राजपथ - जनपथ
मंडी से मंदिर तक आस्था और राजनीति
रायपुर की पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी भले ही अब तुलसी-बाराडेरा शिफ्ट हो चुकी हो, लेकिन पुराने परिसर की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गेट के बाहर स्थित राम-जानकी मंदिर आज भी श्रद्धा का बड़ा केंद्र बना हुआ है। 90 के दशक में बने इस मंदिर की खासियत यह है कि इसका निर्माण उस दौर में हुआ, जब देश में राम मंदिर, बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था। उस समय मंडी अध्यक्ष रहे मोहम्मद अकबर ने मंदिर का निर्माण कराया था।
आज भी परंपरा जारी है। नवरात्र में ज्योति कलश स्थापना के दौरान सबसे पहला नाम अकबर का ही लिया जाता है। उनके बाद के पदाधिकारियों में देवजी पटेल, सुरेखा महेश शर्मा और अनिता योगेंद्र शर्मा जैसे नाम भी इस परंपरा से जुड़े हैं। व्यापारी और किसान भी पीछे नहीं हैं। वे भी आस्था के इस सिलसिले में बराबर सहभागी हैं। रामनवमी के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना हो रही है, जिससे साफ है कि मंडी भले खाली हो गई हो, लेकिन आस्था अब भी आबाद है।
दूसरी ओर, इस खाली पड़ी जमीन पर जेम-ज्वेलरी पार्क बनाने का प्रस्ताव है, जिस पर सियासत गर्म है। मंडी से राजनीति की शुरुआत करने वाले कई नेताओं ने इसका विरोध किया है। देवजी पटेल इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट तक जा चुके हैं, और अब फिर से कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं। हालांकि पिछली सरकार ने पहले आपत्ति खारिज कर दी थी। वर्तमान में उनकी अपनी पार्टी सरकार ने भी देवजी की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया है। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि मंडी शिफ्ट हो चुकी है, ऐसे में खाली जमीन का अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग करना गलत नहीं है। मगर देवजी भाई पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में आगे क्या होगा, इस पर सबकी नजर है।
फोटो असली हो या नकली, सलाह खरी
एआई और फोटो-वीडियो एडिटिंग के दूसरे मामूली औजारों के इस वक्त में यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल रहता है कि असली क्या है और नकली क्या है? ऐसे में सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चित एक लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने आज अपनी तस्वीर के साथ एक पेट्रोल पंप पर लगे एक बैनर की फोटो पोस्ट की है । बारीकी से देखने पर, डिजिटल औजारों से परखने पर ऐसा लगता है कि यह बैनर कहीं और से लाकर इस फोटो पर जोड़ दिया गया है। जो भी हो बैनर असली हो या नकली, सलाह तो खरी है, और इस पर अमल में समझदारी भी है।
ईंधन संकट की आहट...
खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात का असर अब स्थानीय बाजार तक महसूस होने लगा है। ईंधन और रसोई गैस को लेकर संकट की चर्चाएं तेज हैं, और इसके साथ ही कालाबाजारी भी सिर उठाने लगी है।
प्रदेश में लगातार छापेमारी हो रही है, लेकिन हालात यह है कि कमर्शियल गैस सिलेंडर जहां तय कीमत करीब 1800 रुपये है, वहीं बाजार में 7 हजार रुपये तक बिकने की खबरें हैं। सरकार द्वारा होटल-रेस्टोरेंट को सीमित मात्रा (करीब 20 फीसदी) में ही कमर्शियल सिलेंडर देने के फैसले के बाद परेशानी और बढ़ गई है। इसका सीधा असर होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर पड़ रहा है। विकल्प के तौर पर डीजल चूल्हों की मांग बढ़ी है, लेकिन अब इनमें बने खाने में डीजल की गंध आने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जो नई चिंता का विषय बन गया है।
जिला प्रशासन ने पेट्रोल पंप संचालकों को ड्रम और जेरिकेन में पेट्रोल-डीजल देने पर सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं, यहां तक कि उल्लंघन पर पंप सील करने की चेतावनी भी दी गई है।
सरकार भले ही ईंधन और गैस की कोई कमी नहीं होने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी खबरें अलग कहानी कह रही हैं। पड़ोसी राज्यों के फैसले भी चिंता बढ़ा रहे हैं, महाराष्ट्र में ट्रक चालकों के लिए डीजल की सीमा तय की गई है, वहीं ओडिशा में रेस्टोरेंट्स को गैस की जगह पारंपरिक चूल्हे इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। अब देखना यह है कि यह संकट अफवाहों तक सीमित रहता है या वाकई बड़े असर के साथ सामने आता है।
शीर्ष फैसले का छत्तीसगढ़ पर असर..
छत्तीसगढ़ में वर्षों से प्रार्थना सभाओं पर संगठित हमले होते रहे हैं। पास्टरों पर लाठी-डंडों का प्रहार, महिलाओं-बच्चों की गरिमा का अपमान और सामाजिक बहिष्कार। ऐसे में 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला राज्य के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। इस फैसले के मुताबिक एक बार ईसाई या इस्लाम जैसे धर्म में सार्वजनिक रूप से प्रवेश कर लेने पर जन्म-आधारित जाति का लाभ तत्काल और पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के न केवल आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में बल्कि मैदानी इलाकों में भी धर्मांतरण के आरोप पर प्रार्थना सभाएं बाधित होती रही हैं। बस्तर के छिंदवाड़ गांव में एक दलित ईसाई परिवार के परिजन का शव तीन सप्ताह तक चीरघर में पड़ा रहा। ग्राम सभा के पारंपरिक रिवाज और पेसा कानून का हवाला देकर गांववालों ने शव दफनाने का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले में अंतत: शव को गांव के बाहर एक ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का आदेश हुआ। कुछ क्षेत्रों में दफनाए गए शव को निकालने के मामले भी आ चुके हैं। पादरियों के गांवों में प्रवेश को रोकने के ग्राम सभाओं के फैसलों को भी अदालत सही ठहरा चुकी है।
हाल ही में विधानसभा ने धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक पारित किया है, जो 1968 के पुराने कानून को बदल देता है। यह कानून जबरन, लालच, विवाह या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाता है, जिसमें सामूहिक धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास और अन्य अवैध मामलों में 10-20 साल की कैद के साथ भारी जुर्माने का प्रावधान है। पुराने कानून में केवल एक साल की सजा और 5 हजार रुपये का जुर्माना था।
दिलचस्प यह है कि पुराने कानून में भी सजा की दर बेहद कम रही या नगण्य रही है। वास्तव में लालच या धोखाधड़ी की बात को न तो धर्म परिवर्तन करने वाला स्वीकार करता है और न ही धर्मांतरित कराने वाला। इसलिये कानून कठोर बना देने का मतलब ऐसे मामलों में सजा की दर बढ़ जाएगी यह मान लेना सही नहीं होगा। दूसरी तरफ, शीर्ष अदालत ने आंध्रप्रदेश के जिस मामले को सुनकर यह फैसला दिया है वह अनुसूचित जाति से संबंधित है, जनजाति से नहीं। छत्तीसगढ़ में मत और धर्म बदलने वाले दोनों ही तरह के लोग हैं। मैदानी इलाकों में ओबीसी और एससी वर्ग के लोग तो आदिवासी बहुल इलाकों में एसटी वर्ग के। जिस केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, वह प्रार्थना सभा में हमले का मामला था। इस मामले में एससी अत्याचार अधिनियम के तहत आरोपियों पर कार्रवाई की मांग थी। मगर, अब साफ हो गया है कि प्रार्थना सभा में मौजूद लोग यदि अनुसूचित जाति के हैं और वे पुख्ता तौर पर धर्म बदल चुके हैं तो वे हमले की स्थिति में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर नहीं करा सकेंगे। मगर, बीएनएस में मौजूद सुरक्षा मिलती रहेगी।


