतजार है तो घड़ी को रिवर्स ले जाते हैं। बात प्रत्याशी चयन के दौर की कर लें। उस दौरान एक से बढक़र एक किस्से हुए। टिकटार्थियों और देने वालों के बीच। एक प्रत्याशी के बारे में आपको बताएं। वे नगरीय निकाय के नेता हैं। एक बार मुखिया और दूसरी बार पार्षद का चुनाव जीते। और एक विस, एक लोस का चुनाव हार चुके हैं। लेकिन अभी भी वे निकाय के नंबर दो पोजीशन पर हैं। फिर से चुनाव लडऩे दावेदारी करने गए। चयन के लिए सभी स्तर से पैनल में नाम था। लेकिन जिन्हें उनके नाम पर टिक करना था वे सहमत नहीं थे। नेताजी उनके पास सपत्नीक गए। दावेदारी की। टिकट देने वालों ने कहा इस बार नहीं दे सकते। तो उन्होंने पत्नी को आगे किया। लेकिन उन्हें क्या पता था कि पहले से ही डिसाइडेड था। बिग बॉस ने कहा कि अगली बार सोचेंगे, पार्षद-वार्षद के लिए। नेताजी मुरझाया सा चेहरा,और मन लेकर लौट आए। अब यही नेताजी , पार्टी के चुनाव संचालक बने। कितना मन लगा होगा नतीजे बताएंगे।
एक दूसरे के मन की बात

गाय बछड़े चरा रही इस महिला से मोरनी क्या बतिया रही है, जिसका जवाब वह हंसकर दे रही है? छत्तीसगढ़ के बस्तर के किसी जगह की यह तस्वीर है, जिसे सोशल मीडिया में बस्तर भूषण के अकाउंट पर अपलोड किया गया है।
ग़ुस्सा किस पर निकलेगा
खबर है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा का चुनाव प्रबंधन गड़बड़ा गया था। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया ने खुद कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में बैठकर काफी कुछ स्थिति को संभाला, लेकिन कमियां रह गई।
पार्टी ने चुनाव के लिए वार रूम तैयार किया था। इसकी कमान दिल्ली के प्रोफेशनल्स को दी गई थी। स्थानीय नेताओं को इससे दूर रखा गया था। वार रूम चुनाव के दौरान पूरी तरह सक्रिय नहीं रहा। वार रूम रात में बंद कर दिया जाता था। इस वजह से कई प्रत्याशियों को अपेक्षाकृत सहयोग नहीं मिल पाया। फिलहाल तो प्रत्याशी खामोश हैं, और चुनाव नतीजे का इंतजार कर रहे हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि नतीजे अनुकूल नहीं आए तो वार रूम प्रभारियों पर भी गुस्सा निकल सकता है।
बिचौलियों का भी भला हो गया
छत्तीसगढ़ में धान का औसत उत्पादन 12 क्विंटल प्रति एकड़ है। सरकार की इकाई इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च यही कहता है। पर सामान्य परिस्थितियों में किसान 15 क्विंटल तक उगा लेता है। जो किसान बोनी से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करते हैं, समय पर खाद खुराक डालते हैं, सिंचाई के साधन हों, और मौसम भी साथ दे तो उनका उत्पादन 25 क्विंटल तक पहुंच सकता है। बस्तर जैसी जगह पर औसत उत्पादन 6 क्विंटल ही है। धमतरी राजिम में यह 20 क्विंटल तक पहुंचता है। पूरे प्रदेश में 5 फीसदी किसान ही ऐसे हैं जो 20 क्विंटल या अधिक उत्पादन कर सकते हैं। 25 क्विंटल उगाने वाले किसान तो गिनती के ही होंगे। इस बार कांग्रेस भाजपा दोनों ही दलों ने धान खरीदी की सीमा बढ़ाने की घोषणा की है। कांग्रेस ने 20 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदने की घोषणा की है तो भाजपा ने 21 क्विंटल। इसका फायदा कुछ प्रतिशत बड़े किसानों को जरूर मिलेगा, पर छोटे किसान जो पर्याप्त खाद, अच्छे बीज नहीं डाल पाते और फसल के लिए सिर्फ बारिश पर निर्भर हैं, उन पर इस बढ़ोतरी का असर नहीं होगा। ऐसे किसान छत्तीसगढ़ में 80 फीसदी हैं, जिनके पास 2.5 एकड़ या उससे कम खेत हैं। इन किसानों को अपनी पूरी उपज बेचने के बाद भी और धान बेचने का मौका है। इसका फायदा अभी से बिचौलियों ने उठाना शुरू कर दिया है। पड़ोसी राज्यों से धान की तस्करी की आशंका बढ़ गई है। गरियाबंद जिले में ओडिशा की सीमा पर पांच गाडिय़ों में जब्त 300 बोरी धान कल ही जब्त किया गया। इस जिले में औसत उत्पादन 7-8 क्विंटल ही है। यानि एक एकड़ के पीछे किसान को 12 क्विंटल अतिरिक्त बेचने का मौका मिल रहा है।
बैलगाड़ी है या भैंस गाड़ी?

आम तौर पर गाड़ी को या तो दो बैल खींचते हैं या फिर दो भैंस। दोनों की भार वहन क्षमता और चलने की गति अलग-अलग होती है। पर इन दिनों किसान खेतों में कट चुकी अपनी फसल खलिहान लाने के लिए भी बेचैन है। गौरेला के समीप एक गांव के इस गाड़ी के साथ हमेशा चलने वाला दूसरा बैल बीमार है। गाड़ीवान ने पड़ोसी से मदद मांगी। उसके पास बैल नहीं था, भैंसा था। बस उसे ही फांद दिया। तालमेल बैठ गया, और संभव हो गया। गाड़ी हांक कर खेत तक ले जा रही हैं, गाड़ीवान की बेटियां। तस्वीर अखिलेश नामदेव ने ली है।
सरकार के काम में कोर्ट की दखल
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सोशल मीडिया और अखबारों पर बारीकी से नजर रहती है। उसी के आधार पर वे खुद ही जनहित याचिका दर्ज कर जिम्मेदार अफसरों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। अभी बारिश के दिनों में कोंडागांव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें कुछ स्कूली बच्चे बांस के सहारे नदी पार करते हुए दिखे। हाईकोर्ट में तीन-चार पेशी हुई। अफसरों ने बताया कि पुल के लिए टेंडर हो गया है। बारिश के बाद काम शुरू हो जाएगा और अगले सीजन में ऐसी नौबत नहीं आएगी। इधर तीन दिन पहले उन्होंने रेल की पटरी को पार कर स्कूल जाते बिलासपुर के बच्चों की तस्वीर देखी। सीजे ने स्वत: संज्ञान लेकर एक पीआईएल दर्ज कर ली और रेलवे से 48 घंटे के भीतर जवाब मांगा। कोर्ट में रेलवे की ओर से जो बताया जाए, अधिकारियों ने मीडिया को बताया है कि वह कितनी मुस्तैद है। इसके मुताबिक अंडर ब्रिज और फुट ओवर ब्रिज का काम तेजी से चल रहा है। वैसे दोनों काम 4 साल से अधूरे हैं।
सिम्स मेडिकल कॉलेज बिलासपुर की बदहाली पर खबरें पढऩे के बाद चीफ जस्टिस ने उसे भी जनहित याचिका में लिया। सुनवाई के दौरान इस अस्पताल को उन्होंने कचरा घर तक कह दिया, कलेक्टर ने जो जांच रिपोर्ट जमा की, उसे फालतू बताया। सरकार को ओएसडी के रूप में यहां सचिव स्तर के एक अधिकारी को बिठाना पड़ा। अभी यह खबर भी आ रही है कि स्वास्थ्य विभाग की टीम दूसरे मेडिकल कॉलेजों में भी जाकर मरीजों के उपचार और उपकरणों के रखरखाव पर व्यवस्था देख रही है। जगदलपुर मेडिकल कॉलेज में रायपुर से गई एक टीम 2 दिन से जांच कर रही है।
कई बार अदालतों की इस तरह की सक्रियता को सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जाता है। मगर, ऐसी दखल से अकर्मण्य नौकरशाह सबक लें, तो नागरिकों का भला हो।
बिल्डिंग नहीं, अच्छे टीचर बनाएं..
पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले की कोयला सिटी आसनसोल के नजदीक जमुरिया ब्लॉक में एक आदिवासी गांव है, नमो जामदोबा। यहां आप पहुंचे तो एक असामान्य सा दृश्य देख सकते हैं। इसकी मुख्य सडक़ों में से एक पर, एक आउटडोर स्कूल है, जिसमें मिट्टी की दीवारों पर छोटे-छोटे ब्लैकबोर्ड पेंट किए गए हैं। यहां, किसी भी दिन, कोई भी छोटे बच्चों को आत्मविश्वास से भरा पढ़ते हुए देख सकते हैं। उसी तरह जैसे साधन संपन्न विद्यार्थी माइक्रोस्कोप और लैपटॉप जैसे गैजेट का उपयोग करते हुए पढ़ाई करते हैं।
इस परियोजना को शुरू किया है, जमुरिया के तिलका मांझी आदिवासी विद्यालय के 37 वर्षीय प्राइमरी शिक्षक दीपनारायण नायक ने। वे रस्तर मास्टर (सडक़ के शिक्षक) के रूप में लोकप्रिय हैं। इन बच्चों को वे अपने खर्चे पर हल्का-फुल्का खाना भी खिलाते हैं। 2014 में, उन्होंने इस ओपन-एयर लर्निंग स्पेस की शुरुआत की, जहां वंचित बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलती है। प्रत्येक दिन, शिक्षक नायक अपने स्कूल की ड्यूटी पूरी करने के बाद इस सडक़ स्कूल पर कम से कम 5-6 घंटे बिताते हैं।
बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरक्षरता और सडक़, बिजली पानी की कमी के कारण स्कूल छोडऩे की दर ज्यादा है। स्कूल जाने लायक लडक़े पास की दुकानों या कोयला खदानों में काम करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं, वहीं लड़कियां घर के काम में मदद करती हैं या कम उम्र में शादी करने के लिए स्कूल छोड़ देती हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि यहां ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या बेहद कम, 0.8 प्रतिशत है। पर यह भी एक तथ्य है कि अपना प्रदेश प्राथमिक शिक्षा गुणवत्ता दर में 27वें स्थान पर है। इसकी जाहिर सी एक वजह यह है कि रिमोट एरिया में पोस्टिंग हो जाने पर शिक्षक शहर की तरफ भागने के लिए हाथ-पैर मारते हैं। प्रमोशन के बाद पोस्टिंग में पसंदीदा जगह के लिए शिक्षकों ने लाखों रुपए रिश्वत दी। यह हाल की घटना है। इसमें कई अधिकारी और बाबू सस्पेंड हुए हैं। जैसा ऐलान किया गया है, कांग्रेस सरकार दोबारा आती है तो सभी स्कूलों को स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों जैसा बनाया जाएगा। तब हो सकता है कि गांव के स्कूल भवन शानदार दिखें, पर क्या इनमें दीप नारायण नायक जैसे समर्पित शिक्षक मिलेंगे?
गिनती के पहले ईश्वर की बारी
चुनाव निपटने के बाद कांग्रेस, और भाजपा के कई प्रत्याशी तीर्थ यात्रा पर निकल गए हंै। ज्यादातर प्रत्याशी धर्म-कर्म में लगे हैं। सीएम भूपेश बघेल राजस्थान में चुनाव प्रचार के लिए गए हैं, लेकिन उनका भी वहां नाथद्वारा में प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर में दर्शन के लिए जाने का कार्यक्रम है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज सपरिवार और लखेश्वर बघेल महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन गए हैं। जबकि आबकारी मंत्री कवासी लखमा तेलंगाना के प्रसिद्ध राम मंदिर के दर्शन के लिए गए हैं। उनके साथ सुकमा के तमाम छोटे-बड़े नेता भी हैं। दर्शन के बहाने वो भद्राचलम में कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार भी कर रहे हैं। नतीजे आने में 10 दिन बाकी हैं। ऐसे में सभी प्रत्याशी पूजा पाठ और परिवार को भरपूर समय दे रहे हैं।
खर्चा कौन देगा

रायपुर नगर निगम के आधा दर्जन से अधिक पार्षद नाराज चल रहे हैं। चर्चा है कि इन पार्षदों को पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में अपने वार्डों में रैली निकालने के निर्देश दिए गए हैं। पार्षदों ने मतदान के दो दिन पहले अपने-अपने वार्डों में रैली निकालकर जोरदार शक्ति प्रदर्शन भी किया।
चुनाव निपटने के बाद अब रैली का खर्च मांगने के लिए चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों से संपर्क किया गया, तो कोई ठोस जवाब नहीं मिल रहा है। ये सभी पार्षद रैली पर 5-5 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। अभी तो रणनीति के तहत सभी खामोश हैं, लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद पार्षदों का गुस्सा फट सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
आधी मूंछ की शर्त

विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, अब नतीजे 3 दिसंबर को आएंगे। अब जिन सीटों पर स्थिति टक्कर की है, वहां के प्रत्याशियों ने खामोशी ओढ़ ली है। कुछ प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ नफे-नुकसान का गणित लगा रहे हैं। कुछ समर्थक ऐसे हैं जो हार-जीत का शर्त लगा रहे हैं।
चर्चा है कि कुछ समर्थकों ने शर्त की रकम तीसरे प्रत्याशी तक को दे दी है। कुछ समर्थक जीत को लेकर इतना अधिक आश्वस्त हैं कि वे आधी मूंछ मुड़ाने की शर्त लगा रहे हैं। ऐसे में विपक्षी समर्थक भी कम नहीं है, वे शर्त पर शर्त रख रहे हैं कि हम हार गए तो शर्त का पालन करेंगे, लेकिन आप हार गए तो शर्त का पालन कराने आप 10 जमानतदार लाइये। तभी शर्त लगाएंगे। वैसे प्रदेश के लोगों ने मूंछों की बड़ी इज्जत की है। भाजपा के पूर्व दिग्गज स्व. दिलीप सिंह जूदेव ने 2003 में अपनी पूरी मूंछ ही दांव पर लगा दी थी, भाजपा जीती भी और मूंछ बनी रहीं।
बड़ी अदालतों में ऊंची पॉलिटिक्स
इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिटायर हुए चीफ जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर ने जबलपुर से लॉ की डिग्री ली थी। अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। सन् 2005 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिला। उन्हें मार्च 2009 में यहीं पर जज नियुक्त किया गया। उन्होंने 9 साल यहां सेवा दी। जनवरी 2018 में उनका तबादला इलाहाबाद कर दिया गया। लोगों को लगा कि एक ही कोर्ट में 9 साल सेवा देने के बाद तबादला किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। पर वे तबादला नहीं चाहते थे। उन्होंने अपना आदेश रद्द कराने की कोशिश की और पुनर्विचार का आवेदन भेजा। इस बीच करीब 8 माह छत्तीसगढ़ में ही वे काम करते रहे। सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने जस्टिस दिवाकर के आवेदन को खारिज करते हुए तबादले की अनुशंसा को यथावत रखा। आखिरकार उन्हें 4 अक्टूबर 2018 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में ज्वाइनिंग देनी पड़ी। मार्च 2023 में वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने और अभी दो दिन पहले रिटायर हो गए।
अधिवक्ताओं के बीच विदाई भाषण में उन्होंने लीक से हटकर कुछ बात की। उन्होंने तब के सीजेआई जस्टिस मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए। कहा कि उन्होंने परेशान करने के लिए मेरा तबादला किया। दूसरी ओर सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने मेरे साथ हुए अन्याय को सुधारा।
जस्टिस दिवाकर ने यह साफ नहीं किया है कि छत्तीसगढ़ में लंबा समय बिता लेने के बाद भी वे तबादला क्यों नहीं चाहते थे। शायद यहां उन्हें चीफ जस्टिस के ओहदे तक पहुंचने का मौका जल्दी मिल जाता। पर एक बात का जिक्र यहां जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने उन्हीं वर्षों में स्थानीय पृष्ठभूमि वाले और लंबे समय से पदस्थ जजों के स्थानांतरण की मांग उठाई थी। एसोसिएशन ने दिल्ली जाकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इस संबंध में ज्ञापन भी सौंपा था। यह जरूर है कि इसमें उन्होंने जस्टिस दिवाकर या किसी अन्य जज विशेष का नाम नहीं लिया था।
बताते चलें कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर चुके जस्टिस पी सैम कोशी ने वकालत के दौरान एसईसीएल, रेलवे जोन, एनएमडीसी, छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल आदि के लिए पैरवी की थी। भाजपा शासन काल में दो साल तक डिप्टी एडवोकेट जनरल भी वे रहे। उन्हें सितंबर 2013 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ही जज नियुक्त किया गया। करीब 10 साल बाद यानि इसी साल 2023 में उन्होंने खुद ही अपने तबादले के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में आवेदन दिया। इस पर कॉलेजियम ने विचार किया और उनका मध्यप्रदेश तबादला कर दिया। जस्टिस कोशी ने मध्यप्रदेश को छोडक़र किसी भी दूसरे राज्य में भेजने का आग्रह किया। शायद इसलिए कि पहले वे वहां के कई संस्थानों के लिए वे प्रैक्टिस कर चुके थे। उनका आग्रह मान लिया गया और उन्हें तेलंगाना भेजा गया।
जस्टिस दिवाकर ने कहा है कि तबादले के अलावा भी अलग-अलग तरह की विपरीत घटनाएं उनके साथ हुईं। यह शायद प्रमोशन से जुड़ा है। वे वरिष्ठता में जस्टिस प्रशांत मिश्रा से ऊपर थे। दोनों ने ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक साथ प्रैक्टिस शुरू की थी। जस्टिस दिवाकर मार्च 2009 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में नियुक्त हुए थे, जबकि जस्टिस प्रशांत मिश्रा इसके 9 माह बाद दिसंबर 2009 में। पर जस्टिस मिश्रा 1 जून 2021 को ही आंध्र प्रदेश के चीफ जस्टिस बन गए थे और पिछले मई में वे सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किये गए। जस्टिस दिवाकर मार्च 2023 में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए। रिटायरमेंट की वजह से उनका सफर यहीं तक रहा। संभवत: चीफ जस्टिस पद पर हुई नियुक्ति को लेकर जस्टिस दिवाकर ने कहा कि सीजेआई ने उनके साथ हुए अन्याय को दूर किया।
इस बार अधिक व्यावहारिक दावा
सन् 2018 में भारतीय जनता पार्टी ने 65 पार का नारा दिया था। केंद्रीय गृह मंत्री हर चुनावी सभा में इसका दावा ठोकते थे। प्रदेश के नेताओं ने उनको यही संख्या बताई होगी। पर नतीजे अप्रत्याशित रहे। नई पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ बनाकर चुनाव लडऩे के दौरान स्व. अजीत जोगी ने 72 सीटों का लक्ष्य रखा था। हर पोस्टर में यह दावा होता था।
इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने 75 पार का नारा दिया। कई बार कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखने के लिए बढ़-चढक़र बातें कहनी पड़ती है, चाहे जमीनी हकीकत वैसी नहीं हो। मगर, टीएस सिंहदेव मतगणना के पहले लगातार भूचाल ला रहे हैं। वोटिंग के तुरंत बाद ही उन्होंने कहा कि इस बार मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला तो फिर कभी नहीं मिलेगा। अब उन्होंने कहा है कि 75 पार उनको संभव नहीं दिखता। कोरिया और जशपुर, जहां पूरी 6 सीटें कांग्रेस को पिछली बार आई थी, उनको लेकर भी उन्होंने उम्मीद जताई कि तीन ही जीत सकते हैं। सरगुजा जिले की सभी 8 सीटों पर जीतने का दावा उन्होंने जरूर किया है।। वे कह रहे हैं कि कुल जीत दो तिहाई सीटों (60) तक हो सकती है, यानि 2018 से कम । इधर भाजपा ने चुनाव अभियान के दौरान सीटों की संख्या पर कोई दावा करने से परहेज किया। अब डॉ. रमन सिंह का मानना है कि 52 से 55 सीटें आ सकती हैं। दोनों में से भी किसी एक का ही दावा सच के करीब होगा। पर दोनों ही दावे हवाबाजी नहीं है। वोट पड़ चुके हैं इसलिए कुछ व्यावहारिक सा आकलन किया जा सकता है। वैसे असल अनुमान 30 नवंबर की शाम 5 बजे के बाद लगेगा, जब मतदान का अंतिम चरण पूरा हो जाएगा और मतगणना तक एग्जिट पोल अखबार-टीवी पर चलते रहेंगे।
चुनावी निवेश कभी लौटता है?
विधानसभा चुनाव निपटने के बाद जीत-हार को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने दावे हैं। रायपुर की सीटों में कांग्रेस, और भाजपा के रणनीतिकार अपने पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की भूमिका की समीक्षा कर रहे हैं।
चर्चा है कि कांग्रेस में एक विधानसभा सीट में मतदाता पर्ची नहीं बंटने की शिकायतों की पड़ताल की गई। यह बताया गया कि चुनाव संचालक ने एक युवा नेता को पर्ची बांटने का ठेका दिया था। इसके लिए लाखों रुपए दिए गए थे। मगर नेताजी ने पर्ची नहीं बंटवाई। अब इसको लेकर पूछताछ हो रही है।
कहा जा रहा है कि इसी सीट पर कांग्रेस के रणनीतिकारों ने जाति समीकरण को ध्यान में रखकर एक निर्दलीय प्रत्याशी को उतारा था। पर्दे के पीछे निर्दलीय पर काफी कुछ निवेश भी किया गया था। यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि निर्दलीय प्रत्याशी अपने समाज का वोट हासिल कर लेंगे, और इससे परम्परागत भाजपा के वोट बैंक को नुकसान होगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
चर्चा है कि निर्दलीय प्रत्याशी ने अंतिम दिनों में प्रचार बंद कर दिया था। इससे नाराज कांग्रेस के लोग अब निर्दलीय से निवेश की गई राशि वापस देने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद विवाद और बढऩे की आशंका जताई जा रही है।
नई रणनीति का क्या असर होगा?
कांग्रेस में इस बार प्रचार के लिए अलग ही रणनीति बनाई थी। आखिरी के दिनों में जिन क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशी की स्थिति कमजोर दिखी, वहां अपनी ताकत झोंकी है, और इससे बेहतर नतीजे की उम्मीद भी बढ़ी है।
बताते हैं कि प्रचार के शुरूआती दौर में धमतरी, भाटापारा, और वैशाली नगर में कांग्रेस प्रत्याशी की स्थिति खराब थी। इसके बाद सीएम भूपेश बघेल, और प्रभारी सैलजा ने प्रमुख पदाधिकारियों को इसका जिम्मा दिया। धमतरी में टिकट कटने से नाराज चल रहे पूर्व विधायक गुरुमुख सिंह होरा की ड्यूटी लगाई, तो गिरीश देवांगन को भाटापारा भेजा गया।
इन प्रत्याशियों को अतिरिक्त संसाधन भी उपलब्ध कराए गए। इसका नतीजा यह रहा कि इन सीटों पर पार्टी प्रत्याशी की स्थिति बेहतर हुई है। अब पार्टी के रणनीति कामयाब हुई है या नहीं, यह तो 3 तारीख को नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
झीरम की जांच क्या आसान हुई?
झीरम घाटी हत्याकांड का पूरा सच सामने आने का न केवल प्रभावित परिवार और कांग्रेस बल्कि आम लोग भी इंतजार कर रहे हैं। सन् 2018 में सत्ता में आने के 15 दिन के भीतर ही छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने एनआईए को चि_ी लिखी, जिसमें उसने जांच पूरी नहीं होने पर ऐतराज करते हुए केस डायरी वापस मांगी। सरकार ने कहा कि एसआईटी बनाकर वह खुद मामले की जांच कराएगी। मगर केस नहीं किया गया। जांच के मामले में स्थिति अभी भी वही है। हत्याकांड के 3 दिन बाद ही तत्कालीन भाजपा सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन कर दिया था। मगर इसकी रिपोर्ट आने में 8 साल लग गए। नवंबर 2021 में इसकी सीलबंद 4000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट तत्कालीन राज्यपाल अनुसूया उईके को सौंपी गई। रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपे जाने को लेकर बहस अलग छिड़ गई थी, मगर उनको कोई निर्णय लेना नहीं था, इसलिए उन्होंने इसे सरकार के पास भेज दिया। रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद सरकार ने कहा कि यह अधूरी है। चार दिन बाद ही जस्टिस सतीश के अग्निहोत्री की अध्यक्षता और जी मिन्हाजुद्दीन की सदस्यता वाले एक नए आयोग का गठन किया गया। इसमें जांच के जो बिंदु जोड़े गए, उनमें एक था कि क्या हमले के बाद हताहतों के लिए समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई थी?, इस हत्याकांड के बाद ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कोई कदम उठाए गए थे? अन्य महत्वपूर्ण बिंदु सरकार और आयोग जिसे आवश्यक समझे, जोड़े जाएंगे।
इस दूसरे आयोग को 6 माह के भीतर रिपोर्ट देनी थी लेकिन उसका भी कार्यकाल लगातार बढ़ाया गया। इस साल अगस्त महीने में कार्यकाल फिर बढऩे के बाद आयोग को अब 10 फरवरी 2024 तक समय मिल गया है। भाजपा नेता धरमलाल कौशिक ने इस आयोग के औचित्य को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसके चलते कुछ समय तक के लिए आयोग पर कोर्ट ने रोक भी लगा दी थी। झीरम हमले में मारे गए कांग्रेस नेता उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार ने जून 2020 में दरभा थाने में एक एफआईआर झीरम घाटी हत्याकांड के पीछे के कथित षड्यंत्र की जांच को लेकर दर्ज कराई। इसके लिए सरकार ने एक 10 सदस्यीय एसआईटी बनाई, जिसकी कमान तत्कालीन डीआईजी सुंदरराज पी. को सौंपी गई। एनआईए ने छत्तीसगढ़ पुलिस के अधिकार को हाईकोर्ट में चुनौती दी। छत्तीसगढ़ सरकार और जितेंद्र मुदलियार की ओर से कहा गया कि एनआईए केवल आपराधिक घटना की जांच कर रही है, जबकि छत्तीसगढ़ पुलिस इसके पीछे के षड्यंत्र का पता लगाएगी। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर एनआईए ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जहां से छत्तीसगढ़ पुलिस के पक्ष में फैसला आया है।
अब इस मामले में स्थिति यह है कि प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद एनआईए ने पूरी जांच अब तक नहीं की है। जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग ने 8 साल बाद जो रिपोर्ट सौंपी उसमें क्या था, यह सिर्फ सरकार को पता है। जो दूसरा आयोग बनाया गया उसे भी 6 माह में रिपोर्ट देनी थी मगर अब उसे फरवरी 2024 तक का वक्त मिल गया है। घटना के पीछे के षड्यंत्र की जांच छत्तीसगढ़ पुलिस अब जाकर 10 साल बाद शुरू करेगी।
क्या होगा यदि जस्टिस मिश्रा आयोग की और जस्टिस अग्निहोत्री आयोग की रिपोर्ट आपस में विरोधाभासी होंगे? और इधर एनआईए और छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच रिपोर्ट आपस में टकराएंगीं?
यदि कांग्रेस की सरकार दोबारा प्रदेश में बनती है तो मुमकिन है अग्निहोत्री आयोग और छत्तीसगढ़ पुलिस किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर रिपोर्ट सार्वजनिक करे। मगर भाजपा ने इन दोनों की जांच को अनावश्यक बताया है। यदि उसकी सरकार बनी तो शायद छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच रुक जाए और जस्टिस अग्निहोत्री आयोग को भी काम करने रोके। छत्तीसगढ़ पुलिस को मिली मंजूरी के बावजूद जांच किस दिशा में बढ़ेगी यह नई सरकार के बनने से ही तय होगा।
एयरपोर्ट में पार्किंग रंगदारी

माना एयरपोर्ट पहुंचते ही कार, टैक्सी वालों को 50 रुपये की पार्किंग रसीद थमाने के विवाद ने तूल पकड़ा तो मई माह में एयरपोर्ट प्रबंधन ने ठेका चलाने वाली कंपनी अंजनी इंटरप्राइजेज को नोटिस थमाई, जबकि पहले सात मिनट तक का कोई शुल्क नहीं लेने का नियम था। जून माह में इस सात मिनट के समय को घटाकर 4 मिनट कर दिया गया। मगर अब भी अवैध वसूली नहीं रुकी है। दोपहिया वाहनों के लिए प्रारंभिक शुल्क 10 रुपये है। मगर, शुल्क 50 रुपये लेकर बकायदा रसीद भी दी जा रही है।
चुनाव के पहली और बाद !
विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, मेयर एजाज ढेबर पर हमलावर थे। बृजमोहन ने बैजनाथ पारा में अपने पर जानलेवा हमले का भी आरोप लगाया था। उन्होंने इसको लेकर ढेबर परिवार को आड़े हाथों लिया था, और समर्थकों के साथ थाने का भी घेराव किया था। मगर चुनाव निपटने के बाद छठ के मौके पर महादेव घाट के एक कार्यक्रम में दोनों ने मंच साझा किया, और एक-दूसरे से आत्मीयता से बतियाते नजर आए।
एजाज ने बैजनाथ पारा की घटना का जिक्र छेड़ दिया, और कहा बताते हैं कि भईया, आपने तो मुझे रायपुर का दाऊद बना दिया था। इस पर बृजमोहन ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे आरोप के बाद रायपुर में तो तुम्हारा कद भूपेश बघेल से बड़ा हो गया। दोनों काफी देर मंच पर रहे, और चुनाव को लेकर भी काफी बात हुई। इस दौरान लोगों की निगाह बृजमोहन, और ढेबर पर टिकी रही।
साठ या अस्सी?

विधानसभा चुनाव में रायपुर और बिलासपुर में कम वोटिंग की खूब चर्चा हो रही है। मगर भाजपा के रणनीतिकारों का दावा है कि रायपुर दक्षिण में 80 फीसदी से अधिक वोटिंग हुई है। जबकि सरकारी आंकड़ा 59.99 फीसदी है।
पार्टी के रणनीतिकारों ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में रायपुर दक्षिण में विधानसभा में 21 हजार लोगों की मौत हुई है, लेकिन उनके नाम अभी भी मतदाता सूची में दर्ज हैं। यही नहीं, 18 हजार लोग रायपुर दक्षिण छोडक़र जा चुके हैं। 10 हजार लोग दूसरे वार्डों में चले गए हैं। जबकि मतदाता सूची में 2 लाख 61 हजार लोगों के नाम दर्ज हैं। इनमें से 1 लाख 60 हजार लोगों ने वोट डाले हैं। ऐसे में वोटिंग का आंकड़ा 80 फीसदी के आसपास बैठता है। भाजपा के रणनीतिकार सारे दस्तावेज होने की बात कह रहे हैं।
मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर कांग्रेस ने भी आरोप लगाए हैं, और इसकी शिकायत भी की थी। जानकारों का मानना है कि जिला प्रशासन ने मतदाता सूची तैयार करने में लापरवाही बरती है। जूनियर अफसर को मतदाता सूची का काम दिया गया था। इससे मतदाता सूची तैयार करने का काम सही ढंग से नहीं हो पाया।
बताते हैं कि सुकमा, रायगढ़, और कांकेर जिले में मतदाता सूची तैयार करने से लेकर पोलिंग पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था जिसका नतीजा भी सामने आया। धुर नक्सल प्रभावित इलाके सुकमा के कोंटा विधानसभा में पोलिंग में 7 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। जबकि कांकेर के अंतागढ़ विधानसभा में 9 फीसदी से अधिक पोलिंग हुई है।
रायपुर में पदस्थ रहे तीन आईएएस मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव के प्रबल दावेदार

करीब तीन दशक पहले रायपुर में पदस्थ रहे अविभाज्य राज्य के तीन आईएएस अफसर, इस समय मध्य प्रदेश के नए मुख्य सचिव की दौड़ में हैं। इनमें वीरा राणा, डॉ.राजेश राजौरा और अजय तिर्की शामिल हैं। वहां के वर्तमान मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस को डबल इंजन की सरकार होने का फायदा मिला और छह-छह माह के दो एक्सटेंशन के बाद 30 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।
अब उन्हें एक्सटेंशन मिलने की उम्मीद नहीं है। अभी आचार संहिता के चलते चुनाव आयोग की मदद से मिल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा, बल्कि एक्सटेंशन की हैट्रिक का रिकॉर्ड भी बना सकते हैं। हालांकि शिवराज सरकार ने प्रस्ताव केंद्र को भेजा है। अनुमति न मिलने की स्थिति में सबसे प्रबल दावेदार, मप्र माशिमं अध्यक्ष आईएएस वीरा राणा को बताया जा रहा है। वीरा, राज्य गठन से पहले वर्ष 1997-98 के दौरान, सरजियस मिंज आयुक्त के साथ रायपुर संभाग उपायुक्त और उनके पति आईपीएस संजय राणा, रायपुर एसपी रह
चुके हैं।
दूसरे दावेदार डॉ.राजौरा, 1995-96 के दौरान डीआरडीओ में सीईओ रहे हैं। इसी तरह से अजय तिर्की को तो विभाजित छत्तीसगढ़ में रायपुर को राजधानी गठन का श्रेय है। वे उस वक्त रायपुर के अंतिम कलेक्टर रहे हैं। और पूर्व एसीएस एमके.राउत जो काडा (राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण) के सीईओ के साथ मिलकर, मंत्रालय, राजभवन, पीएचक्यू जैसे भवन तैयार किए थे। तिर्की इस समय केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर हैं। और वे 41 दिन बाद रिटायर होने वाले हैं।
निभाया सबने मित्र धर्म
विधानसभा चुनाव में एक सीट की सबसे ज्यादा चर्चा थी, वह है साजा। यहां से कद्दावर मंत्री और सात बार विधायक रहे रविंद्र चौबे मैदान में थे तो भाजपा ने इनसे मुकाबला करने एक मजदूर ईश्वर साहू को उतारा था।
बिरनपुर में सांप्रदायिक तनाव में ईश्वर साहू के बेटे की मौत हुई थी, सो भाजपा ने इसे मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर ताकत झोंकी थी तो कांग्रेस प्रत्याशी अपने दम पर लड़ रहे थे। यहां कांग्रेस से कोई खास स्टार प्रचारक नहीं था, जबकि भाजपा के अमित शाह से लेकर हेमंत बिस्वा सरमा सहित कई नेता आए। जितने सक्रिय राष्ट्रीय स्तर के नेता थे, उतने ही सक्रिय कार्यकर्ता भी थे, लेकिन भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेता सुस्त दिखे।
पूर्व विधायक से लेकर जिन्हें जिम्मेदारी देकर भेजा गया, वे भी मित्र धर्म निभाने लगे। पूर्व विधायक पर तो यहां तक आरोप लग रहा है कि वे कांग्रेस प्रत्याशी को रोज ब्रिफ्रिंग करते थे। समाज के वोटरों को साधने भाजपा ने खैरागढ़ के एक नेता को साजा प्रचार की जिम्मेदारी देकर भेजा, लेकिन वे खुद अपनी टिकट नहीं मिलने से नाराज थे। वे प्रचार में कहीं दिखे भी नहीं। उन्होंने भी अपना मित्र धर्म निभाया।
सरकारों का हाथ, भ्रष्टाचार के साथ
सरकारी अधिकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच करने वाली एजेंसी एंटी करप्शन ब्यूरो को छत्तीसगढ़ सरकार ने सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया है। दरअसल इस संबंध में मूल आदेश भाजपा के शासनकाल में 1 अगस्त 2013 को जारी किया गया था। छत्तीसगढ़ के एक आरटीआई कार्यकर्ता राजकुमार गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका का आधार 16 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विधायक देवजी भाई पटेल के सवाल पर विधानसभा में पेश किया गया जवाब था। इसमें बताया गया था कि 17 नवंबर 2015 तक 45 अधिकारियों के खिलाफ शिकायत लंबित है। इनमें ज्यादातर आईएएस अफसर हैं। आरटीआई कार्यकर्ता ने जब सामान्य प्रशासन विभाग से इन अफसरों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी तो उन्हें यह कहते हुए मना किया गया कि एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच आरटीआई के दायरे से बाहर है। इस संबंध में 1 अगस्त 2013 के आदेश का हवाला दिया गया। आरटीआई कार्यकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि भ्रष्टाचार की शिकायतों के संबंध में जानकारी देने से मना किया जाना सूचना के अधिकार अधिनियम की भावनाओं से मेल नहीं खाता। शासन की ओर से सुनवाई के दौरान जवाब आया था कि इन 45 अफसरों के खिलाफ कुल 73 शिकायत मिली थीं, जिनमें से 62 का निराकरण किया जा चुका है। हाई कोर्ट 11 प्रकरणों की जांच जल्दी कार्यालय को प्रतिवेदन सौंपने का आदेश दिया। हाई कोर्ट ने 1 अगस्त 2013 के आदेश की भी समीक्षा की, जिसे लेकर आरटीआई कार्यकर्ता ने याचिका लगाई थी। कोर्ट ने पाया कि कतिपय परिस्थितियों में सूचना देने से मना करने का अधिकार राज्य को है पर इस आदेश में खामियां हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के पास विकल्प था कि वह 2013 के आदेश को वापस ले लेती जो भाजपा के कार्यकाल में निकाला गया था। आरटीआई कानून केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है। पर राज्य की कांग्रेस सरकार ने को कमजोर करने वाले आदेश का समर्थन किया और संशोधित आदेश निकाल दिया। अक्टूबर में हाई कोर्ट ने सरकार को तीन सप्ताह का समय दिया था। इसलिए यह आदेश 10 नवंबर को निकल चुका था, लेकिन अब बाहर आया है। भ्रष्ट अफसरों की जांच से संबंधित जानकारी ना तो आप भाजपा के शासन में हासिल कर सकते थे और न ही अब कर सकते हैं।
भाजपा को पता है, सिंहदेव जीतेंगे?
मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी नहीं तो कभी नहीं वाले, टी एस सिंहदेव के बयान पर कांग्रेस के दूसरे नेताओं के बयान तो आ ही रहे हैं मगर भाजपा नेताओं का बयान भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा के प्रवक्ता ने इसकी प्रतिक्रिया में कहा है कि बाबा मुख्यमंत्री तो बनेंगे नहीं। हम चाहेंगे कि भाजपा की सरकार में भी नेता प्रतिपक्ष बनाकर हमारे साथ रहें। इसी सवाल पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने कहा कि उनकी गलत समय पर इच्छा जागृत हुई है। उन्हें विपक्ष में रहना होगा।
ऐसा लगता है कि भाजपा अंबिकापुर की सीट नहीं निकालने वाली है। यह उनके बड़े नेताओं को पता है तभी तो अपनी सरकार में वे सिंहदेव को कोई विपक्ष के नेता के रूप में देखने की इच्छा होने की बात कह रहे हैं। इसके बावजूद कि अंबिकापुर में भाजपा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। यदि उन्होंने राजधानी में बैठे बड़े नेताओं के बयान को गंभीरता से लिया तो मायूस हो सकते हैं।
खर्च करोड़ों में सबकी आँखें बंद
चुनाव आयोग ने विधानसभा प्रत्याशी के लिए चुनाव खर्च की सीमा 40 लाख रुपए निर्धारित की है, लेकिन चर्चा है कि प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा ने अपने प्रत्याशियों को तय सीमा से अधिक राशि उपलब्ध कराई थी। 40 लाख रुपए तो प्रत्याशियों के बैंक अकाउंट में जमा किए गए थे। बाकी राशि किस्तों में उपलब्ध कराई गई।
सुनते हैं कि दोनों ही दलों ने अपने प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार में खर्च के लिए 2 करोड़ तक दिया था। बस्तर के प्रत्याशियों को मैदानी इलाकों के प्रत्याशियों की तुलना में कम फंड दिया गया था। मगर दर्जनभर से अधिक सीट ऐसी है जहां 10 करोड़ से ज्यादा खर्च हुआ है।
चर्चा है कि रायपुर में तो एक निर्दलीय ने एक रात में ही 2 करोड़ बांट डाले। रायपुर और बिलासपुर में तो रातभर गलियों में पैसे का खेल चलता रहा। मगर व्यय प्रेक्षकों ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। कुछ लोग तो मानते हैं कि इस बार पैसे का खेल पहले की तुलना में काफी ज्यादा हुआ है। अब चुनाव नतीजे पर क्या कुछ फर्क पड़ता है, यह तो 3 दिसंबर के बाद ही पता चलेगा।
एक पूर्व विधायक के खिलाफ शिकायत
कांग्रेस मेें भीतरघातियों के खिलाफ कार्रवाई चल रही है, और दर्जनभर से अधिक नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। भाजपा में भी ढेरों शिकायतें हुई है, लेकिन अभी कार्रवाई से परहेज किया जा रहा है। चर्चा है कि चुनाव नतीजे आने के बाद भीतरघातियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
सुनते हैं कि रायपुर की सीटों के भाजपा प्रत्याशियों ने एक पूर्व विधायक पर पार्टी के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है। पूर्व विधायक की शह पर एक-दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी भी खड़े किए गए हैं। एक प्रत्याशी ने तो सह चुनाव प्रभारी डॉ. मनसुख मंडाविया से इसकी शिकायत की है। मंडाविया ने तमाम शिकायतों को गंभीरता से लिया है। देखना है कि भीतरघातियों पर क्या, और कब कार्रवाई होती है।
चुनाव खत्म तगादा शुरू, फंड मैनेजर गायब
प्रदेश में दोनों चरणों का मतदान खत्म हो गया है। प्रत्याशी और उनके व्यय पर्यवेक्षक एक एक वोट पर हुए खर्च के हिसाब किताब में व्यस्त हैं। कुछ रिलेक्स होकर हिसाब किताब करने के मूड में कस्बा,गांव और शहर से बाहर हैं तो कुछ ने घर के दरवाजे नतीजों तक बंद कर लिए हैं। यानी जीते तो पेमेंट और हारे तो बाद में दे देंगे, भागे थोड़े जा रहे हैं। सबका दिया है तुम्हें भी दे देंगे आदि आदि जवाब तैयार है। पड़ोस के शहर में आज सुबह से एक पेंटर, भैया के फंड मैनेजर के हेमू नगर के घर के बाहर हंगामा कर रहा है। इसने भैया के लिए वॉल राइटिंग की है।
पहली किस्त के बाद दूसरी का अता पता नहीं। दूसरी किस्त में पौन लाख का बिल दिया तो मैनेजर ने नापजोख की बात कही, वो भी करना शुरू किया तो मैनेजर का गवाह गायब। अब बेचारा पेंटर दरवाजे पर खड़े होकर हंगामा कर रहा और व्हाट्सएप में वायरल करने मजबूर हो रहा। सरकारी एजेंसी से भी लोग नाराज हैं । मतदान के दिन ब्रेकफास्ट और लंच का पैसा न मिलने पर बस ड्राइवर सैकड़ों बसें खड़ी कर विरोध जता चुके थे।
चुनाव अभी बाकी है दोस्त...
मतदाताओं का ख्याल तभी तक किया जाता है जब तक वोटिंग नहीं हो जाती। ऐसे फैसले सरकार नहीं लेती जिससे मतदाता नाराज हों, वरना वोट उनके खिलाफ जा सकते हैं। लोगों ने पिछले कई चुनावों में पाया है कि पेट्रोलियम कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाना महीने दो महीने पहले बंद कर देती हैं और मतदान खत्म होने के तुरंत बाद एकमुश्त वृद्धि कर भरपाई कर लेती हैं। केंद्र सरकार अक्सर पेट्रोलियम के दाम बढऩे के सवाल पर हाथ खड़े कर देती है कि यह तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार के आधार पर कंपनियां खुद तय करती हैं। पर, चुनाव के वक्त यह साफ हो जाता है कि कंपनियां कुछ नहीं, केवल सरकार की सुविधा और निर्देश पर ही काम करती हैं।
कोविड काल के बाद से छोटे स्टेशनों पर ट्रेनों का स्टापेज बंद करना, अनेक ट्रेनों को लंबे समय से रद्द करके रखना, आए दिन सुधार व निर्माण कार्यों का नाम लेकर चालू ट्रेनों का परिचालन रोक देना, छत्तीसगढ़ के यात्रियों पर भारी पड़ता रहा है। इसके खिलाफ लगातार आंदोलन किए गए। इसे लेकर छोटे-छोटे कई आंदोलन अलग-अलग स्टेशनों में पिछले दो साल से हो रहे हैं। कांग्रेस के सांसद विधायकों की चि_ियों और रेलवे के अधिकारियों से चर्चा करने पर भी स्थिति नहीं सुधरी। बीते सितंबर महीने में कांग्रेस ने एक बड़ा रेल रोको आंदोलन किया था। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, दुर्ग सभी जगह कार्यकर्ता पटरी पर बैठ गए थे। सैकड़ों लोगों के खिलाफ रेलवे ने एफआईआर दर्ज कर ली थी। इसके बाद रेलवे को शायद लगा कि मुद्दा बड़ा होता जा रहा है, जिसका आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है। तब एक-एक कर ट्रेनों के बंद स्टापेज शुरू किए गए। चुनाव की घोषणा के बाद कटनी रूट पर कई पुराने बंद स्टापेज फिर शुरू कर दिए गए। खासकर कोटा और गौरेला के लोग लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। ट्रेन ठहरने की बंद की गई सुविधा को भी उपलब्धि की तरह दिखाया गया, सांसदों और मंत्रियों को अतिथि बनाकर कार्यक्रम रखे गए। इधर, आधुनिकीकरण के नाम पर ट्रेनों को निरस्त करने का सिलसिला भी थम सा गया। दो महीने तक रेलवे ने कोई बड़ी कैंसिलेशन नहीं की। हालांकि त्यौहारों के समय स्पेशल ट्रेनों की संख्या में पहले की तरह उदारता रेलवे ने नहीं दिखाई। इसके कारण हावड़ा, पटना की ओर आने-जाने वाली ट्रेनों में टिकटों की मारामारी रही।
इधर 17 नवंबर को मतदान खत्म होने के बाद अगले दिन रेलवे ने 30 ट्रेनों को रद्द करने का ऐलान कर दिया। दोपहर में ऐलान हुआ फिर अचानक यह फैसला वापस ले लिया गया। हद तो यह हो गई कि बिलासपुर से बीकानेर जाने वाली ट्रेन को रद्द करने की सूचना यात्रियों को उनके मोबाइल फोन पर भेजी जा चुकी थी। पर उसे भी अचानक रवाना कर दिया गया। जो यात्री महीनों पहले रिजर्वेशन करा चुके थे, उन्हें अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी, क्योंकि रद्द होने की सूचना के चलते वे स्टेशन पहुंचे ही नहीं थे। रेलवे ने अधिकारिक रूप से यह नहीं बताया कि किस वजह से इन 30 ट्रेनों को रद्द करने का फैसला वापस लिया गया। इनमें कई ट्रेन ऐसी हैं, जो राजस्थान की ओर जाती है, जहां अभी विधानसभा चुनाव के लिए वोट नहीं डाले गए हैं।
किसने सामान दिया, पता तो रहे...

चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद पूरे प्रदेश में इस बार पुलिस और निर्वाचन आयोग की टीम ने साड़ी कंबल और नगद के परिवहन को रोकने के लिए जबरदस्त अभियान चलाया। फिर भी आखिरी रात तक मतदाताओं तक रकम और सामग्री पहुंचाने का सिलसिला चलता रहा। जशपुर में ‘कत्ल की रात’ में जो साडिय़ां बंटने के लिए आई, वह चोरी छिपे नहीं बांटी गई। दो कारों में लोग घूम रहे थे। भीतर उपहार था, जिसे आप वोट देने के लिए दी गई रिश्वत भी कह सकते हैं। चूंकि ये लोग कांग्रेस का प्रचार करने वाले लोग ही थे, इसलिये ग्रामीणों ने अंदाजा लगाया है कि यह सब उम्मीदवार की जानकारी में हुआ होगा। पुलिस ने जब्ती बनाई है, शिकायत हुई है-कार्रवाई करना न करना आयोग के हाथ में है। पर दिलचस्प यह है कि ये सामान बकायदा एक बड़े थैले में लाए गए थे, जिनमें पंजे के निशान के साथ कांग्रेस प्रत्याशी विनय भगत की बड़ी सी तस्वीर थी। शायद यह सुनिश्चित करने के लिए कि मतदाता याद रखे, सामान किससे मिला। ([email protected])
खर्च करोड़ों में सबकी आँखें बंद
चुनाव आयोग ने विधानसभा प्रत्याशी के लिए चुनाव खर्च की सीमा 40 लाख रुपए निर्धारित की है, लेकिन चर्चा है कि प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा ने अपने प्रत्याशियों को तय सीमा से अधिक राशि उपलब्ध कराई थी। 40 लाख रुपए तो प्रत्याशियों के बैंक अकाउंट में जमा किए गए थे। बाकी राशि किस्तों में उपलब्ध कराई गई।
सुनते हैं कि दोनों ही दलों ने अपने प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार में खर्च के लिए 2 करोड़ तक दिया था। बस्तर के प्रत्याशियों को मैदानी इलाकों के प्रत्याशियों की तुलना में कम फंड दिया गया था। मगर दर्जनभर से अधिक सीट ऐसी है जहां 10 करोड़ से ज्यादा खर्च हुआ है।
चर्चा है कि रायपुर में तो एक निर्दलीय ने एक रात में ही 2 करोड़ बांट डाले। रायपुर और बिलासपुर में तो रातभर गलियों में पैसे का खेल चलता रहा। मगर व्यय प्रेक्षकों ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। कुछ लोग तो मानते हैं कि इस बार पैसे का खेल पहले की तुलना में काफी ज्यादा हुआ है। अब चुनाव नतीजे पर क्या कुछ फर्क पड़ता है, यह तो 3 दिसंबर के बाद ही पता चलेगा।
एक पूर्व विधायक के खिलाफ शिकायत
कांग्रेस मेें भीतरघातियों के खिलाफ कार्रवाई चल रही है, और दर्जनभर से अधिक नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। भाजपा में भी ढेरों शिकायतें हुई है, लेकिन अभी कार्रवाई से परहेज किया जा रहा है। चर्चा है कि चुनाव नतीजे आने के बाद भीतरघातियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
सुनते हैं कि रायपुर की सीटों के भाजपा प्रत्याशियों ने एक पूर्व विधायक पर पार्टी के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है। पूर्व विधायक की शह पर एक-दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी भी खड़े किए गए हैं। एक प्रत्याशी ने तो सह चुनाव प्रभारी डॉ. मनसुख मंडाविया से इसकी शिकायत की है। मंडाविया ने तमाम शिकायतों को गंभीरता से लिया है। देखना है कि भीतरघातियों पर क्या, और कब कार्रवाई होती है।
चुनाव खत्म तगादा शुरू, फंड मैनेजर गायब
प्रदेश में दोनों चरणों का मतदान खत्म हो गया है। प्रत्याशी और उनके व्यय पर्यवेक्षक एक एक वोट पर हुए खर्च के हिसाब किताब में व्यस्त हैं। कुछ रिलेक्स होकर हिसाब किताब करने के मूड में कस्बा,गांव और शहर से बाहर हैं तो कुछ ने घर के दरवाजे नतीजों तक बंद कर लिए हैं। यानी जीते तो पेमेंट और हारे तो बाद में दे देंगे, भागे थोड़े जा रहे हैं। सबका दिया है तुम्हें भी दे देंगे आदि आदि जवाब तैयार है। पड़ोस के शहर में आज सुबह से एक पेंटर, भैया के फंड मैनेजर के हेमू नगर के घर के बाहर हंगामा कर रहा है। इसने भैया के लिए वॉल राइटिंग की है।
पहली किस्त के बाद दूसरी का अता पता नहीं। दूसरी किस्त में पौन लाख का बिल दिया तो मैनेजर ने नापजोख की बात कही, वो भी करना शुरू किया तो मैनेजर का गवाह गायब। अब बेचारा पेंटर दरवाजे पर खड़े होकर हंगामा कर रहा और व्हाट्सएप में वायरल करने मजबूर हो रहा। सरकारी एजेंसी से भी लोग नाराज हैं । मतदान के दिन ब्रेकफास्ट और लंच का पैसा न मिलने पर बस ड्राइवर सैकड़ों बसें खड़ी कर विरोध जता चुके थे।
चुनाव अभी बाकी है दोस्त...
मतदाताओं का ख्याल तभी तक किया जाता है जब तक वोटिंग नहीं हो जाती। ऐसे फैसले सरकार नहीं लेती जिससे मतदाता नाराज हों, वरना वोट उनके खिलाफ जा सकते हैं। लोगों ने पिछले कई चुनावों में पाया है कि पेट्रोलियम कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाना महीने दो महीने पहले बंद कर देती हैं और मतदान खत्म होने के तुरंत बाद एकमुश्त वृद्धि कर भरपाई कर लेती हैं। केंद्र सरकार अक्सर पेट्रोलियम के दाम बढऩे के सवाल पर हाथ खड़े कर देती है कि यह तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार के आधार पर कंपनियां खुद तय करती हैं। पर, चुनाव के वक्त यह साफ हो जाता है कि कंपनियां कुछ नहीं, केवल सरकार की सुविधा और निर्देश पर ही काम करती हैं।
कोविड काल के बाद से छोटे स्टेशनों पर ट्रेनों का स्टापेज बंद करना, अनेक ट्रेनों को लंबे समय से रद्द करके रखना, आए दिन सुधार व निर्माण कार्यों का नाम लेकर चालू ट्रेनों का परिचालन रोक देना, छत्तीसगढ़ के यात्रियों पर भारी पड़ता रहा है। इसके खिलाफ लगातार आंदोलन किए गए। इसे लेकर छोटे-छोटे कई आंदोलन अलग-अलग स्टेशनों में पिछले दो साल से हो रहे हैं। कांग्रेस के सांसद विधायकों की चि_ियों और रेलवे के अधिकारियों से चर्चा करने पर भी स्थिति नहीं सुधरी। बीते सितंबर महीने में कांग्रेस ने एक बड़ा रेल रोको आंदोलन किया था। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, दुर्ग सभी जगह कार्यकर्ता पटरी पर बैठ गए थे। सैकड़ों लोगों के खिलाफ रेलवे ने एफआईआर दर्ज कर ली थी। इसके बाद रेलवे को शायद लगा कि मुद्दा बड़ा होता जा रहा है, जिसका आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है। तब एक-एक कर ट्रेनों के बंद स्टापेज शुरू किए गए। चुनाव की घोषणा के बाद कटनी रूट पर कई पुराने बंद स्टापेज फिर शुरू कर दिए गए। खासकर कोटा और गौरेला के लोग लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। ट्रेन ठहरने की बंद की गई सुविधा को भी उपलब्धि की तरह दिखाया गया, सांसदों और मंत्रियों को अतिथि बनाकर कार्यक्रम रखे गए। इधर, आधुनिकीकरण के नाम पर ट्रेनों को निरस्त करने का सिलसिला भी थम सा गया। दो महीने तक रेलवे ने कोई बड़ी कैंसिलेशन नहीं की। हालांकि त्यौहारों के समय स्पेशल ट्रेनों की संख्या में पहले की तरह उदारता रेलवे ने नहीं दिखाई। इसके कारण हावड़ा, पटना की ओर आने-जाने वाली ट्रेनों में टिकटों की मारामारी रही।
इधर 17 नवंबर को मतदान खत्म होने के बाद अगले दिन रेलवे ने 30 ट्रेनों को रद्द करने का ऐलान कर दिया। दोपहर में ऐलान हुआ फिर अचानक यह फैसला वापस ले लिया गया। हद तो यह हो गई कि बिलासपुर से बीकानेर जाने वाली ट्रेन को रद्द करने की सूचना यात्रियों को उनके मोबाइल फोन पर भेजी जा चुकी थी। पर उसे भी अचानक रवाना कर दिया गया। जो यात्री महीनों पहले रिजर्वेशन करा चुके थे, उन्हें अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी, क्योंकि रद्द होने की सूचना के चलते वे स्टेशन पहुंचे ही नहीं थे। रेलवे ने अधिकारिक रूप से यह नहीं बताया कि किस वजह से इन 30 ट्रेनों को रद्द करने का फैसला वापस लिया गया। इनमें कई ट्रेन ऐसी हैं, जो राजस्थान की ओर जाती है, जहां अभी विधानसभा चुनाव के लिए वोट नहीं डाले गए हैं।
किसने सामान दिया, पता तो रहे...

चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद पूरे प्रदेश में इस बार पुलिस और निर्वाचन आयोग की टीम ने साड़ी कंबल और नगद के परिवहन को रोकने के लिए जबरदस्त अभियान चलाया। फिर भी आखिरी रात तक मतदाताओं तक रकम और सामग्री पहुंचाने का सिलसिला चलता रहा। जशपुर में ‘कत्ल की रात’ में जो साडिय़ां बंटने के लिए आई, वह चोरी छिपे नहीं बांटी गई। दो कारों में लोग घूम रहे थे। भीतर उपहार था, जिसे आप वोट देने के लिए दी गई रिश्वत भी कह सकते हैं। चूंकि ये लोग कांग्रेस का प्रचार करने वाले लोग ही थे, इसलिये ग्रामीणों ने अंदाजा लगाया है कि यह सब उम्मीदवार की जानकारी में हुआ होगा। पुलिस ने जब्ती बनाई है, शिकायत हुई है-कार्रवाई करना न करना आयोग के हाथ में है। पर दिलचस्प यह है कि ये सामान बकायदा एक बड़े थैले में लाए गए थे, जिनमें पंजे के निशान के साथ कांग्रेस प्रत्याशी विनय भगत की बड़ी सी तस्वीर थी। शायद यह सुनिश्चित करने के लिए कि मतदाता याद रखे, सामान किससे मिला। ([email protected])
लंबित विधेयक नई सरकार के हाथ
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने और विधेयक पर हस्ताक्षर करने को लेकर राज्यपालों के रवैये पर गंभीर चिंता जताई और कड़ी टिप्पणी की थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि वे आग से ना खेलें, वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं, बिल दबाकर न बैठें। इसके बाद खबर यह आई है कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने वे 10 विधेयक विधानसभा को लौटा दिए, जिन पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए थे। तमिलनाडु विधानसभा में सरकार ने विपक्षी अन्नाद्रमुक और भाजपा के बहिर्गमन के बीच इन विधेयकों को फिर से पेश कर दिया। अब ये विधेयक फिर पारित हो जाएं तो प्रावधानों के मुताबिक राज्यपाल को इन पर हस्ताक्षर करना होगा। इनमें से कुछ विधेयक राज्यपाल के पास सन् 2020 से लंबित थे। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का असर पंजाब और पश्चिम बंगाल में भी हुआ है। पंजाब के राज्यपाल की ओर से बताया गया है कि उन्होंने विधेयक जानबूझकर नहीं रोके, बल्कि कानूनी सलाह लेनी थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने दावा किया, उनके पास कोई भी विधेयक लंबित नहीं है।
संयोगवश, छत्तीसगढ़ सरकार भी पंजाब और तमिलनाडु की तरह राज्यपाल के पास विधेयकों के लंबित रहने को लेकर परेशान रही है। इनमें विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्तियों और हटाने का अधिकार राज्यपाल की जगह मंत्रिपरिषद् को देना, कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नाम बदलना आदि शामिल हैं। पर सबसे अधिक चर्चा में आया आरक्षण संशोधन विधेयक। विधानसभा के विशेष सत्र में इससे जुड़े दो भागों में यह विधेयक पारित करके राज्यपाल के पास भेजा गया। लंबे समय तक रुके रहने पर कांग्रेस ने आंदोलन किया, भाजपा को घेरा। इस बीच हाईकोर्ट ने रमन सरकार के दौरान पारित 58 प्रतिशत आरक्षण के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके चलते प्रदेश में आरक्षण की स्थिति शून्य हो गई। इसके चलते सरकारी नौकरियों में भर्ती रुक गई और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश बंद हो गया। हाईकोर्ट के आदेश पर जब सुप्रीम कोर्ट से स्थगन मिला, तब कहीं जाकर गतिरोध खत्म हुआ। पर विशेष सत्र में पारित 76 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक अब तक राज्यपाल के पास रुका हुआ है।
पंजाब और तमिलनाडु के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब छत्तीसगढ़ में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया चल रही है। यदि कुछ पहले सुप्रीम कोर्ट का रुख सामने आया होता तो छत्तीसगढ़ सरकार भी अपने विधेयकों को लौटाने या हस्ताक्षर करने का दबाव बना सकती थी। अब जो होगा नई सरकार में होगा। वह चाहेगी तो इन विधेयकों को दोबारा विधानसभा में लाएगी।
रेलवे में कम मतदान क्यों?
केंद्रीय कर्मचारियों को क्या विधानसभा चुनावों से अधिक लेना-देना नहीं है? यह सवाल तब पैदा हुआ है जब रेलवे क्षेत्र के वार्डों से मतदान की स्थिति सामने आई। बिलासपुर में रेलवे के दो केंद्रों में वोटिंग 36 प्रतिशत ही रही। दो हजार वोटरों में से करीब 700 ने ही वोट डाले। पूछे जाने पर बूथ पर मंडरा रहे पार्टी कार्यकर्ताओं ने बताया कि ऐसा हर बार होता है। रेलवे की तो एक अलग कॉलोनी है इसलिये जानकारी मिल गई, पर दूसरे केंद्र सरकार के संस्थाओं के अधिकारी कर्मचारी भी विधानसभा चुनाव में अधिक रुचि नहीं लेते। नगरीय निकाय चुनाव में भी ऐसा ही है। लोकसभा चुनाव में जरूर 55-60 प्रतिशत मतदान हो जाता है। रेलवे में बहुत से रनिंग स्टाफ भी होते हैं, जिनको मतदान के दिन छुट्टी नहीं दी जा सकती। ऐसे कर्मचारियों को डाक मतदान करने का अधिकार है, पर वे इसका इस्तेमाल करने में रुचि नहीं लेते।
एक ओर प्रदेश के दूरस्थ अंचलों से खबरें आई हैं कि मीलों चलकर, नदी-नाले पार कर नक्सली और हाथियों के डर के बीच लोग वोट देने के लिए निकले, वहीं दूसरी ओर जिनके घर के आसपास ही बूथ बने हैं, उन्होंने मत देने के अधिकार को कर्तव्य के रूप में लिया ही नहीं।
लकड़ा भाजी भी, चटनी भी..

छत्तीसगढ़ के हर हिस्से में अलग-अलग पारंपरिक भोजन मिलते हैं। भाजियों की अनगिनत श्रेणियां हैं। इन दिनों सरगुजा और जशपुर में लकड़ा के फूल खिले हुए हैं। जितने सुंदर इसके फूल हैं, उतने ही स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं। कच्चे में इसकी भाजी बनाकर खाई जा सकती है। चाहे तो इसे सुखाकर रख लें, और चटपटी चटनी बनाकर भात या रोटी के साथ खाएं। बाहर के जो लोग इसके बारे में जानते हैं, वे इसका स्वाद एक बार जरूर लेना चाहते हैं। ([email protected])
फंस गए मंत्रीजी
अंबिकापुर और आसपास के इलाके का माहौल मतदान के एक दिन पहले का तनावपूर्ण रहा। अंबिकापुर से डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव, तो पड़ोस की सीट सीतापुर से ताकतवर मंत्री अमरजीत भगत मैदान में थे। दोनों के समर्थकों ने काफी उत्पात मचाया। इसके कई वीडियो वायरल भी हुए हैं।
अमरजीत भगत के खिलाफ भाजपा प्रत्याशी पूर्व सैनिक रामकुमार टोप्पो मैदान में थे। भगत मिलनसार हैं, और चर्चा है कि भाजपा का स्थानीय संगठन उनके प्रभाव में रहा है। बताते हैं कि मतदान के एक-दो दिन पहले तो सीतापुर इलाके के भाजपा के कई मंडल पदाधिकारियों ने पार्टी प्रत्याशी के प्रचार से खुद को अलग कर दिया था। ऐसे कठिन समय में टोप्पो के समर्थन में कई पूर्व सैनिक आगे आए, और उन्होंने मतदाताओं को प्रलोभन देने की कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थकों की कोशिशों का कड़ा विरोध किया।
चर्चा है कि एक-दो जगहों पर तो कांग्रेस समर्थकों को लौटना पड़ा है। जिला प्रशासन पहले शिकायतों को नजरअंदाज करता रहा लेकिन पूर्व सैनिकों ने दिल्ली तक अलग-अलग स्तरों पर अपनी बात पहुंचाई, और भारी फोर्स वहां पहुंची। बाद में भगत के चुनाव संचालक का होटल भी सील कर दिया गया।
कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया टीएस सिंहदेव के खिलाफ भी हुई। अंबिकापुर से सटे उदयपुर इलाका सिंहदेव का गढ़ माना जाता है। यहां उनके करीबी सिद्धार्थनाथ सिंह के यहां फोर्स पहुंच गई थी। शिकायत यह थी कि सिंहदेव समर्थक मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए साड़ी-कंबल और अन्य सामग्री बांट रहे थे। अपने करीबी के यहां फोर्स पहुंचने की जानकारी मिलते ही सिंहदेव का काफिला उदयपुर पहुंचा लेकिन बात बिगडऩे से बच गई। पिछले चुनाव में सिंहदेव और भगत रिकॉर्ड वोटों से जीते थे। मगर इस बार दोनों ही कड़े मुकाबले में फंस गए हैं। दोनों ही प्रत्याशी की जीत और हार को लेकर बढ़-चढक़र दावे किए जा रहे हैं। 3 तारीख को सब कुछ साफ हो जाएगा।
कम वोटिंग के कई निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ की 70 सीटों पर शुक्रवार को हुए मतदान के कम प्रतिशत ने राजनीतिक दलों के साथ-साथ निर्वाचन से जुड़े अफसर को भी चौंकाया है। इसकी अलग-अलग वजह बताई जा रही है। कुछ लोगों का कहना था कि शहरी क्षेत्र में कम मतदान इसलिए हुआ क्योंकि दोनों ही प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने ग्रामीण मजदूर, किसानों का वोट हासिल करने के लिए तो ताबड़तोड़ घोषणा की है लेकिन शहरी निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग के लिए कोई ऐसी घोषणा नहीं की। शहरों और कस्बों में इसका असर मतदान में कमी के रूप में दिखा। आंकड़े विस्तृत रूप से सामने आएंगे, तब मालूम होगा कि वोटिंग में महिला मतदाताओं का प्रतिशत कितना था। पर यह जरूर हुआ है कि उनकी लंबी-लंबी कतार बूथों में देखी गई।? इसे कांग्रेस और भाजपा की उस महतारी वंदन और गृह लक्ष्मी योजना के ऐलान का असर बताया जा रहा है, जिसके तहत उनके खाते में नगद राशि डाली जाएगी।
मतदाता के मन की बात
जब से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से मतदान शुरू हुआ, मतपेटी की भूमिका खत्म हो गई। और इसी के साथ समाप्त हो गई, गिनती के दौरान मतपेटी से निकलने वाली दिलचस्प पर्चियां। इनमें अनेक वोटर अपना मत पत्र डालने के अलावा अपने मन की बात भी लिखकर छोड़ देते थे। इसमें वे अपने प्रतिनिधि की शिकायत करते थे। गुण गाते, निजी समस्या, देश दुनिया का हाल, प्रिय कविता कहानी शायरी गजल भी पुर्जे में लिखकर डाल देते थे। वोट गिनने वालों का भी मनोरंजन होता था और इन पर खबर भी बनती थी।
17 नवंबर को वोट डालने के बाद एक सुशिक्षित महिला मतदाता ने सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग से नाराजगी जताई। उन्होंने लिखा कि पहले मतपत्र के माध्यम से चुनाव होता था। मतदाता उसमें अपने मन की बात लिख सकता था। अब तो बटन दबाओ और मतदान हो गया। इस प्रणाली के कारण अब संवाद की संभावना समाप्त हो गई है। मतदाता अपने मन की बात या कहें भड़ास भी नहीं निकल पाता।
शिकायत वाजिब है। अब तो लोकसभा विधानसभा ही नहीं बल्कि स्थानीय निकायों के चुनाव भी ईवीएम से हो रहे हैं। पंचायत चुनाव जरूर अब भी मतपेटी से हो रहे हैं पर पंच सरपंच के दावेदार तो सामने खड़े होते हैं, उनके लिए पेटी में पर्ची नहीं छोडऩी पड़ती।
अंतिम समय में भारी मुकाबला
विधानसभा चुनाव में दोनों ही दल मतदाताओं को मुद्दों से जोडने में पीछे नहीं रहे। मोदी सरकार जो कल तक बोनस देने पर केंद्रीय पूल में चावल लेने से इंकार कर रही थी, उसने एक कदम बढक़र घोषणा की। कांग्रेस ने भी उनसे ज्यादा देने का वादा किया। महिलाओ के लिए 12 हजार की घोषणा हुई तो दूसरे ने 15 हजार कर दी। इस वजह से मतदान आते आते मुकाबला कांटे का दिखने लगा। अब बारी प्रत्याशियों की थी, सो उन्होंने आखरी रात में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्हें पता है कि अभी कंजूसी किये तो पांच साल बेरोजगार रहेंगे। अब उनका दांव कितना असर करता है नतीजे उसी पर निर्भर करेंगे।
बांध नहीं बनी बाधा

कुछ गांवों में सडक़ बनाने की मांग पूरी नहीं होने पर ग्रामीणों ने मतदान के बहिष्कार का ऐलान कर दिया। अधिकारियों के समझाने बुझाने पर कहीं-कहीं या तो बहिष्कार खत्म भी कर दिया गया। पर ऐसी घटनाओं के बीच कोरबा जिले के सतरेंगा ग्राम पंचायत के आश्रित गांवों के मतदाताओं ने अनूठा उदाहरण पेश किया। यह खोखरा आमा, कुकरी चोली, कांसीपानी के कोरवा पहाड़ी आदिवासी हैं जो घने जंगल के भीतर घास फूस की झोपड़ी में रहते हैं। वोट डालने के लिए पहले वे 5 किलोमीटर पैदल चले। उसके बाद बांगो बांध के डुबान क्षेत्र में पहुंचे। नौका पर चढक़र बांध पार किया। उसके बाद फिर दो किलोमीटर चलकर मतदान केंद्र लाम पहाड़ पहुंचे। वोट डालने में तो उनको करीब आधा घंटा ही लगा, मगर यहां से घर तक आने-जाने में पूरा एक दिन लग गया। सुबह? से निकले ग्रामीण शाम तक वापस अपने गांव लौट पाए। पहाड़ी कोरवावों तक सुविधा पहुंचाने के लिए सरकार ने अलग प्राधिकरण बना रखा है, जिसमें करोड़ों रुपए का बजट है। अभावों के बाद भी इन मतदाताओं की लोकतंत्र में गहरी आस्था दिखी।


