आजकल
बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनावों के महीनों पहले से सोशल मीडिया उबलने लगा था, और वह उफनते भी जा रहा था। जिस तरह कुछ चीजों को उबालने से उनकी अशुद्धियां उबलकर उफनते हुए बाहर आने लगती हैं, उसी तरह चुनावी राजनीति से लेकर व्यक्तिगत आरोपों और लांछनों तक विचारों की हिंसा इसी तरह उफनकर बाहर आ रही थी। अब चूंकि एआई की मेहरबानी से मिनटों में मनचाही फोटो या वीडियो बनाना आसान हो गया है, इसलिए पहले के मुकाबले इस बार जहरीला ऑडियो-वीडियो कुछ अधिक उफन रहा था। असल जिंदगी का तो नहीं मालूम, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों में, उनके बीच, जिस दर्जे का ध्रुवीकरण हो चुका है, उनके बीच सच को सांस लेने की जगह नहीं है। इस खेमे, या उस खेमे की सक्रियता में सब कुछ खो चुका है। आप किसी भी तरह की हकीकत बयां करें, तो जिन्हें वह पसंद आएगी, वे अमूमन चुप रहेंगे, जिन्हें वह नापसंद रहेगी, वे बिफर पड़ेंगे, और टूट पड़ेंगे। ऐसे में एक सवाल उठ खड़ा होता है कि आज के ध्रुवीकरण के बीच सच बोलना महज साहस है, या फिर वह एक जोखिम भी है?
बंगाल में चूंकि ममता बैनर्जी एक महिला हैं, इसलिए महिलाविरोधी रूख अपने पूरे हिंसक तेवरों के साथ सोशल मीडिया पर छाया हुआ था। एक किसी पत्रकार ने एक गढ़ी हुई तस्वीर या पोस्टर का एक हिस्सा कुछ दबा-छुपाकर पोस्ट किया है जिसमें ममता बैनर्जी की एक अश्लील सी तस्वीर होने का आभास मिलता है। एक कार्टून की तरह बनाई गई यह फोटो पूरी देखने में नहीं मिली है, और न ही पूरी देखने की कोई लोकतांत्रिक-हसरत ही है। अगर राजनीति इस स्तर पर गिर चुकी है कि चुनावी मैदान की एक महिला के विरोधी, या हो सकता है उसके समर्थक भी, ऐसी फोटो बनाकर कुछ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो हम सिर्फ उसका जिक्र करना चाहते हैं कि ऐसे जहरीले वातावरण में लोकतंत्र कैसे जिंदा रह सकता है? कैसे ममता के विरोधी, या सहानुभूति पाने की साजिश में ममता के कुछ समर्थक ऐसे पोस्टर या कार्टून बना सकते हैं?
कुछ अरसा पहले मुझे यह लगता था कि सोशल मीडिया अपने अराजक तेवरों के साथ, और लोकतांत्रिक संभावनाओं को लेकर आजादी की एक नई मशाल है। इस मशाल की रौशनी में लोगों को कुछ अधिक दूर तक देखना मुमकिन होगा। लेकिन ऐसा सोचना शुरू करने के कुछ बरसों के भीतर ही अब मेरा मोहभंग हो चला है, और यह साफ-साफ लगने लगा है कि जमीन पर लोगों के दिलों में जितना जहर नहीं हो सकता, उससे हजारों गुना अधिक जहर सोशल मीडिया पर निकाला जा रहा है। वहां पर भाड़े के भोंपू हों, समर्पित कार्यकर्ता हों, या वैचारिक प्रतिबद्धता वाले लोग हों, कुल मिलाकर कुछ रासायनिक कारखानों की चिमनियों की तरह जहर उगलते लोग सोशल मीडिया को लोकतंत्र से परे ले जा रहे हैं, लोकतंत्र के आसपास भी फटकने नहीं दे रहे हैं। मैं जंगली शब्द को गाली तरह इस्तेमाल नहीं कर रहा, लेकिन जिसे जंगली तौर-तरीका कहा जाता है, वैसे घेरकर मारने के तेवर सोशल मीडिया पर इतने हावी हो चुके हैं, कि वहां पर किसी वैचारिक विचार-विमर्श की गुंजाइश नहीं रह गई है। और यह एक बात ऐसी है कि जो इसे लोकतांत्रिक मिजाज से ठीक उल्टी दिशा में ले जा रही है, ले जा चुकी है।
अब किसी गंभीर विचार को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लिखने का मतलब वैचारिक रूप से असहमत लोगों के हिंसक झुंड के बीच घिर जाने सरीखा है। वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से इतनी तकलीफ झेलने की बात तो समझ आती है, और वैचारिक प्रतिबद्धता जब मूल्यों को लेकर रहती है, तो कुछ खतरा उठाना भी समझ आता है। लेकिन सोशल मीडिया के जिन प्लेटफॉम्र्स पर मूल्यों को लेकर ऐसे लिखने का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं होता है, वहां अपनी जिंदगी के सुख-चैन को खत्म करना क्या सचमुच समझदारी है?
पता नहीं यह कौन से युग की बातें थीं, या सचमुच की बातें थीं भी, या नहीं थीं, और ये केवल किस्सा-कहानियां थीं। सुनते हैं किसी समय भारत में बड़े-बड़े शास्त्रार्थ होते थे, विद्वानों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर, कुछ विषयों पर लंबी सार्वजनिक बहस होती थी। और ऐसी जितनी कहानियां इतिहास में दर्ज हैं, उनमें से किसी में भी जीते या हारे लोग दूसरे की मां-बहन एक किए बिना परस्पर सम्मान और सद्भाव से बिदा होते थे। ऐसे शास्त्रार्थ के बीच उनके समर्थकों के हिंसक-शिकारी झुंड नारे लगाते किसी मुद्दे को दबाते खड़े नहीं रहते थे। शास्त्रार्थ की वैसी गौरवशाली परंपरा अब खो गई है, शायद कभी लौटकर नहीं आने के लिए।
सच तो यह है कि सच कहने को अब दिल नहीं करता, और दिमाग यही कहता है कि दिल तुम सच से या तो दूर रहो, या उसे अपने भीतर बसाकर रखो, उसे बाहर मत उफनने दो, क्योंकि उससे नुकसान के अलावा हासिल और कुछ नहीं होगा। एक वक्त मुद्दों पर ध्रुवीकरण होता था, लोग असहमत रहते थे, लेकिन सहअस्तित्व की गुंजाइश बनी रहती थी। अब सोशल मीडिया पर, और उसकी मेहरबानी से, लोग एक-दूसरे से असहमत नहीं होते, उन्हें नापसंद करने लगते हैं। अब लोग दूसरी सोच के लोगों को बुरा, बेवकूफ, या देश का गद्दार मानने लगे हैं। अब असहमति दिमागी शास्त्रार्थ का सामान नहीं रह गई, वह दिल की नफरत की वजह बन गई है। आज का सोशल मीडिया का, या किसी और जगह का सार्वजनिक शास्त्रार्थ कुतर्कों से शुरू होता है, और गालियों और व्यक्तिगत दुश्मनी पर जाकर ही थमता है।
कुछ राजनीति शास्त्रियों का मानना है कि अब लोग अपनी जीत से ज्यादा दूसरे की हार में खुशी ढूंढते हैं। और अब लोग अपने और दूसरे खेमे को इस तरह देखने लगे हैं कि अगर आप उनके खेमे में नहीं हैं, तो न सिर्फ आप गलत हैं, बल्कि उनके खेमे के अस्तित्व के लिए एक खतरा भी हैं। बात जब अस्तित्व की लड़ाई की हो जाती है, तो फिर लोग मामूली सी असहमति के मुद्दों को भी आखिरी खंदक की लड़ाई की तरह लडऩे लगते हैं। जो लोकतंत्र असहमति को सुनने, समझने, महत्व देने के बाद अपनी सोच को एक बार फिर सोचने की बुनियाद पर खड़ा होता है, उसमें आज वैचारिक असहमति के लिए असहिष्णुता में लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म कर दिया है। अब लोग छोटे-छोटे ऐसे ईको-चेंबर्स में कैद हो गए हैं, जहां उन्हें अपनी ही कही बात की गूंज सुनाई पड़ती रहे। अब खुली जगहों की विविधता और असहमति को देखने-सुनने की संस्कृति खत्म हो गई है।
कुछ हाल के राजनीति शास्त्री चेतावनी देते हैं कि भावनाओं पर आधारित ध्रुवीकरण तथ्यों को मार देता है। जब हम नफरत से भरे होते हैं, तो हम केवल वह सत्य देखना चाहते हैं जो हमारे पाले को सही, और दूसरे को गलत साबित करे। ऐसा दुराग्रह लोकतंत्र को सहमत-असहमत लोगों, और समूहों की एकजुटता से परे ले जाकर ऐसे कबीलों में तब्दील कर देता है जिनका अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व को खत्म करने पर टिका रहता है। यह सिलसिला लोगों को किसी असहमत सच से लडऩे के लिए गढ़े हुए झूठ के इस्तेमाल को जायज ठहराने का नैतिक साहस भी देता है। और इन दिनों बढ़ता चल रहा ऐसा नैतिक दुस्साहस, या अधिक बेहतर यह कहना होगा कि ऐसा अनैतिक दुस्साहस, लोगों को हिंसा, अश्लीलता गढऩे को भी जायज ठहराने में मदद करता है। तथाकथित इंसानियत जिस रफ्तार से हिंसानियत में बदल गई है, उससे लगता है कि ऐसीे आत्ममुग्ध, और स्वघोषित-गौरवशाली संस्कृति की पूरी मोटाई बदन की पतली सी चमड़ी जितनी ही थी, एक खरोंच लगी, और इस तथाकथित इंसानियत के नीचे से आदिम हिंसानियत निकलकर सामने आ गई। अब इसके सामने इसे नापसंद सच को कहने का हौसला दिमाग को तो नापसंद होगा ही, अब दिल भी जवाब देने लगा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


