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दैनिक जागरण में छपी ख़बर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर अभियुक्त को ज़मानत देने का मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि ऐसी शर्तें स्वीकार नहीं की जा सकती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा और दुष्कर्म मामलों पर ज़मानत देते वक्त अतार्किक शर्तों और घिसी-पिटी पुरुषवादी सोच दिखाने वाली टिप्पणियों पर कड़ा रुख़ अपनाते हुए कहा है कि जजों को केस की सुनवाई के दौरान ना बोलना चाहिए ना लिखना चाहिए जिससे पीड़िता का कोर्ट की निष्पक्षता पर भरोसा कम हो.
ख़बर में कहा गया है कि जस्टिस एएम खनविलकर और जस्टिस एस रविंद्र भट की पीठ ने अपने फ़ैसले की शुरुआत हेनरिक इब्सेन के कथन से की जिसमें कहा गया है कि वर्तमान में महिलाएं ऐसे समाज में हैं जो ख़ासतौर पर मर्दाना समाज है, जहां पुरुषों द्वारा बनाए गए क़ानून और न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं का आचरण पुरुषवादी नज़रिए से आंका जाता है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर खेद जताया है कि इब्सेन की 19वीं सदी में कही गई बात 21 सदी में भी सत्य है. (bbc.com)


