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देश भर में नफरती हिंसा, और दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय नाम का स्मारक
सुनील कुमार ने लिखा है
14-Dec-2025 4:23 PM
देश भर में नफरती हिंसा, और दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय नाम का स्मारक

जम्मू के किश्तवाड़ जिले में चल रही एक हाइड्रो पॉवर परियोजना के एक बड़े अफसर ने स्थानीय भाजपा विधायक पर राजनीतिक और धार्मिक आधार पर नियुक्तियां करने का दबाव डालने का आरोप लगाया है। रतले परियोजना के संयुक्त मुख्य परिचालन अधिकारी हरपाल सिंह ने 13 दिसंबर को एक वीडियो संदेश जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि किश्तवाड़ की भाजपा विधायक शगुन परिहार इस योजना में मजदूरों और ठेकेदारों को धार्मिक आधार पर नियुक्त करने के लिए दबाव डाल रही हैं। उन्होंने वीडियो में कहा है कि एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह से बांह मरोडऩे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह परियोजना तकनीकी और सुरक्षा की दृष्टि से एक संवेदनशील प्रोजेक्ट है, और यहां पर नियुक्तियां और ठेके योग्यता के आधार पर होने चाहिए न कि राजनीतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर। अगर सही वातावरण में काम करने नहीं दिया गया तो इससे बांध की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ सकता है। शगुन परिहार पहले भी विवादों में रही हैं, और अक्टूबर में उन्होंने विधानसभा के भीतर एक भाषण में अपने निर्वाचन क्षेत्र की हिन्दू आबादी को राष्ट्रवादी लोग कहकर संबोधित किया था, जिस पर विपक्ष की कड़ी आपत्ति के बाद विधानसभा अध्यक्ष को उनकी टिप्पणी रिकॉर्ड से हटानी पड़ी थी।

अब जम्मू से थोड़ा नीचे उतरें, और यूपी आ जाएं, तो यहां पर राजधानी दिल्ली से लगे हुए नोएडा की अदालत ने यूपी सरकार से पूछा है कि क्या कत्ल के मामले को आज तक कभी सरकार ने ही वापिस लिया है? फास्ट ट्रैक अदालत के अतिरिक्त जिला जज सौरभ द्विवेदी ने यह सवाल यूपी सरकार की इस अर्जी पर किया कि गोमांस के शक में घर से निकालकर जिस अखलाक को भीड़ ने मार डाला था, उस भीड़ के सारे आरोपियों पर से सरकार सारे आरोप वापिस ले लेना चाहती है। अखलाक का मामला भारत में भीड़त्या के मामलों की शुरूआत माना जाता है। 2015 में 55 बरस के अखलाक को इस आरोप के साथ घर से निकालकर मार डाला गया था कि उसने घर पर गोमांस रखा है। बाद में प्रयोगशाला की जांच में पाया गया कि वह गोमांस नहीं था। इस मामले में डेढ़ दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें से तीन नाबालिग भी थे। बाकी सबकी जमानत हो चुकी है, और मामला अदालत में इंच-इंच घिसट रहा है। अब योगी सरकार सारे आरोपियों पर से सारे आरोप वापिस लेना चाहती है। इन आरोपियों में से जो पहले दस गिरफ्तार हुए थे, उनके नाम रूपेन्द्र, विवेक, सचिन, हरिओम, श्रीओम, विशाल, शिवम, संदीप, सौरभ, और गौरव हैं।

एक तीसरा मामला बिहार के नवादा जिले का है जहां भीड़ द्वारा पीटे गए एक मुस्लिम फेरीवाले मोहम्मद हुसैन की कल मौत हो गई। वह इस जिले का ही रहने वाला था, और 20 साल से गांव-गांव जाकर कपड़े बेचता था। उसने मरने के पहले वीडियो-कैमरे पर जो बयान दिया, वह दिल दहलाने वाला है। हमलावरों ने उसके पैंट उतारकर उसके धर्म की जांच की, उंगलियां पेंचिस से तोड़ीं, गर्म लोहे से जलाया, सीने पर चढक़र पीटा, ग्लास तोडक़र उससे कान और उंगलियां काटे, उंगलियों को ईंटों से कुचला, गर्म रॉड से जलाया, बिजली के झटके दिए, और उसके बदन के भीतर पेट्रोल भी भर दिया। बुरी तरह जख्मी हालत में उसे अस्पताल में भर्ती किया गया, और अपने परिवार का वह अकेला कमाऊ सदस्य चल बसा। जिन हत्यारों की शिनाख्त हो पाई है, उनमें सोनू कुमार, रंजन कुमार, सचिन कुमार, और श्रीकुमार अब तक गिरफ्तार हुए हैं।

इन तीन मामलों से भी जिनका दिल न दहलता हो, उन्हें अपने दिल की जांच जरूर करवानी चाहिए, और दिमाग की भी। उन्हें किसी मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक की सेवाएं लेकर अपनी धार्मिक भावनाओं के बारे में भी विश्लेषण करवाना चाहिए कि वह सचमुच आस्था ही है, या आस्था की खाल ओढ़ी हुई कातिल भावना है? जिन लोगों को इन तीनों घटनाओं के खतरे नहीं समझते हैं, उनके लिए मध्यप्रदेश के रायसेन की एक खबर है। वहां पर उदयपुरा इलाके के एक गांव में भरत सिंह धाकड़ और उनके परिवार का गांव ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया है, उन्हें किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाता। इसकी वजह है कि भरत सिंह और उसके दो साथी, मनोज पटेल, और सत्येन्द्र रघुवंशी एक दलित परिवार में श्राद्ध पर भोजन कर आए थे। गांव ने पंचायत करके फरमान जारी किया कि दलित के यहां भोजन करना गोहत्या से बड़ा पाप है। इसके लिए गंगा स्नान कर शुद्धिकरण करना होगा, और गांव में भंडारा कराना होगा। जब पंचायत में भरत सिंह ने सवाल उठाया कि दलित के घर भोजन उसने किया तो उसके पिता का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है, तो उसे जवाब मिला कि अगर पिता को दोष से मुक्त रखना है, तो मुंडन कराकर जीते जी उनका पिंडदान कर दो, और संबंध तोडऩे की घोषणा कर दो, तभी वे तुम्हारे पाप से मुक्त माने जाएंगे।

अब इतने पर भी जिनका दिल न दहलता हो, उनके लिए यह देखना भी जरूरी है कि दूसरे धर्म से नफरत बढ़ते-बढ़ते, विधर्मी न मिलने पर अपने धर्म की दूसरी जातियों के खिलाफ किस तरह हिंसक होने लगती हैं। हिन्दू धर्म का ही भगवा चोला ओढ़ा हुआ रामभद्राचार्य नाम का एक आदमी वीडियो-कैमरों के सामने, मंच से, भक्तों के बीच बोलते हुए नफरत की ढेरों बातें करता है। वह मुस्लिमों के खिलाफ बोलते-बोलते ब्राम्हणों की ही कुछ उपजातियों के खिलाफ गंदी और ओछी बातें बोलता है, दलितों और आरक्षित तबकों के खिलाफ तो हिंसक बातें बोलता ही है, अब महिलाओं के बारे में भी उसने बहुत ही घटिया और ओछी बातें कही हैं। यह आदमी कुंभ के दौरान धरती के नक्शे से पाकिस्तान के मिट जाने का दावा कर रहा था। ऐसी ही तमाम अनर्गल बातों के चलते हुए ही उसे पिछले बरस ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया, और भारत सरकार ने उसे देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मविभूषण से सम्मानित किया। देश के दलित-आदिवासी संगठनों ने उनके घोर जातिवादी, नफरती, और हिंसक बयानों के लिए पद्मविभूषण वापिस लेने की मांग भी की। ब्राम्हण जाति के अपने असीमित अहंकार, और बाकी सबके लिए हिंसक नफरत के साथ वे धर्मान्ध हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र बने हुए हैं।

जिन लोगों को दूसरे धर्म के लोगों से हिंसक नफरत से परहेज नहीं है, उन लोगों को आगे चलकर अपने ही धर्म की दूसरी जातियों की नफरती-हिंसा का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। नफरत और हिंसा जब मिजाज का हिस्सा बन जाते हैं, तो उनकी प्राथमिकता शायद दूसरा धर्म रहती है, लेकिन आसपास विधर्मी न रहने पर उस नफरती हिंसा के मुंह लगा हुआ खून का स्वाद उसे अपने धर्म की दूसरी जातियों को खाने के लिए उकसाता है, और फिर धर्म और जातियों, इन सबसे परे औरतें तो बनी ही इसीलिए हैं कि नफरती भीड़ हो, या रामभद्राचार्य जैसे किसी भी धर्म के लोग हों, वे उन्हें दिलजोई का खिलौना मानकर उनको बेइज्जत करते रहें।

आपका धर्म अगर आपको नफरती और हिंसक बना रहा है, तो आपको धर्म की अपनी जरूरत के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए। वैसे तो पूरे भारतीय लोकतंत्र को यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय कहा जाने वाला एक खूब बड़ा सा स्मारक है।

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