आजकल
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अभी दो दिन पहले सांसद राहुल गांधी से जुड़े एक मामले में जिस तरह का यू-टर्न लिया है, वह हैरान और हक्का-बक्का करता है। राहुल गांधी के खिलाफ कर्नाटक के एक भाजपा कार्यकर्ता ने यह याचिका दायर की थी कि राहुल ब्रिटिश नागरिक हैं। यह मामला रायबरेली के विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट में चला, और याचिकाकर्ता के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने इसे वहां से लखनऊ ट्रांसफर कर दिया था। फिर लखनऊ में एमपी-एमएलए कोर्ट ने अभी जनवरी में इसे खारिज कर दिया, तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने दिन में अदालती सुनवाई में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, और इस मामले को सीबीआई को देने को भी कहा। इसकी खबरें पल भर चारों ओर फैल गईं, और देश की कानूनी समाचारों की सबसे बड़ी वेबसाइटों पर यह पूरे खुलासे और प्रमुखता से छा गई खबर रही। लेकिन अगली सुबह लोग हक्का-बक्का रह गए जब हाईकोर्ट ने वेबसाइट पर अपना आदेश बदल दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि पुराने मामलों के अध्ययन से यह समझ आया कि ऐसे मामलों में (राहुल गांधी को) नोटिस भेजना जरूरी था। जबकि पहले बिना किसी नोटिस के जज ने खुली अदालत की कार्रवाई के दौरान एफआईआर का जुबानी आदेश दिया था, और सीबीआई जांच का भी।
17 अप्रैल को जब यह खबर छाई, उस वक्त लखनऊ से दूर दिल्ली में संसद में यह बहस चल रही थी कि महिला आरक्षण के 2023 के बने कानून में संशोधन करके परिसीमन को जोड़ा जाए या नहीं। राहुल गांधी विपक्ष की तरफ से इस मामले में सबसे बड़े नेता थे। कुछ घंटों के भीतर शाम के पहले यह साबित हो गया कि विपक्षी पार्टियां ऐसे किसी परिसीमन वाले संशोधन के खिलाफ थीं, और सबने यह भी साफ कर दिया था कि वे सब 2023 के महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन कर चुकी हैं, आज भी उसके साथ हैं, और आज की संसद में महिला आरक्षण लागू कर दिया जाए, तो भी वे सब उसके साथ हैं। विपक्ष ने बार-बार यह साफ किया था कि वे सिर्फ परिसीमन और सीटें बढ़ाने के साथ महिला आरक्षण को जोडऩे की जटिलता के खिलाफ हैं। यह बात संसद की कार्रवाई के पहले से चल रही थी, और यही रूख मतदान में भी सामने आया। राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, और मतदान के बाद आई खबरों से यह भी पता लगता है कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से बात करके, बाकी विपक्षी दलों से बात करके सबका समर्थन जुटाया, और सरकार के लाए संशोधन अधिनियम को शिकस्त दी। खबरें बताती हैं कि किस तरह राहुल गांधी ने अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से उस दिन भी फोन पर संपर्क किया, और उसके बाद विपक्ष की एकजुटता बढ़ी।
यह कैसा गजब का संयोग था कि जिस वक्त संसद में विपक्ष पिछले 11 बरस की अपनी सबसे कड़ी लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त उसके नेता के खिलाफ लखनऊ हाईकोर्ट के एक जज अदालत में जुबानी टिप्पणी करके दो देशों की नागरिकता के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का हुक्म देते हैं, मामले की जांच सीबीआई को देने को कहते हैं, और उसी रात किसी समय टाईप हुए आदेश में वे इसका ठीक उल्टा आदेश करते हैं। जब संसद एक नाजुक दौर से गुजर रही थी, ठीक उसी के बीच हाईकोर्ट के जज के कहे हुए से उपजी खबरों को तो पल भर में फैलना ही था, और वही हुआ भी। जब हमने भी सबसे विश्वसनीय कानूनी वेबसाइटों पर इस खबर को देखा, और उसके बाद इसे दूसरे, तीसरे, और चौथे समाचार स्रोत से कसौटी पर कसना चाहा, तो पता लगा कि किसी भी एआई ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश की खबर निकालकर नहीं दी। हर एआई ने इस हाईकोर्ट बेंच के पहले की एमपी-एमएलए कोर्ट से याचिका खारिज होने की ही खबर निकालकर दी, और अलग-अलग एक से अधिक एआई को कानूनी वेबसाइटों की खबर देने पर भी उन्होंने इसकी पुष्टि करने से इंकार कर दिया। बात कुछ अटपटी लग रही थी, लेकिन फिर समझ आया कि जज के खुली अदालत में जुबानी कहे हुए को एआई अदालती आदेश नहीं मान रही थी, जो कि अगली सुबह वेबसाइट पर डाला गया, और जो कि जज के जुबानी कहे के ठीक उल्टे भी था। लेकिन तब तक उधर दूर दिल्ली में संसद के भीतर जितनी बहस होनी थी, वह हो चुकी थी, मतदान भी हो चुका था, और सरकार का लाया हुआ संशोधन विधेयक हार चुका था। अगली सुबह हाईकोर्ट बेंच ने एफआईआर का अपना मौखिक आदेश बदलकर राहुल को नोटिस देना तय किया।
यह मामला बड़ा ही अटपटा लगा, इसलिए हमने सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे ऐसे कुछ मामलों को लेकर जानकारी ढूंढने की कोशिश की। न्यायशास्त्र में स्थापित एक नियम का हवाला भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अलावा दुनिया की कई बड़ी अदालतों ने दिया है, जिनमें कहा गया है- अदालत अपने लिखित आदेशों से बोलती है, मौखिक टिप्पणियों से नहीं। तकनीकी रूप से तो जज खुली अदालत में दिए गए अपने आदेशों को लिखते हुए बदल भी सकते हैं, लेकिन एक बार सार्वजनिक रूप से कुछ कहने के बाद उसे पूरी तरह पलट देना न्यायिक शिष्टाचार के खिलाफ माना जाता है। मौखिक टिप्पणियों, और लिखित आदेशों के बीच टकराव की यह नौबत अदालत की गरिमा और साख दोनों को घटाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार जजों को जुबानी जमा-खर्च से बचने की सलाह दी है। ऐसे दो बड़े मामलों, एक विनोद दुआ का, और एक जस्टिस आर.ए.मेहता का, इन दोनों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों को सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए जो अंतिम आदेश का न हों, क्योंकि इससे जनता में भ्रम पैदा होता है, किसी की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जज के यू-टर्न को न्यायिक अनुशासन के खिलाफ माना है।
कुछ दूसरे देशों के मामले देखें, तो अमरीका में भी इसी फलसफे को माना जाता है कि जज नहीं बोलते, उनके लिखित विचार बोलते हैं। अमरीकी अदालतों में जजों को चेतावनी दी जाती है कि सुनवाई के दौरान उनके कटाक्ष, या उनकी की हुई प्रशंसा पक्षकारों के बीच पक्षपात का भ्रम पैदा कर सकते हैं। ब्रिटेन में सुप्रीम कोर्ट के जजों से उम्मीद की जाती है कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। उन्हें कहा जाता है कि वे एक अम्पायर की तरह रहें, न कि एक खिलाड़ी की तरह। अगर कोई जज सुनवाई के दौरान बहुत ज्यादा बोलते हैं, जिन्हें कि दखलंदाजी-जज माना जाता है, तो ऊपरी अदालतें उनके फैसलों को यह कहकर पलट सकती हैं कि मामले की सुनवाई में निष्पक्षता के अधिकार का सम्मान नहीं हुआ। दुनिया भर के बहुत से देशों में बड़ी अदालतों के जजों की टिप्पणियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि एक जुबानी टिप्पणी अखबारों की सुर्खियां बन जाती है, जबकि अंतिम फैसला हफ्तों बाद आता है, इस बीच व्यक्ति की छवि को जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई असंभव रहती है। हाल ही के कुछ फैसलों में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा है कि जजों की मौखिक टिप्पणियां ‘एजेंडा-संचालित हमलों’ और ‘मीडिया ट्रायल’ को खाद-पानी देती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जजों को यह चेतावनी भी दी है कि वे स्वयं को सुर्खियों में रखने के लिए ऐसी टिप्पणियां न करें जो अंतिम लिखित आदेश का हिस्सा न हो। कहा- न्याय को केवल लोकप्रिय दिखने के लिए अपनी मौखिक गरिमा नहीं खोनी चाहिए।
दुनिया भर में अदालत के ऐसे यू-टर्न की व्याख्या बड़ी दिलचस्प होती है। कई जगहों पर इसे मीडिया में चल रहे ट्रायल के बीच एक जनधारणा-प्रबंधन माना जाता है। सुर्खियों का ऐसा इंतजाम कई जगहों पर सोच-समझकर किया जाता है, और एक जुबानी टिप्पणी को लेकर मीडिया दौड़ पड़ता है। इसे हेडलाईन-मैनेजमेंट भी कहते हैं। हफ्तों बाद आने वाले लिखित आदेश तक तो पहले दिन की नाजायज सुर्खियों पर टीवी बहसों की सिल्वर जुबली भी हो चुकी रहती है, और इसके बाद मीडिया सुर्खियों के उल्टे आए फैसले को छूना भी नहीं चाहता, क्योंकि वह पहले की गढ़ी हुई सुर्खियों की गगनचुंबी इमारत खड़ी कर चुका रहता है। यह पूरा सिलसिला बड़ा ही अटपटा रहा। खैर, जिस दिन संसद में बहस चल रही थी, उस दिन राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की सुर्खियां छा गई थीं, उधर संसद में मतदान का फैसला आया, और अगली सुबह हाईकोर्ट का बदला हुआ रूख सामने आया।


