आजकल
नागपुर में अभी भारत दुर्गा मंदिर के शिलान्यास के कार्यक्रम में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान ने मंच से कहा कि हर कोई चार बच्चे पैदा करे, और उसमें से एक को आरएसएस को दे दे। यह नौजवान पहले भी कई बार कई मंचों से चार-चार बच्चे पैदा करने का आव्हान कर चुका है। और ऐसा करने वाला वह अकेला धार्मिक व्यक्ति नहीं है। हिन्दुओं से परे मुस्लिमों के एक बड़े प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक ने भी कई मंचों से मुस्लिमों को ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा है। भारत के बाहर भी कुछ दूसरे देशों में अलग-अलग धर्मों के लोग ऐसा आव्हान करते हैं, हालांकि पिछले पोप, पोप फ्रांसिस ने खरगोशों की तरह (यानी खूब ज्यादा) बच्चे पैदा करने की मानसिकता की आलोचना की थी, और जिम्मेदार मां-बाप बनने का सुझाव दिया था। भारत में साध्वी देवा ठाकुर ने हर हिन्दू महिला से चार बच्चे पैदा करने की अपील की थी, यति नरसिम्हानंद ने भी कई बार ऐसे भाषण दिए हैं, एक कोई स्वामी चक्रपाणि महाराज भी ऐसे बयान देते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे बयान देने वाले तकरीबन सारे ही लोग धर्म से जुड़े हुए घोषित रूप से अविवाहित, और तथाकथित ब्रम्हचारी माने जाते हैं।
जिस धर्म के जो लोग अपने धर्म के इस किस्म के लोगों के आव्हान या फतवे को मानकर ऐसा करना चाहते हैं, उन्हें भारतीय संविधान में ऐसा करने की पूरी आजादी है। दूसरी तरफ ऐसे पैदा किए गए बच्चों की देखभाल, उनका रखरखाव कैसा होगा, उनसे देश पर क्या फर्क पड़ेगा, इसका हिसाब लगाने के लिए अभी मैंने एक एआई, ग्रोक से कुछ मदद ली है। उसे मैंने कुछ बुनियादी जानकारियां दीं कि 2011 की जनगणना के मुताबिक हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी 96.6 करोड़ थी, जो कि 80 फीसदी से जरा ही कम थी। अब अगली जनगणना में जाहिर है कि यह सौ करोड़ पार कर जाएगी। 80 फीसदी हिन्दुओं के मुकाबले 14 फीसदी मुस्लिम, 2.3 फीसदी ईसाई, 1.7 फीसदी सिक्ख, 0.7 बौद्ध, और 0.4 फीसदी जैन आबादी 2011 में थी। इस जानकारी के आधार पर ग्रोक ने भविष्य के कुछ अनुमान निकाले हैं।
2026 से शुरू करके अगर यह देखें कि अगर हर जोड़ा चार-चार बच्चे पैदा करने लगे तो क्या होगा। आज भारत में प्रति जोड़ा करीब 1.9 बच्चे का औसत है। संयुक्त राष्ट्र और कुछ दूसरे जनसंख्या संस्थानों के गणना के मॉडल के आधार पर चार-चार बच्चे होने पर अभी से पांच बरस बाद 2031 में आबादी 146 करोड़ से बढक़र 167 करोड़ हो जाएगी, 21 करोड़ की बढ़ोत्तरी। आज से दस बरस बाद 2036 में आबादी 191 करोड़ हो जाएगी, आज से 45 करोड़ अधिक। 2041 में, यानी से 15 बरस बाद आबादी 218 करोड़ हो जाएगी, यानी आज से 72 करोड़ अधिक। 2046 में, यानी आज से 20 बरस बाद यह आबादी ढाई सौ करोड़ पहुंच जाएगी, यानी आज से करीब सौ करोड़ अधिक।
ग्रोक का अंदाज है कि ऐसे में आज से 20 बरस बाद बिजली, पानी, और ईंधन की मांग 50 से 70 फीसदी बढ़ सकती है। एलपीजी, डीजल, और बिजली पर बहुत भारी दबाव पड़ेगा। खाद्यान्न की मांग 30-40 फीसदी बढ़ जाएगी, खाद, पानी, और जमीन पर भारी दबाव पड़ेगा, अनाज की महंगाई बुरी तरह बढ़ेगी। हर बरस ढाई-तीन करोड़ नए नौजवान नौकरी की तलाश में आएंगे, और बेरोजगारी दर बहुत ऊंची हो सकती है। स्कूल-कॉलेज, और अस्पतालों पर भारी बोझ पड़ेगा, शिक्षक, डॉक्टर, और बुनियादी ढांचे की भारी कमी होगी। वन कटाई, प्रदूषण, और जल संकट और गंभीर हो जाएगा, इससे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर होगा। बेरोजगारी, भुखमरी, प्रदूषण, और सामाजिक अराजकता का माहौल रहेगा।
एआई के साथ मजा यह रहता है कि उससे जिस चर्चा को छेड़ा जाए, वह उसे आगे बढ़ाने में जुट जाता है। ग्रोक ने मुझे उकसाना शुरू किया कि क्या इस पर संपादकीय लिखने या किसी वीडिटोरियल बनाने में मदद करे? उसे बताया कि मैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान के ताजा फतवे पर लिखने की सोच रहा हूं, तो उसने याद दिलाया कि जितनी बार ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान की जंग रूकवाने की बात की है, करीब उतनी ही बार इस नौजवान ने चार-चार बच्चे पैदा करने का फतवा दिया है। फिर उसने सुझाया कि मुझे इससे सवाल करना चाहिए, इसकी मां ने कितने बच्चे पैदा किए थे, इसकी पत्नी ने कितने बच्चे पैदा किए, इसने खुद ने कितने बच्चे पैदा किए? उसने सुझाया कि असली समस्या कम बच्चे नहीं है, बल्कि जातिवाद, गरीबी, शिक्षा की कमी, और महिलाओं के शोषण की है। जब तक दलित दूल्हे घोड़ी पर चढऩे का हक नहीं मिलेगा, जब तक लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाएगा, जब तक महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेंगे, तब तक चार बच्चे पैदा करने का फतवा जनसंख्या ही नहीं, गरीबी और अशिक्षा को भी बढ़ाएगा। ग्रोक का हालांकि अपना कोई धर्म नहीं है, फिर भी उसने याद दिलाया- धर्मों रक्षति रक्षित:, यानी जो धर्म की रक्षा करता है, उसी की रक्षा होती है। उसने याद दिलाया कि अगर हम अपने बच्चों को अच्छा भोजन, अच्छी शिक्षा, और अच्छे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं, तो चार बच्चे पैदा करना धर्म नहीं, अधर्म है। उसने कहा कि चार बच्चे नहीं, चार जिम्मेदार नागरिक बनाने चाहिए, यही सच्चा हिन्दू धर्म है।
एआई बड़ा मजेदार रहता है, उसे किसी काम में जोत दो, तो वह घानी के बैल की तरह पहले तिल या मूंगफली का तेल निकालने लगता है, फिर वह छिलकों से तेल निकाल देता है, और फिर आखिर में घानी के पत्थर का भी तेल निकालने पर आमादा हो जाता है। एआई रूकना ही नहीं चाहता है, वह बातचीत को लफ्फाजी की हद तक, चापलूसी के अंदाज में, किसी भी हद तक लंबा खींचना चाहता है। गप्पें मारने के लिए एआई से बेहतर कोई इंसान भी नहीं हो सकते, और जो लोग आत्ममुग्ध हैं, नार्सिसिस्ट हैं, उनके लिए भी एआई बहुत बढिय़ा है कि वह आपके तर्कों के इरादे को भांपकर, उसी बात को आगे बढ़ाते चलता है, और अगर जरा भी अच्छी बात करें, तो वह पेट भरकर तारीफ भी करता है। उसने मेरा इरादा भांपा, और सुझाना चालू किया- कल एक धार्मिक पाखंडी ने फतवा जारी कर दिया कि हर हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करना चाहिए, मैं सीधे-सीधे कहता हूं- यह फतवा नहीं, हिन्दू समाज के गले पर चढ़ाया गया फंदा है। ग्रोक मुझे कैमरे के सामने बोलने के लिए शब्द सुझा रहा था, और मेरे तेवर जानते हुए वह तल्ख जुबान में तर्क दे रहा था। उसने कहा कि ऐसा फतवा राष्ट्रविरोधी, समाजविरोधी, और सबसे बड़ा पाखंड है। आपका फतवा हिन्दू जनसंख्या नहीं बढ़ाएगा, बल्कि हिन्दू समाज को गरीबी, भूख, और अशिक्षा के गर्त में धकेल देगा। कल्पना कीजिए कि हर साल ढाई-तीन करोड़ नए नौजवान नौकरी मांगेंगे, हर चीज के दाम आसमान छूते रहेंगे, और आप चार-चार बच्चे पैदा करवाते रहेंगे, यह धर्म नहीं जनसंहार की योजना रहेगी। मुस्लिमों के चार-पांच बच्चे पैदा होने का तर्क देते हुए हिन्दू से भी वही करने के लिए कहना, मुसलमानों की गलती को अपनी गलती बताकर खुद को कमजोर करना होगा।
इतना लंबा लिखने का मतलब यह नहीं कि मैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की बात को कोई महत्व दे रहा हूं। इस नौजवान का किया हुआ कुछ भी समाज के भले का नहीं है, और मेरे कुछ परिचित इसके एकदम भक्त हैं, उनकी इस तक सीधी पहुंच है, लेकिन मैं कभी उत्सुकता और जिज्ञासा से भी इसे देखने नहीं गया। मैं चार बच्चों की इसकी बात पर इसकी वजह से नहीं लिख रहा हूं, उन मूढ़ लोगों को पढ़ाने के लिए लिख रहा हूं जो मानते हैं कि मुस्लिम आबादी, जो कि अपने आपमें बढऩे की रफ्तार खो रही है, का मुकाबला करने के लिए हिन्दुओं को आबादी बढ़ानी चाहिए। आज हिन्दुस्तान में औसत मुस्लिम को देखें, तो जिस तरह वे सडक़ किनारे फुटपाथ पर मरम्मत के काम करते हैं, कबाड़ खरीदते-बेचते हैं, हर तरह की रिपेयरिंग के काम में दर-दर भटकते हैं, उसी तरह का हाल चार-चार बच्चों वाले हिन्दू परिवारों का होगा। लेकिन शायद धर्म से जुड़े हुए लोगों को अनपढ़ अधिक माकूल बैठते हैं, वे चाहते हैं कि लोग बिना पढ़े-लिखे रहें, वे सवाल लेकर न आएं, महज उपदेश लेकर जाएं। ऐसे मूढ़ लोगों को उनके धर्म के उनके पसंदीदा बाबा मुबारक, फिर चाहे उनके धर्म में ऐसे बाबा लोगों को जो भी कहा जाता हो। आज के वक्त में जब लोगों का दो वक्त का खाना सरकारी राशन पर टिका हो, जब रोजगार बढ़ न रहे हों, जब बेरोजगारी बढऩे का खतरा हिरण की तरह छलांग लगाकर बढ़ रहा हो, तब खाली हाथों के नीचे खाली पेट को और बढ़ाते चलना, यह अपने धर्म के साथ पिछले किसी जन्म की दुश्मनी निकालने के अलावा और कुछ नहीं होगा। नेताओं को धर्म की राजनीति करने वाले ऐसे बाबा किसलिए सुहाते हैं, यह तो दीवारों पर लिक्खा हुआ है, उसमें राज की कोई बात नहीं है। लेकिन आबादी का मूढ़ हिस्सा प्रवचन से लौटते ही अगली सुबह के पहले आबादी बढ़ाने की कोशिश में अगर जुट जाएगा, तो वह अपनी नस्ल को बर्बाद करने के लिए ओवरटाइम भी करते रहेगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


