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बिहार चुनाव: लेफ़्ट पार्टियों का उदय एक बार फिर कैसे हुआ?
11-Nov-2020 4:07 PM
बिहार चुनाव: लेफ़्ट पार्टियों का उदय एक बार फिर कैसे हुआ?

1995 के बिहार विधानसभा चुनाव. ये वो चुनाव थे जब ना तो बिहार में आरजेडी थी और ना जेडीयू. 1994 में नीतीश कुमार ज़रूर समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे.

-सरोज सिंह

1995 के चुनाव में नीतीश कुमार ने सीपीआई (एमएल) के साथ चुनाव लड़ा था. सीपीआई (एमएल) के साथ ही नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन का पहला गठबंधन किया था.

उनके नेतृत्व में समता पार्टी ने 310 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और महज़ 7 सीटों पर उन्हें जीत मिली थी. गठबंधन के उनके साथी सीपीआई (एमएल) ने उस वक़्त भी 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. ये वो दौर था जब अविभाजित बिहार विधानसभा में कुल 324 सीटें हुआ करती थी.

साल 2020 आते-आते समय का चक्र ऐसा बदला कि उसी सीपीआई (एमएल) ने विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर चुनाव लड़ा. 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और 12 सीटों पर जीत दर्ज की है. उनसे साथ सीपीआई और सीपीएम ने भी दो दो सीटों पर जीत हासिल की है.

बिहार विधानसभा के नतीजों के बारे में एक बात जो सबसे पुख़्ता तरीके से कही जा सकती है वो है सीपीआई (एमएल) का रिवाइवल. लेफ़्ट पार्टियों का भी प्रदर्शन कुल मिला कर अच्छा ही रही है. तीनों पार्टियाँ 29 सीटों पर लड़ी और 16 सीटों पर जीते. बंगाल और केरल के बाद बिहार तीसरा राज्य है जहाँ उनके विधायकों की संख्या ज़्यादा है.

साल 2020 के विधानसभा चुनाव ने सीपीआई (एमएल) के लिए संजीवनी के तौर पर काम किया है. पिछले चुनाव तक ये पार्टी ही बिहार के चुनावी मैदान में अकेले के दम पर उतरती थी.

लेकिन इस बार अपनी विचारधारा के साथ समझौता करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल जैसी क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन किया और बहुत हद तक अपनी खोई हुई ज़मीन पाने में सफल रहे हैं.

2015 के विधानसभा चुनाव में इनको मात्र तीन सीटों पर जीत मिली थी. पिछली बार के नतीजों से सबक लेते हुए भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से अलग रखने के इरादे से उन्होंने इस बार महागठबंधन का हाथ थामा.

जहाँ एक ओर आरजेडी जातिगत राजनीति में माहिर मानी जाती है, वहीं सीपीआई (एमएल) हमेशा से वर्ग संघर्ष की राजनीति करती आई है.

इस बेमेल जोड़ी को उन्होंने क्यों स्वाकार किया? ये सवाल चुनाव में उनसे कई बार पूछा भी गया, लेकिन जवाब बड़े ही नपे तुले अंदाज में ही हमेशा आया. विचारधारा के स्तर पर दोनों पार्टियों में बहुत समानता नहीं है, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के ख़ातिर हमने गठबंधन का हिस्सा बनना स्वीकार किया.

लेफ़्ट का बेहतर प्रदर्शन कैसे?
लेफ़्ट पार्टियों का ऐसा प्रदर्शन कैसे संभव हुआ?

इस सवाल के जवाब में प्रभात खबर के पटना के रेज़िडेंट एडिटर अजय कुमार कहते हैं, "लेफ़्ट पार्टियों का बिहार में सामाजिक आधार हमेशा से रहा है. 90 के दशक के बाद से लेकर अब तक मध्यमार्गीय पार्टियों जैसे राजद और जदयू ने उन्हें काफ़ी नुक़सान पहुँचाया. एक दौर था जब लेफ़्ट के कई लोग टूट कर लालू यादव के साथ चले गए थे, मंत्री तक बने थे. मंडल पॉलिटिक्स के दौर में उन्हें सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ. उनका जनाधार, उनसे छूटता चला गया. इस वजह से ज़्यादा सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के बावजूद वो जीत कर उसे सीटों में तब्दील नहीं कर पाते थे. भारत में जाति और वर्ग का भेद एक बिंदु पर जा कर मिट जाता है. छोटी जाति वाले ज़्यादातर ग़रीब वर्ग के लोग ही होते हैं. इसी वजह से लेफ़्ट का स्पोर्ट कम होता गया."

इस चुनाव में सीपीआई (एमएल) या कहें तो लेफ़्ट की बाक़ी दोनों पार्टियों का अच्छा प्रदर्शन रहा है. गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के फैसले से लेफ़्ट को बहुत फ़ायदा मिला है.

मध्य बिहार और दक्षिण बिहार के इलाकों में जहाँ लेफ़्ट का जनाधार अब भी बचा था, वहाँ गठबंधन के साथ होने से जनता ने एकजुट होकर वोट किया है. ऐसा अजय कुमार को लगता है.

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...जब लेफ़्ट ही बिहार में विपक्ष था

बिहार में वामपंथी पार्टियों की 70 के दशक में मज़बूत ज़मीन रही है. बिहार विधानसभा में सीपीआई 1972 से 77 तक मुख्य विपक्षी पार्टी रही. लेकिन 1977 में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का फ़ैसला किया, तब से जातीय पहचान और जाति के आधार पर उत्पीड़न की बहस राजनीति के केंद्र में आई और वामपंथी पार्टियों का जनाधार खिसकता गया.

बाद में मंडल कमीशन लागू हुआ और वामपंथी पार्टियों के वर्ग संघर्ष की बहस जातीय पहचान की राजनीति के सामने नहीं टिक पाई.

अजय कुमार आगे कहते हैं, "1990 में सीपीआई (एमएल) भूमिगत थी. ये इंडियन पीपल्स फ़्रंट नाम से ऑपरेट करते थे. 1990 से 1995 के बीच वाम दल के कुछ बड़े नेता जिनमें सूर्य देव सिंह, कृष्ण देव सिंह, श्री भगवान सिंह लालू यादव के साथ जा कर मिल गए थे. यही वो दौर था जब वाम विचारधारा का बिहार में पतन शुरू हुआ था."

लेकिन ये भी सच है कि लेफ़्ट पार्टियाँ बिहार में एकजुट हो कर नहीं लड़ पा रही थीं. 1995 के बाद ये पहला मौक़ा है जब लेफ़्ट पार्टियाँ गठबंधन में चुनाव लड़ी हों. पिछले बार 2015 में वो महागठबंधन का हिस्सा नहीं थी. हालाँकि चुनाव में भी तीनों पार्टियों के बीच बहुत एक जुटता नहीं दिखी. कन्हैया कुमार जो सीपीआई के नेता हैं, उन्होंने इस बार सीपीआई (एमएल) के नेताओं के लिए प्रचार नहीं किया.

बिहार विधानसभा चुनाव में सीपीआई (एमएल) का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन माना जा रहा है. साल 2000 के बाद से अब तक अकेले सीपीआई(एमएल) दहाई का आँकड़ा पार नहीं कर पाई थी. 2000 में 6 सीटें जीती थी, 2005 के अक्टूबर वाले चुनाव में 5 सीटें जीती थी, 2010 में वो खाता भी नहीं खोल पाई थी और 2015 में 3 सीटें इनके खाते में आई थी.

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प्रदर्शन पर पार्टी का रुख़
साल 2020 के बिहार चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बारे में सीपीआई (एमएल) के राज्य महासचिव कुणाल कहते हैं, "हम हर बार 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारते थे. इस बार हमने अपने कई सीटों की एक तरह से बलि दी है. महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिए हमने ऐसा किया. और अब इस गठबंधन का परिणाम अच्छा ही दिख रहा है."

वो आगे कहते हैं, "जहाँ हमने अपनी सीटें छोड़ी हैं, वहाँ कई जगह पर महागठबंधन के उम्मीदवार अच्छा कर रहे हैं, ये अपने आप में शुभ संकेत हैं. साफ़ दिख रहा है कि हमारा वोट ट्रांसफर भी हुआ है. हमारी पार्टी का जनादेश पूरे बिहार में है. भले ही हम जीतने की स्थिति में हर सीट पर ना हों. लेकिन हम जिधर जाते हैं हमारा वोट बैंक वहीं जाता है."

कुणाल के मुताबिक़ जगदीशपुर, बड़हरा, संदेस कुछ ऐसी सीटें हैं जहाँ सीपीआई (एमएल) पहले भी अच्छी करती रही हैं. महागठबंधन में शामिल होने के लिए इस बार इन सीटों पर सीपीआई (एमएल) ने अपने उम्मीदवार खड़े नहीं किए और रुझान में ये सीटें महागठबंधन के खाते में जाती दिख रही हैं. (bbc.com/hindi)


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