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जयललिता की मौत के कुछ दिन बाद ही एआईएडीएमक पार्टी के दो हिस्से हो गए थे.
एक धड़े का नेतृत्व ओ पनीरसेलवम कर रहे थे जो शुरुआत में मुख्यमंत्री भी बने जबकि शशिकला के नेतृत्व वाले दूसरे धड़े ने ईडापड्डी के पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बनाया. एक छोटे लेकिन नाटकीय घटनाक्रम के बाद पलानीस्वामी सीएम बने थे.
एआईएडीएमके ने ओ पनीरसेलवम को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया, हालांकि उन्हें अस्थायी तौर पर ही सीएम चुना गया था लेकिन वो इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर सत्ता और पार्टी को अपने नियंत्रण में करने में नाकाम रहे.
दूसरी तरफ़ ईके पलानीस्वामी ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों के भीतर ही सरकार और पार्टी को अपने नियंत्रण में ले लिया. इसकी एक वजह जयललिता की मौत को भी बताया जा सकता है लेकिन उन्होंने ये भी साबित कर दिया कि वो कितने मंझे हुए राजनेता हैं.
उन्होंने ना सिर्फ़ अपने प्रतिद्वंदी ओ पनीरसेलवम को अपने पाले में कर लिया बल्कि पार्टी को शशिकला परिवार के चंगुल से भी निकाल लिया. ये बिडंबना ही है कि अपने राजनीतिक करियर में उन्हें हार ही ज़्यादा मिली थी.
पलानीस्वामी का जन्म 12 मई 1954 को सेलम ज़िले के इडापड्डी क़स्बे के पास सिलूवापलयम में करूपा गौंडर और दावूसायम्माल के घर में हुआ था. वो अपने माता पिता के दूसरे बेटे थे.
उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इरोड वासावी कॉलेज से जूलॉजी में स्नातक की डिग्री हासिल की. शुरू से ही उनका रुझान राजनीति में था. उन्होंने उस दौरान अस्तित्व में आई एआईएडीएमके पार्टी का दामन थाम लिया.
वो अपना खर्च चलाने के लिए गुड़ की दलाली का काम भी करते थे. लेकिन उनकी रूचि राजनीति में ही रहती थी और इसी में उनका अधिकतर समय व्यतीत होता था. उनके रुझान को देखकर पार्टी ने उन्हें कोनेरीपट्टी शाखा का सचिव बना दिया था. ये पार्टी के भीतर उन्हें मिला पहला राजनीतिक पद था.
साल 1989 में एमजीआर की मौत के बाद हुए चुनावों में पार्टी दो धड़े में बँट गई थी. एक जयललिता और दूसरा जानकी का धड़ा था. पलानीस्वामी जयललिता के साथ थे और उन्हें इडापड्डी से टिकट दे दिया गया. उस चुनाव में डीएमके को बहुमत मिला था लेकिन पलानीस्वामी अपनी सीट जीतने में कामयाब रहे थे.
उन्होंने 1364 वोटों से जीत हासिल की थी. 1991 में हुए चुनावों में उन्हें फिर से टिकट मिला और इस बार उन्होंने 41 हज़ार से अधिक वोटों से जीत हासिल की.
1996 में जब उन्होंने फिर से चुनाव लड़ा तो इस बार सत्ताविरोधी लहर का सामना करना पड़ा. पार्टी के दूसरे कई उम्मीदवारों की तरह वो भी अपनी सीट हार गए. इसके बाद के सालों में उनके राजनीतिक करियर में कई रुकावटों आईं और उन्हें एक के बाद एक हार का भी सामना करना पड़ा.
1998 के लोकसभा चुनावों में उन्हें थीरूचेंदूर सीट से जीत तो हासिल कर ली थी लेकिन कुछ ही महीनों में संसद भंग कर दी गई थी. इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनावों में वो डीएमके के उम्मीदवार एम कनप्पम से करीब साढ़े चार हज़ार वोटों से हार गए थे. उन्होंने साल 2004 में फिर चुनाव लड़ा लेकिन डीएमके के उम्मीदवार के सामने फिर हार गए.
लेकिन पार्टी महासचिव जयललिता को उन पर पूरा भरोसा था. 2006 के विधानसभा चुनावों में उन्हें फिर से इडापड्डी से टिकट दिया गया. इस बार वो पीएमके पार्टी की कावेरी के सामने 6347 मतों से हार गए.
पार्टी ने उन्हें हर बार मौक़ा दिया लेकिन 1991 से 2011 के बीच उन्होंने एक चुनाव को छोड़कर हर चुनाव में हार का सामना किया. कोई और राजनेता होता तो उम्मीद ही छोड़ बैठता या हो सकता है राजनीति से ही किनारा कर लेता. लेकिन पलानीस्वामी ने प्रयास जारी रखे और कभी भी अपनी राजनीतिक गतिविधियां बंद नहीं की.
साल 2011 में उन्हें फिर से इडापड्डी सीट से लड़ने का मौका मिला. बीस साल बाद वो फिर विधानसभा पहुंचे. इस बार उन्हें मंत्री भी बना दिया गया. उन्हें हाइवे और छोटे बंदरगाहों का मंत्री बनाया गया. ये वो समय था जब उन्हें एआईएडीएमके के शीर्ष चार नेताओं में शामिल किया जाने लगा था.
साल 2016 के चुनावों में उन्हें फिर से अपनी सीट से लड़ने का मौका दिया गया और पार्टी की सरकार आने पर मंत्री भी बनाया गया. नाकामयाबियों के बावजूद उन्हें टिकट मिलता रहा और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का सहारा मिलता रहा. इसकी एक वजह ये भी रही कि शशिकला उन्हें अपने भरोसे का आदमी मानती थीं.
जयललिता ने जब केए संकोटायन को नज़रअंदाज़ किया तब भी इडापड्डी को भरोसेमंद माना गया. माना जाता है कि जयललिता की मौत के बाद उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया गया था लेकिन उस समय मुख्यमंत्री पद संभाल रहे ओ पनीरसेलवम को ही पद के लिए चुना गया.
पार्टी की अंदरूनी राजनीति की वजह से जब ओ पनीरसेलवम ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा तब शशिकला को एआईएडीएमके विधायक दल का नेता चुना गया था और राज्यपाल से उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का आग्रह किया गया था.
लेकिन राज्यपाल ने शपथ दिलाने में कई दिन की देरी की और इस दौरान आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया. इस मामले में दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी करीबी सहयोगी शशिकला पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप थे. ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में सभी अभियुक्तों को सज़ा सुनाई थी जबकि हाई कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया था.
अभियोजन पक्ष ने हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जहां ये मामला कई सालों से लंबित था. इस दौरान मुख्य अभियुक्त जयललिता की मौत हो गई थी.
दो दशक पुराना ये मामला जब अपने अंजाम तक पहुंचा तो शशिकला के लिए बहुत बुरा वक्त लेकर आया. राज्यपाल की तरफ़ से सरकार बनाने के निमंत्रण का इंतज़ार कर रहीं शशिकला को दोषी क़रार दे दिया गया और उन्हें जेल जाना पड़ा.
ऐसे समय में शशिकला ने इडापड्डी पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना. शशिकला ने सोचा होगा कि उनका परिवार पर्दे के पीछे से मुख्यमंत्री को नियंत्रित कर पाएगा. उन्होंने 14 फ़रवरी 2017 को सीएम पद की शपथ ली.
शशिकाल समेत किसी ने भी ये अंदाज़ा नहीं लगाया होगा कि वो पार्टी को अपने नियंत्रण में ले लेंगे. शशिकला और टीटीवी दीनाकरन के प्रभाव को तोड़कर उन्होंने पार्टी को अपने एकक्षत्र राज में ले लिया.
उन्होंने शुरुआत धीरे-धीरे की और फिर अपनी गति बढ़ाई. उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि सरकार और पार्टी का हर तत्व उनके लिए काम करे. उन्होंने ओ पनीरसेलवम को अपने पाले में लिया और टीटीवी दीनाकरन के समर्थक विधायकों के इस्तीफ़े ले लिए.
उन्होंने सरकार चलाने के लिए ज़रूरी विधायकों की संख्या भी हासिल की. उन्होंने आगामी चुनावों के लिए अपने आप को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कराने के लिए भी सभी ज़रूरी इंतेज़ाम किए.
इडापड्डी पलानीस्वामी तमिलनाडु में कामराजार, बक्तावत्सलम, करुणानिधी, एमजीआर और जयललिता के बाद सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले व्यक्ति भी बन गए हैं.
हालांकि ये भी सच है कि उन्होंने अपने आप को मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश करके कोई जीत हासिल नहीं की है. पलानीस्वामी के लिए सीएम के पद पर बने रहना और राजनीति में बने रहना कोई आसान काम नहीं रहा है.
साल 2021 के विधानसभा चुनाव राज्य में कई नेताओं और पार्टियों का भविष्य तय करेंगे. इडापड्डी पलानीसामी उनमें से एक हैं. लेकिन उन्होंने ये तो साबित कर ही दिया है कि वो ऐसे व्यक्ति नहीं है जिन्हें कुछ समय के लिए कोई खाली जगह भरने के लिए बुलाया जाए और फिर वो गुमनाम हो जाएं. राज्य की सत्ता में उन्होंने अपनी जगह तो बना ही ली है.(bbc.com)


