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बर्फानी आश्रम के संत लाल बिहारी का अहमदाबाद में निधन
24-Dec-2020 1:14 PM
बर्फानी आश्रम के संत लाल बिहारी का अहमदाबाद में निधन

   अमरकंटक के बाद नांदगांव में बर्फानी धाम के नाम से शुरू किया दूसरा आश्रम   

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 24 दिसंबर।
बर्फानी दादा के नाम से विख्यात संत लाल बिहारी दास का बुधवार देर रात को अहमदाबाद में निधन हो गया। छत्तीसगढ़ में बर्फानी धाम की राजनांदगांव में पहली नींव रखने वाले संत स्व. लाल बिहारी दास मूल रूप से उत्तरप्रदेश के अयोध्या के पास एक गांव में जन्म लिया था। उनकी देश के प्रमुख संतों में गिनती होती थी। करीब 25 साल पहले राजनांदगांव को बर्फानी धाम का निर्माण कर उन्होंने धार्मिक क्षेत्र में पहचान दिलाई। 6 अक्टूबर 1996 को बर्फानी दादा ने अमरकंटक के बाद दूसरा आश्रम राजनांदगांव में स्थापित किया। बीते दो दशक में बर्फानी धाम एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बन गया।

बताया जाता है कि राजस्थान के मेंहदीपुर में वह नया आश्रम निर्माण का मुआयना करने के लिए कुछ दिनों से ठहरे हुए थे। कल अचानक उनकी तबियत में उतार-चढ़ाव आया और बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच उन्हें अहमदाबाद में भर्ती कराया गया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। वह अखिल भारतीय चतुर सम्प्रदाय के अध्यक्ष भी थे। 

राजनांदगांव में पाताल भैरवी शक्तिपीठ के प्रमुख होने की वजह से उनके भक्तों की लंबी फेहरिस्त है। पाताल भैरवी मंदिर में लाखों की तादाद में श्रद्धालु सालभर दर्शनार्थ हेतु पहुंचते हैं। आश्रम के स्थापना के साथ उन्होंने अपनी निगरानी में 1997 से शरद पूर्णिमा के अवसर पर जड़ी-बूटीयुक्त खीर वितरण करने की शुरूआत की। उनके द्वारा प्रारंभ यह आयोजन अब परंपरागत रूप ले चुका है। 

समिति के सचिव गणेश प्रसाद शर्मा ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि कल 25 दिसंबर को मेंहदीपुर में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। समूचे देश के अलावा वैश्विक स्तर पर भी उनके भक्तों की काफी तादाद है। उनके निधन की खबर से राजनांदगांव शहर में शोक की लहर है। अपने जीवनकाल में उन्होंने भोपाल, इंदौर, विशाखापट्नम में भी आश्रम की स्थापना की। मेंहदीपुर में निर्माणाधीन आश्रम की व्यवस्था देखने पहुंचने के दौरान उनकी तबियत बिगड़ गई। बीते 5-6 दिसंबर को उन्होंने अयोध्या के रामलला का दर्शन किया। बताया जाता है कि राम मंदिर निर्माण में भी उनकी प्रत्यक्ष दखल थी।  इधर निधन पर अनुयायियों ने स्थानीय बर्फानी आश्रम  में संत के कमरे में एकत्रित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।


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