राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : दावोस में धमक कब?
24-Jan-2026 6:09 PM
राजपथ-जनपथ : दावोस में धमक कब?

दावोस में धमक कब?

विश्व के सबसे बड़े आर्थिक मंच वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक का दुनिया के हर विकसित और विकासशील देशों के उनके राज्यों को इंतजार रहता है। इस वर्ष भी इस फोरम की बैठक दावोस में अंतिम चरण में जारी है। इस फोरम का आकर्षण और अहमियत यह है कि इस बार डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन  भी शामिल हुए। यह फोरम की 56 वीं बैठक रही।

और इस बार भारत से अब तक का सबसे बड़ा दल शामिल हुआ। लगभग आधे दर्जन केंद्रीय मंत्रियों और 10 राज्यों ने हिस्सा लिया। यह पहली बार है कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय राज्यों - विकासशील से लेकर विकसित राज्यों ने इसमें भाग लिया और दुनिया के सामने अपनी उपलब्धियां पेश कीं। महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और केरल। असम और झारखंड ने इस शिखर सम्मेलन में पहली बार भाग लिया। उत्तर प्रदेश, केरल, गुजरात और कर्नाटक के मुख्यमंत्री दावोस नहीं गए, बल्कि उनके वरिष्ठ मंत्रियों ने अपने-अपने राज्यों का प्रतिनिधित्व किया। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के ही साथ अस्तित्व में आया झारखंड इस बैठक में शामिल हो गया। और हम बीते 24 आयोजनों से भी दूर रहे।

 इस दौरान दावोस जैसे मंच को आकर्षित करने छत्तीसगढ़ की रमन सिंह, भूपेश बघेल और साय  सरकारों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय इन्वेस्टर्स समिट के आयोजन करने के साथ ही कई आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल के साथ चीन, ब्रिटेन अमेरिका, जापान दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों का दौरा भी किया। जहां वैश्विक उद्योगपतियों के साथ चर्चा और आमंत्रण दिया जाता रहा। खैर हम आशावादी हैं आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ भी दावोस में धमक दिखा सकता है।

राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों की भूख

गोद में बच्चे, आंखों में चिंता। यह तस्वीर कोरबा जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर नकिया गांव की पहाड़ी कोरवा आदिवासी महिलाएं, जो तीन महीनों से राशन न मिलने की पीड़ा लेकर जंगल, पहाड़ और नदी-नालों को पार करती हुई पैदल जिला मुख्यालय पहुंचीं। वे पूछ रही थीं-अपने बच्चों को क्या खिलाएं?

कहीं राशन की खेप नहीं पहुंची, कहीं हितग्राही का सत्यापन अधूरा। कारण अलग-अलग बताए गए। अधिकारियों के सामने फरियाद रखी गई तो जवाब मिला राशन आया ही नहीं है, आएगा तो भेज दिया जाएगा।  बिना किसी ठोस आश्वासन के उन्हें वापस लौटना पड़ा। मालूम हो कि विलुप्त होती जनजाति पहाड़ी कोरवा को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है। इस ओहदे के बावजूद व्यवस्था की खामियों के चलते वे भूख के सामने बेबस हैं।

टीम-नबीन में कौन-कौन?

भाजपा में नबीन युग शुरू हो गया है। पार्टी के युवा नेता तो खुश हैं, लेकिन कई स्थापित नेताओं को किनारे कर दिए जाने का डर समा गया है। नितिन नबीन जल्द ही अपनी नई टीम का ऐलान करने वाले हैं। नई टीम में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।

कुछ लोग अंदाज लगा रहे हैं कि नबीन की टीम में पूर्व मंत्री महेश गागड़ा, संजय श्रीवास्तव, सुशांत शुक्ला जैसे नए चेहरे आ सकते हैं। यही नहीं, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव, विजय शर्मा, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी को भी जगह मिल सकती है। पार्टी के पुराने नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिलेगी कि नहीं, इस पर संशय है। पार्टी ने युवा मोर्चा के राष्ट्रीय पदाधिकारी के लिए नया आयु सीमा निर्धारित कर दी है। यानी 30 साल से अधिक उम्र वालों को पदाधिकारी नहीं बनाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में तो युवा मोर्चा में सक्रिय ज्यादातर नेता 30 पार कर चुके हैं। ऐसे में उनके लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह पाने की संभावना कम हो गई है। इसी तरह संगठन के बाकी पदों पर नियुक्ति के लिए भी उम्र का ध्यान रखा जा रहा है, और ज्यादा से ज्यादा युवाओं को आगे लाने की कोशिश चल रही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पार्टी के स्थापित पुराने नेता बेचैन हैं। नबीन युग में पार्टी संगठन में कुछ नवीन होने के संकेत दिख रहे हैं।

एमपी के युवा आईपीएस ने छोड़ी नौकरी

मध्यप्रदेश कैडर के 2013 बैच आईपीएस अभिषेक तिवारी का सरकार से मोह भंग हो गया। अब उन्होंने 12 साल की सर्विस के बाद इस्तीफा देकर साइबर के क्षेत्र में निजी तौर पर काम करने के लिए कदम बढ़ाया है। मूलत: मध्यप्रदेश सिवनी जिले के रहने वाले तिवारी इन दिनों केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर थे। वह नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाईजेश, तकनीकी खुफिया एजेंसी में दिल्ली में पदस्थ थे। बालाघाट से बतौर एसपी शुरूआत करने वाले तिवारी रतलाम और सागर जिले में भी पदस्थ रहे। उनके पिता भी मध्यप्रदेश पुलिस महकमे में डीएसपी के पद से रिटायर्ड हुए। वह छत्तीसगढ़ के युवा आईपीएस जितेन्द्र शुक्ला के ट्रेनिंग रूम मैट थे। नौकरी छोडऩे के फैसले को लेकर तिवारी ने मध्यप्रदेश  सरकार के जरिये केंद्र को आवेदन दिया था। सुनते हैं कि वह साइबर के बढ़ते अपराध पर विशेष रूप से तकनीकी रूप से काम करने की इच्छा रखते हैं। छत्तीसगढ़ में उनके बैच मेट मोहित गर्ग, अभिषेक पल्लव और मुंगेली एसपी भोजराम पटेल रहे हैं।

खत्म होती हिंसा के बीच डर का साया

हाल ही में नारायणपुर जिले के बिनागुंडा गांव में एक दुखद घटना हुई। 55 साल के मनकू पद्दा ने पुलिस की मदद करने के कुछ घंटों बाद प्रतिशोध के डर से आत्महत्या कर ली। मनकू ने मनीष नारेती का शव ढूंढने में पुलिस की मदद की थी, जिसकी पिछले साल अगस्त में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के आरोप में माओवादियों ने हत्या कर दी थी। मनकू खुद माओवादियों की मदद कर चुका था और सरेंडर करना चाहता था, लेकिन डर ने उन्हें इस कदम पर मजबूर कर दिया। इसके पहले दिसंबर में बीजापुर जिले में माडवी भीमा ने भी सीआरपीएफ की मदद करने के बाद इसी डर से आत्महत्या कर ली थी।

ये घटनाएं बताती हैं कि बस्तर में बंदूकों की लड़ाई मंद जरूर पड़ गई है, बल्कि यह आम लोगों के मन में डर और असुरक्षा खत्म करने में वक्त लगने वाला है।

केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश से नक्सल विद्रोह को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। 2025 में बस्तर रेंज में 256 नक्सल मारे गए और 1500 से ज्यादा ने सरेंडर किया। इसी महीने जनवरी में बीजापुर में दो माओवादी मारे गए, सुकमा और बीजापुर में 14 नक्सल ढेर हुए और धमतरी में 47 लाख के इनामी 9 हाई-रैंक माओइस्ट ने सरेंडर किया। आंकड़े दिखाते तो हैं कि सुरक्षा बलों की मुहिम तेज है, और नक्सल प्रभाव कम हो रहा है। मगर, सुसाइड की ये दो घटनाएं बताती हैं कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। आंकड़ों सरेंडर करने वालों और मारे जाने वाले नक्सलियों की बड़ी संख्या के बावजूद संकेत है कि अभी भी पुलिस की मदद करने वाले आदिवासी डर रहे हैं। शायद उन्हें लगता है कि बचे हुए माओवादी अब भी जन अदालत लगाकर उन्हें सजा सुना सकते हैं, जैसे नारेती की हत्या हुई।


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