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दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) अब सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने में तेजी से जुटी है. इसके साथ ही कंपनी अपनी छोटी खानों को बंद कर रही है.
सीआईएल की योजना अब एक अन्य सरकारी कोयला कंपनी एनएलसी इंडिया के साथ मिलकर 3,000 मेगावाट के सोलर इनर्जी प्रोजेक्ट में निवेश करने की है.
कंपनी यह भी चाहती है कि देश में सोलर प्रोजेक्ट के लिए न्यूनतम क़ीमत लगाकर ऐसी परियोजनाएं हासिल करे. सबसे अधिक कोयला पैदा करने वाली कंपनी की नीति में इसे बहुत बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
कंपनी के चेयरमैन प्रमोद अग्रवाल ने रॉयटर्स के साथ एक इंटरव्यू में कहा, ''अगले दो या दशक में हम कोयले का बिज़नेस ख़ोने जा रहे हैं.आने वाले सालों में कोयले की जगह सोलर इनर्जी ले लेगी.''
सीआईएल जिस प्रोजेक्ट में एनएलसी इंडिया का पार्टनर बनने जा रही है, उसकी अनुमानित लागत 12,500 करोड़ रुपए है. अनुमान है कि 2024 तक इस लागत का क़रीब आधा सीआईएल की ओर से निवेश होगा.
कोल इंडिया ने अप्रैल 2017 से मार्च 2020 के बीच अपनी 82 खानों को बंद कर दिया है, जबकि अपने कर्मचारियों की संख्या में 18,600 की कटौती कर दी है. प्रमोद अग्रवाल का अनुमान है कि कार्यबल में अभी और कटौती होगी.
उनके अनुसार इससे होने वाली बचत को फिर सोलर वेफर (सौर उपकरण) को बनाने में पुनर्निवेश किया जाएगा. ऊर्जा उत्पादन में परिवर्तन भारत फिलहाल थर्मल पावर के लिए हर साल 100 करोड़ टन कोयले का उपयोग करता है.
चीन के बाद इस मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है. केंद्रीय कोयला मंत्रालय के अनुसार, इनमें से भी क़रीब 70 फ़ीसदी यानी 71 करोड़ टन कोयले का उत्पादन अकेले कोल इंडिया करती है.
अमेरिकी इनर्जी इन्फॉरमेशन एजेंसी के अनुसार यह आंकड़ा 2019 में अमेरिका के कुल कोयला उत्पादन से भी थोड़ा ज्यादा है. भारत का मानना है कि पर्यावरण में हो रहे बदलावों के चलते ऊर्जा स्रोतों में आने वाले समय में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा.
भारत जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते का मुख्य हस्ताक्षरी है. लिहाज़ा भारत का वादा है कि वह 2030 तक 2005 के कार्बन उत्सर्जन स्तर में 35 फ़ीसदी की कटौती कर लेगा. पिछले साल देश का कार्बन उत्सर्जन कई दशकों में पहली बार घटा था.
हालांकि जानकारों का मानना है कि कोरोना महामारी के चलते लगे सख़्त लॉकडाउन और उसके चलते कोयले की ख़पत में कमी होने से ऐसा हुआ था.
भारत को उम्मीद है कि अगले साल यानी 2022 तक अक्षय ऊर्जा का उत्पादन बढ़कर 175 गीगावाट हो जाएगा. जबकि 2030 तक इसे 450 गीगावाट तक ले जाने का लक्ष्य है. (bbc.com)


