आजकल
दुनिया में इस बात पर भारी उत्सुकता रहती है कि क्या किसी और ग्रह पर भी कोई जिंदगी है? एक सबसे विकसित देश अमरीका अंतरिक्ष अभियानों में सबसे आगे भी रहता है, और वहां पर लोगों के बीच ऐसी साजिशों की कहानियां चलती ही रहती हैं कि कैसे बाहर से कोई उडऩतस्तरी आई, कैसे उसमें दूसरे ग्रहों के लोग उतरे। बहुत सारी खबरें तो ऐसी भी बनती हैं कि कोई दूसरे ग्रह का प्राणी अमरीकी सरकारी एजेंसियों के हाथ लग गया है, और उसके शरीर पर तरह-तरह के प्रयोग चल रहे हैं। यूएफओ और एलियन, अमरीकी जनता के बीच असली रहस्य की तरह बड़ी प्रचलित धारणाएंं हैं, और एआई से बनने वाले वीडियो-फोटो के दशकों पहले से अमरीका से यूएफओ और एलियन की तस्वीरें गढ़ी जाकर दुनिया भर में फैलती आई हैं। लेकिन अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों तक फैली हुई किसी संभावित जिंदगी से परे एक और जिंदगी इस धरती की जिंदगी से परे सामने आई है।
धरती के लोग अपनी असल जिंदगी के साथ-साथ अब एक आभासी जीवन भी जीते हैं। वे आज अपने घर-परिवार, और अपने असल दायरे के दोस्तों, सहकर्मियों, सहपाठियों से परे आभासी दुनिया के लोगों के साथ अधिक जी रहे हैं। फेसबुक या इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को हर दिन घंटों व्यस्त रखते हैं, और अलग-अलग कई पीढिय़ों के लोग आज इस दिमागी हालत में रहते हैं कि उनकी असल जिंदगी वही ऑनलाइन वाली है, और जो ऑफलाइन, या जमीनी और असली जिंदगी है, उससे लोगों का लेना-देना घटते चल रहा है। यह सिलसिला एक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है।
अब लोगों को खरीददारी करने बाजार नहीं जाना पड़ता, किसी असल इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, सब कुछ ऑनलाइन हो जाता है। लोगों को खाने-पीने के लिए किसी इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, मोबाइल ऐप से खाना ऑर्डर हो जाता है, और अगर पहले से भुगतान किया हुआ रहे तो डिलीवरी करने वाले लोग दरवाजे पर छोडक़र चले जाते हैं। बिना किसी मानवीय संपर्क के ट्रेन या प्लेन की टिकटें बुक हो जाती हैं, कार किराए पर मिल जाती है, और तो और अगर भाड़े पर कुछ देर के लिए संगी चाहिए, तो वैसी एस्कॉर्ट सर्विस भी ऑनलाइन हासिल है। किसी भी तरह के भुगतान के लिए, किराना या फल-सब्जी खरीदने के लिए किसी इंसान से बातचीत जरूरी नहीं रह गई है।
इससे परे लोग अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में सबसे करीबी और सबसे भरोसेमंद दोस्त ऑनलाइन भी, और बहुत से मामलों में शायद, ऑनलाइन ही बनाने लगे हैं, उन्हीं से राज बांटने लगे हैं, उन्हीं के सुख-दुख मायने रखते हैं, और लोग उसे काफी भी समझने लगे हैं। दरअसल आभासी दुनिया के ऑनलाइन रिश्तों में कोई असल नकारात्मक बात नहीं रहती। सब कुछ नकली रहता है, सांसों की बदबू, बदन से उठने वाली आवाजें, कुछ भी ऑनलाइन रिश्तों को परेशान नहीं करते। लोगों को किसी के बारे में कुछ भी सच पता लग जाए, यह जरूरी नहीं रहता। लोग अंधाधुंध झूठ बोल सकते हैं, और बरसों तक एक मुखौटा ओढक़र रह सकते हैं। ऐसा सहूलियत का झूठ असल जिंदगी में मुमकिन नहीं रहता। ऑनलाइन रिश्ते कुछ-कुछ खरीदे हुए देह-सुख सरीखे रहते हैं जिनके साथ असल लंबी जिंदगी की जिम्मेदारियां जुड़ी हुई नहीं रहतीं। ऐसे में ऑनलाइन सहूलियत को छोडक़र असल जिंदगी की खुरदुरी हकीकत बहुत से लोगों को नहीं सुहाती, और वे ऑनलाइन ही खुश रहने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शोधकर्ता लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि आज नौजवानों की जिंदगी में मेटावर्स (फेसबुक, वॉट्सऐप, और इंस्टाग्राम की कंपनी मेटा में उलझे हुए लोगों की दुनिया) का हिस्सा उनकी असल जिंदगी से अधिक बड़ा होते जा रहा है। वे रोज की अपनी जिंदगी में जितना वक्त दूसरे इंसानों के साथ जीते हैं, असल जिंदगी की धरती पर काम करते हैं, उससे कहीं अधिक वक्त वे मेटावर्स पर गुजारते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लाखों-बरसों में इंसान के मिजाज में धीरे-धीरे करके जो सामाजिकता आई थी, वह अब एक पीढ़ी के भीतर ही तेजी से कमजोर पड़ रही है। असली रिश्ते, भावनाएं, और सामाजिक संपर्क कमजोर होते चल रहे हैं। अमरीकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन, और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध नतीजों में यह पाया गया है कि मेटावर्स का लंबे समय तक इस्तेमाल लोगों को अकेलेपन के पैमाने पर बहुत अधिक अकेला कर देता है। जो लोग रोज तीन घंटे से ज्यादा मेटावर्स में जीते हैं, उनमें अकेलापन, उदासी, और सामाजिक अलगाव की भावना अधिक बढ़ जाती है। अब लोग मेटावर्स पर भी अपने खुद के चेहरे के बजाय अपनी पसंद के बनाए गए अवतार की शकल में सामने आते हैं, और वे धीरे-धीरे अपनी खुद की हकीकत से भी कट जाते हैं। भारत में 2025 में बेंगलुरू के देश के सबसे बड़े मानसिक केन्द्र, निम्हंस और एम्स-दिल्ली के एक संयुक्त अध्ययन में यह पता लगा कि 18 से 25 साल उम्र के लोगों में से 64 फीसदी लोग रोज दो-चार घंटे मेटावर्स पर गुजारते हैं, इनमें से 47 फीसदी ने यह माना है कि उनकी अपने असली दोस्तों से बात करने की इच्छा अब कम हो गई है। इस अध्ययन के 39 फीसदी नौजवानों में सामाजिक बेचैनी बढ़ी है, वे वास्तविक दुनिया में बात करने से डरते हैं, और अपने गढ़े हुए अवतार के पीछे से बात करने में सुरक्षित महसूस करते हैं। इस शोध के नतीजे बता रहे हैं कि आभासी दुनिया असल जिंदगी का पूरक नहीं बन रही है, वह असल जिंदगी को बेदखल ही कर दे रही है।
2025-26 में आईआईटी दिल्ली, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज मुम्बई के एक साझा अध्ययन, डिजिटल डी-टॉक्स में यह बात सामने आई कि जो नौजवान सात दिन तक मेटावर्स से दूर रहे, उनकी नींद 31 फीसदी बेहतर हुई, फिक्र एक चौथाई घट गई, और परिवार के साथ वक्त गुजारने की उनकी इच्छा बढ़ी। ऐसे कुछ अध्ययन बतलाते हैं कि लोग अपने गढ़े हुए चेहरे-मोहरे, और तस्वीरों के पीछे से आभासी जीवन जीते हुए अपने असली तन-मन की फिक्र करना भूल जाते हैं, और घंटों ऑनलाइन बैठे हुए वे अपने तन और मन दोनों को बर्बाद कर लेते हैं।
ये मुद्दा असीमित है, इस पर एक पूरी किताब भी कम पड़ सकती है, लेकिन हम आज लोगों को नकली-आभासी जिंदगी के खतरे, और असली जिंदगी की उपेक्षित संभावनाओं के बारे में आगाह भर करना चाहते हैं। लोगों को आभासी जीवन को ही सब कुछ मानकर असली जिंदगी, असली इंसानों, और असली रिश्तों की उपेक्षा के खतरे में नहीं पडऩा चाहिए। असल जिंदगी अधिक चुनौतियों भरी जरूरी रहती है, लेकिन चुनौतियों के साथ ही संभावनाएं इंसानों को परिपक्व और बेहतर बना सकती हैं। मुखौटों के पीछे छुपी हुई ऑनलाइन संभावनाएं बिना चुनौतियों के रहती हैं, लोग अपने गढ़े हुए झूठ को किसी परीकथा की तरह आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह झूठ उन्हें किसी किनारे नहीं ले जा सकता।
अमरीका सहित योरप के कई बड़े देशों में मेटा प्लेटफॉम्र्स पर कई तरह के मुकदमे चल रहे हैं। इनमें बच्चों की मानसिक सुरक्षा की उपेक्षा करना एक आरोप है, लेकिन इसके अलावा भी लोगों को अपने प्लेटफॉर्म की लत में उलझा देना, यह दूसरा बड़ा आरोप है। मेटा के प्लेटफॉम्र्स जिस तरह नशा बन जाते हैं, उसे लेकर अमरीका में ही चल रहे एक मुकदमे की तुलना तम्बाकू कंपनियों की लत लगाने के एक पुराने मामले से की जा रही है। एक मामला यह भी चल रहा है कि फेसबुक ने किस तरह इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप खरीदकर सोशल मीडिया में अपना एक एकाधिकार बना लिया है, और जो लोग इस ककून में फंस जाते हैं, वे इससे बाहर ही नहीं निकल पाते। एक मुकदमा यह भी चल रहा है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम बच्चों को फंसाने वाले मुजरिमों की चारागाह बन गए हैं। जो जिम्मेदार देश हैं, वहां पर मेटा जैसी कंपनियों पर अरबों डॉलर के जुर्माने लग चुके हैं, लेकिन अधिकतर देश अपने बच्चों, नौजवान पीढ़ी, और बाकी लोगों की मानसिक सेहत, उनकी निजता को लेकर अधिक फिक्रमंद या जिम्मेदार नहीं हैं, इसलिए वहां पर जनता को आभासी दुनिया के इस बेताज तानाशाह, मार्क जुकरबर्ग से बचाने वाले कोई नहीं हैं। समाज के भीतर के लोगों को डिजिटल और ऑनलाइन तानाशाही के इस नए साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा, आवाज उठानी पड़ेगी, वरना लोकतांत्रिक सरकारें भी अपनी राजनीतिक साजिशों में मेटा जैसी कंपनियों का साथ पाने के लिए उनके जहरीले असर को छूट देती रहेंगी।


