आजकल

अमरीका में बने रहने के लिए ख़ुद पर डकैती करवाने वाले पटेलों की कहानी
सुनील कुमार ने लिखा है
15-Mar-2026 1:08 PM
अमरीका में बने रहने के लिए ख़ुद पर डकैती करवाने वाले पटेलों की कहानी

अमरीका के कुछ राज्यों में अभी हिंदुस्तानियों को गिरफ्तार किया गया जिन पर वहां बने रहने के लिए अपने खुद के ऊपर फर्जी डकैती करवाने का जुर्म दर्ज हुआ है। अमरीकी कानून के मुताबिक गंभीर अपराध के शिकार लोगों को पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों की मदद करने के एवज में सरकार वहां रहने की कुछ रियायत देती है। कानून की इसी नरमी का फायदा उठाकर जायज वीजा पर वहां पहुंचे हुए हिंदुस्तानियों ने अपने ही छोटे-छोटे कारोबार पर नकली डकैती डलवाई, और फिर उसकी सीसीटीवी रिकॉर्डिंग के साथ वहां आगे बने रहने की कोशिश की। अभी ऐसे 11 हिंदुस्तानी पकड़ाए हैं, जिनमें से हर कोई गुजरात के पटेल हैं, पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। इन सभी पर वीजा फ्रॉड साजिश की तोहमत लगी है, और गिरफ्तारी के बाद ये अदालत से जमानत पर रिहा हुए हैं। इनमें से एक आरोपी महिला को पहले ही भारत भेजा जा चुका है।

घटना की जानकारी बताती है कि दुकान मालिक खुद, या अपने कर्मचारियों को नकली डकैत बनाकर अपनी दुकान में हथियार जैसा दिखता कुछ लेकर लूट-डकैती के लिए आते दिखाते थे, और वहां पर हर दुकान में अनिवार्य रूप से लगने वाले सीसीटीवी कैमरे पर यह ‘जुर्म’ दर्ज होता था। जब कई राज्यों में बिल्कुल एक ही किस्म से ऐसे मामले सामने आए, और इनमें से हर किसी में पुलिस को खबर देने में जानबूझकर देर की गई, और सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग में कुछ अटपटी बातें जांच अधिकारियों को दिखीं, तो उन्होंने इस साजिश का भांडाफोड़ किया। यह कानून आमतौर पर घरेलू हिंसा, मानव तस्करी, या गंभीर जुर्म के शिकार प्रवासियों की मदद के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसके ऐसे धड़ल्ले से बेजा इस्तेमाल के बाद हो सकता है कि इस रियायत के जायज हकदारों को नुकसान हो। इस घटना पर अमरीका के कई भारतीय समुदायों ने कहा है कि यह मामला पूरे समुदाय के लिए एक आम बात नहीं है।

लोगों को 2022 की एक घटना याद होगी कि गुजरात के एक पटेल परिवार के पति-पत्नी, बेटा-बेटी कनाडा के रास्ते अमरीका में गैरकानूनी तरीके से घुसते हुए सरहद पर ही ठंड से जमकर मर गए थे। उस वक्त वहां पर शून्य से 38 डिग्री नीचे तापमान था, और वैसे में यह परिवार गुजरात से कनाडा के टोरंटो होते हुए अमरीका में गैरकानूनी तरीके से घुस रहा था। ये चारों भी एक बड़े ऐसे जत्थे में शामिल थे, लेकिन ऐसी बर्फीली हवाओं में बर्फ पर घंटों पैदल चलते हुए वे ठंड में ही जमकर मर गए। जांच एजेंसियों ने अदालत को कहा कि इन लोगों को यह मालूम था कि ठंड से उनकी मौत हो सकती है, फिर भी उन्होंने एक बेहतर जिंदगी पाने के लिए यह खतरा उठाया था। कुछ पेशेवर मानव तस्करों ने उन्हें पहुंचाने का ठेका लिया था।

अब गुजरात से अमरीका गए हुए पटेल समुदाय के लोगों को देखें तो वे वहां पर एक बार जम जाने के बाद कामयाब कारोबारी हो जाते हैं। कारोबार चाहे छोटा हो, या बड़ा, वे मेहनत से काम करते हैं, और उनकी अगली पीढ़ी तो किसी भी अमरीकी नागरिक जितनी ही संभावनाओं को लेकर आगे बढ़ती है। अमरीका में किसी भी शहर या हाईवे के किनारे बने हुए मोटेल (छोटी-मोटी होटल) में ठहरें, तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि उसका मालिक कोई पटेल हो। गुजरात से वहां गए हुए पाटीदार समुदाय के लोग ऐसे छोटे-छोटे होटल चलाने में खूब मेहनत करते हैं, और उसके बाद उनके परिवार के दूसरे लोग, या रिश्तेदार भी वहां काम करने आ जाते हैं, और वहां के सारे कर्मचारी इसी समुदाय के हो जाते हैं। कुछ बरस पहले मोटेल को पोटेल भी कहा जाने लगा क्योंकि मालिक के पटेल होने की ही अधिक संभावना रहती है।

अमरीका में गुजरातियों का इतिहास आमतौर पर अपराध से जुड़ा हुआ नहीं है, वह कारोबार से जुड़ा हुआ है। 1960-70 के दशक में अमरीका के बहुत से मोटेल आर्थिक संकट में थे, पुराने मालिक रिटायर हो रहे थे, या इतनी मेहनत का काम नहीं करना चाहते थे। ऐसे में भारत से गए हुए लोग कारोबार और अपने रहने की मिली-जुली जगह, ऐसे मोटेल पहले किराए पर लेकर चलाने लगे, और फिर धीरे-धीरे खरीदने लगे। यह 1980 के दशक तक एक खासा कामयाब कारोबार पटेल समुदाय के लिए बन गया था। 1990 के दशक में तो भारतीय मूल के मोटेल और होटेल मालिकों ने एशियन अमेरिकन होटल ओनर्स एसोसिएशन भी बना लिया जिसके मातहत हजारों होटल-मोटेल आते हैं।

यह काम पूरे परिवार के करने वाला एक घरेलू या कुटीर उद्योग जैसा हो गया, घर की महिलाएं भी वहीं पर काम संभालने लगीं, और गुजरात से बुलाए गए कुछ नए और गरीब रिश्तेदार बाकी काम करने लगे।

गुजराती कारोबारियों की ऐसी मौजूदगी ही सबसे बड़ी वजह थी कि डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए जब दुबारा चुनाव लड़ा, तो वे प्रचार करने के लिए गुजरात तक आए थे, और मोदी के साथ मिलकर नमस्ते ट्रंप नाम के कार्यक्रम से अमरीका में बसे हुए गुजरातियों तक संदेश भेजा था।

लेकिन हिंदुस्तान में गुजरात बाकी देश के मुकाबले एक अधिक संपन्न राज्य माना जाता है। यहां पर बंदरगाह हैं, जो कि खाड़ी के देशों के करीब पड़ते हैं, इसलिए यहां पर पेट्रोकेमिकल के बड़े-बड़े उद्योग हैं, और उनसे जुड़े हुए फर्टिलाइजर कारखाने जैसी दूसरी फैक्ट्रियां भी हैं। फिर गुजरात कारोबारियों का प्रदेश माना जाता है जहां का कपड़ा उद्योग देश में सबसे अधिक कामयाब है, और देश की शायद सबसे अधिक कपड़ा फैक्ट्रियां गुजरात में ही लगी हुई हैं। गुजरात के सूरत का देश के हीरा कटाई उद्योग का मानो एकाधिकार ही है, और वहां से हर दिन शायद हजारों करोड़ के तराशे गए हीरों का व्यापार होता है। गुजराती लोग मिजाज से भी कारोबारी हैं, और देश में शायद ही कोई ऐसे प्रदेश हों जहां गुजराती कारोबारी न हों। गुजरात राजनीतिक रूप से एक असाधारण स्थिरता वाला प्रदेश भी है, और यहां करीब 30 बरस से भाजपा की ही सरकार चली आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से ही की थी, और अब भी बाहर से आने वाले विदेशी राष्ट्र या शासन प्रमुखों को वे किसी एक प्रदेश अगर लेकर जाते हैं, तो वह गुजरात ही है। ऐसे में गुजरात के लोग अगर जायज और नाजायज तरीके से अमरीका जाकर बसने के लिए जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं, तो उसे हम गुजरात की किसी बदहाली, या बेरोजगारी का संकेत नहीं मानते, बल्कि यह मानते हैं कि वे कारोबारी रोमांच उठाने वाले लोग हैं जो कि अच्छी जिंदगी से बेहतर जिंदगी की तरफ बढऩे के लिए अमरीका पहुंचते हैं।

छत्तीसगढ़ के चिरमिरी से अमरीका जाकर फ्लोरिडा में बसने वाले चंद्रकांत पटेल वहां के हिंदू समुदाय के भी एक बड़े सक्रिय व्यक्ति हैं, वे ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी के अमरीका के अध्यक्ष भी रहे हैं, और वहां पीसी बोर्ड बनाने वाले एक उद्योग के मालिक भी हैं। वे तो गुजरात से अमरीका नहीं गए, वे छत्तीसगढ़ से अमरीका गए, लेकिन इसके पीछे उनके पटेल होने की खूबी भी रही जो कि दूर-दूर तक जाकर कारोबार शुरू करने वाला समुदाय है।

2022 में जब एक पटेल परिवार अमरीकी सरहद पर जमकर मर गया, तो लोगों ने उसे भारतीयों के देश छोडक़र जाने की एक बेबसी से जोड़ा। छोडक़र जाने वाले हर कोई बेबसी में नहीं जाते, बहुत से लोग एक ऐसी बेहतर जिंदगी के लिए जाते हैं जो कि उनके अपने देश-प्रदेश में मुमकिन नहीं है।

पटेल समुदाय के इतिहास को देखें तो गुजरात में पटेल अपने गांव के मुखिया भी रहते आए हैं, और वह जातिसूचक नाम के बजाय पदसूचक नाम भी रहता था। आज देश के दूसरे कई प्रदेशों में भी गांव के मुखिया को पटेल कहने का चलन है। अमरीका में तो पटेल इतने हो गए हैं कि जब कोई टेलीफोन डायरेक्टरी देखे, तो उसके कई-कई पन्ने पटेल लोगों से ही भरे रहते हैं। मुगल काल और ब्रिटिश काल में गुजरात के गांवों में जो व्यक्ति लगान वसूली करते थे, और सरकारी काम देखते थे उन्हें पटेल कहा जाता था, यह शब्द पट्टेदार से भी जुड़ा हुआ है, जो कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा हुआ शब्द है। 19वीं सदी के अंत में, और 20वीं सदी की शुरुआत में अमरीका के अलावा केन्या, युगांडा, और तंजानिया जैसे अफ्रीकी देशों में गुजराती व्यापारी बड़ी संख्या में पहुंचे। लोगों को अगर पुरानी घटना याद होगी, तो 1970 के दशक में ईदी अमीन ने युगांडा से एशियाई समुदाय के लोगों को निकाल बाहर किया था, और उस वक्त भारतीय मूल के हजारों लोग ब्रिटेन, कनाडा, और अमरीका चले गए।

अमरीका ने जब 1965 के बाद एशियाई देशों के लोगों के प्रवास पर लगी रोक लचीली की, तो उसका फायदा सबसे पहले उठाने वालों में गुजरात के पाटीदार समुदाय के लोग थे, जो एक से दूसरा, दूसरे से तीसरा के अंदाज में बढ़ते चले गए। आज अमरीका में मोटेल उद्योग के अलावा पेट्रोल पंप, किराना स्टोर, छोटी-मोटी दूसरी दुकानें चलाने वाले लोगों में भारत से जाने वाली पटेलों की पहली पीढ़ी तो है ही, उनकी दूसरी पीढ़ी किसी भी पैदाइशी अमरीकी की तरह आसमान पर पहुंची हुई है। उनमें से कुछ सरहद पर पकड़ाते हैं, कुछ वीसा फ्रॉड में, तो वे अपने समुदाय की आबादी का एकदम ही नगण्य हिस्सा हैं. ताजा वीजा साजिश में पकड़ाए गए पटेल समुदाय के, और सारे के सारे इसी समुदाय के लोगों को लेकर किसी तरह की सोच लोगों में बने, उसके पहले मैं इन तमाम बातों को एक सही संदर्भ में रख देना चाहता हूं।

मेरे अमरीका प्रवास के दौरान मुझे फ्लोरिडा आमंत्रित करके वहां दर्जनों प्रमुख पेशेवर लोगों के साथ एक डिनर पर मेरी बातचीत आयोजित करवाने वाले मेरे मेजबान चंद्रकांत पटेल के घर कुछ दिन खाए हुए नमक का कुछ हक तो अदा करना बनता है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


अन्य पोस्ट